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प्रश्न 1. इंद्र को ‘पुरंदर’ क्यों कहा गया है?
(A) क्योंकि वे वर्षा के देवता थे
(B) क्योंकि वे किलों को तोड़ने वाले थे
(C) क्योंकि वे युद्ध में सदा विजयी होते थे
(D) क्योंकि वे सर्वशक्तिमान थे
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उत्तर: (B) क्योंकि वे किलों को तोड़ने वाले थे
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📝 Summary: इंद्र को ‘पुरंदर’ कहा गया है, जिसका मतलब है किलों को तोड़ने वाला। यहाँ ‘पुर’ का अर्थ है किला या नगर और ‘दर’ का अर्थ है तोड़ने वाला। ऋग्वेद में बताया गया है कि इंद्र अपने शत्रुओं के किले और नगरों को अपनी शक्ति से नष्ट करते थे। उनका यह कार्य उनके वीरता और युद्ध कौशल को दर्शाता है। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि इंद्र द्वारा ‘पुरों’ के विनाश का उल्लेख सिंधु घाटी सभ्यता के नगरों के पतन से जुड़ा हो सकता है। इसलिए इंद्र को शक्तिशाली और युद्ध में निपुण देवता माना गया।
प्रश्न 2. इंद्र को ‘वृत्रहन्ता’ क्यों कहा गया है?
(A) क्योंकि उन्होंने दानव वृत्र को मारकर अकाल दूर किया
(B) क्योंकि उन्होंने राक्षसों का नाश किया
(C) क्योंकि उन्होंने पृथ्वी की रक्षा की
(D) क्योंकि उन्होंने देवताओं को अमरत्व दिया
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उत्तर: (A) क्योंकि उन्होंने दानव वृत्र को मारकर अकाल दूर किया
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📝 Summary: ऋग्वेद के अनुसार, ‘वृत्र’ एक अकाल का दानव था जिसने जल को रोक दिया था, जिससे सूखे की स्थिति उत्पन्न हो गई। इंद्र ने अपने वज्र से वृत्र का वध किया और जल को मुक्त करके वर्षा कराई। इसी कारण इंद्र को ‘वृत्रहन्ता’ कहा गया, जिसका अर्थ है वृत्र का वध करने वाला। यह कथा दर्शाती है कि इंद्र की पूजा वर्षा और कृषि की सफलता के लिए की जाती थी।
प्रश्न 3. ऋग्वेद में अग्नि देवता का उल्लेख कितनी बार हुआ है?
(A) 100 बार
(B) 150 बार
(C) 200 बार
(D) 250 बार
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उत्तर: (C) 200 बार
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📝 Summary: ऋग्वेद में अग्नि देवता का उल्लेख लगभग 200 बार हुआ है। अग्नि को ऋग्वेद का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण देवता माना जाता है। वे व्यक्ति और ईश्वर के बीच मध्यस्थ का काम करते थे। यज्ञ में दी गई आहुति अग्नि के माध्यम से देवताओं तक पहुँचती थी। ऋग्वेद का पहला मंत्र ‘अग्निमीले पुरोहितम्’ अग्नि की स्तुति से शुरू होता है। इंद्र के बाद, जिनका उल्लेख 250 बार हुआ, अग्नि का उल्लेख सबसे अधिक है। यह दिखाता है कि ऋग्वैदिक धर्म में यज्ञ और अग्नि की पूजा का कितना महत्व था।
प्रश्न 4. ऋग्वेद में अग्नि देवता की क्या भूमिका बताई गई है?
(A) युद्ध में सहायक देवता
(B) व्यक्ति और ईश्वर के बीच मध्यस्थ देवता
(C) वर्षा और जल के देवता
(D) मृत्यु और पाताल के देवता
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उत्तर: (B) व्यक्ति और ईश्वर के बीच मध्यस्थ देवता
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📝 Summary: ऋग्वेद में अग्नि देवता को व्यक्ति और ईश्वर के बीच मध्यस्थ या Messenger माना गया है। यज्ञ में दी गई आहुति अग्नि के माध्यम से देवताओं तक पहुँचती थी। इसी कारण अग्नि को ‘देवदूत’ भी कहा जाता है। अग्नि के बिना यज्ञ संभव नहीं था। इंद्र के बाद अग्नि को ऋग्वेद में सर्वाधिक महत्व दिया गया है। भारतीय परंपरा में आज भी यज्ञ अग्नि के माध्यम से ही संपन्न होते हैं।
प्रश्न 5. वरुण देवता को ‘ऋतस्य गोपा’ कहा गया है — इसका क्या अर्थ है?
(A) जल के रक्षक
(B) नैतिक मूल्यों (ऋत) के रक्षक
(C) सत्य के प्रचारक
(D) देवताओं के रक्षक
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उत्तर: (B) नैतिक मूल्यों (ऋत) के रक्षक
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📝 Summary: वरुण देवता को ‘ऋतस्य गोपा’ कहा गया है, जिसका अर्थ है नैतिक मूल्यों का रक्षक। यहाँ ‘ऋत’ का मतलब है सत्य, नैतिक मूल्य और ब्रह्मांड की व्यवस्था और ‘गोपा’ का अर्थ है रक्षक। वरुण सभी प्राणियों के शुभ और अशुभ कर्मों के ज्ञाता माने जाते थे। नैतिक दृष्टि से, वे ऋग्वैदिक देवताओं में सबसे श्रेष्ठ थे। यह तथ्य UPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछा जाता है।
प्रश्न 6. ऋग्वेद में वरुण देवता का किस रूप में उल्लेख हुआ है?
(A) युद्ध के देवता के रूप में
(B) सृष्टि के नियंता के रूप में
(C) कृषि के देवता के रूप में
(D) मृत्यु के देवता के रूप में
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उत्तर: (B) सृष्टि के नियंता के रूप में
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📝 Summary: ऋग्वेद में वरुण देवता का उल्लेख ‘सृष्टि के नियंता’ के रूप में हुआ है। वे ब्रह्मांड की नैतिक और प्राकृतिक व्यवस्था के रक्षक थे। वरुण सभी प्राणियों के शुभ और अशुभ कर्मों के ज्ञाता माने जाते थे और उन्हें कहा जाता था कि वे सब कुछ जानते और देखते हैं। नैतिक दृष्टि से, वरुण ऋग्वैदिक काल के सर्वश्रेष्ठ देवता थे।
प्रश्न 7. ऋग्वैदिक काल में वरुण देवता की नैतिक दृष्टि से क्या विशेषता थी?
(A) वे सर्वाधिक पूजनीय देवता थे
(B) वे नैतिक दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ देवता थे और सभी के कर्मों के ज्ञाता थे
(C) वे युद्ध में सर्वाधिक शक्तिशाली थे
(D) वे केवल जल के देवता थे
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उत्तर: (B) वे नैतिक दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ देवता थे और सभी के कर्मों के ज्ञाता थे
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📝 Summary: ऋग्वेद में वरुण को नैतिक दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ देवता माना गया है। वे सभी प्राणियों के शुभ और अशुभ कर्मों के ज्ञाता थे और उन्हें कहा जाता था कि वे सब कुछ जानते और देखते हैं (He knows everything and sees everything)। पापियों को वरुण ‘पाश’ से बाँधते थे। ऋग्वेद में वरुण से पाप-क्षमा माँगने के कई सुंदर सूक्त मौजूद हैं। वरुण की नैतिक अवधारणा एकेश्वरवाद के बहुत करीब मानी जाती है।
प्रश्न 8. आर्यों का सबसे प्रिय पेय पदार्थ क्या था?
(A) दुग्ध
(B) मधु
(C) सोमरस
(D) सुरा
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उत्तर: (C) सोमरस
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📝 Summary: आर्यों का सबसे प्रिय पेय पदार्थ ‘सोमरस’ था, जो ‘सोम’ नामक वनस्पति से बनाया जाता था। यह वनस्पति हिमालय की मुजवंत चोटी से प्राप्त होती थी। सोमरस देवताओं को अर्पित किया जाता था और इसे धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोग किया जाता था। ऋग्वेद का पूरा नवम् मण्डल (144 सूक्त) सोम देवता को समर्पित है। सोम को एक देवता के रूप में भी पूजा जाता था और इसे चंद्रमा का प्रतीक माना जाता है।
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प्रश्न 9. गायत्री मंत्र की रचना किसने की थी?
(A) वशिष्ठ
(B) अत्रि
(C) विश्वामित्र
(D) भरद्वाज
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उत्तर: (C) विश्वामित्र
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📝 Summary: गायत्री मंत्र की रचना महर्षि विश्वामित्र ने की थी। यह मंत्र ऋग्वेद के तृतीय मण्डल में शामिल है, जिसे विश्वामित्र ने रचा। गायत्री मंत्र सूर्य देवता ‘सविता देव’ को समर्पित है। इसमें सविता देव से प्रार्थना की जाती है कि वे हमारी बुद्धि को प्रेरित और प्रचोदित करें। गायत्री मंत्र को हिंदू धर्म का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण मंत्र माना जाता है।
प्रश्न 10. गायत्री मंत्र में किस देवता से क्या प्रार्थना की गई है?
(A) इंद्र से — युद्ध में विजय की प्रार्थना
(B) सविता देव से — बुद्धि को प्रचोदित करने की प्रार्थना
(C) वरुण से — पापों की क्षमा की प्रार्थना
(D) अग्नि से — यज्ञ की सफलता की प्रार्थना
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उत्तर: (B) सविता देव से — बुद्धि को प्रचोदित करने की प्रार्थना
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📝 Summary: गायत्री मंत्र में सूर्य देवता ‘सविता देव’ से प्रार्थना की जाती है कि वे हमारी बुद्धि को प्रचोदित (प्रेरित) करें। मंत्र का सार है — ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’। ‘सविता’ सूर्य का वह रूप है जो प्रेरणा और सृजन का प्रतीक है। यह मंत्र ऋग्वेद के तृतीय मण्डल में है और इसे विश्वामित्र ने रचा था। उपनयन संस्कार के समय बालक को यही मंत्र दिया जाता है।
प्रश्न 11. ऋग्वैदिक काल में देवताओं की तुलना में देवियों की स्थिति कैसी थी?
(A) देवियों का महत्व देवताओं से अधिक था
(B) देवताओं की तुलना में देवियों का महत्व काफी कम था
(C) देवियों और देवताओं का महत्व समान था
(D) देवियों का कोई उल्लेख नहीं था
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उत्तर: (B) देवताओं की तुलना में देवियों का महत्व काफी कम था
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📝 Summary: ऋग्वैदिक काल में देवताओं की तुलना में देवियों का महत्व काफी कम था। इस काल की सबसे प्रसिद्ध देवी ‘ऊषस’ या ‘ऊषा’ थीं, जिन्हें प्रातःकाल की देवी कहा जाता है। इसके अलावा पृथ्वी, अदिति, सरस्वती आदि देवियाँ भी थीं। लेकिन पुरुष देवताओं — इंद्र, अग्नि, वरुण, सोम — की तुलना में देवियों की स्तुतियाँ बहुत कम हैं। यह ऋग्वैदिक समाज के पितृसत्तात्मक स्वरूप का प्रमाण है।
प्रश्न 12. ऋग्वैदिक काल की प्रसिद्ध देवी ‘ऊषा’ को क्या कहा गया है?
(A) वर्षा की देवी
(B) प्रातःकाल की देवी जो सूर्य के यात्रा पथ को खोलती है
(C) नदियों की देवी
(D) पृथ्वी की देवी
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उत्तर: (B) प्रातःकाल की देवी जो सूर्य के यात्रा पथ को खोलती है
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📝 Summary: ऋग्वैदिक काल में ‘ऊषस’ या ‘ऊषा’ प्रातःकाल की देवी थीं। उन्हें कहा जाता था कि वे ‘सूर्य के यात्रा पथ को खोलने वाली’ हैं, अर्थात् वे अंधकार हटाकर सूर्य के लिए मार्ग तैयार करती थीं। ऋग्वेद में उषा की स्तुतियाँ अत्यंत काव्यात्मक और सुंदर हैं। उषा के संदर्भ में लिखी गई कविताएँ विश्व साहित्य की श्रेष्ठ रचनाओं में मानी जाती हैं।
प्रश्न 13. ऋग्वेद में देवताओं के मंदिरों के उदाहरण मिलते हैं या नहीं?
(A) हाँ, अनेक मंदिरों का उल्लेख है
(B) नहीं, ऋग्वेद में मंदिरों या देवताओं की मूर्तियों का कोई उल्लेख नहीं है
(C) केवल इंद्र के मंदिर का उल्लेख है
(D) केवल अग्नि मंदिर का उल्लेख है
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उत्तर: (B) नहीं, ऋग्वेद में मंदिरों या देवताओं की मूर्तियों का कोई उल्लेख नहीं है
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📝 Summary: ऋग्वेद में देवताओं के मंदिरों या मूर्तियों का कोई उल्लेख नहीं है। ऋग्वैदिक आर्य मूर्तिपूजा नहीं करते थे। वे प्रकृति की शक्तियों को मंत्रों और यज्ञ के माध्यम से पूजते थे। मंदिर निर्माण और मूर्तिपूजा की परंपरा भारत में बाद के काल में विकसित हुई। यह तथ्य ऋग्वैदिक धर्म की प्रकृतिवादी विशेषता को दर्शाता है।
प्रश्न 14. उत्तर वैदिक काल में कौन से तीन नए देवताओं का महत्व स्थापित हुआ?
(A) इंद्र, अग्नि, वरुण
(B) रुद्र या शिव, विष्णु या नारायण, ब्रह्मा या प्रजापति
(C) सूर्य, सोम, वायु
(D) यम, कुबेर, वरुण
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उत्तर: (B) रुद्र या शिव, विष्णु या नारायण, ब्रह्मा या प्रजापति
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📝 Summary: उत्तर वैदिक काल में तीन नए देवताओं का महत्व स्थापित हुआ — रुद्र या शिव, विष्णु या नारायण, और ब्रह्मा या प्रजापति। इनमें ब्रह्मा या प्रजापति सर्वाधिक प्रसिद्ध थे। ऋग्वैदिक काल में इंद्र और अग्नि सर्वप्रमुख थे, लेकिन उत्तर वैदिक काल में इनका महत्व कम हो गया। इस समय ब्रह्मा-विष्णु-महेश की त्रिदेव अवधारणा विकसित होने लगी। यह घटना भारतीय धर्म के विकास की महत्वपूर्ण घटना है।
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प्रश्न 15. उत्तर वैदिक काल में नए तीन देवताओं में सर्वाधिक प्रसिद्ध कौन थे?
(A) रुद्र या शिव
(B) विष्णु या नारायण
(C) ब्रह्मा या प्रजापति
(D) इंद्र
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उत्तर: (C) ब्रह्मा या प्रजापति
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📝 Summary: उत्तर वैदिक काल में उभरे तीन नए देवताओं — रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा — में से ब्रह्मा या प्रजापति सर्वाधिक प्रसिद्ध थे। ‘प्रजापति’ का अर्थ है — प्रजा का स्वामी या सृष्टिकर्ता। उत्तर वैदिक साहित्य में प्रजापति को सर्वोच्च देवता के रूप में स्थापित किया गया। बाद के पुराण काल में विष्णु और शिव का महत्व बढ़ा और ब्रह्मा की पूजा कम हो गई। आज भारत में ब्रह्मा का एकमात्र प्रमुख मंदिर पुष्कर में है।
प्रश्न 16. उत्तर वैदिक काल में धर्म के क्षेत्र में क्या परिवर्तन आया?
(A) मूर्तिपूजा समाप्त हो गई
(B) कर्मकांडीय जटिलताएँ बढ़ गईं और पुरोहित वर्ग की मध्यस्थता बढ़ी
(C) यज्ञ परंपरा समाप्त हो गई
(D) एकेश्वरवाद स्थापित हो गया
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उत्तर: (B) कर्मकांडीय जटिलताएँ बढ़ गईं और पुरोहित वर्ग की मध्यस्थता बढ़ी
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📝 Summary: उत्तर वैदिक काल में धर्म के क्षेत्र में कर्मकांडीय जटिलताएँ बढ़ गईं। मंत्रोच्चारण की शुद्धता पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा, जिससे पुरोहित वर्ग की मध्यस्थता बढ़ी। ऋग्वैदिक काल में पुरोहितों के 7 प्रकार थे, जो उत्तर वैदिक काल में बढ़कर 17 प्रकार हो गए। इस समय बड़े-बड़े यज्ञों का आयोजन होने लगा। इसी कर्मकांड की जटिलता की प्रतिक्रिया में बाद में बौद्ध और जैन धर्म का उदय हुआ।
प्रश्न 17. ऋग्वैदिक काल में पुरोहितों के कितने प्रकार थे?
(A) चार
(B) सात
(C) दस
(D) सत्रह
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उत्तर: (B) सात
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📝 Summary: ऋग्वैदिक काल में पुरोहितों के 7 प्रकार थे। उत्तर वैदिक काल में मंत्रोच्चारण की शुद्धता पर जोर बढ़ने के कारण पुरोहितों की संख्या बढ़कर 17 प्रकार हो गई। यह वृद्धि धार्मिक कर्मकांड की जटिलता और पुरोहित वर्ग के प्रभाव में वृद्धि का प्रमाण है। यह तथ्य UPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में भ्रामक प्रश्नों में पूछे जाने के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 18. उत्तर वैदिक काल में पुरोहितों के कितने प्रकार हो गए?
(A) सात
(B) बारह
(C) पंद्रह
(D) सत्रह
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उत्तर: (D) सत्रह
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📝 Summary: उत्तर वैदिक काल में पुरोहितों के प्रकार ऋग्वैदिक काल के 7 से बढ़कर 17 हो गए। यह वृद्धि धार्मिक कर्मकांड की जटिलता और विशेषज्ञता में बढ़ोतरी का प्रमाण है। प्रत्येक यज्ञ के लिए विशेष प्रकार के पुरोहितों की आवश्यकता होती थी। मंत्रोच्चारण में एक भी गलती यज्ञ को निष्फल बना देती थी। इस कारण ब्राह्मण वर्ग की समाज में शक्ति असाधारण रूप से बढ़ी।
प्रश्न 19. उत्तर वैदिक काल में ‘राजसूय यज्ञ’ किस उद्देश्य से किया जाता था?
(A) साम्राज्य प्रसार के लिए
(B) राज्याभिषेक (सिंहासन पर बैठने) से संबंधित
(C) सुरापान की प्रधानता के लिए
(D) रथ दौड़ के लिए
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उत्तर: (B) राज्याभिषेक (सिंहासन पर बैठने) से संबंधित
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📝 Summary: उत्तर वैदिक काल में राजसूय यज्ञ राज्याभिषेक (सिंहासन पर बैठने/Accession to Throne) से संबंधित था। यह यज्ञ राजा के सिंहासन पर बैठने की वैधता को धार्मिक स्वीकृति प्रदान करता था। राजसूय यज्ञ का सर्वप्रथम उल्लेख ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता है। इसी ग्रंथ में देवासुर संग्राम का भी उल्लेख है। महाभारत में युधिष्ठिर ने भी राजसूय यज्ञ किया था।
प्रश्न 20. ‘राजसूय यज्ञ’ का सर्वप्रथम उल्लेख किस ग्रंथ में मिलता है?
(A) शतपथ ब्राह्मण
(B) ऐतरेय ब्राह्मण
(C) तैत्तिरीय ब्राह्मण
(D) गोपथ ब्राह्मण
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उत्तर: (B) ऐतरेय ब्राह्मण
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📝 Summary: राजसूय यज्ञ का सर्वप्रथम उल्लेख ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण ऋग्वेद का एक ब्राह्मण ग्रंथ है। इसी ग्रंथ में देवासुर संग्राम (देवताओं और असुरों के बीच युद्ध) का भी वर्णन है। ऐतरेय ब्राह्मण में ‘आश्रम’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग हुआ। यह ग्रंथ उत्तर वैदिक कालीन इतिहास और संस्कृति की जानकारी का महत्वपूर्ण स्रोत है।
प्रश्न 21. उत्तर वैदिक काल में ‘अश्वमेध यज्ञ’ किस उद्देश्य से किया जाता था?
(A) राज्याभिषेक के लिए
(B) साम्राज्य प्रसार के लिए
(C) सुरापान की प्रधानता के लिए
(D) वर्षा के लिए
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उत्तर: (B) साम्राज्य प्रसार के लिए
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📝 Summary: अश्वमेध यज्ञ साम्राज्य प्रसार के लिए किया जाता था। ‘अश्वमेध’ का शाब्दिक अर्थ है — अश्व (घोड़े) की बलि। इस यज्ञ में एक विशेष घोड़े को छोड़ा जाता था, और जहाँ-जहाँ वह जाता, वह भूमि राजा के अधीन मानी जाती थी। जो राजा उस घोड़े को रोकता, उसे युद्ध करना पड़ता था। अंत में घोड़े की बलि दी जाती थी। इसका उद्देश्य राजा की सर्वोच्चता और साम्राज्य विस्तार को सिद्ध करना था।
प्रश्न 22. उत्तर वैदिक काल में ‘वाजपेय यज्ञ’ की क्या विशेषता थी?
(A) इसमें घोड़े की बलि होती थी
(B) इसमें रथ दौड़ (17 रथ) की प्रधानता थी
(C) इसमें सुरापान की प्रधानता थी
(D) यह राज्याभिषेक से संबंधित था
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उत्तर: (B) इसमें रथ दौड़ (17 रथ) की प्रधानता थी
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📝 Summary: वाजपेय यज्ञ का अर्थ है — ‘शक्ति का पेय’ (Drink of Strength)। यह एक नवीकरण समारोह (Rejuvenation Ceremony) था जो राजा की प्रजा में प्रतिष्ठा को मजबूत करता था। इस यज्ञ की महत्वपूर्ण विशेषता 17 रथों की रथ दौड़ थी। इसमें सुरापान (मदिरा पान) की प्रधानता भी थी। वाजपेय यज्ञ को राजसूय यज्ञ से पहले किया जाता था।
प्रश्न 23. उत्तर वैदिक काल में ‘सीत्रामणि यज्ञ’ की क्या विशेषता थी?
(A) रथ दौड़ की प्रधानता
(B) सुरापान की प्रधानता
(C) घोड़े की बलि
(D) राज्याभिषेक
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उत्तर: (B) सुरापान की प्रधानता
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📝 Summary: उत्तर वैदिक काल में सीत्रामणि यज्ञ में सुरापान (मदिरा पान) की प्रधानता थी। यह यज्ञ उत्तर वैदिक धार्मिक अनुष्ठानों की जटिलता और विविधता को दर्शाता है। इस काल में विभिन्न प्रकार के यज्ञ प्रचलित थे — राजसूय, अश्वमेध, वाजपेय, सीत्रामणि आदि। इन यज्ञों में विशाल संपत्ति और दक्षिणा का व्यय होता था, जिससे पुरोहित वर्ग समृद्ध होता था।
प्रश्न 24. ऐतरेय ब्राह्मण में ‘देवासुर संग्राम’ के अतिरिक्त और किस महत्वपूर्ण विषय का उल्लेख है?
(A) अश्वमेध यज्ञ
(B) राजसूय यज्ञ
(C) वाजपेय यज्ञ
(D) दोनों (B) और (C)
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उत्तर: (B) राजसूय यज्ञ
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📝 Summary: ऐतरेय ब्राह्मण में राजसूय यज्ञ और देवासुर संग्राम दोनों का उल्लेख मिलता है। राजसूय यज्ञ का सर्वप्रथम उल्लेख इसी ग्रंथ में हुआ। ऐतरेय ब्राह्मण ऋग्वेद से संबंधित एक ग्रंथ है। इसमें ‘आश्रम’ शब्द का भी सर्वप्रथम प्रयोग हुआ। यह ग्रंथ उत्तर वैदिक कालीन राजनीतिक और धार्मिक जीवन की महत्वपूर्ण जानकारी देता है।
प्रश्न 25. ‘आश्रम’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किस ग्रंथ में हुआ है?
(A) शतपथ ब्राह्मण
(B) ऐतरेय ब्राह्मण
(C) कठोपनिषद्
(D) मनुस्मृति
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उत्तर: (B) ऐतरेय ब्राह्मण
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📝 Summary: ‘आश्रम’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग ऐतरेय ब्राह्मण में हुआ। आश्रम व्यवस्था उत्तर वैदिक काल में अस्तित्व में आई। चार आश्रम हैं — ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास। चारों आश्रमों का एक साथ उल्लेख पहली बार जाबालोपनिषद् में मिलता है। यह व्यवस्था मनुष्य के जीवन को व्यवस्थित और उद्देश्यपूर्ण बनाने की भारतीय समाजशास्त्रीय अवधारणा है।
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