
प्राचीन भारत का इतिहास भाग-38 MCQ-2026
जैन धर्म MCQ 2026 ये 25 सवाल बार-बार पूछे जाते हैं | Full Explanation
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प्रश्न 1. जैन दर्शन में ‘जीव’ के विपरीत जड़/अचेतन तत्व को क्या कहते हैं?
(A) आत्मा
(B) पुद्गल
(C) धर्म
(D) आकाश
✅ उत्तर: (B) पुद्गल
📝 जैन दर्शन में समस्त अस्तित्व को दो भागों में बाँटा गया है — ‘जीव’ (चेतन/आत्मा) और ‘अजीव’ (जड़/अचेतन)। अजीव के पाँच प्रकार हैं — पुद्गल (Matter), धर्म (Medium of Motion), अधर्म (Medium of Rest), आकाश (Space) और काल (Time)। इनमें ‘पुद्गल’ वह भौतिक तत्व है जिसमें स्पर्श, रस, गंध और रूप जैसे गुण होते हैं। जैन दर्शन में कर्म भी पुद्गल का ही एक रूप है जो जीव से चिपककर उसे बंधन में डालता है। यह षड्द्रव्य सिद्धांत जैन दर्शन की एक विशिष्ट और मौलिक देन है। UPSC प्रीलिम्स में यह शब्दावली पूछी जाती है।
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प्रश्न 2. जैन धर्म में ‘चतुर्विध संघ’ (चार संघ) में क्या-क्या शामिल है?
(A) ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र
(B) साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविका
(C) गणधर, तीर्थंकर, श्रावक, आचार्य
(D) भिक्षु, भिक्षुणी, उपासक, उपासिका
✅ उत्तर: (B) साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविका
📝 जैन धर्म में ‘तीर्थ’ को चार भागों में विभाजित किया गया है जिसे ‘चतुर्विध संघ’ कहते हैं। इसमें (1) साधु (पुरुष साधक जो पंचमहाव्रत का पालन करते हैं), (2) साध्वी (महिला साधिका), (3) श्रावक (पुरुष गृहस्थ जो अणुव्रत पालते हैं), (4) श्राविका (महिला गृहस्थ) — ये चार वर्ग शामिल हैं। साधु और साध्वी पंचमहाव्रत का कठोरता से पालन करते हैं जबकि श्रावक और श्राविका ‘अणुव्रत’ (लघु व्रत) का पालन करते हैं। बौद्ध धर्म में इसके समकक्ष ‘त्रिरत्न’ — बुद्ध, धम्म, संघ — है। जैन धर्म की यह चार वर्गीय संरचना अत्यंत व्यवस्थित और व्यावहारिक है।
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प्रश्न 3. जैन धर्म में गृहस्थों (श्रावकों) के लिए लघु व्रतों को क्या कहा जाता है?
(A) महाव्रत
(B) अणुव्रत
(C) सल्लेखना
(D) संवर
✅ उत्तर: (B) अणुव्रत
📝 जैन धर्म में दो प्रकार के व्रत हैं। साधुओं के लिए ‘पंचमहाव्रत’ — जो कठोर और पूर्ण रूप से पालन किए जाते हैं। गृहस्थों (श्रावकों) के लिए ‘अणुव्रत’ — जो महाव्रतों के सरल और लघु रूप होते हैं। ‘अणु’ का अर्थ ‘छोटा’ होता है। अणुव्रत भी उन्हीं पाँच महाव्रतों पर आधारित हैं — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह — परंतु इनका पालन आंशिक रूप से किया जाता है। जैन धर्म में गृहस्थ जीवन के लिए अणुव्रत की व्यवस्था एक अत्यंत व्यावहारिक दृष्टिकोण है। इससे जैन धर्म सामान्य जन तक भी पहुँच सका। यह BPSC और SSC में पूछा जाता है।
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प्रश्न 4. भद्रबाहु के नेतृत्व में जैन भिक्षु किस दिशा में गए जिससे जैन धर्म दो शाखाओं में बँटा?
(A) पूर्व भारत
(B) उत्तर भारत
(C) दक्षिण भारत
(D) पश्चिम भारत
✅ उत्तर: (C) दक्षिण भारत
📝 जैन धर्म के प्रसिद्ध आचार्य ‘भद्रबाहु’ ने एक बड़े अकाल के समय चंद्रगुप्त मौर्य सहित अपने अनुयायियों के साथ दक्षिण भारत (कर्नाटक) की ओर प्रयाण किया। इसी कारण दक्षिण भारत में जैन धर्म का प्रभाव अत्यंत गहरा हुआ। जो लोग उत्तर भारत में ‘स्थूलभद्र’ के नेतृत्व में रहे वे ‘श्वेतांबर’ कहलाए और जो भद्रबाहु के साथ दक्षिण गए वे ‘दिगंबर’ कहलाए। श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) में जैन धर्म का इतना गहरा प्रभाव इसी ऐतिहासिक प्रवास का परिणाम है। चंद्रगुप्त मौर्य ने भी इसी दौरान जैन धर्म अपनाया। UPSC और BPSC में यह पूछा जाता है।
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प्रश्न 5. उदयगिरि और खंडगिरि की प्रसिद्ध जैन गुफाएं भारत के किस राज्य में हैं?
(A) कर्नाटक
(B) राजस्थान
(C) गुजरात
(D) ओडिशा
✅ उत्तर: (D) ओडिशा
📝 उदयगिरि और खंडगिरि की प्रसिद्ध जैन गुफाएं ओडिशा (उड़ीसा) की राजधानी भुवनेश्वर के निकट स्थित हैं। इनका निर्माण कलिंग के महान जैन शासक ‘राजा खारवेल’ ने करवाया था। खारवेल का काल लगभग पहली शताब्दी ईपू माना जाता है। ये गुफाएं जैन धर्म का पूर्वी भारत में प्रसार और उसकी स्थापत्य कला का महत्वपूर्ण पुरातात्विक प्रमाण हैं। उदयगिरि की गुफाओं में ‘रानी गुम्फा’ सबसे बड़ी और प्रसिद्ध है। यह जैन वास्तुकला और मूर्तिकला का एक उत्कृष्ट नमूना है। UPSC प्रीलिम्स में स्थापत्य स्थलों से यह पूछा जाता है।
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प्रश्न 6. ‘हाथीगुम्फा अभिलेख’ किस शासक से संबंधित है?
(A) अशोक
(B) खारवेल
(C) चंद्रगुप्त मौर्य
(D) समुद्रगुप्त
✅ उत्तर: (B) खारवेल
📝 ‘हाथीगुम्फा अभिलेख’ कलिंग के जैन शासक ‘खारवेल’ से संबंधित है। यह अभिलेख ओडिशा के उदयगिरि पर्वत की ‘हाथीगुम्फा’ (हाथी गुफा) में उत्कीर्ण है। खारवेल ‘महामेघवाहन वंश’ के शासक थे और जैन धर्म के प्रबल समर्थक थे। यह अभिलेख ब्राह्मी लिपि में और प्राकृत भाषा में लिखा गया है। इससे खारवेल के शासनकाल, विजय अभियानों और धार्मिक कार्यों की महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। यह मौर्योत्तर काल का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अभिलेखीय साक्ष्य है। UPSC प्रीलिम्स में यह बार-बार पूछा जाता है।
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प्रश्न 7. श्रवणबेलगोला में गोमतेश्वर (बाहुबली) की मूर्ति का ‘महामस्तकाभिषेक’ कितने वर्षों में एक बार होता है?
(A) 6 वर्ष
(B) 8 वर्ष
(C) 10 वर्ष
(D) 12 वर्ष
✅ उत्तर: (D) 12 वर्ष
📝 श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) में स्थित 70 फीट ऊँची गोमतेश्वर (बाहुबली) की मूर्ति के सम्मान में ‘महामस्तकाभिषेक’ महोत्सव प्रत्येक 12 वर्ष में एक बार आयोजित किया जाता है। इस महोत्सव में लाखों जैन तीर्थयात्री एकत्र होते हैं और मूर्ति के सिर पर दूध, घी, केसर, पुष्प, स्वर्ण आदि से अभिषेक किया जाता है। यह जैन धर्म का सबसे बड़ा और विश्व प्रसिद्ध धार्मिक समागम है। इस महोत्सव को देखने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु आते हैं। यह परंपरा सदियों से निरंतर चली आ रही है और जैन धर्म की एक अनोखी और विशिष्ट पहचान है।
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प्रश्न 8. अकबर के दरबार में कौन सा प्रसिद्ध जैन आचार्य आया था?
(A) भद्रबाहु
(B) हीरविजय सूरि
(C) स्थूलभद्र
(D) देवार्धिगण क्षमाश्रमण
✅ उत्तर: (B) हीरविजय सूरि
📝 मुगल सम्राट अकबर अपनी धार्मिक सहिष्णुता के लिए प्रसिद्ध था। उसके दरबार में श्वेतांबर जैन आचार्य ‘हीरविजय सूरि’ 1583 ई० में आए। अकबर हीरविजय सूरि की विद्वत्ता और व्यक्तित्व से इतना प्रभावित हुआ कि उसने उन्हें ‘जगतगुरु’ की उपाधि प्रदान की। अकबर ने उनके प्रभाव में आकर कुछ समय के लिए पशु वध पर प्रतिबंध भी लगाया था। यह जैन धर्म के मध्यकाल में भी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। UPSC मध्यकालीन इतिहास खंड में यह प्रश्न पूछा जाता है।
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प्रश्न 9. जैन धर्म का सर्वाधिक प्रसार किस सामाजिक-आर्थिक वर्ग में हुआ?
(A) किसान वर्ग
(B) व्यापारी / वणिक वर्ग
(C) ब्राह्मण वर्ग
(D) सैनिक वर्ग
✅ उत्तर: (B) व्यापारी / वणिक वर्ग
📝 जैन धर्म का सर्वाधिक प्रसार व्यापारी और वणिक वर्ग में हुआ। इसका प्रमुख कारण था — जैन धर्म की अहिंसा की कठोर माँग। कृषि में हल चलाने से सूक्ष्म जीवों की हत्या होती है, इसलिए जैन धर्म में कृषि उपयुक्त नहीं मानी गई। फलस्वरूप जैन अनुयायी व्यापार और वाणिज्य की ओर उन्मुख हुए। आज भी जैन समुदाय मुख्यतः व्यापार और उद्योग में अग्रणी है। गुजरात और राजस्थान में जैन व्यापारियों का ऐतिहासिक वर्चस्व इसी परंपरा का परिणाम है। दिलवाड़ा जैसे भव्य मंदिरों का निर्माण भी मुख्यतः वणिक वर्ग ने ही करवाया।
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प्रश्न 10. महावीर ने गृहत्याग के बाद कितने वर्षों की कठोर तपस्या के पश्चात् ज्ञान प्राप्त किया?
(A) 6 वर्ष
(B) 10 वर्ष
(C) 12 वर्ष
(D) 15 वर्ष
✅ उत्तर: (C) 12 वर्ष
📝 महावीर ने 30 वर्ष की अवस्था में अपने बड़े भाई नन्दिवर्धन की आज्ञा लेकर गृहत्याग किया। इसके पश्चात् उन्होंने पूरे 12 वर्षों तक अत्यंत कठोर तपस्या की। इस तपस्याकाल में उन्होंने भोजन, वस्त्र और समस्त सुख-सुविधाओं का पूर्णतः त्याग किया। गृहत्याग के 13वें महीने में वस्त्र त्यागकर नग्न होकर भटकने लगे। 12 वर्ष की कठोर तपस्या के पश्चात् तेरहवें वर्ष में अंग देश के जृंभिय ग्राम के पास ऋजुपालिका नदी के किनारे शाल वृक्ष के नीचे उन्हें ‘कैवल्य’ (पूर्ण ज्ञान) की प्राप्ति हुई। BPSC में यह अक्सर पूछा जाता है।
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प्रश्न 11. जैन दर्शन में ‘बंध’ का क्या अर्थ है?
(A) तपस्या करना
(B) कर्म और आत्मा का संयोग / बंधन
(C) मोक्ष की प्राप्ति
(D) गृहत्याग करना
✅ उत्तर: (B) कर्म और आत्मा का संयोग / बंधन
📝 जैन दर्शन में कर्म सिद्धांत की व्याख्या अत्यंत विस्तृत है। ‘बंध’ उस अवस्था को कहते हैं जब कर्म रूपी पुद्गल और आत्मा का संयोग या बंधन होता है। ‘आसव’ (कर्मों का बहाव) के कारण जीव/आत्मा पर कर्मों का आवरण चढ़ता है जिसे ‘बंध’ कहते हैं। इस बंधन से मुक्ति के लिए ‘संवर’ (बहाव रोकना) और ‘निर्जरा’ (पुराने कर्मों का क्षय) आवश्यक है। जैन धर्म के ‘नवतत्व’ में आसव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष — ये सभी शामिल हैं। UPSC में इन सभी शब्दों के अर्थ और उनके क्रम से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं।
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प्रश्न 12. जैन धर्म के ‘सप्तभंगीनय’ का संबंध किससे है?
(A) सात प्रकार के जीवों से
(B) किसी भी कथन के सात संभावित रूपों की सत्यता से
(C) सात प्रकार के व्रतों से
(D) सात प्रकार के कर्मों से
✅ उत्तर: (B) किसी भी कथन के सात संभावित रूपों की सत्यता से
📝 ‘सप्तभंगीनय’ जैन दर्शन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण तार्किक सिद्धांत है। इसका अर्थ है कि किसी भी कथन या दावे के सात संभावित रूप होते हैं। ‘स्याद्वाद’ और ‘अनेकांतवाद’ से जुड़ा यह सिद्धांत कहता है — (1) स्यात् अस्ति (शायद है), (2) स्यात् नास्ति (शायद नहीं है), (3) स्यात् अस्ति-नास्ति (शायद दोनों), (4) स्यात् अवक्तव्य (कहा नहीं जा सकता)… इस प्रकार सात भंग बनते हैं। यह सिद्धांत जैन दर्शन की बौद्धिक परिपक्वता और सापेक्षिक सत्य की गहरी समझ को दर्शाता है। यह ‘स्याद्वाद’ का व्यावहारिक और तार्किक प्रयोग है।
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प्रश्न 13. महावीर के ग्यारह गणधरों में सर्वप्रमुख / प्रथम गणधर कौन थे?
(A) आचार्य सुधर्मन
(B) इन्द्रभूति गौतम
(C) जामालि
(D) स्थूलभद्र
✅ उत्तर: (B) इन्द्रभूति गौतम
📝 महावीर के ग्यारह गणधरों में ‘इन्द्रभूति गौतम’ सर्वप्रमुख और प्रथम गणधर माने जाते हैं। वे ब्राह्मण थे और उन्होंने महावीर से दीक्षा ली थी। इन्हें ‘गौतम स्वामी’ भी कहा जाता है और ये जैन परंपरा में अत्यंत पूजनीय हैं। ग्यारह गणधरों में से अधिकांश की मृत्यु महावीर के जीवनकाल में ही हो गई थी। जीवित बचे दो गणधर — इन्द्रभूति और आचार्य सुधर्मन — थे। महावीर की मृत्यु के पश्चात् ‘आचार्य सुधर्मन’ को जैन संघ का प्रथम प्रधान बनाया गया। BPSC में यह पूछा जाता है।
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प्रश्न 14. जैन दर्शन के ‘नवतत्व’ में कुल कितने तत्व हैं?
✅ उत्तर: (C) 9
📝 जैन दर्शन में ‘नवतत्व’ नौ मूलभूत तत्वों को कहते हैं। ये नौ तत्व हैं — (1) जीव (Soul), (2) अजीव (Non-soul), (3) पुण्य (Merit), (4) पाप (Demerit), (5) आसव (Inflow of karma), (6) बंध (Bondage), (7) संवर (Stoppage of karma), (8) निर्जरा (Shedding of karma), (9) मोक्ष (Liberation)। इन नौ तत्वों के माध्यम से जैन दर्शन जीव की वर्तमान अवस्था और उसकी मुक्ति की पूरी यात्रा को समझाता है। जैन धर्म का यह विस्तृत दार्शनिक ढाँचा इसे भारतीय दर्शन में एक अत्यंत विशिष्ट और महत्वपूर्ण स्थान दिलाता है।
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प्रश्न 15. जैन धर्म के ‘पंच परमेष्ठी’ में इनमें से क्या शामिल नहीं है?
(A) अरिहंत
(B) सिद्ध
(C) आचार्य
(D) ईश्वर
✅ उत्तर: (D) ईश्वर
📝 जैन धर्म में ‘पंच परमेष्ठी’ पाँच सर्वोच्च आध्यात्मिक सत्ताएँ हैं जिनकी पूजा-आराधना की जाती है। ये हैं — (1) अरिहंत (जिन्होंने इन्द्रियों पर विजय पाई और संसार में उपदेश देते हैं), (2) सिद्ध (मोक्ष प्राप्त पूर्णतः मुक्त आत्मा), (3) आचार्य (जैन संघ के गुरु), (4) उपाध्याय (शास्त्र के शिक्षक), (5) साधु (जैन मुनि)। जैन धर्म एक अनीश्वरवादी धर्म है इसलिए इसमें ‘ईश्वर’ की अवधारणा नहीं है। जैन धर्म का सर्वाधिक पवित्र ‘णमोकार मंत्र’ (नवकार मंत्र) इन्हीं पाँच परमेष्ठियों को नमस्कार है। UPSC में यह पूछा जाता है।
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प्रश्न 16. जैन धर्म के ‘षड्द्रव्य’ सिद्धांत में कुल कितने द्रव्य हैं?
✅ उत्तर: (C) 6
📝 जैन दर्शन में ‘षड्द्रव्य’ सिद्धांत के अनुसार ब्रह्मांड में कुल छह मूलभूत द्रव्य (तत्व) हैं — (1) जीव (Soul/चेतन), (2) पुद्गल (Matter/भौतिक पदार्थ), (3) धर्म (Medium of Motion — गति का माध्यम), (4) अधर्म (Medium of Rest — स्थिरता का माध्यम), (5) आकाश (Space/स्थान), (6) काल (Time/समय)। इनमें ‘जीव’ एकमात्र चेतन तत्व है और शेष पाँच ‘अजीव’ हैं। ध्यान दें कि यहाँ ‘धर्म’ और ‘अधर्म’ का अर्थ पुण्य-पाप से नहीं बल्कि गति और स्थिरता के माध्यम से है। जैन दर्शन का षड्द्रव्य सिद्धांत भारतीय दर्शन में एक अद्वितीय योगदान माना जाता है।
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प्रश्न 17. जैन धर्म में मोक्ष प्राप्त सिद्ध आत्माएँ ब्रह्मांड में कहाँ निवास करती हैं?
(A) स्वर्ग में
(B) लोकाकाश के सर्वोच्च शिखर ‘सिद्धशिला’ पर
(C) पृथ्वी पर
(D) शून्य में
✅ उत्तर: (B) लोकाकाश के सर्वोच्च शिखर ‘सिद्धशिला’ पर
📝 जैन दर्शन में ब्रह्मांड को ‘लोकाकाश’ और ‘अलोकाकाश’ में विभाजित किया गया है। ‘लोकाकाश’ वह स्थान है जहाँ जीव, पुद्गल और अन्य द्रव्यों का अस्तित्व है। ‘अलोकाकाश’ लोकाकाश के बाहर अनंत रिक्त आकाश है जहाँ कुछ नहीं है। जैन धर्म के अनुसार जब आत्मा सभी कर्मों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करती है तो वह लोकाकाश के सर्वोच्च शिखर पर स्थित ‘सिद्धशिला’ पर पहुँचती है। वहाँ वह अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत शक्ति और अनंत सुख की अवस्था में अनंत काल तक रहती है। यह जैन ब्रह्मांड विज्ञान की विशिष्ट अवधारणा है।
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प्रश्न 18. जैन धर्म में ‘अर्हत’ शब्द का क्या अर्थ है?
(A) विजेता
(B) योग्य / पूज्य
(C) सर्वज्ञ
(D) मुक्त आत्मा
✅ उत्तर: (B) योग्य / पूज्य
📝 ज्ञान प्राप्ति के उपरांत महावीर को अनेक उपाधियों से विभूषित किया गया। ‘जिन’ का अर्थ विजेता, ‘केवलिन’ का अर्थ सर्वज्ञ, ‘महावीर’ का अर्थ महान वीर और ‘अर्हत’ का अर्थ है ‘योग्य’ या ‘पूज्य’। ‘अर्हत’ वह व्यक्ति होता है जिसने समस्त घातिया कर्मों (ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अंतराय) को नष्ट कर लिया हो। जैन धर्म में ‘अर्हत’ और ‘तीर्थंकर’ दोनों सर्वोच्च आध्यात्मिक अवस्थाएँ हैं। बौद्ध धर्म में भी ‘अर्हत’ शब्द का प्रयोग होता है परंतु उसका संदर्भ थोड़ा भिन्न है — वहाँ अर्हत वह है जिसने निर्वाण प्राप्त किया हो।
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प्रश्न 19. जैन धर्म में ‘सिद्ध’ कौन कहलाते हैं?
(A) जो तपस्या कर रहे हों
(B) जिन्होंने समस्त कर्मों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर लिया हो
(C) जो गणधर हों
(D) जो महाव्रत पालते हों
✅ उत्तर: (B) जिन्होंने समस्त कर्मों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर लिया हो
📝 जैन धर्म के ‘पंच परमेष्ठी’ में ‘सिद्ध’ दूसरे स्थान पर हैं। ‘सिद्ध’ वे आत्माएँ हैं जिन्होंने समस्त कर्मों का पूर्ण क्षय करके मोक्ष प्राप्त कर लिया है। ये आत्माएँ लोकाकाश के शीर्ष पर ‘सिद्धशिला’ में अनंत ज्ञान, दर्शन, शक्ति और सुख की अवस्था में रहती हैं। ‘अरिहंत’ और ‘सिद्ध’ में यह अंतर है कि अरिहंत शरीरधारी होते हैं जो संसार में रहकर उपदेश देते हैं, जबकि सिद्ध शरीर से पूर्णतः मुक्त होते हैं। जैन धर्म के पवित्र ‘णमोकार मंत्र’ में सर्वप्रथम ‘अरिहंत’ और फिर ‘सिद्ध’ को नमस्कार किया जाता है।
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प्रश्न 20. जैन धर्म के किस आगम ग्रंथ को सबसे बड़ा माना जाता है?
(A) आचारांग सूत्र
(B) उत्तराध्ययन सूत्र
(C) भगवती सूत्र
(D) सूत्रकृतांग
✅ उत्तर: (C) भगवती सूत्र
📝 जैन धर्म के ‘बारह अंग’ आगम साहित्य में ‘भगवती सूत्र’ (व्याख्याप्रज्ञप्ति) पाँचवाँ अंग है और यह सबसे बड़ा जैन आगम ग्रंथ माना जाता है। इसमें महावीर और उनके गणधरों के बीच हुए विस्तृत प्रश्नोत्तर का संकलन है। ‘आचारांग’ प्रथम और सर्वाधिक प्राचीन अंग है जिसमें साधुओं के आचार नियम और महावीर के कठोर जीवन का चित्रण है। ‘सूत्रकृतांग’ दूसरा अंग है जिसमें अन्य दार्शनिक मतों का खंडन किया गया है। ‘उत्तराध्ययन सूत्र’ को महावीर के अंतिम उपदेशों का संग्रह माना जाता है। UPSC में जैन साहित्य से प्रश्न आते हैं।
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प्रश्न 21. जैन धर्म के ‘णमोकार मंत्र’ (नवकार मंत्र) में किन्हें नमस्कार किया जाता है?
(A) तीर्थंकरों और गंगा को
(B) पंच परमेष्ठी को
(C) चौदह पूर्व के ज्ञाताओं को
(D) बारह गणधरों को
✅ उत्तर: (B) पंच परमेष्ठी को
📝 ‘णमोकार मंत्र’ या ‘नवकार मंत्र’ जैन धर्म का सर्वाधिक पवित्र और आधारभूत मंत्र है। इस मंत्र में जैन धर्म के ‘पंच परमेष्ठी’ — (1) अरिहंत, (2) सिद्ध, (3) आचार्य, (4) उपाध्याय, (5) साधु — को नमस्कार किया जाता है। यह मंत्र किसी विशेष व्यक्ति को नहीं बल्कि उनके दिव्य गुणों को नमस्कार करता है। यह अर्द्धमागधी / प्राकृत भाषा में है। जैन धर्म के गृहस्थ और साधु दोनों इस मंत्र का प्रतिदिन पाठ करते हैं। बौद्ध धर्म में ‘त्रिशरण’ (बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि) सर्वाधिक पवित्र है।
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प्रश्न 22. जैन धर्म में ‘लोकाकाश’ और ‘अलोकाकाश’ की अवधारणा किस विषय से संबंधित है?
(A) कर्म सिद्धांत से
(B) जैन ब्रह्मांड विज्ञान (Cosmology) से
(C) अहिंसा सिद्धांत से
(D) त्रिरत्न से
✅ उत्तर: (B) जैन ब्रह्मांड विज्ञान (Cosmology) से
📝 ‘लोकाकाश’ और ‘अलोकाकाश’ की अवधारणा जैन दर्शन की विशिष्ट ब्रह्मांड विज्ञान (Cosmology) से संबंधित है। जैन धर्म के अनुसार ब्रह्मांड दो भागों में विभाजित है — ‘लोकाकाश’ जहाँ जीव, पुद्गल और अन्य द्रव्यों का अस्तित्व है, तथा ‘अलोकाकाश’ जो लोकाकाश के बाहर अनंत रिक्त आकाश है। जैन धर्म के अनुसार यह ब्रह्मांड किसी ईश्वर ने नहीं बनाया बल्कि यह अनादि और अनंत है — जो इसे बौद्ध और हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान से अलग करता है। जैन ब्रह्मांड विज्ञान अत्यंत विस्तृत और जटिल है।
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प्रश्न 23. जैन धर्म के किस शासक ने ‘हाथीगुम्फा अभिलेख’ उत्कीर्ण करवाया और किस वंश से संबंधित था?
(A) चंद्रगुप्त मौर्य — मौर्य वंश
(B) खारवेल — महामेघवाहन वंश
(C) अशोक — मौर्य वंश
(D) चामुण्डराय — गंग वंश
✅ उत्तर: (B) खारवेल — महामेघवाहन वंश
📝 कलिंग के राजा ‘खारवेल’ ‘महामेघवाहन वंश’ के शासक थे और जैन धर्म के महान संरक्षक थे। उनका काल लगभग प्रथम शताब्दी ईपू माना जाता है। ओडिशा के उदयगिरि पर्वत की ‘हाथीगुम्फा’ में उत्कीर्ण ‘हाथीगुम्फा अभिलेख’ ब्राह्मी लिपि और प्राकृत भाषा में लिखा गया है। इससे खारवेल के विजय अभियानों, जैन धर्म के प्रति उनके समर्थन और तत्कालीन राजनीतिक स्थिति की विस्तृत जानकारी मिलती है। खारवेल ने उदयगिरि और खंडगिरि की जैन गुफाएं भी बनवाईं। यह मौर्योत्तर काल का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अभिलेखीय साक्ष्य है।
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प्रश्न 24. जैन धर्म में ‘आचारांग सूत्र’ के बारे में कौन सा कथन सही है?
(A) यह जैन धर्म का 12वाँ अंग है
(B) यह जैन धर्म का प्रथम और सर्वाधिक प्राचीन अंग है
(C) यह द्वितीय जैन संगीति में लिखा गया
(D) इसमें महावीर के अंतिम उपदेश हैं
✅ उत्तर: (B) यह जैन धर्म का प्रथम और सर्वाधिक प्राचीन अंग है
📝 जैन धर्म के ‘बारह अंग’ आगम साहित्य में ‘आचारांग सूत्र’ प्रथम और सर्वाधिक प्राचीन अंग माना जाता है। इसमें जैन साधुओं के आचार-विचार और नियमों का विस्तृत वर्णन है। इसी ग्रंथ में महावीर की तपस्या काल की कठिनाइयों और उनके कठोर जीवन का अत्यंत मार्मिक चित्रण मिलता है। ‘उत्तराध्ययन सूत्र’ में महावीर के अंतिम उपदेश हैं। ‘भगवती सूत्र’ पाँचवाँ और सबसे बड़ा अंग है। प्रथम जैन संगीति (पाटलिपुत्र, 300 ईपू) में स्थूलभद्र की अध्यक्षता में बारह अंगों का संकलन हुआ था। UPSC में जैन साहित्य से यह पूछा जाता है।
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प्रश्न 25. जैन धर्म का सर्वाधिक प्रभाव ऐतिहासिक और वर्तमान दृष्टि से किन क्षेत्रों में रहा है?
(A) बिहार, बंगाल, ओडिशा
(B) गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक
(C) उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़
(D) पंजाब, हरियाणा, दिल्ली
✅ उत्तर: (B) गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक
📝 जैन धर्म का सर्वाधिक ऐतिहासिक और वर्तमान प्रभाव गुजरात, राजस्थान और कर्नाटक में रहा है। राजस्थान में माउंट आबू का दिलवाड़ा मंदिर, राणकपुर जैन मंदिर और जैसलमेर के जैन मंदिर प्रसिद्ध हैं। गुजरात में पालिताना के जैन मंदिर और द्वितीय जैन संगीति स्थल ‘वल्लभी’ स्थित हैं। कर्नाटक में श्रवणबेलगोला और भद्रबाहु-चंद्रगुप्त की ऐतिहासिक परंपरा है। जैन समुदाय आज भी इन्हीं राज्यों में अधिक संख्या में निवास करता है। व्यापार और उद्योग में गुजरात और राजस्थान के जैन समुदाय ऐतिहासिक रूप से अग्रणी रहे हैं।