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इस्लाम धर्म का उदय 25 महत्वपूर्ण MCQs
इस पोस्ट में इस्लाम धर्म के उदय से संबंधित 25 सबसे महत्वपूर्ण MCQ दिए गए हैं, जो UPSC, SSC, UPPCS और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। ये प्रश्न परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाले तथ्यों पर आधारित हैं और Revision के लिए बहुत मददगार हैं।
इस्लाम धर्म के संस्थापक पैगंबर हजरत मुहम्मद माने जाते हैं। उनका जन्म 570 ईस्वी में मक्का शहर में हुआ था। जब वे लगभग 40 वर्ष के थे, तब 610 ईस्वी में उन्हें पहली वही (ईश्वरीय संदेश) प्राप्त हुई। इसके बाद उन्होंने लोगों को एकेश्वरवाद यानी एक ईश्वर में विश्वास करने का संदेश दिया। साथ ही उन्होंने सामाजिक समानता, ईमानदारी, दया और नैतिक जीवन अपनाने की शिक्षा दी। उनके उपदेशों से धीरे-धीरे इस्लाम धर्म का प्रसार हुआ।
कुरआन इस्लाम धर्म की पवित्र पुस्तक है, जिसे अल्लाह का वचन माना जाता है। यह पवित्र ग्रंथ पैगंबर हजरत मुहम्मद को 610 ईस्वी से 632 ईस्वी के बीच धीरे-धीरे सुनाया गया। इस संदेश को फरिश्ते जिब्रईल के माध्यम से पहुँचाया गया था। कुरआन में मनुष्य के जीवन से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों का वर्णन मिलता है, जैसे ईश्वर में आस्था, नैतिक जीवन, सामाजिक न्याय, दया, ईमानदारी और मानव समानता। इसके साथ ही इसमें समाज, कानून और आचरण से जुड़े अनेक निर्देश भी दिए गए हैं। मुसलमानों के लिए कुरआन केवल धार्मिक पुस्तक ही नहीं बल्कि जीवन जीने का मार्गदर्शक भी मानी जाती है, जो उन्हें सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा देती है।
इस्लाम धर्म के संस्थापक पैगंबर हजरत मुहम्मद माने जाते हैं। उनका जन्म 570 ईस्वी में मक्का शहर में हुआ था। जब वे लगभग 40 वर्ष के थे, तब 610 ईस्वी में उन्हें पहली वही (ईश्वरीय संदेश) प्राप्त हुई। इसके बाद उन्होंने लोगों को एकेश्वरवाद यानी एक ईश्वर में विश्वास करने का संदेश दिया। साथ ही उन्होंने सामाजिक समानता, ईमानदारी, दया और नैतिक जीवन अपनाने की शिक्षा दी। उनके उपदेशों से धीरे-धीरे इस्लाम धर्म का प्रसार हुआ।
नालंदा विश्वविद्यालय: अंतिम भोजन, प्रतीक, अशोक के प्रचारक और पतन के कारण – परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न-
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हिजरत (622 ई.) इस्लाम के इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। जब मक्का में पैगंबर हजरत मुहम्मद और उनके अनुयायियों को विरोध और अत्याचार का सामना करना पड़ा, तब उन्होंने 622 ईस्वी में मक्का से मदीना की ओर प्रस्थान किया। इस ऐतिहासिक यात्रा को हिजरत कहा जाता है। हिजरत केवल स्थान परिवर्तन नहीं था, बल्कि इसने इस्लाम को एक संगठित धार्मिक और राजनीतिक व्यवस्था का रूप दिया। मदीना पहुँचने के बाद पैगंबर मुहम्मद ने वहाँ एक मजबूत मुस्लिम समुदाय की स्थापना की और समाज में भाईचारा, न्याय और समानता के सिद्धांतों को लागू किया। इसी महत्वपूर्ण घटना को आधार मानकर इस्लामी हिजरी संवत की शुरुआत मानी जाती है, जो आज भी मुस्लिम समाज में प्रचलित है।
इस्लाम के पाँच स्तंभ मुस्लिम धर्म के मूल आधार माने जाते हैं, जिन्हें प्रत्येक मुसलमान के लिए महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया है। ये पाँच स्तंभ हैं – कलमा, नमाज़, रोज़ा, जकात और हज। कलमा का अर्थ है एक ईश्वर (अल्लाह) और पैगंबर मुहम्मद की पैगंबरी में विश्वास करना। नमाज़ दिन में पाँच बार अदा की जाने वाली प्रार्थना है, जो ईश्वर के प्रति श्रद्धा और समर्पण को व्यक्त करती है। रोज़ा रमज़ान के महीने में रखा जाता है, जो आत्मसंयम और धैर्य का प्रतीक है। जकात का अर्थ है अपनी आय का एक हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों को दान करना। वहीं हज मक्का की पवित्र यात्रा है, जिसे जीवन में कम से कम एक बार करना आवश्यक माना गया है। इन पाँच स्तंभों का पालन आध्यात्मिक अनुशासन, सामाजिक समानता और ईश्वर के प्रति गहरे समर्पण को दर्शाता है।
जुम्मा (शुक्रवार) इस्लाम धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र दिन माना जाता है। इस दिन मुसलमान विशेष सामूहिक नमाज़ अदा करते हैं, जिसे जुम्मा की नमाज़ कहा जाता है। शुक्रवार के दिन मुस्लिम समुदाय के लोग मस्जिद में एकत्र होकर इमाम के नेतृत्व में नमाज़ पढ़ते हैं और उससे पहले खुतबा (धार्मिक उपदेश) दिया जाता है। इस उपदेश में धर्म, नैतिकता, समाज और जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण संदेश दिए जाते हैं। जुम्मा का दिन मुसलमानों के बीच आध्यात्मिक एकता, भाईचारा और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करता है। यह दिन लोगों को ईश्वर की याद, अच्छे कर्म करने और समाज में शांति व सहयोग बनाए रखने की प्रेरणा भी देता है।
इस्लाम धर्म की शुरुआत अरब के प्रसिद्ध शहर मक्का से मानी जाती है। यहीं पैगंबर हजरत मुहम्मद को लगभग 610 ईस्वी में पहली वही (ईश्वरीय संदेश) प्राप्त हुई, जिसे इस्लाम के संदेश की शुरुआत माना जाता है। मक्का में स्थित काबा इस्लाम का सबसे पवित्र स्थल है, जिसकी ओर मुख करके पूरी दुनिया के मुसलमान नमाज़ अदा करते हैं। बाद में जब मक्का में विरोध बढ़ा, तो पैगंबर मुहम्मद ने 622 ईस्वी में मदीना की ओर हिजरत की। मदीना पहुँचने के बाद वहाँ एक संगठित मुस्लिम समुदाय की स्थापना हुई और यह शहर इस्लाम का महत्वपूर्ण धार्मिक और राजनीतिक केंद्र बन गया। इसी कारण मक्का और मदीना दोनों ही इस्लाम के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
काबा सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में स्थित इस्लाम का सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र धार्मिक स्थल है। पूरी दुनिया के मुसलमान नमाज़ पढ़ते समय किब्ला यानी काबा की दिशा की ओर मुख करके प्रार्थना करते हैं। काबा मस्जिद अल-हराम के मध्य में स्थित एक घनाकार इमारत है, जिसे इस्लाम में अत्यंत सम्मान दिया जाता है। प्रत्येक वर्ष लाखों मुसलमान हज यात्रा के लिए मक्का पहुँचते हैं और काबा की परिक्रमा (तवाफ) करते हैं। यह परिक्रमा अल्लाह के प्रति श्रद्धा, विश्वास और समर्पण का प्रतीक मानी जाती है। काबा पूरी दुनिया के मुसलमानों को एक दिशा में जोड़ने वाला प्रतीक भी है, जो इस्लाम में एकता, आस्था और भाईचारे का संदेश देता है।
इस्लामी हिजरी संवत की शुरुआत 622 ईस्वी में पैगंबर हजरत मुहम्मद की मक्का से मदीना की ऐतिहासिक यात्रा, जिसे हिजरत कहा जाता है, से मानी जाती है। यह घटना इस्लाम के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी से मुस्लिम समुदाय के संगठन और स्वतंत्र पहचान की शुरुआत हुई। मदीना पहुँचने के बाद पैगंबर मुहम्मद ने वहाँ एक संगठित समाज की स्थापना की और धार्मिक तथा सामाजिक नियमों को व्यवस्थित रूप दिया। हिजरी कैलेंडर एक चंद्र आधारित कैलेंडर है, जिसमें महीनों की गणना चाँद के दिखाई देने के आधार पर की जाती है। इसी कैलेंडर के अनुसार मुसलमान रमज़ान, हज और अन्य धार्मिक पर्वों का निर्धारण करते हैं, इसलिए यह इस्लामी धार्मिक जीवन में विशेष महत्व रखता है।
जकात इस्लाम धर्म में दिया जाने वाला अनिवार्य दान है, जिसे आर्थिक रूप से सक्षम मुसलमानों के लिए महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया है। इसके अनुसार हर सक्षम मुसलमान को अपनी संपत्ति और आय का एक निश्चित भाग गरीबों, जरूरतमंदों और असहाय लोगों को देना चाहिए। जकात का उद्देश्य समाज में आर्थिक समानता स्थापित करना और जरूरतमंदों की सहायता करना है। इससे समाज में करुणा, सहयोग और भाईचारे की भावना को बढ़ावा मिलता है। इस्लाम में जकात को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है और इसे इस्लाम के पाँच स्तंभों में शामिल किया गया है। इस प्रकार जकात न केवल धार्मिक कर्तव्य है, बल्कि यह समाज में आर्थिक संतुलन और सामाजिक न्याय बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी है।
रमज़ान इस्लामी चंद्र कैलेंडर का नौवां महीना है, जिसे मुसलमानों के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस महीने में मुसलमान सूर्योदय से सूर्यास्त तक उपवास (रोज़ा) रखते हैं और दिनभर भोजन, पानी तथा अन्य सांसारिक इच्छाओं से दूर रहकर आत्मसंयम का पालन करते हैं। रमज़ान का मुख्य उद्देश्य आध्यात्मिक शुद्धि, आत्मअनुशासन और ईश्वर के प्रति समर्पण को मजबूत करना है। इस दौरान मुसलमान अधिक से अधिक नमाज़, कुरआन का पाठ और दान जैसे धार्मिक कार्य करते हैं। माना जाता है कि इसी पवित्र महीने में कुरआन का अवतरण हुआ था। इसलिए रमज़ान मुसलमानों के लिए केवल उपवास का समय ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक विकास, करुणा और गरीबों के प्रति संवेदना को समझने का भी विशेष अवसर होता है।
उम्मा का अर्थ सम्पूर्ण मुस्लिम समुदाय से है, जो दुनिया भर के सभी मुसलमानों को एक साझा धार्मिक बंधन में जोड़ता है। इस्लाम धर्म में उम्मा की अवधारणा बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि यह सभी मुसलमानों के बीच एकता, भाईचारा और समानता की भावना को दर्शाती है। इस्लाम के अनुसार मनुष्य के बीच जाति, रंग, भाषा या क्षेत्र के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। इसलिए उम्मा का विचार सभी मुसलमानों को एक वैश्विक समुदाय के रूप में जोड़ता है। इस अवधारणा का उद्देश्य समाज में सामाजिक समानता, आपसी सहयोग और धार्मिक एकता को मजबूत करना है, ताकि सभी लोग मिलकर शांति, न्याय और भाईचारे के साथ जीवन जी सकें।
बौद्ध स्तूप: राजा, विश्वविद्यालय, तीर्थ स्थल और प्रतीक का महत्व – परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न-
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शरीयत इस्लाम धर्म की महत्वपूर्ण कानूनी और नैतिक व्यवस्था है, जो मुख्य रूप से कुरआन और हदीस पर आधारित है। इसमें मनुष्य के जीवन से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों के लिए नियम और मार्गदर्शन दिए गए हैं। शरीयत के अंतर्गत व्यक्तिगत जीवन, सामाजिक व्यवहार, विवाह, परिवार, व्यापार, संपत्ति और न्याय से संबंधित नियम शामिल होते हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मुसलमान अपने जीवन में नैतिकता, ईमानदारी और धार्मिक अनुशासन का पालन करें। शरीयत केवल कानूनी नियमों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोगों को सही आचरण, न्यायपूर्ण व्यवहार और समाज में शांति बनाए रखने की प्रेरणा भी देती है। इस प्रकार शरीयत इस्लाम में धार्मिक, सामाजिक और नैतिक जीवन को व्यवस्थित करने वाली महत्वपूर्ण प्रणाली मानी जाती है।
हदीस पैगंबर हजरत मुहम्मद के कथनों, कर्मों और अनुमोदनों का संकलन है, जिसे इस्लामी परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। हदीस में पैगंबर मुहम्मद के जीवन से जुड़े ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जो मुसलमानों को सही आचरण और जीवन जीने की दिशा दिखाते हैं। कुरआन के बाद हदीस को इस्लामी शिक्षाओं का दूसरा प्रमुख स्रोत माना जाता है। इसके आधार पर इस्लामी विद्वान कई धार्मिक और सामाजिक नियमों की व्याख्या करते हैं। शरीयत के नियमों को समझने और उन्हें दैनिक जीवन में लागू करने में भी हदीस की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इस प्रकार हदीस मुसलमानों के लिए नैतिक मार्गदर्शन, धार्मिक अनुशासन और आदर्श जीवन का महत्वपूर्ण आधार मानी जाती है।
किब्ला वह दिशा है जिसकी ओर मुख करके मुसलमान नमाज़ अदा करते हैं। प्रारंभिक समय में नमाज़ की दिशा यरूशलम की ओर थी, लेकिन बाद में इसे बदलकर मक्का में स्थित पवित्र स्थल काबा की ओर निर्धारित कर दिया गया। इसके बाद से दुनिया भर के मुसलमान नमाज़ पढ़ते समय काबा की दिशा की ओर ही मुख करते हैं। किब्ला की यह व्यवस्था इस्लाम में धार्मिक एकता और अनुशासन का प्रतीक मानी जाती है, क्योंकि इससे पूरी दुनिया के मुसलमान एक ही दिशा में ईश्वर की उपासना करते हैं। इस प्रकार किब्ला मुसलमानों के बीच केंद्रीकृत आस्था, एकता और आध्यात्मिक संबंध को दर्शाने वाला महत्वपूर्ण धार्मिक सिद्धांत है।
खिलाफत इस्लाम के इतिहास में वह व्यवस्था थी, जिसके अंतर्गत पैगंबर हजरत मुहम्मद के बाद मुस्लिम समुदाय का राजनीतिक और धार्मिक नेतृत्व संचालित किया जाता था। इस व्यवस्था के प्रमुख को खलीफा कहा जाता था, जिसे पूरे मुस्लिम समुदाय का संरक्षक और मार्गदर्शक माना जाता था। खलीफा का कार्य इस्लामी सिद्धांतों के अनुसार शासन चलाना, समाज में न्याय स्थापित करना और मुस्लिम समुदाय की एकता बनाए रखना था। पैगंबर मुहम्मद के बाद आने वाले पहले चार खलीफा राशिदून खलीफा कहलाए। इन शासकों ने इस्लाम के विस्तार, संगठन और प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसलिए प्रारंभिक खिलाफत काल इस्लामी इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
तौहीद इस्लाम धर्म का सबसे मूल और महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जिसके अनुसार अल्लाह एक, निराकार और अद्वितीय है। इस सिद्धांत के अनुसार ईश्वर के अलावा किसी अन्य शक्ति या देवता की पूजा स्वीकार नहीं की जाती। इसलिए इस्लाम धर्म मूर्ति पूजा और बहुदेववाद को अस्वीकार करता है। तौहीद का अर्थ केवल एक ईश्वर में विश्वास करना ही नहीं, बल्कि अपने जीवन के सभी कार्यों में उसी एक ईश्वर पर पूर्ण भरोसा और समर्पण रखना भी है। यह सिद्धांत इस्लामी आस्था की केंद्रीय धुरी माना जाता है, जो मुसलमानों को एकेश्वरवाद, आध्यात्मिक शुद्धता और नैतिक जीवन अपनाने की प्रेरणा देता है। इसी कारण तौहीद इस्लाम की धार्मिक शिक्षाओं और विश्वासों का आधार माना जाता है।
हज इस्लाम धर्म का पाँचवाँ स्तंभ माना जाता है। इस्लामी मान्यता के अनुसार प्रत्येक आर्थिक और शारीरिक रूप से सक्षम मुसलमान को अपने जीवन में कम से कम एक बार मक्का की पवित्र यात्रा करना आवश्यक माना गया है। हज के दौरान श्रद्धालु कई महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान करते हैं, जिनमें काबा की परिक्रमा (तवाफ), अराफात के मैदान में ठहरना और अन्य पवित्र क्रियाएँ शामिल होती हैं। इस यात्रा में दुनिया भर से लाखों मुसलमान एकत्र होते हैं, जिससे समानता, भाईचारा और एकता की भावना प्रकट होती है। हज केवल एक धार्मिक यात्रा ही नहीं, बल्कि यह आस्था, आत्मसमर्पण और आध्यात्मिक शुद्धि का महत्वपूर्ण प्रतीक भी माना जाता है।
जिहाद का शाब्दिक अर्थ संघर्ष या प्रयास होता है। इस्लामी विचारधारा में इसका व्यापक अर्थ केवल युद्ध नहीं, बल्कि आत्म-सुधार, नैतिकता और बुराइयों के विरुद्ध संघर्ष से भी जुड़ा हुआ है। जिहाद का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति को अपने भीतर की कमजोरियों, बुरे विचारों और अनैतिक कार्यों के खिलाफ प्रयास करने के लिए प्रेरित करना है। इस दृष्टि से जिहाद को आध्यात्मिक और नैतिक संघर्ष भी माना जाता है, जिसमें व्यक्ति अपने चरित्र को बेहतर बनाने और समाज में अच्छाई फैलाने का प्रयास करता है। इसलिए इस्लाम में जिहाद की अवधारणा केवल युद्ध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सत्य, न्याय और नैतिक जीवन के लिए किए जाने वाले हर सकारात्मक प्रयास को भी दर्शाती है।
अरबी भाषा का इस्लाम धर्म में विशेष महत्व माना जाता है, क्योंकि कुरआन का अवतरण इसी भाषा में हुआ था। इस कारण अरबी को इस्लामी धार्मिक परंपरा की प्रमुख भाषा माना जाता है। दुनिया भर के मुसलमान नमाज़ पढ़ते समय और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान कुरआन की आयतों का पाठ अरबी भाषा में ही करते हैं। इससे विभिन्न देशों और संस्कृतियों में रहने वाले मुसलमानों के बीच धार्मिक एकरूपता बनी रहती है। साथ ही अरबी भाषा इस्लामी शिक्षा, धार्मिक ज्ञान और सांस्कृतिक परंपराओं को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है। इस प्रकार अरबी भाषा मुसलमानों को एक साझा धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
इस्लाम में नमाज़ को अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया है। मुसलमानों के लिए दिन में पाँच वक्त की नमाज़ अदा करना अनिवार्य माना जाता है। ये पाँच नमाज़ हैं — फज्र, जुहर, अस्र, मग़रिब और ईशा। प्रत्येक नमाज़ का समय निश्चित होता है और इसे निर्धारित समय पर अदा किया जाता है। नमाज़ के माध्यम से मुसलमान अल्लाह का स्मरण करते हैं और अपने जीवन में आध्यात्मिक शांति प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। यह केवल प्रार्थना ही नहीं, बल्कि अनुशासन, आत्मसंयम और ईश्वर के प्रति समर्पण का भी प्रतीक है। जब मुसलमान मस्जिद में सामूहिक रूप से नमाज़ पढ़ते हैं, तो यह समानता, भाईचारा और धार्मिक एकता की भावना को भी मजबूत बनाता है।
बद्र का युद्ध 624 ईस्वी में मुसलमानों और मक्का के कुरैशों के बीच लड़ा गया था। यह इस्लाम के इतिहास का पहला महत्वपूर्ण युद्ध माना जाता है। यह युद्ध मदीना के पास स्थित बद्र नामक स्थान पर हुआ था। इस संघर्ष में मुसलमानों की संख्या अपेक्षाकृत कम थी, जबकि विरोधी सेना अधिक बड़ी और शक्तिशाली थी। इसके बावजूद मुस्लिम सेना को इस युद्ध में महत्वपूर्ण विजय प्राप्त हुई। इस जीत से मुस्लिम समुदाय का आत्मविश्वास, मनोबल और प्रतिष्ठा काफी बढ़ गई। साथ ही यह विजय इस्लामी इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई, जिसने मुस्लिम समुदाय को अधिक संगठित और मजबूत बनने में सहायता की।
फतह-ए-मक्का इस्लाम के इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। 630 ईस्वी में पैगंबर हजरत मुहम्मद ने मक्का पर शांतिपूर्ण विजय प्राप्त की। इस घटना के बाद मक्का शहर इस्लामी शासन के अधीन आ गया और वहाँ इस्लाम का प्रभाव तेजी से बढ़ा। विजय के बाद काबा में स्थापित मूर्तियों को हटाया गया और इसे पूर्ण रूप से एकेश्वरवाद की उपासना का केंद्र बनाया गया। इस घटना ने पूरे अरब क्षेत्र में इस्लाम की स्थिति को और मजबूत कर दिया। फतह-ए-मक्का के बाद बड़ी संख्या में लोगों ने इस्लाम को स्वीकार किया, जिससे अरब में इस्लाम की निर्णायक सर्वोच्चता स्थापित हो गई।
पैगंबर हजरत मुहम्मद की मृत्यु के बाद मुस्लिम समुदाय में नेतृत्व को लेकर एक महत्वपूर्ण विवाद उत्पन्न हुआ। इस विषय पर मुसलमानों के बीच अलग-अलग मत सामने आए। सुन्नी समुदाय का मानना था कि समुदाय की सहमति से चुने गए अबू बकर इस्लाम के पहले खलीफा बने और उन्होंने मुस्लिम समुदाय का नेतृत्व संभाला। वहीं शिया समुदाय का विश्वास है कि पैगंबर मुहम्मद के निकट संबंधी और दामाद अली को ही उनका वैध उत्तराधिकारी होना चाहिए था। इसी मतभेद के कारण आगे चलकर मुस्लिम समाज में सुन्नी और शिया दो प्रमुख धार्मिक परंपराएँ विकसित हुईं। यह विभाजन इस्लामी इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है, जिसने बाद के धार्मिक और राजनीतिक विकास को भी प्रभावित किया।
लैलत-उल-क़द्र इस्लाम में अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण रात मानी जाती है, जो रमज़ान के अंतिम दस दिनों में आती है। इस्लामी परंपरा के अनुसार इसी रात कुरआन की पहली वही (ईश्वरीय संदेश) पैगंबर हजरत मुहम्मद पर अवतरित हुई थी। इसलिए इसे मुसलमानों के लिए अत्यंत पवित्र अवसर माना जाता है। कुरआन में इस रात को हजार महीनों से भी श्रेष्ठ बताया गया है। इसी कारण मुसलमान इस रात में विशेष रूप से नमाज़, इबादत, कुरआन का पाठ और दुआ करते हैं। लैलत-उल-क़द्र को आध्यात्मिक शुद्धि, ईश्वर से क्षमा मांगने और जीवन में नई प्रेरणा प्राप्त करने का महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है।
अंततः, प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता केवल मेहनत से नहीं, बल्कि सही दिशा में पढ़ाई से मिलती है। इस्लाम धर्म के उदय से संबंधित ये MCQ आपको इतिहास की मूल अवधारणाओं को सरल तरीके से समझने में मदद करेंगे। यदि यह पोस्ट आपको उपयोगी लगी हो, तो इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करें और ऐसे ही महत्वपूर्ण कंटेंट के लिए हमारे ब्लॉग से जुड़े रहें।
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