
जीव विज्ञान के 30 महत्वपूर्ण MCQ 2026
जीव विज्ञान के 30 महत्वपूर्ण MCQ 2026 | कोशिका, श्वसन, प्रकाश-संश्लेषण व आनुवंशिकी
प्राचीन भारत का इतिहास-21 MCQ-2026
वैदिक दर्शन और ऋग्वैदिक समाज के 25 महत्वपूर्ण MCQ
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भारतीय दर्शन में छः आस्तिक दर्शन माने जाते हैं — सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत। इनमें सांख्य दर्शन सबसे प्राचीन है जिसके प्रवर्तक महर्षि कपिल थे, जबकि योग दर्शन सबसे प्रचारित है जिसके प्रवर्तक पतंजलि थे।
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योग दर्शन भारतीय दर्शन परम्परा का सबसे अधिक प्रचारित दर्शन माना जाता है। इसके प्रवर्तक महर्षि पतंजलि थे, जिन्होंने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘योगसूत्र’ की रचना की। इस ग्रंथ में अष्टांग योग का वर्णन मिलता है, जिसमें यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि जैसे आठ चरण बताए गए हैं। योग दर्शन को सांख्य दर्शन का व्यावहारिक रूप भी माना जाता है, क्योंकि यह व्यक्ति को अपने मन और शरीर पर नियंत्रण रखना सिखाता है और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग बताता है। वर्तमान समय में भी योग की लोकप्रियता पूरे विश्व में बहुत अधिक है। इसी कारण संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया है। यह विषय UPSC, SSC, BPSC और STATE PCS जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
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पूर्व मीमांसा दर्शन को ‘कर्म मीमांसा’ भी कहा जाता है। इसके प्रवर्तक महर्षि जैमिनि माने जाते हैं और इसका प्रमुख ग्रंथ ‘मीमांसासूत्र’ है। इस दर्शन में मुख्य रूप से वेदों के कर्मकांड भाग की व्याख्या की गई है, जिसमें यज्ञ, याग और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों का महत्व बताया गया है। पूर्व मीमांसा के अनुसार वेद स्वतः प्रमाण (Self-valid) और नित्य हैं, अर्थात् वे सदैव सत्य और शाश्वत माने जाते हैं। इस दर्शन का मुख्य उद्देश्य वैदिक कर्मों के सही पालन पर जोर देना है। दूसरी ओर उत्तर मीमांसा को वेदांत दर्शन कहा जाता है, जिसमें मुख्य रूप से ब्रह्म और आत्मा के संबंध तथा आध्यात्मिक ज्ञान की चर्चा होती है। भारतीय दर्शन के षड्दर्शन से संबंधित ये तथ्य UPSC, SSC, BPSC और STATE PCS जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पूछे जाते हैं, इसलिए इन्हें समझना और याद रखना बहुत महत्वपूर्ण है।
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वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक महर्षि कणाद माने जाते हैं। उन्होंने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘वैशेषिकसूत्र’ की रचना की। इस दर्शन का मुख्य सिद्धांत परमाणुवाद है, जिसके अनुसार यह संसार बहुत छोटे-छोटे परमाणुओं से मिलकर बना है। इसलिए वैशेषिक दर्शन को विश्व का प्राचीनतम परमाणु सिद्धांत भी माना जाता है। यह दर्शन यथार्थवादी (Realistic) है, क्योंकि यह बाहरी जगत की वास्तविकता को स्वीकार करता है और वस्तुओं का तार्किक तथा वैज्ञानिक विश्लेषण करता है। भारतीय दर्शन में वैशेषिक दर्शन का न्याय दर्शन से बहुत निकट संबंध माना जाता है और दोनों को अक्सर साथ-साथ अध्ययन किया जाता है। भारतीय दर्शन के ये तथ्य UPSC, BPSC, UPPCS, SSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछे जाते हैं, इसलिए इन्हें समझना और याद रखना बहुत महत्वपूर्ण है।
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ऋग्वैदिक काल में आर्यों की जीवनशैली अर्द्धयायावर (Semi-Nomadic) थी, अर्थात वे एक स्थान पर स्थायी रूप से नहीं रहते थे और अपने पशुओं के साथ इधर-उधर घूमते रहते थे। इस काल की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार पशुपालन था। आर्य लोग मुख्य रूप से गाय, घोड़े, बकरी और भेड़ जैसे पशु पालते थे। ऋग्वेद में घोड़े का लगभग 215 बार और गाय का लगभग 176 बार उल्लेख मिलता है, जिससे इन पशुओं के महत्व का पता चलता है। उस समय गाय को धन और समृद्धि का प्रतीक माना जाता था तथा यही विनिमय (Barter) का मुख्य माध्यम भी थी। कृषि इस काल में बहुत कम विकसित थी और केवल ‘यव’ (जौ) नामक फसल उगाई जाती थी। बाद में उत्तर वैदिक काल में धीरे-धीरे कृषि का विकास हुआ और यह लोगों का मुख्य व्यवसाय बन गया। ये तथ्य UPSC, SSC, BPSC, UPPCS जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछे जाते हैं।
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ऋग्वेद में घोड़े (अश्व) का लगभग 215 बार उल्लेख मिलता है, जो यह दर्शाता है कि वैदिक आर्यों के जीवन में घोड़े का बहुत अधिक महत्व था। घोड़े का उपयोग मुख्य रूप से युद्ध, रथ चलाने और लंबी यात्राओं में किया जाता था। वैदिक धर्म में होने वाले प्रसिद्ध अश्वमेध यज्ञ में भी घोड़े की विशेष भूमिका होती थी, इसलिए इसे शक्ति और प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था। दूसरी ओर गाय का उल्लेख भी ऋग्वेद में लगभग 176 बार मिलता है, जिससे पता चलता है कि गाय उस समय धन और समृद्धि का मुख्य प्रतीक थी। ऋग्वेद में घोड़े को ‘अश्व’ कहा गया है और एक पूरा स्तोत्र ‘अश्व सूक्त’ घोड़े को समर्पित है। वैदिक साहित्य में उल्लेखों की संख्या से जुड़े ये तथ्य UPSC, SSC, BPSC और STATE PCS जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछे जाते हैं।
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ऋग्वेद में गाय का लगभग 176 बार उल्लेख मिलता है, जिससे स्पष्ट होता है कि वैदिक काल में गाय का बहुत अधिक महत्व था। उस समय गाय को सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण पशु माना जाता था। गाय न केवल धन और समृद्धि का प्रतीक थी बल्कि यह विनिमय (Barter) का मुख्य साधन भी थी। गाय से जुड़े कई शब्द भी प्रचलित थे, जैसे गविष्ठि जिसका अर्थ युद्ध होता था, गोमत जिसका अर्थ धनी व्यक्ति होता था, और दुहिता जिसका अर्थ पुत्री होता था। वैदिक आर्य गाय को ‘अघन्या’ कहते थे, जिसका अर्थ है — जिसकी हत्या न की जाए। ऋग्वेद के चौथे मंडल में ऋषि वामदेव ने दस गायों का उल्लेख विनिमय के संदर्भ में किया है, जिससे उस समय की वस्तु-विनिमय प्रणाली की जानकारी मिलती है। ये तथ्य UPSC, SSC, BPSC और STATE PCS जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
वैदिक धर्म, देवता और यज्ञ के 25 महत्वपूर्ण MCQ
वैदिक धर्म, देवता और यज्ञ के 25 महत्वपूर्ण MCQ | Vedic Religion MCQ for UPSC, SSC, UPPCS
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ऋग्वैदिक काल में गाय का बहुत अधिक महत्व था और इसे धन व समृद्धि का मुख्य मापदंड माना जाता था। इसी कारण उस समय धनी व्यक्ति को ‘गोमत’ कहा जाता था, जिसका अर्थ है — जिसके पास अधिक गायें हों। इससे यह स्पष्ट होता है कि वैदिक समाज में संपत्ति का आकलन मुख्य रूप से गायों की संख्या के आधार पर किया जाता था। उस समय गाय से जुड़े कई महत्वपूर्ण शब्द भी प्रचलित थे। जैसे ‘गविष्ठि’ या ‘गवेष्णा’ का अर्थ गाय की खोज या युद्ध होता था, क्योंकि कई बार युद्ध का कारण भी गायों की प्राप्ति होती थी। इसी प्रकार ‘दुहिता’ शब्द का अर्थ पुत्री होता था, जबकि ‘अहन्या’ का अर्थ अतिथि बताया गया है। ‘गोहना’ शब्द भी गाय से संबंधित माना जाता है। इन शब्दों से यह पता चलता है कि वैदिक समाज की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था में गाय का विशेष स्थान था। इसलिए ये तथ्य BPSC, UPPCS, SSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछे जाते हैं।
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ऋग्वैदिक काल में ‘दुहित्र’ या ‘दुहिता’ शब्द का प्रयोग पुत्री के लिए किया जाता था। यह शब्द ‘गौ’ (गाय) शब्द से ही व्युत्पन्न माना जाता है और इसका शाब्दिक अर्थ है — वह जो गाय दुहती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि उस समय गाय से संबंधित कार्यों में लड़कियों की भी भागीदारी होती थी। यह तथ्य यह भी दर्शाता है कि ऋग्वैदिक समाज में स्त्रियों की स्थिति अपेक्षाकृत अच्छी थी और वे पारिवारिक तथा आर्थिक कार्यों में योगदान देती थीं। इसी काल में ‘गौ’ शब्द से अनेक अन्य शब्दों की भी उत्पत्ति हुई, जो उस समय के सामाजिक और आर्थिक जीवन में गाय के विशेष महत्त्व को दर्शाते हैं। यह एक महत्त्वपूर्ण भाषाशास्त्रीय तथ्य है, जो UPSC, BPSC, UPPCS, SSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछा जाता है।
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ऋग्वैदिक आर्यों ने जब पहली बार भैंस को देखा तो उसे ‘गवल’ या ‘गौरी’ कहकर पुकारा। ‘गवल’ का शाब्दिक अर्थ है — ‘गाय जैसे बालों वाला’। यह इस बात का प्रमाण माना जाता है कि आर्यों की पहचान और तुलना का मुख्य आधार गाय ही थी। इससे यह भी संकेत मिलता है कि भैंस आर्यों के मूल निवास स्थान में सामान्य रूप से नहीं पाई जाती थी, इसलिए वे प्रारंभ में इससे अपरिचित थे और उसकी पहचान गाय से मिलाकर करते थे। यह तथ्य वैदिक काल में पशु-ज्ञान और आर्यों के जीवन को समझने में महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए UPSC, BPSC, UPPCS, SSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में वैदिक पशु-ज्ञान से संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
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ऋग्वेद के चौथे मंडल में ऋषि वामदेव का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने कहा — “कौन है जो मेरे इन्द्र की प्रतिमा को दस गायों में खरीद सकता है।” यह उद्धरण इस बात को स्पष्ट करता है कि ऋग्वैदिक काल में गाय विनिमय (Barter) का प्रमुख साधन थी। उस समय वस्तुओं तथा धार्मिक प्रतीकों का मूल्य भी गायों के आधार पर आंका जाता था। इससे यह पता चलता है कि वैदिक समाज में आर्थिक लेन-देन मुख्य रूप से वस्तु विनिमय प्रणाली पर आधारित था और गाय इस व्यवस्था की केंद्रीय इकाई थी। ऋषि वामदेव ऋग्वेद के प्रमुख ऋषियों में गिने जाते हैं। यह तथ्य ऋग्वैदिक अर्थव्यवस्था तथा उस समय की वस्तु-विनिमय प्रणाली (Barter System) को समझने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, और UPSC CSE, BPSC, UPPCS तथा अन्य राज्य PCS परीक्षाओं में इससे संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
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ऋग्वैदिक काल में कृषि का महत्त्व अपेक्षाकृत सीमित था और उस समय मुख्य रूप से केवल ‘यव’ नामक फसल का उल्लेख मिलता है। ‘यव’ की पहचान सामान्यतः जौ (Barley) से की जाती है। जौ भारत की प्राचीनतम कृषि फसलों में से एक मानी जाती है और इसका उपयोग ऋग्वैदिक काल में धार्मिक अनुष्ठानों में भी किया जाता था। बाद में उत्तर वैदिक काल में कृषि का उल्लेखनीय विकास हुआ और चावल, गेहूं, उड़द तथा सरसों जैसी कई अन्य फसलों की खेती शुरू हो गई। इस प्रकार यह तथ्य भारतीय कृषि के प्रारंभिक इतिहास और उसके क्रमिक विकास को समझने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, इसलिए UPSC, BPSC, UPPCS, SSC तथा NCERT आधारित प्रतियोगी परीक्षाओं में इससे संबंधित प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं।
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ऋग्वेद में हल के लिए सीधे ‘हल’ शब्द का उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन ‘लांगल’ शब्द का उल्लेख मिलता है जिसे हल का पर्याय माना जाता है। इससे यह संकेत मिलता है कि ऋग्वैदिक काल में आदिम कृषि का अस्तित्व था। आगे चलकर उत्तर वैदिक काल में हल के लिए ‘सीर’ शब्द का प्रयोग यजुर्वेद में मिलता है। समय के साथ हल की संरचना अधिक भारी और विकसित होती गई। काठक संहिता में तो 24 बैलों द्वारा हल चलाने का भी उल्लेख मिलता है, जो उस समय कृषि तकनीक के विकास को दर्शाता है। इस प्रकार यह तथ्य भारतीय कृषि के क्रमिक विकास को समझने में महत्त्वपूर्ण है और BPSC, UPPCS, SSC तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में इससे संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं।
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ऋग्वेद में केवल दो धातुओं का उल्लेख मिलता है — सोना (Gold) और अयस। ‘अयस’ की पहचान के विषय में विद्वानों में मतभेद पाया जाता है। कुछ विद्वान इसे ताँबा (Copper) मानते हैं, जबकि कुछ इसे कांसा (Bronze) से जोड़ते हैं। ऋग्वैदिक साहित्य में चाँदी और लोहे का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। बाद में उत्तर वैदिक काल में लगभग 1000 ईसा पूर्व के आसपास आर्यों को लोहे का ज्ञान हुआ, जिससे कृषि और औजारों के विकास में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया। ‘निष्क’ उस समय सोने का एक प्रकार का हार था जिसे आभूषण के रूप में धारण किया जाता था। इस प्रकार ऋग्वैदिक काल का धातु ज्ञान उस समय की तकनीकी और आर्थिक स्थिति को समझने में सहायक है, इसलिए UPSC, BPSC, UPPCS, SSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में इससे संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
उत्तर वैदिक काल MCQ: आश्रम व्यवस्था, 16 संस्कार और षड्दर्शन
उत्तर वैदिक काल MCQ: आश्रम व्यवस्था, 16 संस्कार और षड्दर्शन
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ऋग्वेद में ‘निष्क’ का उल्लेख सोने के एक कीमती आभूषण के रूप में मिलता है, जिसे सामान्यतः गले में पहना जाता था। यह वैदिक काल की आभूषण परंपरा और उस समय की संपन्नता का महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाता है। निष्क केवल आभूषण ही नहीं था, बल्कि इसे धन और समृद्धि के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता था। आगे चलकर उत्तर वैदिक तथा बाद के कालों में ‘निष्क’ शब्द का प्रयोग एक प्रकार की मुद्रा (सिक्के) के अर्थ में भी होने लगा। यह शब्द संस्कृत साहित्य में विभिन्न संदर्भों में मिलता है और उस समय की आर्थिक तथा सामाजिक स्थिति को समझने में सहायक है। इसलिए UPSC, BPSC, UPPCS, SSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में वैदिक काल के आभूषणों और धन-संपत्ति से संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
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ऋग्वेद के छठे मंडल में बुनाई (Weaving) से संबंधित प्रक्रियाओं का उल्लेख मिलता है, जो यह दर्शाता है कि वैदिक काल में वस्त्र उद्योग का भी अस्तित्व था। इस संदर्भ में जुलाहे को ‘वाय’ और करघा को ‘तसर’ कहा गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि उस समय वस्त्र निर्माण की प्रारंभिक तकनीक विकसित हो चुकी थी। इसके अतिरिक्त ऋग्वेद के मंडलों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। सातवां मंडल मुख्यतः ऋषि वशिष्ठ द्वारा रचित माना जाता है, जबकि चौथा मंडल ऋषि वामदेव से संबंधित है। वहीं दसवां मंडल को विद्वानों द्वारा सबसे बाद में जोड़ा गया माना जाता है। इस प्रकार ऋग्वेद के मंडलों, उनके रचयिताओं और विषयवस्तु से संबंधित तथ्य UPSC, BPSC, UPPCS, SSC तथा अन्य राज्य PSC परीक्षाओं में नियमित रूप से पूछे जाते हैं।
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ऋग्वैदिक काल में जुलाहे को ‘वाय’ और करघे को ‘तसर’ कहा जाता था। ये शब्द ऋग्वेद के छठे मंडल में प्रयुक्त हुए हैं, जो यह दर्शाते हैं कि उस समय कपड़ा बुनाई एक महत्त्वपूर्ण व्यवसाय था। वैदिक साहित्य में सूत कातने और वस्त्र बुनने की प्रक्रियाओं का भी उल्लेख मिलता है। उस समय ऊन तथा सूती वस्त्र दोनों का उपयोग किया जाता था, जिससे वस्त्र निर्माण की प्रारंभिक तकनीकों का पता चलता है। इसके अतिरिक्त कृषि संबंधी शब्दावली में भी अंतर मिलता है—‘लांगल’ शब्द ऋग्वेद में हल के पर्याय के रूप में प्रयुक्त हुआ है, जबकि ‘सीर’ शब्द यजुर्वेद में हल के लिए प्रयुक्त होता है। इस प्रकार वैदिक व्यवसायों और उनसे संबंधित शब्दावली उस समय की आर्थिक गतिविधियों को समझने में सहायक है और UPSC, BPSC, UPPCS, SSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में इससे संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
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उत्तर वैदिक काल (लगभग 1000 ई.पू. से 600 ई.पू.) में अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ और पशुपालन के स्थान पर कृषि मुख्य आधार बन गई। इस समय आर्य लोग स्थायी रूप से बसने लगे थे, जिससे कृषि गतिविधियों का विस्तार हुआ। इस काल में अनेक नई फसलों की खेती प्रारम्भ हुई, जैसे — चावल (व्रीहि), गेहूं (गोधूम), उड़द (माष) तथा सरसों (सर्षप)। कृषि के विकास के साथ हल की संरचना भी भारी हो गई और ग्रंथों में 24 बैलों द्वारा खेत जोते जाने का उल्लेख मिलता है। इसी काल में लोहे का ज्ञान भी आर्यों को हुआ, जिससे कृषि उपकरणों में सुधार आया और कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई। इस प्रकार यह काल भारतीय कृषि के विकास की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है और यह तथ्य NCERT आधारित इतिहास पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण भाग है, जिसे UPSC, BPSC, UPPCS, SSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछा जाता है।
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काठक संहिता में 24 बैलों द्वारा खेतों की जुताई का उल्लेख मिलता है, जबकि अथर्ववेद में 6 से 12 बैलों द्वारा हल चलाने का वर्णन किया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि उत्तर वैदिक काल में हल काफी भारी और बड़े हो चुके थे। ऐसे भारी हलों से भूमि की गहरी जुताई संभव होती थी, जिससे कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई। यह स्थिति उस समय की कृषि प्रगति और कृषि क्रांति का महत्वपूर्ण प्रमाण मानी जाती है। काठक संहिता वास्तव में कृष्ण यजुर्वेद की एक प्रमुख शाखा है। इस प्रकार उत्तर वैदिक काल की कृषि तकनीक और वैदिक साहित्य से संबंधित ये तथ्य UPSC, BPSC, UPPCS, MPPSC, SSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछे जाते हैं।
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अथर्ववेद में 6 से 12 बैलों द्वारा खेत जोतने का उल्लेख मिलता है। अथर्ववेद चारों वेदों में से एक है, जिसमें जादू-टोना, औषधि, कृषि, समाज तथा दैनिक जीवन से संबंधित अनेक विषयों की जानकारी प्राप्त होती है। इसके विपरीत काठक संहिता में 24 बैलों द्वारा खेतों की जुताई का उल्लेख मिलता है। इन दोनों ग्रंथों के उल्लेखों में अंतर यह संकेत देता है कि विभिन्न क्षेत्रों में हल का आकार और खेती की पद्धति अलग-अलग हो सकती थी। अथर्ववेद को ‘ब्रह्मवेद’ के नाम से भी जाना जाता है। इस प्रकार अथर्ववेद से संबंधित तथ्य वैदिक समाज, कृषि और धार्मिक परंपराओं को समझने में महत्त्वपूर्ण हैं और UPSC, BPSC, UPPCS, MPPSC, SSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में इनसे जुड़े प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं।
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उत्तर वैदिक काल में चावल के लिए ‘व्रीहि’ शब्द का प्रयोग किया जाता था। यजुर्वेद में चावल की पाँच किस्मों का उल्लेख मिलता है, जिनमें ‘महाव्रीहि’ को सर्वोत्तम गुणवत्ता का चावल माना गया है। इसी प्रकार ‘गोधूम’ शब्द गेहूं के लिए, ‘माष’ शब्द उड़द के लिए तथा ‘सर्षप’ शब्द सरसों के लिए प्रयुक्त होता था। ‘यव’ जौ का प्राचीन नाम था, जो ऋग्वैदिक काल की प्रमुख और लगभग एकमात्र फसल मानी जाती है। उत्तर वैदिक काल तक आते-आते कृषि बहुफसली (Multi-crop) हो गई थी और कई प्रकार की फसलों की खेती होने लगी थी। इस प्रकार प्राचीन फसलों के नाम और उनका वैदिक साहित्य में उल्लेख भारतीय कृषि के विकास को समझने में महत्त्वपूर्ण है, इसलिए BPSC, UPPCS, SSC तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में इससे संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
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यजुर्वेद में हल के लिए ‘सीर’ शब्द का प्रयोग मिलता है, जबकि ऋग्वेद में हल के लिए ‘लांगल’ शब्द प्रयुक्त हुआ है। यजुर्वेद में मुख्यतः कृषि विधियों, यज्ञ-अनुष्ठानों तथा सामाजिक जीवन का विस्तृत वर्णन मिलता है। यह वेद दो भागों में विभाजित है — कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद। उत्तर वैदिक काल में अनाज को मापने के लिए ‘उर्दर’ नामक बर्तन का प्रयोग किया जाता था। इसी प्रकार ‘तसर’ शब्द का प्रयोग करघे के लिए किया जाता था, जो उस समय के वस्त्र उद्योग का संकेत देता है। इस प्रकार हल और कृषि से संबंधित वैदिक शब्दावली प्राचीन भारत के कृषि इतिहास को समझने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, इसलिए UPSC, BPSC, UPPCS, SSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में इससे संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
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यजुर्वेद में अनाज नापने के लिए ‘उर्दर’ नामक बर्तन का उल्लेख मिलता है। यह तथ्य उत्तर वैदिक काल में कृषि की उन्नति तथा व्यापार-वाणिज्य के विकास का महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाता है। जब कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई तो अनाज की माप-तौल की आवश्यकता भी बढ़ी, जिसके परिणामस्वरूप विशेष माप-पात्रों का निर्माण किया गया। वैदिक साहित्य में कई अन्य महत्वपूर्ण शब्द भी मिलते हैं, जैसे ‘तसर’ करघे के लिए प्रयुक्त शब्द था, ‘सीर’ हल का नाम था जिसका उल्लेख यजुर्वेद में मिलता है, और ‘लांगल’ शब्द ऋग्वेद में हल के पर्यायवाची के रूप में प्रयुक्त हुआ है। इस प्रकार माप-तौल तथा कृषि से संबंधित वैदिक शब्दावली प्राचीन भारत की आर्थिक और कृषि व्यवस्था को समझने में सहायक है और UPSC, BPSC, UPPCS, SSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में इससे जुड़े प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
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उत्तर वैदिक काल में लगभग 1000 ईसा पूर्व के आसपास आर्य लोग पहली बार लोहे से परिचित हुए। उत्तर वैदिक साहित्य में ‘लौह अयस’ और ‘कृष्ण अयस’ दोनों का उल्लेख मिलता है। सामान्यतः ‘लौह अयस’ को ताँबा तथा ‘कृष्ण अयस’ को लोहा माना जाता है। हालांकि लोहे का व्यापक और बड़े पैमाने पर प्रयोग लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व में शुरू हुआ, जब लोहे के औजारों और हथियारों का व्यापक उपयोग होने लगा। लोहे के आगमन से कृषि, युद्ध और व्यापार में महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी परिवर्तन हुए, क्योंकि मजबूत औजारों से भूमि की गहरी जुताई संभव हुई और हथियारों की शक्ति भी बढ़ी। इस प्रकार लोहे का उपयोग प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था और तकनीकी विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है, इसलिए यह तथ्य UPSC, BPSC, UPPCS, SSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछा जाता है।
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उत्तर वैदिक काल में ‘अयस’ के दो रूपों का उल्लेख मिलता है — ‘लौह अयस’ और ‘कृष्ण अयस’। सामान्यतः ‘लौह अयस’ शब्द का प्रयोग ताँबे के लिए तथा ‘कृष्ण अयस’ शब्द का प्रयोग लोहे के लिए किया गया है। ‘कृष्ण’ का अर्थ काला होता है और लोहा काले रंग का होता है, इसलिए इसे ‘कृष्ण अयस’ कहा गया। लोहे की खोज धातु युग के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ मानी जाती है। यद्यपि आर्यों को लोहे का ज्ञान उत्तर वैदिक काल में हो गया था, लेकिन छठी शताब्दी ईसा पूर्व में इसका व्यापक प्रयोग आरंभ हुआ। लोहे के औजारों और हथियारों के उपयोग से कृषि तथा युद्ध तकनीक में व्यापक परिवर्तन हुए और उत्पादन क्षमता में वृद्धि हुई। इसलिए यह तथ्य UPSC, BPSC, UPPCS, SSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछा जाता है।
ऋग्वैदिक और उत्तर वैदिक काल का भूगोल MCQ
ऋग्वैदिक और उत्तर वैदिक काल का भूगोल MCQ | 25 Important Vedic Geography Questions with Explanation