भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस: स्थापना से स्वतंत्रता तक का सफर – प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए संपूर्ण अध्ययन

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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना आधुनिक भारत के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। 28 दिसंबर 1885 को स्थापित यह संगठन न केवल भारत का सबसे पुराना राजनीतिक दल है, बल्कि यह एशिया और अफ्रीका में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध उभरने वाला पहला संगठित राष्ट्रीयता आंदोलन भी था। इस ब्लॉग में हम कांग्रेस की स्थापना से लेकर भारत की स्वतंत्रता तक के संपूर्ण सफर को विस्तार से समझेंगे, जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

स्थापना के पूर्व की परिस्थितियां

1857 के विद्रोह की विफलता के बाद भारत में राजनीतिक चेतना का एक नया दौर शुरू हुआ। 1860 और 1870 के दशकों में शिक्षित भारतीयों में राजनीतिक जागरूकता बढ़ने लगी थी। इस दौर में कई क्षेत्रीय संगठनों का गठन हुआ, जैसे:

सुरेंद्रनाथ बनर्जी द्वारा 1876 में स्थापित ‘इंडियन एसोसिएशन’ और 1883 में ‘नेशनल कॉन्फ्रेंस’ ने बंगाल में राजनीतिक चेतना को मजबूत किया। दादाभाई नौरोजी ने 1867 में लंदन में ‘ईस्ट इंडिया एसोशिएशन’ की स्थापना की थी।

मद्रास प्रेसिडेंसी में एम. वीर राघवाचार्या, पी. आनंद चालू और जी. सुब्रमण्यम अय्यर ने 1884 में ‘मद्रास महाजन सभा’ की स्थापना की। बंबई में फिरोजशाह मेहता, के.टी. तैलंग और बदरुद्दीन तैयबजी ने 1885 में ‘बॉम्बे प्रेसिडेंसी एसोसिएशन’ बनाई।

हालांकि ये सभी संस्थाएं क्षेत्रीय स्तर पर काम कर रही थीं, लेकिन अखिल भारतीय स्तर पर एक संगठित मंच की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। यही आवश्यकता भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का आधार बनी।

28 दिसंबर 1885: ऐतिहासिक बंबई अधिवेशन

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन 28 से 31 दिसंबर 1885 के बीच बंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय में आयोजित हुआ। यह भवन बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान के पास स्थित था। मूलतः यह अधिवेशन पुणे में होना था, लेकिन वहां हैजा फैलने के कारण अंतिम समय में इसका स्थान बदलकर बंबई कर दिया गया।

इस ऐतिहासिक अधिवेशन में कुल 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। व्योमेश चंद्र बनर्जी को प्रथम अधिवेशन का अध्यक्ष चुना गया। सेवानिवृत्त ब्रिटिश अधिकारी एलन ऑक्टेवियन ह्यूम (ए.ओ. ह्यूम) ने इस संस्था की नींव रखी, जिन्हें ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पिता और जन्मदाता’ भी कहा जाता है। वे इसके प्रथम महासचिव भी बने।

उल्लेखनीय है कि पहले इस संस्था का नाम ‘भारतीय राष्ट्रीय यूनियन’ (Indian National Union) था, लेकिन दादाभाई नौरोजी के सुझाव पर इसका नाम बदलकर ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ कर दिया गया। कांग्रेस शब्द लैटिन भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ है “साथ आना”।

इस समय ब्रिटेन का प्रधानमंत्री ग्लैडस्टोन था और भारत का वायसराय लॉर्ड डफरिन (1884-1888) था।

सुरक्षा वाल्व का सिद्धांत: विवाद और वास्तविकता

कांग्रेस की स्थापना को लेकर एक विवादास्पद सिद्धांत प्रचलित रहा है, जिसे ‘सुरक्षा वाल्व का सिद्धांत’ (Safety Valve Theory) कहा जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार, ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों में बढ़ते असंतोष को नियंत्रित करने और एक संभावित विद्रोह को रोकने के लिए कांग्रेस की स्थापना करवाई।

कांग्रेस के इतिहासकार पट्टाभि सीतारमैय्या ने कहा था, “कांग्रेस की स्थापना के रहस्य पर पर्दा पड़ा हुआ है।” लाला लाजपत राय ने 1916 में ‘यंग इंडिया’ अखबार में लिखा कि “कांग्रेस लॉर्ड डफरिन के दिमाग की उपज है।”

हालांकि, आधुनिक इतिहासकारों ने इस सिद्धांत को काफी हद तक खारिज कर दिया है। वास्तविकता यह है कि 1870 के दशक के बाद भारतीय राष्ट्रीयता की भावनाएं तेजी से उभर रही थीं और अखिल भारतीय स्तर पर एक संगठन की आवश्यकता स्वाभाविक रूप से महसूस की जा रही थी। कांग्रेस इसी आवश्यकता की पूर्ति का परिणाम थी।

कलकत्ता अधिवेशन, 1886

दूसरा कांग्रेस अधिवेशन 1886 में कलकत्ता में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। पहले अधिवेशन में केवल 72 प्रतिनिधि थे, जबकि इसमें 434 सदस्यों ने भाग लिया, जो कांग्रेस की बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है।

इस अधिवेशन में ए.ओ. ह्यूम को नियमित रूप से कांग्रेस का महासचिव मान लिया गया और सभी महत्वपूर्ण केंद्रों में स्टैंडिंग कांग्रेस कमेटियां बनाने का निर्णय लिया गया। अधिवेशन के बाद वायसराय लॉर्ड डफरिन ने प्रतिनिधियों को गार्डेन पार्टी दी थी।

दादाभाई नौरोजी नरमपंथी विचारधारा के समर्थक थे। उन्हें ‘भारत का शानदार वयोवृद्ध पुरुष’ (Grand Old Man of India) और ‘भारत का पितामह’ कहा जाता था। उन्होंने 1867 में ‘England Debt to India’ नामक अपने पेपर में “धन के बहिर्गमन के सिद्धांत” (Drain of Wealth) को प्रस्तुत किया। उनकी 1901 की पुस्तक ‘Poverty and Unbritish Rule in India’ में भारत की बढ़ती गरीबी को तथ्यों और तर्कों के आधार पर प्रतिपादित किया गया।

मद्रास अधिवेशन, 1887

1887 में मद्रास में आयोजित तीसरे अधिवेशन की अध्यक्षता बदरुद्दीन तैयबजी ने की, जो कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता करने वाले प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष थे। इसमें 607 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

यह पहला अधिवेशन था जब 3000 प्रतिनिधियों के रहने के लिए विशाल पंडाल बनाया गया। यह पहला अवसर था जब कांग्रेस अधिवेशन के लिए साधारण जनता से पैसा इकट्ठा किया गया। यह पहला अधिवेशन था जिसमें भारतीय भाषा तमिल में भाषण हुआ।

इसी अधिवेशन के बाद डफरिन और अन्य ब्रिटिश शासक कांग्रेस के खिलाफ हो गए। डफरिन ने कांग्रेस के बारे में कहा कि “यह जनता के उस अल्पसंख्यक वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है, जिसकी संख्या सूक्ष्म है।”

इलाहाबाद अधिवेशन, 1888

चौथे अधिवेशन की अध्यक्षता करने वाले प्रथम यूरोपीय जॉर्ज यूल थे, जिन्होंने 1888 में इलाहाबाद कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता की। इस अधिवेशन में 1248 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

ब्रिटिश सरकार ने इस अधिवेशन को असफल बनाने के लिए कांग्रेस विरोधी तत्वों का गुट बनाया, जिसमें बनारस के राजा शिवप्रसाद ‘सितारे-हिंद’ और सर सैयद अहमद खान भी शामिल थे। सर सैयद अहमद खान ने अगस्त 1888 में ‘युनाइटेड इंडिया पैट्रियोटिक एसोसिएशन’ की स्थापना कांग्रेस का विरोध करने के लिए की थी।

इसी अधिवेशन में निर्णय लिया गया कि लंदन में कांग्रेस की एक संस्था ‘ब्रिटिश इंडिया कमेटी’ के रूप में होगी, जो ब्रिटेन में भारत के पक्ष में समर्थन जुटाएगी। इस संस्था द्वारा 1889 में ‘इंडिया’ नामक समाचार पत्र का प्रकाशन किया गया, जिसके प्रथम संपादक विलियम डिग्बी थे।

कांग्रेस के इतिहास में कई यूरोपीय नेताओं ने अध्यक्ष पद संभाला:

  • सर विलियम वेडरबर्न – बंबई 1889 और इलाहाबाद 1910 (दो बार अध्यक्षता करने वाले एकमात्र यूरोपीय)
  • अल्फ्रेड वेब – मद्रास 1894
  • सर हेनरी कॉटन – बंबई 1904
  • एनी बेसेंट – कलकत्ता 1917
  • नेल्ली सेन गुप्ता – कलकत्ता 1933

वंदे मातरम: राष्ट्रीय गीत की यात्रा

भारत का राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ पहली बार 1896 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में गाया गया था। इस अधिवेशन की अध्यक्षता रहमतुल्ला सयानी ने की थी और इसका गान रवींद्रनाथ टैगोर ने किया था।

यह गीत बंकिम चंद्र चटर्जी के प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंद मठ’ से लिया गया है। इस गीत की रचना बंकिम चंद्र ने की, रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे संगीतबद्ध किया और अरविंद घोष ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया। भारत के तीन महान मनीषियों के सहयोग से इस गीत की प्रस्तुति हुई।

वर्तमान में इसे प्रसिद्ध सितारवादक पन्ना लाल घोष द्वारा राग सारंग में स्वरबद्ध धुन में गाया जाता है।

जन गण मन: राष्ट्रगान का जन्म

भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ पहली बार 27 दिसंबर 1911 को कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में गाया गया, जिसकी अध्यक्षता पंडित बिशन नारायण धर ने की थी।

राष्ट्रगान की रचना बंगला भाषा में रवींद्रनाथ टैगोर ने की थी और सर्वप्रथम जनवरी 1912 में ‘तत्वबोधिनी पत्रिका’ में ‘भारत भाग्य विधाता’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। टैगोर ने 1919 में इसका अंग्रेजी भाषा में अनुवाद ‘Morning Song of India’ के नाम से किया।

पूरे गीत में पांच पद हैं, लेकिन इसका प्रथम पद, जिसमें तेरह पंक्तियां हैं, को भारत के राष्ट्रगान के रूप में अपनाया गया। राष्ट्रगान के गायन का समय 52 सेकेंड है। संक्षिप्त रूप में इसे 20 सेकेंड में गाया जाता है, जिसमें केवल प्रथम और अंतिम पंक्तियां होती हैं।

24 जनवरी 1950 को ‘जन गण मन’ को आधिकारिक रूप से राष्ट्रगान के रूप में अपनाया गया।

रवींद्रनाथ टैगोर एशिया के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता थे। उन्हें 1913 में साहित्य के क्षेत्र में उनकी कृति ‘गीतांजलि’ के लिए यह सम्मान मिला।

कलकत्ता अधिवेशन, 1906

1906 में कलकत्ता में आयोजित अधिवेशन में अध्यक्ष पद को लेकर नरमपंथियों और गरमपंथियों के बीच विवाद हो गया। नरमपंथी रासबिहारी घोष को जबकि गरमपंथी बाल गंगाधर तिलक को अध्यक्ष बनाना चाहते थे।

विवाद बढ़ता देखकर लंदन से दादाभाई नौरोजी को बुलाया गया। वे ऐसे व्यक्ति थे जो नरमपंथियों और गरमपंथियों दोनों में समान रूप से लोकप्रिय थे। अंततः दादाभाई नौरोजी ने इस अधिवेशन की अध्यक्षता की।

इस अधिवेशन में मोहम्मद अली जिन्ना दादाभाई के सचिव के रूप में शामिल हुए। दादाभाई के भाषण का अधिकांश भाग जिन्ना ने ही लिखा था।

यद्यपि ‘स्वराज’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग स्वामी दयानंद सरस्वती ने किया था, परंतु कांग्रेस के मंच से इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग दादाभाई नौरोजी ने इसी अधिवेशन में किया।

इस अधिवेशन में चार प्रस्ताव पारित किए गए – राष्ट्रीय शिक्षा, स्वदेशी, स्वशासन और बहिष्कार।

सूरत अधिवेशन, 1907: प्रथम विभाजन

1907 का सूरत अधिवेशन कांग्रेस के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इस अधिवेशन की अध्यक्षता उदारवादी रासबिहारी घोष ने की। 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में पारित चार प्रस्तावों की व्याख्या को लेकर नरमपंथियों और गरमपंथियों में गंभीर मतभेद उत्पन्न हो गए।

इस अधिवेशन में सदस्यों में मारपीट की नौबत आ गई। अंततः कोई समझौता नहीं हो सका और कांग्रेस का प्रथम विभाजन नरमपंथी और गरमपंथी दो दलों में हो गया।

गोपाल कृष्ण गोखले

1905 के बनारस अधिवेशन की अध्यक्षता गोपाल कृष्ण गोखले ने की। उन्होंने 1905 में ‘सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी’ (भारत सेवक समाज) की स्थापना की, जो ऐसे राजनीतिक कार्यकर्ताओं की संस्था थी जो नाममात्र के वेतन पर मातृभूमि की सेवा करने का प्रण लेते थे।

गोखले के राजनीतिक गुरु महादेव गोविंद रानाडे थे, जिन्हें ‘महाराष्ट्र का सुकरात’ कहा जाता था। गोखले स्वयं महात्मा गांधी और मोहम्मद अली जिन्ना दोनों के राजनीतिक गुरु थे। गांधी जी ने उन्हें ‘पुण्यात्मा गोखले’ और जिन्ना उन्हें ‘ऋषि गोखले’ कहते थे।

मोहम्मद अली जिन्ना: शुरुआती राष्ट्रवादी चरण

1904 के बंबई अधिवेशन में जिन्ना ने पहली बार भाग लिया, जहां उनकी मुलाकात गोखले से हुई। प्रारंभ में जिन्ना हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक और राष्ट्रवाद के पुरजोर वकील थे। उन्होंने कहा था, “मैं प्रथमतः राष्ट्रवादी हूं, द्वितीयतः राष्ट्रवादी हूं और अंततः राष्ट्रवादी हूं।”

सरोजिनी नायडू ने 1918 में जिन्ना पर एक पुस्तक लिखी थी, जिसका शीर्षक था – ‘मुहम्मद अली जिन्ना: हिंदू मुस्लिम एकता के दूत’।

बाल गंगाधर तिलक

तिलक ने प्रारंभिक कांग्रेस की नीतियों की आलोचना करते हुए कहा था, “यदि वर्ष में इसी तरह एक बार मेंढक की तरह टर्राएंगे, तो हमें कुछ भी नहीं मिलेगा।”

1918 के दिल्ली अधिवेशन के वास्तविक अध्यक्ष तिलक चुने गए थे, लेकिन वे वेलेंटाइन शिरॉल के मुकदमे के सिलसिले में ब्रिटेन चले गए थे। शिरॉल ने उन्हें ‘भारतीय अशांति का जनक’ (Father of Indian Unrest) कहा था।

1916 के लखनऊ अधिवेशन की अध्यक्षता अंबिका चरण मजूमदार ने की। इस अधिवेशन में दो महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं:

  1. नरमपंथी और गरमपंथी का पुनर्मिलन: 1907 के सूरत अधिवेशन में विभाजित हुए दोनों गुट पुनः एक हो गए। इसमें बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
  2. कांग्रेस-मुस्लिम लीग समझौता: इस अधिवेशन में कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए 1909 के मार्ले-मिंटो सुधार अधिनियम के अंतर्गत प्रदत्त पृथक निर्वाचक मंडल (Separate Electorate) के अधिकार को स्वीकार कर दिया। इस समझौते में तिलक और जिन्ना की भूमिका महत्वपूर्ण रही।

कांग्रेस की महिला अध्यक्ष

भारत की आजादी से पूर्व तीन महिलाओं ने कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता की:

  1. एनी बेसेंट – कलकत्ता 1917
  2. सरोजिनी नायडू – कानपुर 1925 (प्रथम और एकमात्र भारतीय महिला)
  3. नेल्ली सेन गुप्ता – कलकत्ता 1933

सरोजिनी नायडू को “भारत की बुलबुल” (Nightingale of India) के रूप में याद किया जाता है। उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान ‘नारी आंदोलन का जन्मदाता’ कहा गया। स्वतंत्रता के बाद वे उत्तर प्रदेश की प्रथम राज्यपाल बनीं।

उनकी प्रमुख रचनाएं हैं: The Golden Threshold, The Bird of Time, The Broken Wing।

कादम्बिनी गांगुली

1890 के कलकत्ता अधिवेशन में भारत की पहली महिला स्नातक कादम्बिनी गांगुली ने भाग लिया था।

असहयोग आंदोलन और कांग्रेस

कलकत्ता विशेष अधिवेशन, सितंबर 1920: लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में इस अधिवेशन में गांधी जी ने असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव रखा। चितरंजन दास, मोतीलाल नेहरू, एनी बेसेंट और जिन्ना ने इसका विरोध किया, लेकिन यह प्रस्ताव बहुमत से पारित हो गया।

नागपुर अधिवेशन, 1920: सी. विजय राघवाचार्या की अध्यक्षता में इस अधिवेशन में चितरंजन दास ने ही असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव रखा, जिन्होंने पहले इसका विरोध किया था।

अहमदाबाद अधिवेशन, 1921: इसकी अध्यक्षता के लिए चितरंजन दास चुने गए थे, लेकिन उनके गिरफ्तार होने के कारण हकीम अजमल खान ने अध्यक्षता की। यह पहला अधिवेशन था जब बैठक से कुर्सियां उठा ली गईं और प्रतिनिधियों को फर्श पर बैठाया गया।

स्वराज पार्टी का गठन

गया अधिवेशन, 1922: चितरंजन दास की अध्यक्षता में इस अधिवेशन में उन्होंने नवंबर 1923 के चुनाव में भागीदारी का प्रस्ताव रखा, जो बहुमत से खारिज हो गया। इसके बाद उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और जनवरी 1923 में इलाहाबाद में ‘कांग्रेस-खिलाफत स्वराज पार्टी’ (स्वराज पार्टी) का गठन किया। चितरंजन दास इसके अध्यक्ष और मोतीलाल नेहरू सचिव थे।

बेलगांव अधिवेशन, 1924: गांधी जी की एकमात्र अध्यक्षता

एकमात्र कांग्रेस अधिवेशन जिसकी अध्यक्षता महात्मा गांधी ने की, वह बेलगांव (कर्नाटक) का 1924 का अधिवेशन था। इसमें गांधी जी के रचनात्मक कार्यक्रमों पर बल दिया गया, जैसे खादी प्रचार, सांप्रदायिक एकता, अस्पृश्यता निवारण और विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार।

1929 का लाहौर अधिवेशन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में ‘महान विभाजक रेखा’ माना जाता है। इस अधिवेशन की अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की, जिनके नाम की सिफारिश महात्मा गांधी ने की थी।

यद्यपि 18 प्रांतीय कांग्रेस समितियों में से केवल 3 का समर्थन नेहरू को प्राप्त था, लेकिन गांधी जी ने युवाओं के उत्साह को देखते हुए इन चुनौतीपूर्ण क्षणों में नेहरू को सभापतित्व सौंपा।

पूर्ण स्वराज की घोषणा

31 दिसंबर 1929 की अर्धरात्रि को रावी नदी के तट पर ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारों के बीच भारतीय स्वतंत्रता का प्रतीक तिरंगा झंडा फहराया गया। इस अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव करतलध्वनि से पारित किया गया।

26 जनवरी 1930 को पूरे देश में प्रथम स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। गांवों और कस्बों में सभाएं आयोजित की गईं, जहां स्वतंत्रता की शपथ ली गई और तिरंगा झंडा फहराया गया।

इस अधिवेशन में पारित प्रमुख प्रस्ताव:

  • गोलमेज सम्मेलन का बहिष्कार
  • पूर्ण स्वराज को कांग्रेस का मुख्य लक्ष्य घोषित करना
  • सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने का अधिकार कांग्रेस कार्यसमिति को सौंपना
  • कांग्रेस सदस्यों को काउंसिल चुनावों में भाग न लेने का आदेश

1930 सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारण पहला वर्ष था जब कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन नहीं हुआ।

25 मार्च 1931 में सरदार वल्लभभाई पटेल की अध्यक्षता में कराची का विशेष अधिवेशन संपन्न हुआ। इस अधिवेशन में कांग्रेस ने घोषणा की कि दूसरे गोलमेज सम्मेलन में गांधी जी एकमात्र प्रतिनिधि होंगे।

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को 23 मार्च 1931 को फांसी दिए जाने के कारण देश में गहरा क्षोभ था। यह पहली बैठक थी जिसमें गांधी जी को विरोध का सामना करना पड़ा। गांधी जी ने कहा, “गांधी मर सकता है, परंतु गांधीवाद कभी नहीं।”

इसी अधिवेशन में मूल अधिकारों (Fundamental Rights) से संबंधित प्रस्ताव पारित किया गया, जो जवाहरलाल नेहरू ने रखा था। साथ ही आर्थिक राष्ट्रीय नीति से संबंधित प्रस्ताव भी पारित हुआ।

अक्टूबर 1934 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में इस अधिवेशन में रचनात्मक कार्यक्रमों पर विशेष बल दिया गया। ‘अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ’ की स्थापना का निर्णय लिया गया, जिसकी विधिवत स्थापना 14 दिसंबर 1934 को हुई।

यह अधिवेशन कांग्रेस के स्वर्ण जयंती अधिवेशन के रूप में मनाया गया। इसी में गांधी जी ने कांग्रेस की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद की समाजवाद की वकालत के परिणामस्वरूप 1934 में ‘कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी’ का गठन हुआ, जिसमें जयप्रकाश नारायण और आचार्य नरेंद्र देव की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

1939 के त्रिपुरी (जबलपुर) अधिवेशन में सुभाष चंद्र बोस ने गांधी जी के प्रत्याशी पट्टाभि सीतारमैय्या को पराजित कर पुनः अध्यक्ष पद जीता। गांधी जी ने कहा, “पट्टाभि की हार मेरी हार है।”

कांग्रेस कार्यकारिणी के 15 में से 13 सदस्यों ने त्यागपत्र दे दिया। अंततः सुभाष बोस ने 29 अप्रैल 1939 को कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया और मई 1939 में ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ नामक नई राजनीतिक संस्था बनाई।

1940 में रामगढ़ (झारखंड) में मौलाना अबुल कलाम आजाद की अध्यक्षता में अधिवेशन हुआ। इसके बाद 1945 तक कोई कांग्रेस अधिवेशन नहीं हुआ। इस प्रकार अबुल कलाम आजाद सबसे लंबे समय (1940-1945) तक कांग्रेस अध्यक्ष रहे।

छह वर्ष के बाद आचार्य जे.बी. कृपलानी की अध्यक्षता में यह अधिवेशन हुआ। भारत की आजादी के समय (1947) आचार्य कृपलानी ही कांग्रेस के अध्यक्ष थे।

स्वतंत्र भारत में पट्टाभि सीतारमैय्या की अध्यक्षता में यह अधिवेशन हुआ। गांधी जी की हत्या पर गहरा दुख प्रकट किया गया और राष्ट्रीय यादगार कोष स्थापित करने की स्वीकृति दी गई।

  • दादाभाई नौरोजी: भारत का शानदार वयोवृद्ध पुरुष, भारत का पितामह
  • सरोजिनी नायडू: भारत की बुलबुल, नारी आंदोलन की जन्मदाता
  • गोपाल कृष्ण गोखले: पुण्यात्मा गोखले, भारत का रत्न
  • महादेव गोविंद रानाडे: महाराष्ट्र का सुकरात
  • बाल गंगाधर तिलक: भारतीय अशांति का जनक (ब्रिटिश दृष्टि से)
  • ए.ओ. ह्यूम: कांग्रेस का पिता और जन्मदाता

1938 के हरिपुरा अधिवेशन (सुभाष चंद्र बोस की अध्यक्षता) में पहली बार श्यामलाल पार्षद गुप्त द्वारा रचित झंडा गीत ‘झंडा ऊंचा रहे हमारा, विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’ को कांग्रेस ने भारत के झंडा गीत के रूप में मान्यता दी। यह गीत गणेश शंकर विद्यार्थी के कहने पर लिखा गया था।

प्रारंभिक दौर (1885-1905): नरमपंथी चरण

  • सिविल सेवाओं का भारतीयकरण
  • व्यय में कमी, विशेषकर सैन्य व्यय में
  • विधान परिषदों का विस्तार और सुधार
  • भारतीयों को प्रशासन में अधिक प्रतिनिधित्व
  • आर्थिक शोषण के विरुद्ध आवाज
  • नमक कर की समाप्ति
  • आधुनिक उद्योगों की स्थापना

मध्य दौर (1905-1918): गरमपंथी उदय

  • स्वदेशी आंदोलन का समर्थन
  • बंग-भंग का विरोध
  • बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा
  • स्वशासन की मांग

गांधी युग (1919-1947)

  • असहयोग आंदोलन
  • सविनय अवज्ञा आंदोलन
  • पूर्ण स्वराज की मांग
  • मौलिक अधिकारों की घोषणा
  • आर्थिक राष्ट्रीय नीति
  • किसान और मजदूर अधिकार

1918 के दिल्ली अधिवेशन में तिलक को अध्यक्ष चुने जाने के विरोध में सुरेंद्रनाथ बनर्जी के नेतृत्व में नरमपंथी नेताओं ने ‘भारतीय उदारवादी संघ’ (Indian Liberal Federation) की स्थापना की। यह कांग्रेस का दूसरा विभाजन था।

कांग्रेस का अधिवेशन प्रतिवर्ष 28 से 31 दिसंबर के बीच आयोजित होता था, जिसे वार्षिक अधिवेशन कहा जाता था। कभी-कभी वार्षिक अधिवेशन के अतिरिक्त भी बैठक होती थी, जिसे विशेष अधिवेशन कहा जाता था।

प्रमुख विशेष अधिवेशन:

  • कलकत्ता, सितंबर 1920 (लाला लाजपत राय)
  • कराची, मार्च 1931 (सरदार पटेल)
  • बंबई, अक्टूबर 1934 (डॉ. राजेंद्र प्रसाद)

दो गांवों में कांग्रेस अधिवेशन आयोजित हुए:

  1. फैजपुर (महाराष्ट्र), 1937 – जवाहरलाल नेहरू (किसान मुद्दों पर केंद्रित)
  2. हरिपुरा (गुजरात), 1938 – सुभाष चंद्र बोस (राष्ट्रीय योजना समिति की स्थापना)

प्रथम और एकमात्र

  • प्रथम अध्यक्ष: व्योमेश चंद्र बनर्जी (1885)
  • प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष: बदरुद्दीन तैयबजी (1887)
  • प्रथम यूरोपीय अध्यक्ष: जॉर्ज यूल (1888)
  • प्रथम महिला अध्यक्ष: एनी बेसेंट (1917)
  • प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष: सरोजिनी नायडू (1925, एकमात्र भी)
  • एकमात्र बार गांधी जी अध्यक्ष: बेलगांव (1924)
  • दो बार अध्यक्ष बने यूरोपीय: विलियम वेडरबर्न (1889, 1910)

तीन बार अध्यक्ष

  • दादाभाई नौरोजी: 1886, 1893, 1906
  • जवाहरलाल नेहरू: 1929, 1936, 1937

महत्वपूर्ण वर्ष

  • 1885: स्थापना (बंबई)
  • 1896: वंदे मातरम पहली बार गाया गया
  • 1906: स्वराज शब्द का प्रयोग (कलकत्ता)
  • 1907: प्रथम विभाजन (सूरत)
  • 1911: जन गण मन पहली बार गाया गया
  • 1916: पुनर्मिलन और कांग्रेस-लीग समझौता (लखनऊ)
  • 1929: पूर्ण स्वराज घोषणा (लाहौर)
  • 1931: मौलिक अधिकार घोषणा (कराची)
  • 1934: स्वर्ण जयंती अधिवेशन (बंबई)

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाई। 72 प्रतिनिधियों के साथ शुरू हुआ यह संगठन लाखों लोगों का आंदोलन बन गया। नरमपंथी याचनाओं से शुरू होकर गरमपंथी आंदोलनों और अंततः गांधीवादी सत्याग्रह के माध्यम से कांग्रेस ने भारत को स्वतंत्रता दिलाई।

कांग्रेस के विभिन्न अधिवेशनों में पारित प्रस्तावों, महान नेताओं के योगदान, और राष्ट्रीय प्रतीकों के विकास ने भारतीय राष्ट्रवाद को मजबूत किया। प्रतियोगी परीक्षाओं में कांग्रेस के इतिहास से संबंधित प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं, इसलिए इसका गहन अध्ययन आवश्यक है।

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