भारत में आधुनिक शिक्षा का विकास – संपूर्ण इतिहास


भारत की शिक्षा व्यवस्था का आज का रूप सैकड़ों वर्षों के विकास का परिणाम है। ब्रिटिश राज के समय से लेकर आजादी के बाद तक, हमारी शिक्षा प्रणाली में कई महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं। यह ब्लॉग पोस्ट आपको भारत में आधुनिक शिक्षा के विकास की पूरी यात्रा से अवगत कराएगी, जो न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं में भी बार-बार पूछे जाने वाले विषय हैं।

ब्रिटिश भारत में आधुनिक शिक्षा का इतिहास असल में तब शुरू होता है जब अंग्रेज़ यहाँ शक्तिशाली राजनीतिक सत्ता स्थापित करते हैं। शिक्षा के विकास की पहली सीढ़ी 1787 ईस्वी में बनी थी, जब वारेन हेस्टिंग्स ने कलकत्ता में मदरसा की स्थापना की। इस संस्था में फारसी और अरबी भाषा का अध्ययन कराया जाता था, क्योंकि उस समय ये भाषाएँ प्रशासनिक कार्यों के लिए आवश्यक मानी जाती थीं।

इसके चार साल बाद, 1791 ईस्वी में बनारस में एक संस्कृत कॉलेज की स्थापना की गई। यह कॉलेज ब्रिटिश रेजिडेन्ट जोनाथन डंकन के प्रयासों से खुला था। इस संस्था का प्रमुख उद्देश्य हिंदुओं के धर्म, साहित्य और कानून को संरक्षित रखना और इनका अध्ययन करना था। यह एक महत्वपूर्ण कदम था क्योंकि इससे भारतीय संस्कृति और परंपरा के संरक्षण का प्रयास दिख रहा था।

1799 ईस्वी में लार्ड वेलेजली ने कंपनी के असैनिक अधिकारियों की शिक्षा के लिए कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की। यह कॉलेज प्रशासकों को बेहतर शिक्षा प्रदान करने के लिए बनाया गया था, लेकिन 1802 ईस्वी में डायरेक्टरों की आज्ञा पर इसे बंद कर दिया गया।

इन प्रारंभिक प्रयासों के बाद यह स्पष्ट था कि अंग्रेज़ों के पास भारत में शिक्षा व्यवस्था के विकास की कोई सुस्पष्ट योजना नहीं थी। असली बदलाव तब आया जब 1813 का चार्टर एक्ट पारित हुआ।

1813 के चार्टर एक्ट को भारतीय शिक्षा इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है। इस अधिनियम में भारतीय शिक्षा पर एक लाख रुपया खर्च करने की बात की गई थी। यह रकम तीन प्रमुख उद्देश्यों के लिए निर्धारित की गई थी:

  1. साहित्य के पुनरुद्धार और उन्नति के लिए
  2. भारत में स्थानीय विद्वान् को प्रोत्साहन देने के लिए
  3. अंग्रेज़ी प्रदेशों के वासियों में विज्ञान के आरंभ और उन्नति के लिए

हालांकि, यह धन अगले बीस वर्षों तक सही तरीके से व्यय नहीं हुआ क्योंकि एक स्पष्ट नीति का अभाव था। 1833 के चार्टर अधिनियम में इस धन राशि को बढ़ाकर दस लाख रुपया कर दिया गया। तब जाकर लार्ड बैंटिक को इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार करने के लिए बाध्य होना पड़ा।

इसी समय राजा राममोहन राय एक प्रगतिशील विचारक के रूप में उभरे। उन्होंने कलकत्ता मदरसा और बनारस संस्कृत कॉलेज खोलने के सरकार के प्रयत्नों की कड़ी आलोचना की। उनका मानना था कि ये संस्थाएं विद्यार्थियों को व्यावहारिक ज्ञान नहीं देंगे, बल्कि केवल आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करेंगे।

राजा राममोहन राय का दृष्टिकोण बिल्कुल अलग था। वे चाहते थे कि भारत में ऐसी उदारवादी और ज्ञानवर्धक शिक्षा दी जाय जो गणित, प्राकृतिक दर्शन, रसायनशास्त्र और शरीर रचना जैसे विषयों पर केंद्रित हो।

उनके प्रयासों के फलस्वरूप, 1817 ईस्वी में कलकत्ता में डेविड हेयर द्वारा ‘हिंदू कॉलेज’ की स्थापना की गई, और सरकार ने इसे अनुदान भी दिया। इस कॉलेज में अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दी जाती थी, जो उस समय एक क्रांतिकारी कदम था।

1813 के चार्टर अधिनियम के बाद जो भारतीय शिक्षा पर खर्च करने के लिए एक लाख रुपये का प्रावधान किया गया था, उसे किस तरह की पढ़ाई पर खर्च किया जाय – इस सवाल को लेकर अंग्रेज़ नीति निर्धारकों के बीच तीव्र मतभेद उत्पन्न हो गया। इस विवाद को ‘आंग्ल-प्राच्य विवाद’ या ‘Oriental and Occidental Dispute’ कहा जाता है। यह विवाद प्रतियोगी परीक्षाओं में बहुत महत्वपूर्ण है।

प्राच्य विद्या के समर्थक दल के नेता एच०टी० प्रिंसेप थे, जो लोक शिक्षा समिति के सचिव थे। समिति के मंत्री एच०एच० विल्सन ने भी उनका समर्थन किया। ये लोग वारेन हेस्टिंग्स और लार्ड मिंटो की शिक्षा नीति के समर्थक थे।

  • संस्कृत और अरबी भाषाएँ साहित्य की दृष्टि से समृद्ध थीं
  • अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार तत्कालीन पाठशालाओं और मदरसों की शिक्षा को नष्ट कर देगा
  • प्राचीन हिंदू दर्शन के खज़ाने में बहुत सी अमूल्य निधियाँ हैं
  • अंग्रेजी एक विदेशी भाषा है और आम भारतीयों के लिए सहज नहीं है
  • 1813 के अधिनियम के तहत जो एक लाख रुपया रखा गया था, वह प्राच्य शिक्षा के लिए ही था

दूसरी ओर, आंग्ल या पाश्चात्य शिक्षा के समर्थकों का नेतृत्व सर चार्ल्स ट्रेवेलियन कर रहे थे। इस समूह में मुनरो, ऐलफिन्सटन और सबसे महत्वपूर्ण रूप से लार्ड मैकॉले शामिल थे।

मैकॉले का वह प्रसिद्ध कथन इतिहास में दर्ज है: “यूरोप के एक अच्छे पुस्तकालय की एक आलमारी की एक पंक्ति की पुस्तकें भारत और अरब के समस्त साहित्य से अधिक मूल्यवान हैं।”

मैकॉले का विचार था कि भारत के पास ऐसा कुछ भी नहीं है जिस पर वह गर्व कर सके। वह भारत में भारतीय पुरुषों की एक ऐसी श्रेणी बनाना चाहता था, जो रक्त और रंग से भारतीय हो, लेकिन अपनी प्रवृत्ति, विचार, नैतिक मापदंड और बुद्धि से पूरी तरह अंग्रेज़ हो। दूसरे शब्दों में, वह ‘भूरे रंग का अंग्रेज़’ (brown Englishman) बनाना चाहता था।

मैकॉले ने भारतीय संस्कृति की उपेक्षा करते हुए उसे ‘अंधविश्वासों का भंडार’ कहकर संबोधित किया।

आंग्ल शिक्षा के समर्थकों के मुख्य उद्देश्य थे:

  1. अंग्रेजी भाषा के माध्यम से पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार
  2. औद्योगिक क्रांति के लाभों से भारतीयों को परिचित कराना
  3. सस्ते लिपिकों (clerks) का एक वर्ग तैयार करना
  4. अंग्रेजी संस्कृति के प्रसार से अंग्रेजी वस्तुओं की मांग बढ़ाना
  5. इससे अंग्रेज़ी उद्योग का विकास करना

इन दोनों पक्षों के वैचारिक मतभेद की वजह से लोक शिक्षा समिति ठीक ढंग से कार्य नहीं कर पा रही थी। समिति के अधिकांश सदस्य प्राच्य विद्या के पक्ष में थे, इसलिए समिति ने कलकत्ता में एक संस्कृत कॉलेज खोलने का निर्णय लिया। इससे अंग्रेजी के अल्पमत समर्थकों में गहरा रोष था।

इस रोष को राजा राममोहन राय का समर्थन मिला। उन्होंने तीव्र शब्दों में कहा: “यदि ब्रिटिश संसद भारत को अंधकारमय रखना चाहती है, तो उसे संस्कृत शिक्षा प्रणाली पर ज़ोर देना चाहिये।”

राजा राममोहन राय ने सरकार को एक ज्ञापन दिया, जिसे जन-शिक्षा समिति को भेज दिया गया, लेकिन समिति ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया।

समिति की नीति न तो पाश्चात्य शिक्षा के समर्थक भारतीय बुद्धिजीवियों को और न ही इंग्लैंड में कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स को ही प्रसन्न कर सकी।

कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने भारत में कंपनी प्रशासन की आवश्यकताओं के व्यावहारिक पहलू को ध्यान में रखते हुए माना कि अंग्रेजी भाषा और यूरोपीय साहित्य व विज्ञान की जानकारी से ही सरकारी नौकरियों के लिए ऐसे कर्मचारी मिल सकेंगे, जिन्हें विश्वासपूर्वक सरकारी कार्य सौंपे जा सकें।

1829 ईस्वी में भारत सरकार ने स्पष्ट घोषणा कर दी कि ब्रिटिश सरकार की नीति है कि अंग्रेजी भाषा को धीरे-धीरे सारे देश में सार्वजनिक काम-काज की भाषा बनायी जाय।

इस आधिकारिक घोषणा के बाद जन शिक्षा समिति को अपना रवैया बदलने के लिए बाध्य होना पड़ा, लेकिन स्थिति में ज्यादा परिवर्तन नहीं आया।

आंग्ल-प्राच्य विवाद के समय भारत का वायसराय बैंटिक था। वह मैकॉले के विचारों का समर्थक था और यूरोपीय साहित्य तथा विज्ञान के पक्ष में था। बैंटिक ने निर्णय लिया कि शिक्षा के लिए नियत धन राशि का उपयोग अंग्रेजी शिक्षा के लिए हो।

महत्वपूर्ण बात यह थी कि बैंटिक ने प्राच्य विद्या की संस्थाओं को पूरी तरह बंद करने की सिफारिश नहीं की। उसने कलकत्ता मदरसा तथा कलकत्ता और बनारस के संस्कृत कॉलेजों को सरकारी सहायता जारी रखी, लेकिन प्राच्य विद्या के छात्रों को छात्रवृत्ति देना और प्राच्य ग्रंथों को छापना बंद कर दिया।

इस प्रकार, आंग्ल-प्राच्य विवाद में अंत में आंग्लवादियों की विजय हुई।

मैकॉले ने 2 फरवरी 1835 ईस्वी को अपना महत्वपूर्ण स्मरण पत्र (Minute on Education) वायसराय के कार्यकारिणी परिषद के सामने रखा। इसमें कहा गया कि कंपनी की सरकार यूरोपीय साहित्य को अंग्रेजी भाषा के माध्यम से बढ़ावा देगी और सभी धनराशियाँ इसी उद्देश्य के लिए खर्च की जायेगी।

अपने निर्णय के बाद मैकॉले ने गर्वपूर्वक अपने पिता को एक पत्र में लिखा:

“मुझे पक्का विश्वास है कि यदि शिक्षा की हमारी योजना को आगे बढ़ाया गया, तो 30 वर्ष बाद बंगाल के संभ्रांत वर्गों में एक भी मूर्तिपूजक शेष नहीं रहेगा। यह परिणाम बिना किसी धर्मांतरण के और बिना उसकी धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप किये ही मिल सकेगा।”

यह कथन मैकॉले की भारतीय संस्कृति और धर्म के प्रति उसकी नकारात्मक सोच को स्पष्ट करता है।

बैंटिक की स्वीकृति:

लार्ड विलियम बैंटिक अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार के सबसे बड़े समर्थक थे। उन्होंने 7 मार्च 1835 ईस्वी के एक प्रस्ताव द्वारा मैकॉले के स्मरण पत्र को स्वीकार कर लिया और सरकार की शिक्षा नीति की स्पष्ट घोषणा कर दी। इससे वर्षों से चले आ रहे आंग्ल-प्राच्य विवाद का समाप्ति हो गया।

प्राच्य विद्या के दो समर्थक एच०टी० प्रिंसेप और डब्ल्यू०एच० मैकनाफटन ने अपनी पराजय के कारण त्याग-पत्र दे दिया।

मैकॉले का उद्देश्य जन साधारण को शिक्षित करना बिल्कुल नहीं था। वह अधोमुखी निस्यंदन सिद्धांत के जरिए केवल उच्च वर्ग के लोगों तक ही आधुनिक शिक्षा पहुंचाना चाहता था।

इस सिद्धांत के अनुसार, अगर आप उच्च वर्ग को शिक्षित कर दें, तो यह ज्ञान धीरे-धीरे छन-छन कर आम जनों तक पहुँच जायेगा। यह सिद्धांत प्रतियोगी परीक्षाओं में बहुत महत्वपूर्ण है।

सर ऑकलैंड ने सर्वप्रथम इस अधोमुखी निस्यंदन सिद्धांत को सरकारी नीति के रूप में लागू किया था।

अर्ल ऑफ एवरडिन की सरकार में बोर्ड ऑफ कंट्रोल के अध्यक्ष चार्ल्सवुड ने 19 जुलाई 1854 ईस्वी को भारतीय शिक्षा पर एक व्यापक योजना प्रस्तुत की। इसे ‘वुड का डिस्पैच’ या ‘चार्ल्सवुड का डिस्पैच’ कहा जाता है।

यह डिस्पैच ‘भारतीय शिक्षा का मैग्नाकार्टा’ (Magna Carta of Indian Education) के रूप में जाना जाता है। इसमें 100 अनुच्छेद थे और इसने भारत में भविष्य की शिक्षा मशीनरी की व्याख्या की।

  1. सरकार की शिक्षा नीति का उद्देश्य पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार है, अर्थात् कला, विज्ञान, दर्शन और साहित्य का प्रसार।
  2. उच्च शिक्षा के लिए सबसे उत्तम माध्यम अंग्रेजी है, लेकिन देशी भाषाओं को भी प्रोत्साहित किया जाय, क्योंकि यूरोपीय ज्ञान देशी भाषाओं द्वारा ही आम जनों तक पहुँच पायेगा।
  3. गाँवों में देशी भाषायी प्राथमिक पाठशाला स्थापित की जाय और उनसे ऊपर Anglo-Vernacular High School और संबंधित कॉलेज खोले जाय।
  4. निजी प्रयत्नों को प्रोत्साहन देने के लिए अनुदान सहायता की पद्धति चलायी गयी।
  5. व्यवसायिक शिक्षा के महत्व पर बल दिया गया – कानून, डॉक्टरी, कृषि आदि के लिए व्यावसायिक शिक्षा-संस्थाओं की स्थापना करनी चाहिये।
  6. लंदन विश्वविद्यालय की पद्धति पर कलकत्ता, बंबई और मद्रास में तीन विश्वविद्यालय स्थापित किये जाय।
  7. विश्वविद्यालयों को परीक्षाएं लेनी और उपाधियाँ देनी चाहिये।
  8. मैकॉले के अधोमुखी निस्यंदन सिद्धांत के स्थान पर विद्यार्थी विद्यालय खोले जाय, अर्थात् अपेक्षाकृत बड़े वर्ग को शिक्षा प्रदान की जाय।
  9. स्त्री-शिक्षा के लिए विशेष सुविधा और प्रोत्साहन प्रदान किया जाय।
  10. प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय पर विशेष बल दिया जाय।

चार्ल्सवुड के डिस्पैच की सभी सिफारिशें लागू कर दी गईं। पुरानी शिक्षा परिषद और लोक शिक्षा समिति के स्थान पर 1855 ईस्वी में प्रत्येक प्रांत में सामान्य शिक्षा के डायरेक्टर के अधीन एक ‘लोक शिक्षा विभाग’ स्थापित किया गया।

चार्ल्सवुड के डिस्पैच के अंतर्गत स्थापित शिक्षा व्यवस्था के मूल्यांकन के लिए डब्ल्यू०डब्ल्यू० हंटर की अध्यक्षता में 1882 ईस्वी में एक 22 सदस्यीय आयोग का गठन किया गया।

इस आयोग का कार्य विश्वविद्यालयों की समीक्षा करना नहीं था, बल्कि केवल प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की समीक्षा करना था।

  1. सरकार को प्राथमिक शिक्षा के सुधार पर विशेष ध्यान देना चाहिए, जो स्थानीय भाषा में हो।
  2. प्राथमिक शिक्षा के नियंत्रण को नवसंस्थापित जिला और नगर बोर्ड को दे दिया जाय।
  3. माध्यमिक शिक्षा के दो खंड हों – एक साहित्यिक (विश्वविद्यालय प्रवेश के लिए) और दूसरा व्यावसायिक।
  4. प्रेसिडेंसी नगरों के अतिरिक्त अन्य सभी स्थानों पर महिला शिक्षा का विकास होना चाहिए।
  5. मुसलमानों में शिक्षा के विकास पर विशेष बल दिया जाना चाहिये, लेकिन धार्मिक शिक्षा से बचा जाय।
  6. शारीरिक शिक्षा पर भी जोर देने की पहली बार संस्तुति की गई।

1882 ईस्वी के बाद एक महत्वपूर्ण विकास यह हुआ कि पंजाब विश्वविद्यालय की स्थापना हुई, जिससे कलकत्ता विश्वविद्यालय का बोझ भी कम हो गया।

लार्ड कर्जन भारतीय शिक्षा को सुधारने का इच्छुक था। उसने मैकॉले की नीति की आलोचना की और कहा कि यह देशी भाषाओं के विरुद्ध है।

इसके बाद सर टॉमस रैले की अध्यक्षता में 1901 ईस्वी में एक आयोग नियुक्त किया गया, जिसका उद्देश्य विश्वविद्यालयों की स्थिति का अनुमान लगाना था। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा इसके परिधि से बाहर थी।

इस आयोग में दो भारतीय सदस्य भी थे:

  • सैय्यद हुसैन बिलग्रामी
  • गुरदास बनर्जी

रैले कमीशन की सिफारिशों पर 1904 ईस्वी में ‘भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम’ पारित हुआ।

भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम (1904) की प्रमुख व्यवस्थाएं:

  1. विश्वविद्यालय अध्ययन तथा शोध के लिए प्रोफेसर और लेक्चरर की नियुक्ति करे, प्रयोगशालाएं और पुस्तकालय स्थापित करे।
  2. विश्वविद्यालय के उपसदस्यों की संख्या 50 से कम या 100 से अधिक न हो, और ये केवल 6 वर्ष के लिए हों।
  3. उपसदस्य मुख्य रूप से सरकार द्वारा मनोनीत हों।
  4. विश्वविद्यालयों पर सरकार का नियंत्रण बढ़ा दिया गया।
  5. अशासकीय कॉलेजों पर सरकार का नियंत्रण अधिक कड़ा बना दिया गया।
  6. गवर्नर जनरल को विश्वविद्यालयों की क्षेत्रीय सीमाएं निश्चित करने का अधिकार दे दिया गया।

लीड्स विश्वविद्यालय के उपकुलपति सैडलर की अध्यक्षता में 1917 ईस्वी में कलकत्ता विश्वविद्यालय के समस्याओं के अध्ययन के लिए एक आयोग का गठन किया गया।

इस आयोग के दो भारतीय सदस्य थे:

  • डॉ० सर आशुतोष मुखर्जी
  • डॉ० जियाउद्दीन अहमद

इस आयोग ने 1919 ईस्वी में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसने 1904 के अधिनियम की कड़ी निंदा की।

सैडलर आयोग की प्रमुख सिफारिशें:

  1. स्कूल की शिक्षा 12 वर्ष की होनी चाहिए।
  2. इंटरमीडिएट कॉलेज सरकार को बनाने चाहिए।
  3. सेकेंड्री और इंटरमीडियेट शिक्षा का नियंत्रण ‘बोर्ड ऑफ सेकेंड्री एजुकेशन’ को दिया जाय।
  4. स्नातक की उपाधि के लिए त्रिवर्षीय शिक्षा हो।
  5. कलकत्ता विश्वविद्यालय का नियंत्रण केंद्र से प्रांत सरकार को दे दिया जाय।
  6. ढाका विश्वविद्यालय स्थापित करने की बात की गई।
  7. महिला शिक्षा के लिए सुविधाओं का विस्तार होना चाहिए।
  8. हाई स्कूल शिक्षा का माध्यम प्रांतों की वर्नाक्युलर भाषा होनी चाहिये।

1920 में सरकार ने सैडलर आयोग की रिपोर्ट को सभी प्रांतीय सरकारों को सिफारिश कर दी।

1929 ईस्वी में शिक्षा के विकास पर अपनी रिपोर्ट देने के लिए हार्टोग कमेटी की स्थापना की गई थी।

हार्टोग कमेटी की प्रमुख सिफारिशें:

  1. प्राथमिक शिक्षा के राष्ट्रीय महत्व पर बल दिया गया।
  2. माध्यमिक शिक्षा में मैट्रिक परीक्षा पर ही मुख्य बल है – यह कहा गया।
  3. ग्रामीण मानसिकता के विद्यार्थियों को वर्नाक्यूलर मिडिल स्कूल तक ही रोका जाय और कॉलेज शिक्षा से बचा जाय। उन्हें व्यावसायिक तथा औद्योगिक शिक्षा दी जाय।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान, महात्मा गांधी ने भारतीय शिक्षा के विषय में अपने विचार व्यक्त किए। 22 और 23 अक्टूबर, 1937 को वर्धा में शिक्षा पर एक सम्मेलन का आयोजन गांधी जी ने किया, जिसकी अध्यक्षता उन्होंने स्वयं की।

वर्धा सम्मेलन में पारित प्रस्तावों के आधार पर एक शिक्षा योजना प्रस्तुत करने के लिए डॉ० जाकिर हुसैन के सभापतित्व में एक समिति की नियुक्ति की गई।

अप्रैल 1938 में हरिपुरा में संपन्न कांग्रेस अधिवेशन में इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया और बेसिक शिक्षा को पार्टी के कार्यक्रम में समाविष्ट कर लिया गया।

मूल शिक्षा (बेसिक एजुकेशन) की योजना:

1937 में महात्मा गांधी ने ‘हरिजन’ पत्र में एक शिक्षा योजना चालू की, जिसे बेसिक एजुकेशन या आधारभूत शिक्षा या ‘नई तालिम’ कहा गया।

बेसिक शिक्षा के मूल सिद्धांत:

  1. सार्वभौम अनिवार्य निःशुल्क शिक्षा – सात वर्ष से ऊपर के सभी बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दी जाय।
  2. मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा – गांधी जी मातृभाषा के प्रबल समर्थक थे।
  3. उद्योग-केंद्रित शिक्षा – पढ़ने-लिखने के साथ-साथ किसी उद्योग या दस्तकारी को भी सीखना चाहिए। यह ‘करके सीखने का सिद्धांत’ (Learning by Doing) था।
  4. स्वावलंबन – दस्तकारी के जरिए विद्यार्थी जो कुछ पैदा करें, उसकी कीमत से शिक्षक का खर्च निकल सके।

बेसिक शिक्षा की आलोचना:

आचार्य नरेंद्र देव जैसे व्यक्तियों ने ‘स्वावलंबन के सिद्धांत’ की कड़ी आलोचना की। उनका कहना था कि इससे बालकों का शोषण होगा।

बेसिक शिक्षा का कार्यान्वयन:

1938 में बेसिक शिक्षा की योजना को उन प्रांतों में लागू किया गया जहां कांग्रेसी मंत्रिमंडलों की स्थापना हुई थी। इस योजना को बिहार और कश्मीर में विशेष सफलता मिली।

दूसरे विश्व युद्ध के प्रारंभ और मंत्रिमंडलों के त्यागपत्र के कारण यह योजना खटाई में पड़ गई। 1947 के पश्चात् राष्ट्रीय सरकार ने इस योजना को अपने हाथों में ले लिया।

1943 में एक अन्य महत्वपूर्ण योजना सामने आई, जिसे शिक्षा की सार्जेंट योजना कहा जाता है। इसका नेतृत्व भारत सरकार के शिक्षा परामर्शदाता सर जान सार्जेंट ने किया था।

यह योजना द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद लागू किए जाने वाली थी। इस योजना में वर्धा योजना की कई बातें स्वीकार की गईं, लेकिन यह केवल प्राथमिक शिक्षा तक सीमित नहीं थी।

सार्जेंट योजना की व्यापकता:

इस योजना में प्राथमिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा, विश्वविद्यालय शिक्षा, तकनीकी शिक्षा और शारीरिक शिक्षा को भी स्थान दिया गया था।

सार्जेंट योजना की प्रमुख सिफारिशें:

  1. नर्सरी स्कूल 3 से 6 वर्षों के बच्चों के लिए खोले जाएं – महिलाओं द्वारा संचालित।
  2. 6 से 14 वर्षों के लिए शिक्षा अनिवार्य और मुफ्त होनी चाहिए – दो भागों में विभाजित:
  • जूनियर बेसिक (6-11 वर्ष)
  • सीनियर बेसिक (औसत योग्यता वाले बच्चों के लिए)
  1. 11 से 17 वर्ष के बच्चों को हाई स्कूल या सेकेंडरी स्कूल में लिया जाय।
  2. हाई स्कूल के 10 प्रतिशत सर्वश्रेष्ठ छात्र कॉलेजों में विश्वविद्यालयीय शिक्षा के लिए आएं।
  3. ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ की स्थापना की जाय।
  4. अध्यापकों के वेतन में वृद्धि की जाय।
  5. ‘राष्ट्रीय युवा आंदोलन’ चलाया जाय।
  6. इस योजना के तहत उत्तर माध्यमिक या इंटरमीडिएट श्रेणी की शिक्षा समाप्त करनी थी।
  7. मूल रूप से 40 वर्ष में, लेकिन खेर समिति ने इसे 16 वर्ष में परिवर्तित कर दिया।
  8. इस योजना ने 200 करोड़ रुपये व्यय की योजना बनाई।

सार्जेंट योजना का भाग्य:

युद्ध समाप्ति के पश्चात् भारत ने स्वाधीनता अर्जित कर ली, इसलिए इस योजना को पूरी तरह कार्य रूप में परिणत नहीं किया गया। वैसे स्वतंत्र भारत की शिक्षा योजना में इसकी तमाम बेहतर बातें सम्मिलित कर ली गईं।

भारत में आधुनिक शिक्षा का विकास एक लंबी और जटिल प्रक्रिया रही है। 1787 से शुरू होकर 1943 तक, शिक्षा नीति में कई बदलाव आए। अंग्रेजों के समय में मैकॉले की आंग्ल शिक्षा नीति प्रबल रही, लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गांधी जी ने बेसिक शिक्षा के माध्यम से एक वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण बातें:

  • चार्टर एक्ट 1813
  • आंग्ल-प्राच्य विवाद
  • मैकॉले का स्मरण पत्र (1835)
  • चार्ल्सवुड का डिस्पैच (1854)
  • विभिन्न शिक्षा आयोग और उनकी सिफारिशें
  • गांधी जी की बेसिक शिक्षा योजना
  • अधोमुखी निस्यंदन सिद्धांत

यह ज्ञान आपको भारतीय इतिहास और शिक्षा नीति से संबंधित किसी भी प्रश्न का उत्तर देने में सहायता करेगा।

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  1. Q: चार्ल्सवुड के डिस्पैच के अनुसार किन तीन विश्वविद्यालयों की स्थापना करनी थी?
    A: कलकत्ता, बंबई और मद्रास में। (UPSC Prelims, SSC)
  2. Q: वुड के डिस्पैच की सिफारिशों के अनुसार नए लोक शिक्षा विभाग की स्थापना कब हुई?
    A: 1855 ईस्वी में। (UPSC, SSC CGL)
  3. Q: हंटर शिक्षा आयोग का गठन कब किया गया?
    A: 1882 ईस्वी में। (SSC, Railway, UPSC)
  4. Q: हंटर आयोग में कितने सदस्य थे?
    A: 22 सदस्य। (UPSC Prelims, SSC CGL)
  5. Q: हंटर आयोग की समीक्षा किन विषयों तक सीमित थी?
    A: प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा तक। (UPSC, SSC)
  6. Q: पंजाब विश्वविद्यालय की स्थापना कब हुई?
    A: 1882 ईस्वी में। (UPSC Prelims, SSC)
  7. Q: रैले कमीशन का गठन कब किया गया?
    A: 1901 ईस्वी में। (UPSC, SSC CGL)
  8. Q: रैले कमीशन के अध्यक्ष कौन थे?
    A: सर टॉमस रैले। (SSC, Railway, UPSC)
  9. Q: रैले कमीशन के दो भारतीय सदस्य कौन थे?
    A: सैय्यद हुसैन बिलग्रामी और गुरदास बनर्जी। (UPSC Prelims)
  10. Q: रैले कमीशन की सिफारिशों पर कौन सा अधिनियम पारित हुआ?
    A: भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम 1904। (UPSC, SSC)
  11. Q: सैडलर विश्वविद्यालय आयोग का गठन कब किया गया?
    A: 1917 ईस्वी में। (UPSC Prelims, SSC CGL)
  12. Q: सैडलर आयोग के अध्यक्ष कौन थे?
    A: लीड्स विश्वविद्यालय के उपकुलपति सैडलर। (UPSC, SSC)
  13. Q: सैडलर आयोग ने अपनी रिपोर्ट कब प्रस्तुत की?
    A: 1919 ईस्वी में। (SSC, Railway, UPSC)
  14. Q: सैडलर आयोग के दो भारतीय सदस्य कौन थे?
    A: डॉ० सर आशुतोष मुखर्जी और डॉ० जियाउद्दीन अहमद। (UPSC Prelims)
  15. Q: हार्टोग कमेटी का गठन कब किया गया?
    A: 1929 ईस्वी में। (UPSC, SSC CGL)
  16. Q: वर्धा सम्मेलन कब आयोजित किया गया?
    A: 22-23 अक्टूबर 1937 को। (UPSC Prelims, SSC)
  17. Q: वर्धा सम्मेलन की अध्यक्षता किसने की?
    A: महात्मा गांधी ने। (UPSC, SSC CGL)
  18. Q: बेसिक शिक्षा योजना को तैयार करने के लिए समिति के अध्यक्ष कौन थे?
    A: डॉ० जाकिर हुसैन। (UPSC Prelims, SSC)
  19. Q: बेसिक एजुकेशन को किस अन्य नाम से जाना जाता है?
    A: आधारभूत शिक्षा, नई तालिम, बुनियादी शिक्षा। (SSC, Railway, UPSC)
  20. Q: बेसिक शिक्षा का मुख्य सिद्धांत क्या था?
    A: सार्वभौम अनिवार्य निःशुल्क शिक्षा, मातृभाषा के माध्यम से, उद्योग-केंद्रित शिक्षा। (UPSC, SSC CGL)
  21. Q: बेसिक शिक्षा का “करके सीखने का सिद्धांत” किस भाषा में कहा जाता है?
    A: “Learning by Doing”। (UPSC Prelims, SSC)
  22. Q: बेसिक शिक्षा के किस सिद्धांत की सबसे अधिक आलोचना हुई?
    A: स्वावलंबन के सिद्धांत की। (SSC, Railway, UPSC)
  23. Q: बेसिक शिक्षा के स्वावलंबन सिद्धांत की आलोचना किसने की?
    A: आचार्य नरेंद्र देव ने। (UPSC Prelims, SSC CGL)
  24. Q: बेसिक शिक्षा योजना को कब लागू किया गया?
    A: 1938 ईस्वी में (हरिपुरा अधिवेशन के बाद)। (UPSC, SSC)
  25. Q: किन प्रांतों में बेसिक शिक्षा को विशेष सफलता मिली?
    A: बिहार और कश्मीर में। (SSC, Railway, UPSC)
  26. Q: शिक्षा की सार्जेंट योजना का नेतृत्व किसने किया?
    A: सर जान सार्जेंट ने। (UPSC Prelims, SSC CGL)
  27. Q: सार्जेंट योजना कब प्रस्तुत की गई?
    A: 1943 ईस्वी में। (UPSC, SSC)
  28. Q: सार्जेंट योजना में कितने करोड़ रुपये व्यय की योजना बनाई गई?
    A: 200 करोड़ रुपये। (SSC, Railway, UPSC)
  29. Q: सार्जेंट योजना में ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ स्थापित करने की सिफारिश कब की गई?
    A: 1943 में (योजना प्रस्तुति के समय)। (UPSC Prelims, SSC)
  30. Q: स्वतंत्र भारत ने सार्जेंट योजना को कार्य रूप में क्यों नहीं दिया?
    A: क्योंकि भारत ने स्वाधीनता प्राप्त कर ली, इसलिए अपनी खुद की शिक्षा योजना बनाई। (UPSC, SSC CGL)

उत्तर: आंग्ल-प्राच्य विवाद 1813 के चार्टर एक्ट के बाद उत्पन्न हुआ था। इसमें दो पक्ष थे – एक पक्ष संस्कृत और अरबी भाषा में शिक्षा का समर्थन करता था (प्राच्य विद्या समर्थक), जबकि दूसरा पक्ष अंग्रेजी माध्यम से पाश्चात्य शिक्षा का समर्थन करता था। यह विवाद भारतीय शिक्षा नीति के निर्धारण में बहुत महत्वपूर्ण था। अंतिम विजय आंग्लवादियों की हुई, जिससे अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली भारत में प्रबल बनी।

उत्तर: मैकॉले का मुख्य लक्ष्य भारत में अंग्रेजी भाषा और पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार करना था। वह “भूरे रंग के अंग्रेज़” (brown Englishman) तैयार करना चाहता था – ऐसे भारतीय जो रक्त और रंग से भारतीय हों, लेकिन सोच-विचार से पूरी तरह अंग्रेज़। उसका मानना था कि इससे सरकार के लिए सस्ते लिपिक मिलेंगे और अंग्रेजी वस्तुओं की मांग बढ़ेगी। वह जन साधारण को शिक्षित नहीं करना चाहता था, बल्कि अधोमुखी निस्यंदन सिद्धांत के माध्यम से केवल उच्च वर्ग तक ही शिक्षा पहुंचाना चाहता था।

उत्तर: अधोमुखी निस्यंदन सिद्धांत (Downward Filtration Theory) मैकॉले द्वारा प्रतिपादित एक शिक्षा सिद्धांत था। इसके अनुसार, यदि आप उच्च वर्ग को शिक्षित कर दें, तो यह ज्ञान धीरे-धीरे छन-छन कर आम जनों तक पहुंच जायेगा। इस सिद्धांत का परिणाम यह हुआ कि भारत में एक विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग तो शिक्षित हुआ, लेकिन आम जनता शिक्षा से वंचित रही। चार्ल्सवुड के डिस्पैच में इस सिद्धांत की जगह व्यापक शिक्षा प्रणाली को अपनाया गया।

उत्तर: चार्ल्सवुड का डिस्पैच (1854) को “भारतीय शिक्षा का मैग्नाकार्टा” कहा जाता है क्योंकि इसने भारत की भविष्य की शिक्षा प्रणाली की नींव तैयार की। इस डिस्पैच में 100 अनुच्छेद थे और इसमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण सिफारिशें थीं:

  • कला, विज्ञान, दर्शन और साहित्य का प्रसार
  • अंग्रेजी को उच्च शिक्षा का माध्यम
  • देशी भाषाओं का प्रोत्साहन
  • व्यवसायिक शिक्षा पर बल
  • तीन विश्वविद्यालयों की स्थापना
  • महिला शिक्षा का प्रोत्साहन
  • प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा पर बल

उत्तर: राजा राममोहन राय भारत के प्रगतिशील विचारक थे जिन्होंने कलकत्ता मदरसा और बनारस संस्कृत कॉलेज की आलोचना की क्योंकि वे मानते थे कि ये संस्थाएं व्यावहारिक ज्ञान नहीं देती हैं। वे गणित, विज्ञान, रसायनशास्त्र और शरीर रचना जैसे विषयों पर जोर देते थे। उन्होंने 1817 में डेविड हेयर के साथ हिंदू कॉलेज की स्थापना में सहायता की, जहां अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दी जाती थी। वे आंग्ल शिक्षा के समर्थक थे और अंग्रेजी पढ़ाई के लिए एक शक्तिशाली आवाज़ थे।

उत्तर: विभिन्न शिक्षा आयोगों ने भारतीय शिक्षा में अलग-अलग योगदान दिए:

हंटर आयोग (1882): प्राथमिक शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया, महिला शिक्षा का प्रचार किया।

रैले कमीशन (1901): विश्वविद्यालयों की समीक्षा की, सरकार के नियंत्रण को बढ़ाया।

सैडलर आयोग (1917): 12 वर्षीय स्कूल शिक्षा, इंटरमीडिएट कॉलेज, त्रिवर्षीय स्नातक शिक्षा की सिफारिश की।

हार्टोग कमेटी (1929): प्राथमिक शिक्षा को महत्व दिया।

सार्जेंट योजना (1943): प्राथमिक से विश्वविद्यालय शिक्षा तक सभी स्तरों को कवर किया।

उत्तर: महात्मा गांधी ने 1937 में वर्धा सम्मेलन में बेसिक एजुकेशन या “नई तालिम” की योजना प्रस्तुत की। इसके मुख्य सिद्धांत थे:

  1. सार्वभौम अनिवार्य निःशुल्क शिक्षा – सभी 7+ वर्षीय बच्चों के लिए
  2. मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा
  3. उद्योग-केंद्रित शिक्षा – “करके सीखने” (Learning by Doing) का सिद्धांत
  4. स्वावलंबन – दस्तकारी की कीमत से शिक्षक का खर्च निकालना

यह योजना ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली के विपरीत भारतीय परंपरा और संस्कृति को जोड़ने का प्रयास था।

उत्तर: बेसिक शिक्षा की मुख्य आलोचना इसके “स्वावलंबन के सिद्धांत” को लेकर हुई। आचार्य नरेंद्र देव जैसे प्रमुख विचारकों का कहना था कि यह सिद्धांत बालकों के शोषण का कारण बनेगा। उनका मानना था कि बच्चों से काम कराकर खर्च निकालने से शिक्षा का उद्देश्य विचलित हो जाएगा। इसके अलावा, दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत और मंत्रिमंडलों के त्यागपत्र के कारण इस योजना को व्यावहारिक रूप से पूरी तरह लागू नहीं किया जा सका।

उत्तर: लार्ड विलियम बैंटिक (1828-35) मैकॉले के विचारों के समर्थक थे। उन्होंने मैकॉले के प्रसिद्ध स्मरण पत्र (2 फरवरी 1835) को 7 मार्च 1835 के एक प्रस्ताव से स्वीकार कर लिया। इस निर्णय ने आंग्ल-प्राच्य विवाद को समाप्त कर दिया और अंग्रेजी शिक्षा को भारतीय शिक्षा प्रणाली में प्रबल कर दिया। हालांकि, बैंटिक ने प्राच्य विद्या की संस्थाओं को पूरी तरह बंद नहीं किया, बल्कि सरकारी सहायता कम कर दी। प्राच्य विद्या के समर्थकों एच०टी० प्रिंसेप और डब्ल्यू०एच० मैकनाफटन ने अपनी पराजय के कारण त्यागपत्र दे दिया।

उत्तर: 1904 का भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम रैले कमीशन की सिफारिशों पर आधारित था। इसकी प्रमुख व्यवस्थाएं थीं:

  1. विश्वविद्यालयों को प्रोफेसर, लेक्चरर नियुक्त करने, प्रयोगशालाएं स्थापित करने का अधिकार
  2. विश्वविद्यालय के उपसदस्यों की संख्या 50 से कम और 100 से अधिक न हो
  3. उपसदस्य 6 वर्ष के लिए होंगे
  4. विश्वविद्यालयों पर सरकार का नियंत्रण बढ़ाया गया
  5. सरकार को सीनेट के प्रस्तावों पर वीटो अधिकार दिया गया
  6. अशासकीय कॉलेजों पर सरकार का नियंत्रण कड़ा बनाया गया
  7. गवर्नर जनरल को क्षेत्रीय सीमाएं निश्चित करने का अधिकार

उत्तर: सैडलर विश्वविद्यालय आयोग की प्रमुख सिफारिशें थीं:

  1. स्कूल की शिक्षा 12 वर्षीय होनी चाहिए
  2. इंटरमीडिएट कॉलेज सरकार को बनाने चाहिए
  3. माध्यमिक और इंटरमीडियेट शिक्षा पर विश्वविद्यालय के बजाय “बोर्ड ऑफ सेकेंड्री एजुकेशन” का नियंत्रण हो
  4. स्नातक की उपाधि के लिए त्रिवर्षीय शिक्षा हो
  5. कलकत्ता विश्वविद्यालय पर केंद्र के बजाय प्रांत सरकार का नियंत्रण
  6. ढाका विश्वविद्यालय की स्थापना
  7. महिला शिक्षा के लिए विशेष बोर्ड
  8. हाई स्कूल शिक्षा का माध्यम प्रांतीय भाषा हो

उत्तर: प्राथमिक शिक्षा के विकास के लिए मुख्य आयोग थे:

हंटर आयोग (1882): प्राथमिक शिक्षा को गंभीर दृष्टि से लिया गया और कहा गया कि सरकार को इसमें विशेष ध्यान देना चाहिए।

हार्टोग कमेटी (1929): प्राथमिक शिक्षा के राष्ट्रीय महत्व पर बल दिया।

वर्धा सम्मेलन (1937): बेसिक शिक्षा माध्यम से सार्वभौम अनिवार्य निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा।

सार्जेंट योजना (1943): 6-14 वर्ष के लिए अनिवार्य मुफ्त शिक्षा, जिसे दो भागों में विभाजित किया – जूनियर बेसिक (6-11) और सीनियर बेसिक।

उत्तर: महिला शिक्षा के विकास में निम्नलिखित आयोगों की महत्वपूर्ण भूमिका रही:

चार्ल्सवुड का डिस्पैच (1854): स्त्री-शिक्षा के लिए विशेष सुविधा और प्रोत्साहन देने की सिफारिश।

हंटर आयोग (1882): प्रेसिडेंसी नगरों के अतिरिक्त अन्य स्थानों पर महिला शिक्षा का विकास होना चाहिए – यह सिफारिश दी।

सैडलर आयोग (1917): महिला शिक्षा के लिए सुविधाओं का विस्तार होना चाहिए और कलकत्ता विश्वविद्यालय महिलाओं की शिक्षा के लिए विशेष बोर्ड बनना चाहिए।

सार्जेंट योजना (1943): नर्सरी स्कूल को महिलाओं द्वारा चलाने का सुझाव और सभी स्तरों पर महिला शिक्षा को प्रोत्साहित करना।

उत्तर: व्यावसायिक और तकनीकी शिक्षा पर ध्यान देने की शुरुआत चार्ल्सवुड के डिस्पैच (1854) से हुई। इसमें कानून, चिकित्सा, कृषि जैसे विषयों के लिए व्यावसायिक शिक्षा-संस्थाओं की स्थापना की सिफारिश की गई थी।

सार्जेंट योजना (1943) में इस पहलू को और विस्तारित किया गया। इस योजना में विशेष कौशल प्रशिक्षण, औद्योगिक प्रशिक्षण, और तकनीकी शिक्षा पर जोर दिया गया। योजना के अनुसार उत्तर माध्यमिक या इंटरमीडिएट श्रेणी की शिक्षा के साथ-साथ व्यावहारिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी में पाठ्यक्रमों का प्रबंध किया जाना था।

उत्तर: स्वतंत्र भारत की शिक्षा नीति पर ब्रिटिश काल के आयोगों का गहरा प्रभाव पड़ा:

  1. शिक्षा संरचना: तीन-स्तरीय शिक्षा प्रणाली (प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च) का आधार चार्ल्सवुड और सैडलर आयोग से मिला।
  2. विश्वविद्यालय प्रणाली: तीन विश्वविद्यालयों की संरचना और परीक्षा प्रणाली वही रहीं।
  3. बेसिक शिक्षा: स्वतंत्रता के बाद भी गांधी जी की नई तालिम पर ध्यान दिया गया।
  4. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग: सार्जेंट योजना की सिफारिश से 1956 में यूजीसी की स्थापना हुई।
  5. व्यावसायिक शिक्षा: तकनीकी संस्थानों की स्थापना पर बल दिया गया।
  6. महिला और अल्पसंख्यक शिक्षा: इन पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया गया।

आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणाली इन ऐतिहासिक आयोगों और योजनाओं का ही परिणाम है।

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