मानव प्रतिरक्षा एवं रोग: संपूर्ण अध्ययन सामग्री

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हम अपने दैनिक जीवन में जब भी बाहर निकलते हैं, किसी दरवाजे की कुंडी छूते हैं, खाना खाते हैं, या सांस लेते हैं, तो हम अनगिनत सूक्ष्मजीवों के संपर्क में आते हैं। इनमें से अधिकांश हमें बीमार करने की क्षमता रखते हैं, फिर भी हम हर रोज स्वस्थ रहते हैं। इसके पीछे हमारे शरीर की एक अद्भुत रक्षा प्रणाली काम करती है जिसे प्रतिरक्षा तंत्र (Immune System) कहते हैं। मानव शरीर प्रतिदिन अनगिनत रोगजनक सूक्ष्मजीवों, विषाणुओं (Viruses), जीवाणुओं (Bacteria), कवकों (Fungi) और परजीवी जंतुओं के संपर्क में आता है। इसके अतिरिक्त, वातावरण से विभिन्न विषैले रासायनिक पदार्थ भी शरीर में प्रवेश करते रहते हैं। इन सभी बाहरी आक्रमणों से शरीर की रक्षा करने की क्षमता को प्रतिरक्षा (Immunity) कहते हैं। यह एक अत्यंत जटिल, सुव्यवस्थित और बहुस्तरीय तंत्र है जो शरीर में होमियोस्टैसिस अर्थात समस्थैतिकता बनाए रखता है। सरल शब्दों में, यह वह सैन्य व्यवस्था है जो शरीर रूपी देश की सुरक्षा करती है, जिसमें अलग-अलग सैनिक अलग-अलग काम करते हैं।

प्रतिरक्षा तंत्र को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि वह किसके विरुद्ध लड़ता है। शरीर के लिए हानिकारक या बाहरी पदार्थों को प्रतिजन (Antigens) कहते हैं। जैसे किसी देश में घुसपैठिए की पहचान उसके पहनावे या भाषा से होती है, उसी प्रकार शरीर प्रतिजनों को उनकी अणुसंरचना से पहचानता है। सामान्यतः वे सभी प्रोटीन्स जो शरीर की अपनी प्रोटीन्स से भिन्न होती हैं, प्रतिजन का कार्य कर सकती हैं। यह समझना जरूरी है कि प्रतिजन केवल जीवाणु या विषाणु ही नहीं होते। जब किसी व्यक्ति को परागकण (पराग एलर्जी) से छींक आती है, तो वह परागकण भी एक प्रतिजन है। जब कोई व्यक्ति किडनी प्रत्यारोपण कराता है तो दूसरे व्यक्ति की किडनी भी शरीर के लिए प्रतिजन बन जाती है क्योंकि वह बाहरी है। प्रतिजन मुख्यतः प्रोटीन्स या कार्बोहाइड्रेट के बड़े अणु होते हैं। इनका सबसे महत्वपूर्ण गुण यह है कि ये शरीर में प्रतिरक्षी (Antibodies) के निर्माण को प्रेरित करते हैं। प्रतिजन और प्रतिरक्षी का संबंध ठीक वैसा है जैसे ताला और चाबी का — हर प्रतिजन के लिए एक विशेष प्रतिरक्षी बनती है।

मानव शरीर में प्रतिरक्षा मुख्यतः दो स्तरों पर काम करती है। पहली है स्वाभाविक या जन्मजात प्रतिरक्षा, और दूसरी है विशिष्ट या उपार्जित प्रतिरक्षा। इन दोनों को समझना बहुत आवश्यक है क्योंकि ये मिलकर एक पूर्ण सुरक्षा कवच बनाते हैं।

स्वाभाविक प्रतिरक्षा वह प्रणाली है जो हम सभी के साथ जन्म से ही मौजूद होती है। यह किसी विशेष रोगाणु को पहचानकर नहीं लड़ती बल्कि सभी बाहरी हमलावरों के विरुद्ध एक सामान्य रक्षा प्रदान करती है। इसीलिए इसे अविशिष्ट (Non-specific) प्रतिरक्षा भी कहते हैं। यह संक्रमण के विरुद्ध पहली रक्षा पंक्ति है, जैसे किले की पहली दीवार।

भौतिक अवरोध — शरीर की प्राकृतिक दीवारें

इस प्रतिरक्षा का सबसे पहला और स्पष्ट उदाहरण हमारी त्वचा है। त्वचा न केवल एक आवरण है बल्कि यह एक जीवित रक्षा प्रणाली है। जब तक त्वचा अखंडित रहती है, बाहरी रोगाणु शरीर में प्रवेश नहीं कर सकते। यही कारण है कि जब हमें चोट लगती है और त्वचा कटती है, तो संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। रसोई में काम करते समय हाथ कट जाए और यदि उसे तुरंत साफ न किया जाए तो संक्रमण हो सकता है — यही स्वाभाविक प्रतिरक्षा के टूटने का उदाहरण है।

त्वचा की स्वेद ग्रंथियां (पसीना बनाने वाली ग्रंथियां) त्वचा की सतह को अम्लीय बनाती हैं, जिसका pH मान 3.0 से 5.0 के बीच रहता है। इस अम्लीय वातावरण में अधिकांश सूक्ष्मजीव जीवित नहीं रह सकते। यही कारण है कि स्वस्थ त्वचा पर होने वाले अधिकांश जीवाणु अपने आप नष्ट हो जाते हैं। इसी तरह नाक के अंदर के बाल और श्लेष्मा (Mucus) एक छन्ने की तरह काम करते हैं। जब हम सांस लेते हैं तो हवा के साथ धूल, परागकण और जीवाणु आते हैं। नाक के बाल इन्हें रोक लेते हैं। अगर आप कभी भी धूल भरी जगह में काम करने के बाद नाक साफ करें तो आप देखेंगे कि कितनी गंदगी बाहर आती है — यह वही सुरक्षा तंत्र काम कर रहा होता है।

रासायनिक सुरक्षा — शरीर के प्राकृतिक कीटाणुनाशक

शरीर की रासायनिक सुरक्षा में सबसे महत्वपूर्ण पदार्थ लाइसोजाइम (Lysozyme) एंजाइम है। यह एंजाइम पसीने, आंसू, लार और नाक के स्राव में पाया जाता है। इसका काम जीवाणुओं की कोशिका भित्ति (Cell Wall) को तोड़कर उन्हें नष्ट करना है। जब आप रोते हैं तो आंसुओं में मौजूद लाइसोजाइम आंखों को संक्रमण से बचाता है। जब आप किसी चीज को चाटते हैं तो लार में मौजूद लाइसोजाइम काम करता है। यहां तक कि माताएं जब अपने छोटे बच्चों के घाव को चाटती थीं (पुराने समय में), तो वास्तव में लार का लाइसोजाइम उस घाव को कीटाणुमुक्त करने में कुछ हद तक सहायक था। इसके अलावा पेट में मौजूद HCl (हाइड्रोक्लोरिक एसिड) भोजन के साथ आने वाले अनेक रोगाणुओं को नष्ट कर देता है। यही कारण है कि पेट का अम्लीय वातावरण हमें खाने से होने वाले अनेक संक्रमणों से बचाता है।

प्रदाह या शोथ (Inflammation) — शरीर का अलार्म सिस्टम

जन्मजात प्रतिरक्षा का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा है प्रदाह प्रतिक्रिया। जब भी शरीर में कहीं चोट लगती है या संक्रमण होता है, तो शरीर एक विशेष प्रतिक्रिया प्रदर्शित करता है जिसे हम प्रदाह या शोथ कहते हैं। इसके पांच मुख्य लक्षण होते हैं — ऊष्मा (प्रभावित जगह गर्म हो जाती है), लालपन (खून की नलियां फैल जाती हैं जिससे जगह लाल दिखती है), सूजन (ऊतकों में तरल पदार्थ भर जाता है), दर्द (तंत्रिका अंत प्रभावित होते हैं) और भक्षी कोशिकाओं का आगमन।

आपने कभी ध्यान दिया होगा कि जब हाथ में कांटा चुभता है तो वह जगह लाल, गर्म और सूजी हुई हो जाती है और दर्द करती है। यह कोई समस्या नहीं बल्कि शरीर की रक्षा प्रणाली का काम करने का संकेत है। इस प्रक्रिया में हिस्टामीन (Histamine) नामक रासायनिक पदार्थ बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह हिस्टामीन मास्ट कोशिकाओं में संचित रहता है और चोट या संक्रमण के समय बाहर आता है। यह रक्त वाहिनियों को फैला देता है और उनकी पारगम्यता (Permeability) बढ़ा देता है, जिससे भक्षण करने वाली कोशिकाएं (Phagocytes) उस स्थान पर पहुंच सकती हैं और हमलावर सूक्ष्मजीवों को नष्ट कर सकती हैं। जब भक्षण कोशिकाएं और मृत जीवाणु आपस में मिलकर एकत्र हो जाते हैं तो मवाद (Pus) बनता है जो आपने अक्सर संक्रमित घावों में देखा होगा।

प्रदाह की इस प्रक्रिया में पायरोजेन्स (Pyrogens) भी निकलते हैं जो शरीर का तापमान बढ़ाते हैं। बुखार आना दरअसल शरीर की रक्षा प्रतिक्रिया है क्योंकि अधिकांश जीवाणु और विषाणु अधिक तापमान पर जीवित नहीं रह सकते। इसीलिए डॉक्टर अक्सर हल्के बुखार में तुरंत बुखार कम करने की दवा नहीं देते।

यकृत (Liver) में मौजूद कुप्फर कोशिकाएं (Kupffer Cells) भी फैगोसाइटोसिस (भक्षण प्रक्रिया) से संबंधित महत्वपूर्ण कोशिकाएं हैं। ये यकृत में आने वाले रक्त से हानिकारक पदार्थों और पुरानी कोशिकाओं को हटाती हैं। प्रतिरक्षा के इस कोशिकावाद सिद्धांत को सबसे पहले रूसी वैज्ञानिक एलि मेशिनकॉफ (Elie Metchnikoff) ने 1884 में प्रतिपादित किया था।

यदि जन्मजात प्रतिरक्षा पहली रक्षा पंक्ति है तो विशिष्ट प्रतिरक्षा एक प्रशिक्षित विशेष बल की तरह है जो प्रत्येक शत्रु को उसके चेहरे से पहचानती है। इसे अनुकूली प्रतिरक्षा (Adaptive Immunity) भी कहते हैं। यह प्रतिरक्षा प्रत्येक प्रकार के रोगाणु या प्रतिजन की पृथक पहचान करती है और उसके विनाश की प्रक्रिया शुरू करती है।

विशिष्ट प्रतिरक्षा की सबसे अद्भुत विशेषता इसकी स्मृति क्षमता है। जब पहली बार कोई रोगाणु शरीर में प्रवेश करता है तो शरीर उससे लड़ता है और इस प्रक्रिया में स्मृति कोशिकाएं (Memory Cells) बन जाती हैं। ये स्मृति कोशिकाएं प्लीहा और लिम्फ गांठों में वर्षों तक, कभी-कभी जीवनभर संचित रहती हैं। अगली बार जब वही रोगाणु आता है तो शरीर उसे तुरंत पहचान लेता है और बहुत तेज और प्रभावी प्रतिक्रिया करता है। यही कारण है कि चेचक, खसरा जैसे रोग एक बार होने के बाद आमतौर पर दोबारा नहीं होते। बचपन में एक बार चिकन पॉक्स (छोटी माता) होने के बाद अधिकांश लोगों को यह रोग दोबारा नहीं होता — यह विशिष्ट प्रतिरक्षा की स्मृति का ही परिणाम है।

विशिष्ट प्रतिरक्षा की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता है इसकी विशिष्टता। प्रत्येक प्रकार के प्रतिजन के लिए अलग-अलग विशिष्ट प्रतिरक्षी (Antibodies) बनते हैं। इसके साथ ही यह तंत्र अपनी और बाहरी कोशिकाओं में भेद भी करता है — यानी यह जानता है कि कौन सी कोशिकाएं शरीर की हैं और कौन सी बाहरी आक्रमणकारी।

प्रतिरक्षा तंत्र को समझने के लिए दो ऐतिहासिक सिद्धांत बहुत महत्वपूर्ण हैं। पहला कोशिकावाद सिद्धांत (Cellular Theory) है जिसे 1884 में मेशिनकॉफ ने प्रतिपादित किया। इसके अनुसार भक्षण कोशिकाएं (Phagocytes) संक्रमणकारी कोशिकाओं को निगलकर नष्ट करती हैं। दूसरा है ह्यूमोरलवाद (Humoral Theory) जिसे 1890 में बेहरिंग और कितासातो ने प्रस्तुत किया। इनके अनुसार रक्त सीरम में ऐसे पदार्थ पाए जाते हैं जो विषाक्त पदार्थों को निष्क्रिय करते हैं, इन्हें ऐंटीटॉक्सिन या प्रतिरक्षी (Antibodies) कहते हैं। आज हम जानते हैं कि दोनों सिद्धांत सही हैं और दोनों प्रकार की विधियां शरीर में एक साथ काम करती हैं। इसी आधार पर विशिष्ट प्रतिरक्षा दो प्रकार में विभाजित होती है — ह्यूमोरल प्रतिरक्षा और कोशिका-मध्यस्थ प्रतिरक्षा।

ह्यूमोरल प्रतिरक्षा तंत्र (Humoral Immune Response – HIR) में B-कोशिकाएं एंटीबॉडीज बनाती हैं जो रक्त और लसिका में घुलकर शत्रुओं से लड़ती हैं। कोशिका मध्यस्थ प्रतिरक्षा तंत्र (Cell-Mediated Immune Response – CMI) में T-कोशिकाएं संक्रमित कोशिकाओं को सीधे मारती हैं। अंग प्रत्यारोपण में अस्वीकृति (Rejection) इसी कोशिका-मध्यस्थ प्रतिरक्षा के कारण होती है।

प्रतिरक्षा तंत्र की सेना में अनेक प्रकार के सैनिक होते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण हैं श्वेत रक्त कोशिकाएं (White Blood Cells / WBC) जो कई प्रकार की होती हैं।

लिम्फोसाइट्स — प्रतिरक्षा की विशेष टुकड़ी

लिम्फोसाइट्स प्रतिरक्षा प्रणाली की मुख्य और सबसे महत्वपूर्ण कोशिकाएं हैं। ये तीन प्रकार की होती हैं — B-कोशिकाएं, T-कोशिकाएं और नेचुरल किलर सेल्स।

B-कोशिकाओं का उत्पादन और परिपक्वन दोनों लाल अस्थि मज्जा (Red Bone Marrow) में होता है। B का मतलब Bone Marrow से है। ये कोशिकाएं एंटीबॉडीज बनाने की विशेषज्ञ होती हैं। जब कोई प्रतिजन शरीर में आता है तो संबंधित B-कोशिका सक्रिय होकर प्लाज्मा कोशिकाओं (Plasma Cells) में बदल जाती है। ये प्लाज्मा कोशिकाएं एंटीबॉडी बनाने की फैक्ट्री की तरह होती हैं और प्रति सेकंड 2000 एंटीबॉडी अणु बनाती हैं। इसके साथ ही कुछ B-कोशिकाएं स्मृति B-कोशिकाओं (Memory B Cells) में बदल जाती हैं जो वर्षों तक जीवित रहकर भविष्य के आक्रमण का मुकाबला करने के लिए तैयार रहती हैं।

T-कोशिकाएं लाल अस्थि मज्जा में बनती हैं लेकिन इनका परिपक्वन थाइमस ग्रंथि में होता है — इसीलिए इन्हें T-कोशिकाएं (T का मतलब Thymus) कहते हैं। T-कोशिकाएं चार प्रमुख प्रकार की होती हैं। हेल्पर T-कोशिकाएं (Helper T-Cells) B-कोशिकाओं को सक्रिय करने और अन्य प्रतिरक्षी कोशिकाओं को उत्तेजित करने में मदद करती हैं — ये प्रतिरक्षा तंत्र के सेनापति की तरह हैं। साइटोटॉक्सिक या मारक T-कोशिकाएं (Killer T-Cells) सीधे संक्रमित कोशिकाओं और कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करती हैं। सप्रेसर T-कोशिकाएं प्रतिरक्षी प्रतिक्रिया को नियंत्रित करती हैं ताकि शरीर अपनी ही कोशिकाओं पर हमला न करे। रेगुलेटरी T-कोशिकाएं पूरे प्रतिरक्षा तंत्र को संतुलित रखती हैं और ऑटोइम्यून रोगों से बचाती हैं।

AIDS जैसे भयावह रोग में HIV वायरस इन्हीं हेल्पर T-कोशिकाओं को नष्ट कर देता है, जिसके कारण पूरी प्रतिरक्षा प्रणाली चरमरा जाती है और मामूली संक्रमण भी जानलेवा हो जाते हैं।

नेचुरल किलर सेल्स (NK Cells) स्वाभाविक प्रतिरक्षा का हिस्सा हैं और बोन मैरो में परिपक्व होती हैं। ये विषाणु-संक्रमित कोशिकाओं और कैंसर कोशिकाओं को बिना किसी एंटीबॉडी की आवश्यकता के पहचानकर नष्ट करती हैं। ये तुरंत एक्शन लेने वाले दस्ते की तरह हैं।

फैगोसाइट्स — शरीर के कचरा संग्रहकर्ता और सुरक्षाकर्मी

फैगोसाइट्स वे कोशिकाएं हैं जो हमलावर जीवाणुओं और मृत कोशिकाओं को निगलकर नष्ट करती हैं। न्यूट्रोफिल्स (Neutrophils) सबसे अधिक संख्या में पाए जाने वाले WBC हैं और संक्रमण स्थल पर सबसे पहले पहुंचते हैं। मैक्रोफेज (Macrophages) बड़ी भक्षी कोशिकाएं हैं जो मृत कोशिकाओं और मलबे को साफ करती हैं और साथ ही एंटीजन को T-कोशिकाओं तक पहुंचाती हैं — ये एंटीजन प्रस्तुतीकरण (Antigen Presentation) करती हैं। मैक्रोफेज को हिस्टिओसाइट्स भी कहते हैं।

डेंड्रिटिक कोशिकाएं और मास्ट कोशिकाएं

डेंड्रिटिक कोशिकाएं (Dendritic Cells) शरीर के प्रहरी की तरह हैं। ये रोगाणुओं के संपर्क वाले ऊतकों में रहती हैं और एंटीजन को T-कोशिकाओं तक पहुंचाकर प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया शुरू करती हैं। मास्ट कोशिकाएं (Mast Cells) हिस्टामीन का भंडारण करती हैं और चोट या एलर्जी के समय इसे बाहर छोड़ती हैं। यही हिस्टामीन एलर्जी के लक्षणों जैसे खुजली, सूजन, छींक आदि के लिए जिम्मेदार होता है। एंटीहिस्टामीन दवाएं जो हम एलर्जी में लेते हैं, वे इसी हिस्टामीन के प्रभाव को रोकती हैं।

प्रतिरक्षी (Antibodies) Y-आकार के प्रोटीन अणु होते हैं जो B-कोशिकाओं से बनी प्लाज्मा कोशिकाओं द्वारा बनाए जाते हैं। इनकी संरचना में दो भारी श्रृंखलाएं और दो हल्की श्रृंखलाएं होती हैं। हर एंटीबॉडी के ऊपरी सिरों पर एंटीजन-बंधन स्थल (Antigen-binding sites) होते हैं जो ताले की चाबी की तरह केवल अपने विशेष एंटीजन से ही जुड़ते हैं।

एंटीबॉडीज पांच प्रकार की होती हैं। IgG सबसे अधिक मात्रा में पाया जाता है और दीर्घकालिक प्रतिरक्षा प्रदान करता है। यह प्लेसेंटा पार करके मां से गर्भस्थ शिशु को भी सुरक्षा दे सकता है। यही कारण है कि नवजात शिशुओं में कुछ महीनों तक मां की प्रतिरक्षा काम करती है। IgM पहली बार संक्रमण होने पर सबसे पहले बनने वाला एंटीबॉडी है और सबसे बड़ा एंटीबॉडी अणु है। IgA विशेष रूप से शरीर के स्रावों जैसे लार, आंसू और मां के दूध में पाया जाता है और श्लेष्मा सतहों की सुरक्षा करता है। यही कारण है कि स्तनपान करने वाले शिशुओं में रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है — मां के दूध में मौजूद IgA उनकी आंतों की रक्षा करता है। IgE एलर्जी प्रतिक्रियाओं और परजीवी संक्रमणों से सुरक्षा में भूमिका निभाता है। IgD B-कोशिकाओं की सतह पर रिसेप्टर के रूप में काम करता है।

एंटीबॉडीज के कार्य बहुत विविध हैं — ये प्रतिजनों को निष्क्रिय करते हैं, जीवाणुओं और विषाणुओं को नष्ट करते हैं, विषाक्त पदार्थों (Toxins) को बेअसर करते हैं और कॉम्प्लीमेंट प्रणाली (Complement System) को सक्रिय करते हैं।

प्रतिरक्षा कोशिकाओं के उत्पादन और विकास के लिए शरीर में विशेष अंग होते हैं जिन्हें लिम्फॉइड अंग कहते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं — प्राथमिक और द्वितीयक।

प्राथमिक लिम्फॉइड अंगों में अस्थि मज्जा (Bone Marrow) और थाइमस ग्रंथि (Thymus) आते हैं। अस्थि मज्जा सभी रक्त कोशिकाओं का उत्पादन केंद्र है और B-कोशिकाओं का परिपक्वन भी यहीं होता है। थाइमस ग्रंथि गर्दन के आधार पर छाती के ऊपरी भाग में स्थित होती है और T-कोशिकाओं का परिपक्वन और शिक्षण यहीं होता है। थाइमस ग्रंथि बचपन में सबसे सक्रिय होती है और यौवनावस्था के बाद धीरे-धीरे सिकुड़ती जाती है। यही कारण है कि बुजुर्गों में प्रतिरक्षा कमजोर होती जाती है।

द्वितीयक लिम्फॉइड अंगों में प्लीहा (Spleen), लिम्फ नोड्स (Lymph Nodes), टॉन्सिल्स (Tonsils) और आंतों में पेयर्स पैचेज (Peyer’s Patches) शामिल हैं। प्लीहा पेट के बाईं ओर स्थित होती है। यह पुरानी और क्षतिग्रस्त लाल रक्त कोशिकाओं को नष्ट करती है, रक्तजनित प्रतिजनों से निपटती है और स्मृति कोशिकाओं का भंडारण करती है। लिम्फ नोड्स पूरे शरीर में फैले हुए छोटे-छोटे ग्रंथि जैसे अंग हैं। ये लसीका (Lymph) को छानकर उसमें से रोगाणुओं को नष्ट करते हैं। जब भी गले में संक्रमण होता है तो गर्दन में स्थित लिम्फ नोड्स सूज जाती हैं — यह उनके काम करने का संकेत है। टॉन्सिल्स गले में स्थित होते हैं और श्वसन तथा पाचन तंत्र की प्रवेश द्वार पर सुरक्षा करते हैं। कभी-कभी बार-बार संक्रमित होने पर टॉन्सिल हटाने की जरूरत पड़ती है।

प्रतिरक्षण (Immunization) दो प्रकार का होता है — सक्रिय और निष्क्रिय। इनकी समझ टीकाकरण और चिकित्सा के संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण है।

सक्रिय प्रतिरक्षण (Active Immunity)

सक्रिय प्रतिरक्षण वह है जब शरीर स्वयं प्रतिरक्षी पदार्थों का निर्माण करता है। यह दो तरीकों से होती है। प्राकृतिक सक्रिय प्रतिरक्षण में रोग होने के बाद शरीर स्वयं एंटीबॉडी बनाता है और स्मृति कोशिकाएं विकसित होती हैं जो दीर्घकालिक सुरक्षा प्रदान करती हैं। चेचक, खसरा और मम्प्स जैसे रोग एक बार होने के बाद दोबारा नहीं होते, यह इसी प्राकृतिक सक्रिय प्रतिरक्षण का उदाहरण है। कृत्रिम सक्रिय प्रतिरक्षण को टीकाकरण (Vaccination) कहते हैं। इसमें मृत या कमजोर किए गए रोगाणु शरीर में डाले जाते हैं, जिससे शरीर एंटीबॉडीज बनाता है और स्मृति कोशिकाएं विकसित होती हैं, लेकिन बीमारी नहीं होती। सक्रिय प्रतिरक्षा धीमी गति से विकसित होती है (दिनों से सप्ताहों में) लेकिन दीर्घकालिक या आजीवन सुरक्षा देती है।

निष्क्रिय प्रतिरक्षण (Passive Immunity)

निष्क्रिय प्रतिरक्षण में तैयार एंटीबॉडीज बाहर से शरीर में डाली जाती हैं। प्राकृतिक निष्क्रिय प्रतिरक्षण का सबसे सुंदर उदाहरण मां से बच्चे को मिलने वाली सुरक्षा है। गर्भावस्था के दौरान मां की IgG एंटीबॉडीज प्लेसेंटा के माध्यम से शिशु को मिलती हैं और जन्म के बाद मां के दूध में मौजूद IgA एंटीबॉडीज शिशु की आंत की रक्षा करती हैं। यही कारण है कि कम से कम 6 महीने तक स्तनपान कराना शिशु की सेहत के लिए इतना महत्वपूर्ण माना जाता है।

कृत्रिम निष्क्रिय प्रतिरक्षण में किसी दूसरे जीव का ऐंटीसीरम (Antiserum) इंजेक्ट किया जाता है। सांप के काटने पर दिया जाने वाला एंटीवेनम (Anti-venom), रेबीज या टिटेनस के इलाज में दिया जाने वाला इंजेक्शन कृत्रिम निष्क्रिय प्रतिरक्षण के उदाहरण हैं। इसकी विशेषता यह है कि यह तुरंत काम करती है लेकिन केवल कुछ सप्ताह या महीनों तक ही प्रभावी रहती है, क्योंकि शरीर की अपनी कोई स्मृति कोशिका नहीं बनती।

निष्क्रिय प्रतिरक्षा की खोज एमिल वॉन बेहरिंग ने 1890 में की थी। इसके लिए उन्हें 1901 में प्रथम चिकित्सा क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार मिला।

टीकाकरण मानव इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण चिकित्सा खोजों में से एक है। इसने करोड़ों जानें बचाई हैं और अनेक भयावह रोगों का सफाया किया है। टीकाकरण का जनक अंग्रेज चिकित्सक एडवर्ड जेनर (Edward Jenner) को माना जाता है जिन्होंने 1798 में चेचक (Smallpox) के विरुद्ध पहला टीका विकसित किया। उन्होंने देखा कि जो लोग गाय के चेचक (Cowpox) से ग्रस्त हो जाते थे, उन्हें मानव चेचक नहीं होता था। इससे उन्होंने गाय के चेचक के विषाणु से एक टीका बनाया। ‘वैक्सीन’ शब्द भी जेनर ने ही दिया जो लैटिन शब्द ‘वाका’ (Vacca — गाय) से आया है। एडवर्ड जेनर को इम्यूनोलॉजी (टीकाकरण विज्ञान) का जनक भी कहते हैं।

टीके कई प्रकार के होते हैं। निष्क्रिय या मृत टीकों में मारे गए रोगाणुओं को प्रयोग किया जाता है, जैसे टाइफाइड, कुकुर खांसी और हेपेटाइटिस A के टीके। क्षीण या कमजोर जीवित टीकों में कमजोर किए गए जीवित रोगाणु होते हैं, जैसे BCG (तपेदिक के लिए), MMR (खसरा, मम्प्स, रूबेला के लिए) और मौखिक पोलियो टीका। टॉक्सॉइड टीकों में निष्क्रिय विषैले पदार्थ होते हैं, जैसे टिटेनस और डिप्थीरिया के टीके। सबयूनिट या कॉन्जुगेट टीकों में रोगाणु के केवल कुछ विशेष भाग प्रयोग किए जाते हैं।

भारत में टीकाकरण कार्यक्रम

भारत में बच्चों को कई गंभीर बीमारियों से बचाने के लिए एक व्यापक टीकाकरण कार्यक्रम चलाया जाता है। 2015 में शुरू किए गए मिशन इंद्रधनुष के तहत 2 वर्ष तक के बच्चों और गर्भवती महिलाओं को 12 जानलेवा बीमारियों से सुरक्षा दी जाती है।

जन्म के समय BCG टीका (क्षय रोग के लिए), OPV-0 (पोलियो) और हेपेटाइटिस B का पहला टीका दिया जाता है। 6 सप्ताह पर DPT-1 दिया जाता है जो तीन बीमारियों — डिप्थीरिया, पर्टुसिस (कुकुर खांसी) और टिटेनस — से एक साथ सुरक्षा देता है। इसके साथ पोलियो, हेपेटाइटिस B, हिब (मस्तिष्क ज्वर), रोटावायरस (डायरिया) और न्यूमोकोकल के टीके भी दिए जाते हैं। 9 माह की उम्र में MMR-1 (खसरा, मम्प्स, रूबेला) दिया जाता है। 9 से 12 माह के बीच टाइफाइड कॉन्जुगेट वैक्सीन दी जाती है। 10 से 12 वर्ष की आयु में HPV टीका दिया जाता है जो सर्वाइकल कैंसर से सुरक्षा देता है। टीकाकरण के लाभ केवल व्यक्तिगत नहीं हैं बल्कि जब पूरे समुदाय का टीकाकरण होता है तो हर्ड इम्युनिटी (Herd Immunity) विकसित होती है जो उन लोगों को भी बचाती है जो टीका नहीं ले सकते।

1975 में जर्मन वैज्ञानिक जॉर्ज कोहलर (George Köhler) और अर्जेंटीनी-ब्रिटिश वैज्ञानिक सीसर मिल्स्टीन (César Milstein) ने एक क्रांतिकारी तकनीक विकसित की जिसे हाइब्रिडोमा तकनीक (Hybridoma Technology) कहते हैं। इस खोज के लिए उन्हें 1984 में नोबेल पुरस्कार मिला।

हाइब्रिडोमा एक संकर कोशिका है जो एक B-लिम्फोसाइट और एक माइलोमा कोशिका (Myeloma Cell) के संगलन (Fusion) से बनती है। B-लिम्फोसाइट की विशेषता है कि वह विशिष्ट एंटीबॉडी बनाती है, लेकिन यह अल्पजीवी होती है। माइलोमा कोशिका एक प्रकार की कैंसरग्रस्त प्लाज्मा कोशिका है जो अमर होती है और प्रयोगशाला में अनंतकाल तक विभाजित होती रहती है। जब इन दोनों को मिलाया जाता है तो बनने वाली हाइब्रिडोमा कोशिका में दोनों के गुण आ जाते हैं — यह अमर भी है और विशिष्ट एंटीबॉडी भी बनाती है।

इस हाइब्रिडोमा कोशिका से बनाई जाने वाली एंटीबॉडीज को मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज (Monoclonal Antibodies – mAbs) कहते हैं। ये एंटीबॉडीज एक ही B-लिम्फोसाइट के क्लोन से बनती हैं इसलिए सभी अणु एक जैसे होते हैं और एक ही विशिष्ट एंटीजन को पहचानते हैं। इन्हें “मैजिक बुलेट्स” (Magic Bullets) भी कहा जाता है क्योंकि ये अत्यंत सटीकता से केवल लक्षित कोशिका पर ही हमला करती हैं।

मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज के उपयोग बहुत व्यापक हैं। कैंसर उपचार में ये कैंसर कोशिकाओं को सटीक रूप से लक्षित करती हैं और रेडियोएक्टिव पदार्थों को सीधे ट्यूमर तक पहुंचाती हैं, जिससे स्वस्थ कोशिकाएं नुकसान नहीं होतीं। निपा वायरस संक्रमण और COVID-19 के उपचार में भी इनका प्रयोग किया जाता है। निदान (Diagnosis) में गर्भावस्था परीक्षण किट, रक्त समूह निर्धारण और रोगों का शीघ्र पता लगाने में मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज का उपयोग होता है। घर में प्रयोग होने वाली प्रेग्नेंसी टेस्ट किट भी मोनोक्लोनल एंटीबॉडी तकनीक पर आधारित है। अंग प्रत्यारोपण में अस्वीकृति रोकने के लिए भी इनका प्रयोग किया जाता है।

IAS 2025 की परीक्षा में पूछे गए प्रश्न में स्पष्ट किया गया कि मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज मानव-निर्मित प्रोटीन अणु हैं जो विशिष्ट प्रतिजनों से बंधन बनाकर प्रतिरक्षात्मक कार्य को उद्दीपित करते हैं और निपा विषाणु जैसे संक्रमणों के उपचार में प्रयुक्त होते हैं।

एंटीबॉडी विविधता का आनुवांशिक आधार

एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि शरीर लाखों-करोड़ों प्रकार के प्रतिजनों के विरुद्ध इतनी विविध एंटीबॉडीज कैसे बना लेता है? इसका उत्तर 1987 में जापानी वैज्ञानिक सुसुमु तोनेगावा (Susumu Tonegawa) ने दिया। उन्होंने खोजा कि जीनों में पुनर्संयोजन (Gene Recombination) की एक विशेष प्रक्रिया होती है जो सीमित जीनों से अनगिनत भिन्न एंटीबॉडीज बनाने में सक्षम बनाती है। इस खोज के लिए उन्हें 1987 का नोबेल पुरस्कार दिया गया।

2025 का नोबेल पुरस्कार — परिधीय प्रतिरक्षा सहिष्णुता

2025 का नोबेल पुरस्कार (चिकित्सा) मैरी ब्रंको (अमेरिका), फ्रेड राम्सडेल (अमेरिका) और शिमोन साकागुची (जापान) को परिधीय प्रतिरक्षा सहिष्णुता (Peripheral Immune Tolerance) की खोज के लिए दिया गया। इनकी खोज ने यह समझाया कि प्रतिरक्षा प्रणाली स्वयं को कैसे नियंत्रित रखती है और ऑटोइम्यून रोगों से कैसे बचाव होता है। रेगुलेटरी T-कोशिकाओं की इस प्रक्रिया में भूमिका इनकी खोज का केंद्र थी।

कभी-कभी प्रतिरक्षा तंत्र में गड़बड़ी हो जाती है जिससे विभिन्न प्रकार की समस्याएं उत्पन्न होती हैं।

एलर्जी (Allergy)

एलर्जी तब होती है जब प्रतिरक्षा तंत्र किसी सामान्य रूप से हानिरहित पदार्थ के प्रति अत्यधिक और असामान्य प्रतिक्रिया करता है। उस पदार्थ को एलर्जेन कहते हैं। परागकण, धूल के कण, कुछ खाद्य पदार्थ जैसे मूंगफली या दूध, दवाइयां, सौंदर्य प्रसाधन और कुछ रसायन सामान्य एलर्जेन हैं। एलर्जी में IgE एंटीबॉडीज की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है और मास्ट कोशिकाओं से बड़ी मात्रा में हिस्टामीन निकलता है। इससे त्वचा पर दाने, खुजली, सूजन, छींक और श्वास संबंधी समस्याएं होती हैं। गंभीर एलर्जी में एनाफिलेक्सिस (Anaphylaxis) हो सकता है जो जानलेवा भी हो सकता है। बहुत से लोगों को पालतू जानवरों के बालों से, कुछ को गेहूं से या कुछ को मधुमक्खी के काटने पर गंभीर एलर्जी होती है — यह सब इसी तंत्र के कारण होता है।

स्वप्रतिरक्षण (Autoimmunity)

ऑटोइम्युनिटी की स्थिति में प्रतिरक्षा तंत्र अपनी ही कोशिकाओं और ऊतकों को बाहरी समझकर उनके विरुद्ध एंटीबॉडीज बनाने लगता है। यह उस स्थिति जैसी है जब किसी देश की सेना अपने ही नागरिकों पर हमला करने लगे। प्रमुख ऑटोइम्यून रोगों में रूमेटॉइड आर्थराइटिस (जोड़ों की सूजन और दर्द), टाइप 1 डायबिटीज (जिसमें प्रतिरक्षा तंत्र अग्नाशय की इंसुलिन बनाने वाली बीटा कोशिकाओं को नष्ट कर देता है), मल्टिपल स्केलेरोसिस (जिसमें तंत्रिका तंतुओं की सुरक्षात्मक परत नष्ट हो जाती है), ल्यूपस (जो त्वचा, जोड़ और आंतरिक अंगों को प्रभावित करता है) और थायरॉइड विकार जैसे ग्रेव्स रोग (अतिसक्रिय थायरॉइड) और हाशिमोटो रोग (अल्पसक्रिय थायरॉइड) शामिल हैं। 2025 के नोबेल पुरस्कार से संबंधित खोज इन्हीं रोगों की समझ को आगे बढ़ाने में सहायक है।

इम्यूनोडेफिशिएंसी (Immunodeficiency)

कभी-कभी प्रतिरक्षा तंत्र जन्म से ही कमजोर होता है — इसे जन्मजात इम्यूनोडेफिशिएंसी कहते हैं। अर्जित इम्यूनोडेफिशिएंसी का सबसे भयावह उदाहरण AIDS है। HIV वायरस हेल्पर T-कोशिकाओं (CD4+ T Cells) को नष्ट कर देता है जिससे पूरी प्रतिरक्षा प्रणाली ध्वस्त हो जाती है। इसके बाद मामूली जुकाम या फंगल संक्रमण भी जानलेवा हो सकते हैं क्योंकि शरीर उनसे लड़ने में असमर्थ हो जाता है। AIDS का अभी तक कोई स्थायी इलाज नहीं है, केवल ART (Antiretroviral Therapy) से इसे नियंत्रित किया जा सकता है।

एंटीबायोटिक्स (Antibiotics) जीवाणुओं को मारने या उनकी वृद्धि रोकने वाली दवाएं हैं। यह ध्यान रखना जरूरी है कि एंटीबायोटिक्स केवल जीवाणुओं पर काम करती हैं, विषाणुओं (Viruses) पर नहीं। इसीलिए सर्दी-जुकाम जो आमतौर पर वायरस से होता है, उसमें एंटीबायोटिक देना व्यर्थ है। आधुनिक तीसरी पीढ़ी की एंटीबायोटिक्स जीवाणुओं के जीनों पर हमला करती हैं और बहुत प्रभावी हैं। लेकिन एक गंभीर समस्या उभर रही है — एंटीबायोटिक प्रतिरोध। जब एंटीबायोटिक्स का दुरुपयोग होता है (जैसे अधूरा कोर्स, बिना जरूरत के लेना), तो जीवाणुओं में आनुवंशिक उत्परिवर्तन होते हैं और वे इन दवाओं के विरुद्ध प्रतिरोधी हो जाते हैं। आज यह वैश्विक स्वास्थ्य का एक बड़ा संकट बन चुका है।

रोगों के फैलाव के भौगोलिक विस्तार के आधार पर इन्हें चार श्रेणियों में बांटा जाता है। एंडेमिक (Endemic) वह रोग है जो किसी विशेष क्षेत्र में स्थायी रूप से मौजूद रहता है, जैसे कुछ क्षेत्रों में मलेरिया। एपिडेमिक (Epidemic) किसी क्षेत्र में रोग का अचानक और असामान्य प्रकोप है। पेंडेमिक (Pandemic) विश्व के बड़े क्षेत्र में फैला रोग है जो कई देशों या महाद्वीपों को प्रभावित करे — COVID-19 और 1918 की स्पैनिश फ्लू इसके उदाहरण हैं। एपिजूटिक (Epizootic) पशुओं में फैलने वाली महामारी है।

भारत में प्रतिरक्षा और संक्रामक रोगों पर शोध के लिए कई प्रमुख संस्थाएं कार्यरत हैं। SANRAKSHA (AIDS Research and Control Project) बंगलुरु में स्थित है और एड्स पर शोध व नियंत्रण करती है। ICMR (Indian Council of Medical Research) देश का सर्वोच्च चिकित्सा शोध निकाय है। NIV (National Institute of Virology) पुणे में स्थित है और विषाणुओं पर शोध करती है। AIIMS (All India Institute of Medical Sciences) देश का प्रमुख चिकित्सा संस्थान है।

प्रतिरक्षा विज्ञान के विकास में अनेक महान वैज्ञानिकों का योगदान रहा है। एडवर्ड जेनर (1798) ने टीकाकरण की नींव रखी और इम्यूनोलॉजी के जनक कहलाए। एलि मेशिनकॉफ (1884) ने फैगोसाइटोसिस और कोशिकावाद सिद्धांत दिया। बेहरिंग और कितासातो (1890) ने ह्यूमोरल थ्योरी दी। लुई पाश्चर माइक्रोबायोलॉजी के जनक माने जाते हैं।

नोबेल पुरस्कार की बात करें तो एमिल वॉन बेहरिंग को 1901 में प्रथम चिकित्सा नोबेल पुरस्कार निष्क्रिय प्रतिरक्षा की खोज के लिए मिला। सुसुमु तोनेगावा को 1987 में एंटीबॉडी विविधता के आनुवांशिक आधार की खोज के लिए नोबेल मिला। जॉर्ज कोहलर और सीसर मिल्स्टीन को 1984 में हाइब्रिडोमा तकनीक और मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज की खोज के लिए नोबेल मिला। मैरी ब्रंको, फ्रेड राम्सडेल और शिमोन साकागुची को 2025 में परिधीय प्रतिरक्षा सहिष्णुता की खोज के लिए नोबेल पुरस्कार मिला।

प्रतिरक्षा तंत्र की संपूर्ण समझ के लिए इन महत्वपूर्ण बिंदुओं को याद रखना जरूरी है। लाइसोजाइम एंजाइम पसीने, आंसू, लार और नाक के स्राव में पाया जाता है — यही कारण है कि आंसू बहाना आंखों को स्वस्थ रखता है। पायरोजेन्स श्वेत रक्त कणिकाओं द्वारा उत्पन्न होते हैं और बुखार के लिए जिम्मेदार हैं — बुखार दरअसल शरीर की लड़ाई का संकेत है। T-कोशिकाएं लाल अस्थि मज्जा में बनकर थाइमस में परिपक्व होती हैं। स्मृति कोशिकाएं प्लीहा और लिम्फ गांठों में संचित रहती हैं — इसीलिए एक बार टीका लगवाने के बाद वर्षों तक सुरक्षा मिलती है। DPT टीका डिप्थीरिया, पर्टुसिस और टिटेनस तीनों से एक साथ सुरक्षा देता है। BCG टीका क्षय रोग (Tuberculosis) से बचाव के लिए जन्म के समय दिया जाता है। प्लाज्मा कोशिकाएं 2000 एंटीबॉडी अणु प्रति सेकंड की दर से बनाती हैं — यह शरीर की अद्भुत उत्पादन क्षमता है।

B-कोशिकाओं का परिपक्वन बोन मैरो में होता है जबकि T-कोशिकाओं का थाइमस ग्रंथि में। NK-कोशिकाएं और मास्ट कोशिकाएं भी बोन मैरो से उत्पन्न होती हैं। कुप्फर कोशिकाएं यकृत में फैगोसाइटोसिस का कार्य करती हैं। प्रतिरक्षा के प्राथमिक अंग थाइमस और अस्थि मज्जा हैं जबकि द्वितीयक अंगों में प्लीहा, लिम्फ नोड्स, टॉन्सिल्स और पेयर्स पैचेज आते हैं।

IAS/UPSC की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि IAS 2022 में B और T कोशिकाओं की भूमिका पूछी गई थी जिसका उत्तर है — शरीर को रोगजनकों द्वारा होने वाले रोगों से बचाना। IAS 2025 में मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज के तीनों कथन सही पाए गए। UttPCS 2024 में हाइब्रिडोमा तकनीक के बारे में कोहलर और मिल्स्टीन का नाम पूछा गया।

प्रतिरक्षा को एक सूत्र में समझें तो — प्रतिरक्षा स्वाभाविक और विशिष्ट दो भागों का योग है। स्वाभाविक प्रतिरक्षा में भौतिक अवरोध (त्वचा, नाक के बाल), रासायनिक सुरक्षा (लाइसोजाइम, HCl) और कोशिकीय प्रतिक्रिया (फैगोसाइटोसिस) शामिल हैं। विशिष्ट प्रतिरक्षा में ह्यूमोरल प्रतिरक्षा जो B-कोशिकाओं द्वारा संचालित है और कोशिका-मध्यस्थ प्रतिरक्षा जो T-कोशिकाओं द्वारा संचालित है, शामिल हैं। प्रतिरक्षण सक्रिय (दीर्घकालिक, स्मृति कोशिकाएं बनती हैं) और निष्क्रिय (तत्काल लेकिन अल्पकालिक, कोई स्मृति नहीं) दो प्रकार का होता है।

मानव प्रतिरक्षा तंत्र वास्तव में प्रकृति की एक अद्भुत इंजीनियरिंग है। यह प्रणाली लाखों वर्षों के विकास का परिणाम है और इतनी जटिल है कि वैज्ञानिक आज भी इसके नए-नए पहलू खोज रहे हैं। 2025 के नोबेल पुरस्कार से लेकर मोनोक्लोनल एंटीबॉडी थेरेपी तक — इस क्षेत्र में निरंतर नई खोजें हो रही हैं जो भविष्य में कैंसर, ऑटोइम्यून रोगों और महामारियों से लड़ने में क्रांतिकारी भूमिका निभाएंगी।

प्र. प्रतिरक्षा तंत्र का कोशिकावाद सिद्धांत किसने दिया? उ. एलि मेशिनकॉफ (1884)

प्र. ह्यूमोरल सिद्धांत किसने दिया? उ. बेहरिंग और कितासातो (1890)

प्र. निष्क्रिय प्रतिरक्षा की खोज किसने की? उ. एमिल वॉन बेहरिंग (1890)

प्र. प्रथम चिकित्सा नोबेल पुरस्कार (1901) किसे मिला? उ. एमिल वॉन बेहरिंग को — निष्क्रिय प्रतिरक्षा की खोज हेतु

प्र. टीकाकरण का जनक किसे कहते हैं? उ. एडवर्ड जेनर

प्र. एडवर्ड जेनर ने किस रोग का पहला टीका बनाया? उ. चेचक (Smallpox) — 1798

प्र. वैक्सीन शब्द किसने दिया? उ. एडवर्ड जेनर ने (लैटिन शब्द Vacca = गाय से)

प्र. इम्यूनोलॉजी का जनक किसे कहते हैं? उ. एडवर्ड जेनर

प्र. हाइब्रिडोमा तकनीक किसने विकसित की? उ. जॉर्ज कोहलर और सीसर मिल्स्टीन (1975)

प्र. हाइब्रिडोमा तकनीक के लिए नोबेल पुरस्कार कब मिला? उ. 1984

प्र. हाइब्रिडोमा कोशिका किन दो कोशिकाओं के संगलन से बनती है? उ. B-लिम्फोसाइट + माइलोमा कोशिका

प्र. मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज क्या होती हैं? उ. एक ही B-लिम्फोसाइट के क्लोन से बनी एकसमान एंटीबॉडीज जो एक विशिष्ट एंटीजन को लक्षित करती हैं

प्र. मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज को किस नाम से भी जाना जाता है? उ. मैजिक बुलेट्स (Magic Bullets)

प्र. एंटीबॉडी विविधता का आनुवांशिक आधार किसने खोजा? उ. सुसुमु तोनेगावा (जापान) — नोबेल 1987

प्र. 2025 का चिकित्सा नोबेल पुरस्कार किस खोज के लिए मिला? उ. परिधीय प्रतिरक्षा सहिष्णुता (Peripheral Immune Tolerance)

प्र. 2025 का चिकित्सा नोबेल पुरस्कार किन्हें मिला? उ. मैरी ब्रंको, फ्रेड राम्सडेल (अमेरिका) और शिमोन साकागुची (जापान)

प्र. B-कोशिकाओं का परिपक्वन कहां होता है? उ. लाल अस्थि मज्जा (Bone Marrow) में

प्र. T-कोशिकाओं का परिपक्वन कहां होता है? उ. थाइमस ग्रंथि में

प्र. T-कोशिकाओं में T का क्या अर्थ है? उ. Thymus — क्योंकि इनका परिपक्वन थाइमस में होता है

प्र. NK-कोशिकाओं का परिपक्वन कहां होता है? उ. बोन मैरो (अस्थि मज्जा) में

प्र. प्लाज्मा कोशिकाएं कितनी गति से एंटीबॉडी बनाती हैं? उ. 2000 अणु प्रति सेकंड

प्र. एंटीबॉडीज का निर्माण कौन करती हैं? उ. B-कोशिकाओं से बनी प्लाज्मा कोशिकाएं

प्र. स्मृति कोशिकाएं (Memory Cells) कहां संचित रहती हैं? उ. प्लीहा और लिम्फ गांठों में

प्र. कौन सा एंटीबॉडी प्लेसेंटा पार कर सकता है? उ. IgG

प्र. मां के दूध में कौन सा एंटीबॉडी पाया जाता है? उ. IgA

प्र. सबसे बड़ा एंटीबॉडी कौन सा है? उ. IgM

प्र. एलर्जी में कौन सा एंटीबॉडी सक्रिय होता है? उ. IgE

प्र. B-कोशिकाओं की सतह पर रिसेप्टर का काम कौन सा एंटीबॉडी करता है? उ. IgD

प्र. सबसे अधिक मात्रा में पाया जाने वाला एंटीबॉडी कौन सा है? उ. IgG

प्र. लाइसोजाइम एंजाइम कहां पाया जाता है? उ. पसीने, आंसू, लार और नाक के स्राव में

प्र. लाइसोजाइम का क्या कार्य है? उ. जीवाणुओं की कोशिका भित्ति का लयन (Lysis) करना

प्र. हिस्टामीन का भंडारण कहां होता है? उ. मास्ट कोशिकाओं में

प्र. प्रदाह (Inflammation) में रक्त वाहिनियों का फैलाव किस पदार्थ से होता है? उ. हिस्टामीन

प्र. बुखार के लिए कौन सा पदार्थ जिम्मेदार होता है? उ. पायरोजेन्स (Pyrogens) — श्वेत रक्त कणिकाओं द्वारा विमुक्त

प्र. यकृत में फैगोसाइटोसिस कौन सी कोशिकाएं करती हैं? उ. कुप्फर कोशिकाएं (Kupffer Cells)

प्र. मैक्रोफेज को अन्य किस नाम से जाना जाता है? उ. हिस्टिओसाइट्स

प्र. सबसे अधिक संख्या में पाए जाने वाले WBC कौन से हैं? उ. न्यूट्रोफिल्स

प्र. संक्रमण स्थल पर सबसे पहले कौन सी कोशिका पहुंचती है? उ. न्यूट्रोफिल्स

प्र. AIDS में HIV वायरस कौन सी कोशिकाओं को नष्ट करता है? उ. हेल्पर T-कोशिकाएं (CD4+ T Cells)

प्र. प्रत्यारोपण अस्वीकृति किस प्रतिरक्षा के कारण होती है? उ. कोशिका मध्यस्थ प्रतिरक्षा (CMI) — T-कोशिकाओं द्वारा

प्र. थाइमस ग्रंथि कहां स्थित होती है? उ. गर्दन के आधार पर छाती के ऊपरी भाग में

प्र. थाइमस ग्रंथि किस आयु में सबसे अधिक सक्रिय होती है? उ. बचपन में

प्र. प्लीहा (Spleen) कहां स्थित होती है? उ. पेट के बाईं ओर

प्र. प्राथमिक लिम्फॉइड अंग कौन से हैं? उ. थाइमस और अस्थि मज्जा

प्र. द्वितीयक लिम्फॉइड अंग कौन से हैं? उ. प्लीहा, लिम्फ नोड्स, टॉन्सिल्स, पेयर्स पैचेज

प्र. DPT टीका किन तीन रोगों से सुरक्षा देता है? उ. डिप्थीरिया, पर्टुसिस (कुकुर खांसी) और टिटेनस

प्र. BCG टीका किस रोग से बचाव करता है? उ. क्षय रोग / तपेदिक (Tuberculosis)

प्र. BCG टीका कब दिया जाता है? उ. जन्म के समय

प्र. MMR टीका किन तीन रोगों से सुरक्षा देता है? उ. खसरा (Measles), मम्प्स और रूबेला

प्र. HPV टीका किस रोग से बचाव के लिए दिया जाता है? उ. सर्वाइकल कैंसर (Cervical Cancer)

प्र. मिशन इंद्रधनुष कब शुरू हुआ? उ. 2015

प्र. मिशन इंद्रधनुष किससे संबंधित है? उ. बच्चों के टीकाकरण से — 12 जानलेवा बीमारियों से सुरक्षा

प्र. SANRAKSHA संस्था कहां स्थित है और क्या करती है? उ. बंगलुरु — AIDS शोध एवं नियंत्रण

प्र. NIV (National Institute of Virology) कहां है? उ. पुणे

प्र. पेंडेमिक किसे कहते हैं? उ. विश्व के बृहत् क्षेत्र (कई देशों/महाद्वीपों) में फैला रोग

प्र. एंडेमिक किसे कहते हैं? उ. किसी विशेष क्षेत्र में स्थायी रूप से मौजूद रोग

प्र. एपिजूटिक किसे कहते हैं? उ. पशुओं में फैलने वाली महामारी

प्र. स्वाभाविक प्रतिरक्षा किस प्रकार की होती है? उ. अविशिष्ट (Non-specific)

प्र. विशिष्ट प्रतिरक्षा का दूसरा नाम क्या है? उ. अनुकूली प्रतिरक्षा (Adaptive Immunity)

प्र. सक्रिय प्रतिरक्षा और निष्क्रिय प्रतिरक्षा में मुख्य अंतर क्या है? उ. सक्रिय में स्मृति कोशिकाएं बनती हैं और सुरक्षा दीर्घकालिक होती है; निष्क्रिय में तत्काल लेकिन अल्पकालिक सुरक्षा मिलती है और कोई स्मृति नहीं बनती

प्र. सांप के काटने पर कौन सी प्रतिरक्षा दी जाती है? उ. कृत्रिम निष्क्रिय प्रतिरक्षा (एंटीवेनम इंजेक्शन)

प्र. एंटीबॉडीज की आकृति कैसी होती है? उ. Y-आकार की

प्र. एंटीबॉडीज किस प्रकार के अणु होते हैं? उ. प्रोटीन अणु (Immunoglobulins)

प्र. प्रतिजन का मुख्य गुण क्या है? उ. एंटीबॉडीज का निर्माण प्रेरित करना

प्र. प्रतिजन किन पदार्थों के बड़े अणु होते हैं? उ. मुख्यतः प्रोटीन्स या कार्बोहाइड्रेट के

प्र. त्वचा की सतह का pH मान कितना होता है? उ. 3.0 से 5.0 (अम्लीय)

प्र. आमाशय में रोगाणुओं को कौन नष्ट करता है? उ. HCl (हाइड्रोक्लोरिक एसिड)

प्र. IAS 2022 में B और T कोशिकाओं की क्या भूमिका पूछी गई? उ. शरीर को रोगजनकों द्वारा होने वाले रोगों से बचाना

प्र. IAS 2025 में मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज के बारे में क्या पूछा गया? उ. तीनों कथन सही थे — मानव निर्मित प्रोटीन, विशिष्ट एंटीजन से बंधन, निपा वायरस उपचार में प्रयोग

प्र. COVID-19 किस प्रकार की महामारी थी? उ. पेंडेमिक (Pandemic)

प्र. टाइप 1 डायबिटीज किस प्रकार का रोग है? उ. ऑटोइम्यून रोग — प्रतिरक्षा तंत्र अग्नाशय की बीटा कोशिकाओं पर हमला करता है

प्र. मल्टिपल स्केलेरोसिस में क्या होता है? उ. तंत्रिका तंतुओं की सुरक्षात्मक परत (Myelin Sheath) नष्ट हो जाती है

प्र. एलर्जी में एंटीहिस्टामीन दवाएं क्यों दी जाती हैं? उ. हिस्टामीन के प्रभाव को रोकने के लिए

प्र. लिम्फ नोड्स में सूजन क्यों आती है? उ. संक्रमण के विरुद्ध लड़ाई के दौरान प्रतिरक्षा कोशिकाओं की सक्रियता से

प्र. NK सेल्स किन कोशिकाओं को बिना एंटीबॉडी के नष्ट करती हैं? उ. विषाणु-संक्रमित और कैंसर कोशिकाओं को

प्र. मवाद (Pus) किससे बनता है? उ. मृत भक्षण कोशिकाओं और मृत जीवाणुओं के एकत्र होने से

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