ब्रिटिश भू-राजस्व नीति: किसान क्यों हुए गरीब? जानें सच

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भारत में ब्रिटिश भू-राजस्व नीतियों का इतिहास अत्यंत जटिल एवं किसान-विरोधी रहा है। अंग्रेजों का मुख्य उद्देश्य भारत से अधिकतम राजस्व वसूलना था, न कि यहाँ की कृषि व्यवस्था को सुधारना। इन नीतियों ने भारतीय किसानों को गहरे संकट में डाला।

1. इलाहाबाद की प्रथम संधि (1765) 12 अगस्त 1765 को हुई इस संधि से कम्पनी को बंगाल, बिहार व उड़ीसा में दीवानी अधिकार मिले। कम्पनी दीवान बनी और नवाब नाज़िम रहा। यह द्वैध शासन की नींव थी जिसने किसानों के शोषण का रास्ता खोला।

2. द्वैध शासन की समस्या द्वैध शासन में कम्पनी के पास राजस्व वसूली का अधिकार था लेकिन प्रशासनिक जिम्मेदारी नवाब की थी। इस दोहरी व्यवस्था में कोई जवाबदेही नहीं थी। कम्पनी ने बेतरतीब शोषण किया और किसानों की स्थिति बद से बदतर होती चली गई।

3. बंगाल का महाअकाल (1770) द्वैध शासन के शोषण का सबसे भयावह परिणाम 1770 का बंगाल अकाल था। इस अकाल में बंगाल की लगभग एक-तिहाई जनसंख्या काल के गाल में समा गई। लाखों किसान मारे गए, खेत बर्बाद हो गए और पूरी कृषि व्यवस्था चरमरा गई।

4. भू-राजस्व नीतियों का उद्देश्य अंग्रेजों की सभी भू-राजस्व नीतियों का एकमात्र उद्देश्य था — कम्पनी के लिए अधिकतम एवं निश्चित राजस्व सुनिश्चित करना। किसानों का कल्याण, कृषि का विकास या भूमि सुधार कभी उनकी प्राथमिकता नहीं रही। यही सोच आगे की सभी नीतियों में झलकती है।

5. तीन प्रमुख भू-राजस्व व्यवस्थाएं ब्रिटिश काल में मुख्यतः तीन भू-राजस्व व्यवस्थाएं लागू हुईं — स्थायी बन्दोबस्त (ज़मींदारी), रैय्यतवाड़ी बन्दोबस्त और महालवाड़ी बन्दोबस्त। इनसे पहले वारेन हेस्टिंग्स की इजारेदारी व्यवस्था भी आई जो पूर्णतः असफल रही।

6. भारतीय कृषि पर प्रभाव इन सभी नीतियों ने मिलकर भारतीय कृषि को गहरा नुकसान पहुँचाया। किसान ज़मींदारों, बिचौलियों और सरकारी अधिकारियों के तिहरे शोषण का शिकार बने। परंपरागत ग्राम व्यवस्था टूटी और कृषि उत्पादकता गिरती चली गई।

7. औपनिवेशिक हित बनाम किसान हित ब्रिटिश नीति-निर्माताओं ने सदैव कम्पनी और ब्रिटिश साम्राज्य के हितों को सर्वोपरि रखा। भारतीय किसान इन नीतियों में केवल राजस्व का स्रोत था। यही कारण है कि 19वीं-20वीं सदी में किसान विद्रोहों की बाढ़ आ गई।

1772 में बंगाल का नया गवर्नर बनकर आए वारेन हेस्टिंग्स ने सर्वप्रथम द्वैध शासन समाप्त किया और एक नई व्यवस्था — इजारेदारी या तालुकेदारी प्रणाली — लागू की। यह व्यवस्था राजस्व संग्रहण को नीलामी पद्धति पर आधारित करती थी।

1. नीलामी द्वारा कर संग्रहण इस व्यवस्था में भूमि से कर वसूलने का अधिकार नीलामी के माध्यम से दिया जाता था। जो व्यक्ति सबसे ऊंची बोली लगाता, उसे उस भूमि से लगान वसूलने का ठेका मिल जाता था। यह एक बिल्कुल नई और प्रायोगिक व्यवस्था थी।

2. प्रारंभिक अवधि — 5 वर्ष शुरुआत में यह व्यवस्था 5 वर्षों के लिए लागू की गई थी। इसका उद्देश्य था कि पाँच वर्षों में इसकी समीक्षा कर आवश्यकतानुसार परिवर्तन किए जा सकें। लेकिन 1777 में इसे वार्षिक आधार पर कर दिया गया।

3. ज़मींदार केवल कर संग्राहक इस व्यवस्था का एक मुख्य सिद्धांत यह था कि ज़मींदार को भूमि का मालिक नहीं माना जाएगा, वह केवल कर संग्राहक होगा। उसे अपने इस कार्य के बदले केवल कमीशन का अधिकार था। भूमि पर उसका स्वामित्व नहीं था।

4. ज़मींदारों को कोई प्राथमिकता नहीं नीलामी में पारंपरिक ज़मींदारों को सरकार की ओर से कोई विशेष प्राथमिकता नहीं दी गई। कोई भी व्यक्ति जो अधिक बोली लगा सके, वह ठेका प्राप्त कर सकता था। इससे परंपरागत ज़मींदारी व्यवस्था को गहरा आघात पहुँचा।

5. फ्रांसिस का सुझाव हेस्टिंग्स की काउंसिल के सदस्य फ्रांसिस ने सुझाव दिया था कि ज़मींदारों के साथ स्थायी राजस्व समझौता किया जाए। लेकिन 1775 के बाद मराठा युद्धों में व्यस्त होने के कारण हेस्टिंग्स इस पर ध्यान नहीं दे पाया। यह सुझाव बाद में कार्नवालिस ने लागू किया।

6. ठेकेदार सट्टेबाज थे नीलामी में भाग लेने वाले अधिकांश लोग सट्टेबाज और ठेकेदार थे जिन्हें कृषि की कोई जानकारी नहीं थी। उनका एकमात्र लक्ष्य अपने ठेके की अवधि में किसानों से अधिकतम लाभ निचोड़ना था। कृषि सुधार उनकी प्राथमिकता कभी नहीं रही।

7. कम्पनी अधिकारियों का भ्रष्टाचार कम्पनी के कई अधिकारियों ने अपने निजी नौकरों और गुमाश्तों के नाम पर नीलामी में भाग लिया। स्वयं वारेन हेस्टिंग्स ने भी अप्रत्यक्ष रूप से इसमें हिस्सा लिया। यह व्यवस्था भ्रष्टाचार का गढ़ बन गई।

8. अत्यधिक कर निर्धारण नीलामी में बोली लगाते समय भूमि की उत्पादन क्षमता को वास्तविकता से अधिक आंका जाता था और अधिकतम कर निर्धारित किया जाता था। इससे ज़मीन के किराए बेतहाशा बढ़ गए और किसानों पर कर का बोझ असहनीय हो गया।

निष्कर्ष: वारेन हेस्टिंग्स की यह व्यवस्था पूर्णतः असंतोषजनक एवं असफल रही। इसने किसानों की दशा और भी बदतर कर दी।

हेस्टिंग्स की विफलता के बाद 1786 में लार्ड कार्नवालिस बंगाल का दूसरा गवर्नर जनरल बनकर आया। 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट के निर्देशानुसार उसे भू-राजस्व की समस्या हल करनी थी। 1793 में उसने स्थायी बन्दोबस्त लागू किया।

1. लगान की स्थायी दर लार्ड कार्नवालिस ने ज़मींदारों और उनके उत्तराधिकारियों के लिए लगान की दर एकबार और हमेशा के लिए निश्चित कर दी। यह राशि 3.75 करोड़ रुपये तय की गई। भविष्य में चाहे जितनी भी कृषि आय बढ़े, यह राशि कभी नहीं बदलेगी।

2. ज़मींदार भूमि के स्वामी स्थायी बन्दोबस्त में ज़मींदारों को भूमि का स्थायी स्वामी माना गया। जब तक वे निश्चित राजस्व सरकार को अदा करते रहें, उनकी ज़मींदारी सुरक्षित रहेगी। यह पहली बार था जब भूमि स्वामित्व इस प्रकार परिभाषित हुआ।

3. सरकार की निश्चित आय इस व्यवस्था से सरकार को यह लाभ हुआ कि उसकी भू-राजस्व आय पूर्णतः निश्चित हो गई। सरकार अपनी इस निश्चित आय के आधार पर भविष्य के व्यय की योजना बना सकती थी। यह प्रशासनिक दृष्टि से सुविधाजनक था।

4. कृषि सुधार की उम्मीद कार्नवालिस को विश्वास था कि स्थायी लगान से ज़मींदारों को कृषि सुधार में रुचि होगी। वे नई तकनीक, उर्वरक और सिंचाई में निवेश करेंगे ताकि उत्पादन बढ़े और उनका मुनाफा बढ़े। लेकिन यह उम्मीद पूरी तरह निराश हुई।

5. राजभक्त वर्ग का निर्माण राजनैतिक दृष्टि से कार्नवालिस को विश्वास था कि स्थायी बन्दोबस्त ऐसे राजभक्त ज़मींदारों की श्रेणी तैयार करेगी जो ब्रिटिश हितों की रक्षा करेगी। यही कारण है कि 1857 के विद्रोह में बंगाल के ज़मींदार ब्रिटिश समर्थक रहे।

6. सूर्यास्त कानून (Sunset Law) इस व्यवस्था के अंतर्गत एक कठोर नियम था जिसे “सूर्यास्त कानून” कहा गया। यदि ज़मींदार निश्चित तिथि तक सरकार को लगान नहीं चुकाता, तो सूर्यास्त से पहले उसकी ज़मींदारी नीलाम कर दी जाएगी। इससे पुराने ज़मींदार परिवार बर्बाद हो गए।

7. ज़मींदार-रैयत संबंध इस व्यवस्था में ज़मींदारों को निर्देश था कि वे अपने रैयतों को पट्टे जारी करें जिसमें लगान राशि और भूमि अधिकार स्पष्ट हों। यदि ज़मींदार शर्तों का उल्लंघन करे तो रैयत को न्यायालय में जाने का अधिकार था।

8. सरकारी कर्मचारियों की मुक्ति स्थायी बन्दोबस्त लागू होने से राजस्व वसूली की जटिल प्रक्रिया से मुक्त हुए सरकारी कर्मचारी शासन के अन्य कार्यों में लगाए जा सके। इससे प्रशासनिक दक्षता बढ़ने की उम्मीद थी, हालांकि व्यवहार में यह लाभ सीमित रहा।

1. प्रशासनिक सरलता स्थायी लगान तय होने से सरकार को बार-बार भूमि सर्वेक्षण या लगान पुनर्निर्धारण की झंझट नहीं थी। प्रशासन सरल हो गया और सरकारी मशीनरी को अन्य कार्यों के लिए समय मिला। यह व्यवस्था का सबसे बड़ा व्यावहारिक लाभ था।

2. निश्चित राजस्व आय सरकार को पता था कि उसे प्रतिवर्ष 3.75 करोड़ रुपये की आय होगी। इससे बजट निर्माण आसान हुआ और वित्तीय अनिश्चितता समाप्त हुई। कम्पनी के व्यापारिक और सैन्य खर्चों की योजना इस निश्चित आय के आधार पर बन सकती थी।

3. ज़मींदारी व्यवस्था की निरंतरता स्थायी बन्दोबस्त ने परंपरागत ज़मींदारी व्यवस्था को एक कानूनी आधार दिया। ज़मींदारों को स्थायित्व मिला जिससे उनमें भूमि सुधार के लिए प्रोत्साहन की उम्मीद थी। यह व्यवस्था इंग्लैंड की भूमि स्वामित्व व्यवस्था पर आधारित थी।

4. राजनैतिक स्थिरता इस व्यवस्था ने ब्रिटिश राज के प्रति ज़मींदारों में वफादारी की भावना पैदा की। 1857 तक बंगाल के ज़मींदार अंग्रेजों के अटूट समर्थक रहे। यह ब्रिटिश साम्राज्य के लिए एक राजनैतिक उपलब्धि थी।

5. ज़मींदारों को विकास का अवसर सिद्धांततः ज़मींदारों को लगान उत्पादन से अधिक होने पर अधिक मुनाफा कमाने का अवसर था। इससे उन्हें कृषि में निवेश करने की प्रेरणा मिलती। यदि वे भूमि सुधार करते तो अतिरिक्त आय उनके पास ही रहती।

6. भूमि पर स्वामित्व की स्पष्टता पहली बार भूमि स्वामित्व का स्पष्ट कानूनी ढांचा तैयार हुआ। ज़मींदार भूमि के कानूनी मालिक बने जो उसे बेच, खरीद या गिरवी रख सकते थे। इससे भूमि बाज़ार का विकास हुआ।

7. यूरोपीय पूंजी निवेश की उम्मीद अंग्रेज नीति-निर्माताओं को उम्मीद थी कि स्थायी भूमि स्वामित्व व्यवस्था से यूरोपीय पूंजीपति भारतीय भूमि में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित होंगे। इससे कृषि में आधुनिक तकनीक आएगी और उत्पादन बढ़ेगा।

1. किसानों का भीषण शोषण स्थायी बन्दोबस्त का सबसे बड़ा दोष यह था कि इसने किसानों को पूरी तरह ज़मींदारों की दया पर छोड़ दिया। ज़मींदारों ने किसानों से मनमाना लगान वसूला। किसान भूमि के स्वामित्व से सदा के लिए वंचित हो गए।

2. सरकार की आय स्थिर रही लगान स्थायी रूप से तय होने से भले ही कृषि उत्पादन दोगुना हो जाए, ज़मीन की कीमत सौ गुना बढ़ जाए, सरकार की आय नहीं बढ़ सकती थी। यह सरकार के लिए एक बड़ा नुकसान था। बाद में यह व्यवस्था सरकार के लिए हानिकारक सिद्ध हुई।

3. अनुपस्थित ज़मींदारी (Absentee Landlordism) ज़मींदार अपनी ज़मींदारी पर न रहकर कलकत्ता जैसे बड़े शहरों में विलासितापूर्ण जीवन बिताने लगे। वे बिचौलियों के माध्यम से लगान वसूलते थे। खेती और किसानों की दशा से उनका कोई लेना-देना नहीं रहा।

4. उप-ज़मींदारी प्रणाली का जन्म ज़मींदारों ने लगान वसूली का काम बिचौलियों को सौंप दिया। इससे उप-ज़मींदारी प्रणाली पैदा हुई। हर नए बिचौलिये का अर्थ था किसानों से और अधिक लगान की उगाही। इससे स्थायी ज़मींदारों की आय में 300% तक की वृद्धि हुई।

5. सामंतवाद को बढ़ावा इस व्यवस्था ने समाज में ऊपरी स्तर पर सामंतवाद और निचले स्तर पर दास प्रवृत्ति को प्रोत्साहन दिया। किसान अर्ध-दास की स्थिति में पहुंच गए। सामाजिक असमानता अत्यंत बढ़ गई।

6. कृषि सुधार नहीं हुआ अधिकांश ज़मींदारों ने कभी भूमि सुधार की ओर ध्यान नहीं दिया। उनका एकमात्र लक्ष्य अधिकतम लगान वसूलना था। वे शहरों में बैठकर विलासिता में डूबे रहे। कृषि उत्पादकता में कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई।

7. किसानों के अधिकारों की अनदेखी हालांकि ज़मींदारों को रैयतों को पट्टे देने के निर्देश थे, व्यवहार में इसका पालन नहीं हुआ। किसान न्यायालय जाने की स्थिति में नहीं थे। ज़मींदार रैयतों को कभी भी भूमि से बेदखल कर देते थे।

8. नए ज़मींदार वर्ग का उदय सूर्यास्त कानून के कारण पुराने परंपरागत ज़मींदार परिवार समय पर लगान न चुका पाने से बर्बाद हो गए। उनकी ज़मींदारियां नीलाम होकर नए सट्टेबाजों और व्यापारियों के हाथों में चली गईं जिनका कृषि से कोई संबंध नहीं था।

यह व्यवस्था बंगाल, बिहार, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश के बनारस खंड और उत्तरी कर्नाटक में लागू की गई। यह संपूर्ण भारतीय भूखंड के लगभग 19% भाग में थी।

स्थायी बन्दोबस्त की अंतर्निहित कमजोरियों ने एक नई व्यवस्था को जन्म दिया। ‘रैय्यत’ शब्द का अर्थ है साधारण किसान या प्रजा। इस व्यवस्था में लगान का सीधा समझौता ज़मींदारों के बजाय वास्तविक किसानों से किया गया।

सबसे पहले रैय्यतवाड़ी व्यवस्था 1792 में तमिलनाडु के बारामहल जिले में कर्नल रीड ने लागू की। लेकिन इसे व्यापक रूप से लागू करने का श्रेय टॉमस मुनरो को जाता है जिन्होंने 1820 में मद्रास में इसे पूर्ण रूप दिया।

1. किसान से सीधा समझौता इस व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि लगान का समझौता किसान (रैयत) से सीधे किया जाता था। ज़मींदार जैसा कोई मध्यस्थ नहीं था। सरकार और किसान के बीच सीधा संबंध था जो इसे पिछली व्यवस्थाओं से अलग करता था।

2. किसान भूमि का मालिक रैय्यतवाड़ी व्यवस्था में किसान को उस भूमि का मालिक माना गया जिसे वह जोतता था। वह अपनी भूमि पर स्वामित्व का अधिकार रखता था। जब तक वह नियमित लगान देता रहे, उसे भूमि से नहीं हटाया जा सकता था।

3. अवधि — 3 से 10 वर्ष यह समझौता स्थायी नहीं था। लगान का बन्दोबस्त 3 से 10 वर्षों के लिए किया जाता था। इस अवधि के बाद भूमि का सर्वेक्षण होता था और कृषि आय के अनुसार लगान का पुनर्निर्धारण किया जाता था।

4. उपज का 30% से 55% लगान इस व्यवस्था में कर की दर उपज के 30% से 55% तक रखी गई। यह दर क्षेत्र और भूमि की उपजाऊ शक्ति के अनुसार अलग-अलग होती थी। व्यवहार में यह दर अत्यधिक थी जो किसानों पर भारी बोझ बनती थी।

5. लगान न देने पर भूमि जब्त यदि कोई किसान निर्धारित लगान अदा नहीं कर पाता था तो उसकी भूमि जब्त की जा सकती थी। लेकिन यदि वह नियमित लगान देता रहे तो वह अपनी भूमि पर चिरकाल तक बना रह सकता था। यह व्यवस्था द्विधारी थी।

6. बंजर भूमि पर सरकारी नियंत्रण इस पद्धति में जो भूमि जोती नहीं जा रही थी (बंजर भूमि) उस पर सरकार का नियंत्रण बना रहता था। सरकार उसे जोतने की व्यवस्था कर सकती थी और उससे होने वाली आय में सरकार का हिस्सा होता था।

7. लगान छोड़ने का अधिकार इस व्यवस्था में किसान को यह भी अधिकार था कि यदि वह किसी कारणवश भूमि नहीं जोत सकता तो उचित नोटिस देकर उस भूमि या उसके किसी भाग को छोड़ सकता था। इससे सरकारी मालगुजारी जमा करने से बच सकता था।

8. मद्रास में महालवाड़ी अनुपयुक्त मुनरो ने मद्रास के लिए महालवाड़ी व्यवस्था को अनुचित माना क्योंकि वहाँ बंगाल जैसे बड़े ज़मींदार नहीं थे। मद्रास की परंपरागत व्यवस्था में किसान स्वयं भूमि के मालिक थे। इसलिए वहाँ रैय्यतवाड़ी व्यवस्था अधिक उपयुक्त थी।

1. ज़मींदारों का अंत इस व्यवस्था में ज़मींदारों जैसे मध्यस्थ वर्ग को समाप्त किया गया। किसान को सरकार से सीधे व्यवहार करना था। इससे ज़मींदारों द्वारा होने वाले शोषण से कुछ हद तक किसानों को राहत मिली। यह इसका सबसे बड़ा सैद्धांतिक लाभ था।

2. किसान की स्वतंत्रता सैद्धांतिक रूप से इस व्यवस्था में किसान अधिक स्वतंत्र था। वह अपनी भूमि का मालिक था और किसी ज़मींदार का नौकर नहीं। निजी संपत्ति के लाभ अधिकतम व्यक्तियों में वितरित हो सकते थे।

3. सरकार-किसान सीधा संबंध इस व्यवस्था में सरकार और किसान के बीच सीधा संपर्क था जिससे सरकारी नीतियों का किसान तक सीधा प्रभाव पहुंच सकता था। किसान सरकारी न्याय व्यवस्था और प्रशासन तक सीधे पहुंच सकते थे।

4. सरकार की लचीली आय चूंकि लगान स्थायी नहीं था, इसलिए कृषि के विकास और आय में वृद्धि होने पर सरकार लगान का पुनर्निर्धारण करके अपनी आय बढ़ा सकती थी। यह स्थायी बन्दोबस्त की तुलना में सरकार के लिए अधिक लाभकारी था।

5. बंजर भूमि का उपयोग बंजर भूमि पर सरकारी नियंत्रण होने से उसे कृषि योग्य बनाने की संभावना बनी रहती थी। इससे खेती का विस्तार हो सकता था और कृषि उत्पादन बढ़ सकता था। सरकार को इस भूमि से अतिरिक्त आय भी प्राप्त होती थी।

6. भूमि का अधिकार बना रहता था यदि किसान नियमित लगान देता रहे तो उसे भूमि से नहीं हटाया जा सकता था। इससे किसान में भूमि के प्रति स्थायित्व की भावना थी। वह भूमि में सुधार और निवेश करने के लिए प्रेरित हो सकता था।

7. ज़्यादा न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थायी बन्दोबस्त की तुलना में रैय्यतवाड़ी व्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण माना गया। इसमें हर किसान की भूमि का अलग मूल्यांकन होता था जिससे क्षमता के अनुसार लगान तय होने की संभावना थी।

1. अत्यंत महंगी व्यवस्था यह व्यवस्था ज़मींदारी लगान व्यवस्था से कहीं अधिक महंगी थी। प्रत्येक किसान की भूमि का अलग से सर्वेक्षण और लगान निर्धारण करना पड़ता था। इस पर सरकार को भारी खर्च करना पड़ता था।

2. प्रशासनिक बोझ में वृद्धि हर किसान से अलग समझौते के लिए बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारियों की आवश्यकता थी। राजस्व विभाग का विस्तार करना पड़ा और अन्य विभागों को भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जोड़ना पड़ा। इससे प्रशासन जटिल हो गया।

3. भ्रष्टाचार में वृद्धि इतने बड़े प्रशासनिक तंत्र में भ्रष्टाचार तेज़ी से बढ़ा। ब्रिटिश अधिकारियों ने कई बार वही स्थान ले लिया जो स्थायी बन्दोबस्त में ज़मींदार का था। भूमि सर्वेक्षण के दौरान घूस और बेईमानी आम बात हो गई।

4. गलत कर निर्धारण एक भाग की भूमि के आधार पर दूसरी भूमियों का भी लगान तय कर दिया जाता था। इससे कई बार भूमि की वास्तविक क्षमता से अधिक कर लगा दिया जाता था। किसानों पर अत्यधिक कर का बोझ असहनीय हो जाता था।

5. व्यवहार में लगान दर अत्यधिक उपज का 55% तक लगान लेना किसान के लिए बेहद कठिन था। सरकार लगातार अधिक राजस्व की तलाश में रहती थी। इससे किसान महाजनों से कर्ज लेने पर मजबूर हो गए और कर्ज के जाल में फंसते चले गए।

6. भूमि पर वास्तविक नियंत्रण नहीं हालांकि किसान को भूमि का मालिक माना गया, लेकिन सरकार जब चाहे लगान बढ़ा सकती थी। बार-बार लगान पुनर्निर्धारण से किसान की स्थिति अस्थिर रहती थी। वह दीर्घकालीन कृषि निवेश करने में हिचकिचाता था।

7. किसानों पर कर्ज का बोझ अत्यधिक लगान दर के कारण किसानों को बार-बार महाजनों से कर्ज लेना पड़ता था। धीरे-धीरे किसान कर्ज में डूबते गए और उनकी भूमि महाजनों के हाथ चली जाती थी। इस प्रकार व्यवहार में किसान भूमि के मालिक न रहकर भूमिहीन हो जाते थे।

8. सामाजिक असमानता इस व्यवस्था में भी धनी किसान और गरीब किसान के बीच खाई बढ़ती गई। धनी किसान अधिक भूमि अधिग्रहण करते गए जबकि गरीब किसान भूमिहीन मजदूर बनते गए। कृषि समाज में आर्थिक असमानता गहरी होती गई।

यह व्यवस्था मद्रास, बम्बई, असम, कुर्ग और बरार में लागू की गई। बॉम्बे प्रेसिडेंसी में इसे लागू करने का श्रेय एलफिन्स्टन, चैपलिन और विन्गेट को जाता है। यह संपूर्ण भारतीय भूखंड के 51% भाग में थी — सबसे अधिक क्षेत्र।

‘महाल’ एक फारसी शब्द है जिसका अर्थ जागीर या गाँव होता है। इस व्यवस्था में लगान का बन्दोबस्त अलग-अलग व्यक्तियों से नहीं बल्कि पूरे गाँव या महल के आधार पर किया जाता था। यह एक सामूहिक व्यवस्था थी।

इस व्यवस्था का विकास मध्य प्रांत, उत्तर-पश्चिमी प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) और पंजाब में हुआ। 1833 में मार्टिन बर्ड ने इसे उत्तर-पश्चिमी प्रांतों में व्यापक रूप से लागू किया।

1. गाँव के आधार पर समझौता महालवाड़ी व्यवस्था में लगान का समझौता किसी एक व्यक्ति से नहीं बल्कि सम्पूर्ण गाँव समुदाय के साथ किया जाता था। जो लोग सामूहिक रूप से गाँव के भूस्वामी होने का दावा करते थे, वे पूरे गाँव की ओर से सरकार से समझौता करते थे।

2. सामूहिक जिम्मेदारी पूरे गाँव का लगान एकसाथ निर्धारित होता था और फिर उसे गाँव के सभी निवासियों में उनकी भूमि के अनुपात में बाँटा जाता था। प्रत्येक किसान अपने हिस्से का लगान चुकाता था। यह सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना पर आधारित थी।

3. लम्बरदार / मुखिया की भूमिका गाँव के मुखिया या लम्बरदार को पूरे गाँव का प्रतिनिधि माना जाता था। वह सरकार के साथ बातचीत करता था और पूरे गाँव का लगान इकट्ठा करके सरकार को देता था। इस प्रकार उसे गाँव के लोगों पर काफी अधिकार प्राप्त हो गए।

4. द्विस्तरीय व्यवस्था यह व्यवस्था वास्तव में दो स्तरों पर काम करती थी — पहले सम्पूर्ण ग्राम समुदाय के साथ संयुक्त रूप से और दूसरे प्रत्येक व्यक्तिगत कृषक के भूस्वामित्व के साथ। यह इसकी सबसे विशिष्ट संरचनात्मक विशेषता थी।

5. परंपरा के अनुकूल महालवाड़ी व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता यह मानी गई कि यह भारत की परंपरागत ग्राम व्यवस्था के अनुकूल थी। भारत में सदियों से ग्राम समुदाय सामूहिक रूप से कार्य करते थे। यह व्यवस्था उसी परंपरा को आगे बढ़ाती प्रतीत होती थी।

6. निश्चित अवधि के लिए महालवाड़ी बन्दोबस्त स्थायी नहीं था। यह एक निश्चित अवधि के लिए होता था जिसके बाद पुनर्निर्धारण होता था। इससे सरकार को कृषि विकास के साथ-साथ अपनी आय बढ़ाने का अवसर मिलता था।

7. भूमि स्वामित्व की पहचान इस व्यवस्था में प्रत्येक किसान की भूमि का रिकॉर्ड रखा जाता था। भूमि अधिकारों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया। इससे भूमि विवादों में कमी आने की उम्मीद थी।

8. उत्तर भारत के लिए उपयुक्त उत्तर भारत में जहाँ ग्राम समुदाय की परंपरा मज़बूत थी और जहाँ बड़े ज़मींदारों की अपेक्षा सामूहिक भूस्वामित्व अधिक था, वहाँ यह व्यवस्था अपेक्षाकृत उपयुक्त थी। यही कारण है कि उत्तर-पश्चिमी प्रांत में इसे अपनाया गया।

1. सामूहिक भावना का सम्मान यह व्यवस्था भारत की सामूहिक ग्राम संस्कृति का सम्मान करती थी। गाँव के लोग मिलकर सरकार से व्यवहार करते थे। यह भारतीय परंपरा के अनुकूल थी और इससे ग्रामीण एकता बनी रहती थी।

2. सरकार की लचीली आय स्थायी बन्दोबस्त की तुलना में महालवाड़ी व्यवस्था में सरकार की आय लचीली थी। कृषि विकास के साथ सरकार लगान बढ़ा सकती थी। यह सरकार के दीर्घकालीन राजस्व हितों के लिए बेहतर था।

3. भूमि अधिकारों का स्पष्ट रिकॉर्ड इस व्यवस्था में भूमि का सर्वेक्षण और रिकॉर्ड रखने पर बल दिया गया। प्रत्येक किसान की भूमि का अभिलेख तैयार किया गया। इससे भूमि अधिकारों में स्पष्टता आई।

4. किसान को भूमि का अधिकार महालवाड़ी व्यवस्था में किसान अपनी जोती हुई भूमि का अधिकार रखता था। जब तक वह लगान देता रहे, उसे बेदखल नहीं किया जा सकता था। यह स्थायी बन्दोबस्त की तुलना में किसान के लिए बेहतर था।

5. गाँव की स्वायत्तता गाँव के भीतर लगान का बँटवारा स्वयं ग्रामीण मुखिया करते थे। इससे कुछ हद तक स्थानीय स्वशासन की भावना बनी रही। ग्राम पंचायत जैसी संस्थाओं को भी थोड़ा महत्व मिला।

1. मुखियाओं द्वारा शोषण इस व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि गाँव के मुखिया और लम्बरदार लगान वसूलने की आड़ में अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए किसानों का जमकर शोषण करते थे। वे अधिक लगान वसूल कर अंतर खुद रख लेते थे।

2. सामूहिक जिम्मेदारी का दुरुपयोग यदि गाँव का कोई किसान लगान नहीं दे पाता तो उसका बोझ अन्य किसानों पर पड़ता था। इससे पड़ोसियों के बीच कटुता और संघर्ष पैदा होता था। सामूहिक उत्तरदायित्व की व्यवस्था कमजोर किसानों के लिए अन्यायपूर्ण थी।

3. अत्यधिक कर बोझ मुखियाओं और सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से लगान दर वास्तविक भूमि क्षमता से अधिक निर्धारित की जाती थी। किसानों पर भारी कर बोझ था। कई बार किसान लगान चुकाने के लिए महाजनों से कर्ज लेते थे।

4. भ्रष्टाचार लगान निर्धारण और वसूली की प्रक्रिया में भ्रष्टाचार व्यापक था। सरकारी अधिकारी, मुखिया और महाजन मिलकर किसानों को लूटते थे। न्याय पाना साधारण किसान के लिए लगभग असंभव था।

5. ग्राम एकता का विनाश सामूहिक जिम्मेदारी के कारण यदि एक किसान लगान न दे पाए तो पड़ोसियों में आपसी झगड़े होते थे। इससे परंपरागत ग्रामीण एकता और सहयोग की भावना टूटती गई। ब्रिटिश राज में गाँव की आंतरिक एकता नष्ट होती चली गई।

6. भूमि सुधार का अभाव इस व्यवस्था में भी कृषि उत्पादकता बढ़ाने के प्रयास नगण्य रहे। सरकार का ध्यान केवल राजस्व वसूली पर था। भूमि सुधार, सिंचाई विकास और आधुनिक कृषि तकनीक की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया।

यह व्यवस्था उत्तर-पश्चिमी प्रांत (उत्तर प्रदेश), मध्य प्रांत (मध्यप्रदेश), पंजाब और कुछ अन्य क्षेत्रों में लागू की गई। यह संपूर्ण भारतीय भूखंड के लगभग 30% भाग में थी।

विशेषतास्थायी बन्दोबस्तरैय्यतवाड़ीमहालवाड़ी
किससे समझौताज़मींदारकिसानगाँव / महाल
लागू वर्ष17931820 (व्यापक)1833
प्रमुख व्यक्तिकार्नवालिसटॉमस मुनरोमार्टिन बर्ड
अवधिस्थायी3-10 वर्षनिश्चित अवधि
लाभ किसेज़मींदारसरकारमुखिया
क्षेत्र19%51%30%
प्रमुख दोषकिसान शोषणभ्रष्टाचारमुखिया शोषण
लागू क्षेत्रबंगाल, बिहार, उड़ीसामद्रास, बम्बईUP, पंजाब, MP

ब्रिटिश भू-राजस्व नीतियों ने भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था और कृषि पर दूरगामी नकारात्मक प्रभाव डाला। इन नीतियों को समझे बिना आधुनिक भारत का इतिहास अधूरा है।

1. कृषि व्यवस्था का विनाश ब्रिटिश भू-राजस्व नीतियों ने भारत की परंपरागत कृषि व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया। किसान जो सदियों से अपनी भूमि पर आत्मनिर्भर था, वह भूमिहीन मजदूर बन गया। कृषि उत्पादकता गिरती चली गई और खाद्यान्न संकट बढ़ता गया।

2. किसानों की दयनीय स्थिति तीनों व्यवस्थाओं में किसान का शोषण हुआ — कहीं ज़मींदार के हाथों, कहीं सरकारी अधिकारियों के हाथों और कहीं मुखियाओं के हाथों। किसान को कर्ज के दलदल में धंसना पड़ा। भूमिहीन किसानों की संख्या तेज़ी से बढ़ी।

3. ग्राम समुदाय का विघटन परंपरागत ग्राम समुदाय जो आत्मनिर्भर और सामूहिक था, ब्रिटिश नीतियों से टूट गया। गाँवों में आंतरिक सामंजस्य नष्ट हुआ। जाति और वर्ग के आधार पर विभाजन गहरा हुआ। ग्रामीण समाज की बुनियाद कमजोर पड़ी।

4. महाजनी शोषण का उदय अत्यधिक लगान के कारण किसान महाजनों से कर्ज लेने पर मजबूर हुए। धीरे-धीरे उनकी भूमि महाजनों के हाथ जाती रही। महाजनी व्यवस्था ने कृषि समाज पर पकड़ मजबूत की। इससे किसान एक नए प्रकार के शोषण का शिकार बना।

5. कृषि में निवेश का अभाव चूंकि सरकार का उद्देश्य केवल राजस्व वसूलना था, कृषि में निवेश — सिंचाई, बीज, उर्वरक, आधुनिक तकनीक — की कोई व्यवस्था नहीं थी। भूमि की उत्पादकता गिरती रही। 19वीं सदी में भारत में बार-बार अकाल पड़े जो इसी की परिणति थे।

6. किसान विद्रोहों को जन्म ब्रिटिश भू-राजस्व नीतियों की ज्यादतियों का एक बड़ा परिणाम था — किसान विद्रोहों की बाढ़। 1857 के महाविद्रोह में किसान और सैनिक दोनों शामिल थे। बंगाल में नील किसान आंदोलन (1859-60), दक्कन के किसान विद्रोह (1875) और अनेक अन्य विद्रोह इन नीतियों की प्रतिक्रिया थे।

7. धन का बहिर्गमन (Drain of Wealth) ब्रिटिश भू-राजस्व नीतियों से प्राप्त राजस्व का एक बड़ा हिस्सा भारत में खर्च न होकर इंग्लैंड भेजा जाता था। यह “धन का बहिर्गमन” था जो भारत को निरंतर गरीब बनाता रहा। दादाभाई नौरोजी ने इसे अपनी पुस्तक “Poverty and UnBritish Rule in India” में विस्तार से उजागर किया।

8. राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरणा अंततः इन शोषणकारी नीतियों ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को गहरी प्रेरणा दी। किसानों की दुर्दशा ने नेताओं को अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संगठित होने की शक्ति दी। गाँधीजी का चंपारण सत्याग्रह (1917) किसान आंदोलन का ही एक रूप था।

1. इजारेदारी व्यवस्था — 1772, वारेन हेस्टिंग्स वारेन हेस्टिंग्स ने 1772 में द्वैध शासन समाप्त कर इजारेदारी व्यवस्था लागू की। यह 5 वर्षों के लिए थी, 1777 में वार्षिक हो गई। यह व्यवस्था पूर्णतः असफल रही क्योंकि कर वसूलने वाले सट्टेबाज थे।

2. स्थायी बन्दोबस्त — 1793, लार्ड कार्नवालिस 1786 में आए लार्ड कार्नवालिस ने 1793 में स्थायी बन्दोबस्त लागू किया। लगान 3.75 करोड़ रुपये स्थायी रूप से तय। 19% भू-भाग में लागू। इसे इस्तमरारी बन्दोबस्त या ज़मींदारी बन्दोबस्त भी कहते हैं।

3. रैय्यतवाड़ी — 1792 (प्रारंभ), 1820 (व्यापक), टॉमस मुनरो सबसे पहले 1792 में कर्नल रीड ने बारामहल में लागू किया। 1820 में टॉमस मुनरो ने मद्रास में व्यापक रूप से लागू किया। 51% भू-भाग। लगान 30-55%। 3-10 वर्ष की अवधि।

4. महालवाड़ी — 1833, मार्टिन बर्ड 1833 में मार्टिन बर्ड ने उत्तर-पश्चिमी प्रांत में लागू किया। लगभग 30% भू-भाग। गाँव के आधार पर सामूहिक समझौता। लम्बरदार/मुखिया की केंद्रीय भूमिका।

5. बारामहल — पहली रैय्यतवाड़ी व्यवस्था 1792 में तमिलनाडु के बारामहल जिले में कर्नल रीड ने पहली बार रैय्यतवाड़ी व्यवस्था लागू की। यह एक प्रयोग था। बाद में टॉमस मुनरो ने इसे विस्तार दिया और मद्रास में इसे मुख्य व्यवस्था बनाया।

6. सूर्यास्त कानून (Sunset Law) स्थायी बन्दोबस्त के साथ सूर्यास्त कानून लागू हुआ। यदि ज़मींदार निश्चित तिथि के सूर्यास्त से पहले लगान नहीं देता तो उसकी ज़मींदारी नीलाम हो जाती। इससे पुराने ज़मींदार परिवार बर्बाद हुए।

7. अनुपस्थित ज़मींदारी (Absentee Landlordism) स्थायी बन्दोबस्त का एक दुष्परिणाम यह था कि ज़मींदार गाँव छोड़कर शहरों में बस गए। वे शहरों में विलासितापूर्ण जीवन जीते और बिचौलियों से लगान मँगवाते थे। इसे Absentee Landlordism कहा गया।

8. पिट्स इंडिया एक्ट 1784 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट ने कार्नवालिस को निर्देश दिया कि वह भारत में भू-राजस्व की समस्या हल करे। इसी के परिणामस्वरूप 1793 में स्थायी बन्दोबस्त लागू हुआ। यह एक्ट ब्रिटिश संसद का महत्वपूर्ण भारत-संबंधी कानून था।

ब्रिटिश सरकार की भू-राजस्व नीतियाँ भारत के इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दुखद अध्याय हैं। इलाहाबाद की प्रथम संधि से शुरू हुई इस यात्रा में वारेन हेस्टिंग्स की इजारेदारी व्यवस्था, कार्नवालिस का स्थायी बन्दोबस्त, मुनरो की रैय्यतवाड़ी व्यवस्था और मार्टिन बर्ड की महालवाड़ी व्यवस्था — सभी ने मिलकर भारतीय कृषि समाज को गहरी क्षति पहुंचाई।

1. राजस्व सर्वोपरि, किसान गौण इन सभी नीतियों का एकमात्र उद्देश्य कम्पनी और ब्रिटिश साम्राज्य के लिए अधिकतम राजस्व सुनिश्चित करना था। भारतीय किसान का कल्याण, कृषि का विकास, भूमि सुधार — ये सब कभी उनकी प्राथमिकता नहीं बनी। किसान केवल राजस्व का स्रोत था।

2. शोषण की त्रिस्तरीय व्यवस्था भारतीय किसान तीन स्तरों पर शोषण का शिकार था — सरकारी अधिकारी, ज़मींदार/मुखिया और महाजन। इस तिहरे शोषण ने किसान को कर्ज के दलदल में धकेला और उसकी भूमि छीन ली। कृषि समाज निरंतर गरीब और कमजोर होता चला गया।

3. सामाजिक संरचना पर प्रभाव इन नीतियों ने भारत की परंपरागत सामाजिक और आर्थिक संरचना को तोड़ दिया। ग्राम समुदाय विघटित हुए, जाति आधारित सामाजिक सेवाएं कमजोर पड़ीं और आर्थिक असमानता बढ़ती गई। एक ओर विलासिता में डूबे ज़मींदार थे, दूसरी ओर भूख से तड़पते किसान।

4. आर्थिक बर्बादी ब्रिटिश भू-राजस्व नीतियों ने भारत की अर्थव्यवस्था को खोखला कर दिया। भारत से निकाला गया धन इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति में लगा जबकि भारत आर्थिक पिछड़ेपन का शिकार बनता रहा। यह औपनिवेशिक शोषण का सबसे नग्न रूप था।

5. किसान विद्रोह और राष्ट्रीय जागृति इन नीतियों की प्रतिक्रिया में पूरे 19वीं सदी में किसान विद्रोह होते रहे। नील विद्रोह, दक्कन विद्रोह, संथाल विद्रोह — सभी इन शोषणकारी नीतियों की उपज थे। इन्होंने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को जनाधार और प्रेरणा दी।

6. स्वतंत्रता के बाद सुधार स्वतंत्र भारत में इन दोषपूर्ण नीतियों को समाप्त किया गया। ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम, भूमि सुधार कानून और हरित क्रांति इसी दिशा में उठाए गए कदम थे। लेकिन 200 वर्षों के औपनिवेशिक शोषण से हुई क्षति की भरपाई आसान नहीं थी।

7. परीक्षा की दृष्टि से सारांश स्थायी बन्दोबस्त (1793) = ज़मींदार को लाभ, सरकार को निश्चित आय, किसान को शोषण। रैय्यतवाड़ी (1820) = किसान से सीधा समझौता, 51% क्षेत्र, टॉमस मुनरो। महालवाड़ी (1833) = गाँव के आधार पर, 30% क्षेत्र, मार्टिन बर्ड। तीनों का उद्देश्य एक — अधिकतम राजस्व।

8. आधुनिक भारत की नींव इन भू-राजस्व नीतियों का अध्ययन हमें यह समझाता है कि आधुनिक भारत की गरीबी, भूमि समस्याएं और कृषि संकट की जड़ें औपनिवेशिक काल में हैं। इतिहास को समझना भविष्य की नीतियाँ बनाने के लिए आवश्यक है। यही कारण है कि यह विषय UPSC और अन्य परीक्षाओं में सदैव महत्वपूर्ण रहा है।

परीक्षा टिप्स: स्थायी बन्दोबस्त के लिए याद रखें — कॉर्नवालिस, 1793, 3.75 करोड़, 19%, ज़मींदारी | रैय्यतवाड़ी के लिए — मुनरो, 1820, 51%, किसान, 30-55% | महालवाड़ी के लिए — मार्टिन बर्ड, 1833, 30%, गाँव, लम्बरदार

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