सामाजिक व धार्मिक सुधार आंदोलन: पूरी जानकारी

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19वीं शताब्दी के सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन का आधुनिक भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस काल में भारतीय समाज जाति-प्रथा, अंधविश्वास, मूर्तिपूजा और सामाजिक कुरीतियों में जकड़ा हुआ था। सती प्रथा, बाल विवाह, पर्दा प्रथा और छुआछूत जैसी बुराइयाँ समाज को खोखला कर रही थीं। ब्रिटिश शासन के आगमन ने इन दुर्बलताओं को उजागर किया और भारतीय बुद्धिजीवियों में चेतना जगाई। इस प्रकार एक नए युग की शुरुआत हुई जिसे भारतीय पुनर्जागरण कहा जाता है।

19वीं सदी में भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के साथ पश्चिमी विचारों का प्रसार हुआ। अंग्रेजी शिक्षा, मुद्रण माध्यम और आधुनिक विज्ञान के विचारों ने भारतीय बुद्धिजीवियों को नई दृष्टि प्रदान की। इस नई दृष्टि से उन्होंने अपने धर्म और समाज की कुरीतियों की पहचान की। अंग्रेजों ने भारतीय समाज की बुराइयों की जमकर आलोचना की जिससे भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग को अपने धर्म और समाज की कमजोरियों का सामना करना पड़ा। इसी कारण सुधार आंदोलनों का जन्म हुआ।

इन सुधार आंदोलनों का नेतृत्व मुख्यतः नव-शिक्षित मध्यम वर्ग ने किया जो पश्चिमी ज्ञान से प्रभावित था। ये सुधारक न केवल धर्म में बल्कि समाज के हर पहलू में परिवर्तन चाहते थे। उन्होंने तर्क और बुद्धिवाद की कसौटी पर अपने धर्म और समाज को रखा। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह, जाति-समानता और धार्मिक एकेश्वरवाद जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी। इन आंदोलनों ने भारत में राष्ट्रवाद की नींव तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इन सुधार आंदोलनों को मुख्यतः दो भागों में बाँटा जा सकता है — सुधारवादी आंदोलन और पुनरुत्थानवादी आंदोलन। सुधारवादी आंदोलन पश्चिमी विचारों से प्रेरित थे और समाज में नई सोच लाना चाहते थे, जबकि पुनरुत्थानवादी आंदोलन भारत के प्राचीन गौरव को पुनः स्थापित करने का प्रयास करते थे। ब्रह्म समाज सुधारवादी था तो आर्य समाज पुनरुत्थानवादी। दोनों ही धाराओं ने मिलकर भारत में एक नई सामाजिक चेतना का निर्माण किया।

इन आंदोलनों ने भारत के राष्ट्रीय आंदोलन को एक मजबूत वैचारिक आधार प्रदान किया। महिलाओं की स्थिति में सुधार, दलितों के अधिकारों की रक्षा और शिक्षा के प्रसार ने भारतीय समाज को एकजुट किया। इन सुधारकों ने सिद्ध किया कि धर्म और समाज में परिवर्तन संभव है और यह परिवर्तन राष्ट्र की उन्नति के लिए आवश्यक है। इनके प्रयासों ने आधुनिक भारत की नींव रखी और स्वतंत्रता संग्राम को भी प्रभावित किया।

इन आंदोलनों का दूरगामी प्रभाव पड़ा। इन्होंने न केवल सामाजिक कुरीतियों को चुनौती दी बल्कि भारतीयों में आत्मसम्मान और राष्ट्रीय गौरव की भावना भी जगाई। इन आंदोलनों से प्रेरित होकर भारत सरकार ने सती निषेध अधिनियम, विधवा पुनर्विवाह अधिनियम और बाल विवाह निषेध अधिनियम जैसे महत्वपूर्ण कानून पारित किए। इस प्रकार इन सुधार आंदोलनों ने समाज, धर्म, राजनीति और कानून सभी क्षेत्रों में अमिट छाप छोड़ी।

राजा राममोहन राय का जन्म 1772 ई. में बंगाल के हुगली जिले के राधानगर गाँव में हुआ था। हालाँकि उनकी ब्रिस्टल (इंग्लैंड) स्थित समाधि पर जन्म वर्ष 1774 ई. अंकित है, जिसे प्रो. मैक्समूलर ने प्रमाणिक माना है। उन्हें ‘आधुनिक भारत का निर्माता’ और ‘भारतीय पुनर्जागरण का पिता’ कहा जाता है। उन्हें ‘प्रातःकालीन तारा’ और ‘सायंकालीन तारा’ दोनों उपाधियों से भी जाना जाता है। वे बुद्धिवाद और तार्किक सोच के प्रबल समर्थक थे।

राममोहन राय ने अनेक भाषाओं का ज्ञान अर्जित किया। उन्होंने पटना में फारसी और अरबी का अध्ययन किया जिससे सूफी दर्शन और कुरान को समझा। वाराणसी में संस्कृत का ज्ञान प्राप्त कर उन्होंने हिंदू उपनिषदों और वेदांत दर्शन का गहन अध्ययन किया। हिब्रू भाषा सीखकर उन्होंने बाइबल का भी अध्ययन किया। इस व्यापक भाषाई और धार्मिक अध्ययन ने उन्हें सभी धर्मों के आंतरिक अर्थ को समझने में मदद की।

राममोहन राय ने एकेश्वरवाद की विचारधारा को अपनाया और मूर्तिपूजा का कड़ा विरोध किया। उन्होंने 1809 ई. में ‘तुहफतुल मुवह्हिदीन’ नामक ग्रंथ की रचना की जिसका अर्थ है ‘एकेश्वरवादियों को उपहार’। इसमें उन्होंने बहुदेववाद, मूर्तिपूजा और कर्मकांड की तीव्र आलोचना की। 1820 ई. में उन्होंने ‘ईसा मसीह के उपदेश: शांति और सुख के मार्ग’ नामक पुस्तक प्रकाशित की जिसमें ईसा के आध्यात्मिक सिद्धांतों पर बल दिया गया। इससे ईसाई कट्टरपंथी नाराज हो गए।

राममोहन राय ने अनेक संस्थाओं की स्थापना की। 1814 ई. में ‘आत्मीय सभा’ और 1825 ई. में ‘वेदांत कॉलेज’ की स्थापना की। 1817 ई. में डेविड हेयर के साथ मिलकर कलकत्ता में हिंदू कॉलेज की स्थापना में सहयोग दिया। उन्होंने ‘संक्षिप्त वेदांत’ नामक ग्रंथ भी लिखा। अपनी पत्रिका ‘संवाद कौमुदी’ के माध्यम से उन्होंने सामाजिक सुधारों का प्रचार किया और जनमत तैयार किया। उन्होंने ‘मिरातुल अखबार’ नामक फारसी पत्रिका भी निकाली।

मुगल सम्राट अकबर द्वितीय ने राममोहन राय को ‘राजा’ की उपाधि प्रदान की और उन्हें पेंशन के सिलसिले में ब्रिटेन भेजा। 1833 ई. में ब्रिस्टल में उनका निधन हो गया। उनके विचारों का विरोध करने के लिए राधाकांत देव ने ‘धर्म सभा’ की स्थापना की और ‘चंद्रिका’ समाचार पत्र का संपादन किया। राममोहन राय ने ‘सम्वाद कौमुदी’ के माध्यम से जहाँ सुधारों का समर्थन किया वहीं ‘चंद्रिका’ ने सती प्रथा का समर्थन किया।

राजा राममोहन राय की सबसे बड़ी उपलब्धि सती प्रथा के विरुद्ध आंदोलन थी। उनके अथक प्रयासों के फलस्वरूप 1829 ई. में लॉर्ड विलियम बेंटिक के शासनकाल में अधिनियम 17 के तहत सती प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया गया। उन्होंने बाल विवाह, बहुविवाह और पर्दा प्रथा का भी विरोध किया। महिलाओं की शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में उनकी आवाज बुलंद रही। इस प्रकार राममोहन राय आधुनिक भारत के सच्चे निर्माता सिद्ध हुए।

राजा राममोहन राय ने 20 अगस्त 1828 ई. को कोलकाता में ‘ब्रह्म समाज’ की स्थापना की। इसका मूल नाम ‘ब्रह्म सभा’ था। इसके प्रथम महासचिव ताराचंद्र चक्रवर्ती थे। यह संस्था हिंदू धर्म और समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने के उद्देश्य से स्थापित की गई थी। ब्रह्म समाज ने एकेश्वरवाद का समर्थन किया और मूर्तिपूजा, कर्मकांड एवं जाति-भेद का विरोध किया।

ब्रह्म समाज के प्रमुख सिद्धांतों में एक ईश्वर की उपासना, मानवीय समानता और सामाजिक न्याय शामिल थे। इस संस्था ने यह मत अपनाया कि ईश्वर की उपासना के लिए किसी मध्यस्थ, पुजारी या मूर्ति की आवश्यकता नहीं है। इसने सभी धर्मों की एकता और सार्वभौमिक भाईचारे का संदेश दिया। ब्रह्म समाज ने वेदों और उपनिषदों के तार्किक और आध्यात्मिक पक्ष को मान्यता दी और रूढ़िवादी परंपराओं को अस्वीकार किया।

ब्रह्म समाज ने सामाजिक सुधारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसने महिलाओं की शिक्षा का समर्थन किया, सती प्रथा का विरोध किया और विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहन दिया। इसने बाल विवाह और बहुविवाह की प्रथाओं पर कड़ा प्रहार किया। जाति-भेद और छुआछूत के विरुद्ध भी आवाज उठाई। ब्रह्म समाज ने अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और आधुनिक शिक्षा संस्थानों की स्थापना में सहयोग दिया।

राममोहन राय के बाद द्वारकानाथ टैगोर ने कुछ समय तक ब्रह्म समाज का नेतृत्व किया। 1843 ई. में उनके पुत्र देवेंद्रनाथ टैगोर ने ब्रह्म समाज की बागडोर संभाली। देवेंद्रनाथ ने 1839 ई. में ‘तत्त्वबोधिनी सभा’ की स्थापना की थी और उसके माध्यम से ‘तत्त्वबोधिनी पत्रिका’ का प्रकाशन किया। ब्रह्म समाज का प्रतिज्ञापत्र तैयार करने का श्रेय देवेंद्रनाथ टैगोर को ही जाता है। उन्होंने ब्रह्म समाज के विचारों को संगठित और व्यवस्थित रूप प्रदान किया।

ब्रह्म समाज का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उसने भारतीय समाज में तर्क और बुद्धिवाद की परंपरा स्थापित की। इसने धर्म को अंधविश्वास और कर्मकांड से मुक्त कर एक आध्यात्मिक स्वरूप देने का प्रयास किया। ब्रह्म समाज का प्रभाव न केवल बंगाल में बल्कि समस्त भारत में फैला। इसने भारत के आधुनिकीकरण की दिशा में एक मजबूत कदम उठाया। इसके प्रभाव से अनेक सुधारक और संस्थाएँ उत्पन्न हुईं जिन्होंने भारतीय समाज को एक नई दिशा दी।

ब्रह्म समाज की एक बड़ी विशेषता यह थी कि यह भारत में पहला संगठित सामाजिक-धार्मिक आंदोलन था जिसने महिला सशक्तिकरण को अपनी प्राथमिकता बनाया। इसने विधवाओं के पुनर्विवाह और महिला शिक्षा को प्रोत्साहन दिया। इसने दिखाया कि धर्म के नाम पर होने वाले अत्याचारों का विरोध किया जा सकता है। ब्रह्म समाज ने पूरे भारत में नए विचारों का बीज बोया जो आगे चलकर राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में फला-फूला।

सती प्रथा भारत की सबसे क्रूर सामाजिक कुरीतियों में से एक थी जिसमें पति की मृत्यु के बाद विधवा को उसकी चिता के साथ जीवित जला दिया जाता था। यह प्रथा केवल ब्राह्मणों तक सीमित नहीं थी बल्कि अन्य जातियों में भी प्रचलित थी। 1795 ई. में कोलब्रुक ने सिद्ध करने का प्रयास किया कि सती प्रथा प्रामाणिक वैदिक परंपरा के अनुरूप नहीं है। इस प्रथा के विरुद्ध जन-आंदोलन खड़ा करना आवश्यक था।

राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के विरुद्ध सर्वाधिक प्रभावशाली आंदोलन चलाया। उन्होंने अपनी पत्रिका ‘संवाद कौमुदी’ के माध्यम से जनमत तैयार किया। उन्होंने धार्मिक और तर्कपूर्ण आधार पर सिद्ध किया कि सती प्रथा अमानवीय और धर्मसम्मत नहीं है। उनके इस आंदोलन के परिणामस्वरूप 1829 ई. में लॉर्ड विलियम बेंटिक के शासनकाल में अधिनियम 17 के अंतर्गत सती प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया गया। यह भारत में एक ऐतिहासिक सामाजिक सुधार था।

सती प्रथा उन्मूलन के साथ-साथ राममोहन राय ने महिला शिक्षा के लिए भी अनेक प्रयास किए। उन्होंने महिलाओं के लिए विद्यालय खोलने में सहयोग दिया और महिलाओं को संपत्ति के अधिकार दिलाने की वकालत की। उन्होंने बाल विवाह और बहुविवाह जैसी प्रथाओं का भी कड़ा विरोध किया। उनके इन प्रयासों ने भारतीय महिलाओं की स्थिति सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बाद के सुधारकों को प्रेरणा दी।

1856 ई. में ईश्वरचंद्र विद्यासागर के प्रयासों से लॉर्ड डलहौजी के शासनकाल में हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित हुआ। पहला विधवा विवाह 7 दिसंबर 1856 ई. को विद्यासागर की देखरेख में संपन्न हुआ। इसी प्रकार केशवचंद्र सेन के प्रयासों से 1872 ई. में ‘ब्रह्म मैरिज एक्ट’ पारित हुआ जिसमें बाल विवाह को प्रतिबंधित किया गया। इन सुधारों ने मिलकर भारत में सामाजिक न्याय की एक नई परंपरा स्थापित की।

बाल हत्या एक और भयावह सामाजिक कुरीति थी। सर्वप्रथम बनारस के रेजिडेंट जोनाथन डंकन ने इसे समाप्त करने का प्रयास किया। 1802 ई. में लॉर्ड वेलेजली के काल में अधिनियम 45 के रूप में बाल हत्या पर प्रतिबंध लगाया गया। दास प्रथा को 1843 ई. में लॉर्ड एलेनबरो के काल में अधिनियम 5 द्वारा समाप्त किया गया। कर्नल स्लीमैन ने ठगी प्रथा और लॉर्ड हार्डिंग ने नरबलि प्रथा को समाप्त किया।

इन सुधारों का दीर्घकालिक प्रभाव पड़ा। इन्होंने सिद्ध किया कि सरकार और समाज मिलकर कुरीतियों को समाप्त कर सकते हैं। इन सुधारों ने महिलाओं को सम्मान और अधिकार दिलाए। इनसे भारतीय समाज में प्रगतिशील सोच को बढ़ावा मिला। इन सुधारों की परंपरा आगे शारदा अधिनियम (1929) और स्वतंत्र भारत के संविधान में भी जारी रही जिसने समानता और न्याय को मूल अधिकारों में शामिल किया।

राममोहन राय की मृत्यु के बाद देवेंद्रनाथ टैगोर ने 1843 ई. में ब्रह्म समाज का नेतृत्व संभाला। उन्होंने ‘तत्त्वबोधिनी सभा’ (1839) के माध्यम से ब्रह्म समाज के विचारों का व्यापक प्रचार किया। उन्होंने ब्रह्म समाज का प्रतिज्ञापत्र तैयार किया और इसे एक सुव्यवस्थित संगठन का रूप दिया। बाद में उन्होंने केशवचंद्र सेन को भी इस संस्था से जोड़ा जो अत्यंत प्रतिभाशाली और उत्साही युवा नेता थे।

केशवचंद्र सेन के आने से ब्रह्म समाज में नई ऊर्जा का संचार हुआ। उनके प्रयासों से समाज का प्रचार बंगाल से बाहर पूरे भारत में फैला। उन्होंने 1870 ई. में ‘संगत सभा’ की स्थापना की। वे बाल विवाह के घोर विरोधी थे और उनके प्रयासों से 1872 ई. में ‘ब्रह्म मैरिज एक्ट’ (सिविल मैरिज एक्ट) पारित हुआ जिसमें विवाह के लिए लड़के की न्यूनतम आयु 18 और लड़की की 14 वर्ष निर्धारित की गई। उन्होंने ‘भारत दर्पण’ (Indian Mirror) और ‘सुलभ समाचार’ नामक समाचार पत्र भी निकाले।

1865 ई. में देवेंद्रनाथ टैगोर और केशवचंद्र सेन के बीच वैचारिक मतभेद उत्पन्न हुए और ब्रह्म समाज दो भागों में विभाजित हो गया। केशवचंद्र के नेतृत्व में ‘ब्रह्म समाज ऑफ इंडिया’ (भारतीय ब्रह्म समाज) और देवेंद्रनाथ के नेतृत्व में ‘आदि ब्रह्म समाज’ का गठन हुआ। यह विभाजन मुख्यतः धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं के अंतर के कारण हुआ। दोनों गुटों ने अपने-अपने तरीके से सुधार कार्य जारी रखा।

केशवचंद्र सेन के ब्रह्म समाज ऑफ इंडिया में भी 1878 ई. में विभाजन हुआ। इसका कारण था कि केशवचंद्र ने बाल विवाह का कट्टर विरोधी होने के बावजूद अपनी 13 वर्षीय पुत्री का विवाह कूच बिहार के महाराजा के साथ कर दिया। इस विरोधाभासी कदम से नाराज होकर आनंद मोहन बोस और शिवनारायण शास्त्री के नेतृत्व में ‘नव विधान सभा’ का गठन किया गया। विभाजन के बाद केशवचंद्र का गुट ‘साधारण ब्रह्म समाज’ के नाम से जाना गया।

इस प्रकार ब्रह्म समाज के बार-बार विभाजन से उसकी शक्ति क्षीण होती गई और उसका प्रभाव कम होता गया। तथापि ब्रह्म समाज का ऐतिहासिक महत्त्व अत्यंत बड़ा है। इसने भारत में पहली बार संगठित रूप से सामाजिक और धार्मिक सुधारों की माँग उठाई। इसके द्वारा उठाए गए मुद्दे — महिला शिक्षा, विधवा विवाह, बाल विवाह निषेध — आगे चलकर कानून का रूप ले सके।

आदि ब्रह्म समाज और भारतीय ब्रह्म समाज के बीच का मतभेद मूलतः यह था कि आदि ब्रह्म समाज वेदों की सत्ता को मानता था जबकि भारतीय ब्रह्म समाज सभी धर्मों को समान मानता था। देवेंद्रनाथ टैगोर उपनिषदों और वेदों से प्रेरित थे जबकि केशवचंद्र सार्वभौमिक मानवीय धर्म में विश्वास रखते थे। इन दोनों शाखाओं के अलग-अलग होने के बावजूद दोनों ने भारतीय समाज को जागरूक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यंग बंगाल आंदोलन की स्थापना 1826 ई. में हेनरी विवियन डेरोजियो ने की थी। डेरोजियो एक प्रगतिशील और क्रांतिकारी विचारक थे जो राजा राममोहन राय से भी अधिक आमूल परिवर्तन चाहते थे। राममोहन राय जहाँ भारत के आधुनिकीकरण के समर्थक थे वहीं डेरोजियो भारत का पूर्ण पश्चिमीकरण चाहते थे। उन्होंने अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए ‘बंगाल स्पेक्टेटर’ (Bengal Spectator) नामक समाचार पत्र का प्रकाशन किया।

डेरोजियो को आधुनिक भारत का प्रथम राष्ट्रवादी कवि माना जाता है। उन्होंने हिंदू कॉलेज, कलकत्ता में पढ़ाते हुए अपने विद्यार्थियों में तर्कशीलता, स्वतंत्र सोच और आलोचनात्मक दृष्टिकोण का संचार किया। उन्होंने छात्रों को यह प्रेरणा दी कि किसी भी विचार या परंपरा को बिना तर्क के स्वीकार न करें। उनके शिष्यों को ‘डेरोजियन्स’ कहा जाता था जो हिंदू धार्मिक रूढ़ियों और कुरीतियों के कड़े विरोधी थे।

डेरोजियो ने अपने विचारों के प्रसार के लिए अनेक संस्थाओं की स्थापना की। इनमें ‘सोसायटी फॉर द एक्विजिशन ऑफ जनरल नॉलेज’, ‘ऐंग्लो-इंडियन सोसायटी’, ‘बंग हित सभा’, ‘एकेडमिक एसोसिएशन’ और ‘डिबेटिंग क्लब’ प्रमुख थीं। इन संस्थाओं के माध्यम से उन्होंने बंगाल के युवाओं में नई सोच का संचार किया। उनके प्रयासों से बंगाल में एक नई बौद्धिक क्रांति का सूत्रपात हुआ।

यंग बंगाल आंदोलन की मुख्य कमजोरी यह थी कि इसने अत्यधिक पश्चिमीकरण का समर्थन किया और भारतीय परंपराओं का सर्वथा विरोध किया। इससे रूढ़िवादी हिंदू समाज में प्रतिक्रिया हुई और डेरोजियो को हिंदू कॉलेज से हटाना पड़ा। 1831 ई. में मात्र 22 वर्ष की आयु में डेरोजियो का निधन हो गया। उनके जाने के बाद आंदोलन की गति धीमी पड़ गई लेकिन उनके विचारों का प्रभाव दीर्घकाल तक बना रहा।

यंग बंगाल आंदोलन ने बंगाल में प्रेस की स्वतंत्रता, महिला शिक्षा और जाति प्रथा के उन्मूलन जैसे मुद्दों को उठाया। डेरोजियन्स ने हिंदू धर्म की कुरीतियों पर खुलकर प्रश्न उठाए। उन्होंने यह सिद्ध किया कि युवा पीढ़ी में परिवर्तन की शक्ति होती है। यद्यपि यह आंदोलन अल्पकालिक रहा किंतु इसने बंगाल में एक बौद्धिक जागृति का संचार किया जिसने आगे के सुधार आंदोलनों का मार्ग प्रशस्त किया।

डेरोजियो की महानता यह थी कि उन्होंने भारतीय युवाओं को सोचने और प्रश्न करने की शक्ति दी। उनका मानना था कि सच्चा ज्ञान तर्क और प्रश्न से आता है, न कि अंध-परंपरा से। उनके इस योगदान को भारतीय बौद्धिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। यंग बंगाल आंदोलन यद्यपि राममोहन राय के आंदोलन जितना व्यापक प्रभाव नहीं डाल पाया फिर भी यह भारतीय जागरण की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।

प्रार्थना समाज की स्थापना 1867 ई. में महाराष्ट्र में केशवचंद्र सेन की प्रेरणा से आत्माराम पांडुरंग ने की थी। यह मुख्यतः बंगाल के ब्रह्म समाज से प्रेरित था। इसके प्रमुख सदस्यों में महादेव गोविंद रानाडे, आर.जी. भंडारकर और नारायण चंद्रावरकर शामिल थे। इस समाज का उद्देश्य महाराष्ट्र में सामाजिक और धार्मिक सुधारों का प्रसार करना था। यह समाज जाति-प्रथा, पर्दा प्रथा, छुआछूत और बाल विवाह जैसी कुरीतियों का विरोध करता था।

प्रार्थना समाज का सर्वाधिक विकास महादेव गोविंद रानाडे के नेतृत्व में हुआ। रानाडे को ‘महाराष्ट्र का सुकरात’ कहा जाता है। वे न केवल एक सुधारक थे बल्कि एक महान विद्वान, न्यायाधीश और अर्थशास्त्री भी थे। रानाडे ने ‘विधवा पुनर्विवाह एसोसिएशन’ (Widow Remarriage Association) की स्थापना की। वे गोपाल कृष्ण गोखले के राजनीतिक गुरु थे और गोखले बाद में महात्मा गांधी और मुहम्मद अली जिन्ना के राजनीतिक गुरु बने।

प्रार्थना समाज ने विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया और इसके लिए जनमत तैयार करने में सक्रिय भूमिका निभाई। इसने महिलाओं की शिक्षा और उनके उत्थान के लिए कार्य किया। समाज ने ‘सुबोधिनी’ नामक पत्रिका का प्रकाशन किया। इसने ‘दलित उद्धार मिशन’ नामक संस्था की स्थापना कर निम्न जातियों के उत्थान का प्रयास किया। रानाडे के प्रयत्नों से ही ‘दक्कन एजुकेशन सोसायटी’ (Deccan Education Society) की स्थापना हुई जिसने महाराष्ट्र में शिक्षा के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

रानाडे की राजनीतिक सोच भी अत्यंत महत्वपूर्ण थी। उनका मानना था कि सामाजिक सुधार और राजनीतिक स्वतंत्रता एक-दूसरे से अविभाज्य हैं। उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था पर ब्रिटिश शोषण की आलोचना की। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘राइज ऑफ मराठा पावर’ इतिहास की एक महत्वपूर्ण कृति है। रानाडे ने दिखाया कि एक सुधारक केवल धार्मिक या सामाजिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रह सकता; उसे राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में भी सक्रिय होना होगा।

प्रार्थना समाज ने जाति-प्रथा का विरोध करते हुए यह संदेश दिया कि सभी मनुष्य जाति और धर्म से ऊपर हैं। इसने अंतरजातीय विवाह और सहभोज का समर्थन किया। इसके प्रभाव से महाराष्ट्र में एक नई सामाजिक चेतना का उदय हुआ। प्रार्थना समाज ने दिखाया कि धार्मिक सुधार के बिना सामाजिक सुधार संभव नहीं है और दोनों को साथ चलना होगा।

प्रार्थना समाज का प्रभाव महाराष्ट्र से बाहर भी फैला। इसने आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में भी सुधार आंदोलनों को प्रेरित किया। मोहम्मद अली जिन्ना ने गोखले को ‘ऋषि’ कहकर पुकारा और खुद को ‘मुस्लिम गोखले’ बनाने की इच्छा व्यक्त की। इससे स्पष्ट होता है कि प्रार्थना समाज और रानाडे के विचारों का प्रभाव सांप्रदायिक सीमाओं से परे था और इसने भारतीय एकता की भावना को मजबूत किया।

थियोसोफिकल सोसायटी की स्थापना 1875 ई. में न्यूयॉर्क (अमेरिका) में कर्नल एच.एस. ऑल्काट और मैडम पी. ब्लावत्स्की ने की थी। ‘थियोसोफी’ शब्द दो यूनानी शब्दों ‘थियोस’ (ईश्वर) और ‘सोफिया’ (ज्ञान) से मिलकर बना है जिसका अर्थ है ‘ईश्वरीय ज्ञान‘। संस्कृत में इसे ‘ब्रह्मविद्या’ कहते हैं। इस सोसायटी के दर्शन और सिद्धांत मुख्यतः ब्राह्मण और बौद्ध धर्म के ग्रंथों से प्रभावित थे।

थियोसोफिस्टों का कर्म, पुनर्जन्म, मोक्ष और निर्वाण जैसे भारतीय दर्शन के सिद्धांतों में दृढ़ विश्वास था। इन्होंने रूढ़िवादी परंपराओं के अनुसार हिंदू धर्म की व्याख्या की। इस सोसायटी के दोनों संस्थापक 1879 ई. में स्वामी दयानंद सरस्वती के आमंत्रण पर भारत आए। 1882 ई. में उन्होंने मद्रास के निकट अड्यार को अपना मुख्यालय बनाया जो आज भी थियोसोफिकल सोसायटी का अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय है।

1893 ई. में एनी बेसेंट थियोसोफिकल सोसायटी के विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए भारत आईं। वे मूलतः आयरलैंड की निवासी थीं। एनी बेसेंट ने भारत को अपनी कर्मभूमि बनाया और भारतीय संस्कृति को विश्व में सम्मान दिलाने का कार्य किया। 1898 ई. में उन्होंने बनारस में ‘सेंट्रल हिंदू स्कूल’ की स्थापना की जो 1915-16 ई. में मदन मोहन मालवीय के प्रयासों से ‘बनारस हिंदू विश्वविद्यालय’ में परिवर्तित हो गया।

एनी बेसेंट ने कांग्रेस के किसी भी अधिवेशन की अध्यक्षता करने वाली पहली महिला होने का गौरव प्राप्त किया। 1917 ई. में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन की उन्होंने अध्यक्षता की। उन्होंने भारतीय स्वशासन (Home Rule) आंदोलन का भी नेतृत्व किया और ‘होम रूल लीग’ की स्थापना की। उन्होंने ‘न्यू इंडिया’ और ‘कॉमनवील’ नामक समाचार पत्र निकाले जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख मुखपत्र बने।

थियोसोफिकल सोसायटी का भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह था कि इसने पश्चिमी लोगों को भारतीय दर्शन, धर्म और संस्कृति की महानता से परिचित कराया। इसने भारतीयों में अपनी सभ्यता के प्रति गर्व की भावना जगाई। इसने दिखाया कि भारतीय दर्शन — वेदांत, बौद्ध दर्शन — विश्व स्तर पर श्रेष्ठ है। इससे भारतीयों में आत्मसम्मान और राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ।

थियोसोफिकल सोसायटी के तीन प्रमुख उद्देश्य थे: सार्वभौमिक भाईचारे की स्थापना, प्राचीन धर्मों और दर्शनों का तुलनात्मक अध्ययन और प्रकृति के अज्ञात नियमों की खोज। इस सोसायटी ने हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म की उत्कृष्टता को विश्व के सामने रखा। एनी बेसेंट के नेतृत्व में सोसायटी का प्रभाव बढ़ा और यह भारतीय राजनीतिक जागरण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई।

स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 1824 ई. में गुजरात के काठियावाड़ में एक सम्पन्न ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम मूलशंकर था। विवाह की तय तिथि से लगभग एक सप्ताह पूर्व उन्होंने घर छोड़ दिया और आध्यात्मिक खोज में निकल पड़े। 1860 ई. में मथुरा के स्वामी विरजानंद से उनकी भेंट हुई जो उनके गुरु बने। गुरु की प्रेरणा से दयानंद ने भारत में धार्मिक और सामाजिक सुधार का बीड़ा उठाया।

स्वामी दयानंद सरस्वती ने 10 अप्रैल 1875 ई. को बंबई के माणिकचंद्र जी की वाटिका में ‘आर्य समाज’ की स्थापना की। इसका मुख्य नारा था — ‘वेदों की ओर लौटो’। 1877 ई. में लाहौर में इसकी शाखा स्थापित हुई जो आगे चलकर इस समाज का मुख्य केंद्र बन गई। आर्य समाज ने मूर्तिपूजा, बहुदेववाद, जाति-भेद, बाल विवाह और पर्दा प्रथा का कड़ा विरोध किया। इसने वेदों को सर्वोच्च धार्मिक प्राधिकारी माना।

स्वामी दयानंद ने 1874 ई. में ‘सत्यार्थ प्रकाश’ नामक अपनी सर्वाधिक प्रसिद्ध पुस्तक हिंदी में लिखी। केशवचंद्र सेन की सलाह पर उन्होंने संस्कृत के स्थान पर हिंदी को अपने प्रचार का माध्यम बनाया। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ को ‘आर्य समाज का बाइबल’ कहा जाता है। उन्होंने ‘पाखंड खंडिनी पताका’ लहराई और झूठे धर्मों का खंडन किया। उन्होंने ‘भारत भारतीयों के लिए’ का नारा दिया।

स्वामी दयानंद भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ‘स्वराज्य’ शब्द का प्रयोग किया। उन्होंने अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में कहा कि “विदेशी शासन चाहे कितना ही अच्छा क्यों न हो, स्वशासन उससे भी अच्छा है।” सर वैलेंटाइन शिरॉल ने आर्य समाज को ‘भारतीय अशांति का जनक’ कहा। दयानंद को ‘भारत का मार्टिन लूथर किंग’ कहा जाता है। उन्होंने 1882 ई. में ‘गौरक्षिणी सभा’ की भी स्थापना की।

दयानंद ने ‘शुद्धि आंदोलन’ चलाया जिसका उद्देश्य अन्य धर्मों में परिवर्तित हिंदुओं को पुनः हिंदू धर्म में वापस लाना था। यह आंदोलन एक प्रकार से धर्म परिवर्तन का प्रतिकार था। आर्य समाज ने दलितों की शिक्षा और उत्थान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आर्य समाज को ‘सैनिक हिंदुत्व’ (Militant Hinduism) भी कहा जाता है क्योंकि इसने हिंदू धर्म की रक्षा के लिए आक्रामक रवैया अपनाया।

स्वामी दयानंद की मृत्यु 1883 ई. में अजमेर में विष प्रयोग के कारण हुई। उनकी मृत्यु के बाद उनके अनुयायियों में शिक्षा पद्धति को लेकर मतभेद उत्पन्न हुए। 1887 ई. में लाला हंसराज ने लाहौर में ‘दयानंद एंग्लो वैदिक स्कूल’ की स्थापना की जहाँ पश्चिमी शिक्षा पद्धति अपनाई गई। 1902 ई. में लेखराम और मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानंद) ने हरिद्वार के निकट ‘गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय’ की स्थापना की जहाँ प्राचीन गुरुकुल पद्धति से शिक्षा दी जाती थी।

रामकृष्ण परमहंस का मूल नाम गदाधर चट्टोपाध्याय था। वे बहुत कम उम्र में कलकत्ता के निकट दक्षिणेश्वर स्थित काली माता के मंदिर के पुजारी बन गए। ‘तोतापुरी’ नामक महान वेदांतिक साधु ने उन्हें वेदांत साधना सिखाई। रामकृष्ण ज्ञान की अपेक्षा चरित्र निर्माण पर अधिक बल देते थे। उनका मत था कि संसार में रहते हुए भी इच्छाओं को ईश्वर प्राप्ति में लगाया जा सकता है। उन्होंने सर्व धर्म समभाव का संदेश दिया।

स्वामी विवेकानंद का बचपन का नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। उनका जन्म 12 जनवरी 1853 ई. को कलकत्ता के एक धनी क्षत्रिय परिवार में हुआ था। प्रारंभ में वे रामकृष्ण परमहंस के विचारों से प्रभावित नहीं थे किंतु बाद में उनके शिष्य बन गए। खेतड़ी के महाराजा मंगल सिंह (अजित सिंह) के निवेदन पर वे शिकागो जाने के लिए तैयार हुए। खेतड़ी के महाराजा की सलाह पर ही उन्होंने अपना नाम बदलकर ‘स्वामी विवेकानंद’ रखा।

शिकागो में 11 सितंबर 1893 ई. को विश्व धर्म संसद (First Parliament of Religion) का आयोजन हुआ। विवेकानंद 31 मई 1893 ई. को बंबई से पेनिन्सुलर जहाज पर रवाना हुए। कोलंबस हाल में जब उनकी बारी आई तो उन्होंने ‘मेरे प्रिय भाइयो और बहनों’ से अपना भाषण प्रारंभ किया जिससे श्रोतागण अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने भारतीय दर्शन की आध्यात्मिक गहराइयों को पूरे विश्व के सामने रखा। रोम्याँ रोलां ने उनके भाषण को ‘ज्वाला की दहक’ कहा।

शिकागो सम्मेलन में विवेकानंद ने कहा — “जिस प्रकार विश्व की विभिन्न नदियाँ समुद्र में जाकर एक हो जाती हैं, उसी प्रकार विश्व के विभिन्न धर्म एक ही चरम सत्य तक पहुँचने के भिन्न-भिन्न मार्ग हैं।” फरवरी 1895 ई. में उन्होंने न्यूयॉर्क में ‘वेदांत सोसायटी’ की स्थापना की। 1897 ई. में उन्होंने कलकत्ता के वेलूर में ‘रामकृष्ण मिशन’ की स्थापना की। इस मिशन का उद्देश्य व्यावहारिक वेदांत का प्रचार-प्रसार और समाज सेवा था।

आयरलैंड की मारग्रेट नोबुल स्वामी विवेकानंद के विचारों से प्रभावित होकर भारत आईं। स्वामीजी ने उनका नाम ‘सिस्टर निवेदिता’ रखा और उन्हें रामकृष्ण मिशन का प्रधान बनाया। सिस्टर निवेदिता ने ‘द वे ऑफ इंडिया लाइफ’ नामक पुस्तक लिखी। सुभाष चंद्र बोस ने स्वामी विवेकानंद को ‘आधुनिक राष्ट्रीय आंदोलन का आध्यात्मिक पिता’ कहा। सिस्टर निवेदिता ने उन्हें ‘योद्धा संन्यासी’ की उपाधि दी।

स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को प्रेरणा दी: “उठो, जागो और चलो, तब तक चलो जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।” उन्होंने कहा — “हमारा धर्म रसोईघर में बंद है।” 1902 ई. में पेरिस में हुए दूसरे धर्म सम्मेलन में भी उन्होंने भाग लिया। मात्र 39 वर्ष की अल्पायु में 1902 ई. में उनका निधन हो गया। उनके विचार आज भी भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं। रामकृष्ण मिशन आज भी देश-विदेश में शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा का कार्य करता है।

राधास्वामी सत्संग की स्थापना 1861 ई. में डॉ. शिवदयाल सिंह (तुलसीराम) ने की थी। ‘राधास्वामी’ का शाब्दिक अर्थ है राधा के पति अर्थात् श्रीकृष्ण और ‘सत्संग’ का अर्थ है अच्छे व्यक्ति की संगति। किंतु वास्तव में इस समाज का श्रीकृष्ण से कोई संबंध नहीं है। यह एक गुरु-परंपरा पर आधारित आध्यात्मिक आंदोलन है जिसमें गुरु को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है। इस सत्संग की शुरुआत 1861 ई. में आगरा के पन्नी गली के पीपल मंडी से हुई थी।

डॉ. शिवदयाल सिंह को ‘राधास्वामी दयाल’ और ‘स्वामी जी महाराज’ जैसी उपाधियों से सम्मानित किया गया। उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों में आत्मा का शुद्धिकरण, नाम जप और गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा प्रमुख हैं। राधास्वामी सत्संग का मुख्यालय आगरा के समीप ‘दयालबाग’ में है। दयालबाग की स्थापना 20 जनवरी 1915 ई. को हुजूर साहब जी महाराज ने की थी। इस सत्संग की मुख्य पुस्तक ‘सारबचन‘ है।

राधास्वामी सत्संग ने जाति और धर्म के भेद से ऊपर उठकर मानवीय एकता का संदेश दिया। इसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सभी वर्गों के लोग सम्मिलित हुए। इस सत्संग ने समाज में नैतिकता, शाकाहार, संयम और गुरु-भक्ति पर बल दिया। इसने साधारण जनमानस को एक सरल आध्यात्मिक मार्ग प्रदान किया। दयालबाग में आज भी एक विकसित शैक्षणिक और औद्योगिक संस्था के रूप में यह सत्संग सक्रिय है।

राधास्वामी सत्संग के पत्र-पत्रिकाओं में ‘प्रेम प्रचारक’ और ‘दयालबाग हेराल्ड’ महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इस सत्संग के महापुरुषों की वाणी और संकलन को ‘वचन’ कहा जाता है। 1961 ई. में राधास्वामी सत्संग की स्थापना का शताब्दी वर्ष समारोह मनाया गया। इस सत्संग की देश-विदेश में अनेक शाखाएँ हैं और इसके लाखों अनुयायी हैं।

राधास्वामी सत्संग की विशेषता यह है कि यह किसी विशेष धर्म से बंधा नहीं है। यह एक सार्वभौमिक आध्यात्मिक आंदोलन है जो मानव-मात्र की भलाई के लिए प्रतिबद्ध है। इस सत्संग ने यह संदेश दिया कि ईश्वर प्राप्ति के लिए किसी बाहरी आडंबर की नहीं बल्कि गुरु की कृपा और आंतरिक साधना की आवश्यकता है। इसने 19वीं और 20वीं शताब्दी में उत्तर भारत में एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक आंदोलन के रूप में अपनी पहचान बनाई।

राधास्वामी सत्संग ने 19वीं शताब्दी में भारत के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों में एक अनूठी भूमिका निभाई। अन्य आंदोलनों की तरह यह राजनीतिक नहीं था बल्कि शुद्ध आध्यात्मिक और नैतिक सुधार पर केंद्रित था। इसने सामाजिक विषमताओं को समाप्त करने और मानवीय गरिमा स्थापित करने में योगदान दिया। दयालबाग में स्थापित शिक्षण संस्थाएँ और उद्योग इस सत्संग की सामाजिक प्रतिबद्धता के प्रमाण हैं।

सत्यशोधक समाज की स्थापना 1873 ई. में पुणे में ज्योतिबा फूले ने की थी। ज्योतिबा फूले जाति के माली थे जिन्होंने ब्राह्मण वर्चस्व और उच्च जातियों के शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में पुणे जैसे कट्टरता के गढ़ में सामाजिक विषमताओं के खिलाफ अकेले संघर्ष किया। इस समाज ने यह माना कि ईश्वर एक है और प्रत्येक मनुष्य को उसकी भक्ति का अधिकार है बिना किसी पुजारी या मध्यस्थ के।

सत्यशोधक समाज के प्रमुख सिद्धांत थे: ईश्वर एक है; कोई भी ग्रंथ ईश्वर प्रणीत नहीं है; ईश्वर शारीरिक रूप में अवतार धारण नहीं करता; पुनर्जन्म, कर्मकांड और जप-तप अज्ञानमूलक हैं। इस समाज ने ब्राह्मण वर्चस्व और जाति-व्यवस्था को मूल रूप से चुनौती दी। इसने निम्न जातियों को यह संदेश दिया कि उनकी गरीबी और पिछड़ापन उनके जन्म का दोष नहीं बल्कि सामाजिक शोषण का परिणाम है।

ज्योतिबा फूले ने ‘गुलामगिरी’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी जिसमें उन्होंने दलितों की दयनीय स्थिति को उजागर किया। 1885 ई. में उन्होंने ‘सतसार’ नामक पत्रिका प्रकाशित की। ‘कैफियत’ नामक पुस्तिका में अस्पृश्यता की त्रासदी का वर्णन किया। उन्होंने ‘Who were the Shudras’ नामक एक महत्वपूर्ण पुस्तक भी लिखी। उनकी पत्नी सावित्रीबाई फूले ने महिला शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी कार्य किया और भारत की पहली महिला शिक्षिका बनीं।

ज्योतिबा फूले को ‘महात्मा’ की उपाधि उनके जीवनकाल में ही दी गई। उन्होंने 1848 ई. में पुणे में लड़कियों के लिए पहला विद्यालय खोला। उन्होंने निम्न जातियों और महिलाओं की शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण हथियार माना। उनके इन प्रयासों ने डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे महान दलित नेताओं को प्रेरणा दी। फूले का मानना था कि जब तक जाति-व्यवस्था जड़ से समाप्त नहीं होती, भारत का विकास संभव नहीं है।

सत्यशोधक समाज ने बिना किसी पुजारी या कर्मकांड के विवाह संस्कार की परंपरा शुरू की। इस समाज ने दलित और पिछड़े वर्गों में शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाई। इसने यह भी सिद्ध किया कि सामाजिक सुधार केवल ऊँची जातियों का कार्य नहीं है बल्कि पीड़ित जातियाँ स्वयं भी अपना उद्धार कर सकती हैं। फूले का यह दृष्टिकोण बाद के दलित आंदोलनों का आधार बना।

ज्योतिबा फूले का विचार था कि ब्राह्मणवाद ने न केवल दलितों बल्कि महिलाओं को भी शोषित किया। इसलिए उन्होंने महिलाओं और दलितों के उत्थान को साथ-साथ अपना लक्ष्य बनाया। उनकी इस समग्र सोच ने भारतीय सामाजिक न्याय आंदोलन को एक नया आयाम दिया। 1890 ई. में उनके निधन के बाद भी उनके विचार जीवित रहे और आज भी दलित आंदोलन के प्रमुख स्रोत हैं।

श्री नारायण गुरु ने केरल में जाति प्रथा के विरोध में एक शक्तिशाली आंदोलन चलाया। उनका प्रसिद्ध नारा था — “एक धर्म, एक ईश्वर और एक जाति।” केरल में छुआछूत की समस्या अत्यंत गहरी थी। वहाँ एझवा नामक अछूत जाति के लोगों को सवर्णों से निश्चित दूरी बनाकर चलना पड़ता था। नारायण गुरु ने इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठाई और दलितों को सम्मान और अधिकार दिलाने का संकल्प लिया।

वैकोम आंदोलन (1924-25 ई.) त्रावणकोर के वैकोम गाँव से प्रारंभ हुआ। इस आंदोलन का मुख्य मुद्दा मंदिरों में दलितों का प्रवेश और सार्वजनिक सड़कों पर चलने का अधिकार था। इस आंदोलन में टी.के. माधवन और कुमारन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रमुख सामाजिक सुधारक ई.वी. रामास्वामी नायकर (पेरियार) ने स्वयं इस आंदोलन में भाग लिया और जेल गए। ‘पेरियार’ का अर्थ होता है ‘विजयी’ या ‘महान’

वैकोम आंदोलन को पूरे देश का समर्थन मिला। महात्मा गांधी ने भी इस आंदोलन को अपना समर्थन दिया। लगभग दो वर्षों तक चले इस आंदोलन के बाद एझवा जाति के लोगों को मंदिर की सड़क पर चलने का अधिकार मिला। हालाँकि मंदिरों में प्रवेश अभी भी वर्जित रहा। फिर भी यह आंदोलन दलित अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।

ई.वी. रामास्वामी नायकर (पेरियार) ने 1925 ई. में ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ (Self Respect Movement) चलाया। इस आंदोलन ने ब्राह्मण वर्चस्व और धार्मिक पाखंड के विरुद्ध तमिलनाडु में एक बड़ा जनआंदोलन खड़ा किया। पेरियार ने महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए निरंतर संघर्ष किया। उनके विचार द्रविड़ आंदोलन के आधार बने और आगे चलकर तमिलनाडु की राजनीति पर गहरा प्रभाव डाला।

गुरुवायुर सत्याग्रह (1931-32 ई.) भी मंदिर प्रवेश को लेकर केरल में चलाया गया था। इसका नेतृत्व के. केलप्पन, कृष्ण पिल्लई और ए.के. गोपालन ने किया। यह आंदोलन वैकोम सत्याग्रह की अगली कड़ी थी और इसे भी गांधी जी का समर्थन प्राप्त था। ए.के. गोपालन ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि यद्यपि मंदिर के दरवाजे दलितों के लिए तब भी बंद थे फिर भी यह आंदोलन समाज के लिए प्रेरणादायी था।

श्री नारायण गुरु की महानता यह थी कि उन्होंने दलितों को एक धार्मिक और आध्यात्मिक आधार प्रदान किया। उन्होंने अनेक मंदिरों की स्थापना की जो सभी जातियों के लिए खुले थे। उन्होंने शिक्षा और आत्मनिर्भरता को दलित उत्थान का मार्ग बताया। उनके दर्शन ने केरल के सामाजिक जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाए। उनकी शिक्षाएँ आज भी केरल में सामाजिक न्याय के प्रतीक के रूप में सम्मानित हैं।

डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर महार जाति से थे और उनका जन्म 14 अप्रैल 1891 ई. को हुआ था। वे भारत के सबसे बड़े दलित नेता और संविधान निर्माता के रूप में प्रसिद्ध हैं। उन्होंने अपने जीवन में जाति-भेद और छुआछूत का स्वयं भोगा और उसके विरुद्ध आजीवन संघर्ष किया। वे कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स से उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले पहले दलित थे।

1924 ई. में अंबेडकर ने ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ की स्थापना की जिसने दलितों के हितों के लिए कार्य किया। इसी वर्ष उन्होंने ‘अखिल भारतीय दलित वर्ग संघ’ और ‘अखिल भारतीय दलित वर्ग परिषद’ जैसी संस्थाओं की भी नींव रखी। बहिष्कृत हितकारिणी सभा ने ‘बहिष्कृत भारत’ नामक समाचार पत्र भी प्रकाशित किया। इन संस्थाओं के माध्यम से दलितों में शिक्षा, जागरूकता और संगठन का कार्य किया गया।

अंबेडकर ने दलितों के लिए मंदिर प्रवेश और सार्वजनिक जल-स्रोतों के उपयोग के अधिकार के लिए सत्याग्रह किए। 1927 ई. में महाड़ सत्याग्रह में उन्होंने दलितों को सार्वजनिक तालाब का उपयोग करने का अधिकार दिलाया। 1930 ई. में नासिक में कालाराम मंदिर सत्याग्रह के माध्यम से उन्होंने मंदिर प्रवेश के अधिकार की माँग की। इन आंदोलनों ने दलितों में एक नई चेतना और आत्मसम्मान का भाव जगाया।

गांधी जी ने 1932 ई. में ‘अखिल भारतीय हरिजन सेवक संघ’ की स्थापना की और ‘हरिजन’ नामक साप्ताहिक पत्रिका निकाली। ‘हरिजन’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग गांधी जी ने किया था। 1931 ई. में बी.आर. शिंदे ने ‘Depressed Classes Mission Society of India’ की स्थापना की। ‘आदिवासी’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग ठक्कर बापा ने किया था। गांधी और अंबेडकर के बीच दलित प्रतिनिधित्व को लेकर ‘पूना पैक्ट’ (1932) हुआ।

1935 ई. में अंबेडकर ने घोषणा की कि वे हिंदू धर्म में मरना नहीं चाहते। उन्होंने अनेक वर्षों के अध्ययन के बाद 14 अक्टूबर 1956 ई. को नागपुर में लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया। उनकी प्रसिद्ध पुस्तकों में ‘जाति का विनाश’, ‘बुद्ध और कार्ल मार्क्स’, ‘अछूत कौन और क्यों’ प्रमुख हैं। भारतीय संविधान का निर्माण करके उन्होंने दलितों और वंचितों को कानूनी समानता और सामाजिक न्याय का अधिकार दिलाया।

डॉ. अंबेडकर का मानना था कि जाति-व्यवस्था केवल धार्मिक नहीं बल्कि आर्थिक और राजनीतिक समस्या भी है। उन्होंने दलितों को शिक्षित, संगठित और संघर्षशील बनने का आह्वान किया। उन्होंने कहा — “शिक्षित बनो, संगठित बनो, संघर्ष करो।” उनके इस संदेश ने दलित समाज में एक क्रांतिकारी परिवर्तन लाया। आज भी डॉ. अंबेडकर करोड़ों दलितों के आदर्श और प्रेरणास्रोत हैं।

वहाबी आंदोलन 1820-70 ई. के बीच चला था। अरब में इस आंदोलन को प्रारंभ करने का श्रेय अब्दुल वहाब को जाता है। भारत में इसे प्रचारित करने का श्रेय सैयद अहमद राय बरेलवी को है। भारत में इस आंदोलन ने प्रारंभ में पश्चिमोत्तर क्षेत्र को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया। इस आंदोलन का प्रारंभिक उद्देश्य मुस्लिम समाज और धर्म में सुधार करना था और इस्लाम को उसके मूल स्वरूप में वापस लाना था।

वहाबी आंदोलन ने मुस्लिम धर्म में व्याप्त अंधविश्वासों, कुरीतियों और पश्चिमी प्रभाव के विरुद्ध आवाज उठाई। इसने इस्लाम के मूल सिद्धांतों — तौहीद (एकेश्वरवाद) — पर बल दिया और मुसलमानों को सूफी पीरों की दरगाहों पर श्रद्धा करने जैसी प्रथाओं से दूर रहने को कहा। प्रारंभ में यह एक शुद्ध धार्मिक सुधार आंदोलन था किंतु बाद में अंग्रेजों के विरुद्ध एक राजनीतिक आंदोलन बन गया।

1831 ई. में बालाकोट के युद्ध में सैयद अहमद बरेलवी एक संघर्ष के दौरान मारे गए। उनकी मृत्यु के बाद वहाबी आंदोलन की गतिविधियों का केंद्र पटना (बिहार) बन गया। पटना के वहाबी नेताओं ने इस आंदोलन को जारी रखा और अंग्रेजों को लगातार चुनौती देते रहे। 1863 ई. में पटना के वहाबियों पर अंग्रेजों ने मुकदमा चलाया जो भारतीय इतिहास में ‘वहाबी मुकदमे’ के नाम से प्रसिद्ध है।

वहाबी आंदोलन ने मुस्लिम समाज में नैतिक सुधार, शिक्षा और धार्मिक शुद्धता पर जोर दिया। इसने मुसलमानों को अरबी और इस्लामी शिक्षा की ओर प्रेरित किया। यह आंदोलन भारत में मुस्लिम पुनरुत्थानवाद का एक प्रमुख उदाहरण है। इसने मुसलमानों में एक नई जागरूकता पैदा की और उन्हें ब्रिटिश शासन के विरुद्ध लड़ने की प्रेरणा दी।

वहाबी आंदोलन की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इसने किसान वर्ग और निम्न मुस्लिम जातियों को भी अपने साथ जोड़ा। बंगाल में इस आंदोलन ने ‘फराइजी आंदोलन’ के रूप में अलग पहचान बनाई जिसका नेतृत्व हाजी शरीयतउल्लाह ने किया। इस आंदोलन ने गरीब किसानों को जमींदारों और अंग्रेजों के शोषण के विरुद्ध संगठित किया।

वहाबी आंदोलन यद्यपि अंततः सफल नहीं रहा किंतु इसने मुस्लिम समाज को जगाने का काम किया। इसने भारतीय मुसलमानों में राजनीतिक चेतना का बीज बोया। इसकी विचारधारा ने आगे के मुस्लिम सुधार आंदोलनों को प्रभावित किया। वहाबी आंदोलन को भारत के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलनों में से एक माना जाता है।

देवबंद आंदोलन 1866-67 ई. में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के देवबंद नामक स्थान पर प्रारंभ हुआ। इस आंदोलन के प्रमुख प्रवर्तक मुहम्मद कासिम ननौतवी और रशीद अहमद गंगोही थे। इन्होंने एक इस्लामी मदरसे (देवबंद स्कूल) की स्थापना की जो आगे चलकर एशिया के सबसे बड़े इस्लामी शिक्षा केंद्रों में से एक बन गया। इस मदरसे में अंग्रेजी और पश्चिमी शिक्षा का विरोध किया जाता था।

देवबंद आंदोलन का मुख्य उद्देश्य मुस्लिम समाज में इस्लामी शिक्षा, नैतिकता और धार्मिक मूल्यों को पुनर्स्थापित करना था। इसने मुसलमानों को पश्चिमी शिक्षा के बजाय कुरान और हदीस की शिक्षा दिलाने पर बल दिया। यह आंदोलन अलीगढ़ आंदोलन के ठीक विपरीत था जो पश्चिमी शिक्षा का समर्थक था। देवबंद ने पारंपरिक इस्लामी शिक्षा को आधुनिक रूप देने का प्रयास किया।

देवबंद आंदोलन ने राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का स्वागत किया। इसने अंग्रेजों के विरुद्ध हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश दिया। देवबंद के उलेमाओं ने स्वतंत्रता संग्राम में भी भाग लिया। शेखुल हिंद महमूद हसन जैसे देवबंदी नेताओं ने ‘रेशमी रुमाल आंदोलन’ के माध्यम से अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया। इस प्रकार देवबंद आंदोलन धार्मिक सुधार के साथ-साथ राजनीतिक प्रतिरोध का भी प्रतीक बना।

देवबंद स्कूल की विशेषता यह थी कि यह पूरी तरह जन-समर्थन पर आधारित था। इसे कोई सरकारी सहायता नहीं मिली। मुस्लिम समाज के साधारण लोगों ने चंदा देकर इस संस्था को चलाया। यह ‘मदरसा’ प्रणाली की एक अनूठी मिसाल थी जहाँ कम संसाधनों में भी उत्कृष्ट धार्मिक शिक्षा दी जाती थी। देवबंद के स्नातकों ने देश के कोने-कोने में इस्लामी शिक्षा का प्रसार किया।

देवबंद आंदोलन ने अंग्रेजी सभ्यता और संस्कृति के प्रभाव से मुस्लिम समाज को बचाने का प्रयास किया। इसने मुसलमानों को अपनी धार्मिक पहचान और परंपराओं से जोड़े रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यद्यपि इसने पश्चिमी शिक्षा का विरोध किया किंतु इसने मुस्लिम समाज में एकता और अनुशासन का संचार किया। देवबंद का मदरसा आज भी विश्व के प्रमुख इस्लामी शिक्षा केंद्रों में गिना जाता है।

देवबंद आंदोलन का प्रभाव दक्षिण एशिया से बाहर अफगानिस्तान, मध्य एशिया और अफ्रीका तक फैला। इसने मुस्लिम धर्म में एक सुधारवादी धारा को जन्म दिया जो परंपरागत इस्लाम की रक्षा करते हुए सामाजिक बुराइयों को दूर करना चाहती थी। यह आंदोलन भारत में मुस्लिम बौद्धिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।

सर सैयद अहमद खाँ ने मुस्लिम समाज के लिए वही कार्य किया जो हिंदू समाज के लिए राजा राममोहन राय ने किया था। सैयद अहमद खाँ 1857 के विद्रोह के समय बिजनौर में सदर अमीन के पद पर कार्यरत थे। वे पहले भारतीय थे जिन्होंने 1857 के विद्रोह पर ‘असबाब-ए-बगावत-ए-हिंद’ नामक पुस्तक लिखी जिसका अंग्रेजी अनुवाद ‘The Causes of the Indian Mutiny’ नाम से हुआ। उनके आंदोलन का केंद्र अलीगढ़ होने से इसे ‘अलीगढ़ आंदोलन’ कहा जाता है।

सैयद अहमद खाँ ने मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने पर बल दिया। 1864 ई. में उन्होंने गाजीपुर में ‘साइंटिफिक सोसायटी’ की स्थापना की जिसका उद्देश्य अंग्रेजी पुस्तकों का उर्दू में अनुवाद करना था। उन्होंने ‘तहजीब-उल-अखलाक’ (सभ्यता और नैतिकता) नामक पत्रिका निकाली जिसमें मुसलमानों को आधुनिक विचारों से परिचित कराया जाता था। उनका सबसे महत्वपूर्ण कार्य कुरान पर टीका लिखना था।

24 मई 1875 ई. को महारानी विक्टोरिया के जन्मदिन पर सैयद अहमद खाँ ने अलीगढ़ में ‘मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कॉलेज’ की स्थापना की। यह संस्था 1920 ई. में ‘अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय’ (AMU) के रूप में परिवर्तित हो गई। इस संस्था में इस्लामी और पश्चिमी शिक्षा दोनों का सुंदर समन्वय किया गया। इसने मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ा और उन्हें सरकारी सेवाओं के लिए तैयार किया।

सैयद अहमद खाँ के प्रारंभिक विचार हिंदू-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे। उन्होंने एक बार कहा था — “भिन्न-भिन्न धर्म मानते हुए भी हम सब भारत की दो सुंदर आँखें हैं।” किंतु बाद में उनके विचार सांप्रदायिक हो गए। 1888 ई. में उन्होंने ‘यूनाइटेड इंडिया पैट्रियटिक एसोसिएशन’ की स्थापना की जिसका उद्देश्य कांग्रेस के प्रत्येक प्रगतिशील कदम का विरोध करना था।

सैयद अहमद खाँ ने मुसलमानों की राजभक्ति को प्रदर्शित करने के लिए ‘राजभक्त मुसलमान’ नामक ग्रंथ लिखा। 1863 ई. में अब्दुल लतीफ ने ‘मोहम्मडन लिटरेरी एंड साइंटिफिक सोसायटी’ की स्थापना की। 1878 ई. में मीर अली ने ‘नेशनल मोहम्मडन एसोसिएशन’ की स्थापना की। अलीगढ़ आंदोलन की तुलना में ये आंदोलन कम सफल रहे किंतु मुस्लिम जागरण में इनका भी योगदान है।

अलीगढ़ आंदोलन का दीर्घकालिक प्रभाव मुस्लिम राजनीतिक चेतना पर पड़ा। इस आंदोलन ने एक ऐसे मुस्लिम बुद्धिजीवी वर्ग को तैयार किया जो आगे चलकर मुस्लिम लीग की स्थापना में सहायक हुआ। सैयद अहमद के शिष्यों में थियोडोर बेक जैसे अंग्रेज भी शामिल थे। अलीगढ़ के स्नातकों ने भारतीय राजनीति और प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अहमदिया आंदोलन की स्थापना मिर्जा गुलाम अहमद ने 1889 ई. में की थी। यह आंदोलन पंजाब के गुरुदासपुर जिले के ‘कादियान’ नामक स्थान से प्रारंभ हुआ इसीलिए अहमदिया संप्रदाय को ‘कादियानी’ भी कहा जाता है। मिर्जा गुलाम अहमद धार्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत सहिष्णु थे। उन्होंने इस्लाम, हिंदू धर्म और ईसाई धर्म सभी की अच्छाइयों को स्वीकार किया। उन्होंने अपने को ‘कृष्ण का अवतार’ और ‘मसीह’ भी कहा।

मिर्जा गुलाम अहमद के अनुसार वे ईश्वर के दूत हैं और उनके आगमन से इस्लाम में नई स्फूर्ति आएगी। उन्होंने अपने सिद्धांतों की व्याख्या अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘बराहीन-ए-अहमदिया’ में की। उनका मानना था कि जिहाद अर्थात् धर्म के लिए हथियारबंद संघर्ष की आधुनिक युग में आवश्यकता नहीं है। उन्होंने मुसलमानों से अंग्रेजी शासन के साथ सहयोग करने और शांतिपूर्ण मार्ग अपनाने का आह्वान किया।

अहमदिया आंदोलन ने मुस्लिम समाज में किसी प्रकार के रूढ़िवादी और सांप्रदायिक विचारों का प्रसार नहीं किया। इसने धार्मिक सहिष्णुता, शिक्षा और नैतिकता पर बल दिया। अहमदिया समुदाय ने शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया और देश-विदेश में अनेक विद्यालय और अस्पताल स्थापित किए। किंतु रूढ़िवादी मुसलमानों ने मिर्जा गुलाम अहमद के दावों का कड़ा विरोध किया।

अहमदिया आंदोलन की सबसे बड़ी समस्या यह रही कि मुख्यधारा के मुसलमानों ने इसे इस्लाम के बाहर माना। मिर्जा गुलाम अहमद के स्वयं को ईश्वर का पैगंबर घोषित करने के दावे को अधिकांश मुसलमानों ने स्वीकार नहीं किया। इससे अहमदिया समुदाय और मुख्यधारा के मुसलमानों के बीच एक गहरी खाई उत्पन्न हुई। पाकिस्तान में 1974 ई. में एक संवैधानिक संशोधन द्वारा अहमदियों को गैर-मुस्लिम घोषित कर दिया गया।

अहमदिया आंदोलन ने अपनी स्थापना के बाद से विश्व के अनेक देशों में अपना प्रसार किया। यह समुदाय आज भी ‘अहमदिया मुस्लिम जमाअत’ के नाम से विश्वभर में सक्रिय है। इसके अनुयायी भारत, पाकिस्तान, इंग्लैंड और अफ्रीका में बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। इस समुदाय ने शिक्षा, सेवा और प्रचार के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है।

अहमदिया आंदोलन 19वीं और 20वीं शताब्दी के मुस्लिम सुधार आंदोलनों में एक अनूठी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता है। इसने इस्लाम को एक सहिष्णु और शांतिप्रिय धर्म के रूप में प्रस्तुत किया। इसने विज्ञान और धर्म के बीच विरोध न मानकर उन्हें एक-दूसरे का पूरक माना। यद्यपि यह आंदोलन विवादास्पद रहा किंतु इसने इस्लाम में एक नई वैचारिक धारा को जन्म दिया।

19वीं शताब्दी में भारतीय समाज अनेक कुप्रथाओं से ग्रस्त था। सती प्रथा में विधवाओं को पति की चिता के साथ जीवित जला दिया जाता था। बाल हत्या में लड़कियों को जन्म के समय ही मार दिया जाता था। दास प्रथा में मजदूरों का घोर शोषण होता था। ठगी प्रथा में धर्म के नाम पर यात्रियों की हत्या की जाती थी। इन सभी कुरीतियों के विरुद्ध ब्रिटिश सरकार और भारतीय सुधारकों ने मिलकर अनेक कानून बनाए।

सती प्रथा को 1829 ई. में लॉर्ड विलियम बेंटिक के समय अधिनियम 17 द्वारा प्रतिबंधित किया गया। राजा राममोहन राय के अथक प्रयासों ने इस कानून को संभव बनाया। बाल हत्या पर 1802 ई. में लॉर्ड वेलेजली के काल में अधिनियम 45 द्वारा प्रतिबंध लगाया गया। जोनाथन डंकन ने बनारस में पहले इस प्रथा को समाप्त करने का प्रयास किया था। इन कानूनों ने महिलाओं और बच्चों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

दास प्रथा को समाप्त करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। ब्रिटेन में यह प्रथा 1820 ई. में ही समाप्त हो चुकी थी। भारत में 1833 ई. के चार्टर अधिनियम में इसकी समाप्ति की घोषणा की गई। किंतु वास्तव में 1843 ई. में लॉर्ड एलेनबरो के काल में अधिनियम 5 द्वारा इसे समाप्त किया गया। कर्नल स्लीमैन ने ठगी प्रथा का उन्मूलन किया और लॉर्ड हार्डिंग ने नरबलि प्रथा को समाप्त किया।

पारसी समाज में भी सुधार आंदोलन हुए। 1851 ई. में ‘रहनुमाई माजदयासन सभा’ की स्थापना की गई। इसके संस्थापकों में दादाभाई नौरोजी, एस.एस. बंगाली और जहाँगीर फर्दोनजी प्रमुख थे। इस संस्था ने ‘रास्त गोफ्तार’ नामक साप्ताहिक पत्रिका निकाली। के.आर. कामा ने जेंदावस्ता के सही ज्ञान को पारसियों के सामने रखा। बी.एम. मालाबारी ने पारसी और भारतीय समाज सुधार दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अकाली आंदोलन 1921 ई. में चला जिसका उद्देश्य सिख गुरुद्वारों को भ्रष्ट महंतों से मुक्त करना था। इस आंदोलन के परिणामस्वरूप 1922 ई. में सिख गुरुद्वारा अधिनियम पारित हुआ और 1925 ई. में इसमें संशोधन किए गए। वेद समाज की स्थापना 1864 ई. में मद्रास में के.के. श्रीधरालू नायडू ने की थी। देव समाज की स्थापना 1887 ई. में शिवनारायण अग्निहोत्री ने लाहौर में की थी।

राजमुंदरी सोशल रिफॉर्म एसोसिएशन की स्थापना 1878 ई. में वीरेश लिंगम पंतुलु ने की थी। जे.ई.डी. बेथून ने 1849 ई. में कलकत्ता में एक बालिका विद्यालय की स्थापना की जो ‘बेथून स्कूल’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इन सभी संस्थाओं और आंदोलनों ने मिलकर भारतीय समाज की कुरीतियों को दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

भारत में हिंदू समाज में विधवाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उन्हें सिर मुंडाना पड़ता था, श्वेत वस्त्र पहनने होते थे और शुभ कार्यों से दूर रखा जाता था। पुनर्विवाह का न तो प्रचलन था और न ही सामाजिक स्वीकृति। इस दयनीय स्थिति के विरुद्ध ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने सबसे प्रभावशाली आंदोलन चलाया। उन्होंने शास्त्रों के आधार पर सिद्ध किया कि विधवा पुनर्विवाह हिंदू धर्म में वर्जित नहीं है।

ईश्वरचंद्र विद्यासागर के प्रयासों के फलस्वरूप 1856 ई. में लॉर्ड डलहौजी के शासनकाल में ‘हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम’ पारित हुआ। यह अधिनियम लॉर्ड कैनिंग के शासनकाल में लागू हुआ। इसके अंतर्गत विधवा विवाह को और ऐसे विवाह से उत्पन्न संतान को वैध घोषित किया गया। पहला विधवा विवाह 7 दिसंबर 1856 ई. को विद्यासागर की देखरेख में संपन्न हुआ।

बंबई में प्रोफेसर डी.के. कर्वे ने विधवा पुनर्विवाह के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया। वे विधवा पुनर्विवाह संघ के सचिव थे। विधुर होने पर उन्होंने 1893 ई. में स्वयं एक ब्राह्मण विधवा से विवाह किया और समाज को एक प्रेरक उदाहरण दिया। 1899 ई. में उन्होंने पुणे में एक विधवा आश्रम स्थापित किया जहाँ विधवाओं को जीविकोपार्जन का प्रशिक्षण दिया जाता था।

1906 ई. में प्रोफेसर कर्वे ने बंबई में ‘भारतीय महिला विश्वविद्यालय’ की स्थापना की जो महिला उच्च शिक्षा की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम था। मद्रास में वीरेश लिंगम पंतुलु ने विधवा पुनर्विवाह के लिए उल्लेखनीय कार्य किया। उन्होंने 1878 ई. में राजमुंदरी में ‘सोशल रिफॉर्म एसोसिएशन’ की स्थापना की और विधवाओं के पुनर्विवाह को सामाजिक प्रतिष्ठा दिलाई।

महादेव गोविंद रानाडे ने भी महाराष्ट्र में विधवा पुनर्विवाह आंदोलन का समर्थन किया। उन्होंने ‘विधवा पुनर्विवाह एसोसिएशन’ की स्थापना की। प्रार्थना समाज ने भी इस आंदोलन को नैतिक समर्थन दिया। इन सभी प्रयासों से भारतीय समाज में विधवाओं के प्रति दृष्टिकोण बदलने लगा। हालाँकि सामाजिक परिवर्तन धीरे-धीरे आया किंतु कानूनी परिवर्तन तत्काल प्रभाव से हुआ।

विधवा पुनर्विवाह आंदोलन का महत्त्व केवल कानूनी सुधार तक सीमित नहीं था। इसने भारतीय समाज में महिलाओं को मनुष्य के रूप में सम्मान दिलाने का प्रयास किया। इसने यह स्थापित किया कि किसी महिला का जीवन उसके पति की मृत्यु के साथ समाप्त नहीं हो जाता। यह आंदोलन भारत के स्त्री-मुक्ति आंदोलन का एक महत्वपूर्ण अध्याय है जिसने आधुनिक भारत में महिला समानता की नींव रखी।

बाल विवाह भारत की एक अत्यंत हानिकारक सामाजिक कुरीति थी जिसमें कम उम्र के बच्चों का विवाह कर दिया जाता था। इससे बालिकाओं का शारीरिक और मानसिक विकास बाधित होता था और उनका बचपन छिन जाता था। केशवचंद्र सेन बाल विवाह के घोर विरोधी थे। उनके प्रयासों से 1872 ई. में ‘ब्रह्म मैरिज एक्ट’ (सिविल मैरिज एक्ट) पारित हुआ जिसमें विवाह के लिए लड़के की न्यूनतम आयु 18 और लड़की की 14 वर्ष निर्धारित की गई।

‘ब्रह्म मैरिज एक्ट’ के बावजूद बाल विवाह की समस्या बनी रही क्योंकि यह अधिनियम केवल ब्रह्म समाज के अनुयायियों पर लागू होता था। 1891 ई. में पारसी समाज सुधारक बी.एम. मालाबारी के प्रयासों से ‘आयु सम्मति अधिनियम’ (Age of Consent Act) पारित हुआ जिसमें 12 वर्ष से कम आयु की कन्याओं के विवाह पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया। इस अधिनियम का बाल गंगाधर तिलक ने विरोध किया था।

1929 ई. में बाल विवाह के विरुद्ध सबसे महत्वपूर्ण कदम ‘शारदा अधिनियम’ के रूप में उठाया गया। अजमेर निवासी हरविलास शारदा के प्रयत्नों से यह कानून पारित हुआ। इसमें 18 वर्ष से कम उम्र के लड़के और 14 वर्ष से कम उम्र की लड़की के विवाह को अवैध घोषित किया गया। यह अधिनियम सभी धर्मों और जातियों पर समान रूप से लागू था इसलिए इसका व्यापक प्रभाव पड़ा।

1978 ई. में भारत सरकार ने ‘बाल विवाह निषेध कानून’ बनाया जिसमें लड़की की न्यूनतम विवाह आयु 18 वर्ष और लड़के की 21 वर्ष निर्धारित की गई। यह कानून आज भी प्रभावी है। इसके बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में बाल विवाह की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। सरकार और सामाजिक संगठन मिलकर इस समस्या के समाधान के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं।

बाल विवाह के विरुद्ध आंदोलन में महिला सुधारकों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रमाबाई रानाडे और पंडिता रमाबाई ने महाराष्ट्र में महिला शिक्षा और बाल विवाह के विरोध में सक्रिय कार्य किया। पंडिता रमाबाई ने पुणे में ‘शारदा सदन’ की स्थापना की जहाँ विधवाओं और दुर्भाग्यशाली महिलाओं को शिक्षा और आश्रय दिया जाता था। इन महिला सुधारकों ने अपने स्वयं के जीवन से समाज को प्रेरणा दी।

बाल विवाह के विरुद्ध संघर्ष भारत के सामाजिक सुधार आंदोलन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। इसने दिखाया कि कानून और सामाजिक चेतना मिलकर ही सामाजिक परिवर्तन ला सकते हैं। केवल कानून बनाने से समाज नहीं बदलता; इसके लिए शिक्षा और जागरूकता भी आवश्यक है। यह संघर्ष आज भी जारी है और समाज को इसमें सक्रिय भागीदारी निभानी होगी।

19वीं शताब्दी के सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलनों ने भारतीय समाज में एक अभूतपूर्व जागरण उत्पन्न किया। इन आंदोलनों ने सती प्रथा, बाल विवाह, छुआछूत और जाति-भेद जैसी कुरीतियों को चुनौती दी। इन्होंने महिलाओं को शिक्षा और सम्मान का अधिकार दिलाया। इन्होंने दलितों में आत्मसम्मान और अधिकार चेतना जगाई। इन सुधारकों ने दिखाया कि भारतीय समाज परिवर्तन के लिए सक्षम है और इसमें उत्थान की अपार संभावनाएँ हैं।

इन सुधार आंदोलनों ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की वैचारिक नींव तैयार की। राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद और ज्योतिबा फूले जैसे महान सुधारकों ने भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना का बीज बोया। उन्होंने भारत के अतीत का गौरव उजागर कर भारतवासियों में आत्मसम्मान की भावना जगाई। इस आत्मसम्मान ने ही बाद में स्वतंत्रता संग्राम को प्रेरणा और शक्ति प्रदान की।

इन आंदोलनों ने भारत में आधुनिक शिक्षा के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। हिंदू कॉलेज, वेदांत कॉलेज, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, दयानंद एंग्लो वैदिक स्कूल और गुरुकुल कांगड़ी जैसी संस्थाओं की स्थापना इन्हीं आंदोलनों की देन है। इन संस्थाओं ने करोड़ों भारतीयों को शिक्षित किया और उन्हें आधुनिक जीवन के लिए तैयार किया।

इन सुधार आंदोलनों ने भारत में समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के प्रसार को भी बढ़ावा दिया। ‘संवाद कौमुदी’, ‘तत्त्वबोधिनी पत्रिका’, ‘बंगाल स्पेक्टेटर’, ‘इंडियन मिरर’, ‘सुबोधिनी’, ‘न्यू इंडिया’ और ‘हरिजन’ जैसी पत्रिकाओं ने जनमत निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन्होंने नए विचारों को समाज के हर वर्ग तक पहुँचाया और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनीं।

इन सुधार आंदोलनों का सबसे बड़ा प्रभाव भारत के कानूनों पर पड़ा। सती निषेध अधिनियम (1829), विधवा पुनर्विवाह अधिनियम (1856), आयु सम्मति अधिनियम (1891), शारदा अधिनियम (1929) और दास प्रथा उन्मूलन (1843) — ये सभी कानून इन्हीं आंदोलनों का परिणाम हैं। इन्होंने भारतीय समाज को कानूनी स्तर पर एक नया आकार दिया।

इन सुधार आंदोलनों की विरासत आज भी जीवित है। डॉ. अंबेडकर द्वारा निर्मित भारतीय संविधान में समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय के जो मूल्य स्थापित किए गए वे इन्हीं सुधार आंदोलनों की भावना के प्रतिबिंब हैं। ये आंदोलन हमें यह शिक्षा देते हैं कि समाज का विकास तभी संभव है जब उसमें से अन्याय, भेदभाव और अंधविश्वास को दूर किया जाए और ज्ञान, करुणा और समानता के मूल्यों को प्रतिष्ठित किया जाए।

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