
भूमिका
भारत में प्रेस का विकास राष्ट्रीय चेतना और जन जागरूकता के विकास में एक महत्वपूर्ण कारक रहा है। प्रिंटिंग प्रेस के आगमन ने भारतीय समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया और आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को तीव्र गति प्रदान की। 18वीं और 19वीं शताब्दी में प्रेस ने भारतीय राष्ट्रवाद के उदय में निर्णायक भूमिका निभाई। समाचार पत्रों ने न केवल सूचना प्रसारण का कार्य किया बल्कि सामाजिक सुधार, धार्मिक पुनर्जागरण और राजनीतिक जागरण का माध्यम भी बने।
भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत राजा राममोहन राय से लेकर महात्मा गांधी तक अनेक राष्ट्रीय नेताओं ने प्रेस को अपने विचारों के प्रसार का प्रमुख साधन बनाया। प्रेस ने भारतीय समाज की कुरीतियों, अंधविश्वासों और ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध जनमत तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। 1870 के दशक में जब ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय राष्ट्रवाद का उभार हो रहा था, तब प्रेस ने एक शक्तिशाली हथियार के रूप में कार्य किया।
प्रेस ने भारतीय भाषाओं में साहित्य के विकास को भी प्रोत्साहित किया और शिक्षा के प्रसार में अहम भूमिका निभाई। बंगाली, हिंदी, उर्दू, गुजराती और अन्य भारतीय भाषाओं में समाचार पत्रों के प्रकाशन ने आम जनता तक ज्ञान और सूचना पहुंचाने का कार्य किया। प्रेस ने किसानों, मजदूरों और साधारण नागरिकों की आवाज को मुखर बनाया और उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता पैदा की। इस प्रकार प्रेस ने आधुनिक भारत के निर्माण में अविस्मरणीय योगदान दिया।
प्रेस का विकास केवल राजनीतिक जागरण तक सीमित नहीं था बल्कि इसने सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक क्षेत्रों में भी परिवर्तन लाया। महिला शिक्षा, सती प्रथा का उन्मूलन, विधवा विवाह का समर्थन और छुआछूत के विरुद्ध आंदोलनों में प्रेस की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। समाचार पत्रों ने भारतीय समाज में वैज्ञानिक सोच और तर्कशीलता को बढ़ावा दिया और अंधविश्वासों के विरुद्ध लोगों को शिक्षित किया।
ब्रिटिश सरकार ने प्रेस की बढ़ती शक्ति को देखते हुए अनेक प्रतिबंधात्मक अधिनियम पारित किए जिनका उद्देश्य भारतीय समाचार पत्रों को नियंत्रित करना था। लार्ड वेलेजली से लेकर लार्ड लिटन तक अनेक ब्रिटिश प्रशासकों ने प्रेस की स्वतंत्रता को कुचलने का प्रयास किया। परंतु भारतीय पत्रकारों ने इन दमनकारी नीतियों के विरुद्ध साहसपूर्वक संघर्ष किया और प्रेस की स्वतंत्रता के लिए निरंतर आंदोलन चलाया। यह संघर्ष भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक अभिन्न अंग बन गया।
प्रेस ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अन्य राजनीतिक संगठनों के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समाचार पत्रों ने इन संगठनों के विचारों और कार्यक्रमों को जनसाधारण तक पहुंचाया और राष्ट्रीय आंदोलन को जन-आंदोलन का रूप प्रदान किया। स्वदेशी आंदोलन, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में प्रेस की भूमिका अविस्मरणीय रही। इस प्रकार प्रेस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक शक्तिशाली माध्यम बना।
भारत में प्रिंटिंग प्रेस का आगमन और विकास
भारत में प्रिंटिंग प्रेस का आगमन 16वीं शताब्दी में हुआ जब पुर्तगाली मिशनरियों ने गोवा में पहला प्रिंटिंग प्रेस स्थापित किया। 1556 ई. में सेंट पॉल कॉलेज, गोवा में स्थापित यह प्रेस मूलतः धार्मिक साहित्य के प्रकाशन के लिए लाया गया था। इस प्रेस को वास्तव में एबिसिनिया (वर्तमान इथियोपिया) भेजा जा रहा था लेकिन तकनीकी कारणों से यह गोवा में ही रुक गया। 1557 ई. में ‘डॉक्ट्रिना क्रिस्टा’ नामक पुस्तक भारत में छपी पहली किताब थी जो पुर्तगाली भाषा में प्रकाशित हुई।
गोवा में स्थापित प्रिंटिंग प्रेस का उद्देश्य ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए धार्मिक पुस्तकों का प्रकाशन करना था। पुर्तगाली पादरियों ने इस प्रेस के माध्यम से बाइबिल और अन्य धार्मिक ग्रंथों का प्रकाशन किया। प्रारंभिक वर्षों में यह प्रेस मुख्य रूप से पुर्तगाली और लैटिन भाषा में पुस्तकों का प्रकाशन करता था। धीरे-धीरे भारतीय भाषाओं में भी छपाई का कार्य शुरू हुआ। 1563 में गार्सिया डा ओर्टा की पुस्तक ‘कोलोक्वियोज डॉज सिमेंटस’ का प्रकाशन हुआ जो भारत की सबसे पुरानी शेष मुद्रित पुस्तक मानी जाती है।
आधुनिक भारतीय प्रेस की वास्तविक शुरुआत 1766 ई. में विलियम वोल्ट्स के आगमन से हुई जिन्होंने कलकत्ता में एक प्रिंटिंग प्रेस स्थापित किया। यह प्रेस व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए स्थापित किया गया था और इसने भारत में आधुनिक मुद्रण की नींव रखी। 1780 ई. में जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने ‘बंगाल गजट’ या ‘कलकत्ता जनरल एडवर्टाइजर’ नामक अंग्रेजी भाषा का प्रथम समाचार पत्र प्रकाशित किया। यह समाचार पत्र ब्रिटिश सरकार की नीतियों की कटु आलोचना करता था जिसके कारण इसे शीघ्र ही बंद कर दिया गया।
हिक्की का समाचार पत्र यद्यपि अल्पजीवी रहा परंतु इसने भारत में पत्रकारिता की परंपरा की शुरुआत की। इसके बाद 18वीं शताब्दी के अंत और 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में अनेक अंग्रेजी समाचार पत्र प्रकाशित हुए जैसे ‘इंडिया गजट’, ‘कलकत्ता गजट’, ‘बंगाल जर्नल’ आदि। ये समाचार पत्र मुख्य रूप से अंग्रेज व्यापारियों और प्रशासकों के लिए प्रकाशित होते थे। धीरे-धीरे भारतीयों ने भी प्रेस के महत्व को समझा और भारतीय भाषाओं में समाचार पत्रों का प्रकाशन शुरू हुआ।
प्रिंटिंग प्रेस के प्रसार ने भारतीय समाज में ज्ञान के लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया शुरू की। पहले ज्ञान केवल विशिष्ट वर्गों तक सीमित था लेकिन मुद्रण तकनीक के आगमन से पुस्तकें और समाचार पत्र आम जनता के लिए उपलब्ध होने लगे। इससे शिक्षा का प्रसार हुआ और सामाजिक चेतना में वृद्धि हुई। 19वीं शताब्दी के मध्य तक भारत के प्रमुख शहरों में अनेक प्रिंटिंग प्रेस स्थापित हो चुके थे। कलकत्ता, बंबई, मद्रास, दिल्ली, लाहौर और अन्य शहरों में प्रेस उद्योग तेजी से विकसित हुआ।
1850 तक वाराणसी में चार कार्यशील प्रिंटिंग प्रेस थे और संपूर्ण भारत में लगभग 24 प्रिंटिंग प्रेस कार्यरत थे। इनमें से सात आगरा में, दो दिल्ली में, दो लाहौर में और एक-एक बरेली, कानपुर, इंदौर और शिमला में थे। प्रिंटिंग प्रेस के विकास ने भारतीय साहित्य, पत्रकारिता और शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन लाए। पुस्तकों की कीमतें कम हुईं और वे अधिक लोगों तक पहुंची। इससे साक्षरता दर में वृद्धि हुई और समाज में नई चेतना का संचार हुआ।
भारतीय भाषाओं में समाचार पत्रों का विकास
भारतीयों द्वारा प्रकाशित प्रथम अंग्रेजी समाचार पत्र 1816 ई. में गंगाधर भट्टाचार्य का साप्ताहिक ‘बंगाल गजट’ था जो कलकत्ता से प्रकाशित हुआ। यह समाचार पत्र भारतीयों द्वारा संचालित पहला अंग्रेजी अखबार था और इसने भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया। इस समाचार पत्र ने भारतीयों की समस्याओं और आकांक्षाओं को अंग्रेजी भाषा में अभिव्यक्त किया और ब्रिटिश प्रशासन तक भारतीयों की आवाज पहुंचाई। यह प्रेस की स्वतंत्रता और भारतीय अधिकारों का समर्थक था।
बंगाली भाषा में पहला समाचार पत्र ‘दिग्दर्शन’ था जिसे 1818 ई. में मार्शमैन ने आरंभ किया। यह एक मासिक पत्रिका थी जो धार्मिक और सामाजिक विषयों पर केंद्रित थी। यद्यपि यह अधिक समय तक नहीं चल सका परंतु इसी वर्ष मार्शमैन द्वारा आरंभ किया गया साप्ताहिक समाचार पत्र ‘समाचार दर्पण’ अधिक सफल रहा। यह बंगाली भाषा का प्रथम स्थायी समाचार पत्र था जिसने बंगाली पत्रकारिता की नींव रखी। इस समाचार पत्र ने बंगाली समाज में जागरूकता फैलाने और सामाजिक सुधारों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हिंदी भाषा की देवनागरी लिपि में प्रकाशित होने वाला पहला समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ था जिसे 1826 ई. में कानपुर से पंडित जुगल किशोर शुक्ल और मन्नु ठाकुर ने प्रारंभ किया। यह साप्ताहिक समाचार पत्र हिंदी पत्रकारिता का प्रथम प्रयास था और इसने हिंदी भाषा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यद्यपि आर्थिक कठिनाइयों के कारण यह पत्र लंबे समय तक नहीं चल सका परंतु इसने हिंदी पत्रकारिता की परंपरा की शुरुआत की। इसके बाद हिंदी में अनेक समाचार पत्रों का प्रकाशन हुआ।
फारसी भाषा का प्रथम समाचार पत्र राजा राममोहन राय का ‘मिरातुल अखबार’ था जो 1822 ई. में प्रकाशित हुआ। फारसी उस समय उत्तर भारत की राजभाषा थी और मुस्लिम समुदाय में व्यापक रूप से प्रयोग की जाती थी। राममोहन राय ने इस समाचार पत्र के माध्यम से मुस्लिम समाज तक अपने सामाजिक सुधार के विचारों को पहुंचाया। यह समाचार पत्र सामाजिक कुरीतियों और ब्रिटिश सरकार की अन्यायपूर्ण नीतियों की आलोचना करता था। उर्दू भाषा का प्रथम समाचार पत्र ‘जाम-ए-जहांनुमा’ था जिसका प्रकाशन राजा राममोहन राय ने 1822 ई. में कलकत्ता से करवाया।
गुजराती भाषा का प्रथम समाचार पत्र ‘बम्बई समाचार’ था जिसे जहाँगीर फरदोनजी ने बम्बई से 1822 ई. में प्रकाशित किया। यह गुजराती पत्रकारिता का आरंभ था और इसने गुजरात में सामाजिक और राजनीतिक चेतना फैलाने में योगदान दिया। विभिन्न भारतीय भाषाओं में समाचार पत्रों के प्रकाशन से भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों तक सूचना और ज्ञान पहुंचने लगा। प्रत्येक भाषा के समाचार पत्र ने अपने क्षेत्र की विशिष्ट समस्याओं और आकांक्षाओं को अभिव्यक्त किया। इससे क्षेत्रीय पत्रकारिता का विकास हुआ और राष्ट्रीय एकता की भावना मजबूत हुई।
भारतीय भाषाओं में समाचार पत्रों के विकास ने साहित्यिक पुनर्जागरण को भी बढ़ावा दिया। अनेक लेखकों, कवियों और विचारकों को समाचार पत्रों के माध्यम से अपनी रचनाएं प्रकाशित करने का अवसर मिला। इससे भारतीय भाषाओं का साहित्य समृद्ध हुआ और भाषाओं का मानकीकरण हुआ। समाचार पत्रों ने भाषा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया और आधुनिक भारतीय भाषाओं के निर्माण में सहायता की। पत्रकारिता ने भारतीय भाषाओं को आधुनिक विचारों और शब्दावली से समृद्ध किया।
राजा राममोहन राय: भारतीय पत्रकारिता के जनक
राजा राममोहन राय को भारतीय पत्रकारिता के अग्रदूत और राष्ट्रीय प्रेस के संस्थापक के रूप में जाना जाता है। उनका जन्म 22 मई 1772 को पश्चिम बंगाल के राधानगर गांव में हुआ था। उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वासों और कुरीतियों के विरुद्ध जोरदार संघर्ष किया और सामाजिक सुधार आंदोलन का नेतृत्व किया। प्रेस की स्वतंत्रता के लिए उनका संघर्ष अविस्मरणीय है। उन्होंने प्रेस को सामाजिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम बनाया और पत्रकारिता के माध्यम से जनमत को संगठित किया।
राममोहन राय ने 1821 ई. में बंगाली भाषा में ‘संवाद कौमुदी’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन आरंभ किया। यह समाचार पत्र सामाजिक और धार्मिक सुधारों का प्रबल समर्थक था। इस पत्र के माध्यम से राममोहन राय ने सती प्रथा, बाल विवाह, जातिवाद और अन्य सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध जन-जागरण का कार्य किया। ‘संवाद कौमुदी’ ने बंगाली समाज में नवजागरण की अलख जगाई और सामाजिक चेतना का प्रसार किया। यह पत्र ब्रिटिश सरकार की अन्यायपूर्ण नीतियों की भी आलोचना करता था।
1822 ई. में राममोहन राय ने फारसी भाषा में ‘मिरात-उल-अखबार’ और अंग्रेजी में ‘ब्राह्मणिकल मैगजीन’ का प्रकाशन आरंभ किया। ‘मिरात-उल-अखबार’ का उद्देश्य मुस्लिम समाज में सामाजिक सुधार के विचारों का प्रसार करना था। यह समाचार पत्र प्रेस की स्वतंत्रता का प्रबल समर्थक था और सरकारी सेंसरशिप का विरोध करता था। ‘ब्राह्मणिकल मैगजीन’ के माध्यम से राममोहन राय ने अंग्रेजी पढ़े-लिखे वर्ग तक अपने विचारों को पहुंचाया। उन्होंने ‘बंगदूत’ नामक एक अनोखा समाचार पत्र भी प्रकाशित किया जिसमें बांग्ला, हिंदी और फारसी तीनों भाषाओं का प्रयोग किया जाता था।
राममोहन राय ने प्रेस की स्वतंत्रता के लिए ब्रिटिश सरकार से कठोर संघर्ष किया। 1823 ई. में जब गवर्नर जनरल एडम्स ने ‘लाइसेंसिंग रेग्यूलेशन एक्ट’ लागू किया तो राममोहन राय ने इसका जोरदार विरोध किया। इस अधिनियम के तहत प्रकाशकों को प्रेस स्थापित करने से पूर्व लाइसेंस लेना अनिवार्य कर दिया गया था। राममोहन राय ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की जिसमें प्रेस की स्वतंत्रता के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने तर्क दिया कि मुक्त प्रेस लोकतंत्र और न्याय के लिए आवश्यक है।
सरकार ने राममोहन राय के ‘मिरात-उल-अखबार’ को प्रतिबंधित कर दिया क्योंकि यह समाचार पत्र सरकारी नीतियों की कड़ी आलोचना करता था, परंतु राममोहन राय ने हार नहीं मानी और प्रेस की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष जारी रखा। उन्होंने अपने लेखों और पत्रों के माध्यम से सरकार के दमनकारी कानूनों का विरोध किया। उनके प्रयासों से भारत में प्रेस की स्वतंत्रता का आंदोलन मजबूत हुआ। 1835 ई. में चार्ल्स मैटकॉफ द्वारा प्रेस पर लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने में राममोहन राय के संघर्ष की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
राममोहन राय ने पत्रकारिता और सामाजिक आंदोलन का अद्भुत समन्वय स्थापित किया। उनके समाचार पत्र केवल सूचना देने का माध्यम नहीं थे बल्कि सामाजिक परिवर्तन के साधन थे। उन्होंने पत्रकारिता को समाज सेवा का एक रूप माना। सती प्रथा के विरुद्ध उनका अभियान उनके समाचार पत्रों के माध्यम से जन-जन तक पहुंचा। 1829 ई. में लॉर्ड विलियम बेंटिक द्वारा सती प्रथा को अवैध घोषित करने में राममोहन राय के पत्रकारीय प्रयासों का बड़ा योगदान था। इस प्रकार राममोहन राय ने प्रेस को सामाजिक परिवर्तन का शक्तिशाली हथियार बनाया।
बाल गंगाधर तिलक और पत्रकारिता

बाल गंगाधर तिलक न केवल एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे बल्कि एक प्रभावशाली पत्रकार भी थे। उन्होंने ‘केसरी’ (मराठी) और ‘मराठा’ (अंग्रेजी) दो प्रसिद्ध समाचार पत्रों का प्रकाशन किया। ‘केसरी’ का अर्थ है ‘शेर‘ और यह समाचार पत्र अपने तेजस्वी और आक्रामक लेखन के लिए प्रसिद्ध था। तिलक के संपादन में ‘केसरी’ ब्रिटिश शासन की आलोचना का मुखर मंच बना। इस समाचार पत्र ने महाराष्ट्र में राष्ट्रीय चेतना जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तिलक के प्रखर लेखन ने युवाओं को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया।
‘मराठा’ अंग्रेजी भाषा का समाचार पत्र था जो शिक्षित वर्ग को संबोधित करता था। तिलक से पूर्व ‘केसरी’ के संपादक जी.जी. आगरकर और ‘मराठा’ के संपादक एन.सी. केलकर थे। बाद में दोनों समाचार पत्र तिलक के अधीन आ गए। तिलक ने इन समाचार पत्रों को राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रचार मंच बनाया। उन्होंने स्वदेशी आंदोलन, बहिष्कार आंदोलन और राष्ट्रीय शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए इन पत्रों का प्रयोग किया। तिलक के लेख तर्कपूर्ण, प्रभावशाली और जनसाधारण की भाषा में होते थे जो आम जनता तक आसानी से पहुंचते थे।
तिलक के पत्रकारीय लेखन के कारण उन्हें अनेक बार जेल जाना पड़ा। 1897 में प्लेग महामारी के दौरान ब्रिटिश सरकार की नीतियों की आलोचना करने पर उन्हें 18 महीने की जेल हुई। 1908 में ‘केसरी’ में प्रकाशित लेखों के कारण उन्हें राजद्रोह का दोषी ठहराया गया और 6 वर्ष की कड़ी सजा दी गई। उन्हें बर्मा के मांडले जेल भेज दिया गया। जेल में रहते हुए तिलक ने मराठी भाषा में ‘गीता रहस्य’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना की। यह पुस्तक भगवद् गीता की दार्शनिक व्याख्या है और इसमें कर्मयोग पर विशेष बल दिया गया है।
तिलक ने ‘द आर्कटिक होम ऑफ द वेदाज’ नामक एक अन्य महत्वपूर्ण पुस्तक की भी रचना की जिसमें उन्होंने वैदिक सभ्यता की उत्पत्ति के संबंध में नए सिद्धांत प्रस्तुत किए। तिलक एक विद्वान पत्रकार थे जिन्होंने अपने लेखन में इतिहास, धर्म, दर्शन और राजनीति का समन्वय स्थापित किया। उनके समाचार पत्र केवल समसामयिक घटनाओं की रिपोर्टिंग नहीं करते थे बल्कि गहन विश्लेषण और विचारोत्तेजक संपादकीय प्रस्तुत करते थे। तिलक का पत्रकारीय योगदान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है।
तिलक ने पत्रकारिता को राष्ट्रीय जागरण का माध्यम बनाया। उन्होंने गणेश उत्सव और शिवाजी उत्सव जैसे सार्वजनिक उत्सवों को लोकप्रिय बनाया और इनकी व्यापक कवरेज अपने समाचार पत्रों में दी। इन उत्सवों ने जनता में राष्ट्रीय भावना जागृत की और स्वतंत्रता आंदोलन को जन-आंदोलन का रूप दिया। तिलक के समाचार पत्रों ने भारतीय संस्कृति और परंपरा का गौरव गान किया और पश्चिमी सभ्यता की अंधी नकल का विरोध किया। इस प्रकार तिलक ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को पत्रकारिता के माध्यम से मजबूत किया।
अरविंदो घोष: क्रांतिकारी पत्रकारिता के प्रतीक

अरविंदो घोष भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी नेता और प्रभावशाली पत्रकार थे। उनका जन्म 15 अगस्त 1872 को हुआ था जो संयोग से भारत की स्वतंत्रता की तारीख भी है। 1947 में जब भारत को आजादी मिली तो उसी दिन अरविंदो घोष का 75वां जन्मदिन ‘अमृत महोत्सव’ के रूप में मनाया गया। अरविंदो घोष ने आई.सी.एस. परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण की थी परंतु घुड़सवारी के अनिवार्य परीक्षण का बहिष्कार कर दिया। वे गरमपंथी विचारधारा के समर्थक थे और आयरलैंड की क्रांति से प्रेरित थे।
अरविंदो घोष ने ‘बंदे मातरम्’ नामक समाचार पत्र का संपादन किया जो क्रांतिकारी पत्रकारिता का प्रतीक बन गया। यह समाचार पत्र ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उग्र लेख प्रकाशित करता था और पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करता था। अरविंदो घोष ने स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजी पर्याय शब्द ‘Independence’ का पहली बार प्रयोग किया। पहले ‘Self-Government’ या ‘Home Rule’ शब्दों का प्रयोग किया जाता था। अरविंदो ने ‘कर्मयोगी’ (अंग्रेजी) और ‘धर्म’ (बांग्ला) नामक समाचार पत्रों का भी प्रकाशन किया। ये समाचार पत्र युवाओं में क्रांतिकारी भावना जागृत करते थे।
1908 ई. में हुए ‘अलीपुर षड्यंत्र केस’ में अरविंदो घोष भी एक आरोपी थे। इस मामले में उन पर बम बनाने और क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया गया था। प्रसिद्ध भारतीय वकील चितरंजन दास ने अदालत में उनका जोरदार बचाव किया और अरविंदो निर्दोष सिद्ध हुए, परंतु इस घटना के बाद अरविंदो घोष ने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया और पांडिचेरी चले गए। वहां उन्होंने आध्यात्मिक साधना में अपना जीवन समर्पित कर दिया और ‘ओरोविले आश्रम’ की स्थापना की।
पांडिचेरी में रहते हुए अरविंदो घोष ने ‘आर्य’ नामक पत्रिका का प्रकाशन किया जिसमें भारतीय संस्कृति, दर्शन और आध्यात्मिकता पर गंभीर लेख प्रकाशित होते थे। यह पत्रिका अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित होती थी और इसमें अरविंदो के दार्शनिक विचारों का प्रस्तुतीकरण होता था। उन्होंने ‘लाइफ डिवाइन’, ‘ऐसेज ऑन गीता’ और ‘सावित्री’ जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकों की रचना की। ‘सावित्री’ एक महाकाव्य है जिसमें अरविंदो ने भारतीय पौराणिक कथा को आध्यात्मिक दर्शन से जोड़ा है। यह रचना विश्व साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखती है।
अरविंदो घोष ने पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक गौरव को जगाया। उनके लेख विचारोत्तेजक, तर्कपूर्ण और प्रेरणादायक होते थे। उन्होंने युवाओं को निःस्वार्थ देशसेवा के लिए प्रेरित किया। ‘बंदे मातरम्’ के संपादकीय भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। अरविंदो ने पत्रकारिता को केवल व्यवसाय नहीं बल्कि राष्ट्रसेवा का माध्यम माना। उनका पत्रकारीय योगदान भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में सदैव स्मरणीय रहेगा। दूरदर्शन पर संस्कृत समाचार से पूर्व संसद भवन की पृष्ठभूमि में जो दो मूर्तियां दिखाई देती हैं, उनमें एक अरविंदो घोष की है।
महात्मा गांधी और पत्रकारिता
महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान पत्रकारिता का प्रभावी उपयोग किया। उन्होंने अपने विचारों और सिद्धांतों को जनसाधारण तक पहुंचाने के लिए अनेक समाचार पत्रों का प्रकाशन किया। 1919 ई. में गांधीजी ने अहमदाबाद से दो समाचार पत्र प्रकाशित किए – ‘नवजीवन’ (गुजराती) और ‘यंग इंडिया’ (अंग्रेजी)। ‘नवजीवन’ का उद्देश्य गुजराती भाषी जनता तक गांधीजी के विचारों को पहुंचाना था जबकि ‘यंग इंडिया‘ शिक्षित अंग्रेजी भाषी वर्ग को संबोधित करता था। ये दोनों समाचार पत्र सत्याग्रह, अहिंसा, स्वदेशी और सामाजिक सुधार के विचारों का प्रचार करते थे।
गांधीजी के समाचार पत्र केवल राजनीतिक विषयों तक सीमित नहीं थे बल्कि सामाजिक, आर्थिक और नैतिक मुद्दों पर भी लिखते थे। उन्होंने अस्पृश्यता, महिला शिक्षा, खादी, ग्रामीण विकास और सांप्रदायिक सद्भाव जैसे विषयों पर नियमित रूप से लेख लिखे। गांधीजी स्वयं इन समाचार पत्रों के लिए नियमित रूप से लिखते थे। उनकी लेखन शैली सरल, स्पष्ट और प्रभावशाली थी। वे जटिल विचारों को सरल भाषा में व्यक्त करने में सिद्धहस्त थे। उनके लेख आम आदमी की भाषा में होते थे जो जनसाधारण को समझ आते थे।
1933 ई. में गांधीजी ने पूना से हिंदी भाषा में ‘हरिजन’ नामक समाचार पत्र का प्रकाशन आरंभ किया। यह समाचार पत्र अछूतों के उत्थान और सामाजिक समानता के लिए समर्पित था। गांधीजी ने अस्पृश्यता को हिंदू धर्म का कलंक बताया और इसके उन्मूलन के लिए जोरदार अभियान चलाया। ‘हरिजन’ समाचार पत्र ने इस अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वास्तव में ‘नवजीवन’ का ही रूपांतरण बाद में ‘हरिजन’ के रूप में हुआ। गांधीजी ने ‘हरिजन’ शब्द को लोकप्रिय बनाया जिसका अर्थ है ‘ईश्वर की संतान’।
गांधीजी के समाचार पत्र राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख मुखपत्र बन गए। असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन की जानकारी इन समाचार पत्रों के माध्यम से देश भर में पहुंचती थी। गांधीजी ने अपने समाचार पत्रों में ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों की आलोचना की परंतु हमेशा सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों का पालन किया। उन्होंने कभी भी झूठी या अतिरंजित खबरें नहीं छापीं। गांधीजी के लिए पत्रकारिता सत्य की खोज और जनसेवा का माध्यम थी।
गांधीजी ने पत्रकारिता की नैतिकता पर विशेष बल दिया। उनका मानना था कि पत्रकारों को सत्य, निष्पक्षता और सामाजिक जिम्मेदारी के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। उन्होंने व्यावसायिक हितों के लिए पत्रकारीय मूल्यों से समझौता करने का विरोध किया। गांधीजी के समाचार पत्र विज्ञापनों पर निर्भर नहीं थे बल्कि पाठकों के योगदान से चलते थे। इससे उनकी संपादकीय स्वतंत्रता बनी रहती थी। गांधीजी ने जनता की भाषा में जनता के लिए पत्रकारिता की और भारतीय पत्रकारिता में नए आदर्श स्थापित किए।
लाला लाजपत राय और अन्य महत्वपूर्ण पत्रकार
लाला लाजपत राय गरमपंथी विचारधारा के प्रमुख नेता थे और उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने उर्दू भाषा में ‘वंदे मातरम्’ नामक साप्ताहिक समाचार पत्र का प्रकाशन किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘यंग इंडिया’ और ‘द पीपुल’ जैसे समाचार पत्रों का संपादन भी किया। लाला लाजपत राय ने ‘अनहैप्पी इंडिया’ नामक एक महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी जिसमें उन्होंने मिस कैथरिन मेयो की पुस्तक ‘मदर इंडिया’ में की गई भारतीयों की आलोचना का सशक्त उत्तर दिया। लाजपत राय के लेखन में राष्ट्रीय गौरव की भावना प्रमुख थी।
मदन मोहन मालवीय का भी आधुनिक भारतीय पत्रकारिता में महत्वपूर्ण स्थान था। उन्होंने कालाकांकर के राजा रामपाल द्वारा स्थापित दैनिक ‘हिंदुस्तान’ का कई वर्षों तक संपादन किया। इलाहाबाद से उन्होंने अपना साप्ताहिक पत्र ‘अभ्युदय’ भी निकाला। मालवीय जी एक कवि भी थे और ‘मकरंद’ उपनाम से कविताएं लिखते थे। उन्होंने हिंदी के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन‘ की स्थापना की। मालवीय जी के समाचार पत्र राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक थे और सामाजिक सुधारों को बढ़ावा देते थे।
सुरेंद्रनाथ बनर्जी भी एक प्रभावशाली पत्रकार थे जिन्होंने ‘बंगाली’ नामक समाचार पत्र का संपादन किया। वे समाचार पत्र के कारण जेल जाने वाले प्रथम भारतीय थे। सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने अपने समाचार पत्र के माध्यम से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नीतियों का प्रचार किया। गणेश शंकर विद्यार्थी ने कानपुर से ‘प्रताप’ नामक साप्ताहिक पत्र निकाला जो मजदूरों और किसानों के हितों का समर्थक था। माखनलाल चतुर्वेदी ने ‘कर्मवीर’ का संपादन किया जो हिंदी पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण स्तंभ था।
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने 1867 ई. में हिंदी मासिक ‘कवि वचन सुधा’ का संपादन आरंभ किया। इसके प्रभाव से तत्कालीन सभी समाचार पत्र राष्ट्रीयता की भावनाओं से अनुप्राणित होने लगे। भारतेंदु जी ने हिंदी पत्रकारिता को नई दिशा दी और हिंदी भाषा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने हिंदी को आधुनिक विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। दादाभाई नौरोजी ने ‘हिंदुस्तानी’ और ‘एडवोकेट ऑफ इंडिया’ का प्रकाशन किया जबकि गोपाल कृष्ण गोखले ने ‘सुधारक’ और ‘नेशन’ का संपादन किया।
जवाहरलाल नेहरू ने इलाहाबाद से ‘नेशनल हेराल्ड’ नामक अंग्रेजी दैनिक का प्रकाशन 1938 ई. में आरंभ किया। यह समाचार पत्र भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नीतियों का प्रचार करता था और स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मोतीलाल नेहरू ने ‘इंडिपेंडेंट’ का प्रकाशन किया। इन सभी पत्रकारों ने अपने-अपने समाचार पत्रों के माध्यम से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत किया। उन्होंने पत्रकारिता को राष्ट्रसेवा का माध्यम बनाया और भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाया।
प्रमुख समाचार पत्र और उनकी विशेषताएं
‘हिंदू पैट्रियट’ एक महत्वपूर्ण समाचार पत्र था जिसकी स्थापना हरिशचंद्र मुखर्जी और गिरीश चंद्र बोस ने की थी। इसके संपादक क्रिस्टोदास पाल थे जिन्हें ‘भारतीय पत्रकारिता का राजकुमार’ कहा जाता है। कुछ वर्षों बाद ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने इस समाचार पत्र को अपने हाथों में लिया। मदन मोहन घोष और द्वारकानाथ टैगोर उनके सहायक थे। बाद में देवेंद्रनाथ टैगोर द्वारा 1851 ई. में स्थापित ‘ब्रिटिश इंडिया एसोसिएशन’ ने इसे खरीद लिया। अब यह समाचार पत्र राष्ट्रीय हितों से हटकर भू-स्वामियों के हितों का प्रतिनिधित्व करने लगा।
‘अमृत बाजार पत्रिका’ का प्रारंभ 1868 ई. में मोतीलाल घोष और शिशिर कुमार घोष ने बंगाली भाषा में किया। यह प्रारंभ में साप्ताहिक था परंतु 1869 ई. में दैनिक हो गया। 1878 ई. में लिटन के ‘वर्नाक्यूलर प्रेस अधिनियम’ से बचने के लिए इसने रातों-रात अपनी भाषा बंगाली से बदलकर अंग्रेजी कर ली। यह घटना भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में अद्भुत उदाहरण है। इससे समाचार पत्र की दृढ़ निश्चय और चतुराई का पता चलता है। ‘अमृत बाजार पत्रिका’ ने प्रेस की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया और ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों का विरोध किया।
‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की स्थापना के.एम. पणिक्कर द्वारा 1923 ई. में की गई। यह अंग्रेजी भाषा का दैनिक समाचार पत्र था। अकाली सिख आंदोलन के परिणामस्वरूप इस पत्र की स्थापना हुई और प्रारंभ में इसे अकालियों से धन प्राप्त होता था। बाद में अकालियों ने इसे पंडित मदन मोहन मालवीय के हाथों बेच दिया। ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ ने राष्ट्रीय आंदोलन का समर्थन किया और भारतीय हितों का प्रतिनिधित्व किया। आज यह भारत के प्रमुख अंग्रेजी दैनिकों में से एक है।
‘इंडियन मिरर‘ की स्थापना देवेंद्रनाथ टैगोर और मनमोहन घोष ने 1861 ई. में की। यह एक अंग्रेजी दैनिक था। इसके संपादकीय विभाग में केशव चंद्रसेन और नरेंद्रनाथ सेन थे। ‘सुलभ समाचार’ को 19वीं शताब्दी के सातवें दशक में केशव चंद्र सेन ने शुरू किया। यह बांग्ला का एकमात्र दैनिक था। ‘सोम प्रकाश’ 1859 ई. में बंगाली भाषा में ईश्वर चंद्र विद्यासागर द्वारा प्रकाशित एक साप्ताहिक समाचार पत्र था। जब नील की खेती करने वाले इलाके में अशांति बढ़ी तो इस समाचार पत्र ने किसानों के हितों का जोरदार समर्थन किया।
‘ट्रिब्यून’ की स्थापना सर दयालसिंह मजीठिया ने की जो पंजाब का एक प्रभावशाली अंग्रेजी समाचार पत्र था। ‘सरस्वती’ का संपादन महावीर प्रसाद द्विवेदी ने किया जिसने हिंदी साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। ‘मॉडर्न रिव्यू’ का प्रकाशन रामानंद चटर्जी ने किया जो अंग्रेजी भाषा की एक महत्वपूर्ण पत्रिका थी। इन सभी समाचार पत्रों ने अपने-अपने क्षेत्रों और भाषाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन्होंने भारतीय समाज में जागरूकता फैलाई और राष्ट्रीय आंदोलन को मजबूत किया।
प्रेस पर नियंत्रण के अधिनियम

ब्रिटिश सरकार ने भारतीय प्रेस की बढ़ती शक्ति को देखते हुए अनेक प्रतिबंधात्मक अधिनियम पारित किए। 1799 ई. में लॉर्ड वेलेजली ने ‘सेंसरशिप ऑफ द प्रेस एक्ट’ द्वारा सभी समाचार पत्रों पर सख्त नियंत्रण लगाते हुए संपादक, मुद्रक और मालिक का नाम अखबार पर देना अनिवार्य कर दिया। यह अधिनियम फ्रांस के साथ युद्ध की पृष्ठभूमि में लागू किया गया था, क्योंकि ब्रिटिश सरकार को भय था कि फ्रांसीसी क्रांति के विचार भारत में न फैलें। लॉर्ड हेस्टिंग्स ने 1818 ई. में इस दमनकारी अधिनियम को समाप्त कर दिया।
1823 ई. में कार्यवाहक गवर्नर जनरल एडम्स ने ‘लाइसेंसिंग रेग्यूलेशन एक्ट’ बनाया जिसके तहत मुद्रक और प्रकाशक को मुद्रणालय स्थापित करने से पूर्व लाइसेंस लेना अनिवार्य कर दिया गया। इस अधिनियम के द्वारा राजा राममोहन राय का ‘मिरात-उल-अखबार’ प्रतिबंधित कर दिया गया। यह अधिनियम प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रहार था। राममोहन राय ने इस अधिनियम के विरुद्ध जोरदार आंदोलन चलाया और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की परंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। यह अधिनियम 1835 ई. तक लागू रहा।
विलियम बेंटिक के बाद बने कार्यवाहक अध्यक्ष चार्ल्स मैटकॉफ ने 1835 ई. में ‘लिबरेशन ऑफ द इंडियन प्रेस एक्ट’ पारित कर 1823 के अधिनियम को समाप्त कर दिया। इससे प्रेस को काफी स्वतंत्रता मिली। इसीलिए चार्ल्स मैटकॉफ को ‘भारतीय समाचार पत्रों का मुक्तिदाता’ (Liberator of Indian Newspapers) कहा गया। मैटकॉफ का मानना था कि मुक्त प्रेस सुशासन के लिए आवश्यक है। उन्होंने प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना। इस निर्णय से भारतीय पत्रकारिता को नई गति मिली और अनेक नए समाचार पत्र प्रकाशित हुए।
लॉर्ड लिटन के काल में 1878 ई. में पारित ‘वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट’ भारतीय प्रेस के इतिहास में सबसे कुख्यात अधिनियम था। ‘वर्नाक्यूलर’ का शाब्दिक अर्थ है स्थानीय भाषा। यह अधिनियम यद्यपि स्थानीय भाषाओं में प्रकाशित सभी समाचार पत्रों पर प्रतिबंध लगाने की बात करता था परंतु यह मुख्यतः ‘सोम प्रकाश’ और ‘भारत मिहिर’ नामक दो बंगाली समाचार पत्रों पर प्रतिबंध लगाने के लिए लाया गया था। ये दोनों समाचार पत्र ब्रिटिश सरकार की नीतियों की तीखी आलोचना करते थे।
इस अधिनियम की विशेषता यह थी कि यह केवल स्थानीय भाषाओं में प्रकाशित समाचार पत्रों पर लागू होता था जबकि अंग्रेजी समाचार पत्रों को इससे छूट थी। इससे यह स्पष्ट था कि ब्रिटिश सरकार का उद्देश्य भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों को दबाना था क्योंकि ये आम जनता तक पहुंचते थे। ‘अमृत बाजार पत्रिका’ ने इस अधिनियम से बचने के लिए एक रात में अपनी भाषा बंगाली से बदलकर अंग्रेजी कर ली। इस अधिनियम का भारत में व्यापक विरोध हुआ। लॉर्ड रिपन ने 1882 ई. में इस दमनकारी अधिनियम को वापस ले लिया।
प्रेस और राष्ट्रवाद का विकास

19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारतीय प्रेस राष्ट्रीय चेतना के प्रसार का प्रमुख माध्यम बन गया। समाचार पत्रों ने भारतीयों में राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता की भावना जागृत की। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद ब्रिटिश शासन के विरुद्ध असंतोष बढ़ने लगा था। प्रेस ने इस असंतोष को व्यक्त करने और जनमत तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समाचार पत्रों ने ब्रिटिश सरकार की आर्थिक शोषण की नीतियों, नस्लीय भेदभाव और भारतीयों के साथ अन्याय का भंडाफोड़ किया। इससे भारतीयों में राजनीतिक जागरूकता बढ़ी।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 ई. में हुई और प्रेस ने इस संगठन के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। समाचार पत्रों ने कांग्रेस के अधिवेशनों की विस्तृत रिपोर्टिंग की और उसके प्रस्तावों को जनसाधारण तक पहुंचाया। कांग्रेस के नेताओं ने प्रेस का प्रभावी उपयोग अपने विचारों के प्रचार के लिए किया। दादाभाई नौरोजी की ‘आर्थिक शोषण’ की थ्योरी, सुरेंद्रनाथ बनर्जी के राजनीतिक अधिकारों की मांग और गोपाल कृष्ण गोखले के सुधारवादी विचारों का प्रचार समाचार पत्रों के माध्यम से हुआ।
20वीं शताब्दी के प्रारंभ में जब स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ तो प्रेस ने इसे जन-आंदोलन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाल गंगाधर तिलक के ‘केसरी’ और अरविंदो घोष के ‘बंदे मातरम्’ जैसे समाचार पत्रों ने युवाओं में देशभक्ति की भावना जागृत की। इन समाचार पत्रों ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग का आह्वान किया। 1905 में बंगाल विभाजन के विरुद्ध जो जबरदस्त आंदोलन हुआ उसमें प्रेस की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। समाचार पत्रों ने बंगाल विभाजन को भारतीय एकता पर प्रहार बताया।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान और उसके बाद भारतीय राष्ट्रवाद नए चरण में प्रवेश किया। महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन शुरू हुआ और प्रेस ने इसका व्यापक प्रचार किया। गांधीजी के ‘यंग इंडिया’ और ‘नवजीवन’ ने आंदोलन को दिशा देने का कार्य किया। सविनय अवज्ञा आंदोलन के समय प्रेस पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए परंतु समाचार पत्रों ने जोखिम उठाकर आंदोलन की खबरें प्रकाशित कीं। अनेक संपादकों और पत्रकारों को जेल भेजा गया परंतु उन्होंने राष्ट्रीय हित में अपना बलिदान दिया।
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी प्रेस ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यद्यपि ब्रिटिश सरकार ने सख्त सेंसरशिप लागू की थी परंतु भूमिगत समाचार पत्रों ने आंदोलन को जीवित रखा। प्रेस ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उठाने में भी सहायता की। विदेशी समाचार पत्रों में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की खबरें प्रकाशित होने से विश्व जनमत भारत के पक्ष में तैयार हुआ। इस प्रकार प्रेस ने भारतीय राष्ट्रवाद के विकास और स्वतंत्रता प्राप्ति में अविस्मरणीय योगदान दिया।
उर्दू पत्रकारिता का विकास
1910 से 1920 ई. के मध्य उर्दू पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय विकास हुआ। उर्दू पत्रकारिता के इतिहास में ‘अल हिलाल’ का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है। इसका प्रकाशन कलकत्ता से मौलाना अबुल कलाम आजाद द्वारा किया गया था। ‘अल हिलाल’ का पहला अंक 13 जुलाई 1912 ई. को प्रकाशित हुआ। यह समाचार पत्र इस्लामी पुनर्जागरण और भारतीय राष्ट्रवाद का समर्थक था। मौलाना आजाद ने इस पत्र के माध्यम से मुस्लिम समुदाय में राष्ट्रीय चेतना जागृत की और हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश दिया। ‘अल हिलाल’ की भाषा सरल और प्रभावशाली थी।
एक वर्ष बाद 12 नवंबर 1913 ई. को मौलाना अबुल कलाम आजाद ने ‘अल बलाग‘ नामक एक अन्य उर्दू समाचार पत्र कलकत्ता से निकाला। जब ‘अल हिलाल’ पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया तो मौलाना आजाद ने ‘अल बलाग’ के माध्यम से अपने विचारों का प्रचार जारी रखा। ये दोनों समाचार पत्र ब्रिटिश शासन के विरुद्ध थे और स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन करते थे। मौलाना आजाद के लेख विद्वतापूर्ण और प्रेरणादायक होते थे। उन्होंने उर्दू पत्रकारिता को नई ऊंचाइयां दीं।
मुहम्मद अली ने बंबई से ‘कॉमरेड’ (अंग्रेजी) और ‘हमदर्द’ (उर्दू) नामक समाचार पत्रों का प्रकाशन किया। ये समाचार पत्र खिलाफत आंदोलन के प्रमुख मुखपत्र थे। मुहम्मद अली जिन्ना ने भी कुछ समय के लिए पत्रकारिता में रुचि ली। हबीबुल अंसारी ने बंबई से उर्दू भाषा में ‘मदीना’ नामक समाचार पत्र प्रकाशित किया। अब्दुल वारी साहब ने लखनऊ से उर्दू में ‘हमदम’ का प्रकाशन किया। इन सभी उर्दू समाचार पत्रों ने मुस्लिम समुदाय में राजनीतिक जागरूकता फैलाने का कार्य किया।
उर्दू पत्रकारिता ने हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। अनेक उर्दू समाचार पत्रों ने साझी संस्कृति और गंगा-जमुनी तहज़ीब का समर्थन किया। उर्दू प्रेस ने मुस्लिम समुदाय को राष्ट्रीय मुख्यधारा में जोड़ने का कार्य किया। उर्दू की साहित्यिक परंपरा ने पत्रकारिता को भी समृद्ध किया। उर्दू समाचार पत्रों में शायरी, ग़ज़लें और अदबी लेख भी प्रकाशित होते थे। इससे उर्दू भाषा और साहित्य का विकास हुआ। उर्दू पत्रकारिता ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में मुस्लिम समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित की।
समाजवादी और साम्यवादी पत्रकारिता
20वीं शताब्दी के दूसरे दशक में भारत में समाजवादी और साम्यवादी विचारधाराओं का प्रवेश हुआ। रूसी क्रांति 1917 की सफलता ने भारतीय युवाओं को प्रभावित किया। इन विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए अनेक समाचार पत्र प्रकाशित हुए। ‘द सोशलिस्ट’ एक अंग्रेजी समाचार पत्र था जो समाजवादी विचारधारा का प्रचार करता था। ‘बंगाली’ समाचार पत्र में मुजफ्फर अहमद और काजी नजरुल इस्लाम ने समाजवादी विचारों को स्थान दिया। काजी नजरुल इस्लाम एक क्रांतिकारी कवि थे जिनकी रचनाएं युवाओं में विद्रोह की भावना जागृत करती थीं।
‘लेबर किसान गजट’ का प्रकाशन शिंगार वेलू चेट्टियार ने किया। यह समाचार पत्र मजदूरों और किसानों के हितों का प्रबल समर्थक था। इसने ट्रेड यूनियन आंदोलन और किसान आंदोलन को प्रोत्साहित किया। ‘इंकलाब’ उर्दू भाषा में प्रकाशित एक क्रांतिकारी समाचार पत्र था जिसे गुलाम हुसैन ने निकाला। यह पत्र साम्राज्यवाद और पूंजीवाद का विरोध करता था और मजदूरों के अधिकारों के लिए लड़ता था। इन समाचार पत्रों ने भारतीय समाज में वर्ग चेतना पैदा करने का प्रयास किया।
समाजवादी और साम्यवादी समाचार पत्रों ने आर्थिक शोषण के विरुद्ध जनमत तैयार किया। उन्होंने जमींदारी प्रथा, महाजनी शोषण और औद्योगिक पूंजीवाद की आलोचना की। इन समाचार पत्रों ने मजदूरों और किसानों को संगठित होने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने भूमि सुधार, मजदूरी वृद्धि और काम करने की बेहतर परिस्थितियों की मांग की। यद्यपि ये समाचार पत्र छोटे पैमाने पर प्रकाशित होते थे परंतु इनका प्रभाव महत्वपूर्ण था। इन्होंने भारतीय राजनीति में वामपंथी विचारधारा को स्थापित किया।
समाचार एजेंसियां और प्रेस समितियां
ब्रिटिश शासनकाल के दौरान कुछ समाचार एजेंसियों की स्थापना हुई जिन्होंने समाचार संकलन और वितरण का कार्य किया। 1880 ई. में ‘रॉयटर’ समाचार एजेंसी ने भारत में अपनी शाखा स्थापित की। यह ब्रिटिश स्वामित्व वाली अंतर्राष्ट्रीय समाचार एजेंसी थी जो मुख्य रूप से अंग्रेजी समाचार पत्रों को समाचार उपलब्ध कराती थी। 1905 ई. में ‘एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया’ की स्थापना हुई जो भारतीय समाचार पत्रों को समाचार सेवा प्रदान करती थी। यह एक सहकारी संस्था थी जिसका स्वामित्व भारतीय समाचार पत्रों के पास था।
1927 ई. में ‘फ्री प्रेस न्यूज सर्विस’ की स्थापना हुई। यह समाचार एजेंसी राष्ट्रवादी विचारधारा की थी और स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन करती थी। ‘यूनाइटेड प्रेस ऑफ इंडिया’ की भी स्थापना हुई जो भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय समाचारों का संकलन और वितरण करती थी। इन समाचार एजेंसियों ने भारतीय पत्रकारिता को व्यवस्थित और पेशेवर बनाने में योगदान दिया। समाचार पत्रों को नियमित और विश्वसनीय समाचार उपलब्ध होने लगे। इससे पत्रकारिता की गुणवत्ता में सुधार हुआ।
1921 ई. में समाचार पत्र संबंधी कानूनों की समीक्षा के लिए एक ‘प्रेस कमेटी’ की नियुक्ति की गई जिसके अध्यक्ष सर तेज बहादुर सप्रू थे। इस समिति ने प्रेस की स्वतंत्रता और जिम्मेदारी पर विचार किया। 1947 ई. में स्वतंत्रता से पूर्व ‘प्रेस इन्क्वायरी कमेटी’ की स्थापना की गई जिसका उद्देश्य प्रेस संबंधी कानूनों की समीक्षा करना था। इन समितियों ने भारतीय प्रेस के विकास और प्रेस की स्वतंत्रता के संबंध में महत्वपूर्ण सिफारिशें कीं। स्वतंत्रता के बाद इन सिफारिशों ने भारतीय प्रेस नीति को प्रभावित किया।
निष्कर्ष
भारत में प्रेस का विकास राष्ट्रीय जागरण और स्वतंत्रता संग्राम का अभिन्न अंग रहा है। 16वीं शताब्दी में प्रिंटिंग प्रेस के आगमन से लेकर 20वीं शताब्दी के मध्य तक प्रेस ने भारतीय समाज को गहराई से प्रभावित किया। राजा राममोहन राय, बाल गंगाधर तिलक, अरविंदो घोष, महात्मा गांधी और अनेक अन्य राष्ट्रीय नेताओं ने प्रेस को सामाजिक परिवर्तन और राजनीतिक जागरण का माध्यम बनाया। भारतीय पत्रकारों ने ब्रिटिश सरकार के दमनकारी कानूनों का साहसपूर्वक सामना किया और प्रेस की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। इस संघर्ष में अनेक पत्रकारों को जेल जाना पड़ा और कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
प्रेस ने केवल राजनीतिक जागरण का कार्य नहीं किया बल्कि सामाजिक सुधार, धार्मिक पुनर्जागरण और सांस्कृतिक विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। सती प्रथा, बाल विवाह, छुआछूत और अन्य सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध अभियानों में प्रेस की भूमिका अविस्मरणीय रही। भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों ने भाषाओं के विकास में योगदान दिया और साहित्य को समृद्ध किया। प्रेस ने शिक्षा के प्रसार में सहायता की और आम जनता में जागरूकता फैलाई। इस प्रकार प्रेस ने आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
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