भारत के गवर्नर जनरल एवं वायसराय — सम्पूर्ण इतिहास

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भारत पर ब्रिटिश शासन की शुरुआत एक व्यापारिक कंपनी के रूप में हुई। 31 दिसंबर 1600 को ईस्ट इंडिया कंपनी ने रानी एलिजाबेथ प्रथम से रॉयल चार्टर प्राप्त किया। धीरे-धीरे यह कंपनी व्यापार से आगे बढ़कर एक राजनीतिक शक्ति बन गई। भारत में ब्रिटिश प्रशासन को संचालित करने के लिए गवर्नर, गवर्नर जनरल और बाद में वायसराय के पद सृजित किए गए। ये पद भारतीय उपमहाद्वीप पर ब्रिटिश राज के सर्वोच्च पद थे। इन्हीं पदाधिकारियों के माध्यम से अंग्रेजों ने सैकड़ों वर्षों तक भारत पर शासन किया।

1773 के रेगुलेटिंग एक्ट द्वारा ‘बंगाल के गवर्नर’ का पद ‘बंगाल के गवर्नर जनरल’ में परिवर्तित हुआ। बंगाल के पहले गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स (1772–1785) थे। बंगाल के पहले गवर्नर रॉबर्ट क्लाइव थे, जिन्हें ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1757 में नियुक्त किया था। 1833 के चार्टर एक्ट द्वारा ‘बंगाल का गवर्नर जनरल’ पुनः ‘भारत का गवर्नर जनरल’ बन गया। इस प्रकार गवर्नर जनरल का पद समस्त ब्रिटिश भारत का सर्वोच्च प्रशासनिक पद बन गया। 1857 के विद्रोह के बाद 1858 में यह पद ‘वायसराय’ में बदल गया।

जब गवर्नर जनरल ताज का प्रतिनिधित्व करता था, तब वह ‘वायसराय’ (Viceroy) कहलाता था, और जब सरकार के वैधानिक नेता के रूप में कार्य करता था, तब ‘गवर्नर जनरल’ कहलाता था। वायसराय शब्द फ्रांसीसी ‘रॉय’ (राजा) और अंग्रेजी ‘वाइस’ (उप) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है ‘राजा का प्रतिनिधि’। वायसराय को ‘योर एक्सीलेंसी’ कहकर संबोधित किया जाता था। इनकी पत्नियाँ ‘वायसराइन’ कहलाती थीं। 1858 से 1947 तक कुल 20 वायसराय ने भारत पर शासन किया।

लॉर्ड विलियम बैंटिक भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण गवर्नर जनरलों में से एक थे। उनका शासन काल सामाजिक, शैक्षिक और प्रशासनिक सुधारों के लिए विशेष रूप से स्मरणीय है। वे बंगाल के अंतिम गवर्नर जनरल और भारत के प्रथम गवर्नर जनरल दोनों थे। 1833 के चार्टर अधिनियम के लागू होने से पहले वे बंगाल के गवर्नर जनरल थे और उसके बाद भारत के प्रथम गवर्नर जनरल बने। उनका कार्यकाल सुधारों की दृष्टि से भारतीय इतिहास का एक स्वर्णिम काल माना जाता है।

1833 का चार्टर अधिनियम लॉर्ड विलियम बैंटिक के शासनकाल की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी। इस अधिनियम के अंतर्गत बंगाल के गवर्नर जनरल को अब ‘भारत का गवर्नर जनरल’ कहा जाने लगा। इससे गवर्नर जनरल का अधिकार क्षेत्र समस्त भारत पर हो गया। इस अधिनियम के द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक अधिकार पूरी तरह समाप्त कर दिए गए। इसी अधिनियम के साथ 1833 में दासता उन्मूलन अधिनियम भी पास किया गया, जिसे 1843 में लॉर्ड एलनबरो के काल में लागू किया गया।

लॉर्ड बैंटिक के शासनकाल की सबसे महान सामाजिक उपलब्धि 1829 में सती प्रथा का अंत था। इस कुप्रथा को समाप्त करने में समाज सुधारक राजा राममोहन राय का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा। अधिनियम संख्या 17 के तहत इस प्रथा को कानूनी रूप से अपराध घोषित किया गया। इस कानून के अंतर्गत सती प्रथा में शामिल होने वालों को दंड का प्रावधान किया गया। राजा राममोहन राय ने वर्षों तक इस कुप्रथा के विरुद्ध जन-जागरण अभियान चलाया और अंततः सफलता पाई।

1835 में लॉर्ड बैंटिक के शासनकाल में फारसी भाषा के स्थान पर अंग्रेजी को कार्यालयी भाषा के रूप में स्थापित किया गया। मैकाले की अनुशंसा पर अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाया गया। इसी काल में कलकत्ता मेडिकल कॉलेज की स्थापना की गई, जो भारत में आधुनिक चिकित्सा शिक्षा की पहली संस्था थी। मैकाले मिनट (Macaulay’s Minute) के माध्यम से पश्चिमी शिक्षा पद्धति को भारत में आधिकारिक रूप दिया गया। इस निर्णय ने भारतीय शिक्षा की दिशा को पूरी तरह बदल दिया।

लॉर्ड बैंटिक के शासनकाल में कर्नल स्लीमैन के नेतृत्व में ठगी प्रथा का उन्मूलन किया गया। ठग वे अपराधी थे जो धर्म के नाम पर यात्रियों की हत्या कर लूटते थे। कर्नल स्लीमैन ने व्यापक अभियान चलाकर इस संगठित अपराध को जड़ से समाप्त किया। हजारों ठगों को पकड़कर मृत्युदंड या कारावास दिया गया। इस प्रयास से देश में यात्रा करना अपेक्षाकृत सुरक्षित हो गया। स्लीमैन के प्रयासों की इतिहास में अत्यधिक सराहना की जाती है।

सर चार्ल्स मेटकॉफ केवल एक वर्ष (1835–1836) के लिए भारत के गवर्नर जनरल रहे, किंतु इस अल्प काल में उन्होंने एक ऐसा निर्णय लिया जिसने उन्हें इतिहास में अमर कर दिया। उन्होंने प्रेस पर लगे सारे प्रतिबंधों को हटा दिया। इस क्रांतिकारी निर्णय के कारण भारतीय पत्रकारिता को पूर्ण स्वतंत्रता मिली। उनके इस साहसी कदम से भारत में स्वतंत्र पत्रकारिता की नींव पड़ी। हालांकि बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने इसे अनुचित बताया, फिर भी मेटकॉफ अपने निर्णय पर अडिग रहे।

मेटकॉफ ने प्रेस की स्वतंत्रता को एक मौलिक अधिकार माना और इसके पक्ष में दृढ़ रहे। बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने उनके इस निर्णय की कड़ी आलोचना की और इसे अनुचित बताया। विरोध के बावजूद मेटकॉफ ने अपनी नीति नहीं बदली और अंततः इस्तीफा दे दिया। इसी कारण उन्हें ‘भारतीय पत्रकारिता के मुक्तिदाता’ (Liberator of Indian Journalism) की उपाधि दी गई। उनके इस कदम ने आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में समाचार पत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका तय की।

लॉर्ड आकलैंड (1836–1842) का शासनकाल प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध (1839–42) के कारण विशेष रूप से जाना जाता है। यह युद्ध अफगानिस्तान में ब्रिटिश प्रभाव स्थापित करने के उद्देश्य से लड़ा गया था। इस युद्ध में अंग्रेजों को भारी क्षति और अपमान उठाना पड़ा। हजारों ब्रिटिश सैनिकों की जान चली गई। इस विफलता के परिणामस्वरूप लॉर्ड आकलैंड को वापस बुला लिया गया। यह युद्ध ब्रिटिश इतिहास की सबसे बड़ी सैन्य विफलताओं में से एक मानी जाती है।

प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध (1839–1842) रूस के बढ़ते प्रभाव को रोकने की ब्रिटिश नीति का परिणाम था। अंग्रेजों ने अफगानिस्तान में अपने समर्थक शाहशुजा को गद्दी पर बिठाने का प्रयास किया। आरंभ में अंग्रेजों को सफलता मिली, परंतु बाद में अफगान प्रतिरोध इतना तीव्र हो गया कि ब्रिटिश सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा। काबुल से वापसी के दौरान 16,000 से अधिक ब्रिटिश सैनिक मारे गए। यह युद्ध अंग्रेजों की सबसे बड़ी कूटनीतिक और सैन्य भूलों में से एक था।

लॉर्ड एलनबरो (1842–1844) के काल में सिंध का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय (1843) एक अत्यंत महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना थी। जनरल चार्ल्स नेपियर ने मियानी की लड़ाई में सिंध के अमीरों को पराजित कर सिंध को अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया। इसी काल में अफगान युद्ध की समाप्ति (1842) हुई और सोमनाथ का दरवाजा भारत लाया गया। लॉर्ड विलियम बैंटिक के शासनकाल में पारित दास प्रथा उन्मूलन अधिनियम (1833) को एलनबरो के काल में ही 1843 में लागू किया गया, जिससे दास प्रथा पूरी तरह समाप्त हो गई।

लॉर्ड हार्डिंग का शासनकाल प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध के लिए जाना जाता है। महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद सिख साम्राज्य अस्थिरता में था। इस स्थिति का लाभ उठाकर अंग्रेजों ने सिखों पर आक्रमण किया। यह युद्ध 1845–46 में लड़ा गया और इसमें सिखों की पराजय हुई। लाहौर की संधि (1846) के परिणामस्वरूप सिखों को भारी क्षतिपूर्ति और क्षेत्र अंग्रेजों को देने पड़े। इसी काल में गोंड और मध्य भारत में मानव बलि प्रथा का भी दमन किया गया।

प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध दिसंबर 1845 में आरंभ हुआ। मुदकी, फिरोजशाह और सोब्राओं जैसी लड़ाइयों में सिख सेना पराजित हुई। मार्च 1846 में लाहौर की संधि के द्वारा युद्ध का अंत हुआ। इस संधि के तहत सिखों को जालंधर दोआब अंग्रेजों को देना पड़ा और डmásfragen लाखों रुपये क्षतिपूर्ति भी चुकानी पड़ी। इसी के बाद भैरोवाल की संधि (1846) हुई, जिसके तहत सिख राज्य में अंग्रेजी संरक्षण स्थापित हुआ। लॉर्ड हार्डिंग के काल में ही बाद में 1846 में विस्काउंट हार्डिंग की उपाधि मिली।

लॉर्ड डलहौजी भारतीय इतिहास के सबसे सक्रिय और विवादास्पद गवर्नर जनरलों में से एक थे। उनका शासनकाल आठ वर्षों (1848–1856) का था। इस काल में एक ओर जहाँ रेलवे, डाक-तार जैसी आधुनिक सुविधाओं का विकास हुआ, वहीं दूसरी ओर हड़प नीति जैसे विवादास्पद निर्णय भी लिए गए। द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध (1848–49) में पंजाब पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। द्वितीय आंग्ल-बर्मा युद्ध (1852) में निम्न बर्मा का अधिग्रहण भी इसी काल में हुआ।

हड़प नीति (Doctrine of Lapse) डलहौजी की सर्वाधिक विवादास्पद नीति थी। इस नीति के अनुसार यदि किसी देशी राजा का कोई प्राकृतिक उत्तराधिकारी नहीं है, तो उसका राज्य ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया जाएगा। दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी नहीं माना जाएगा। इस नीति के तहत सतारा (1848), जैतपुर और संभलपुर (1849), बघाट और उदयपुर (1850), झाँसी (1853) तथा नागपुर (1854) को अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया गया। 1856 में अवध को कुशासन के आधार पर मिलाया गया और अंतिम नवाब वाजिद अली शाह को बंदी बनाया गया।

डलहौजी के काल में भारत में आधुनिक संचार और परिवहन की नींव पड़ी। 1853 में बंबई और थाणे के बीच भारत की पहली रेलवे लाइन का निर्माण हुआ। इसी वर्ष कलकत्ता और आगरा के बीच पहली बार बिजली से संचालित तार सेवा (Electric Telegraph) शुरू हुई। 1854 में डाक कानून लागू किया गया और पहली बार डाक टिकट का प्रचलन हुआ। डाक व तार विभाग की स्थापना हुई। 1854 में ही वुड्स शिक्षा डिसपैच (Wood’s Education Despatch) जारी किया गया, जिसे ‘भारतीय शिक्षा का मैग्नाकार्टा’ कहा गया।

1856 में ईश्वरचंद्र विद्यासागर के अथक प्रयासों के फलस्वरूप हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम (Widow Remarriage Act) पारित हुआ। इस अधिनियम ने हिंदू विधवाओं को पुनर्विवाह का कानूनी अधिकार दिया। धार्मिक निर्योग्यता अधिनियम (Religious Disabilities Act) 1856 में पारित हुआ, जिसके द्वारा ईसाई धर्म में परिवर्तित हिंदुओं को उनके पिता की संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता था। 1853 में चार्टर एक्ट पास हुआ जो अंतिम चार्टर एक्ट था। लोक निर्माण विभाग (PWD) और लोक शिक्षा विभाग की स्थापना भी इसी काल में हुई।

1855–56 में झारखंड और बिहार क्षेत्र के संथाल आदिवासियों ने ब्रिटिश शोषण के विरुद्ध बड़ा विद्रोह किया। इस विद्रोह के नायक सिद्धो और कान्हू थे। संथालों ने जमींदारों और महाजनों के शोषण से मुक्ति के लिए हथियार उठाए। इस विद्रोह में हजारों संथाल लड़ाके मारे गए। अंग्रेजी सेना ने इस विद्रोह को बड़ी कठोरता से दबाया। यह विद्रोह 1857 के महाविद्रोह से पहले भारत के प्रमुख जन-आंदोलनों में से एक था।

लॉर्ड कैनिंग का शासनकाल भारतीय इतिहास की एक अत्यंत निर्णायक अवधि थी। वे ईस्ट इंडिया कंपनी के अंतिम गवर्नर जनरल और ब्रिटिश ताज के अधीन भारत के प्रथम वायसराय बने। उनके शासनकाल में ही 1857 का महाविद्रोह हुआ, जिसने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी। 1857 में लंदन विश्वविद्यालय के तर्ज पर कलकत्ता, मद्रास और बंबई में तीन विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई। इन्हें ‘क्लेमेंसी कैनिंग’ भी कहा जाता था क्योंकि उन्होंने विद्रोह के बाद क्षमा की नीति अपनाई।

1857 का विद्रोह 10 मई (रविवार) को मेरठ से प्रारंभ हुआ। यह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध भारतीयों का प्रथम सशक्त और व्यापक विद्रोह था। इसका तात्कालिक कारण चर्बी वाले कारतूसों का मुद्दा था, परंतु वास्तविक कारण अंग्रेजों की शोषणकारी नीतियाँ थीं। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, नाना साहेब, बहादुरशाह जफर जैसे नेताओं ने इस विद्रोह का नेतृत्व किया। हालाँकि यह विद्रोह असफल रहा, फिर भी इसने अंग्रेजों को यह बताया कि भारत में उनके शासन का विरोध है।

1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार ने 1858 में भारत प्रशासन अधिनियम (Government of India Act) पारित किया। इस अधिनियम के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर भारत को सीधे ब्रिटिश ताज के अधीन कर दिया गया। गवर्नर जनरल का पदनाम ‘वायसराय और गवर्नर जनरल’ हो गया। इस अधिनियम के अनुसार भारत पर ब्रिटिश सम्प्रभुता के नाम से एक प्रधान सचिव (Secretary of State) द्वारा शासन किया जाएगा। प्रधान सचिव की सहायता के लिए 15 सदस्यीय परिषद का गठन किया गया।

1 नवंबर 1858 को इलाहाबाद में लॉर्ड कैनिंग ने रानी विक्टोरिया की ऐतिहासिक घोषणा को पढ़ा। इस घोषणा-पत्र को स्टेनली ने तैयार किया था और इसे इलाहाबाद के किले में स्थित प्रयाग प्रशस्ति में भी खुदवाया गया। इस घोषणा में भारतीयों के अधिकारों, धर्म की स्वतंत्रता और देशी राजाओं के अधिकारों की रक्षा का वादा किया गया। भारत सरकार के अधिग्रहण की घोषणा के बाद रानी ने लॉर्ड कैनिंग को भारत का प्रथम वायसराय और गवर्नर जनरल नियुक्त किया। इस प्रकार भारत में वायसराय काल का आधिकारिक आरंभ हुआ।

1858 के बाद भारतीय प्रशासन में अनेक महत्वपूर्ण बदलाव हुए। 1861 में भारतीय परिषद अधिनियम (Indian Council Act) पारित किया गया, जिसके अंतर्गत वायसराय को अध्यादेश (Ordinance) जारी करने का अधिकार मिला। साथ ही मंत्रिमंडलीय व्यवस्था (Portfolio System) का प्रारंभ हुआ। 1860 में इंडियन पेनल कोड (IPC) लागू किया गया। बंगाल किराया अधिनियम (Bengal Tenancy Act) 1859 में पारित किया गया। डलहौजी की विलय नीति (Doctrine of Lapse) को इसी काल में समाप्त कर दिया गया। बंगाल में नील विद्रोह (1859–60) के बाद नील आयोग (1860) का गठन हुआ।

लॉर्ड एल्गिन (1862–63) के बाद लॉर्ड जॉन लॉरेंस (1864–69) ने शासन संभाला। लॉरेंस के काल में भूटान के साथ संघर्ष (1864–65) हुआ। उन्होंने अफगानिस्तान के प्रति ‘यथावस्था नीति’ (Masterly Inactivity) अपनाई। इसके बाद लॉर्ड मेयो (1869–72), लॉर्ड नॉर्थब्रुक (1872–76), लॉर्ड लिटन (1876–80), लॉर्ड रिपन (1880–84), लॉर्ड डफरिन (1884–88), लॉर्ड लैंसडाउन (1888–94), लॉर्ड एल्गिन द्वितीय (1894–99) और लॉर्ड कर्जन (1899–1905) ने भारत पर शासन किया।

लॉर्ड मेयो (1869–72) ने भारत में आर्थिक विकेंद्रीकरण के लिए 1869 में महत्वपूर्ण कदम उठाए। उन्होंने भारतीय राजकुमारों की शिक्षा और राजनीतिक प्रशिक्षण के लिए दो कॉलेज स्थापित किए — राजकोट कॉलेज (काठियावाड़) और मेयो कॉलेज (अजमेर, राजस्थान)। 1872 में भारत की प्रथम जनगणना इसी काल में हुई। दुर्भाग्य से 1872 में अंडमान में एक वहाबी पठान ने उनकी हत्या कर दी। उनका कार्यकाल यद्यपि छोटा रहा, किंतु उनके प्रशासनिक सुधार दीर्घकालिक प्रभाव वाले थे।

लॉर्ड नॉर्थब्रुक (1872–76) के काल में बाबा राम सिंह और भगत जवाहरमल के नेतृत्व में हुए कूका विद्रोह का दमन 1872 में किया गया। केशव चंद्र सेन के प्रयासों से ‘ब्रह्म मैरिज एक्ट’ 1872 में पारित हुआ, जिसमें बाल विवाह को प्रतिबंधित किया गया। लॉर्ड लिटन (1876–80) के काल में दक्कन में भीषण अकाल (1876–78) पड़ा। 1878 में वर्नाक्यूलर प्रेस अधिनियम पास किया गया जिसके तहत देशी भाषाओं के समाचार पत्रों पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगाए गए। इससे बचने के लिए अमृत बाजार पत्रिका ने रातों-रात बंगाली से अंग्रेजी भाषा में अपना रूप बदल लिया।

लॉर्ड रिपन (1880–84) भारत में सबसे लोकप्रिय वायसराय थे। वे प्रजातंत्र के समर्थक और भारतीय प्रशासन में भारतीयों की हिस्सेदारी बढ़ाने के पक्षधर थे। उन्हें ‘स्थानीय स्वशासन का जनक’ कहा जाता है। 1881 में प्रथम फैक्ट्री अधिनियम बाल मजदूरों के कल्याण के लिए पारित हुआ। 1881 में भारत की प्रथम नियमित जनगणना (Regular Census) हुई, जिसमें अनुमानित जनसंख्या 254 मिलियन आंकी गई। यहीं से हर 10 वर्ष में जनगणना की परंपरा शुरू हुई जो आज भी जारी है।

लॉर्ड लिटन के काल का वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट रिपन ने 1882 में समाप्त कर दिया। सर विलियम हंटर की अध्यक्षता में हंटर कमीशन (1882) गठित किया गया, जिसमें प्राथमिक शिक्षा पर विशेष बल दिया गया। 1882 में पंजाब विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। 1883 में विवादास्पद इल्बर्ट बिल (Ilbert Bill) पेश किया गया, जिसके अंतर्गत भारतीय न्यायाधीशों को यूरोपीयनों से संबंधित मुकदमों की सुनवाई का अधिकार दिया गया। 1883 में अकाल संहिता (Famine Code) की स्थापना भी की गई।

लॉर्ड कर्जन (1899–1905) भारत के सर्वाधिक अलोकप्रिय वायसराय थे। उन्होंने कई महत्वपूर्ण आयोगों का गठन किया — सर एंड्रयू फ्रेजर की अध्यक्षता में पुलिस आयोग (1902) और सर थॉमस रैले की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय आयोग (1902)। इसी के सिफारिशों पर 1904 में भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम पारित हुआ। प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम (1904) भी इसी काल में आया। 16 अक्टूबर 1905 को बंगाल का विभाजन उनके सबसे विवादास्पद निर्णयों में से एक था, जिसने भारत में स्वदेशी आंदोलन को जन्म दिया।

बंगाल विभाजन (1905) ने राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई दिशा दी। बंगाल में स्वदेशी आंदोलन और ब्रिटिश माल के बहिष्कार ने सारे भारत को प्रभावित किया। लॉर्ड मिंटो (1905–1910) के काल में 1907 में कांग्रेस का सूरत विभाजन हुआ, जिसमें गरम दल (तिलक) और नरम दल (गोखले) के बीच मतभेद चरम पर पहुँचे। 1909 में मार्ले-मिंटो सुधार अधिनियम पारित हुआ, जिसमें मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन व्यवस्था की गई। यह निर्णय भारत में सांप्रदायिक राजनीति का आधार बना।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना लॉर्ड डफरिन (1884–88) के काल में सेवानिवृत्त अंग्रेज सिविल सेवक ए.ओ. ह्यूम के नेतृत्व में हुई थी। इसका प्रथम अधिवेशन बंबई में गोकुलदास तेजपाल संस्कृत भवन में व्योमेश चंद्र बनर्जी की अध्यक्षता में 1885 में हुआ। कांग्रेस ने धीरे-धीरे भारत में राष्ट्रीय चेतना के प्रमुख संगठन के रूप में अपनी पहचान बनाई। प्रारंभ में कांग्रेस संवैधानिक तरीकों से सुधार माँगती थी। गरम दल के उभार के बाद कांग्रेस में पूर्ण स्वराज की माँग जोर पकड़ने लगी।

30 दिसंबर 1906 को ढाका में मोहम्मडन एजूकेशनल कांफ्रेंस के अधिवेशन में मुस्लिम लीग की स्थापना की गई। इसका मुख्य उद्देश्य मुसलमानों के राजनीतिक हितों की रक्षा करना तथा मुसलमानों में सरकार के प्रति निष्ठा उत्पन्न करना था। इसी के साथ 1875 में सर सैय्यद अहमद खाँ ने अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना की थी, जो बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना। 1909 के मार्ले-मिंटो सुधार से मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था ने लीग को और महत्वपूर्ण बना दिया।

बंगाल विभाजन (1905) के विरोध में देश भर में व्यापक स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ। बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय और अरविंद घोष इस आंदोलन के प्रमुख नेता थे। ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार किया गया और स्वदेशी उद्योगों को प्रोत्साहित किया गया। इस आंदोलन से भारतीय स्वाभिमान और राष्ट्रभावना को नई ऊर्जा मिली। लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय (1910–16) के काल में 1911 में बंगाल विभाजन रद्द कर दिया गया। 1911 में ही भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा हुई और 1912 में दिल्ली राजधानी बनी।

लॉर्ड चेम्सफोर्ड (1916–21) के काल से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम एक नए और अधिक व्यापक चरण में प्रवेश कर गया। 1916 में दो होमरुल लीगों की स्थापना हुई — पहला तिलक द्वारा अप्रैल 1916 में और दूसरा श्रीमती एनी बेसेंट द्वारा सितंबर 1916 में। लखनऊ समझौता (1916) में कांग्रेस और मुस्लिम लीग एकजुट हुईं। जनवरी 1915 में महात्मा गाँधी का भारत वापस आना और 1916 में साबरमती आश्रम की स्थापना ने देश की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ा।

गाँधीजी ने 1917 में चंपारण सत्याग्रह के रूप में भारत में पहली बार सत्याग्रह का प्रयोग किया। 1918 में अहमदाबाद और खेड़ा में भी सत्याग्रह हुए। रॉलैट एक्ट (मार्च 1919) के विरोध में और जलियाँवाला बाग काँड (13 अप्रैल 1919) के बाद असहयोग आंदोलन (1920) शुरू हुआ। 5 फरवरी 1922 को चौरी-चौरा काँड (उत्तर प्रदेश) में हिंसा के कारण गाँधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया। खिलाफत आंदोलन (1919) के साथ असहयोग आंदोलन ने हिंदू-मुस्लिम एकता का दुर्लभ दृश्य प्रस्तुत किया।

लॉर्ड रीडिंग (1921–26) एकमात्र यहूदी गवर्नर जनरल थे। उनके काल में 1921 में प्रिंस ऑफ वेल्स की भारत यात्रा का बहिष्कार हुआ। मार्च 1923 में स्वराज पार्टी की स्थापना इलाहाबाद में हुई, जिसके सचिव मोतीलाल नेहरू और अध्यक्ष चितरंजन दास थे। 1925 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई। लॉर्ड इरविन (1926–31) के काल में 8 नवंबर 1927 को साइमन कमीशन की नियुक्ति हुई। 3 फरवरी 1928 को बंबई बंदरगाह पर उतरे साइमन कमीशन का जोरदार बहिष्कार हुआ और ‘साइमन वापस जाओ’ के नारे गूँजे।

31 दिसंबर 1929 को कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में पूर्ण स्वराज का लक्ष्य निर्धारित किया गया। 26 जनवरी 1930 को कांग्रेस ने रावी नदी के किनारे भारत का पहला स्वतंत्रता दिवस मनाया। 12 मार्च 1930 को गाँधीजी ने दांडी यात्रा (गुजरात के नवसारी जिले में स्थित) के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया। नमक कानून तोड़कर गाँधीजी ने ब्रिटिश सरकार को सीधी चुनौती दी। 1930 में लंदन में प्रथम गोलमेज सम्मेलन हुआ जिसका कांग्रेस ने बहिष्कार किया।

5 मार्च 1931 को गाँधी-इरविन समझौते के बाद सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित हुआ और कांग्रेस ने द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931, लंदन) में भाग लेने की स्वीकृति दी। महात्मा गाँधी ने कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि की हैसियत से S.S. राजपूताना जहाज से लंदन पहुँचे, परंतु सम्मेलन असफल रहा। लॉर्ड वेलिंगटन (1931–36) के काल में 1932 में मैकडोनाल्ड द्वारा कम्युनल अवार्ड की घोषणा हुई, जिसमें हरिजनों को पृथक निर्वाचन मंडल देने की बात कही गई। इसके विरोध में गाँधीजी ने पूना की यरवदा जेल में आमरण अनशन किया।

1932 में पूना समझौता (Poona Pact) गाँधीजी और डॉ. अंबेडकर के बीच हुआ, जिसमें हरिजनों के लिए सुरक्षित सीटों की संख्या बढ़ाई गई। 1934 में आचार्य नरेंद्र देव और जयप्रकाश नारायण ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की। 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई। भारत सरकार अधिनियम 1935 में ब्रिटिश इंडिया और भारतीय रियासतों को मिलाकर ‘ऑल इंडिया फेडरेशन’ की स्थापना का लक्ष्य रखा गया। प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त हुआ और इसी अधिनियम से बर्मा को भारत से अलग करने की घोषणा हुई।

लॉर्ड लिनलिथगो (1936–43) के काल में द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत (1 सितंबर 1939) हुई। मुस्लिम लीग ने लाहौर अधिवेशन (मार्च 1940) में द्विराष्ट्र सिद्धांत पारित किया। 8 अगस्त 1942 को कांग्रेस ने मौलाना अबुल कलाम आजाद की अध्यक्षता में बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में ‘भारत छोड़ो प्रस्ताव’ पारित किया, जिसे ‘अगस्त संकल्प’ भी कहा जाता है। 9 अगस्त 1942 को ‘ऑपरेशन जीरो आवर’ के तहत सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार किया गया। गाँधीजी को पूना के आगा खाँ पैलेस में कस्तूरबा गाँधी और सरोजनी नायडू के साथ कैद किया गया।

लॉर्ड वेवेल (1943–47) के काल में 14 जून 1945 को वेवेल योजना की घोषणा हुई और 25 जून 1945 को शिमला सम्मेलन का आयोजन हुआ, जो मुस्लिम लीग की हठधर्मिता के कारण असफल रहा। 14 अगस्त 1945 को जापान के आत्मसमर्पण के साथ द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हुआ। नवंबर 1945 में आजाद हिंद फौज के तीन सैनिकों — जनरल शाहनवाज, गुरदयाल सिंह ढिल्लों और प्रेम कुमार सहगल — पर दिल्ली के लाल किले में मुकदमा चला। ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने तीन सदस्यीय कैबिनेट मिशन (क्रिप्स, पैथिक लॉरेंस, अलेक्जेंडर) भेजा। सितंबर 1946 में जवाहरलाल नेहरू की अंतरिम सरकार का गठन हुआ।

लॉर्ड माउंटबेटन (मार्च 1947 – अगस्त 1948) भारत के अंतिम वायसराय और स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल बने। 20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने जून 1948 तक भारत को सत्ता हस्तांतरित करने की घोषणा की। माउंटबेटन की नियुक्ति के बाद यह समय-सीमा आगे बढ़ाने के बजाय घटाकर 15 अगस्त 1947 कर दी गई। सांप्रदायिक दंगों की स्थिति और राजनीतिक अनिश्चितता को देखते हुए शीघ्र सत्ता हस्तांतरण का निर्णय लिया गया।

3 जून 1947 को माउंटबेटन योजना की घोषणा की गई, जिसमें भारत के दो भागों — भारत और पाकिस्तान — में विभाजन का प्रस्ताव रखा गया। इस योजना को कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने स्वीकार किया। जुलाई 1947 में ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वाधीनता अधिनियम (Indian Independence Act) पारित किया। इस अधिनियम के अंतर्गत 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान और 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र राज्य बने। सीमा निर्धारण का कार्य सर सिरिल रेडक्लिफ को सौंपा गया।

भारत-पाकिस्तान विभाजन इतिहास का एक अत्यंत दुखद और हिंसक अध्याय था। लाखों लोग विस्थापित हुए और हजारों लोग सांप्रदायिक हिंसा में मारे गए। पंजाब और बंगाल दोनों प्रांतों का विभाजन हुआ। भारत की रियासतों के विलय की प्रक्रिया सरदार वल्लभभाई पटेल और वी.पी. मेनन ने कुशलता से संचालित की। 16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग द्वारा ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस’ की घोषणा के बाद हुए दंगों ने विभाजन की स्थिति को अपरिहार्य बना दिया। विभाजन की पीड़ा भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के लोगों के जेहन में आज भी जीवित है।

मोहम्मद अली जिन्ना स्वतंत्र पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर जनरल बने। 1940 के लाहौर अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने द्विराष्ट्र सिद्धांत अपनाकर एक अलग मुस्लिम राष्ट्र की माँग की थी। जिन्ना ने सी.आर. फार्मूला (1944) को यह कहते हुए अस्वीकार किया था कि इसमें ‘लुंज-पुंज और भूसा जैसा’ पाकिस्तान दिया जा रहा है। उनके नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने 1946 के चुनावों में मुस्लिम सीटों पर भारी बहुमत प्राप्त किया। 14 अगस्त 1947 को कराची में पाकिस्तान की स्थापना हुई और जिन्ना उसके प्रथम गवर्नर जनरल बने।

लॉर्ड माउंटबेटन स्वतंत्र भारत के प्रथम और अंतिम अंग्रेज गवर्नर जनरल थे। जून 1948 में उनके पद छोड़ने के बाद सी. राजगोपालाचारी (चक्रवर्ती राजगोपालाचारी) भारत के प्रथम भारतीय और अंतिम गवर्नर जनरल बने। वे 1948 से 1950 तक इस पद पर रहे। 26 जनवरी 1950 को भारत गणराज्य बना और गवर्नर जनरल का पद समाप्त हो गया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने। शिक्षा के लिए राधाकृष्णन आयोग (1948–49) इसी काल में गठित हुआ।

ब्रिटिश गवर्नर जनरल और वायसराय का भारत पर प्रभाव

लगभग 175 वर्षों (1773–1950) तक गवर्नर जनरल और वायसराय के रूप में अनेक ब्रिटिश पदाधिकारियों ने भारत पर शासन किया। इन पदाधिकारियों ने एक ओर जहाँ भारत का शोषण किया, वहीं दूसरी ओर रेलवे, डाक, तार, आधुनिक शिक्षा, कानून व्यवस्था जैसी सुविधाएं भी लाईं। सती प्रथा, ठगी प्रथा, बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों को दूर करने में भी इनका योगदान रहा। परंतु हड़प नीति, बंगाल विभाजन, जलियाँवाला बाग जैसी घटनाएँ ब्रिटिश शासन के क्रूर चेहरे को उजागर करती हैं।

भारत की प्रतिक्रिया और राष्ट्रीय जागरण

ब्रिटिश शासन की शोषणकारी नीतियों के विरुद्ध भारतीयों ने समय-समय पर प्रतिरोध किया। 1857 के महाविद्रोह से लेकर गाँधीजी के सत्याग्रह तक, भारतीयों ने अपनी स्वतंत्रता के लिए अनगिनत बलिदान दिए। राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गाँधी, सुभाष चंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू और अनगिनत अन्य नेताओं ने देश की आजादी के लिए संघर्ष किया। अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में अपनी यात्रा शुरू की।

ऐतिहासिक महत्व और समकालीन प्रासंगिकता

गवर्नर जनरल और वायसराय के काल का ऐतिहासिक अध्ययन आज भी प्रासंगिक है। इस काल में पारित कानून, बनाई गई संस्थाएँ और किए गए प्रशासनिक सुधार आधुनिक भारत की नींव हैं। भारतीय दंड संहिता (1860), संविधान सभा का विचार, लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ सब इसी काल की देन हैं। इतिहास से सीख लेकर ही कोई राष्ट्र अपना भविष्य निर्मित कर सकता है। ब्रिटिश शासन का यह कालखंड भारत के लिए पीड़ा और संघर्ष का काल था, साथ ही आधुनिकता के अनेक बीज भी इसी काल में बोए गए।

  • 1773 — रेगुलेटिंग एक्ट, बंगाल के पहले गवर्नर जनरल: वारेन हेस्टिंग्स
  • 1828–35 — लॉर्ड विलियम बैंटिक: सती प्रथा उन्मूलन (1829), चार्टर एक्ट (1833), भारत के प्रथम गवर्नर जनरल
  • 1835–36 — सर चार्ल्स मेटकॉफ: प्रेस की स्वतंत्रता, भारतीय पत्रकारिता के मुक्तिदाता
  • 1836–42 — लॉर्ड आकलैंड: प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध (1839–42)
  • 1842–44 — लॉर्ड एलनबरो: सिंध विलय (1843), दास प्रथा उन्मूलन अधिनियम लागू (1843)
  • 1844–48 — लॉर्ड हार्डिंग: प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध (1845–46), लाहौर संधि (1846)
  • 1848–56 — लॉर्ड डलहौजी: हड़प नीति, पहली रेलवे (1853), तार सेवा (1853), विधवा पुनर्विवाह अधिनियम (1856)
  • 1856–62 — लॉर्ड कैनिंग: 1857 विद्रोह, भारत शासन अधिनियम (1858), प्रथम वायसराय
  • 1858 — वायसराय काल शुरू, रानी विक्टोरिया की घोषणा (1 नवंबर 1858)
  • 1869–72 — लॉर्ड मेयो: प्रथम जनगणना (1872), मेयो कॉलेज (अजमेर)
  • 1880–84 — लॉर्ड रिपन: स्थानीय स्वशासन के जनक, प्रथम नियमित जनगणना (1881), हंटर कमीशन (1882)
  • 1884–88 — लॉर्ड डफरिन: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885)
  • 1899–1905 — लॉर्ड कर्जन: बंगाल विभाजन (1905), सर्वाधिक अलोकप्रिय वायसराय
  • 1905–10 — लॉर्ड मिंटो: मुस्लिम लीग (1906), मार्ले-मिंटो सुधार (1909)
  • 1910–16 — लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय: बंगाल विभाजन रद्द (1911), दिल्ली राजधानी (1912)
  • 1916–21 — लॉर्ड चेम्सफोर्ड: रॉलैट एक्ट (1919), जलियाँवाला बाग (1919), माण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (1919)
  • 1921–26 — लॉर्ड रीडिंग: एकमात्र यहूदी गवर्नर जनरल, स्वराज पार्टी (1923)
  • 1926–31 — लॉर्ड इरविन: साइमन कमीशन (1927), दांडी मार्च (1930), गाँधी-इरविन समझौता (1931)
  • 1931–36 — लॉर्ड वेलिंगटन: कम्युनल अवार्ड (1932), पूना समझौता (1932), भारत सरकार अधिनियम (1935)
  • 1936–43 — लॉर्ड लिनलिथगो: द्वितीय विश्व युद्ध, भारत छोड़ो आंदोलन (1942)
  • 1943–47 — लॉर्ड वेवेल: वेवेल योजना (1945), शिमला सम्मेलन (1945), कैबिनेट मिशन
  • 1947–48 — लॉर्ड माउंटबेटन: भारत-पाकिस्तान विभाजन (1947), अंतिम वायसराय व प्रथम अंग्रेज गवर्नर जनरल (स्वतंत्र भारत)
  • 1948–50 — सी. राजगोपालाचारी: प्रथम और अंतिम भारतीय गवर्नर जनरल
  • 26 जनवरी 1950 — भारत गणराज्य बना, गवर्नर जनरल पद समाप्त

रॉबर्ट क्लाइव से लॉर्ड एमहर्स्ट तक: बंगाल के गवर्नर

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