
शुरुआत की बात
दोस्तों, भारत में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जो राष्ट्रीय आंदोलन चला, उसकी गहराई से पड़ताल करने से पहले ये समझना बेहद जरूरी है कि आखिर वो कौन-सी परिस्थितियां थीं जिन्होंने इस आंदोलन को जन्म दिया। भारत में राष्ट्रवाद की भावना किन वजहों से पनपी, इसके पीछे कई अहम कारण थे। आइए, इन कारणों को एक-एक करके समझते हैं।
1857 का महान विद्रोह – पहली चिंगारी
भाइयों, बात शुरू होती है 1857 के उस ऐतिहासिक विद्रोह से। यह अंग्रेजी शासन के खिलाफ भारतीयों का पहला बड़े पैमाने का सशस्त्र विद्रोह था। पहली बार पूरे देश के विशाल इलाके और करोड़ों लोग इस विद्रोह से प्रभावित हुए थे।
सच कहूं तो अंग्रेजों ने इस विद्रोह को अपनी तकनीकी ताकत और बेहद क्रूर तरीकों से कुचल दिया था। लेकिन जानते हैं, इस विद्रोह ने भारतीयों के मन में एक बीज बो दिया था। पहली बार लोगों को यह एहसास हुआ कि अगर संगठित होकर लड़ें, तो अंग्रेजों को देश से बाहर खदेड़ना नामुमकिन नहीं है।
विद्रोह के दौरान जो कुछ हुआ, उसने भले ही उस वक्त अफरा-तफरी मचा दी हो, लेकिन इसका असर लंबे समय तक रहा। यह बाद में उभरने वाली राष्ट्रवादी भावनाओं के लिए खाद का काम किया। भारतीय उन शहादतों को कभी नहीं भूल पाए जो इस विद्रोह के दौरान दी गईं। अंग्रेजों ने विद्रोह के समय और उसके बाद भी जो सामूहिक नरसंहार और अत्याचार किए, उससे भारतीय जनता की आत्मा तक दहल गई थी।
सर थॉमसन एडवर्ड ने बिल्कुल सही कहा था: “जब भी कोई भारतीय किसी अंग्रेज से बात करता है, तो उसके दिमाग की गहराई में एक भूत की तस्वीर घूमती रहती है – वो भूत बदले की भावना से भरा है और बदला न ले पाने की बेचैनी उसे चैन नहीं लेने देती।”
विद्रोह के बाद – नया दौर, नई चालें
विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने भारत में जो नई नीतियां अपनाईं, उन्होंने भी राष्ट्रीयता की आग को हवा दी। सबसे बड़ा बदलाव यह हुआ कि ईस्ट इंडिया कंपनी का राज खत्म कर दिया गया और सीधे ब्रिटिश महारानी के शासन की शुरुआत हुई।
पहले तो कंपनी के डायरेक्टर और बोर्ड ऑफ कंट्रोल राज चलाते थे, लेकिन अब सारी ताकत ‘भारत मंत्री’ (Secretary of State for India) के हाथों में आ गई। यह मंत्री ब्रिटिश कैबिनेट का सदस्य होता था और संसद के प्रति जवाबदेह था। यानी असली सत्ता ब्रिटिश संसद के हाथों में थी।
1858 के बाद भारतीय प्रशासन पहले से भी ज्यादा दमनकारी हो गया। उदारवाद का दिखावा भी धीरे-धीरे बंद हो गया। इसके अलावा अंग्रेजों ने भविष्य में इस तरह के किसी भी विद्रोह को रोकने के लिए कई कठोर कदम उठाए, जिन्होंने जनता को गहरे तक उद्वेलित किया।
बाबर ने 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई में इब्राहिम लोदी को हराकर जो मुगल साम्राज्य स्थापित किया था, अंग्रेजों ने उसका पूरी तरह अंत कर दिया। मुगल वंश के आखिरी बादशाह बहादुर शाह जफर को हुमायूं के मकबरे से गिरफ्तार कर रंगून (अब यांगून, म्यांमार) भेज दिया गया। भारत के शासन के इस आखिरी प्रतीक को भी अंग्रेजों ने समाप्त कर दिया। बहादुरशाह के दोनों बेटों को गोली मार दी गई। ये सब ऐसे काम थे जिन्होंने भारतीयों की रूह को हिला कर रख दिया।
महारानी विक्टोरिया का घोषणापत्र – खोखले वादे
1858 के भारतीय प्रशासन अधिनियम के बाद 1 नवंबर 1858 को इलाहाबाद में एक शाही दरबार हुआ। लॉर्ड कैनिंग ने ‘रानी विक्टोरिया के घोषणापत्र’ के जरिए इस बदलाव की घोषणा की।
इस घोषणापत्र में जो बातें और वादे किए गए थे, वक्त के साथ साफ होता गया कि ब्रिटिश सरकार ने सिर्फ भारतीयों को बहलाने के लिए ऐसी घोषणा की थी। विक्टोरिया ने कहा था कि भारतीयों के धार्मिक और सामाजिक जीवन में अब कोई दखलअंदाजी नहीं होगी। नौकरियों में जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं होगा। हर व्यक्ति को योग्यता और क्षमता के आधार पर नौकरी मिलेगी।
लॉर्ड डलहौजी ने जमींदारों से जो जमीनें छीन ली थीं, उन्हें वापस करने का वादा किया गया। देशी रियासतों के राजाओं से सभी संधियों का पालन करने का आश्वासन दिया गया। सार्वजनिक कार्य पूरी जनता के हित में किए जाने की बात कही गई।
सच कहूं तो अगर इन वादों को ईमानदारी से लागू किया जाता, तो भारतीयों का विश्वास जीता जा सकता था। लेकिन सभ्यता का ढोंग करने वाले इन अंग्रेजों ने ऐसी बर्बरता दिखाई जिसकी मिसाल इंसानों और जानवरों की दुनिया में भी दुर्लभ है।
नस्लवाद का जहर – अपमान की हद
अंग्रेजों की भारतीयों के प्रति जो नस्लवादी सोच थी, उसने भी लोगों को झकझोर दिया। गैरेट के मुताबिक: “वे हिंदुस्तानियों को ऐसा प्राणी समझते थे जो आधा हब्शी और आधा गोरिल्ला था। उनकी नजर में हिंदुस्तानी पेड़ों और पत्थरों की पूजा करने वाला नास्तिक था, जो जानवरों की तरह बांसों पर झूलता था। उसे बराबरी का दर्जा देना मूर्खता है।”
यह नस्लवादी सोच अंग्रेजों की सोची-समझी रणनीति का नतीजा थी। अपनी बातों को सही ठहराने के लिए उन्होंने कई जुमले गढ़े थे। वे कहते थे कि भारतीय सिर्फ डर की भाषा समझते हैं। एक यूरोपीय कई भारतीयों का अकेले मुकाबला कर सकता है।
उनका मानना था कि इंग्लैंड ने भारत को जीतने में हजारों जानें गंवाई हैं और करोड़ों पौंड खर्च किए हैं, इसलिए उसे पूरा हर्जाना मिलना चाहिए। यानी भारत की संपत्ति पर पहला हक अंग्रेजों का है।
दरअसल, भारतीयों के प्रति इस घमंडी सोच की नींव लॉर्ड मैकॉले के विचारों में मिलती है। उसने यूरोपीयों की श्रेष्ठता और भारतीयों की हीनता साबित करने वाले कई विचार रखे। उसका मानना था कि “यूरोप के एक अच्छे पुस्तकालय की एक अलमारी की एक पंक्ति की किताबें भारत और अरब के पूरे साहित्य से ज्यादा मूल्यवान हैं।”
लॉर्ड मैकॉले ने भारतीय संस्कृति को ‘अंधविश्वासों का भंडार’ बताया। इससे भी पहले लॉर्ड कॉर्नवालिस ने कहा था कि “हिंदुस्तान का हर निवासी भ्रष्ट है।” विद्रोह के बाद इस तरह के विचारों को खुलकर बढ़ावा दिया जाने लगा। इसने भारतीयों को अंदर तक हिला दिया।
रेलवे – एक दोधारी तलवार

19वीं सदी के उत्तरार्ध में अंग्रेजों ने भारत में रेलवे की शुरुआत की। इसने भी राष्ट्रीयता की भावनाओं को जन्म देने में अहम भूमिका निभाई। रेलवे की स्थापना का भारतीय जीवन, संस्कृति और अर्थव्यवस्था पर क्रांतिकारी प्रभाव पड़ा।
रेलों से पहले अंग्रेज न तो भारतीय जीवन में सही मायने में प्रवेश कर पाए थे, न भारत को विकासशील बाजार से जोड़ पाए थे। 20 अप्रैल 1853 को लॉर्ड डलहौजी ने अपना प्रसिद्ध रेलवे वक्तव्य जारी किया। उसमें बताया गया कि रेलवे से ईस्ट इंडिया कंपनी को क्या व्यावसायिक फायदे होंगे।
डलहौजी का कहना था कि जहां आवागमन की सुविधा नहीं है, वहां विद्रोहों को दबाने के लिए रेलवे से जल्दी सैनिक पहुंचाए जा सकते हैं। वाणिज्य की दृष्टि से उसने कहा कि इंग्लैंड भारतीय कपास के लिए तरस रहा है और रेलवे से दूर-दराज इलाकों से भी कपास लाया जा सकता है। साथ ही ब्रिटिश उत्पादों के लिए दूर के बाजार भी खोले जा सकते हैं।
इस व्यवस्था को नैतिक औचित्य देते हुए अंग्रेजों ने लोकोपकार की बात की और घोषणा की कि रेलों से देश की गरीबी और अकाल का खात्मा होगा। लेकिन असलियत में इसका मकसद अपने आर्थिक हितों की पूर्ति था।
इस रेल व्यवस्था से भारत का चौतरफा शोषण हुआ। 1898 में जी.एस. अय्यर ने कहा कि मौजूदा रेलवे नीति देश के लिए ‘बहुमुखी रोग’ साबित हुई है। उन्होंने कहा, “इस देश में रेल की हर अतिरिक्त मील का निर्माण किसी न किसी उद्योग के कफन में एक नई कील है।”
तिलक महोदय ने तो शुरुआत में ही कहा था कि “रेल, तार और सड़क जैसे साधनों की भारत को कोई जरूरत नहीं है। ये तो दूसरे की पत्नी को सजाने जैसा है।” भारतीय विद्वानों और अखबारों की इस तरह की आलोचना ने लोगों में राष्ट्रीयता की भावनाओं को मजबूत किया।
लेकिन एक और तरीके से रेलवे ने राष्ट्रीयता को बढ़ावा दिया। इसने पूरे भारत को एक धागे में पिरो दिया। रेलों ने देश में राजनीतिक चेतना फैलाने में योगदान दिया। राष्ट्रीय नेताओं के लिए देश भर में घूम-घूमकर स्वतंत्रता का बिगुल बजाना आसान हो गया। इस तरह रेलों ने भारतीयों में राष्ट्रीय भावना और एकता का संचार किया।
सफर के दौरान छुआछूत की भावनाओं का पालन संभव नहीं रह गया। इसलिए रेलों के विकास से समाज के जाति-पांति के बंधन ढीले हो गए। दूसरे शब्दों में, इसने वैज्ञानिक सोच के विकास में अहम भूमिका निभाई। कार्ल मार्क्स ने लिखा है कि “भारतीय रेल किसी न किसी रूप में देश के आधुनिकीकरण में अग्रणी थी।”
19वीं सदी के भेदभावपूर्ण कानून
19वीं सदी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश सरकार ने कुछ ऐसे कानून बनाए जिन्होंने भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावनाओं को भड़काया। विद्रोह के बाद 1861 में ‘भारतीय परिषद अधिनियम’ पारित किया गया। इस कानून के जरिए वायसराय की कार्यकारी परिषद में एक पांचवा सदस्य जोड़ा गया, जो कानून का जानकार था।
इस कानून के मुताबिक बंबई और मद्रास प्रांतों को अपने लिए कानून बनाने का अधिकार दिया गया, लेकिन इन परिषदों के बनाए कोई भी कानून तब तक वैध नहीं माने जाते थे जब तक गवर्नर जनरल की मंजूरी न मिल जाए।
गवर्नर जनरल की काउंसिल को कानून बनाने की अनुमति दी गई, इसलिए इसका नाम बदलकर ‘इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल’ (साम्राज्यवादी विधायी परिषद) कर दिया गया। कानून बनाने के लिए गवर्नर जनरल को यह अधिकार था कि वह कम से कम 6 और ज्यादा से ज्यादा 12 सदस्यों को नामित करे। इनमें कम से कम आधे गैर-सरकारी होंगे, जिनमें कुछ भारतीय भी शामिल होंगे।
इस परिषद का काम सिर्फ कानून बनाना था। इसका प्रशासन या वित्त पर कोई नियंत्रण नहीं था। बिना पूर्व स्वीकृति के इन सदस्यों को सवाल पूछने या काम में दखल देने का अधिकार नहीं था। कुछ मामलों को तो गवर्नर जनरल की अनुमति के बिना उठाया ही नहीं जा सकता था।
इस कानून ने जो परिषदें बनाईं, वे कानून के मामले में सिर्फ सलाह की भूमिका निभा सकती थीं। ये किसी भी तरह की शिकायत की सुनवाई नहीं कर सकतीं थीं और न ही किसी प्रशासनिक आदेश पर विरोध जता सकती थीं।
इसके अलावा प्रांतों में विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया तो शुरू की गई, लेकिन भारत सरकार की शक्ति में कोई खास कमी नहीं आई। केंद्र और प्रांतों के कार्यक्षेत्र को अलग करने का कोई प्रयास नहीं किया गया। जॉर्ज यूल ने 1861 के इंडियन काउंसिल एक्ट की आलोचना करते हुए कहा कि यह कानून “भारतीयों को दूध की बोतल देने जैसा है, जबकि भारतीय अब व्यस्क हो गए हैं और उन्हें पूर्ण भोजन की जरूरत है।”
इस कानून की कमियों ने बाद में भारतीयों को प्रेरित किया कि वे और रियायतें हासिल करें। इसलिए भारतीयों ने विधानपरिषदों का विस्तार करने और उन्हें ज्यादा प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने की मांग की। इन परिस्थितियों में 1892 में एक और ‘भारतीय परिषद अधिनियम’ पारित किया गया।
इस कानून के तहत केंद्रीय विधानमंडल में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ाकर कम से कम 10 और ज्यादा से ज्यादा 16 कर दी गई। परिषद के कम से कम 40% सदस्य गैर-सरकारी होना तय किया गया। बंगाल, मद्रास और बंबई विधानमंडलों में यह संख्या कम से कम 8 और ज्यादा से ज्यादा 20 रखी गई।
इन सदस्यों की नियुक्ति के लिए चुनाव और नामांकन के बीच की प्रक्रिया तय की गई। यानी केंद्र और प्रांतों के विधानमंडलों में अतिरिक्त सदस्यों की नियुक्ति अब न तो पूरी तरह चुनाव से होनी थी और न ही पूरी तरह नामांकन से। दिलचस्प बात यह है कि इस कानून में चतुराई से ‘चुनाव’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया था।
प्रेस की ताकत – जनता की आवाज
राष्ट्रवाद के विकास में आधुनिक प्रेस की भी बड़ी भूमिका रही। भारत में प्रिंटिंग प्रेस लाने का श्रेय पुर्तगालियों को जाता है, लेकिन प्रेस को जनता का आईना बनाने का श्रेय अंग्रेजों को जाता है।
पत्रकारिता की शुरुआत सरकारी नीतियों के बारे में जनता को बताने, जनता की जरूरतों और सरकारी नीतियों पर उठने वाली प्रतिक्रियाओं से सरकार को अवगत कराने और दोनों को समकालीन घटनाओं की जानकारी देने के लिए हुई। शुरुआत में प्रेस का मकसद साम्राज्यवादी जरूरतों की पूर्ति करना था।
लेकिन आधुनिक शिक्षा प्राप्त भारतीयों ने 19वीं सदी के उत्तरार्ध में इसे अपने आर्थिक असंतोष की अभिव्यक्ति और जनता को आधुनिक राजनीतिक विचारों में प्रशिक्षित करने का माध्यम बनाया। अखबारों और लेखों के जरिए राष्ट्रवादी भारतीयों ने देशभक्ति की भावनाओं, आधुनिक आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विचारों का प्रचार किया।
राष्ट्रीयता की भावनाओं में तेजी तब और बढ़ी, जब अंग्रेज अधिकारियों ने भारतीय अखबारों पर प्रतिबंध लगाने वाले कई भेदभावपूर्ण कानून बनाए। इसमें सबसे ज्यादा असरदार ‘वर्नाक्युलर प्रेस अधिनियम’ था।
लॉर्ड लिटन के दमनकारी कदम – गुस्से की आग

लॉर्ड लिटन के काल में (1876-80) कुछ ऐसे कदम उठाए गए जिन्होंने भारतीयों को अंदर तक हिला दिया। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि लॉर्ड लिटन ने अपने कारनामों से भारत में राष्ट्रवाद की प्रक्रिया को और तेज कर दिया।
उसका पहला कदम जिसने लोगों को उद्वेलित किया, वह ‘शाही पद अधिनियम’ (Royal Title Act) था। 1876 में इस कानून के तहत रानी विक्टोरिया ने भारत की साम्राज्ञी की उपाधि धारण की। लॉर्ड लिटन की ख्वाहिश थी कि भारत में एक ऐसे दरबार का आयोजन हो जिसमें भारत के सभी राजा हाजिर होकर इंग्लैंड के प्रति अपनी श्रद्धा प्रदर्शित करें।
इसके लिए उसने घोषणा की कि 1 जनवरी 1877 को दिल्ली में शाही दरबार का आयोजन होगा। तय तारीख पर दिल्ली में एक भव्य दरबार लगा, जिसमें भारतीय जनता और देशी रियासतों के शासकों के सामने महारानी विक्टोरिया को ‘कैसर-ए-हिंद’ की उपाधि से संबोधित किया गया।
भारतीयों की नाराजगी इस बात को लेकर थी कि करोड़ों रुपये खर्च वाले इस दरबार का आयोजन ऐसे समय में हुआ जब भारत में भयंकर अकाल पड़ा हुआ था। ‘इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ के लेखक रमेशचंद्र दत्त के मुताबिक 1 साल में 50 लाख लोग मारे गए थे। इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई। उस समय के प्रमुख अखबार ‘कलकत्ता पत्रिका’ ने लिखा: “रोम जल रहा था और नीरो बांसुरी बजा रहा था।”
उसका दूसरा विवादित कदम भारतीय भाषाओं में छपने वाले अखबारों पर प्रतिबंध लगाने वाला ‘वर्नाक्यूलर प्रेस अधिनियम’ था। भारतीय मामलों के प्रति उसके संवेदनहीन काम की वजह से भारतीय अखबारों में उसकी कड़ी आलोचना हो रही थी, जिससे वह बहुत नाराज था। वह प्रेस की इस कार्रवाई को राजद्रोह मानता था। उसने भारतीय अखबारों को सबक सिखाने के लिए 14 मार्च 1878 को यह कानून पारित किया।
इस कानून को भारतीय जनता ने ‘गला घोंटने वाले कानून’ की संज्ञा दी। सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने इसे ‘आकाश से होने वाला वज्रपात’ कहा। यह कानून सिर्फ भारतीय भाषाओं में छपने वाले अखबारों पर प्रतिबंध लगाता था, अंग्रेजी अखबारों पर नहीं। मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ कोई अपील नहीं की जा सकती थी।
इन सभी भेदभावपूर्ण विशेषताओं के कारण जल्द ही भारतीय जनमानस इसका तीखा आलोचक बन गया। उन्होंने जता दिया कि भारतीय भाषाई प्रेस और अंग्रेजी प्रेस के बीच किया जा रहा भेदभाव न्यायसंगत नहीं है। इस कानून के तहत सोमप्रकाश, ढाका प्रकाश, सहचर, भारत मिहिर जैसे अखबारों के खिलाफ मामले बनाए गए। ‘अमृत बाजार पत्रिका’ ने इस प्रतिबंध से बचने के लिए रातोंरात अपना माध्यम बंगाली से बदलकर अंग्रेजी कर लिया।
लिटन की दमनकारी नीति का एक और उदाहरण ‘आर्म्स एक्ट’ (मार्च 1878) था। इसके तहत बिना लाइसेंस के हथियार रखना और उसका व्यापार करना दंडनीय अपराध बना दिया गया। इसके उल्लंघन पर 3 साल की जेल या जुर्माना या दोनों की सजा थी। इसे छिपाने के प्रयास पर 7 साल की जेल या जुर्माना या दोनों की सजा एक साथ दी जा सकती थी।
उल्लेखनीय है कि खेती और निजी संपत्ति की सुरक्षा के लिए भारतीयों को हथियार रखने की सुविधा बहुत पहले से थी। इसलिए यह कानून भारतीयों को चुभा। इसका सबसे घिनौना पक्ष यह था कि जमींदारों, नगरपालिका सदस्यों, उपाधि प्राप्त प्रतिष्ठित व्यक्तियों, यूरोपीयों, एंग्लो-इंडियन, आर्मेनियन और सरकार के खास अधिकारियों को इस कानून से मुक्त रखा गया था।
इसके अलावा 1876 में इसी वायसराय के काल में सिविल सेवा की परीक्षा की आयु सीमा 21 साल से घटाकर 19 साल कर दी गई थी। आर्थिक क्षेत्र में उसने लंकाशायर के मिल मालिकों के हितों के लिए भारतीय जनता के हितों की अनदेखी की, क्योंकि उसने सूती कपड़े पर लगे 5% का आयात शुल्क हटा दिया था। इससे भारतीयों को अंग्रेजों के न्याय और समानता के व्यवहार के खोखलेपन का स्पष्ट सबूत मिला। एंग्लो-अफगान युद्ध में भी लिटन ने भारी मात्रा में धन खर्च किया और कई भारतीय सैनिक मारे गए।
लॉर्ड रिपन के दौर की अप्रिय घटनाएं – इल्बर्ट बिल का विवाद
लॉर्ड रिपन के काल में भी कुछ ऐसे प्रयास हुए जिन्होंने भारतीयों की भावनाओं को ठेस पहुंचाई। उस समय के कानून के मुताबिक प्रेसिडेंसी शहरों से बाहर रहने वाले यूरोपीयों पर सिर्फ यूरोपीय मजिस्ट्रेट या जज ही मुकदमा चला सकते थे।
1882 में आईसीएस के एक सदस्य बिहारी लाल गुप्ता और बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर एशले ईडन ने यह सवाल उठाया कि आईसीएस के कुछ भारतीय सदस्य इतने वरिष्ठ हो गए हैं कि वे सेशन जज बन सकते हैं और उन्हें भी यूरोपीय मजिस्ट्रेटों की तरह यूरोपीयों के मामलों की सुनवाई का अधिकार मिलना चाहिए। इसी का नतीजा था – ‘इल्बर्ट बिल’ (2 फरवरी 1883)।
सीपी इल्बर्ट उस समय वायसराय की कार्यकारी परिषद में कानून सदस्य थे। इस बिल के जरिए भारतीय मजिस्ट्रेटों पर लगे नस्लीय प्रतिबंधों को खत्म कर दिया गया। साथ ही अंग्रेजों को मिले कुछ विशेषाधिकार कम कर दिए गए।
इसका यूरोपीयों ने जबरदस्त विरोध किया, जिसे ‘श्वेत विद्रोह’ के नाम से जाना जाता है। इस विरोध की शुरुआत कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश गार्थ के अवकाश पर चले जाने से हुई, जब एक भारतीय न्यायाधीश रमेशचंद्र मित्तर को, जो सबसे वरिष्ठ थे, मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया। भारतीय न्यायाधीशों को ‘आबनूसी रंग का बाबू’ कहा जाता था।
बिल के विरोधियों ने ‘यूरोपीयन डिफेंस एसोसिएशन’ का गठन किया, जिसकी शाखाएं भारत के सभी महत्वपूर्ण केंद्रों पर बनाई गईं और 1.5 लाख रुपये इकट्ठे भी किए गए। उनके आंदोलन के नतीजे में अंततः इस बिल को वापस ले लिया गया। इस घटना ने भारतीयों की आंखें खोल दीं।
माना जाता है कि ‘यूरोपियन डिफेंस एसोसिएशन’ से प्रेरित होकर 1883 में सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने एक ‘राष्ट्रीय सभा’ (National Conference) का गठन किया, जिसे ‘इंडियन नेशनल कांग्रेस की पूर्ववर्ती संस्था’ माना जाता है। दूसरे शब्दों में, नेशनल कॉन्फ्रेंस नेशनल कांग्रेस की प्रस्तावना का आधार बना। इल्बर्ट बिल के विवाद ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय राष्ट्रीय विचारधारा को मजबूत बनाया।
शिक्षित भारतीयों की आवाज – खुली आलोचना
1857 के विद्रोह में भारत के शिक्षित मध्यम वर्गों की भूमिका खास नहीं रही थी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि वे देशद्रोही थे। जब उन्हें मौका मिला तो उन्होंने अपने बौद्धिक विचारों के असर में ब्रिटिश शासन की खुलकर आलोचना करनी शुरू कर दी।
शिक्षित भारतीयों ने औपनिवेशिक शोषणकारी आर्थिक नीतियों की खुलकर आलोचना की। दादाभाई नौरोजी, भोलाचंद्र दत्त, आरसी दत्त, गोपाल कृष्ण गोखले आदि ने मिलकर ब्रिटिश सरकार के आर्थिक दोहन की खुलकर निंदा की और लोगों के सामने यह रखा कि किस तरह अंग्रेजों ने अपनी घिनौनी आर्थिक नीतियों से भारत की पारंपरिक अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया।
पुनरुत्थान आंदोलन – स्वाभिमान की जागृति
19वीं सदी के उत्तरार्ध में भारत में होने वाले पुनरुत्थान आंदोलन ने भी अहम भूमिका निभाई। भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की स्थापना के राजनीतिक और आर्थिक पहलुओं के अलावा एक सांस्कृतिक पक्ष भी था।
भारत की प्राचीन संस्कृति और साहित्य से प्रभावित ईस्ट इंडिया कंपनी के शुरुआती शासकों ने संस्कृत भाषा में लिखे कई ग्रंथों का अंग्रेजी में अनुवाद किया और पश्चिमी दुनिया को यहां की शानदार साहित्यिक परंपराओं से परिचित कराया।
इस संदर्भ में सबसे प्रमुख नाम महान भारतविद सर विलियम जोन्स का है, जो 1784 में बंगाल में स्थापित ‘एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल’ के पहले अध्यक्ष थे। संस्कृत भाषा के अद्भुत आकर्षण से प्रेरित होकर उन्होंने कालिदास के नाटक ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ का अंग्रेजी में अनुवाद किया। इसी दौर में जॉन विल्किंस ने श्रीमद्भगवद्गीता का अनुवाद किया।
खुद वारेन हेस्टिंग्स ने, जो कई भारतीय भाषाओं का जानकार था, हिंदू धर्मशास्त्रों के आधार पर अदालतों में इस्तेमाल के लिए एक संहिता बनवाई। साहित्य और संस्कृति के प्रति इस नई रुचि को ‘पुनरुत्थानवाद’ की संज्ञा दी जाती है। इससे हमें अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर के प्रति गौरव की भावना मिली।
पुनरुत्थानवादी ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा अंग्रेजी भाषा में शिक्षा के प्रचार के समर्थक थे। पश्चिमी विचारधारा के सबसे महान प्रवर्तक राजा राममोहन राय थे, जिन्हें आधुनिक भारत के सबसे सार्थक प्रतिनिधि माना जाता है। राममोहन राय ने भारत में अंग्रेजी भाषा में शिक्षा दिए जाने का समर्थन किया।
यद्यपि इस पुनरुत्थानवादी आंदोलन का प्रभाव समाज के उच्च वर्ग तक ही सीमित रहा, फिर भी इसकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि 19वीं सदी की शुरुआत से ही भारतीय भाषाओं के विकास में इन सामाजिक और धार्मिक नेताओं ने बहुत योगदान दिया, जिससे सामाजिक बदलाव का संदेश आम लोगों तक पहुंच सका। बंगला, हिंदी, उर्दू जैसी भाषाओं का विकास भी पुनरुत्थान आंदोलन के साथ हुआ।
स्वामी दयानंद सरस्वती और स्वामी विवेकानंद – राष्ट्रवाद के महानायक

स्वामी दयानंद सरस्वती और स्वामी विवेकानंद ने अपने विचारों से भारत में राष्ट्रवाद की भावनाओं को जन्म देने में बड़ी भूमिका निभाई। भारत में राजनीतिक जागरूकता लाने में आर्य समाज की काफी अहम भूमिका रही।
सामाजिक और धार्मिक सुधार के लिए बनी संस्थाओं में आर्य समाज एक ऐसी संस्था थी जिसने भारत में राजनीतिक जागृति के लिए स्पष्ट कदम उठाए। बाल गंगाधर तिलक, गोखले, लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र जैसे लोग आर्य समाज के विचारों से प्रभावित थे।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के समय ऐसे कई लोगों के उदाहरण मिलते हैं जो राजनीतिक आंदोलन में हिस्सा लेते थे और साथ ही आर्य समाज के भी सदस्य थे। स्वामी दयानंद ऐसे पहले भारतीय थे जिन्होंने सबसे पहले ‘स्वराज्य’ शब्द का इस्तेमाल किया।
उन्होंने हिंदी में लिखी अपनी मशहूर किताब ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में लिखा है कि “विदेशी शासन चाहे जितना भी अच्छा क्यों न हो, स्वराज्य या स्वशासन उससे भी बेहतर है।” स्वामी दयानंद ही ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने और स्वदेशी वस्तुओं के इस्तेमाल का उपदेश दिया। उन्होंने देशी उद्योगों के विकास पर जोर दिया।
स्वामी दयानंद ने ही सबसे पहले ‘भारत भारतीयों के लिए है’ का नारा दिया था। उनका मानना था कि भारत का धर्म और शासन सत्ता भारतीयों की ही होनी चाहिए। इसीलिए डॉ. मजुमदार ने लिखा है कि “आर्य समाज शुरुआत से ही एक उग्रवादी संप्रदाय था, जिसका मुख्य स्रोत तीव्र राष्ट्रीयता थी।”
असल में स्वामी दयानंद हिंदू धर्म के सुधार पर उतना जोर नहीं देते थे, जितना कि पश्चिमी प्रभाव पर। उनका ख्याल था कि पश्चिमी प्रभाव राष्ट्र विरोधी है। इससे देश अपनी सभ्यता और संस्कृति से दूर होता जाता है। आर्य समाज के इन विचारों से भारत में 19वीं सदी के अंतिम उत्तरार्ध में राष्ट्रीयता की भावनाएं काफी प्रबल हो गईं।
यही वजह थी कि आर्य समाज को सरकार शक की नजर से देखती थी। वैलेंटाइन शिरॉल, जो 1907-10 के बीच ‘लंदन टाइम्स’ का खास संवाददाता बनकर भारत आया था, ने यहां फैली अशांति का अध्ययन किया। उसने लिखा था कि “भारतीय अशांति वास्तव में हिंदू अशांति है और हिंदुओं में सबसे ज्यादा अशांत वर्ग आर्य समाज है। यह आर्य समाज भारतीय समाज में अशांति का जन्मदाता भी है।” आर्य समाज पर इसके बाद कई तरह के प्रतिबंध ब्रिटिश सरकार ने लगाए।
स्वामी विवेकानंद का योगदान दो रूपों में था। पहला, विदेशी शासन के तहत गुलाम और भौतिक रूप से पिछड़े भारत में स्वाभिमान की भावना को प्रोत्साहित करने के लिए उन्होंने यहां की गौरवमयी आध्यात्मिक परंपरा का लोगों को याद दिलाया। दूसरे, उन्होंने वेदांत के दर्शन पर आधारित सामाजिक समानता के सिद्धांत का जोरदार समर्थन किया।
उन्होंने 1893 में शिकागो में आयोजित ‘धर्म संसद’ (Parliament of Religion) में दिए गए अपने शानदार भाषण में इस बात पर जोर दिया कि यद्यपि पश्चिमी दुनिया राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से भारत से ज्यादा शक्तिशाली और समृद्ध है, फिर भी आध्यात्मिक क्षेत्र में वह उससे कहीं पीछे है और भारत उसे कुछ दे सकता है। इन बातों से भारतीयों में जागृति काफी बढ़ी।
स्वामी जी बार-बार कहते थे कि भारत का कल्याण शक्ति की साधना में है। हर व्यक्ति में जो शक्ति छिपी है, हमें उसे बाहर लाना है। “मैं भारत में लोहे की मांसपेशियां और फौलाद की नाड़ी देखना चाहता हूं, क्योंकि इन्हीं के भीतर वह मन निवास करता है जो चट्टानों और वज्रों से बना होता है। शक्ति, पौरुष, क्षात्र-वीर्य, ब्रह्म तेज – इनके समन्वय से भारत की नई मानवता का निर्माण होना चाहिए।”
संस्कृति का ध्यान करते-करते भारत का स्वाभिमान जग चुका था। अब दूसरा कदम उसकी वीरता, निर्भयता और बलिदान की भावना को जागृत करना था। स्वामी विवेकानंद दुनिया में घूमकर देख चुके थे कि नई मानवता कितनी उत्साही और बलवान है। उसकी तुलना में भारत के लोग उन्हें कमजोर और बीमार दिखाई दिए। इसलिए भारत में उनके ज्यादातर उपदेश उन्नति, साहस, सेवा और कर्म की महत्ता को सिद्ध करने के लिए दिए गए।
रवींद्रनाथ ने कहा है – “यदि कोई भारत को समझना चाहता है, तो उसे विवेकानंद को पढ़ना चाहिए।” नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने लिखा है – “स्वामी विवेकानंद का धर्म राष्ट्रीयता को उत्तेजना देने वाला धर्म है। नई पीढ़ी के लोगों में उन्होंने भारत के प्रति भक्ति जगाई, उसके अतीत के प्रति गौरव और उसके भविष्य के प्रति आस्था पैदा की। उनके उद्गारों से लोगों में आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान के भाव जगे। स्वामी जी ने साफ तौर पर राजनीति का एक भी संदेश नहीं दिया, लेकिन जो भी उनके या उनकी रचनाओं के संपर्क में आया, उसमें देशभक्ति और राजनीतिक चेतना अपने आप पैदा हो गई।”
निष्कर्ष
ये सारे कारण थे जिनकी वजह से भारत में राष्ट्रीयता की भावनाओं ने जन्म लेना शुरू किया। कहा जाता है कि विदेशी गुलामी हमेशा गुलाम जनता के दिलों में राष्ट्रवाद को जन्म देती है। भारत में भी राष्ट्रवाद इसी वजह से पनपा।
इस राष्ट्रवाद को एक संगठित रूप जिस अखिल भारतीय संस्था ने प्रदान किया, वह कांग्रेस थी, जिसकी स्थापना से संबंधित कारकों के बारे में अगले अध्याय में चर्चा होगी।
ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में हुए विद्रोह: एक विस्तृत अध्ययन