ऋग्वैदिक और उत्तर वैदिक प्रशासन MCQ | कुलप, ग्रामणी, विशपति, जन, सभा-समिति, दाशराज्ञ युद्ध, कुरु-पांचाल | UPSC/SSC 2026

Rigvedic Polity MCQ in Hindi for UPSC SSC PCS


प्राचीन भारत का इतिहास-17 MCQ-2026

ऋग्वैदिक और उत्तर वैदिक प्रशासन MCQ | कुलप, ग्रामणी, विशपति, जन, सभा-समिति, दाशराज्ञ युद्ध, कुरु-पांचाल | UPSC/SSC 2026

प्रश्न 1. ऋग्वैदिक काल में ‘कुल’ या ‘परिवार’ के प्रधान को क्या कहा जाता था?
(A) ग्रामणी
(B) विशपति
(C) कुलप
(D) राजन्

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उत्तर: (C) कुलप

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ऋग्वैदिक काल में समाज का सबसे छोटी प्रशासनिक इकाई **कुल** या परिवार था। इस परिवार का मुखिया **कुलप** कहलाता था। कुलप परिवार का प्रमुख होने के नाते सभी सदस्यों का संरक्षक और मार्गदर्शक माना जाता था। परिवार से ऊपर की इकाई **ग्राम** होती थी, जिसका प्रमुख **ग्रामणी** कहलाता था। ग्राम के ऊपर **विश** नामक इकाई थी, जिसका प्रमुख **विशपति** होता था। सबसे बड़ी प्रशासनिक इकाई **जन** थी, जिसके प्रमुख को **राजन्** कहा जाता था। इस प्रकार ऋग्वैदिक प्रशासन में **कुलप → ग्रामणी → विशपति → राजन्** की स्पष्ट श्रृंखला थी। इसलिए इन सभी इकाइयों और उनके प्रमुखों के नाम याद रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस श्रृंखला से पता चलता है कि समाज व्यवस्थित और पितृसत्तात्मक था, जिसमें परिवार से लेकर राज्य तक हर स्तर पर स्पष्ट नेतृत्व और जिम्मेदारी होती थी।

प्रश्न 2. ऋग्वैदिक काल में ‘ग्राम’ के प्रधान को क्या कहा जाता था?
(A) कुलप
(B) ग्रामणी
(C) विशपति
(D) राजन्

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उत्तर: (B) ग्रामणी

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ऋग्वैदिक काल में समाज की एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक इकाई **ग्राम** होती थी। एक ग्राम में कई **कुल** शामिल होते थे और इन कुलों का नेतृत्व **कुलप** करता था। पूरे ग्राम का प्रमुख या नेता **ग्रामणी** कहलाता था। ग्रामणी का मुख्य कर्तव्य ग्राम की **सुरक्षा**, **न्याय** और **प्रशासन** को संभालना था। ऋग्वेद में कई स्थानों पर **ग्रामणी** का उल्लेख मिलता है, जो यह दर्शाता है कि यह पद समाज में बहुत महत्वपूर्ण था। इस पद का स्थान वंशानुगत भी हो सकता था, यानी यह परिवार के अंदर से ही अगली पीढ़ी को मिलता था। आज भी हमारे देश में **’ग्रामीण’** और **’ग्राम प्रमुख’** जैसे शब्द इसी परंपरा से जुड़े हुए हैं। इस प्रकार, ग्रामणी का पद समाज में नेतृत्व, न्याय और व्यवस्था बनाए रखने में केंद्रीय भूमिका निभाता था।

प्रश्न 3. ऋग्वैदिक काल में ‘विश’ के प्रधान को क्या कहा जाता था?
(A) ग्रामणी
(B) कुलप
(C) विशपति
(D) जनपति

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उत्तर: (C) विशपति

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ऋग्वैदिक काल में **विश** एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक इकाई थी, जो आज के **जिले** जैसी होती थी। अनेक **ग्राम** मिलकर एक **विश** बनाते थे। इस इकाई का प्रमुख **विशपति** कहलाता था। **विशपति** का कार्य अपने क्षेत्र में **व्यापार**, **कृषि** और **सामाजिक व्यवस्था** का संचालन करना था। विश और विशपति की अवधारणा समाज में आर्थिक और प्रशासनिक नियंत्रण बनाए रखने के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी। रोचक तथ्य यह है कि **’विश’** शब्द से ही **वैश्य** शब्द उत्पन्न हुआ है, जो व्यापारियों और कृषक वर्ग से जुड़ा है। ऋग्वैदिक प्रशासन में यह पद **कुलप → ग्रामणी → विशपति → राजन्** की श्रृंखला में ग्रामणी के ऊपर आता था। इस तरह, विशपति अपने क्षेत्र में नेतृत्व और व्यवस्था का केंद्रीय स्तंभ था।

प्रश्न 4. ऋग्वैदिक काल में ‘जन’ के प्रधान को क्या कहा जाता था?
(A) विशपति
(B) ग्रामणी
(C) कुलप
(D) राजन्

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उत्तर: (D) राजन्

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ऋग्वैदिक काल में समाज की प्रशासनिक संरचना चार मुख्य स्तरों में थी। सबसे छोटी इकाई **कुल** या परिवार था, जिसका प्रमुख **कुलप** कहलाता था और वह परिवार के सभी सदस्यों का संरक्षक तथा मार्गदर्शक होता था। अनेक कुल मिलकर **ग्राम** बनाते थे, जिसके प्रधान को **ग्रामणी** कहा जाता था। ग्रामणी ग्राम की **सुरक्षा**, **न्याय** और **प्रशासन** संभालता था और इसका उल्लेख ऋग्वेद में कई स्थानों पर मिलता है। कई ग्राम मिलकर **विश** बनाते थे, जो आधुनिक जिले जैसी इकाई थी, और इसका प्रमुख **विशपति** अपने क्षेत्र में **व्यापार**, **कृषि** और **सामाजिक व्यवस्था** का संचालन करता था। रोचक तथ्य यह है कि **’विश’** शब्द से ही **वैश्य** शब्द बना। सबसे बड़ी प्रशासनिक इकाई **जन** थी, जिसके प्रमुख को **राजन्** कहा जाता था। अनेक विश मिलकर जन बनाते थे। राजन् का पद **वंशानुगत** होता था, लेकिन उस पर **सभा और समिति** का नियंत्रण भी होता था। ऋग्वैदिक राजा युद्ध में नेतृत्व करता और जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करता था। इस प्रकार, ऋग्वैदिक प्रशासनिक संरचना की श्रृंखला थी: कुलप → ग्रामणी → विशपति → राजन्

प्रश्न 5. ऋग्वैदिक प्रशासन में इकाइयों का सही क्रम (छोटी से बड़ी) कौन सा है?
(A) जन → विश → ग्राम → कुल
(B) कुल → ग्राम → विश → जन
(C) ग्राम → कुल → जन → विश
(D) विश → जन → ग्राम → कुल

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उत्तर: (B) कुल → ग्राम → विश → जन

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ऋग्वैदिक प्रशासनिक संरचना को चार मुख्य स्तरों में बांटा गया था, जिन्हें छोटी से बड़ी इकाई की ओर क्रमबद्ध किया जा सकता है। सबसे छोटी इकाई **कुल** या परिवार थी, जिसका प्रमुख **कुलप** होता था और वह परिवार के सभी सदस्यों का संरक्षक तथा मार्गदर्शक माना जाता था। अनेक कुल मिलकर **ग्राम** बनाते थे, जिसके प्रधान को **ग्रामणी** कहा जाता था। ग्रामणी का कार्य ग्राम की **सुरक्षा**, **न्याय** और **प्रशासन** सुनिश्चित करना था। कई ग्राम मिलकर **विश** बनाते थे, जो आधुनिक जिले जैसी इकाई होती थी, और इसका प्रमुख **विशपति** अपने क्षेत्र में **व्यापार**, **कृषि** और **सामाजिक व्यवस्था** का संचालन करता था। सबसे बड़ी इकाई **जन** थी, जिसके प्रमुख को **राजन्** कहा जाता था। राजन् का पद **वंशानुगत** होता था, लेकिन उस पर **सभा और समिति** का नियंत्रण भी रहता था। ऋग्वैदिक राजा युद्ध में नेतृत्व करता और जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करता था। इस प्रकार, ऋग्वैदिक प्रशासनिक इकाइयों का सही क्रम छोटी से बड़ी की ओर इस प्रकार था — कुल (परिवार) → ग्राम → विश → जन। यह स्पष्ट प्रशासनिक श्रृंखला ऋग्वैदिक समाज की संगठित व्यवस्था का प्रमाण है।

प्रश्न 6. ऋग्वेद में ‘जन’ शब्द कितनी बार उल्लिखित है?
(A) 100 बार
(B) 175 बार
(C) 275 बार
(D) 375 बार

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उत्तर: (C) 275 बार

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ऋग्वेद में **‘जन’** शब्द का उल्लेख लगभग **275 बार** हुआ है। इससे स्पष्ट होता है कि ऋग्वैदिक काल में **जन** यानी **जनजाति या कबीला** की अवधारणा समाज में अत्यंत महत्वपूर्ण थी। इसके विपरीत, **‘जनपद’** शब्द का ऋग्वेद में एक भी बार उल्लेख नहीं मिलता। इसका कारण यह था कि उस समय की अर्थव्यवस्था **पशुपालन पर आधारित** थी और भूमि विशेष का महत्व अभी स्थापित नहीं हो पाया था। इस तथ्य से यह समझा जा सकता है कि उस काल में सामाजिक संगठन का आधार **कबीले और जन** थे, न कि स्थायी भू-क्षेत्र।

प्रश्न 7. ऋग्वेद में ‘जनपद’ शब्द का उल्लेख कितनी बार हुआ है?
(A) एक बार
(B) पाँच बार
(C) दस बार
(D) एक बार भी नहीं

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उत्तर: (D) एक बार भी नहीं

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ऋग्वेद में **‘जनपद’** शब्द का एक भी बार उल्लेख नहीं मिलता। इसका कारण यह था कि उस काल में अर्थव्यवस्था **पशुपालन पर आधारित** थी और आर्यों का जीवन **अर्ध-घुमंतू** था। इस कारण भूमि विशेष का महत्व स्थापित नहीं हो पाया था। वास्तव में, **’जनपद’** शब्द भूमि विशेष का द्योतक है और इसका उद्भव **उत्तर वैदिक काल** में हुआ, जब स्थायी **कृषि** और भूमि से जुड़ाव बढ़ा। इस तथ्य से यह स्पष्ट होता है कि आर्य समाज में प्रारंभिक काल में सामाजिक संगठन का आधार **जन या कबीला** था, न कि स्थायी भू-क्षेत्र।

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प्रश्न 8. ऋग्वेद में ‘जनपद’ शब्द का उल्लेख न होने का क्या कारण बताया गया है?
(A) लिपि का अभाव
(B) पशुपालन अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार होने के कारण भूमि का महत्व स्थापित न होना
(C) युद्धों का अधिक होना
(D) वर्ण व्यवस्था का कठोर होना

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उत्तर: (B) पशुपालन अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार होने के कारण भूमि का महत्व स्थापित न होना

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ऋग्वेद में **‘जनपद’** शब्द का अभाव इसलिए है क्योंकि उस काल में अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार **पशुपालन** था। पशुओं के लिए **चरागाह** की आवश्यकता होती थी, इसलिए आर्य लोग किसी एक स्थान पर **स्थायी रूप से नहीं बसते थे**। भूमि विशेष से स्थायी लगाव न होने के कारण **’जनपद’** जैसे भूमि-बोधक शब्द का प्रयोग नहीं हुआ। यह स्पष्ट करता है कि आर्य समाज में प्रारंभिक काल में सामाजिक संगठन का आधार **जन या कबीला** था, न कि स्थायी भू-क्षेत्र। उत्तर वैदिक काल में **कृषि के विकास** और भूमि से जुड़ाव बढ़ने के कारण भूमि का महत्व बढ़ा और **’जनपद’** जैसे शब्द का प्रयोग प्रचलित हुआ।

प्रश्न 9. ऋग्वेद में उल्लिखित ‘पंचजन’ में कौन सी पाँच जनजातियाँ शामिल थीं?
(A) भरत, कुरु, पांचाल, मत्स्य, काशी
(B) पुरु, यदु, तुर्वश, अनु, द्रुह्यु
(C) गंधार, कम्बोज, मद्र, कुरु, पांचाल
(D) भरत, यदु, पुरु, कुरु, पांचाल

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उत्तर: (B) पुरु, यदु, तुर्वश, अनु, द्रुह्यु

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ऋग्वेद में **‘पंचजन’** का कई बार उल्लेख हुआ है। **पंचजन** के अंतर्गत पाँच प्रमुख जनजातियाँ आती थीं — **पुरु**, **यदु**, **तुर्वश**, **अनु** और **द्रुह्यु**। ये ऋग्वैदिक काल की पाँच प्रमुख **आर्य जनजातियाँ** थीं, जिनमें से **पुरु जनजाति** सबसे प्रसिद्ध मानी जाती थी। पंचजन का यह उल्लेख ऋग्वैदिक समाज के **राजनीतिक और जनजातीय संगठन** को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे पता चलता है कि उस समय समाज में जनजातियों का संगठन और उनके बीच आपसी संबंध व्यवस्थित और स्पष्ट थे।

प्रश्न 10. ऋग्वेद में कितनी जन-संस्थाओं का उल्लेख मिलता है?
(A) दो — सभा और समिति
(B) तीन — सभा, समिति और विदथ
(C) चार — सभा, समिति, विदथ और परिषद्
(D) पाँच — सभा, समिति, विदथ, परिषद् और गण

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उत्तर: (B) तीन — सभा, समिति और विदथ

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ऋग्वेद में तीन प्रमुख **जन-संस्थाओं** का उल्लेख मिलता है — **सभा**, **समिति** और **विदथ**। इनका उल्लेख क्रमशः अलग-अलग स्थानों पर हुआ है: सभा का **8 बार**, समिति का **9 बार**, और विदथ का **122 बार** उल्लेख मिलता है। विदथ का सर्वाधिक उल्लेख यह दर्शाता है कि यह ऋग्वैदिक आर्यों के जीवन में सबसे **महत्वपूर्ण संस्था** थी। ये संस्थाएँ उस समय समाज में **सामाजिक निर्णय**, **विवाद समाधान** और **सामूहिक नेतृत्व** सुनिश्चित करती थीं। ऋग्वैदिक काल की ये जन-संस्थाएँ भारत में **प्राचीन लोकतंत्र** की नींव मानी जाती हैं। इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि आर्य समाज में सत्ता और प्रशासन केवल राजा पर नहीं, बल्कि **सामूहिक संस्थाओं** पर भी आधारित था, जो समाज के लोकतांत्रिक स्वरूप को दर्शाता है।

प्रश्न 11. ऋग्वेद में सभा, समिति और विदथ में से किसका उल्लेख सर्वाधिक बार हुआ है?
(A) सभा — 122 बार
(B) समिति — 122 बार
(C) विदथ — 122 बार
(D) सभा — 275 बार

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उत्तर: (C) विदथ — 122 बार

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ऋग्वेद में **विदथ** का उल्लेख **122 बार** हुआ है, जबकि **सभा** का **8 बार** और **समिति** का **9 बार** उल्लेख मिलता है। विदथ का इतना अधिक उल्लेख यह सिद्ध करता है कि यह ऋग्वैदिक आर्यों की सबसे **महत्वपूर्ण संस्था** थी। विदथ एक ऐसी संस्था थी जिसमें **सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक विषयों** पर विचार किया जाता था और इसमें **महिलाएँ भी भाग लेती थीं**। यह तथ्य यह दर्शाता है कि आर्य समाज में विदथ का महत्व अत्यंत उच्च था और इसे सामाजिक निर्णयों में व्यापक भूमिका मिली। आर्य समाज के **सामूहिक प्रशासन** और **लोकतांत्रिक तत्व** को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 12. ऋग्वेद में ‘सभा’ का उल्लेख कितनी बार हुआ है?
(A) 4 बार
(B) 8 बार
(C) 9 बार
(D) 122 बार

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उत्तर: (B) 8 बार

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ऋग्वेद में तीन प्रमुख संस्थाओं का उल्लेख मिलता है — **सभा** का **8 बार**, **समिति** का **9 बार**, और **विदथ** का **122 बार** हुआ है। तीनों में **विदथ** सर्वाधिक उल्लिखित है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह ऋग्वैदिक आर्यों की सबसे महत्वपूर्ण संस्था थी। **सभा** मुख्यतः श्रेष्ठ और वृद्ध लोगों की संस्था थी, जो **राजनीतिक और न्यायिक मामलों** में राजा को परामर्श देती थी। इन संख्याओं को याद रखना परीक्षाओं में अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि अक्सर UPSC, SSC और राज्य PSC में **भ्रामक प्रश्नों** में यही संख्याएँ पूछी जाती हैं। इस तथ्य से यह समझा जा सकता है कि आर्य समाज में निर्णय लेने की प्रक्रिया में सामूहिक संस्थाओं का भी महत्वपूर्ण स्थान था।

प्रश्न 13. ऋग्वेद में ‘समिति’ का उल्लेख कितनी बार हुआ है?
(A) 8 बार
(B) 9 बार
(C) 75 बार
(D) 122 बार

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उत्तर: (B) 9 बार

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ऋग्वेद में **समिति** का उल्लेख **9 बार** हुआ है। समिति एक **सामान्य जनता की संस्था** थी, जिसमें सभी जन भाग ले सकते थे। राजा का **चुनाव** और अन्य महत्वपूर्ण निर्णय इसी समिति में होते थे। इसे कभी-कभी **’राजन् की माता’** भी कहा जाता है। **सभा** और **समिति** दोनों मिलकर राजा की शक्ति पर नियंत्रण रखती थीं और समाज में संतुलित प्रशासन सुनिश्चित करती थीं। अथर्ववेद में इन्हें **प्रजापति की दो पुत्रियाँ** कहा गया है, जो यह दर्शाता है कि आर्य समाज में निर्णय और शक्ति का वितरण सामूहिक और व्यवस्थित था।

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प्रश्न 14. ऋग्वैदिक कालीन जन-संस्थाओं में ‘विदथ’ क्या था?
(A) एक प्रकार का यज्ञ
(B) ऋग्वैदिक आर्यों की सर्वाधिक महत्वपूर्ण सामाजिक-धार्मिक-आर्थिक संस्था
(C) एक प्रकार का कर
(D) राजदरबार का नाम

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उत्तर: (B) ऋग्वैदिक आर्यों की सर्वाधिक महत्वपूर्ण सामाजिक-धार्मिक-आर्थिक संस्था

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**विदथ** ऋग्वैदिक आर्यों की सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्था थी, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में **122 बार** हुआ है। यह एक ऐसी संस्था थी जिसमें **सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक मामलों** पर विचार-विमर्श होता था। विशेष बात यह है कि **विदथ में महिलाएँ भी भाग लेती थीं**, जो ऋग्वैदिक काल में स्त्रियों की **उच्च सामाजिक स्थिति** का प्रमाण है। उत्तर वैदिक काल में विदथ का उल्लेख धीरे-धीरे घटने लगा, जिससे यह स्पष्ट होता है कि सामाजिक संरचनाओं में समय के साथ बदलाव आया।

प्रश्न 15. दाशराज्ञ युद्ध में दस राजाओं की ओर से कितने राजा आर्य और कितने अनार्य थे?
(A) सभी दस आर्य थे
(B) पाँच आर्य और पाँच अनार्य
(C) आठ आर्य और दो अनार्य
(D) तीन आर्य और सात अनार्य

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उत्तर: (B) पाँच आर्य और पाँच अनार्य

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दाशराज्ञ युद्ध में **दस राजाओं** का गठबंधन हुआ, जिसमें **पाँच आर्य और पाँच अनार्य राजा** शामिल थे। इससे स्पष्ट होता है कि यह युद्ध केवल आर्य बनाम अनार्य नहीं था, बल्कि विभिन्न **जनजातियों** के बीच संघर्ष था। इस गठबंधन के विरुद्ध **भरत जन** के राजा **सुदास** ने युद्ध लड़ा और वे विजयी हुए। सुदास के पुरोहित **वशिष्ठ** थे, जबकि दस राजाओं के पुरोहित **विश्वामित्र** थे। यह युद्ध ऋग्वैदिक समाज के **राजनीतिक और धार्मिक नेतृत्व** की महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है।

प्रश्न 16. दाशराज्ञ युद्ध में दस राजाओं के पुरोहित कौन थे?
(A) वशिष्ठ
(B) विश्वामित्र
(C) अत्रि
(D) भरद्वाज

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उत्तर: (B) विश्वामित्र

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दाशराज्ञ युद्ध में दस राजाओं के पुरोहित **विश्वामित्र** थे, जबकि **सुदास** के पुरोहित **वशिष्ठ** थे। यह युद्ध केवल राजनीतिक संघर्ष ही नहीं था, बल्कि दो महान ऋषियों — **वशिष्ठ** और **विश्वामित्र** — के बीच की **प्रतिद्वंद्विता** का प्रतीक भी था। इस युद्ध में **सुदास की विजय** हुई। इस प्रतिद्वंद्विता का उल्लेख **पुराणों और रामायण** में भी मिलता है। यह ऋग्वैदिक काल के राजनीतिक तथा धार्मिक परिदृश्य को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 17. दाशराज्ञ युद्ध में सुदास के पुरोहित कौन थे?
(A) विश्वामित्र
(B) अत्रि
(C) वशिष्ठ
(D) भरद्वाज

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उत्तर: (C) वशिष्ठ

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दाशराज्ञ युद्ध में **भरत जन** के राजा **सुदास** के पुरोहित **महर्षि वशिष्ठ** थे। वशिष्ठ को ऋग्वेद के **सप्तम मण्डल** का रचयिता माना जाता है। वशिष्ठ और विश्वामित्र की **प्रतिद्वंद्विता** भारतीय साहित्य और **पुराणों** में प्रसिद्ध है। वशिष्ठ मूलतः ब्राह्मण थे, जबकि विश्वामित्र **क्षत्रिय से ब्राह्मण बने** थे। सुदास की जीत में **वशिष्ठ** की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। यह तथ्य ऋग्वैदिक काल के राजनीतिक और धार्मिक नेतृत्व को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 18. ऋग्वेद में ‘बलि’ क्या था?
(A) यज्ञ में दी जाने वाली आहुति
(B) प्रजा द्वारा राजा को दिया जाने वाला स्वैच्छिक भेंट
(C) एक प्रकार का अनिवार्य कर
(D) देवताओं को दी जाने वाली भेंट

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उत्तर: (B) प्रजा द्वारा राजा को दिया जाने वाला स्वैच्छिक भेंट

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ऋग्वेद में **बलि** प्रजा द्वारा राजा को दिया जाने वाला एक प्रकार का **स्वैच्छिक भेंट** था, जो इस काल में अनिवार्य नहीं था। किंतु **उत्तर वैदिक काल** में बलि का स्वरूप बदल गया और यह **अनिवार्य** कर दिया गया। यह परिवर्तन ऋग्वैदिक काल से उत्तर वैदिक काल में **राजसत्ता के सुदृढ़ीकरण** का प्रमाण है। बलि को भारतीय कर-प्रणाली का **प्राचीनतम रूप** भी माना जाता है। इस तथ्य से यह समझा जा सकता है कि आर्य समाज में प्रारंभिक काल में राजा और प्रजा के बीच आर्थिक और प्रशासनिक संबंध धीरे-धीरे संगठित होते गए।

प्रश्न 19. उत्तर वैदिक काल में ‘बलि’ किस रूप में परिवर्तित हो गई?
(A) स्वैच्छिक भेंट
(B) अनिवार्य कर
(C) धार्मिक दान
(D) यज्ञ की आहुति

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उत्तर: (B) अनिवार्य कर

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ऋग्वैदिक काल में **बलि** प्रजा द्वारा राजा को दिया जाने वाला **स्वैच्छिक भेंट** था। किंतु **उत्तर वैदिक काल** में यह प्रजा के द्वारा दिया जाने वाला **अनिवार्य कर** बन गया। यह परिवर्तन उत्तर वैदिक काल में **राजसत्ता के अधिक केंद्रीयकृत और शक्तिशाली** होने का प्रमाण है। इस बदलाव से राज्य और नागरिक के बीच संबंधों में **परिवर्तन** स्पष्ट होता है। यह आर्य समाज के प्रशासनिक तथा आर्थिक ढांचे को समझने में सहायक है।

प्रश्न 20. उत्तर वैदिक काल में ‘जनपद’ शब्द का उल्लेख मिलने लगा — इस काल के दो प्रसिद्ध जनपद कौन से थे?
(A) मगध और वैशाली
(B) कुरु और पांचाल
(C) काशी और कोसल
(D) गंधार और कम्बोज

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उत्तर: (B) कुरु और पांचाल

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उत्तर वैदिक काल में **जनपद** शब्द का उल्लेख मिलने लगा। इस काल के दो सबसे प्रसिद्ध जनपद **कुरु** और **पांचाल** थे। **शतपथ ब्राह्मण** में कुरु और पांचाल को वैदिक सभ्यता के दो प्रमुख केंद्र बताया गया है। आधुनिक भौगोलिक दृष्टि से **कुरु जनपद** हरियाणा और दिल्ली के आसपास स्थित था, जबकि **पांचाल जनपद** आधुनिक उत्तर प्रदेश के बरेली और बदायूँ क्षेत्र में था। यह तथ्य उत्तर वैदिक काल की प्रशासनिक और भौगोलिक संरचना को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 21. शतपथ ब्राह्मण में किन दो जनपदों को वैदिक सभ्यता के प्रसिद्ध केंद्र कहा गया है?
(A) मगध और वैशाली
(B) काशी और कोसल
(C) कुरु और पांचाल
(D) गंधार और मद्र

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उत्तर: (C) कुरु और पांचाल

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**शतपथ ब्राह्मण** में **कुरु** और **पांचाल** को वैदिक सभ्यता के दो प्रसिद्ध केंद्र कहा गया है। ये दोनों **जनपद** गंगा-यमुना दोआब में स्थित थे। इस उल्लेख से स्पष्ट होता है कि उत्तर वैदिक काल में वैदिक संस्कृति का केंद्र **सप्त सैंधव** से खिसककर **गंगा-यमुना दोआब** में आ गया था। महाभारत काल में **कुरु जनपद** भारत का प्रमुख केंद्र बन गया, जिसे आधुनिक संदर्भ में **हस्तिनापुर** कहा जाता है। यह तथ्य उत्तर वैदिक काल की **भौगोलिक और सांस्कृतिक परिवर्तन** को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 22. कुरु जनपद का निर्माण किन दो पूर्व वैदिक जनजातियों ने मिलकर किया था?
(A) पुरु और यदु
(B) भरत और कुरु
(C) तुर्वश और क्रीवि
(D) अनु और द्रुह्यु

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उत्तर: (B) भरत और कुरु

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उत्तर वैदिक काल में **कुरु जनपद** का निर्माण पूर्व वैदिक कालीन दो जनजातियों — **भरत** और **कुरु** — ने मिलकर किया था। **भरत जनजाति** वही थी जिसके राजा **सुदास** ने **दाशराज्ञ युद्ध** में विजय प्राप्त की थी। आधुनिक भारत का नाम इसी **भरत जनजाति** से जुड़ा माना जाता है। बाद में **कुरु जनपद** महाभारत के **कुरुवंश** का प्रमुख केंद्र बन गया। यह तथ्य उत्तर वैदिक काल की **राजनीतिक, भौगोलिक और ऐतिहासिक संरचना** को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 23. पांचाल जनपद का निर्माण किन दो पूर्व वैदिक जनजातियों ने मिलकर किया था?
(A) भरत और कुरु
(B) पुरु और यदु
(C) तुर्वश और क्रीवि
(D) अनु और द्रुह्यु

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उत्तर: (C) तुर्वश और क्रीवि

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उत्तर वैदिक काल में **पांचाल जनपद** का निर्माण पूर्व वैदिक कालीन दो जनजातियों — **तुर्वश** और **क्रीवि** — ने मिलकर किया था। **पांचाल जनपद** आधुनिक उत्तर प्रदेश के **बरेली-बदायूँ** क्षेत्र में स्थित था। महाभारत में **पांचाल** राजकुमारी **द्रौपदी** के लिए प्रसिद्ध है। **शतपथ ब्राह्मण** में **कुरु** और **पांचाल** को वैदिक सभ्यता के दो प्रमुख केंद्र कहा गया है। यह तथ्य उत्तर वैदिक काल के **भौगोलिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्रों** को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 24. शतपथ ब्राह्मण में कितने प्रकार के ‘रत्नियों’ की चर्चा है?
(A) 8
(B) 10
(C) 11
(D) 12

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उत्तर: (D) 12

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**शतपथ ब्राह्मण में 12 प्रकार के **रत्नियों** (प्रशासकीय अधिकारियों) की चर्चा है, जबकि **तैत्तिरीय आरण्यक** में 11 प्रकार के रत्नियों का उल्लेख मिलता है। रत्नि उत्तर वैदिक काल के प्रमुख **प्रशासकीय अधिकारी** थे जो राजा के विभिन्न कार्यों में सहायता करते थे। इनमें **संग्रहीतृ (कोषाध्यक्ष)** और **भागदूध (भू-राजस्व अधिकारी)** प्रमुख थे। यह तथ्य स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि उत्तर वैदिक काल में प्रशासन **संगठित और विस्तृत** था।

प्रश्न 25. तैत्तिरीय आरण्यक में कितने प्रकार के ‘रत्नियों’ की चर्चा है?
(A) 8
(B) 9
(C) 11
(D) 12

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उत्तर: (C) 11

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**तैत्तिरीय आरण्यक में 11 प्रकार के **रत्नियों** का उल्लेख है, जबकि **शतपथ ब्राह्मण** में 12 प्रकार के। रत्नि उत्तर वैदिक काल के **प्रशासकीय अधिकारी** थे जो राजा के प्रशासनिक कार्यों में सहायता करते थे। तैत्तिरीय आरण्यक **कृष्ण यजुर्वेद** से संबंधित आरण्यक ग्रंथ है। उत्तर वैदिक काल में **राजतंत्र के सुदृढ़ीकरण** के साथ-साथ प्रशासनिक व्यवस्था भी अधिक **संगठित** हुई। परीक्षाओं में इन **11 और 12 की संख्याओं** का अक्सर उपयोग भ्रामक प्रश्नों में किया जाता है, इसलिए इन्हें याद रखना महत्वपूर्ण है।

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भारत पर अरबों का आक्रमण

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