मध्यकालीन भारत का इतिहास भाग-6 MCQ-2026
गुलाम वंश MCQ 2026 सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न | UPSC SSC PCS MCQ 2026
यह पोस्ट पिछले वर्षों के प्रश्नों के पैटर्न, बार-बार पूछे जाने वाले तथ्य, और Exam-Trending Topics को ध्यान में रखते हुए MCQ तैयार किए हैं, जिसमे प्रतियोगी परीक्षाओ से सम्बंधित ज्यादा से ज्यादा प्रश्न इस पोस्ट में कवर किये गये है ………………………….
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प्र.1. “तारीखे-फिरोजशाही” के लेखक बरनी ने किस अध्याय में बलबन के राजत्व सिद्धांत का वर्णन किया है?
(a) राजत्व अध्याय
(b) बसाया अध्याय
(c) सुल्तान अध्याय
(d) खिल्जी अध्याय
✅ उत्तर: (b) बसाया अध्याय
📝 बरनी की प्रसिद्ध ऐतिहासिक कृति “तारीखे-फिरोजशाही” दिल्ली सल्तनत के इतिहास का एक महत्वपूर्ण स्रोत मानी जाती है। इस ग्रंथ के “बसाया” अध्याय में बलबन के राजत्व सिद्धांत का विस्तृत और व्यवस्थित वर्णन मिलता है। बरनी ने इसमें बलबन की शासन नीति, उसके राजनीतिक विचार और शाही गरिमा को स्पष्ट किया है। बलबन ने सुल्तान को ईश्वर का प्रतिनिधि अर्थात “नियाबते-खुदाई” तथा “जिल्ले-इलाही” माना। उसने दरबार की मर्यादा, कठोर अनुशासन और केंद्रीकृत सत्ता पर विशेष बल दिया। इसलिए बसाया अध्याय बलबन की राजसत्ता की अवधारणा को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
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प्र.2. रजिया सुल्तान के पतन में किसने सबसे पहले विद्रोह किया था?
(a) अल्तुनिया ने
(b) कबीर खां अयाज ने
(c) इख्तियारुद्दीन ऐतगीन ने
(d) बहरामशाह ने
✅ उत्तर: (b) कबीर खां अयाज ने
📝 रजिया सुल्तान के शासनकाल में तुर्क अमीरों का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया था, जिससे दरबार में असंतोष की स्थिति उत्पन्न हो गई। 1240 ई० में सबसे पहले लाहौर के इक्तादार कबीर खां अयाज ने रजिया सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह किया। यह विद्रोह उसके शासन की कमजोरी का प्रारंभिक संकेत था। इसके बाद तबरहिंद के गवर्नर इख्तियारुद्दीन अल्तुनिया ने भी विद्रोह कर दिया। रजिया ने स्थिति संभालने के लिए अल्तुनिया से विवाह किया और पुनः सत्ता प्राप्त करने का प्रयास किया, परंतु अंततः उसे पराजय का सामना करना पड़ा। इस प्रकार कबीर खां अयाज का विद्रोह रजिया के पतन की शुरुआत माना जाता है।
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प्र.3. इल्तुतमिश ने “दोआब” के बारे में क्या समझा था?
(a) यह सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण है
(b) यह आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है
(c) यह धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है
(d) यह बाढ़ से खतरनाक है
✅ उत्तर: (b) यह आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है
📝 इल्तुतमिश दिल्ली सल्तनत का एक दूरदर्शी और सक्षम शासक था। उसने गंगा और यमुना नदियों के बीच स्थित दोआब क्षेत्र के महत्व को भली-भांति समझा। यह क्षेत्र अत्यंत उपजाऊ था और कृषि उत्पादन की दृष्टि से समृद्ध माना जाता था। दोआब से प्राप्त होने वाला राजस्व दिल्ली सल्तनत की आर्थिक मजबूती का मुख्य आधार था। इल्तुतमिश ने इस क्षेत्र पर सुदृढ़ प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित किया और इसे अपने शासन का आर्थिक केंद्र बनाया। उसका मानना था कि दोआब पर नियंत्रण के बिना राज्य की वित्तीय स्थिरता संभव नहीं है।
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प्र.4. कैकुबाद का शासनकाल कब से कब तक रहा?
(a) 1265-1287 ई०
(b) 1280-1290 ई०
(c) 1287-1290 ई०
(d) 1290-1296 ई०
✅ उत्तर: (c) 1287-1290 ई०
📝 कैकुबाद का शासनकाल 1287 से 1290 ई० तक रहा। वह बलबन का पौत्र था और उसकी मृत्यु के बाद उसे सिंहासन पर बैठाया गया। बलबन ने अपने जीवनकाल में कैखुसरो को उत्तराधिकारी घोषित किया था, परंतु तुर्क अमीरों ने राजनीतिक स्वार्थ के कारण कैकुबाद को गद्दी पर बैठाया। कैकुबाद एक युवा और अनुभवहीन शासक था, जो विलासिता और भोग-विलास में अधिक लिप्त रहा। उसके शासनकाल में प्रशासनिक अनुशासन कमजोर पड़ गया और दरबार में षड्यंत्र बढ़ गए। इसी अवधि में जलालुद्दीन फिरोज खिल्जी का उदय हुआ, जिसने आगे चलकर खिल्जी वंश की स्थापना की।
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प्र.5. “खिल्जी क्रांति” को क्रांति क्यों कहा जाता है?
(a) क्योंकि इसमें बहुत रक्तपात हुआ
(b) क्योंकि तुर्की सत्ता समाप्त होकर गैर-तुर्क खिल्जियों का शासन आया
(c) क्योंकि इसमें जनता ने भाग लिया
(d) क्योंकि इससे इस्लाम फैला
✅ उत्तर: (b) क्योंकि तुर्की सत्ता समाप्त होकर गैर-तुर्क खिल्जियों का शासन आया
📝 1290 ई० में जलालुद्दीन फिरोज खिल्जी ने सत्ता पर अधिकार कर खिल्जी वंश की स्थापना की। इस घटना को “खिल्जी क्रांति” कहा जाता है क्योंकि इससे दिल्ली सल्तनत में तुर्क अमीरों का एकाधिकार समाप्त हो गया। पहले शासन पर मुख्य रूप से तुर्की शासकों और अमीरों का नियंत्रण था, लेकिन खिल्जी वंश के उदय के साथ गैर-तुर्क तत्व सत्ता में आए। यह परिवर्तन केवल शासक बदलने तक सीमित नहीं था, बल्कि सत्ता संरचना और दरबारी प्रभाव में भी बदलाव आया।
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प्र.6. इल्तुतमिश से पहले दिल्ली की राजगद्दी में अल्पकाल तक कौन शासक रहा?
(a) कुबाचा
(b) यल्दौज
(c) आरामशाह
(d) मांगबर्नी
✅ उत्तर: (c) आरामशाह
📝 कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु 1210 ई० में चौगान खेलते समय हो गई थी। उसके बाद उसके पुत्र आरामशाह को दिल्ली की गद्दी पर बैठाया गया। किंतु वह एक कमजोर और अयोग्य शासक सिद्ध हुआ। उसमें प्रशासनिक क्षमता और नेतृत्व का अभाव था, जिसके कारण तुर्क अमीरों और सेना का विश्वास वह प्राप्त नहीं कर सका। अंततः प्रमुख सरदारों ने इल्तुतमिश को दिल्ली बुलाया, जिसने आरामशाह को पराजित कर सत्ता प्राप्त की। इस प्रकार आरामशाह का शासन अत्यंत अल्पकालिक रहा और वह दिल्ली सल्तनत के इतिहास में केवल एक संक्रमणकालीन शासक के रूप में जाना जाता है।
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प्र.7. बलबन की मृत्यु के समय उसकी आयु कितनी थी?
(a) 60 वर्ष
(b) 70 वर्ष
(c) 75 वर्ष
(d) 80 वर्ष
✅ उत्तर: (d) 80 वर्ष
📝 बलबन की मृत्यु 1287 ई० में लगभग 80 वर्ष की आयु में हुई थी। वह दिल्ली सल्तनत का एक शक्तिशाली और कठोर शासक था, जिसने 1265 से 1287 ई० तक लगभग 22 वर्षों तक शासन किया। उसने अपने शासनकाल में केंद्रीय सत्ता को मजबूत किया और तुर्क अमीरों के प्रभाव को समाप्त करने का प्रयास किया। बलबन ने “लौह और रक्त की नीति” अपनाई तथा शाही गरिमा को पुनर्स्थापित किया। उसके जीवन के अंतिम वर्षों में उसके प्रिय पुत्र कैखुसरो की मृत्यु हो गई थी, जिससे उसे गहरा मानसिक आघात लगा।
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प्र.8. गुलाम वंश में वह महिला शासक कौन थी, जो भारत की प्रथम महिला शासक थी?
(a) नूरजहाँ
(b) रजिया सुल्तान
(c) चांद बीबी
(d) दुर्गावती
✅ उत्तर: (b) रजिया सुल्तान
📝 रजिया सुल्तान (1236–1240 ई०) दिल्ली सल्तनत की प्रथम और एकमात्र महिला शासक थी। वह इल्तुतमिश की पुत्री थी, जिसने अपनी योग्यता और प्रशासनिक क्षमता के कारण उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। रजिया ने परंपरागत पर्दा प्रथा को त्यागकर खुले दरबार में शासन किया और स्वयं सेना का नेतृत्व भी किया। उसने न्यायप्रिय और सक्षम शासन देने का प्रयास किया, किंतु तुर्क सरदार उसे एक महिला होने के कारण स्वीकार नहीं कर पाए। फिर भी इतिहास में वह एक साहसी और सक्षम शासिका के रूप में स्मरण की जाती है।
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प्र.9. इल्तुतमिश द्वारा चलाए गए तांबे के सिक्के को क्या कहा जाता है?
(a) टंका
(b) दाम
(c) जीतल
(d) दिरहम
✅ उत्तर: (c) जीतल
📝 इल्तुतमिश ने दिल्ली सल्तनत की आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए महत्वपूर्ण मुद्रा सुधार किए। उसने दो प्रमुख प्रकार के सिक्के जारी किए — चांदी का “टंका” और तांबे का “जीतल”। जीतल सामान्य लेन-देन के लिए उपयोग में लाया जाता था और यह जनता के बीच व्यापक रूप से प्रचलित हुआ। टंका को आधुनिक रुपये का पूर्वज माना जाता है। इल्तुतमिश पहला सुल्तान था जिसने शुद्ध अरबी लिपि में सिक्के चलाए और उन पर खलीफा का नाम अंकित कराया, जिससे उसकी वैधता और प्रतिष्ठा बढ़ी।
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प्र.10. बलबन ने किस विद्रोह को दबाने के लिए सबसे कठोर कार्रवाई की थी?
(a) तुर्क सरदारों का विद्रोह
(b) मंगोल आक्रमण
(c) हिंदू राजाओं का विद्रोह
(d) खलीफा का विरोध
✅ उत्तर: (a) तुर्क सरदारों का विद्रोह
📝 बलबन ने तुर्क सरदारों, विशेषकर “चालीसा” दल के प्रभाव को समाप्त करने के लिए अत्यंत कठोर नीति अपनाई। ये सरदार अत्यधिक शक्तिशाली हो गए थे और केंद्रीय सत्ता को चुनौती देते थे। बलबन ने “लौह और रक्त की नीति” के माध्यम से उनके विद्रोह को कुचल दिया। उसने विद्रोही अमीरों को कठोर दंड दिए और कई को समाप्त कर दिया। साथ ही उसने एक सशक्त गुप्तचर तंत्र स्थापित किया, जिससे किसी भी षड्यंत्र की सूचना समय रहते मिल सके। इस नीति से शासन में अनुशासन और स्थिरता स्थापित हुई।
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प्र.11. अलाउद्दीन मसूद का शासनकाल था?
(a) 1240-1242 ई०
(b) 1242-1246 ई०
(c) 1246-1265 ई०
(d) 1236-1240 ई०
✅ उत्तर: (b) 1242-1246 ई०
📝 अलाउद्दीन मसूद का शासनकाल 1242 से 1246 ई० तक रहा। वह रुकनुद्दीन फिरोज के बाद दिल्ली की गद्दी पर बैठाया गया, किंतु वह एक कमजोर और अयोग्य शासक सिद्ध हुआ। उसके शासनकाल में वास्तविक सत्ता तुर्क अमीरों और चालीसा दल के हाथों में रही। प्रशासनिक निर्णयों पर उसका नियंत्रण बहुत कम था और दरबार में षड्यंत्र बढ़ते गए। अंततः तुर्क सरदारों ने उसे पदच्युत कर नासिरुद्दीन महमूद को सुल्तान बना दिया।
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प्र.12. इल्तुतमिश ने बगदाद के खलीफा से मान्यता कब प्राप्त की थी?
(a) 1215 ई०
(b) 1220 ई०
(c) 1229 ई०
(d) 1236 ई०
✅ उत्तर: (c) 1229 ई०
📝 इल्तुतमिश ने 18 फरवरी 1229 ई० को बगदाद के अब्बासी खलीफा से औपचारिक मान्यता प्राप्त की थी। यह घटना दिल्ली सल्तनत के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। खलीफा ने उसे खिल्लत, मानपत्र तथा “नासिर-अमीर-उल-मोमिनीन” की उपाधि प्रदान की। इस मान्यता से इल्तुतमिश का शासन वैध और धार्मिक दृष्टि से स्वीकृत माना गया और दिल्ली सल्तनत को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिली। सिक्कों और खुतबे में खलीफा का नाम अंकित कराया गया, जिससे उसकी राजनीतिक स्थिति और अधिक सुदृढ़ हो गई।
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प्र.13. कुतुबुद्दीन ऐबक को कहाँ दफनाया गया था?
(a) दिल्ली में
(b) अजमेर में
(c) लाहौर में
(d) मुल्तान में
✅ उत्तर: (c) लाहौर में
📝 कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु 1210 ई० में लाहौर में हुई थी। वह चौगान अर्थात पोलो खेलते समय घोड़े से गिर पड़ा, जिससे उसे गंभीर चोट लगी और उसकी मृत्यु हो गई। ऐबक दिल्ली सल्तनत का संस्थापक शासक माना जाता है और उसने गुलाम वंश की नींव रखी थी। उसकी मृत्यु के बाद उसे लाहौर में ही दफनाया गया। आज भी उसका मकबरा लाहौर (वर्तमान पाकिस्तान) में स्थित है। यह तथ्य प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पूछा जाता है।
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प्र.14. बलबन ने अपने राजत्व सिद्धांत में स्वयं को किससे जोड़ा?
(a) पैगंबर मोहम्मद से
(b) अफरासियाब वंश के पौराणिक ईरानी राजाओं से
(c) खलीफा से
(d) चंगेज खां से
✅ उत्तर: (b) अफरासियाब वंश के पौराणिक ईरानी राजाओं से
📝 बलबन ने अपने राजत्व सिद्धांत में कुलीनता और शाही गरिमा को अत्यधिक महत्व दिया। उसने स्वयं को पौराणिक ईरानी राजा अफरासियाब के वंश से जोड़कर अपनी प्रतिष्ठा को बढ़ाने का प्रयास किया। उसका उद्देश्य था कि सुल्तान की छवि सामान्य मनुष्य से ऊपर, दैवीय प्रतिनिधि के रूप में स्थापित हो। उसने “नियाबते-खुदाई” और “जिल्ले-इलाही” जैसी अवधारणाओं को बल दिया तथा दरबार में सिजदा और पैबोस जैसी प्रथाओं को लागू किया। निम्न कुल के लोगों को उच्च पदों से दूर रखा गया।
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प्र.15. तुर्कान-ए-चिहालगानी में कितने सरदार थे?
✅ उत्तर: (c) 40
📝 “तुर्कान-ए-चिहालगानी” का अर्थ है चालीस तुर्क सरदारों का समूह। इसका गठन इल्तुतमिश ने अपने 40 विश्वसनीय तुर्क अमीरों के दल के रूप में किया था। इस दल का उद्देश्य शासन को स्थिरता प्रदान करना और सुल्तान को प्रशासनिक सहयोग देना था। प्रारंभ में यह समूह सुल्तान का समर्थक था, किंतु समय के साथ इसकी शक्ति अत्यधिक बढ़ गई और यह सत्ता पर प्रभाव डालने लगा। बाद में बलबन ने इसकी शक्ति को समाप्त करने के लिए कठोर कदम उठाए।
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प्र.16. ऐबक द्वारा निर्मित कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद कितने मंदिरों को तोड़कर बनाई गई?
(a) 15 मंदिर
(b) 20 मंदिर
(c) 27 मंदिर
(d) 32 मंदिर
✅ उत्तर: (c) 27 मंदिर
📝 कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1193 ई० के आसपास दिल्ली में “कुव्वत-उल-इस्लाम” मस्जिद का निर्माण कराया, जिसे भारत की प्रथम जामा मस्जिद माना जाता है। ऐतिहासिक अभिलेखों और शिलालेखों के अनुसार यह मस्जिद 27 जैन और हिंदू मंदिरों को तोड़कर उनकी सामग्री से बनाई गई थी। इस निर्माण में पुराने मंदिरों के स्तंभ, शिल्पकला और नक्काशीदार पत्थरों का उपयोग किया गया, जो आज भी मस्जिद परिसर में देखे जा सकते हैं। यह स्मारक भारतीय और इस्लामी स्थापत्य कला के प्रारंभिक मिश्रण का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।
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प्र.17. रजिया सुल्तान के शासनकाल में लाहौर का इक्तादार कौन था?
(a) जमालुद्दीन याकूत
(b) इजुद्दीन कबीर खां अयाज
(c) इख्तियारुद्दीन अल्तुनिया
(d) इख्तियारुद्दीन ऐतगीन
✅ उत्तर: (b) इजुद्दीन कबीर खां अयाज
📝 रजिया सुल्तान के शासनकाल (1236–1240 ई०) में इजुद्दीन कबीर खां अयाज लाहौर का इक्तादार नियुक्त था। वह प्रारंभ में दिल्ली सल्तनत का वफादार अधिकारी था, लेकिन बाद में उसने रजिया के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। रजिया को अपने शासनकाल में तुर्क सरदारों के तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा, क्योंकि वे एक महिला शासक को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। इख्तियारुद्दीन अल्तुनिया तबरहिंद (भटिंडा) का गवर्नर था, जिसने बाद में रजिया को बंदी बनाया।
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प्र.18. गुलाम वंश के किस शासक ने इल्तुतमिश द्वारा बनाए “चालीसा” को नष्ट कर दिया था?
(a) रजिया
(b) नासिरुद्दीन महमूद
(c) बलबन
(d) कैकुबाद
✅ उत्तर: (c) बलबन
📝 इल्तुतमिश ने अपने शासनकाल में तुर्कान-ए-चिहालगानी अथवा “चालीसा” नामक 40 प्रमुख तुर्क सरदारों का एक शक्तिशाली दल गठित किया था। परंतु समय के साथ ये सरदार अत्यधिक प्रभावशाली हो गए और सुल्तान की सत्ता में हस्तक्षेप करने लगे। जब बलबन सत्ता में आया, तब उसने केंद्रीय शासन को सुदृढ़ करने का संकल्प लिया। उसने “लौह और रक्त की नीति” अपनाते हुए चालीसा के प्रभाव को समाप्त कर दिया और उनके राजनीतिक हस्तक्षेप को कठोरता से दबा दिया। इस कदम से राजसत्ता अधिक केंद्रीकृत हो गई।
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प्र.19. इल्तुतमिश के शासनकाल की प्रमुख उपलब्धि कौन-सी नहीं थी?
(a) खलीफा से मान्यता प्राप्त करना
(b) खिल्जी वंश की स्थापना
(c) इक्ता प्रणाली को व्यवस्थित करना
(d) टंका और जीतल सिक्के चलाना
✅ उत्तर: (b) खिल्जी वंश की स्थापना
📝 इल्तुतमिश दिल्ली सल्तनत का एक सशक्त और संगठक शासक था। उसकी प्रमुख उपलब्धियों में बगदाद के खलीफा से वैधता की स्वीकृति प्राप्त करना, इक्ता प्रणाली को सुव्यवस्थित करना तथा टंका (चाँदी) और जीतल (ताँबा) जैसे मानक सिक्कों का प्रचलन शामिल था। किंतु खिल्जी वंश की स्थापना उसकी उपलब्धि नहीं थी। 1290 ई० में जलालुद्दीन फिरोज खिल्जी ने गुलाम वंश का अंत कर खिल्जी वंश की स्थापना की।
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प्र.20. बलबन की “लौह और रक्त की नीति” का क्या अर्थ था?
(a) सोने और चांदी का संग्रह
(b) सैन्य शक्ति के बल पर कठोर शासन
(c) लोहे के हथियार बनाना
(d) रक्तदान की परंपरा
✅ उत्तर: (b) सैन्य शक्ति के बल पर कठोर शासन
📝 बलबन की “लौह और रक्त की नीति” का आशय कठोर, अनुशासित और सशक्त शासन व्यवस्था से था। बलबन का मानना था कि राज्य की स्थिरता के लिए सुल्तान की प्रतिष्ठा सर्वोच्च होनी चाहिए। उसने विद्रोहियों और असंतुष्ट अमीरों को कठोर दंड दिए तथा सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा को मजबूत किया। उसने गुप्तचर तंत्र को सुदृढ़ किया और दरबार में सिजदा तथा पैबोस जैसी परंपराएं लागू कीं। परिणामस्वरूप दिल्ली सल्तनत में राजनीतिक स्थिरता आई और सुल्तान की शक्ति निर्विवाद हो गई।
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प्र.21. इल्तुतमिश से पहले “टंका” जैसा शुद्ध सिक्का क्यों नहीं था?
(a) चांदी की कमी थी
(b) पहले के सिक्के शुद्ध अरबी मानकों पर नहीं थे
(c) खलीफा ने मना किया था
(d) व्यापार नहीं होता था
✅ उत्तर: (b) पहले के सिक्के शुद्ध अरबी मानकों पर नहीं थे
📝 इल्तुतमिश से पहले दिल्ली सल्तनत में प्रचलित सिक्के प्रायः मिश्रित धातु के होते थे तथा वे स्थानीय परंपराओं और विभिन्न मापदंडों पर आधारित थे। उनमें एकरूपता और शुद्धता का अभाव था, जिससे व्यापार और राजकोषीय नियंत्रण में कठिनाई उत्पन्न होती थी। इल्तुतमिश ने पहली बार शुद्ध अरबी-इस्लामी मानकों के अनुरूप चांदी का “टंका” और तांबे का “जीतल” जारी किया। टंका लगभग 175 ग्रेन चांदी का होता था। इस सुधार ने दिल्ली सल्तनत की वित्तीय व्यवस्था को संगठित और विश्वसनीय बनाया।
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प्र.22. बलबन ने अपने शासनकाल में किस उत्सव को प्रचलित किया जो पहले नहीं मनाया जाता था?
(a) ईद
(b) नौरोज (ईरानी नववर्ष)
(c) मुहर्रम
(d) बारावफात
✅ उत्तर: (b) नौरोज (ईरानी नववर्ष)
📝 बलबन ने अपने शासनकाल में दरबार की गरिमा और शाही वैभव को बढ़ाने के लिए ईरानी परंपराओं को अपनाया। इन्हीं परंपराओं में “नौरोज” अर्थात ईरानी नववर्ष का उत्सव भी शामिल था। इससे पहले दिल्ली सल्तनत में यह उत्सव औपचारिक रूप से नहीं मनाया जाता था। नौरोज के अवसर पर दरबार को भव्य रूप से सजाया जाता था, अमीर-उमराव विशेष वस्त्र धारण करते थे और सुल्तान की प्रतिष्ठा का प्रदर्शन किया जाता था। इस प्रकार नौरोज ने बलबन के शासन को अधिक प्रभावशाली और औपचारिक स्वरूप प्रदान किया।
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प्र.23. कैकुबाद के शासन में जलालुद्दीन खिल्जी को कौन सा पद प्रदान किया गया था?
(a) वजीर
(b) नायब
(c) सेनापति
(d) गवर्नर
✅ उत्तर: (c) सेनापति
📝 कैकुबाद के शासनकाल में जलालुद्दीन फिरोज खिल्जी को सेनापति का महत्वपूर्ण पद प्रदान किया गया था। यह नियुक्ति विशेष महत्व रखती थी क्योंकि जलालुद्दीन तुर्की कुलीन वर्ग से नहीं था, बल्कि खिल्जी वंश से संबंधित था। सेनापति के रूप में जलालुद्दीन को सेना और राजनीतिक मामलों में प्रभाव प्राप्त हुआ, जिससे उसकी शक्ति बढ़ी। अंततः 1290 ई० में उसने सत्ता परिवर्तन कर खिल्जी वंश की स्थापना की। इस प्रकार उसकी नियुक्ति ने गुलाम वंश के अंत और नए वंश के उदय की भूमिका तैयार की।
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प्र.24. गुलाम वंश की स्थापना से लेकर अंत तक कुल कितने शासक हुए?
(a) 6 शासक
(b) 8 शासक
(c) 9 शासक
(d) 10 शासक
✅ उत्तर: (c) 9 शासक
📝 गुलाम वंश, जिसे ममलूक वंश भी कहा जाता है, का शासनकाल 1206 ई० से 1290 ई० तक रहा। इस अवधि में कुल 9 शासकों ने दिल्ली सल्तनत पर शासन किया। इनमें कुतुबुद्दीन ऐबक, आरामशाह, इल्तुतमिश, रुक्नुद्दीन फिरोज, रजिया सुल्तान, बहरामशाह, अलाउद्दीन मसूद, नासिरुद्दीन महमूद और बलबन शामिल थे। इस वंश ने लगभग 84 वर्षों तक शासन किया और दिल्ली सल्तनत की प्रशासनिक, सैन्य तथा आर्थिक नींव को सुदृढ़ किया।
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प्र.25. गुलाम वंश के संदर्भ में कौन सा कथन पूर्णतः सही है?
(a) सभी शासक योग्य थे
(b) इस वंश ने भारत में तुर्की शासन की नींव रखी और आगामी वंशों के लिए मार्ग प्रशस्त किया
(c) इस वंश ने केवल 50 वर्ष शासन किया
(d) इस वंश का अंत मंगोल आक्रमण से हुआ
✅ उत्तर: (b) इस वंश ने भारत में तुर्की शासन की नींव रखी और आगामी वंशों के लिए मार्ग प्रशस्त किया
📝 गुलाम वंश ने भारत में तुर्की शासन की सुदृढ़ नींव रखी और दिल्ली सल्तनत की प्रारंभिक संरचना को विकसित किया। कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसकी स्थापना की, जबकि इल्तुतमिश ने इसे संगठित और स्थिर बनाया। रजिया सुल्तान ने महिला नेतृत्व का उदाहरण प्रस्तुत किया और बलबन ने केंद्रीकृत तथा अनुशासित शासन की स्थापना की। इस वंश ने लगभग 84 वर्षों तक शासन किया। 1290 ई० में खिल्जी क्रांति के साथ इसका अंत हुआ, किंतु इसने आगामी वंशों जैसे खिल्जी और तुगलक वंश के लिए मार्ग प्रशस्त किया।