प्लाज्मा झिल्ली, जीवद्रव्य और माइटोकॉण्ड्रिया: 30 महत्वपूर्ण MCQ | UPSC, SSC, NEET 2026

3D पशु और पौध कोशिका का चित्र जिसमें प्लाज्मा झिल्ली, जीवद्रव्य, केन्द्रक और माइटोकॉण्ड्रिया दिखाए गए हैं। कोशिका के अंदर सेमी-ट्रांसपेरेंट जीवद्रव्य और चमकते हुए माइटोकॉण्ड्रिया दिख रहे हैं। विज्ञान और शिक्षा के लिए उपयोगी पोस्टर स्टाइल।

जीव विज्ञान-भाग-13 MCQ-2026

प्लाज्मा झिल्ली, जीवद्रव्य और माइटोकॉण्ड्रिया: 30 महत्वपूर्ण MCQ | UPSC, SSC, NEET 2026

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प्र.1. प्लाज्मा झिल्ली किस पदार्थ से बनी होती है?

(A) केवल प्रोटीन
(B) वसा (लिपिड) और प्रोटीन
(C) सेलुलोज और प्रोटीन
(D) केवल कार्बोहाइड्रेट

उत्तर: (B) वसा (लिपिड) और प्रोटीन

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प्लाज्मा झिल्ली कोशिका की बाहरी परत होती है और मुख्यतः वसा (लिपिड) और प्रोटीन से बनी होती है। इसमें कुछ मात्रा में कार्बोहाइड्रेट्स भी पाए जाते हैं। यह झिल्ली अर्द्ध-पारगम्य होती है, यानी कुछ पदार्थ आसानी से गुजर सकते हैं जबकि कुछ नहीं। इसका मुख्य काम कोशिका के अंदर और बाहर पदार्थों का आवागमन नियंत्रित करना है। जंतु कोशिकाओं में यह सबसे बाहरी परत होती है, जबकि वनस्पति कोशिकाओं में यह सेल वॉल के अंदर दूसरी परत के रूप में होती है। इसे कोशिका कला या जीवद्रव्य कला भी कहा जाता है।

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प्र.2. प्लाज्मा झिल्ली में किस प्रकार की पारगम्यता पाई जाती है?

(A) पूर्ण पारगम्यता
(B) अपारगम्यता
(C) चयनात्मक पारगम्यता (Selective Permeability)
(D) इनमें से कोई नहीं

उत्तर: (C) चयनात्मक पारगम्यता (Selective Permeability)

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प्लाज्मा झिल्ली में चयनात्मक पारगम्यता (Selective Permeability) पाई जाती है, यानी यह कुछ पदार्थों को अंदर या बाहर जाने देती है और कुछ को रोकती है। इसी विशेषता के कारण यह कोशिका के आंतरिक वातावरण को नियंत्रित करती है। यह गुण परासरण, विसरण और सक्रिय आवागमन जैसी क्रियाओं के लिए जरूरी है। इस गुण के कारण ही कोशिका जीवित रह पाती है और अपनी आंतरिक संरचना बनाए रख सकती है।

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प्र.3. निम्नलिखित में से कौन-सी क्रिया प्लाज्मा झिल्ली द्वारा सम्पन्न नहीं होती है ?

(A) परासरण (Osmosis)
(B) पाइनोसाइटोसिस
(C) प्रकाश संश्लेषण
(D) सक्रिय आवागमन

उत्तर: (C) प्रकाश संश्लेषण

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प्लाज्मा झिल्ली पारगम्यता, परासरण, विसरण, सक्रिय आवागमन, पाइनोसाइटोसिस, फैगोसाइटोसिस, साइटोसिस, प्रोटीन संश्लेषण और DNA replication जैसी क्रियाओं में सहायक होती है। परंतु प्रकाश संश्लेषण की क्रिया क्लोरोप्लास्ट (हरितलवक) में होती है, न कि प्लाज्मा झिल्ली में। प्लाज्मा झिल्ली का मुख्य कार्य कोशिका की सुरक्षा करना और पदार्थों के आवागमन को नियंत्रित करना है।

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प्र.4. जीवद्रव्य को “जीवन का भौतिक आधार” किसने कहा है ?

(A) रॉबर्ट हुक
(B) हक्सले
(C) पुरकिन्जे
(D) लुई पाश्चर

उत्तर: (B) हक्सले

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जीवद्रव्य (Protoplasm) को “जीवन का भौतिक आधार” (Physical Basis of Life) कहा जाता है। इसका नाम सर्वप्रथम पुरकिन्जे (1840) और एच.बी. मोहल (1846) ने प्रोटोप्लाज्म रखा। जीवों में होने वाली समस्त जैविक क्रियाएँ इसी जीवद्रव्य में सम्पन्न होती हैं। इसमें लगभग 60-80% मात्रा में जल पाया जाता है। यह एक क्रिस्टलो-कोलाइडल घोल है और यह सॉल और जेल दो अवस्थाओं में पाया जाता है।

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प्र.5. जीवद्रव्य किस प्रकार का घोल है?

(A) केवल क्रिस्टलीय घोल
(B) केवल कोलाइडल घोल
(C) क्रिस्टलो-कोलाइडल घोल
(D) सुपरसैचुरेटेड घोल

उत्तर: (C) क्रिस्टलो-कोलाइडल घोल

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जीवद्रव्य एक क्रिस्टलो-कोलाइडल घोल (Crystallo-Colloidal Solution) है। इसमें शक्कर, नमक, खनिज लवण जैसे पदार्थ आयन के रूप में घुले रहते हैं और क्रिस्टलीय घोल बनाते हैं। वहीं प्रोटीन और वसा जैसे कार्बनिक पदार्थ कोलाइडल घोल बनाते हैं। यह घोल दो अवस्थाओं में पाया जाता है — सॉल (Sol) जो अर्द्धतरल होती है और जेल (Gel) जो अर्द्ध ठोस होती है। ये अवस्थाएँ एक-दूसरे में परिवर्तित हो सकती हैं।

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प्र.6. कोलाइड कणों का आकार कितना होता है?

(A) 0.1 से 0.001 माइक्रोन
(B) 1 से 10 माइक्रोन
(C) 10 से 100 माइक्रोन
(D) 0.001 से 0.00001 माइक्रोन

उत्तर: (A) 0.1 से 0.001 माइक्रोन

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कोलाइड कणों का आकार 0.1 से 0.001 माइक्रोन के बीच होता है। ये कण अणुओं से बड़े होते हैं क्योंकि कई अणु समूहों में जुड़े रहते हैं। जीवद्रव्य में प्रोटीन और वसा जैसे कार्बनिक पदार्थ इसी रूप में पाए जाते हैं। इन कणों का जीवद्रव्य में महत्वपूर्ण कार्य है। सॉल अवस्था में ये कण ब्राउनीयन गति करते हैं, जिससे वे तल पर नहीं बैठ पाते। यह विशेषता जीवद्रव्य को जीवित रखने में सहायक है।

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प्र.7. ब्राउनीयन गति (Brownian Movement) कहाँ सम्पन्न होती है?

(A) केन्द्रक में
(B) जीवद्रव्य में
(C) माइटोकॉण्ड्रिया में
(D) क्लोरोप्लास्ट में

उत्तर: (B) जीवद्रव्य में

📝

ब्राउनीयन गति जीवद्रव्य में सम्पन्न होती है। सॉल अवस्था में कोलाइडल कण एक-दूसरे से टकराकर इधर-उधर गति करते हैं, इसे ब्राउनीयन गति कहते हैं। इसी गति के कारण जीवद्रव्य में घुलित अणु या कण तल पर नहीं बैठ पाते। यह गति जीवद्रव्य को एक समान बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस गति की खोज वैज्ञानिक रॉबर्ट ब्राउन ने की थी, इसलिए इसे उनके नाम पर रखा गया।

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प्र.8. जीवद्रव्य में सर्वाधिक मात्रा में कौन-सा तत्व पाया जाता है?

(A) कार्बन
(B) हाइड्रोजन
(C) ऑक्सीजन
(D) नाइट्रोजन

उत्तर: (C) ऑक्सीजन

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जीवद्रव्य में लगभग 30 तत्व पाए जाते हैं जिनमें ऑक्सीजन सर्वाधिक मात्रा (65%) में होती है। इसके बाद क्रमशः कार्बन (18.5%), हाइड्रोजन (10.5%) और नाइट्रोजन (3.3%) पाई जाती है। शेष तत्वों में सोडियम, पोटैशियम, कैल्शियम , लोहा और सल्फेट सूक्ष्म मात्रा में होते हैं। जीवद्रव्य का निर्माण मुख्यतः इन्हीं चार तत्वों से होता है जो सभी जैविक यौगिकों के मूल घटक हैं।

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प्र.9. जीवद्रव्य में सॉल-जेल परिवर्तन किस प्रकार की क्रिया है?

(A) भौतिक क्रिया
(B) रासायनिक क्रिया
(C) जैव-रासायनिक क्रिया
(D) यांत्रिक क्रिया

उत्तर: (C) जैव-रासायनिक क्रिया

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जीवद्रव्य में सॉल-जेल परिवर्तन एक जैव-रासायनिक क्रिया है। सॉल (Sol) अर्द्धतरल अवस्था होती है जिसमें कोलाइडल कण दूर-दूर बिखरे रहते हैं। जेल (Gel) गाढ़ा और अर्द्ध ठोस होता है जिसमें कण आपस में जुड़े रहते हैं। ये दोनों अवस्थाएँ आसानी से एक-दूसरे में बदल सकती हैं। यह परिवर्तन जीवद्रव्य की एक महत्वपूर्ण विशेषता है जो अनेक जैविक कार्यों जैसे गति, विभाजन आदि में सहायक है।

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प्र.10. प्रोटोप्लाज्म नाम सर्वप्रथम किसने दिया था?

(A) रॉबर्ट हुक
(B) पुरकिन्जे और एच.बी. मोहल
(C) कोलिकर
(D) पेलाडे

उत्तर: (B) पुरकिन्जे और एच.बी. मोहल

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प्रोटोप्लाज्म (Protoplasm) नाम सर्वप्रथम पुरकिन्जे (1840) और एच.बी. मोहल (1846) ने दिया। जीवद्रव्य रंगहीन, अर्द्धपारदर्शक और अर्द्धतरल पदार्थ है। इसमें 60-80% जल होता है। जीवों में समस्त जैविक क्रियाएँ इसी में होती हैं, इसलिए इसे जीवन का भौतिक आधार कहा जाता है। जीवद्रव्य के दो भाग होते हैं — कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) और केन्द्रक (Nucleus)

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प्र.11. कोशिकाद्रव्य को कितने भागों में बाँटा जाता है?

(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच

उत्तर: (B) तीन

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कोशिकाद्रव्य को तीन भागों में बाँटा जाता है —
(1) एक्टोप्लास्ट: कोशिका भित्ति के सम्पर्क में पतली झिल्ली, जिसे प्लाज्मा कला या प्लाज्मालेमा भी कहते हैं।
(2) टोनोप्लास्ट: रिक्तिका के चारों ओर की पतली झिल्ली।
(3) मीसोप्लाज्म: एक्टोप्लास्ट और टोनोप्लास्ट के बीच का भाग जिसमें कोशिका के सभी कोशिकांग पाए जाते हैं। मीसोप्लाज्म में ही माइटोकॉण्ड्रिया, राइबोसोम आदि सभी उपापचयी सक्रिय कोशिकांग स्थित होते हैं।

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प्र.12. रिक्तिका (Vacuole) के चारों ओर की झिल्ली को क्या कहते हैं?

(A) प्लाज्मालेमा
(B) टोनोप्लास्ट
(C) एक्टोप्लास्ट
(D) मीसोप्लाज्म

उत्तर: (B) टोनोप्लास्ट

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रिक्तिका (Vacuole) के चारों ओर एक पतली झिल्ली होती है जिसे टोनोप्लास्ट (Tonoplast) या रिक्तिका कला (Vacuolar Membrane) कहते हैं। यह संरचना प्लाज्मा झिल्ली के समान होती है। रिक्तिका के अंदर भरे तरल पदार्थ को रिक्तिका रस (Vacuolar Sap) कहते हैं। रिक्तिकाएँ प्रायः पादप कोशिकाओं में पाई जाती हैं और कोशिका की स्फीति बनाए रखने में सहायक होती हैं।

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प्र.13. तरुण (young) कोशिका में रिक्तिकाओं की विशेषता क्या होती है?

(A) आकार बड़ा, संख्या कम
(B) आकार छोटा, संख्या अधिक
(C) आकार बड़ा, संख्या अधिक
(D) आकार छोटा, संख्या कम

उत्तर: (B) आकार छोटा, संख्या अधिक

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तरुण (युवा) कोशिका में रिक्तिकाएँ छोटी और संख्या अधिक होती हैं। परंतु जैसे-जैसे कोशिका परिपक्व होती है, रिक्तिकाएँ आपस में मिलकर बड़ी हो जाती हैं और उनकी संख्या कम हो जाती है। परिपक्व कोशिका में एक बड़ी केन्द्रीय रिक्तिका होती है। जंतु कोशिकाओं में रिक्तिकाएँ अनुपस्थित या बहुत छोटी होती हैं। रिक्तिकाएँ कोशिका की स्फीति बनाए रखने और भोज्य पदार्थ संचित करने का कार्य करती हैं।

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प्र.14. पुष्पों और फलों में रंग के लिए उत्तरदायी रिक्तिका में कौन-सा रंगद्रव्य पाया जाता है?

(A) क्लोरोफिल
(B) कैरोटीन
(C) एन्थोसायनिन
(D) जैन्थोफिल

उत्तर: (C) एन्थोसायनिन

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पुष्पों और फलों की रिक्तिकाओं में एन्थोसायनिन (Anthocyanin) नामक रंगद्रव्य पाया जाता है, जो उन्हें नीला, बैंगनी, लाल और गुलाबी रंग प्रदान करता है। रिक्तिका रस (Vacuolar Sap) में यह घुला रहता है। सेब के फल में लाली का कारण भी एन्थोसायनिन है। यह रंग फूलों को आकर्षक बनाता है, जिससे कीट परागण में सहायता मिलती है।

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प्र.15. जंतु कोशिकाओं में रिक्तिकाएँ किस प्रकार होती हैं?

(A) एक बड़ी रिक्तिका
(B) अनेक छोटी रिक्तिकाएँ या अनुपस्थित
(C) दो मध्यम रिक्तिकाएँ
(D) पादप कोशिका के समान

उत्तर: (B) अनेक छोटी रिक्तिकाएँ या अनुपस्थित

📝

जंतु कोशिकाओं में रिक्तिकाएँ अनेक छोटी होती हैं या अनुपस्थित रहती हैं। यह पादप और जंतु कोशिका के बीच एक प्रमुख अंतर है। पादप कोशिकाओं में विशेषकर परिपक्व कोशिकाओं में एक बड़ी केन्द्रीय रिक्तिका होती है जो कोशिका के अधिकांश स्थान को घेरती है। यह जंतु-पादप कोशिका का महत्वपूर्ण अंतर है और IAS और UPPCS जैसी परीक्षाओं में प्रायः पूछा जाता है।

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प्र.16. माइटोकॉण्ड्रिया की खोज किसने की थी?

(A) अल्टमान
(B) बेन्डा
(C) कोलिकर
(D) पेलाडे

उत्तर: (C) कोलिकर

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माइटोकॉण्ड्रिया की खोज सर्वप्रथम कोलिकर (Kolliker) ने 1880 में की थी। इसके बाद 1890 में अल्टमान (Altmann) ने इसका वर्णन “बायोप्लास्ट” के नाम से किया। 1897 में बेन्डा (Benda) ने इन रचनाओं को “माइटोकॉण्ड्रिया” नाम दिया जो आज भी प्रचलित है। यूकैरियोटिक कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य में माइटोकॉण्ड्रिया गोलाकार, छड़ या कण के आकार में पाए जाते हैं। इसे कोशिका का पावर हाउस भी कहा जाता है।

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प्र.17. माइटोकॉण्ड्रिया को “बायोप्लास्ट” नाम किसने दिया था?

(A) कोलिकर
(B) अल्टमान
(C) बेन्डा
(D) पेलाडे

उत्तर: (B) अल्टमान

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1890 में अल्टमान (Altmann) ने माइटोकॉण्ड्रिया का वर्णन “बायोप्लास्ट” (Bioplast) के नाम से किया। कोलिकर ने 1880 में इसकी खोज की थी और बेन्डा ने 1897 में इसे “माइटोकॉण्ड्रिया” नाम दिया। माइटोकॉण्ड्रिया की सामान्य लंबाई 5 मिलीमाइक्रोन होती है और व्यास 0.2 से 2 मिलीमाइक्रोन तक होता है। यह ऊर्जा उत्पादन में सहायक होने के कारण कोशिका का सबसे महत्वपूर्ण कोशिकांग माना जाता है।

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प्र.18. माइटोकॉण्ड्रिया किन कोशिकाओं में नहीं पाया जाता है?

(A) यकृत कोशिका
(B) मांसपेशी कोशिका
(C) नीले-हरे शैवाल और R.B.C.
(D) तंत्रिका कोशिका

उत्तर: (C) नीले-हरे शैवाल और R.B.C.

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माइटोकॉण्ड्रिया बैक्टीरिया, नीले-हरे शैवाल और मानव की परिपक्व लाल रक्त कोशिकाएँ (R.B.C.) में नहीं पाया जाता। इसके अलावा यह पौधों और जंतुओं की समस्त जीवित कोशिकाओं में पाया जाता है। R.B.C. में माइटोकॉण्ड्रिया की अनुपस्थिति इसलिए होती है क्योंकि यह परिपक्व होने पर अपना केन्द्रक भी खो देती है। यह तथ्य विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में बारम्बार पूछा जाता है।

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प्र.19. माइटोकॉण्ड्रिया को “कोशिका का पावर हाउस” क्यों कहते हैं?

(A) क्योंकि यह प्रकाश संश्लेषण करता है
(B) क्योंकि यहाँ सभी खाद्य पदार्थों का आक्सीकरण होकर ATP बनती है
(C) क्योंकि यह DNA का निर्माण करता है
(D) क्योंकि यह कोशिका भित्ति बनाता है

उत्तर: (B) क्योंकि यहाँ सभी खाद्य पदार्थों का आक्सीकरण होकर ATP बनती है

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माइटोकॉण्ड्रिया को “कोशिका का पावर हाउस” (Power House of Cell) कहा जाता है क्योंकि यहाँ कार्बोहाइड्रेट्स, वसा और प्रोटीन जैसे खाद्य पदार्थ का ऑक्सीकरण होता है। इससे ATP (Adenosine Triphosphate) के रूप में ऊर्जा उत्पन्न होती है। ATP का निर्माण ADP और अकार्बनिक फास्फेट के संयोग से होता है। ऑक्सीकरण के फलस्वरूप CO₂ और जल भी बनते हैं। यह ऊर्जा कोशिका की विभिन्न क्रियाओं जैसे जैव संश्लेषण, यांत्रिक कार्य और परिवहन में उपयोग होती है।

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प्र.20. क्रेब्स चक्र (Krebs Cycle) माइटोकॉण्ड्रिया के किस भाग में सम्पन्न होता है?

(A) बाह्य कोष्ठ में
(B) क्रिस्टी में
(C) मैट्रिक्स में
(D) बाहरी झिल्ली में

उत्तर: (C) मैट्रिक्स में

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क्रेब्स चक्र (Krebs Cycle) माइटोकॉण्ड्रिया के मैट्रिक्स में सम्पन्न होता है। मैट्रिक्स भीतरी झिल्ली से घिरा सघन और कणिकायुक्त जेलीय पदार्थ है। यहाँ चक्र के सभी विकार घुलित अवस्था में पाए जाते हैं। इस चक्र में पाइरुवेट अणु का ऑक्सीकरण होकर CO₂ उत्पन्न होती है और हाइड्रोजन अणु निकलते हैं जो प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन में टूट जाते हैं। यह ऊर्जा उत्पादन की महत्वपूर्ण प्रक्रिया है।

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प्र.21. इलेक्ट्रॉन अभिगमन तन्त्र माइटोकॉण्ड्रिया के किस भाग में होता है?

(A) मैट्रिक्स में
(B) बाहरी झिल्ली में
(C) क्रिस्टी में
(D) बाह्य कोष्ठ में

उत्तर: (C) क्रिस्टी में

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इलेक्ट्रॉन अभिगमन तन्त्र (Electron Transport System) माइटोकॉण्ड्रिया के क्रिस्टी में होता है। क्रिस्टी भीतरी झिल्ली से बनी हाथ की अंगुलियों जैसी संरचनाएँ होती हैं। क्रेब्स चक्र से उत्पन्न इलेक्ट्रॉन इस तंत्र में प्रवेश करते हैं और अंत में ऑक्सीजन और प्रोटॉन से संयोग करके जल बनाते हैं। इसे श्वसन श्रृंखला (Respiratory Chain) भी कहते हैं। इसी प्रक्रिया में ऑक्सीकीय फॉस्फोरिलीकरण द्वारा ATP का निर्माण होता है।

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प्र.22. F₁ कण (ऑक्सीसोम) माइटोकॉण्ड्रिया में कहाँ पाए जाते हैं?

(A) मैट्रिक्स में
(B) बाहरी झिल्ली पर
(C) भीतरी झिल्ली और क्रिस्टी की सतह पर
(D) बाह्य कोष्ठ में

उत्तर: (C) भीतरी झिल्ली और क्रिस्टी की सतह पर

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F₁ कण या ऑक्सीसोम माइटोकॉण्ड्रिया की भीतरी झिल्ली और क्रिस्टी की सतह पर पाए जाते हैं। ये टेनिस के रैकेट के आकार के होते हैं और 7 से 100 Å लंबाई के होते हैं। प्रत्येक F₁ कण तीन भागों में होता है — आधार (Base), वृन्त (Stalk) और सिर (Head)। इनमें इलेक्ट्रॉन अभिगमन तंत्र और ऑक्सीकीय फॉस्फोरिलीकरण के एन्जाइम होते हैं। इन्हें इलेक्ट्रॉन अभिगमन कण (Electron Transport Particle) भी कहा जाता है।

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प्र.23. माइटोकॉण्ड्रिया में DNA कहाँ पाया जाता है?

(A) बाहरी झिल्ली में
(B) मैट्रिक्स में
(C) क्रिस्टी में
(D) बाह्य कोष्ठ में

उत्तर: (B) मैट्रिक्स में

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माइटोकॉण्ड्रिया के मैट्रिक्स में DNA पाया जाता है। कोशिका में DNA केवल केन्द्रक में ही नहीं बल्कि माइटोकॉण्ड्रिया और क्लोरोप्लास्ट में भी होता है। माइटोकॉण्ड्रिया का रासायनिक संघटन प्रोटीन (65-70%), फॉस्फोलिपिड (25%), RNA (0.5%) और कुछ मात्रा में DNA से होता है। DNA की उपस्थिति के कारण माइटोकॉण्ड्रिया अर्ध-स्वायत्त कोशिकांग माना जाता है जो स्वयं विभाजित हो सकता है।

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प्र.24. ATP का निर्माण किसमें होता है?

(A) राइबोसोम में
(B) केन्द्रक में
(C) माइटोकॉण्ड्रिया में
(D) लाइसोसोम में

उत्तर: (C) माइटोकॉण्ड्रिया में

📝

ATP (Adenosine Triphosphate) का निर्माण माइटोकॉण्ड्रिया में होता है। यह ADP (Adenosine Diphosphate) और अकार्बनिक फास्फेट (Pi) के संयोग से बनता है। यह ऊर्जा का प्रमुख वाहक है और कोशिका में ऊर्जा मुद्रा के रूप में कार्य करता है। इसका निर्माण ऑक्सीकीय फॉस्फोरिलीकरण द्वारा माइटोकॉण्ड्रिया के F₁ कणों में होता है। इसी कारण माइटोकॉण्ड्रिया को कोशिका का पावर हाउस कहा जाता है।

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प्र.25. माइटोकॉण्ड्रिया की झिल्ली कितने Å मोटी होती है?

(A) 30 Å
(B) 60 Å
(C) 100 Å
(D) 150 Å

उत्तर: (B) 60 Å

📝

माइटोकॉण्ड्रिया लगभग 60 Å मोटी वसा-प्रोटीन (Lipoprotein) से निर्मित दो झिल्लियों से घिरी होती है — बाहरी झिल्ली और भीतरी झिल्लीबाहरी झिल्ली सपाट होती है और भीतरी झिल्ली अंदर की ओर क्रिस्टी बनाती है। दोनों झिल्लियों के बीच का स्थान बाह्य कोष्ठ कहलाता है जो लगभग 60-80 Å होता है। इन दो झिल्लियों की रचना इकाई झिल्ली (Unit Membrane) की तरह होती है।

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प्र.26. गॉल्जीकाय की खोज किसने की थी ?

(A) कोलिकर
(B) कैमिलो गॉल्जी
(C) पेलाडे
(D) के.आर. पोर्टर

उत्तर: (B) कैमिलो गॉल्जी

📝

गॉल्जीकाय (Golgi Bodies) की खोज सर्वप्रथम 1898 में कैमिलो गॉल्जी (Camillo Golgi) ने की। इन्हीं के नाम पर इसे गॉल्जीकाय कहा जाता है। पौधों में इसे डिक्टियोसोम (Dictyosome) भी कहते हैं। गॉल्जीकाय को लाइपोकॉण्ड्रिया (Lipochondria) भी कहा जाता है। यह नीले-हरे शैवाल, जीवाणु और माइकोप्लाज्मा को छोड़कर सभी जीवधारियों की कोशिकाओं में पाया जाता है।

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प्र.27. गॉल्जीकाय को “ट्रैफिक पुलिस” क्यों कहते हैं?

(A) क्योंकि यह ATP बनाता है
(B) क्योंकि यह प्रोटीन पुटिका, लिपिड परिवहन और लाइसोसोम निर्माण में सहायक है
(C) क्योंकि यह DNA का निर्माण करता है
(D) क्योंकि यह कोशिका विभाजन करता है

उत्तर: (B) क्योंकि यह प्रोटीन पुटिका, लिपिड परिवहन और लाइसोसोम निर्माण में सहायक है

📝

गॉल्जीकाय को “ट्रैफिक पुलिस” (Traffic Police) कहा जाता है क्योंकि यह प्रोटीन पुटिकाओं के निर्माण, लिपिड परिवहन और लाइसोसोम के गठन में सहायक होता है। यह कोशिका के विभिन्न पदार्थों के वितरण को नियंत्रित करता है। जंतुओं में गॉल्जीकाय से विभिन्न हार्मोन स्त्रावित होते हैं। यह शुक्राणुओं के अग्रपिण्ड (Acrosomes) के निर्माण और कोशिका विभाजन में कोशिका पट्टिका (Cell Plate) बनाने में भी सहायक है।

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प्र.28. पौधों में गॉल्जीकाय को किस अन्य नाम से जाना जाता है?

(A) बायोप्लास्ट
(B) क्रोमोसोम
(C) डिक्टियोसोम
(D) लाइपोकॉण्ड्रिया

उत्तर: (C) डिक्टियोसोम

📝

पौधों में गॉल्जीकाय को डिक्टियोसोम (Dictyosome) भी कहा जाता है। गॉल्जीकाय को लाइपोकॉण्ड्रिया भी कहते हैं। गॉल्जीकाय की गुहिकाओं में अनेक प्रकार के एन्जाइम्स और पॉलिसैकेराइड्स पाए जाते हैं। इसलिए यह स्त्रावी कोशिकाओं में अधिक पाया जाता है। अग्न्याशय, यकृत और थायरॉइड जैसी स्त्रावी कोशिकाओं में यह प्रचुर मात्रा में मिलता है। यह कोशिका विभाजन के समय कोशिका पट्टिका निर्माण में भी भाग लेता है।

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प्र.29. अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) की खोज किसने की थी?

(A) पेलाडे
(B) के.आर. पोर्टर (K.R. Porter)
(C) कोलिकर
(D) कैमिलो गॉल्जी

उत्तर: (B) के.आर. पोर्टर (K.R. Porter)

📝

अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) की खोज के.आर. पोर्टर ने 1945 में की थी। यह केन्द्रक कला से कोशिका कला तक फैली रहती है। यह स्तनधारियों की लाल रुधिर कणिकाओं को छोड़कर सामान्यतः सभी सुकेन्द्रकीय कोशिकाओं में पाई जाती है। जीवाणु और नीले-हरे शैवाल में इसका अभाव होता है। यह लाइपोप्रोटीन्स की दोहरी इकाई झिल्ली से बनी होती है। इसे कोशिका का कंकाल तंत्र भी कहते हैं।

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प्र.30. अन्तःप्रद्रव्यी जालिका को “कोशिका का कंकाल तंत्र” क्यों कहते हैं?

(A) क्योंकि यह कठोर होती है
(B) क्योंकि यह कोशिका को यांत्रिक शक्ति प्रदान करती है
(C) क्योंकि यह हड्डी जैसी होती है
(D) क्योंकि यह कोशिका भित्ति बनाती है

उत्तर: (B) क्योंकि यह कोशिका को यांत्रिक शक्ति प्रदान करती है

📝

अन्तःप्रद्रव्यी जालिका को “कोशिका का कंकाल तंत्र” इसलिए कहते हैं क्योंकि यह कोशिका में कंकाल की भाँति कार्य करती है और उसे यांत्रिक शक्ति प्रदान करती है। इसके अन्य कार्यों में एक कोशिका को दूसरी से जीवद्रव्य तंतु के माध्यम से जोड़ना, कोशिका विभाजन का तल निश्चित करना, आनुवंशिक पदार्थों का अभिगमन और प्रोटीन संश्लेषण शामिल हैं। यह कोशिका भित्ति और केन्द्रक आवरण के निर्माण में भी सहायक है।

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