
प्राचीन भारत का इतिहास-13 MCQ-2026
वैदिक साहित्य और वेदांग MCQs 2026: 50+ महत्वपूर्ण प्रश्न (Vedic Literature & Vedanga)
प्रश्न 1. अथर्ववेद में ‘सभा’ और ‘समिति’ को किसकी दो पुत्रियाँ कहा गया है?
✅ उत्तर: (C) प्रजापति की
अथर्ववेद में ‘सभा’ और ‘समिति’ को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया है। यह उल्लेख वैदिक काल की राजनीतिक और सामाजिक संस्थाओं की महत्वपूर्ण जानकारी देता है। ‘सभा’ मुख्यतः श्रेष्ठ, अनुभवी और वृद्ध व्यक्तियों की संस्था मानी जाती थी, जहाँ महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श किया जाता था। वहीं ‘समिति’ को सामान्य जनता की संस्था माना गया है, जिसमें जनसाधारण की भागीदारी होती थी। ये दोनों संस्थाएँ मिलकर वैदिक काल की शासन व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। इतिहासकारों के अनुसार सभा और समिति राजा की शक्ति पर नियंत्रण रखने वाली संस्थाएँ थीं और महत्वपूर्ण निर्णयों में इनका प्रभाव रहता था। इसी कारण इन्हें वैदिक काल की लोकतांत्रिक संस्थाएँ माना जाता है। कई विद्वान इन्हें भारत में प्रजातंत्र की सबसे प्राचीन संस्थाओं के रूप में भी देखते हैं, जो उस समय के सामाजिक-राजनीतिक संगठन के उन्नत स्तर को दर्शाती हैं।
प्रश्न 2. अथर्ववेद में मगध के लोगों को क्या कहा गया है?
✅ उत्तर: (B) व्रात्य
अथर्ववेद में मगध के लोगों को ‘व्रात्य’ कहा गया है। वैदिक साहित्य में ‘व्रात्य’ शब्द उन लोगों के लिए प्रयोग किया जाता था जो वैदिक कर्मकांड, यज्ञ परंपराओं और सामाजिक नियमों का पालन नहीं करते थे या उनसे बाहर माने जाते थे। इससे यह संकेत मिलता है कि उस समय मगध क्षेत्र (आधुनिक बिहार) के लोग वैदिक आर्य संस्कृति की मुख्यधारा से कुछ हद तक अलग थे। वैदिक ग्रंथों में ‘व्रात्य’ शब्द कभी-कभी उन समुदायों के लिए भी प्रयुक्त हुआ है जो आर्य समाज के धार्मिक और सामाजिक ढाँचे में पूरी तरह सम्मिलित नहीं थे। यह तथ्य उस समय की सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक विभाजन को दर्शाता है। उल्लेखनीय है कि बाद के ऐतिहासिक काल में यही मगध क्षेत्र अत्यंत शक्तिशाली बन गया और यहाँ से नंद, मौर्य और गुप्त जैसे महान साम्राज्यों का उदय हुआ, जिन्होंने भारतीय इतिहास को गहराई से प्रभावित किया।
प्रश्न 3. शतपथ ब्राह्मण में कृषि की कितनी क्रियाओं का उल्लेख मिलता है?
✅ उत्तर: (C) चार
शतपथ ब्राह्मण में कृषि से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। इस ग्रंथ में कृषि की चार प्रमुख क्रियाओं का उल्लेख किया गया है — जुताई, बुआई, कटाई और मड़ाई। यह तथ्य दर्शाता है कि उत्तर वैदिक काल में कृषि प्रणाली काफी विकसित हो चुकी थी और खेती के विभिन्न चरणों की स्पष्ट समझ मौजूद थी। शतपथ ब्राह्मण को यजुर्वेद का ब्राह्मण ग्रंथ माना जाता है और यह सभी ब्राह्मण ग्रंथों में सबसे विशाल और विस्तृत है। इस ग्रंथ में केवल धार्मिक अनुष्ठानों का ही नहीं, बल्कि उस समय की सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों का भी वर्णन मिलता है। उल्लेखनीय है कि इसमें दो प्रकार के समुद्रों का भी उल्लेख मिलता है, जो उस काल के भौगोलिक ज्ञान को दर्शाता है। इसलिए शतपथ ब्राह्मण को उत्तर वैदिक काल के कृषि और सामाजिक जीवन की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जानकारी देने वाला ग्रंथ माना जाता है।
प्रश्न 4. शतपथ ब्राह्मण में किसका उल्लेख मिलता है?
✅ उत्तर: (B) कृषि की चार क्रियाओं और दो प्रकार के समुद्रों का
शतपथ ब्राह्मण वैदिक साहित्य का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें कृषि की चार क्रियाओं — जुताई, बुआई, कटाई और मड़ाई का उल्लेख मिलता है, जो यह दर्शाता है कि उत्तर वैदिक काल में कृषि व्यवस्था काफी विकसित हो चुकी थी। इसके साथ ही इस ग्रंथ में दो प्रकार के समुद्रों का भी उल्लेख मिलता है, जो उस समय के भौगोलिक और वैज्ञानिक ज्ञान की व्यापकता को प्रकट करता है। शतपथ ब्राह्मण में परीक्षित और जनमेजय जैसे प्रसिद्ध राजाओं का उल्लेख भी मिलता है, जिससे उस काल की राजनीतिक स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। यह ग्रंथ यजुर्वेद का सबसे महत्वपूर्ण और विस्तृत ब्राह्मण ग्रंथ माना जाता है। परंपरा के अनुसार इसके प्रमुख आचार्य या रचयिता महर्षि याज्ञवल्क्य माने जाते हैं। इसलिए शतपथ ब्राह्मण को वैदिक युग के धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक जीवन को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।
प्रश्न 5. अथर्ववेद में कितने बैलों द्वारा जोते जाने वाले खेतों का उल्लेख है?
✅ उत्तर: (C) 6 से 12 बैल
अथर्ववेद में कृषि से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। इसमें उल्लेख मिलता है कि खेतों की जुताई के लिए 6 से 12 बैलों का उपयोग किया जाता था। यह तथ्य इस बात का प्रमाण है कि उत्तर वैदिक काल में कृषि प्रणाली काफी विकसित हो चुकी थी और खेती बड़े पैमाने पर की जाती थी। अधिक संख्या में बैलों का उपयोग यह दर्शाता है कि उस समय कृषि कार्यों में पशुपालन का महत्वपूर्ण स्थान था। बैलों की सहायता से भूमि की गहरी और व्यापक जुताई संभव होती थी, जिससे उत्पादन क्षमता भी बढ़ती थी। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि उस काल में पशुधन को आर्थिक समृद्धि का प्रमुख आधार माना जाता था। इस प्रकार अथर्ववेद में दिया गया यह उल्लेख प्राचीन भारतीय कृषि व्यवस्था और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रमाण प्रस्तुत करता है।
प्रश्न 6. अथर्ववेद के ‘पृथ्वी सूक्त’ को क्या माना जाता है?
✅ उत्तर: (B) वैदिक राष्ट्रीय गीत
अथर्ववेद के प्रसिद्ध ‘पृथ्वी सूक्त’ को प्रायः वैदिक राष्ट्रीय गीत के रूप में माना जाता है। इस सूक्त में पृथ्वी के प्रति गहरी श्रद्धा और मातृभूमि के प्रति समर्पण की भावना व्यक्त की गई है। पृथ्वी सूक्त में कुल 63 मंत्र हैं, जिनमें पृथ्वी की महिमा, उसकी समृद्धि और मानव जीवन के साथ उसके गहरे संबंध का वर्णन किया गया है। इस सूक्त का एक अत्यंत प्रसिद्ध वाक्य है — “माता भूमि: पुत्रोऽहम् पृथिव्याः”, जिसका अर्थ है कि पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं। यह कथन मातृभूमि के प्रति प्रेम और सम्मान की भावना को व्यक्त करता है। इसलिए इतिहासकारों के अनुसार यह मातृभूमि की अवधारणा का सबसे प्राचीन वैदिक प्रमाण माना जाता है और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में इसका विशेष महत्व है।
प्रश्न 7. ऋग्वेद की एकमात्र उपलब्ध शाखा कौन सी है?
✅ उत्तर: (B) शाकल शाखा
ऋग्वेद वैदिक साहित्य का सबसे प्राचीन ग्रंथ माना जाता है। प्राचीन समय में इसकी कई शाखाएँ (Branches) विद्यमान थीं, जिनके माध्यम से वेदों का अध्ययन और संरक्षण किया जाता था। किंतु समय के साथ अधिकांश शाखाएँ लुप्त हो गईं और आज केवल ‘शाकल शाखा’ ही उपलब्ध है। यह शाखा परंपरा के अनुसार महर्षि शाकल्य से संबंधित मानी जाती है, जिन्होंने ऋग्वेद के मंत्रों को व्यवस्थित रूप से संकलित किया। शाकल शाखा के माध्यम से ही आज हमें ऋग्वेद के मंत्रों का संपूर्ण रूप प्राप्त होता है। इस शाखा का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यंत अधिक है। इसी महत्व को ध्यान में रखते हुए UNESCO ने 2007 में ऋग्वेद की शाकल शाखा की पांडुलिपियों को विश्व विरासत (Memory of the World Register) में शामिल किया। यह भारतीय वैदिक परंपरा की प्राचीनता और वैश्विक महत्व का महत्वपूर्ण प्रमाण है।
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प्रश्न 8. यजुर्वेद की किस शाखा को ‘वास्तविक यजुर्वेद’ कहा जाता है?
✅ उत्तर: (C) वाजसनेयी शाखा
यजुर्वेद वैदिक साहित्य का एक महत्वपूर्ण वेद है, जो मुख्य रूप से यज्ञों और वैदिक अनुष्ठानों से संबंधित मंत्रों और विधियों का वर्णन करता है। यजुर्वेद की ‘वाजसनेयी शाखा’ को प्रायः ‘वास्तविक यजुर्वेद’ कहा जाता है। यह शाखा शुक्ल यजुर्वेद से संबंधित है और इसके संकलनकर्ता के रूप में महर्षि याज्ञवल्क्य का नाम लिया जाता है। ‘वाजसनेयी’ नाम का संबंध याज्ञवल्क्य के पिता ‘वाजसन’ से माना जाता है, इसलिए इस शाखा को वाजसनेयी कहा गया। वैदिक परंपरा में यजुर्वेद को दो प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है — शुक्ल यजुर्वेद और कृष्ण यजुर्वेद। इनमें शुक्ल यजुर्वेद को अधिक व्यवस्थित और स्पष्ट माना जाता है। यह तथ्य प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे UPSC, SSC और अन्य परीक्षाओं में अक्सर पूछा जाता है, इसलिए इतिहास और वैदिक साहित्य के अध्ययन में इसका विशेष महत्व है।
प्रश्न 9. ऋग्वेद के ‘नासदीय सूक्त’ में किसकी जानकारी मिलती है?
✅ उत्तर: (A) सृष्टि की उत्पत्ति और निर्गुण ब्रह्म की
ऋग्वेद के दशम् मण्डल में स्थित प्रसिद्ध ‘नासदीय सूक्त’ वैदिक साहित्य का एक अत्यंत महत्वपूर्ण दार्शनिक सूक्त है। इस सूक्त में सृष्टि की उत्पत्ति के रहस्य पर गहन विचार किया गया है। इसमें यह बताया गया है कि सृष्टि की उत्पत्ति से पहले न सत् था और न असत्, न आकाश था और न पृथ्वी, न प्रकाश था और न अंधकार। इस प्रकार यह सूक्त ब्रह्मांड की उत्पत्ति से जुड़े गूढ़ प्रश्नों को उठाता है और ‘निर्गुण ब्रह्म’ की अवधारणा की ओर संकेत करता है। नासदीय सूक्त में सृष्टि की उत्पत्ति को लेकर जिज्ञासा और दार्शनिक चिंतन स्पष्ट दिखाई देता है। इसी कारण इतिहासकार और विद्वान इसे विश्व के प्राचीनतम दार्शनिक चिंतनों में से एक मानते हैं। यह सूक्त वैदिक काल की दार्शनिक गहराई और बौद्धिक जिज्ञासा का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है।
प्रश्न 10. बृहदारण्यक उपनिषद् में किन दो विद्वानों के बीच दार्शनिक वाद-विवाद का उल्लेख मिलता है?
✅ उत्तर: (B) गार्गी और याज्ञवल्क्य
बृहदारण्यक उपनिषद् प्राचीन वैदिक साहित्य का एक अत्यंत महत्वपूर्ण दार्शनिक ग्रंथ है। इसमें विदेह के राजा जनक के दरबार में आयोजित एक प्रसिद्ध दार्शनिक सभा का उल्लेख मिलता है। इस सभा में अनेक विद्वानों के बीच ज्ञान चर्चा हुई, जिसमें विशेष रूप से विदुषी गार्गी और महान ऋषि याज्ञवल्क्य के बीच हुआ दार्शनिक वाद-विवाद उल्लेखनीय है। गार्गी ने याज्ञवल्क्य से आत्मा और ब्रह्म से संबंधित गहरे और जटिल प्रश्न पूछे, जो उस समय के उच्च स्तर के दार्शनिक चिंतन को दर्शाते हैं। इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि वैदिक काल में स्त्रियों को शिक्षा प्राप्त करने और दार्शनिक चर्चाओं में भाग लेने की स्वतंत्रता प्राप्त थी। इसलिए गार्गी को वैदिक काल की प्रमुख विदुषी महिलाओं में गिना जाता है और यह प्रसंग उस युग की बौद्धिक परंपरा और स्त्री शिक्षा का महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाता है।
प्रश्न 11. वेदांग साहित्य के कितने अंग हैं?
✅ उत्तर: (C) छह
वेदांग साहित्य वैदिक परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण सहायक ग्रंथों का समूह है। वेदांग शब्द का अर्थ है ‘वेद का अंग’, अर्थात ऐसे शास्त्र जो वेदों को सही ढंग से समझने, पढ़ने और उनके प्रयोग में सहायता करते हैं। वेदांगों की कुल छह शाखाएँ मानी जाती हैं — शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष। इनमें शिक्षा उच्चारण और ध्वनि विज्ञान से संबंधित है, कल्प यज्ञ और अनुष्ठानों की विधियों से, व्याकरण भाषा के नियमों से, निरुक्त शब्दों के अर्थ और व्युत्पत्ति से, छंद वैदिक मंत्रों की छंद संरचना से तथा ज्योतिष यज्ञों के लिए उचित समय निर्धारण से संबंधित है। हालांकि वेदांग वेदों से जुड़े हुए हैं, फिर भी उन्हें मुख्य वैदिक साहित्य का भाग नहीं माना जाता। इन्हें प्रतीकात्मक रूप से ‘वेद के शरीर के अंग’ कहा जाता है क्योंकि ये वेदों के अध्ययन और संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
प्रश्न 12. वेदांग में ‘वेद का नाक’ किसे कहा गया है?
✅ उत्तर: (A) शिक्षा
वेदांग वैदिक साहित्य को समझने के लिए बनाए गए सहायक शास्त्र हैं, जिनमें ‘शिक्षा’ का विशेष महत्व है। वेदांगों में शिक्षा को प्रतीकात्मक रूप से ‘वेद का नाक’ कहा गया है। शिक्षा का संबंध मुख्य रूप से मंत्रों के सही उच्चारण और ध्वनि विज्ञान (Phonetics) से होता है। इसमें वर्णों की ध्वनि, स्वर, मात्रा, बल और उच्चारण के नियमों का विस्तार से अध्ययन किया जाता है। जैसे नाक श्वास और गंध से जुड़ी होती है, उसी प्रकार शिक्षा ध्वनि और उच्चारण से संबंधित है। वैदिक काल में मंत्रों का शुद्ध और सटीक उच्चारण अत्यंत आवश्यक माना जाता था, क्योंकि उच्चारण में छोटी-सी गलती भी यज्ञ या अनुष्ठान को विफल कर सकती थी। इसलिए शिक्षा वेदों के अध्ययन और संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती थी और इसे वेद के प्रमुख अंगों में शामिल किया गया है।
प्रश्न 13. वेदांग में ‘वेद का हाथ’ किसे कहा गया है?
✅ उत्तर: (B) कल्प
वेदांग वैदिक साहित्य को समझने और उसके सही प्रयोग के लिए बनाए गए सहायक शास्त्र हैं। इनमें ‘कल्प’ का महत्वपूर्ण स्थान है और इसे प्रतीकात्मक रूप से ‘वेद का हाथ’ कहा जाता है। कल्प का संबंध मुख्य रूप से वैदिक कर्मकांडों और अनुष्ठानों की विधियों से है। जैसे हाथ से कार्य किया जाता है, उसी प्रकार कल्प वेदों के व्यावहारिक और क्रियात्मक पक्ष से जुड़ा हुआ है। कल्प शास्त्र को सामान्यतः तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया जाता है — श्रौत सूत्र, गृह्य सूत्र और धर्म सूत्र। श्रौत सूत्रों में बड़े वैदिक यज्ञों की विधियाँ बताई गई हैं, गृह्य सूत्रों में विवाह, उपनयन और अन्य संस्कारों की विधियाँ वर्णित हैं, जबकि धर्म सूत्रों में सामाजिक नियमों और आचारों का उल्लेख मिलता है। इस प्रकार कल्प वेदों के अनुष्ठानों और संस्कारों को व्यवस्थित रूप से संपन्न करने का मार्गदर्शन प्रदान करता है।
प्रश्न 14. वेदांग में ‘वेद का मुख’ किसे कहा गया है?
✅ उत्तर: (C) व्याकरण
वेदांग वैदिक साहित्य को समझने और उसके सही अध्ययन के लिए बनाए गए सहायक शास्त्र हैं। इनमें ‘व्याकरण’ का विशेष महत्व है और इसे प्रतीकात्मक रूप से ‘वेद का मुख’ कहा जाता है। व्याकरण भाषा के शुद्ध और सही प्रयोग का विज्ञान है, जो शब्दों के निर्माण, वाक्य संरचना और भाषा के नियमों को व्यवस्थित करता है। जैसे मुख से भाषा और वाणी का उच्चारण होता है, उसी प्रकार व्याकरण भाषा को सही और व्यवस्थित रूप प्रदान करता है, इसलिए इसे वेद का मुख कहा गया है। संस्कृत व्याकरण के क्षेत्र में महर्षि पाणिनि द्वारा रचित ‘अष्टाध्यायी’ को सबसे महत्वपूर्ण और श्रेष्ठ ग्रंथ माना जाता है। यह ग्रंथ भाषा के नियमों को अत्यंत वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत करता है। व्याकरण वेदांग का संबंध भाषाविज्ञान (Linguistics) से है और यह वेदों के अध्ययन में भाषा की शुद्धता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
प्रश्न 15. वेदांग में ‘वेद का कान’ किसे कहा गया है?
✅ उत्तर: (C) निरुक्त
वेदांग वैदिक साहित्य को समझने के लिए बनाए गए सहायक शास्त्र हैं, जिनमें ‘निरुक्त’ का विशेष स्थान है। वेदांगों में निरुक्त को प्रतीकात्मक रूप से ‘वेद का कान’ कहा गया है। निरुक्त का मुख्य कार्य वैदिक मंत्रों में प्रयुक्त शब्दों की व्युत्पत्ति (Etymology) और उनके अर्थ का अध्ययन करना है। वैदिक भाषा प्राचीन और जटिल होने के कारण अनेक शब्दों के अर्थ समझना कठिन होता था, इसलिए निरुक्त शास्त्र इन शब्दों की उत्पत्ति और वास्तविक अर्थ को स्पष्ट करता है। इस शाखा का सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ यास्काचार्य द्वारा रचित ‘निरुक्त’ है। जैसे कान किसी ध्वनि को सुनकर उसका अर्थ समझने में सहायता करता है, उसी प्रकार निरुक्त वैदिक शब्दों के अर्थ और उनके मूल को समझाने में मदद करता है। इस कारण निरुक्त वेदों के सही अर्थ को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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प्रश्न 16. वेदांग में ‘वेद का पैर’ किसे कहा गया है?
✅ उत्तर: (D) छंद
वेदांग वैदिक साहित्य के अध्ययन को व्यवस्थित करने वाले सहायक शास्त्र हैं, जिनमें ‘छंद’ का महत्वपूर्ण स्थान है। वेदांगों में छंद को प्रतीकात्मक रूप से ‘वेद का पैर’ कहा गया है। छंद का संबंध काव्य की लय, मात्रा, गण, यति और छंद संरचना से होता है। जैसे पैर चलने में सहायक होते हैं, उसी प्रकार छंद वेद मंत्रों को लय, गति और संतुलन प्रदान करता है। वैदिक मंत्र विशेष छंदों में रचे गए थे, जिससे उनका उच्चारण सुगम और प्रभावशाली बन सके। वैदिक साहित्य में गायत्री, अनुष्टुप और त्रिष्टुप जैसे प्रमुख छंदों का उल्लेख मिलता है। छंद शास्त्र का सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ पिंगलाचार्य द्वारा रचित ‘छंदसूत्र’ माना जाता है। इस प्रकार छंद वेदों के मंत्रों को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करने और उनकी लयात्मकता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
प्रश्न 17. वेदांग में ‘वेद की आँख’ किसे कहा गया है?
✅ उत्तर: (D) ज्योतिष
वेदांग वैदिक साहित्य को समझने और उसके सही प्रयोग के लिए बनाए गए सहायक शास्त्र हैं। इनमें ‘ज्योतिष’ का विशेष महत्व है और इसे प्रतीकात्मक रूप से ‘वेद की आँख’ कहा गया है। ज्योतिष का संबंध नक्षत्रों, ग्रहों, काल-गणना और खगोलीय घटनाओं के अध्ययन से है। वैदिक काल में यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों को संपन्न करने के लिए सही समय, तिथि और मुहूर्त का निर्धारण अत्यंत आवश्यक माना जाता था, और यह कार्य ज्योतिष के माध्यम से किया जाता था। जैसे आँख मार्ग को देखकर दिशा प्रदान करती है, उसी प्रकार ज्योतिष वैदिक कर्मकांडों को करने के लिए उचित समय और दिशा निर्धारित करने में सहायता करता है। इस प्रकार ज्योतिष वेदांग वैदिक अनुष्ठानों को सही समय पर संपन्न करने और काल-निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
प्रश्न 18. कल्प (वेदांग) के कितने भाग हैं?
✅ उत्तर: (B) तीन
कल्प वेदांग वैदिक साहित्य का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो मुख्य रूप से वैदिक कर्मकांडों और अनुष्ठानों की विधियों से संबंधित है। कल्प वेदांग को सामान्यतः तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया जाता है — श्रौत सूत्र, गृह्य सूत्र और धर्म सूत्र। श्रौत सूत्र में बड़े और सार्वजनिक वैदिक यज्ञों की विधियाँ और नियमों का वर्णन मिलता है। गृह्य सूत्र में गृहस्थ जीवन से जुड़े संस्कारों जैसे विवाह, उपनयन, नामकरण और अन्य पारिवारिक संस्कारों की विधियों का उल्लेख किया गया है। वहीं धर्म सूत्र में सामाजिक और धार्मिक नियमों, आचार-व्यवहार और कर्तव्यों का वर्णन मिलता है। आगे चलकर यही धर्म सूत्र विकसित होकर ‘स्मृति साहित्य’ का आधार बने। यह विषय इतिहास और संस्कृति से संबंधित प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे UPSC में अक्सर पूछा जाने वाला महत्वपूर्ण तथ्य है।
प्रश्न 19. ज्यामिति (रेखागणित) के प्राचीनतम साक्ष्य किस ग्रंथ में मिलते हैं?
✅ उत्तर: (C) शुल्व सूत्र में
ज्यामिति (Geometry) के प्राचीनतम साक्ष्य भारतीय वैदिक साहित्य के ‘शुल्व सूत्र’ में मिलते हैं। शुल्व सूत्र, कल्प वेदांग के अंतर्गत आने वाले श्रौत सूत्र का एक महत्वपूर्ण भाग है। इसमें मुख्य रूप से यज्ञ वेदियों (altar) के निर्माण के लिए आवश्यक ज्यामितीय गणनाओं और माप विधियों का वर्णन किया गया है। ‘शुल्व’ शब्द का अर्थ रस्सी होता है, जिसका उपयोग प्राचीन काल में नाप-जोख और माप निर्धारित करने के लिए किया जाता था। शुल्व सूत्रों में विभिन्न आकृतियों के निर्माण और क्षेत्रफल के निर्धारण से संबंधित अनेक गणितीय नियम बताए गए हैं। विशेष रूप से इसमें पाइथागोरस प्रमेय के समान सिद्धांत का उल्लेख मिलता है, जो यूनानी गणितज्ञ पाइथागोरस से भी पहले का माना जाता है। इस प्रकार शुल्व सूत्र प्राचीन भारत में गणित और ज्यामिति के उन्नत ज्ञान का महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करता है।
प्रश्न 20. बोगाजकोई अभिलेख कहाँ से प्राप्त हुआ?
✅ उत्तर: (C) एशिया माइनर (आधुनिक तुर्की)
बोगाजकोई अभिलेख एशिया माइनर के बोगाजकोई (आधुनिक तुर्की) नामक स्थान से प्राप्त एक महत्वपूर्ण प्राचीन अभिलेख है। यह अभिलेख मितानी (Mitanni) सभ्यता से संबंधित माना जाता है और इसका समय लगभग 1400 ईसा पूर्व माना जाता है। इस अभिलेख का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि इसमें वैदिक देवताओं जैसे इन्द्र, मित्र, वरुण और नासत्य का उल्लेख मिलता है। इससे यह प्रमाणित होता है कि वैदिक देवताओं की पूजा केवल भारत में ही नहीं बल्कि भारत के बाहर भी की जाती थी। इसलिए इसे आर्यों से संबंधित सबसे प्राचीन लेखीय साक्ष्यों में से एक माना जाता है। यह अभिलेख प्राचीन आर्य संस्कृति के भौगोलिक विस्तार और उसके प्रभाव को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसी कारण यह विषय इतिहास और संस्कृति से संबंधित प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे UPSC की प्रारंभिक परीक्षा में अक्सर पूछा जाने वाला महत्वपूर्ण तथ्य है।
प्रश्न 21. बोगाजकोई अभिलेख में किन दो राजाओं के बीच संधि का उल्लेख है?
✅ उत्तर: (A) हित्ती राजा शुब्बि लिम्बा और मितन्त्री राजा मतिऊअजा
बोगाजकोई अभिलेख प्राचीन इतिहास का एक महत्वपूर्ण साक्ष्य है, जो एशिया माइनर (आधुनिक तुर्की) के बोगाजकोई स्थान से प्राप्त हुआ है। इस अभिलेख में हित्ती (Hittite) राजा शुब्बि लिम्बा और मितानी राजा मतिऊअजा के बीच हुई एक महत्वपूर्ण संधि का उल्लेख मिलता है। इस संधि को प्रमाणित करने के लिए वैदिक देवताओं — इंद्र, मित्र, वरुण और नासत्य (अश्विन) को साक्षी के रूप में लिया गया था। इस अभिलेख का समय लगभग 1400 ईसा पूर्व माना जाता है। इसका विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि इससे यह प्रमाणित होता है कि वैदिक संस्कृति और देवताओं की पूजा भारत के बाहर पश्चिम एशिया तक फैली हुई थी। इसलिए यह अभिलेख प्राचीन आर्य संस्कृति के भौगोलिक विस्तार और उसके प्रभाव का महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाता है।
प्रश्न 22. बोगाजकोई अभिलेख में किन वैदिक देवताओं का उल्लेख है?
✅ उत्तर: (B) इंद्र, मित्र, वरुण, नासत्य
बोगाजकोई अभिलेख प्राचीन इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रमाण है, जो एशिया माइनर (आधुनिक तुर्की) के बोगाजकोई नामक स्थान से प्राप्त हुआ है। इस अभिलेख में वैदिक देवताओं — इंद्र, मित्र, वरुण और नासत्य का उल्लेख मिलता है। इनमें नासत्य की पहचान सामान्यतः अश्विन कुमारों से की जाती है। वैदिक परंपरा में अश्विन कुमारों को चिकित्सा, स्वास्थ्य और सूर्योदय से जुड़े देवता माना जाता है तथा उन्हें देवताओं के वैद्य के रूप में भी वर्णित किया गया है। इस अभिलेख का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह भारत-यूरोपीय भाषाई और सांस्कृतिक संबंधों का महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करता है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि वैदिक देवताओं की प्रतिष्ठा और पूजा भारत से बाहर पश्चिम एशिया तक फैली हुई थी। यही कारण है कि यह तथ्य इतिहास से संबंधित प्रतियोगी परीक्षाओं, विशेषकर UPSC में बार-बार पूछा जाता है।
प्रश्न 23. आर्यों के मूल निवास स्थान के बारे में सर्वाधिक मान्य मत किसका है?
✅ उत्तर: (C) मैक्समूलर
आर्यों के मूल निवास स्थान के संबंध में अनेक विद्वानों ने विभिन्न मत प्रस्तुत किए हैं, जिनमें जर्मनी के प्रसिद्ध विद्वान मैक्समूलर का मत सबसे अधिक प्रसिद्ध और व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है। मैक्समूलर ने अपने अध्ययन के आधार पर यह माना कि आर्यों का मूल निवास स्थान ‘मध्य एशिया’ था। वे संस्कृत भाषा और वैदिक साहित्य के महान विद्वान थे और उन्होंने वेदों तथा प्राचीन भारतीय ग्रंथों का गहन अध्ययन किया। उनके द्वारा प्रस्तुत यह विचार ‘मध्य एशिया सिद्धांत’ के नाम से जाना जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार आर्य लोग मध्य एशिया से विभिन्न दिशाओं में फैलकर भारत सहित अन्य क्षेत्रों में पहुँचे। आर्यों की उत्पत्ति से संबंधित यह सिद्धांत इतिहास और संस्कृति के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है और प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे UPSC में भी अक्सर पूछा जाता है।
प्रश्न 24. बाल गंगाधर तिलक ने आर्यों का मूल निवास स्थान कहाँ बताया?
✅ उत्तर: (C) आर्कटिक क्षेत्र
आर्यों के मूल निवास स्थान के विषय में अनेक विद्वानों ने अलग-अलग मत प्रस्तुत किए हैं। इनमें बाल गंगाधर तिलक का मत विशेष रूप से प्रसिद्ध है। तिलक ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘The Arctic Home in the Vedas’ (1903) में यह प्रतिपादित किया कि आर्यों का मूल निवास स्थान ‘आर्कटिक क्षेत्र’ था। उन्होंने अपने इस सिद्धांत के समर्थन में वेदों में वर्णित लंबी रातों, लंबे दिनों और ध्रुवीय प्राकृतिक घटनाओं का उल्लेख किया। तिलक के अनुसार ऐसे वर्णन केवल ध्रुवीय क्षेत्रों में ही संभव हैं, इसलिए उन्होंने आर्यों की प्रारंभिक उत्पत्ति आर्कटिक क्षेत्र में मानी। हालांकि आधुनिक इतिहासकारों और विद्वानों के बीच यह मत सर्वमान्य नहीं है और इस पर कई प्रकार की बहस होती रही है। फिर भी आर्यों के मूल निवास स्थान से संबंधित यह सिद्धांत इतिहास के अध्ययन में महत्वपूर्ण माना जाता है और प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे UPSC में इस विषय से जुड़े विभिन्न मतों पर प्रश्न पूछे जाते हैं।
प्रश्न 25. स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्यों का मूल निवास स्थान कहाँ बताया?
✅ उत्तर: (C) तिब्बत
आर्यों के मूल निवास स्थान के विषय में विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग मत प्रस्तुत किए हैं। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने विचारों में आर्यों का मूल निवास स्थान ‘तिब्बत’ बताया। उनके अनुसार आर्य लोग तिब्बत क्षेत्र से भारत की ओर आए और यहाँ आकर उन्होंने वैदिक संस्कृति का विकास किया। स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में यह विचार व्यक्त किया कि वेद ही सत्य ज्ञान का एकमात्र और सर्वोच्च स्रोत हैं। वे भारतीय समाज को वेदों की ओर वापस लौटने का संदेश देते थे, इसलिए उनके विचारों को ‘वेदों की ओर लौटो’ के सिद्धांत से भी जोड़ा जाता है। हालांकि आर्यों के मूल निवास स्थान के संबंध में उनका यह मत आधुनिक इतिहासकारों और शैक्षणिक जगत में व्यापक रूप से स्वीकार नहीं किया जाता, फिर भी यह विचार भारतीय इतिहास के अध्ययन में उल्लेखनीय माना जाता है।
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Very important questions sir
Thanku sir 🙏