वैदिक काल MCQs 2026: ऋग्वैदिक देवता, धर्म और उत्तर वैदिक प्रशासन के 25+ महत्वपूर्ण प्रश्न

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वैदिक काल MCQs 2026: ऋग्वैदिक देवता, धर्म और उत्तर वैदिक प्रशासन के 25+ महत्वपूर्ण प्रश्न

वैदिक काल के ये 25 महत्वपूर्ण MCQ ऋग्वैदिक देवता, ऋग्वैदिक धर्म, जनपद और उत्तर वैदिक प्रशासन से संबंधित हैं। ये प्रश्न UPSC, SSC, UPPSC, BPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।

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प्रश्न 1. उत्तर वैदिक काल में ‘संग्रहीतृ’ का क्या कार्य था?

(A) भू-राजस्व वसूल करना
(B) कोषाध्यक्ष (खजाने का अधिकारी)
(C) जुए में राजा को सहयोग करना
(D) राजा का विदूषक

उत्तर: (B) कोषाध्यक्ष (खजाने का अधिकारी)

उत्तर वैदिक काल में ‘संग्रहीतृ’ एक महत्वपूर्ण अधिकारी था, जिसे हम कोषाध्यक्ष (खजाने का अधिकारी) कह सकते हैं। संग्रहीतृ का मुख्य काम था राज्य के कोष का संचालन और संग्रह करना। वह राजा के प्रमुख प्रशासकीय अधिकारियों, जिन्हें ‘रत्नियों’ कहा जाता था, में शामिल था। उत्तर वैदिक काल में प्रशासन में ऐसे विशेषज्ञ अधिकारी होने का मतलब यह था कि राज्य की सत्ता और व्यवस्था बहुत संगठित होने लगी थी। यह दिखाता है कि राज्य प्रशासन का विकास इस समय हो रहा था। संग्रहीतृ की जिम्मेदारी से यह भी पता चलता है कि राज्य की आर्थिक शक्ति मजबूत थी और कर संग्रहण व्यवस्थित तरीके से होता था। यह तथ्य UPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछा जाता है।
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प्रश्न 2. उत्तर वैदिक काल में ‘भागदूध’ का क्या कार्य था?

(A) कोषाध्यक्ष
(B) भू-राजस्व वसूल करने वाला अधिकारी
(C) जुए में राजा का सहायक
(D) सेनापति

उत्तर: (B) भू-राजस्व वसूल करने वाला अधिकारी

उत्तर वैदिक काल में ‘भागदूध’ एक महत्वपूर्ण अधिकारी था, जो भू-राजस्व वसूल करने का काम करता था। यह अधिकारी ‘रत्नियों’ में शामिल था, जो राजा के प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी होते थे। ‘भाग’ का अर्थ है कर या हिस्सा, और ‘दूध’ वसूल करने वाले से जुड़ा हुआ है। भागदूध का मुख्य कार्य था किसानों से राज्य का भाग (कर) वसूल करना। उत्तर वैदिक काल में जैसे-जैसे कृषि का विकास हुआ, वैसे-वैसे भू-राजस्व प्रणाली भी संगठित हुई। इस व्यवस्था से यह स्पष्ट होता है कि राज्य प्रशासन ने कर संग्रह और आर्थिक नियंत्रण के लिए विशेषज्ञ अधिकारियों का निर्माण किया। भागदूध की भूमिका से यह भी पता चलता है कि राज्य की आर्थिक शक्ति मजबूत थी और कर प्रणाली व्यवस्थित रूप से चल रही थी।
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प्रश्न 3. उत्तर वैदिक काल में ‘अक्षवाप’ का क्या कार्य था?

(A) कोषाध्यक्ष
(B) भू-राजस्व वसूल करना
(C) जुआ खेलने में राजा को सहयोग करना
(D) सेना का नेतृत्व करना

उत्तर: (C) जुआ खेलने में राजा को सहयोग करना

उत्तर वैदिक काल में ‘अक्षवाप’ एक विशेष अधिकारी था, जो जुआ खेलने में राजा की सहायता करता था। यह अधिकारी ‘रत्नियों’ में शामिल था, यानी राजा के प्रमुख प्रशासनिक अधिकारियों में से एक। ऋग्वैदिक साहित्य में जुए का उल्लेख मिलता है, और ‘अक्ष’ शब्द का अर्थ है पासा या जुआ। राजसूय यज्ञ के दौरान जुआ खेलने की विधि होती थी, जिसमें अक्षवाप की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण होती थी। यह दिखाता है कि उत्तर वैदिक समाज में सामाजिक जीवन और धार्मिक अनुष्ठान के दौरान खेलों और मनोरंजन का भी स्थान था। अक्षवाप की भूमिका से पता चलता है कि प्रशासन और यज्ञ समारोहों में हर प्रकार के विशेषज्ञ अधिकारी नियुक्त किए जाते थे। इस प्रकार, अक्षवाप समाज की सांस्कृतिक और धार्मिक व्यवस्था का हिस्सा था।

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प्रश्न 4. उत्तर वैदिक काल में ‘पालागल’ का क्या कार्य था?

(A) कोषाध्यक्ष
(B) भू-राजस्व वसूल करना
(C) जुए में सहायक
(D) विदूषक

उत्तर: (D) विदूषक

उत्तर वैदिक काल में ‘पालागल’ राजा का ‘विदूषक’ (Court Jester) होता था। यह अधिकारी ‘रत्नियों’ में शामिल था, यानी राजा के प्रमुख प्रशासनिक अधिकारियों में से एक। विदूषक का मुख्य काम था राजा का मनोरंजन करना और दरबार में हास्य और हल्का माहौल बनाना। विदूषक की भूमिका केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं थी; वह दरबार की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में भी महत्वपूर्ण योगदान देता था। भारतीय परंपरा में विदूषक की भूमिका बाद में संस्कृत नाटकों और अन्य साहित्य में भी महत्वपूर्ण रही। इस प्रकार, पालागल की उपस्थिति से उत्तर वैदिक कालीन दरबारी जीवन और संस्कृति की झाँकी मिलती है, जिससे उस समय के सामाजिक और प्रशासनिक ढांचे का पता चलता है।

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प्रश्न 5. ऋग्वैदिक धर्म की मुख्य विशेषता क्या थी?

(A) मूर्ति पूजा
(B) ईश्वर की प्रकृतिवादी अवधारणा में विश्वास (प्रकृति पूजा)
(C) एकेश्वरवाद
(D) बहुदेवतावाद और यज्ञ की अनिवार्यता

उत्तर: (B) ईश्वर की प्रकृतिवादी अवधारणा में विश्वास (प्रकृति पूजा)

ऋग्वैदिक धर्म की सबसे बड़ी विशेषता थी ईश्वर की ‘प्रकृतिवादी अवधारणा’। इसका मतलब है कि ऋग्वैदिक आर्य प्रकृति की शक्तियों—जैसे इंद्र, अग्नि, सूर्य, वायु, वरुण—को देवता मानकर पूजते थे। इसे प्रकृति पूजा (Nature Worship) कहा जाता है और यह अपने समय का एक उन्नत रूप था। ऋग्वैदिक आर्य मूर्ति पूजा नहीं करते थे। वे देवताओं को मंत्रों और यज्ञ के माध्यम से प्रसन्न करते थे। इस पूजा प्रणाली से पता चलता है कि ऋग्वैदिक समाज में धार्मिक और प्राकृतिक संतुलन को महत्व दिया जाता था। यह बुनियादी अवधारणा UPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछी जाती है।

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प्रश्न 6. ऋग्वैदिक देवताओं को कितने भागों में बाँटा गया था?

(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच

उत्तर: (B) तीन

ऋग्वैदिक काल में देवताओं को तीन मुख्य भागों में बाँटा गया था: पृथ्वीस्थानीय देवता, अंतरिक्षस्थानीय देवता और द्यौ या आकाशस्थानीय देवता। यह विभाजन ऋग्वैदिक आर्यों की ब्रह्मांड संबंधी सोच को दर्शाता है। पृथ्वी, अंतरिक्ष और आकाश—ये तीनों लोक उनके धार्मिक और प्राकृतिक दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण माने जाते थे। पृथ्वीस्थानीय देवता भूमि और यज्ञ से जुड़े थे, अंतरिक्षस्थानीय देवता मौसम और वायु से संबंधित थे, और आकाशस्थानीय देवता सूर्य, सविता, वरुण जैसे आकाशीय शक्तियों से जुड़े थे। यह त्रिविध वर्गीकरण यह दिखाता है कि ऋग्वैदिक समाज में देवताओं की पूजा व्यवस्था संगठित और विस्तृत थी। यह तथ्य UPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछा जाता है।

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प्रश्न 7. ऋग्वैदिक काल में पृथ्वीस्थानीय देवताओं में कौन-कौन से देवता आते थे?

(A) इंद्र, वायु, मरुत, पर्जन्य
(B) सूर्य, सविता, मित्र, उषा
(C) अग्नि, सोम, पृथ्वी, बृहस्पति
(D) विष्णु, वरुण, मित्रा, उषा

उत्तर: (C) अग्नि, सोम, पृथ्वी, बृहस्पति

ऋग्वैदिक काल में पृथ्वीस्थानीय देवताओं में अग्नि, सोम, पृथ्वी और बृहस्पति शामिल थे। ये देवता पृथ्वी पर दिखने वाली प्राकृतिक शक्तियों से संबंधित थे। अग्नि सबसे महत्वपूर्ण पृथ्वीस्थानीय देवता माने जाते थे और उन्हें देवताओं और मनुष्यों के बीच दूत माना जाता था। बृहस्पति को देवताओं का गुरु और ज्ञान का देवता माना जाता था। सोम का संबंध वनस्पति और चंद्रमा दोनों से था। यह दर्शाता है कि ऋग्वैदिक समाज में देवताओं का चयन प्रकृति और जीवन से जुड़े तत्वों के आधार पर किया जाता था। इस व्यवस्था से समाज में धार्मिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने की दृष्टि दिखाई देती है।

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प्रश्न 8. ऋग्वैदिक काल में अंतरिक्ष स्थानीय देवताओं में कौन-कौन से देवता आते थे?

(A) अग्नि, सोम, पृथ्वी, बृहस्पति
(B) इंद्र, वायु, मरुत, पर्जन्य
(C) सूर्य, सविता, मित्र, उषा
(D) विष्णु, वरुण, मित्रा, उषा

उत्तर: (B) इंद्र, वायु, मरुत, पर्जन्य

ऋग्वैदिक काल में अंतरिक्षस्थानीय देवताओं में इंद्र, वायु, मरुत और पर्जन्य शामिल थे। इनमें से इंद्र सबसे प्रमुख देवता थे, जिनकी स्तुति में लगभग 250 सूक्त शामिल हैं, जो किसी अन्य देवता से अधिक हैं। इंद्र को वर्षा, युद्ध और शक्ति का देवता माना जाता था और उन्हें वृत्रहन् (वृत्र को मारने वाला) भी कहा जाता था। वायु वायु का देवता था, मरुत तूफान और आंधी का देवता, और पर्जन्य बादल और वर्षा का देवता थे। यह दर्शाता है कि ऋग्वैदिक समाज में प्राकृतिक घटनाओं और मौसम को देवताओं से जोड़ा गया था और उन्हें पूजा का माध्यम माना जाता था। इस व्यवस्था से ऋग्वैदिक समाज में प्रकृति और धार्मिक संतुलन की दृष्टि स्पष्ट होती है।

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प्रश्न 9. ऋग्वैदिक काल में द्यौ या आकाश स्थानीय देवताओं में कौन-कौन से देवता आते थे?

(A) अग्नि, सोम, पृथ्वी, बृहस्पति
(B) इंद्र, वायु, मरुत, पर्जन्य
(C) सूर्य, सविता, मित्र, उषा, विष्णु, वरुण, मित्रा
(D) इंद्र, वरुण, अग्नि, सोम

उत्तर: (C) सूर्य, सविता, मित्र, उषा, विष्णु, वरुण, मित्रा

ऋग्वैदिक काल में आकाशस्थानीय देवताओं में सूर्य, सविता, मित्र, उषा, विष्णु, वरुण और मित्रा शामिल थे। ये देवता आकाश और आकाशीय प्राकृतिक शक्तियों से जुड़े थे। वरुण नैतिकता और जल के देवता थे, जबकि उषा भोर (प्रभात) की देवी थीं। विष्णु उस समय एक सामान्य आकाशस्थानीय देवता थे, लेकिन बाद में उन्हें त्रिदेव में प्रमुख स्थान मिला। सूर्य और सविता दोनों सूर्य के अलग-अलग रूप हैं—सूर्य प्रकाश देने वाले हैं, और सविता प्रेरणा और सृजन का प्रतीक हैं। यह दर्शाता है कि ऋग्वैदिक समाज में धार्मिक विश्वास और प्राकृतिक घटनाओं को देवताओं के रूप में व्यवस्थित किया गया था। इस व्यवस्था से आकाशीय देवताओं और धार्मिक जीवन की महत्वपूर्ण झाँकी मिलती है।

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प्रश्न 10. ऋग्वैदिक काल में सर्वाधिक महत्वपूर्ण देवता कौन थे?

(A) वरुण
(B) अग्नि
(C) इंद्र
(D) सूर्य

उत्तर: (C) इंद्र

ऋग्वैदिक काल में इंद्र सबसे महत्वपूर्ण देवता थे। ऋग्वेद में उनकी स्तुति लगभग 250 सूक्तों में की गई है, जो किसी अन्य देवता से अधिक है। इंद्र को वर्षा, वज्र और युद्ध का देवता माना जाता था। उन्हें ‘वृत्रहन्’ भी कहा जाता था, जिसका अर्थ है वृत्र (जल रोकने वाले राक्षस) को मारने वाला। कथा के अनुसार, वृत्र ने जल को रोक रखा था, और इंद्र ने उसे मारकर वर्षा कराई। इस कारण इंद्र को आर्यों का योद्धा देवता माना जाता था। उनकी भूमिका केवल युद्ध तक सीमित नहीं थी, बल्कि प्रकृति और जीवन के संतुलन में भी महत्वपूर्ण मानी जाती थी। इस प्रकार, इंद्र ऋग्वैदिक समाज और धार्मिक जीवन के केंद्र में थे।

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प्रश्न 11. ऋग्वैदिक काल में अग्नि देवता का क्या महत्व था?

(A) वे युद्ध के देवता थे
(B) वे देवताओं और मनुष्यों के बीच दूत माने जाते थे
(C) वे वर्षा के देवता थे
(D) वे मृत्यु के देवता थे

उत्तर: (B) वे देवताओं और मनुष्यों के बीच दूत माने जाते थे

ऋग्वैदिक काल में अग्नि देवता को देवताओं और मनुष्यों के बीच दूत (Messenger) माना जाता था। यज्ञ में जब अग्नि को आहुति दी जाती थी, तो वह उसे सीधे देवताओं तक पहुँचाती थी। इस कारण अग्नि को पृथ्वीस्थानीय देवता माना जाता था और यज्ञ का मुख्य केंद्र भी था। ऋग्वेद का पहला मंत्र “अग्निमीले पुरोहितम्” अग्नि की स्तुति से शुरू होता है। इंद्र के बाद ऋग्वेद में अग्नि की स्तुति सबसे अधिक है। यह दिखाता है कि अग्नि देवता ऋग्वैदिक समाज में धार्मिक अनुष्ठानों और जीवन के संतुलन में कितना महत्वपूर्ण था।

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प्रश्न 12. ऋग्वैदिक काल में ‘वरुण’ देवता किसके देवता माने जाते थे?

(A) युद्ध और वज्र के देवता
(B) नैतिकता, जल और ऋत (सत्य व्यवस्था) के देवता
(C) सूर्य और प्रकाश के देवता
(D) मृत्यु और पाताल के देवता

उत्तर: (B) नैतिकता, जल और ऋत (सत्य व्यवस्था) के देवता

ऋग्वैदिक काल में वरुण को नैतिकता, जल और ‘ऋत’ (सत्य व्यवस्था/Cosmic Order) का देवता माना जाता था। ‘ऋत’ का मतलब है ब्रह्मांड की नैतिक और प्राकृतिक व्यवस्था। वरुण पापों का लेखा रखते थे और पापियों को पाश से बाँधते थे। ऋग्वेद में वरुण से पाप-क्षमा मांगने के कई सूक्त हैं। आकाश देवताओं में उनका स्थान सर्वोच्च माना जाता था। यह दिखाता है कि ऋग्वैदिक समाज में धार्मिक और नैतिक नियमों का बहुत महत्व था और वरुण को प्राकृतिक और सामाजिक न्याय का प्रतीक माना जाता था।

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प्रश्न 13. ऋग्वैदिक काल में ‘उषा’ किस की देवी थीं?

(A) रात्रि की
(B) भोर (प्रभात) की
(C) वर्षा की
(D) नदियों की

उत्तर: (B) भोर (प्रभात) की

ऋग्वैदिक काल में उषा भोर (प्रभात/Dawn) की देवी थीं और वे आकाशस्थानीय देवताओं में शामिल थीं। ऋग्वेद में उनकी स्तुति में कई सुंदर और काव्यात्मक सूक्त मिलते हैं। उषा को अंधकार को हटाने वाली और प्रकाश लाने वाली कहा जाता था। यह दर्शाता है कि ऋग्वैदिक समाज में प्राकृतिक घटनाओं और उनके महत्व को देवताओं से जोड़ा गया था। उषा एक महिला देवता थीं, जो उस समय महिलाओं के सामाजिक और धार्मिक महत्व का प्रतीक थीं। उनके स्तुति मंत्र ऋग्वेद की सबसे सुंदर काव्यात्मक रचनाएँ माने जाते हैं और धार्मिक जीवन में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी।

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प्रश्न 14. ऋग्वैदिक काल में ‘मरुत’ कौन से देवता थे?

(A) सूर्य के सहायक देवता
(B) तूफान और आँधी के देवता
(C) जल के देवता
(D) कृषि के देवता

उत्तर: (B) तूफान और आँधी के देवता

ऋग्वैदिक काल में मरुत देवता तूफान और आँधी के देवता थे और वे अंतरिक्षस्थानीय देवताओं में शामिल थे। इन्हें इंद्र के साथी और सहायक देवता माना जाता था। ‘मरुत’ शब्द से ही आधुनिक हिंदी में मारुत और पवन शब्द जुड़े हैं। वायु और मरुत दोनों वायु से संबंधित देवता हैं। मरुत केवल एक देवता नहीं, बल्कि एक देवताओं का समूह माना जाता था, जिनकी संख्या 7 या 21 बताई जाती है। ऋग्वैदिक समाज में मरुत की पूजा और उनका उल्लेख प्राकृतिक घटनाओं और युद्ध में सहायता से जुड़ा हुआ था, जिससे उनकी महत्ता स्पष्ट होती है।

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प्रश्न 15. ऋग्वेद में ‘पर्जन्य’ कौन से देवता थे?

(A) सूर्य के देवता
(B) अग्नि के देवता
(C) बादल और वर्षा के देवता
(D) पृथ्वी के देवता

उत्तर: (C) बादल और वर्षा के देवता

ऋग्वैदिक काल में पर्जन्य देवता बादल और वर्षा के देवता माने जाते थे। वे अंतरिक्षस्थानीय देवताओं में शामिल थे। पर्जन्य और इंद्र अलग देवता थे — जहाँ इंद्र वज्र और युद्ध के देवता थे, वहीं पर्जन्य विशेष रूप से वर्षा लाने वाले बादलों के देवता थे। कृषि-प्रधान वैदिक समाज में वर्षा की महत्ता अत्यधिक थी, इसलिए पर्जन्य देवता का महत्वपूर्ण स्थान था। आधुनिक हिंदी में ‘पर्जन्य’ का अर्थ बादल होता है। ऋग्वैदिक यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों में पर्जन्य की स्तुति और प्रार्थना का विशेष महत्व था, जिससे समाज में कृषि और जल संरक्षण का ज्ञान भी दर्शाया जाता था।

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प्रश्न 16. ऋग्वैदिक काल में ‘सविता’ देवता किससे संबंधित थे?

(A) चंद्रमा से
(B) अग्नि से
(C) सूर्य (प्रेरणा और सृजन के रूप में) से
(D) वायु से

उत्तर: (C) सूर्य (प्रेरणा और सृजन के रूप में) से

ऋग्वैदिक काल में सविता सूर्य का एक विशेष रूप था जो प्रेरणा और सृजन का प्रतीक माना जाता था। सविता को आकाशस्थानीय देवताओं में रखा गया था। प्रसिद्ध गायत्री मंत्र विशेष रूप से सविता देव को ही समर्पित है। ‘सविता’ का अर्थ है — प्रेरणा देने वाला। सूर्य और सविता दोनों सूर्य के अलग-अलग रूप हैं — जहाँ सूर्य प्रकाश देने वाले हैं, वहीं सविता प्रेरणा और सृजन के रूप में पूजे जाते हैं। ऋग्वैदिक समाज में सविता की पूजा और स्तुति धार्मिक, सामाजिक और काव्यात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण थी और इसे मानव जीवन और प्रकृति के संतुलन का प्रतीक माना जाता था।
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प्रश्न 17. ऋग्वैदिक काल में ‘बृहस्पति’ कौन से देवता थे?

(A) युद्ध के देवता
(B) ज्ञान और देवगुरु
(C) वर्षा के देवता
(D) मृत्यु के देवता

उत्तर: (B) ज्ञान और देवगुरु

ऋग्वैदिक काल में बृहस्पति को ज्ञान का देवता और देवताओं का गुरु माना जाता था। वे पृथ्वीस्थानीय देवताओं में शामिल थे। ‘बृहस्पति’ का अर्थ है — बृहत् (विशाल) + पति (स्वामी), अर्थात् महान स्वामी। बृहस्पति को प्रार्थना और पवित्र वाणी के देवता भी माना जाता था। खगोलशास्त्र में बृहस्पति ग्रह का नाम इसी देवता के नाम पर रखा गया है, और ज्योतिष में गुरु ग्रह के रूप में प्रसिद्ध है। ऋग्वैदिक समाज में बृहस्पति का महत्व धार्मिक, ज्ञान और शिक्षा से जुड़ा था, और वे देवताओं तथा मानव जीवन में मार्गदर्शक की भूमिका निभाते थे।

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प्रश्न 18. ऋग्वैदिक काल में ‘सोम’ किस-किस रूप में पूजे जाते थे?

(A) केवल एक देवता के रूप में
(B) देवता और एक पवित्र पेय दोनों के रूप में
(C) केवल एक पेय के रूप में
(D) एक पर्वत के रूप में

उत्तर: (B) देवता और एक पवित्र पेय दोनों के रूप में

ऋग्वैदिक काल में सोम को केवल एक देवता ही नहीं, बल्कि पवित्र पेय के रूप में भी पूजा जाता था। सोम देवता पृथ्वीस्थानीय देवताओं में शामिल थे। यह पवित्र पेय हिमालय की मुजवंत चोटी से प्राप्त वनस्पति से बनाया जाता था। ऋग्वेद का पूरा नवम् मण्डल सोम देवता को समर्पित है। यज्ञों में सोम रस देवताओं को अर्पित किया जाता था। इसके अलावा, सोम देवता चंद्रमा से भी संबंधित माने जाते थे। इस प्रकार, सोम का महत्व धार्मिक, सामाजिक और प्राकृतिक दृष्टि से अत्यंत था और वैदिक जीवन में उनकी पूजा अनिवार्य मानी जाती थी।

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प्रश्न 19. ऋग्वैदिक काल में ‘विष्णु’ का क्या स्थान था?

(A) सर्वप्रमुख देवता
(B) एक सामान्य आकाश स्थानीय देवता
(C) पृथ्वी देवता
(D) इनका उल्लेख ऋग्वेद में नहीं है

उत्तर: (B) एक सामान्य आकाश स्थानीय देवता

ऋग्वैदिक काल में विष्णु एक सामान्य आकाशस्थानीय देवता थे और उनका महत्व इंद्र, वरुण या अग्नि जितना नहीं था। हालांकि, उत्तर वैदिक काल और पुराण काल में विष्णु का महत्व बढ़ा और वे त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) में से एक बन गए। ऋग्वेद में विष्णु की ‘तीन पगों’ या त्रिविक्रम की कथा भी मिलती है, जो उनके विश्व व्यापी और सृजनकारी स्वरूप को दर्शाती है। यह परिवर्तन भारतीय धर्म के विकासक्रम को स्पष्ट करता है, जिससे पता चलता है कि कैसे वैदिक देवताओं का महत्व समय के साथ बदलता गया और विष्णु का स्थान प्रमुख देवताओं में शामिल हो गया।

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प्रश्न 20. उत्तर वैदिक काल में ‘जनपद’ शब्द के उद्भव का क्या कारण था?

(A) पशुपालन का विकास
(B) स्थायी कृषि का विकास और भूमि से स्थायी लगाव
(C) व्यापार का विकास
(D) नगरों का निर्माण

उत्तर: (B) स्थायी कृषि का विकास और भूमि से स्थायी लगाव

उत्तर वैदिक काल में जनपद शब्द का उद्भव स्थायी कृषि के विकास और भूमि से स्थायी लगाव के कारण हुआ। ऋग्वैदिक काल में अधिकांश आर्य अर्ध-घुमंतू थे और मुख्य रूप से पशुपालन करते थे, इसलिए ‘जनपद’ जैसे भूमि-बोधक शब्द का प्रयोग नहीं होता था। उत्तर वैदिक काल में लोहे के हल के इस्तेमाल से कृषि का विस्तार हुआ और लोग एक स्थान पर स्थायी रूप से बसने लगे। इसी स्थायित्व ने जनपद की अवधारणा को जन्म दिया, जिससे स्थानीय प्रशासन, भूमि-व्यवस्था और सामाजिक संगठन अधिक विकसित हुए। जनपद शब्द से उस काल के कृषि, सामाजिक और प्रशासनिक विकास का स्पष्ट प्रमाण मिलता है।

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प्रश्न 21. उत्तर वैदिक काल में कुरु और पांचाल जनपद किस क्षेत्र में स्थित थे?

(A) पंजाब क्षेत्र में
(B) गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र में
(C) उत्तरी बिहार में
(D) राजस्थान में

उत्तर: (B) गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र में

उत्तर वैदिक काल में दो प्रमुख जनपदकुरु और पांचालगंगा-यमुना दोआब क्षेत्र में स्थित थे। कुरु जनपद आधुनिक हरियाणा और दिल्ली के आसपास था, जबकि पांचाल जनपद आधुनिक उत्तर प्रदेश के बरेली-बदायूँ क्षेत्र में था। यह क्षेत्र उत्तर वैदिक काल में वैदिक सभ्यता का मुख्य केंद्र माना जाता था। इस प्रकार, गंगा-यमुना दोआब उस समय की प्रमुख सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों का केंद्र था। इस क्षेत्र की विशेष भौगोलिक और कृषि योग्य भूमि ने स्थायी बस्ती और प्रशासनिक संरचना के विकास में मदद की, जिससे जनपद प्रणाली को मजबूती मिली।

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प्रश्न 22. ऋग्वैदिक काल में ‘विदथ’ में महिलाओं की क्या भूमिका थी?

(A) महिलाएँ विदथ में भाग नहीं ले सकती थीं
(B) महिलाएँ विदथ में भाग लेती थीं
(C) महिलाएँ केवल दर्शक के रूप में उपस्थित रह सकती थीं
(D) इस विषय में कोई जानकारी नहीं

उत्तर: (B) महिलाएँ विदथ में भाग लेती थीं

ऋग्वैदिक काल में विदथ में महिलाएँ भी भाग लेती थीं। यह उस समय स्त्रियों की उच्च सामाजिक स्थिति का प्रमाण है। विदथ एक ऐसा मंच था जहाँ सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक मामलों पर विचार-विमर्श किया जाता था। इस काल में लोपामुद्रा, घोषा, अपाला जैसी विदुषी महिलाएँ थीं जिन्होंने स्वयं वैदिक सूक्त रचे और ज्ञान का प्रसार किया। हालांकि, उत्तर वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति में गिरावट आई और उनका समाज में प्रभाव कम हो गया। यह तथ्य ऋग्वैदिक समाज में स्त्रियों की स्वतंत्रता और अधिकारों का मूल्य समझने में मदद करता है।

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प्रश्न 23. ऋग्वैदिक काल से उत्तर वैदिक काल में ‘बलि’ के स्वरूप में क्या परिवर्तन आया और यह किसका प्रमाण है?

(A) बलि समाप्त हो गई — धर्म के विकास का प्रमाण
(B) स्वैच्छिक भेंट से अनिवार्य कर बनी — राजसत्ता के सुदृढ़ीकरण का प्रमाण
(C) अनिवार्य कर से स्वैच्छिक भेंट बनी — लोकतंत्र के विकास का प्रमाण
(D) बलि का स्वरूप नहीं बदला

उत्तर: (B) स्वैच्छिक भेंट से अनिवार्य कर बनी — राजसत्ता के सुदृढ़ीकरण का प्रमाण

ऋग्वैदिक काल में बलि प्रजा द्वारा राजा को दी जाने वाली स्वैच्छिक भेंट थी। इसका मतलब था कि लोग अपनी इच्छा से राजा को बलि देते थे। लेकिन उत्तर वैदिक काल में यह अनिवार्य कर बन गई, जिसका मतलब है कि सभी प्रजा को इसे देना पड़ता था। यह बदलाव राजसत्ता के सुदृढ़ीकरण और केंद्रीयकरण का स्पष्ट प्रमाण है। ऋग्वैदिक काल में राजा की शक्ति सीमित होती थी, जबकि उत्तर वैदिक काल में राजतंत्र अधिक शक्तिशाली और संगठित हो गया। बलि की यह व्यवस्था यह दिखाती है कि कैसे राजा ने अपनी सत्ता को मजबूत किया और प्रशासनिक नियंत्रण बढ़ाया।

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प्रश्न 24. उत्तर वैदिक काल में ‘रत्नियों’ की व्यवस्था किस बात का प्रमाण है?

(A) धर्म के पतन का
(B) संगठित और विशेषज्ञ प्रशासनिक व्यवस्था के उद्भव का
(C) कृषि के पतन का
(D) व्यापार की समाप्ति का

उत्तर: (B) संगठित और विशेषज्ञ प्रशासनिक व्यवस्था के उद्भव का

उत्तर वैदिक काल में रत्नियों की व्यवस्था से यह स्पष्ट होता है कि राज्य में संगठित और विशेषज्ञ प्रशासन का विकास हुआ। इस व्यवस्था में प्रमुख अधिकारी जैसे — संग्रहीतृ (कोषाध्यक्ष), भागदूध (भू-राजस्व अधिकारी), अक्षवाप (जुए में राजा के सहायक), और पालागल (विदूषक) शामिल थे। इन अधिकारियों की नियुक्ति यह दर्शाती है कि राज्य प्रशासन अधिक व्यवस्थित और कुशल हो गया था। ऋग्वैदिक काल में इस तरह के विशेषज्ञ अधिकारियों का उल्लेख नहीं मिलता, इसलिए रत्नियों की यह व्यवस्था उत्तर वैदिक काल में राज्य संरचना और प्रशासनिक विकास का प्रमाण है। यह दिखाता है कि कैसे राज्य सत्ता केंद्रीकृत हुई और विभिन्न कार्यों के लिए विशेषज्ञों की भूमिका सुनिश्चित की गई।
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प्रश्न 25. ऋग्वेद में सबसे महत्वपूर्ण देवता कौन थे और उनका उल्लेख कितनी बार हुआ है?

(A) अग्नि — 200 बार
(B) वरुण — 150 बार
(C) इंद्र — 250 बार
(D) सोम — 144 बार

उत्तर: (C) इंद्र — 250 बार

ऋग्वेद में सबसे महत्वपूर्ण देवता इंद्र हैं, जिनका उल्लेख लगभग 250 बार हुआ है। इंद्र को युद्ध का देवता (The War God), वर्षा का देवता और पुरंदर (किलों को तोड़ने वाला) कहा जाता था। उन्होंने अकाल के दानव वृत्र का वध किया, इसलिए उन्हें वृत्रहन्ता भी कहा जाता है। इंद्र आर्यों के लिए सबसे अधिक पूजनीय देवता थे। वे न केवल सैनिक और योद्धा देवता थे, बल्कि कृषि और वर्षा के माध्यम से समाज के जीवन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। UPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में इंद्र से संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं, इसलिए उनका महत्व याद रखना अत्यंत आवश्यक है।

निष्कर्ष
वैदिक काल के ये महत्वपूर्ण MCQ हमें ऋग्वैदिक धर्म, देवताओं और उत्तर वैदिक प्रशासन की स्पष्ट समझ देते हैं। ऐसे प्रश्नों का अभ्यास न केवल इतिहास की समझ बढ़ाता है, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता की संभावना भी मजबूत करता है।

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