छठी शताब्दी ई.पू. MCQ 2026: धर्म, समाज के Top प्रश्न

छठी शताब्दी ई.पू. में लोहे के हल से गहरी जुताई करते किसान, कृषि क्रांति का दृश्य

प्राचीन भारत का इतिहास भाग-27 MCQ-2026

छठी शताब्दी ई.पू. में लोहे के हल से गहरी जुताई करते किसान, कृषि क्रांति का दृश्य

Real Education Factory

प्रश्न 1. उत्तरवैदिक काल में ब्राह्मणों के हाथ में क्या था?

A) राजनीतिक सत्ता
B) सैन्य सत्ता
C) धार्मिक सत्ता
D) आर्थिक सत्ता

उत्तर: C) धार्मिक सत्ता

📝

उत्तरवैदिक काल में समाज को चार वर्णों में बांटा गया था। इस समाज में ब्राह्मणों के हाथ में धार्मिक सत्ता थी और क्षत्रियों के हाथ में राजनीतिक सत्ता थी। ब्राह्मण यज्ञ, मंत्र और धार्मिक अनुष्ठानों के एकमात्र संचालक थे। इसी कारण समाज में उनका स्थान सर्वोच्च था। धार्मिक सत्ता का यह एकाधिकार अन्य वर्णों में असंतोष का मुख्य कारण बन गया। बुद्ध और महावीर ने इस पुरोहित वर्ग के एकाधिकार को चुनौती दी और सीधे ईश्वर से संपर्क का मार्ग सुझाया। इसलिए बौद्ध और जैन धर्म में पुरोहित की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं थी। यही बदलाव समाज में धार्मिक और सामाजिक समानता की ओर बढ़ने का कारण बना।

प्रश्न 2. वैदिककालीन धर्म की तुलना में उत्तरवैदिककालीन धर्म कैसा था?

A) अधिक सरल और सीधा
B) अधिक जटिल और कर्मकांडीय
C) अधिक लोकतांत्रिक
D) अधिक अहिंसावादी

उत्तर: B) अधिक जटिल और कर्मकांडीय

📝

पूर्व वैदिककाल में धर्म सीधा-सादा और सरल था, जिसमें प्रकृति की उपासना और साधारण स्तुतियाँ शामिल थीं। लेकिन उत्तरवैदिक काल तक धर्म अत्यंत जटिल और कर्मकांडीय हो गया। यज्ञों की संख्या और जटिलता बढ़ गई और मंत्रोच्चार की शुद्धता पर अत्यधिक जोर दिया जाने लगा। धार्मिक कृत्य इतने समयसाध्य और व्ययसाध्य हो गए कि सामान्य जन उन्हें संपन्न नहीं कर सकते थे। इस जटिलता ने लोगों को सरल धर्म की ओर आकर्षित किया और बौद्ध और जैन धर्म के लिए उर्वर भूमि तैयार की।

प्रश्न 3. निम्नलिखित में से कौन सी गतिविधि ब्राह्मणीय व्यवस्था में निंदनीय मानी जाती थी?

A) वेद पाठ
B) समुद्रपारीय व्यापार
C) यज्ञ करना
D) दान लेना

उत्तर: B) समुद्रपारीय व्यापार

📝

ब्राह्मणीय व्यवस्था में समुद्रपारीय व्यापार (Overseas Trade) को निंदनीय माना जाता था। इसके अलावा सार्वजनिक भोजनालय, वेश्यावृत्ति, सूद पर ऋण देना और मौद्रिक अर्थव्यवस्था जैसी गतिविधियाँ भी ब्राह्मणीय दृष्टि से अपवित्र और निंदनीय थीं। ब्राह्मण ग्रंथों में समुद्र यात्रा को “समुद्र दोष” या पाप माना गया था। परंतु व्यापारी वर्ग के लिए ये गतिविधियाँ आजीविका का साधन थीं। इसी विरोधाभास ने नई अर्थव्यवस्था को धार्मिक स्वीकृति दिलाने की आवश्यकता उत्पन्न की, जिसे बौद्ध धर्म ने पूरी की।

सूक्ष्मजीव विज्ञान और विषाणु के बारे में पढ़े –
सूक्ष्मजीव विज्ञान और विषाणु से जुड़े 30 महत्वपूर्ण MCQ 2026
प्रश्न 4. छठी शताब्दी ई०पू० में नवीन आर्थिक परिस्थितियों के साथ कौन सी सामाजिक बुराई भी आई?

A) जाति प्रथा
B) सम्पत्ति का संचय और उससे उत्पन्न कुरीतियाँ
C) दास प्रथा
D) बाल विवाह

उत्तर: B) सम्पत्ति का संचय और उससे उत्पन्न कुरीतियाँ

📝

छठी शताब्दी ई०पू० में अधिशेष उत्पादन और मौद्रिक अर्थव्यवस्था के विकास के साथ संपत्ति का बड़े पैमाने पर संचय होने लगा। यह संचय कुरीतियाँ, युद्ध और अशांति लेकर आया। लोग सुखी जीवन की तलाश में भटकने लगे और शांतिमय एवं सरल जीवन की लालसा बढ़ी। इसी वातावरण में जैन और बौद्ध धर्म ने अहिंसा और तपस्वी जीवन का संदेश दिया, जो लोगों के लिए अत्यंत आकर्षक था। भौतिकवाद की प्रतिक्रिया में आध्यात्मवाद का उदय सामाजिक मनोविज्ञान की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण तथ्य है।

प्रश्न 5. नगरीय जीवन की किस विशेषता को ब्राह्मणीय व्यवस्था में निंदनीय नहीं माना जाता था?

A) सार्वजनिक भोजनालय
B) मौद्रिक अर्थव्यवस्था
C) वेद विद्यालय
D) वेश्यावृत्ति

उत्तर: C) वेद विद्यालय

📝

नगरीय जीवन की कई विशेषताएँ जैसे वेश्यावृत्ति, सार्वजनिक भोजनालय, समुद्रपारीय व्यापार और मौद्रिक अर्थव्यवस्था ब्राह्मणीय व्यवस्था में निंदनीय मानी जाती थीं। इसके विपरीत, वेद विद्यालय (गुरुकुल) ब्राह्मणीय व्यवस्था में सर्वाधिक सम्मानित संस्था थी। यह प्रश्न Negative approach पर आधारित है। परीक्षाओं में ऐसे प्रश्नों में विकल्पों को ध्यान से पढ़ना चाहिए और जो विकल्प ब्राह्मणीय व्यवस्था के अनुकूल हो, वही सही उत्तर माना जाता है। इस प्रकार के प्रश्न UPSC Prelims में उम्मीदवारों को भ्रमित करने के लिए दिए जाते हैं।

प्रश्न 6. उत्तरवैदिक काल में सामाजिक स्थिति किस आधार पर निर्धारित होती थी?

A) धन और संपत्ति के आधार पर
B) व्यक्ति के गुणों के आधार पर
C) जन्म के वर्ण के आधार पर
D) शिक्षा के आधार पर

उत्तर: C) जन्म के वर्ण के आधार पर

📝

उत्तरवैदिक काल में सामाजिक स्थिति जन्म के वर्ण पर निर्धारित होती थी। जो व्यक्ति ऊँचे वर्ण में जन्म लेता था, वह शुद्ध और श्रेष्ठ माना जाता था। इस व्यवस्था में व्यक्तिगत योग्यता, धन या शिक्षा का कोई महत्व नहीं था। यह कठोर जन्म आधारित व्यवस्था विशेष रूप से वैश्यों के लिए कष्टकारी थी, जो आर्थिक रूप से समृद्ध थे किंतु सामाजिक प्रतिष्ठा में तीसरे स्थान पर थे। यही कारण था कि बुद्ध और महावीर का कर्म आधारित समाज का संदेश क्रांतिकारी था।

प्रश्न 7. छठी शताब्दी ई०पू० में लोहे के प्रयोग से कृषि में क्या परिवर्तन आया?

A) सिंचाई व्यवस्था सुधरी
B) खेतों की गहरी जुताई संभव हुई
C) नई फसलें आईं
D) कृषि भूमि घटी

उत्तर: B) खेतों की गहरी जुताई संभव हुई

📝

लोहे के उपकरणों — विशेषकर लोहे के फाल वाले हल — के प्रयोग से खेतों की गहरी जुताई संभव हुई। इससे पहले लकड़ी के हल से उथली जुताई होती थी, जो उत्पादन को सीमित रखती थी। गहरी जुताई से मिट्टी की उर्वरा शक्ति का बेहतर उपयोग हुआ और उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इसी से अधिशेष उत्पादन संभव हुआ, जो नगरीकरण, व्यापार और सामाजिक विकास का आधार बना। यह कृषि क्रांति वास्तव में भारतीय इतिहास का एक turning point था।

प्रश्न 8. अधिशेष उत्पादन (Surplus Production) ने किस प्रक्रिया को सबसे अधिक प्रभावित किया?

A) धर्म प्रचार
B) नगरों का उदय
C) राजतंत्र का विकास
D) साहित्य निर्माण

उत्तर: B) नगरों का उदय

📝

लोहे के कृषि में प्रयोग से उत्पादन क्षमता बढ़ी और बड़े पैमाने पर अधिशेष उत्पादन होने लगा। अधिशेष उत्पादन का अर्थ है — आवश्यकता से अधिक उत्पादन। जब किसान अपनी आवश्यकता से अधिक अनाज उगाने लगे तो विनिमय और व्यापार शुरू हुआ। व्यापार के केंद्र के रूप में नगरों का उदय हुआ। नगरों में विभिन्न व्यवसायों के लोग बसने लगे — व्यापारी, कारीगर, पुजारी आदि। इस प्रकार अधिशेष उत्पादन ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नगरीय अर्थव्यवस्था में बदलने में निर्णायक भूमिका निभाई।

प्रश्न 9. छठी शताब्दी ई०पू० के धार्मिक आंदोलन में जिन दो धर्मों ने सर्वाधिक लोकप्रियता पाई, वे थे?

A) शैव और वैष्णव
B) बौद्ध और जैन
C) आजीवक और लोकायत
D) शाक्त और स्मार्त

उत्तर: B) बौद्ध और जैन

📝

छठी शताब्दी ई०पू० में लगभग 62 धार्मिक संप्रदाय उदय हुए, परंतु इनमें से बौद्ध और जैन धर्म सर्वाधिक लोकप्रिय सिद्ध हुए। इसके कई कारण थे — दोनों ने सरल और व्यावहारिक जीवन दर्शन प्रस्तुत किया, वर्ण व्यवस्था को नकारा, कर्मकांड की जटिलता को अस्वीकार किया और अहिंसा पर बल दिया। इसके अलावा दोनों धर्म राजाश्रय और व्यापारी वर्ग के समर्थन से लाभान्वित हुए। आजिवक संप्रदाय (मक्खली गोशाल) तीसरा प्रमुख संप्रदाय था, किंतु वह उतना दीर्घजीवी नहीं रहा।

प्रश्न 10. उत्तरवैदिक समाज में किस वर्ण को छोड़कर बाकी सभी वर्ण असंतुष्ट थे?

A) क्षत्रिय
B) वैश्य
C) ब्राह्मण
D) शूद्र

उत्तर: C) ब्राह्मण

📝

उत्तरवैदिक काल में चार वर्णों में से केवल ब्राह्मण ही संतुष्ट थे क्योंकि सामाजिक वर्ण क्रम में उनका स्थान सर्वोच्च था और धार्मिक सत्ता उनके हाथ में थी। क्षत्रिय राजनीतिक दृष्टि से सर्वोच्च होने के बावजूद सामाजिक दर्जे में ब्राह्मणों से नीचे होने के कारण असंतुष्ट थे। वैश्य आर्थिक रूप से समृद्ध होने के बावजूद तीसरे स्थान पर होने से असंतुष्ट थे। शूद्रों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी और उन पर अनेक अपात्रताएं थीं। यही सामाजिक असंतोष नए धर्मों के उदय का सामाजिक आधार बना।

प्रश्न 11. “ढलवा लोहा” बनाने की तकनीक का महत्व छठी शताब्दी ई०पू० में क्यों था?

A) इससे आभूषण बनते थे
B) इससे कृषि में व्यापक उपयोग संभव हुआ
C) इससे जहाज बनते थे
D) इससे मूर्तियाँ बनती थीं

उत्तर: B) इससे कृषि में व्यापक उपयोग संभव हुआ

📝

मगध के आसपास के क्षेत्रों में लौह अयस्क की प्रचुरता के साथ-साथ ढलवा लोहा (Cast Iron) बनाने की नई तकनीक भी विकसित हो गई थी। ढलवा लोहा अधिक मजबूत और टिकाऊ होता था। इससे कृषि उपकरण जैसे हल के फाल, कुदाल, दरांती आदि बनाए जा सकते थे, जो खेती को अधिक कुशल बनाते थे। इस तकनीकी प्रगति ने कृषि क्रांति को संभव बनाया, जो आगे चलकर नगरीय क्रांति, सामाजिक परिवर्तन और मगध साम्राज्य के उदय का आधार बनी। यह तकनीक और इतिहास का संबंध UPSC दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 12. छठी शताब्दी ई०पू० में जैन और बौद्ध धर्म का मुख्य सकारात्मक संदेश क्या था?

A) राजतंत्र का समर्थन
B) अहिंसा और तपस्वी जीवन
C) यज्ञ प्रणाली में सुधार
D) व्यापार का विस्तार

उत्तर: B) अहिंसा और तपस्वी जीवन

📝

जैन और बौद्ध धर्म ने ऐसे समय में अहिंसा और तपस्वी जीवन का संदेश दिया, जब भौतिकवाद, युद्ध और अशांति अपने चरम पर थे। अहिंसा का संदेश न केवल नैतिक था बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी उचित था क्योंकि इससे पशुधन की रक्षा होती थी। तपस्वी जीवन का आदर्श उन लोगों को आकर्षित करता था जो भौतिक जीवन की कुरीतियों से थक चुके थे। महावीर का “त्रिरत्न” (सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चरित्र) और बुद्ध का “अष्टांगिक मार्ग” इसी सरल जीवन दर्शन के प्रतीक थे।

प्रश्न 13. छठी शताब्दी ई०पू० में राजनीतिक और धार्मिक गतिविधियों का नगरों के उदय में क्या योगदान था?

A) कोई योगदान नहीं था
B) नगरों के उदय में सहायक कारकों के रूप में
C) नगरों को नष्ट करने में
D) ग्रामीण संस्कृति को बढ़ावा देने में

उत्तर: B) नगरों के उदय में सहायक कारकों के रूप में

📝

लोहे के कृषि में प्रयोग और अधिशेष उत्पादन द्वितीय नगरीय क्रांति के प्रमुख कारण थे, किंतु इसके अतिरिक्त राजनीतिक और धार्मिक गतिविधियाँ भी नगरों के उदय में महत्वपूर्ण रहीं। राजनीतिक दृष्टि से महाजनपदों की राजधानियाँ नगरों के रूप में विकसित हुईं। धार्मिक दृष्टि से बौद्ध और जैन केंद्रों के आसपास भी नगर बसे। इस प्रकार आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक — तीनों कारकों ने मिलकर नगरीकरण को बढ़ावा दिया। यह बहुकारणीय दृष्टिकोण परीक्षाओं में विश्लेषणात्मक प्रश्न के लिए उपयोगी है।

प्रश्न 14. छठी शताब्दी ई०पू० में व्यापार और वाणिज्य में प्रगति का मुख्य कारण क्या था?

A) विदेशी व्यापारियों का आगमन
B) नगरों का उदय और मौद्रिक अर्थव्यवस्था
C) राजाओं की व्यापार नीति
D) समुद्री मार्गों की खोज

उत्तर: B) नगरों का उदय और मौद्रिक अर्थव्यवस्था

📝

छठी शताब्दी ई०पू० में कौशांबी, कुशीनगर, वाराणसी जैसे नगरों के उदय और धातु के सिक्कों के प्रचलन ने व्यापार-वाणिज्य में उल्लेखनीय प्रगति की। नगर व्यापार के केंद्र बने और मौद्रिक अर्थव्यवस्था ने वस्तु विनिमय की पुरानी व्यवस्था को प्रतिस्थापित किया। सिक्कों के प्रचलन से दूरस्थ व्यापार आसान हुआ। इसी के साथ सूद पर ऋण देने की प्रथा चली, जिसने व्यापारिक पूँजी के विकास में योगदान दिया। यह आर्थिक क्रांति प्राचीन भारत के सर्वांगीण विकास का आधार बनी।

प्रश्न 15. छठी शताब्दी ई०पू० में उपनिषदों के अतिरिक्त किस तत्व ने धार्मिक चेतना जागृत करने में सहयोग दिया?

A) विदेशी दर्शन
B) नई अर्थव्यवस्था
C) राजाओं की धार्मिक नीति
D) वेदों का पुनर्पाठ

उत्तर: B) नई अर्थव्यवस्था

📝

पाठ के अनुसार उपनिषदों में वर्णित सिद्धांतों से उपजी धार्मिक चेतना के साथ-साथ नई अर्थव्यवस्था ने भी छठी शताब्दी ई०पू० के सामाजिक और धार्मिक आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नई कृषि अर्थव्यवस्था, मौद्रिक व्यवस्था और नगरीकरण ने समाज की संरचना को बदल दिया। इस आर्थिक परिवर्तन ने पुरानी ब्राह्मणीय व्यवस्था को चुनौती दी और नई धार्मिक चेतना को जन्म दिया। इस प्रकार धर्म और अर्थव्यवस्था का अंतर्संबंध इस काल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है, जो UPSC के analytical प्रश्नों में अक्सर आती है।

प्रश्न 16. निम्नलिखित में से किसे छठी शताब्दी ई०पू० की “क्रांतिकारी शताब्दी” की घटना नहीं माना जाता?

A) बौद्ध धर्म का उदय
B) सोलह महाजनपदों का उदय
C) आर्यों का भारत आगमन
D) मगध साम्राज्य का उदय

उत्तर: C) आर्यों का भारत आगमन

📝

पाठ में छठी शताब्दी ई०पू० की क्रांतिकारी घटनाओं में — द्वितीय नगरीय क्रांति, सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन, बौद्ध-जैन धर्म का उदय, सोलह महाजनपदों का उदय और मगध साम्राज्य का उदय — शामिल हैं। आर्यों का भारत आगमन लगभग 1500 ई०पू० के आसपास माना जाता है, जो छठी शताब्दी ई०पू० से बहुत पहले की घटना है। यह प्रश्न chronological awareness की जाँच करता है। परीक्षाओं में ऐसे प्रश्न आते हैं जिनमें अलग-अलग कालखंड की घटनाओं को मिलाकर भ्रम पैदा किया जाता है।

प्रश्न 17. वैश्य वर्ग द्वारा बौद्ध धर्म को समर्थन देने का प्रमुख कारण क्या था?

A) बौद्ध धर्म ने व्यापार को निषिद्ध किया
B) बौद्ध धर्म ने कर्म आधारित समाज और सामाजिक गतिशीलता का मार्ग दिखाया
C) बौद्ध धर्म ने क्षत्रियों की शक्ति बढ़ाई
D) बौद्ध धर्म ने यज्ञ प्रणाली को प्रोत्साहित किया

उत्तर: B) बौद्ध धर्म ने कर्म आधारित समाज और सामाजिक गतिशीलता का मार्ग दिखाया

📝

वैश्य वर्ग व्यापार-वाणिज्य में संलग्न रहने के कारण आर्थिक रूप से समृद्ध था, किंतु जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था में उनका स्थान तीसरा था। उन्हें अपनी आर्थिक उपलब्धियों के अनुरूप सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं मिलती थी। बौद्ध धर्म ने जन्म नहीं बल्कि कर्म को आधार माना, जिससे वैश्यों को समान सामाजिक प्रतिष्ठा मिलने का अवसर मिला। व्यापारी श्रेणियों (Guilds) ने बौद्ध विहारों और स्तूपों के निर्माण में भारी आर्थिक योगदान दिया। अनाथपिंडक जैसे धनी व्यापारियों का बुद्ध को दान इसी का उदाहरण है।

प्रश्न 18. प्राचीन भारत में “अधिशेष उत्पादन” से क्या तात्पर्य था?

A) अन्य देशों को निर्यात किया गया अनाज
B) व्यक्तिगत आवश्यकता से अधिक उत्पादन
C) राजा को दिया गया कर
D) यज्ञ में प्रयुक्त सामग्री

उत्तर: B) व्यक्तिगत आवश्यकता से अधिक उत्पादन

📝

अधिशेष उत्पादन (Surplus Production) का अर्थ है — अपनी आवश्यकता से अधिक उत्पादन करना। जब कोई किसान अपने परिवार की आवश्यकता से अधिक अनाज उगाता था, तो वह अतिरिक्त अनाज बाजार में बेच सकता था। यही आर्थिक विशेषीकरण और व्यापार की नींव है। लोहे के उपकरण से गहरी जुताई होने पर उत्पादन इतना बढ़ा कि बड़े पैमाने पर अधिशेष उत्पन्न होने लगा। इस अधिशेष ने व्यापार, नगरों और जटिल समाज के निर्माण को संभव बनाया। यह अवधारणा प्राचीन इतिहास की नींव है।

भारत पर अरबों का आक्रमण के बारे में पढ़े –
भारत पर अरबों का आक्रमण Most Important MCQ 2026
प्रश्न 19. छठी शताब्दी ई०पू० में जो सरल धर्म की तलाश थी, उसका क्या कारण था?

A) लोग नास्तिक हो गए थे
B) धार्मिक कृत्य अत्यंत समयसाध्य और व्ययसाध्य हो गए थे
C) विदेशी धर्मों का प्रभाव था
D) राजाओं ने ब्राह्मणों को निष्काषित किया

उत्तर: B) धार्मिक कृत्य अत्यंत समयसाध्य और व्ययसाध्य हो गए थे

📝

उत्तरवैदिक काल में यज्ञों और धार्मिक कर्मकांडों की जटिलता इतनी बढ़ गई थी कि उनका संपादन अत्यंत समयसाध्य और व्ययसाध्य (costly and time-consuming) हो गया था। इन्हें संपन्न कराने के लिए दक्ष पुरोहितों की आवश्यकता होती थी और भारी मात्रा में सामग्री और पशु बलि देनी पड़ती थी। सामान्य जन इन धार्मिक क्रियाओं का वहन नहीं कर सकते थे। वे सरल धर्म की तलाश में थे जो बिना किसी पुरोहित और महंगे अनुष्ठान के आचरण किया जा सके। महावीर और बुद्ध ने ऐसा ही सरल मार्ग प्रस्तुत किया।

प्रश्न 20. छठी शताब्दी ई०पू० के सामाजिक-धार्मिक आंदोलन के बारे में निम्नलिखित में से कौन सा निष्कर्ष सबसे उचित है?

A) यह केवल ब्राह्मण विरोधी आंदोलन था
B) यह केवल राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने का प्रयास था
C) यह सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक कारणों से उत्पन्न बहुआयामी आंदोलन था
D) यह विदेशी प्रेरणा से शुरू हुआ आंदोलन था

उत्तर: C) यह सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक कारणों से उत्पन्न बहुआयामी आंदोलन था

📝

पाठ का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि छठी शताब्दी ई०पू० का सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन बहुआयामी था। इसके पीछे वैदिक कर्मकांडों की जटिलता, सामाजिक विषमताएँ, नई कृषि अर्थव्यवस्था, मौद्रिक व्यवस्था और उपनिषदिक चेतना — सभी का योगदान था। इसे मात्र ब्राह्मण विरोधी आंदोलन कहना अनुचित होगा। यह एक सम्पूर्ण सामाजिक-आर्थिक-धार्मिक रूपांतरण था। UPSC मुख्य परीक्षा में इस निष्कर्ष को समझकर लिखना बहुत उपयोगी है क्योंकि परीक्षक बहुकारणीय और विश्लेषणात्मक उत्तरों की अपेक्षा रखते हैं।

प्रश्न 21. उत्तरवैदिक काल में पुरोहित वर्ग की मध्यस्थता बढ़ने का मुख्य कारण क्या था?

A) राजाओं का आदेश
B) मंत्रोच्चार की शुद्धता पर अत्यधिक बल
C) विदेशी आक्रमण का भय
D) व्यापार में वृद्धि

उत्तर: B) मंत्रोच्चार की शुद्धता पर अत्यधिक बल

📝

उत्तरवैदिक काल में लोगों के मन में यह भावना थी कि गलत मंत्रोच्चार के अनिष्टकारी परिणाम सामने आएंगे। इस भय के कारण बिना पुरोहित की सहायता के कोई भी धार्मिक कार्य संभव नहीं रहा। पुरोहित वर्ग ने इस स्थिति का पूरा लाभ उठाया और धर्म पर अपना एकाधिकार स्थापित कर लिया। यही कारण था कि सामान्य जन धार्मिक क्षेत्र में पूरी तरह पुरोहितों पर निर्भर हो गए। बुद्ध ने इस पुरोहित वर्ग की मध्यस्थता को अस्वीकार किया और व्यक्तिगत साधना और अष्टांगिक मार्ग का उपदेश दिया, जो क्रांतिकारी था।

प्रश्न 22. छठी शताब्दी ई०पू० में शांतिमय और सरल जीवन की लालसा क्यों बढ़ी?

A) लोग गरीब हो गए थे
B) युद्ध और अशांति के वातावरण में सम्पत्ति संचय ने कुरीतियाँ उत्पन्न कीं
C) सरकार ने विलासिता पर प्रतिबंध लगाया
D) ब्राह्मणों ने सरल जीवन का प्रचार किया

उत्तर: B) युद्ध और अशांति के वातावरण में सम्पत्ति संचय ने कुरीतियाँ उत्पन्न कीं

📝

छठी शताब्दी ई०पू० में नई अर्थव्यवस्था के उदय से लोगों के भौतिक जीवन में व्यापक परिवर्तन आए। संपत्ति का संचय बड़े पैमाने पर हुआ, जो अपने साथ कई कुरीतियाँ भी लाया। महाजनपदों के बीच निरंतर युद्ध और अशांति का वातावरण था। इस परिस्थिति में लोग सुनहरे दिनों की ओर लौटने की बात सोचने लगे। शांतिमय और सरल जीवन की लालसा स्वाभाविक रूप से बढ़ी। जैन और बौद्ध धर्म ने ठीक इसी समय अहिंसा और तपस्वी जीवन का संदेश दिया, जो लोगों की इस आंतरिक भावना से पूर्णतः मेल खाता था।

प्रश्न 23. निम्नलिखित में से कौन सा कथन “द्वितीय नगरीय क्रांति” के बारे में गलत है?

A) यह लौहयुगीन थी
B) यह गंगा के मध्यवर्ती क्षेत्र में हुई
C) यह सिंधु नदी क्षेत्र में हुई
D) इसका प्रमुख कारण लोहे का कृषि में प्रयोग था

उत्तर: C) यह सिंधु नदी क्षेत्र में हुई

📝

द्वितीय नगरीय क्रांति के बारे में सही तथ्य यह हैं — यह लौहयुगीन थी, यह गंगा के मध्यवर्ती क्षेत्र में हुई और इसका प्रमुख कारण लोहे का कृषि में बड़े पैमाने पर प्रयोग था। “सिंधु नदी क्षेत्र में हुई” यह कथन पूर्णतः गलत है क्योंकि सिंधु क्षेत्र प्रथम नगरीय क्रांति (सैंधव सभ्यता) से संबंधित है। यह एक Incorrect Statement वाला प्रश्न है जो परीक्षाओं में बहुत आम है। ऐसे प्रश्नों में हर विकल्प को पाठ के तथ्यों से मिलाकर जाँचना चाहिए और जो तथ्य पाठ से मेल न खाए वही गलत उत्तर होगा।

प्रश्न 24. छठी शताब्दी ई०पू० में व्यापार-वाणिज्य में प्रगति से सर्वाधिक लाभ किस वर्ण को हुआ?

A) ब्राह्मण
B) क्षत्रिय
C) वैश्य
D) शूद्र

उत्तर: C) वैश्य

📝

छठी शताब्दी ई०पू० में नगरों के उदय, मौद्रिक अर्थव्यवस्था के विकास और व्यापार-वाणिज्य की प्रगति से सर्वाधिक लाभ वैश्य वर्ण को हुआ। वैश्य वर्ग परंपरागत रूप से कृषि, पशुपालन और व्यापार-वाणिज्य में संलग्न था। नई अर्थव्यवस्था ने उनकी आर्थिक स्थिति को और अधिक मजबूत किया। धातु के सिक्कों के प्रचलन से सूद पर ऋण देने की प्रथा आरंभ हुई, जिसका लाभ भी वैश्यों को मिला। श्रेष्ठी और गाहपति (गृहपति) इसी वर्ग के प्रमुख थे, जो बौद्ध और जैन ग्रंथों में समृद्ध दानदाताओं के रूप में उल्लिखित हैं।

प्रश्न 25. पाठ के अनुसार छठी शताब्दी ई०पू० को “क्रांतिकारी शताब्दी” क्यों कहा गया है?

A) क्योंकि इसमें केवल बौद्ध धर्म का उदय हुआ
B) क्योंकि इसमें एक साथ कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक परिवर्तन हुए
C) क्योंकि इसमें विदेशी आक्रमण हुए
D) क्योंकि इसमें वेदों की रचना हुई

उत्तर: B) क्योंकि इसमें एक साथ कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक परिवर्तन हुए

📝

छठी शताब्दी ई०पू० को “क्रांतिकारी शताब्दी” इसलिए कहा गया क्योंकि इस एक ही शताब्दी में भारतीय इतिहास की अनेक निर्णायक घटनाएँ एक साथ घटित हुईं — द्वितीय नगरीय क्रांति, सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन, बौद्ध और जैन धर्म का उदय, सोलह महाजनपदों का उदय और मगध साम्राज्य की नींव। ये सभी परिवर्तन परस्पर संबंधित थे और एक-दूसरे को प्रभावित करते थे। किसी एक शताब्दी में इतने व्यापक सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक परिवर्तन का एक साथ होना ही इसे “क्रांतिकारी” बनाता है।

हड़प्पा सभ्यता (सिंधु घाटी सभ्यता)(Part-3) के बारे में पढ़े –
हड़प्पा सभ्यता (सिंधु घाटी सभ्यता)(Part-3) Most Important MCQ 2026

1 thought on “छठी शताब्दी ई.पू. MCQ 2026: धर्म, समाज के Top प्रश्न”

Leave a Comment