
प्राचीन भारत का इतिहास भाग-40 MCQ-2026
UPSC/SSC/PSC के लिए 25 High-Scoring वैष्णव और शैव MCQs 2026
प्रश्न 1: विष्णु का सर्वप्रथम उल्लेख किस वेद में मिलता है?
✅ उत्तर: (C) ऋग्वेद
प्रश्न 2: कृष्ण का प्राचीनतम उल्लेख किस उपनिषद में मिलता है?
✅ उत्तर: (B) छांदोग्य उपनिषद
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प्रश्न 3: किस व्याकरणाचार्य के ग्रन्थ में कृष्ण को भगवान के रूप में पूजे जाने की सर्वप्रथम जानकारी मिलती है?
✅ उत्तर: (B) पाणिनी
प्रश्न 4: मेगस्थनीज ने किस देवता को ‘हेराक्लीज’ कहकर संबोधित किया?
✅ उत्तर: (C) कृष्ण
प्रश्न 5: पतंजलि ने किस ग्रन्थ पर ‘महाभाष्य’ नामक टीका की रचना की?
✅ उत्तर: (B) अष्टाध्यायी
प्रश्न 6: भागवत् धर्म के बारे में जानकारी देने वाला पहला अभिलेखीय साक्ष्य कौन सा है?
✅ उत्तर: (B) हेलियोडोरस का बेसनगर गरुड़ स्तम्भ अभिलेख
प्रश्न 7: हेलियोडोरस किस यूनानी शासक का दूत था?
✅ उत्तर: (C) एण्टीयाल्कीड्स
प्रश्न 8: पंचवृष्णि वीरों का एक साथ उल्लेख किस अभिलेख में मिलता है?
✅ उत्तर: (A) मोरा कुआं अभिलेख
प्रश्न 9: पंचवृष्णि वीरों से किसे बाद में हटा दिया गया?
✅ उत्तर: (C) साम्ब
पौराणिक मान्यता के अनुसार साम्ब को कुष्ठ रोग हो जाने के कारण उन्हें पंचवृष्णि वीरों से हटा दिया गया; इसके बाद भागवद् धर्म में ‘चतुर्व्यूह’ की अवधारणा विकसित हुई जिसमें वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध शामिल हैं; इस परिवर्तन ने वैष्णव धर्म में पंचवीर पूजा परंपरा को पूर्ण रूप से बदलकर धार्मिक शुद्धता और पवित्रता की नई अवधारणा स्थापित की; इससे सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं में समग्र सुधार हुआ और वैष्णव धर्म के इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक घटना मानी जाती है।
प्रश्न 10: वैष्णव धर्म किस काल में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचा?
✅ उत्तर: (B) गुप्त काल
गुप्तकाल (चौथी-छठी शताब्दी ई.) में वैष्णव धर्म अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचा, इस दौरान अधिकांश गुप्त शासक भागवत धर्मानुयायी थे और उन्होंने स्वयं को ‘परम भागवत’ की उपाधि दी; उनका राजकीय चिन्ह गरुड़ था, जो विष्णु का वाहन माना जाता है; इस काल में विष्णु के दस अवतारों की अवधारणा व्यापक रूप से प्रसिद्ध हुई, साथ ही मंदिर निर्माण, मूर्तिकला और साहित्य में भी वैष्णव धर्म का प्रभाव अत्यंत स्पष्ट था; गुप्तकाल में यह धार्मिक और सांस्कृतिक समृद्धि वैष्णव धर्म की लोकप्रियता और सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व को दर्शाती है, जिससे यह धर्म साम्राज्य और समाज में गहराई से स्थापित हुआ।
प्रश्न 11: गुप्त वंशीय शासकों का राजकीय चिन्ह क्या था?
✅ उत्तर: (B) गरुड़
गुप्त वंश के शासकों का राजकीय चिन्ह गरुड़ था, जो विष्णु का वाहन माना जाता है और उनकी वैष्णव धर्म के प्रति निष्ठा को स्पष्ट रूप से दर्शाता है; गुप्त सिक्कों और अभिलेखों में गरुड़ का चित्रण मिलता है और गरुड़ स्तम्भ वैष्णव मंदिरों की एक प्रमुख विशेषता बन गए; यह प्रतीक शक्ति, गति और भक्ति का प्रतिनिधित्व करता है, साथ ही सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व को भी दर्शाता है, जो गुप्तकाल में वैष्णव धर्म के व्यापक प्रभाव और समाज में उसकी लोकप्रियता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है और मंदिर कला तथा पूजा परंपरा में स्थायी योगदान देता है।
प्रश्न 12: विष्णु के दस अवतारों में प्रथम अवतार कौन सा है?
✅ उत्तर: (B) मत्स्य
विष्णु का प्रथम अवतार मत्स्य (मछली) अवतार है, जिसे जलप्रलय से पृथ्वी को बचाने वाला अवतार माना जाता है; इस अवतार में विष्णु ने मनु की नाव को महाप्रलय से सुरक्षित रखा और वेदों की रक्षा की, जिससे धर्म और सृष्टि की स्थिरता बनी रही; यह अवतार सृष्टि की रक्षा, धर्म की सुरक्षा और मानवता के उद्धार का प्रतीक है; मत्स्य पुराण में इस अवतार का विस्तृत वर्णन मिलता है, जो वैष्णव धर्म में अवतार सिद्धांत के महत्व को दर्शाता है; इसे धार्मिक परंपराओं, भक्ति और मंदिर कला में भी आदर्श के रूप में चित्रित किया गया है, और यह विश्वव्यापी न्याय और धर्म की स्थापना का संदेश देता है।
प्रश्न 13: गुप्त काल में विष्णु का कौन सा अवतार सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ?
✅ उत्तर: (C) वराह
गुप्त काल में विष्णु का वराह (सूअर) अवतार अत्यंत लोकप्रिय हुआ; इस अवतार में विष्णु ने हिरण्याक्ष दैत्य का वध किया और पृथ्वी को समुद्र से बाहर निकाला, जिससे धर्म और पृथ्वी की सुरक्षा सुनिश्चित हुई; उदयगिरि (मध्य प्रदेश) की गुफाओं में इस अवतार की विशाल वराह मूर्तियां आज भी देखने को मिलती हैं, जो वैष्णव धर्म में इस अवतार की महत्ता को दर्शाती हैं; यह अवतार राजसत्ता द्वारा प्रजा की सुरक्षा, धर्म की स्थापना और सत्य के पक्ष में शक्ति के प्रयोग का प्रतीक माना जाता था; गुप्त शासकों द्वारा इसे राजकीय संरक्षण और मंदिर कला में प्रदर्शित किया गया और यह अवतार सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से आदर्श बन गया।
प्रश्न 14: विष्णु के दस अवतारों में नौवां अवतार किसे माना जाता है?
✅ उत्तर: (B) बुद्ध
विष्णु के दस अवतारों में बुद्ध को नौवें अवतार के रूप में शामिल किया गया है; यह कदम बौद्ध धर्म को हिन्दू धर्म में समाहित करने का प्रयास माना जाता है और इससे दोनों धर्मों के बीच धार्मिक सामंजस्य स्थापित हुआ; ऐसा भी कहा जाता है कि बुद्ध ने पशु बलि को रोकने और अहिंसा का संदेश फैलाने के उद्देश्य से अवतार लिया; हालांकि, विभिन्न परंपराओं में बलराम को भी नौवां अवतार माना जाता है, जो इस सिद्धांत की लचीलापन और सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है; यह अवतार धर्म, नैतिकता और धार्मिक समरसता के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित है; इस प्रकार, विष्णु अवतार सिद्धांत में ऐतिहासिक, धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से विविधता का महत्वपूर्ण योगदान देखने को मिलता है।
प्रश्न 15: कल्कि अवतार का प्रतीक चिन्ह क्या है?
✅ उत्तर: (B) सफेद घोड़ा
कल्कि अवतार, जो अभी आना बाकी है, का प्रतीक चिन्ह सफेद घोड़े पर सवार होकर हाथ में तलवार लिए आना है; इसे मैत्रेय (बौद्ध धर्म के भविष्य के बुद्ध) के प्रतीक के समान माना जाता है; कल्कि को कलियुग के अंत में धर्म की पुनर्स्थापना और अधर्म का नाश करने के लिए अवतार लेना माना जाता है; यह अवतार न्याय, धर्म और सत्य की अंतिम विजय का प्रतीक है; हिन्दू धर्मशास्त्र में कल्कि के आगमन को समाज में धार्मिक और नैतिक व्यवस्था बहाल करने वाला महत्वपूर्ण भविष्यवाणी माना गया है; यह अवतार सर्वधर्म समरसता और आदर्श शासन का संदेश देता है और अधर्म पर धर्म की स्थायी विजय की आशा व्यक्त करता है।
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प्रश्न 16: दक्षिण भारत में अलवार संतों का उदय किस वंश के शासनकाल में हुआ?
✅ उत्तर: (C) पल्लव
दक्षिण भारत में पल्लवों के शासनकाल (छठी-नौवीं शताब्दी ई.) में अलवार और नयनार संतों का उदय हुआ; अलवार संत विशेष रूप से वैष्णव धर्म के भक्त थे और उन्होंने भक्ति आंदोलन को बढ़ावा दिया; इस भक्ति आंदोलन ने दक्षिण भारत के धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया; संतों ने जाति व्यवस्था की कठोरता को चुनौती दी और भक्ति मार्ग को सर्वसुलभ बनाया; उन्होंने साधारण जनता में ईश्वर भक्ति का संदेश फैलाया, भक्ति साहित्य और काव्य की रचना की, और लोकधर्म और आध्यात्मिक जागरूकता को प्रोत्साहित किया; अलवारों की शिक्षाएँ ईश्वर प्रेम, नैतिकता और सामाजिक समरसता पर केंद्रित थीं; इस काल में भक्ति ने दक्षिण भारतीय संस्कृति और मंदिर परंपरा में स्थायी प्रभाव डाला।
प्रश्न 17: अलवार संतों की कुल संख्या कितनी थी?
✅ उत्तर: (B) 12
अलवार संतों की कुल संख्या 12 थी, जिनमें अंडाल, नाम्मालवार और कुलशेखर प्रमुख थे; इन संतों ने तमिल भाषा में भक्ति काव्य की रचना की और विष्णु के विभिन्न रूपों की स्तुति की; अलवार का अर्थ है ‘ईश्वर में डूबा हुआ’; इन संतों ने हजारों पद रचे, जो ‘नालायिर दिव्य प्रबन्धम्’ नामक संग्रह में संकलित हैं; उनकी रचनाएँ भक्ति, प्रेम, निष्ठा और ईश्वर में आत्मसमर्पण का संदेश देती हैं; इनकी काव्य रचनाएँ दक्षिण भारत की धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा को प्रभावित करती हैं; अलवार संतों का योगदान वैष्णव धर्म के विकास और मंदिर संस्कृति में महत्वपूर्ण माना जाता है और उनकी शिक्षाएँ आज भी भक्ति मार्ग और धार्मिक अभ्यास में मार्गदर्शक हैं।
प्रश्न 18: अंडाल को किस नाम से भी जाना जाता है?
✅ उत्तर: (A) दक्षिण भारत की मीरा
अंडाल एकमात्र महिला अलवार संत थीं, जिन्हें ‘दक्षिण भारत की मीरा’ कहा जाता है; उन्होंने विष्णु (रंगनाथ) के प्रति अटूट प्रेम और भक्ति व्यक्त की; उनकी रचनाएँ ‘तिरुप्पावै’ और ‘नाच्चियार तिरुमोळि’ अत्यंत प्रसिद्ध हैं; वे आठवीं शताब्दी में हुईं और उनकी भक्ति भावना उत्तर भारत की मीरा से तुलनीय है; अंडाल ने अपने संपूर्ण जीवन को विष्णु भक्ति में समर्पित किया और संगीत, काव्य और भक्ति रचनाओं के माध्यम से वैष्णव धर्म को दक्षिण भारत में गहराई से प्रभावित किया; उनकी रचनाएँ सामाजिक और धार्मिक चेतना का प्रतीक हैं और भक्ति मार्ग के लिए मार्गदर्शक मानी जाती हैं।
प्रश्न 19: अलवार संत कुलशेखर किस राज्य के शासक थे?
✅ उत्तर: (B) केरल
कुलशेखर केरल के शासक थे और एक प्रमुख अलवार संत थे; उन्होंने अपना राज्य छोड़कर विष्णु भक्ति में जीवन समर्पित कर दिया; उनकी रचना ‘पेरुमाळ तिरुमोळि’ अत्यंत प्रसिद्ध है; वे राम भक्त थे और राम के प्रति अपनी भक्ति में विभिन्न पात्रों की भूमिका निभाते थे; उनका जीवन त्याग, भक्ति और सेवा का उदाहरण है; कुलशेखर ने अपने संपूर्ण जीवन को धार्मिक कर्तव्य और वैष्णव परंपरा के प्रचार में लगाया; उनकी शिक्षाएँ भक्ति मार्ग और सदाचार के लिए मार्गदर्शक मानी जाती हैं और दक्षिण भारत में वैष्णव धर्म की स्थापनाओं में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।
प्रश्न 20: शिव से संबंधित धर्म को क्या कहा जाता है?
✅ उत्तर: (B) शैव धर्म
शिव से संबंधित धर्म को शैव धर्म कहा जाता है और इसके अनुयायियों को शैव कहते हैं; भगवान शिव शैवों के प्रधान इष्टदेव हैं; शैव धर्म भारत के प्राचीनतम धर्मों में से एक है; सिंधु घाटी सभ्यता में पशुपति मुहर शैव परंपरा का प्रारंभिक साक्ष्य मानी जाती है; यह धर्म योग, तपस्या और त्याग पर बल देता है; शैव धर्म ने भारतीय सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक जीवन में गहरी छाप छोड़ी है; इसके संत, संप्रदाय और साधना पद्धतियाँ शैव परंपरा की विविधता और समृद्धि को दर्शाती हैं और पूरे भारत में आज भी इसका प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
प्रश्न 21: शैव धर्म के उदय की ठोस ऐतिहासिक जानकारी किस ग्रंथ से मिलती है?
✅ उत्तर: (B) इंडिका
शैव धर्म के उदय की ठोस ऐतिहासिक जानकारी चौथी शताब्दी ई.पू. में मेगस्थनीज के ग्रंथ ‘इंडिका’ से मिलती है; इस ग्रंथ में डायोनिसियस (शिव) और हेराक्लीज (कृष्ण) नामक दो भारतीय देवताओं का वर्णन है; यह ग्रंथ मौर्यकालीन भारत की धार्मिक स्थिति का महत्वपूर्ण विदेशी साक्ष्य है; मेगस्थनीज ने भारतीय धर्म और धार्मिक परंपराओं को यूनानी दृष्टिकोण से समझाने का प्रयास किया; इस ग्रंथ से शैव और वैष्णव धर्म के प्रारंभिक प्रभाव, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और धार्मिक दृष्टिकोणों की जानकारी मिलती है, जो प्राचीन भारतीय धार्मिक इतिहास का महत्वपूर्ण प्रमाण है।
प्रश्न 22: पाणिनी के अष्टाध्यायी में कितने प्रकार के शैव सम्प्रदायों का उल्लेख है?
✅ उत्तर: (C) चार
पाणिनी के ‘अष्टाध्यायी’ में चार प्रकार के शैव सम्प्रदायों का उल्लेख किया गया है – शैव, पाशुपत, कापालिक और कालामुख; इनमें पाशुपत सम्प्रदाय को सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध माना जाता है; प्रत्येक सम्प्रदाय की अपनी विशिष्ट साधना पद्धति और दार्शनिक मान्यताएं थीं; शैव सम्प्रदायों के माध्यम से शैव धर्म की विविधता, आध्यात्मिक दृष्टिकोण और साधना परंपरा का पता चलता है; इन सम्प्रदायों का प्रभाव प्राचीन भारतीय धार्मिक इतिहास में स्पष्ट है और ये योग, तपस्या और त्याग के महत्व को भी दर्शाते हैं; पाशुपत सम्प्रदाय विशेषकर समाज और राजसत्ता में अपने आध्यात्मिक तथा राजनीतिक प्रभाव के लिए प्रसिद्ध था।
प्रश्न 23: पाशुपत सम्प्रदाय के प्रवर्तक कौन थे?
✅ उत्तर: (B) लकुलीश
पाशुपत सम्प्रदाय के प्रवर्तक लकुलीश थे, जिन्हें शिव का अट्ठाईसवां और अंतिम अवतार माना जाता है; उन्होंने गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में कायावरोहण (करवन) नामक स्थान के श्मशान घाट में शिव के अवतार के रूप में जन्म लिया माना जाता है; पाशुपत सम्प्रदाय योग और तपस्या पर विशेष बल देता है और यह शैवों का सबसे प्राचीन संगठित सम्प्रदाय माना गया; इसका उद्देश्य आध्यात्मिक साधना, आत्मा की मुक्ति और तपस्वी जीवन के माध्यम से शिव की भक्ति को बढ़ावा देना था; पाशुपत सम्प्रदाय ने प्राचीन भारत में शैव धर्म की सामाजिक और धार्मिक संरचना पर गहरा प्रभाव डाला।
प्रश्न 24: कापालिकों के इष्ट देव कौन थे?
✅ उत्तर: (B) भैरव
कापालिक सम्प्रदाय के इष्ट देव भैरव थे, जिन्हें शिव के उग्र अवतार के रूप में माना जाता है; इस सम्प्रदाय के अनुयायी भैरव को सृजन और संहार करने वाला मानते थे; कापालिक सम्प्रदाय की साधना पद्धति अत्यंत कठोर और रहस्यमय थी; वे मानव खोपड़ी (कपाल) को धारण करते थे, जिससे उनका नाम कापालिक पड़ा; यह सम्प्रदाय तांत्रिक परंपरा से जुड़ा था; कापालिक सम्प्रदाय ने शैव धर्म में अत्यधिक उग्र साधना, तांत्रिक अनुष्ठान और रहस्यवाद को बढ़ावा दिया; इसका उद्देश्य शिव की शक्ति और तंत्र साधना के माध्यम से आध्यात्मिक शक्ति और मोक्ष प्राप्त करना था।
प्रश्न 25: नयनार संतों की संख्या कितनी बताई गई है?
✅ उत्तर: (C) 63
ग्रंथों में नयनार संतों की संख्या तिरसठ (63) बताई गई है; ये शैव धर्म के भक्त संत थे जिन्होंने पल्लव काल में दक्षिण भारत में शैव भक्ति आंदोलन का नेतृत्व किया; प्रमुख नयनार संतों में अप्पार, सुंदरमूर्ति, मणिक्कवाचगर और संबंदर शामिल हैं; इन संतों ने तमिल भाषा में शिव स्तुति काव्य की रचना की जो ‘तेवारम’ नामक संग्रह में संकलित है; नयनार संतों की रचनाएँ भक्ति भावना, सामाजिक समरसता और शैव धर्म की प्रचार का महत्वपूर्ण स्रोत मानी जाती हैं; उनके काव्य और स्तोत्र शैव धर्म की परंपरा, दर्शन और सांस्कृतिक जीवन में गहरी छाप छोड़ते हैं।
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