प्राचीन भारत का इतिहास भाग-24 MCQ-2026
वैदिक काल MCQ: लोहे, परिवार और स्त्रियों के महत्वपूर्ण MCQ 2026
वैदिक काल भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण दौर है, जिसमें लोहे का उपयोग, परिवार व्यवस्था और स्त्रियों की स्थिति जैसे विषय विशेष रूप से विकसित हुए। इन टॉपिक्स से जुड़े प्रश्न प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पूछे जाते हैं। इस पोस्ट में दिए गए MCQs आपको इन महत्वपूर्ण पहलुओं को आसानी से समझने और जल्दी रिवाइज करने में मदद करेंगे। अगर आप UPSC, SSC या UPPCS की तैयारी कर रहे हैं, तो यह क्विज़ आपके लिए बेहद उपयोगी और स्कोर बढ़ाने वाला साबित होगा।
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प्रश्न 1. लोहे का बड़े पैमाने पर प्रयोग पहली बार कब हुआ?
(A) 1500 ई.पू.
(B) 1000 ई.पू.
(C) छठी शताब्दी ई.पू.
(D) तीसरी शताब्दी ई.पू.
✅ उत्तर: (C) छठी शताब्दी ई.पू.
आर्य लोग लगभग 1000 ई.पू. में लोहे से परिचित हो चुके थे, लेकिन उस समय इसका उपयोग बहुत सीमित था और यह सामान्य जीवन में अधिक प्रचलित नहीं था। बाद में छठी शताब्दी ई.पू. में लोहे का बड़े पैमाने पर व्यापक प्रयोग शुरू हुआ, जिसने भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। लोहे से बने मजबूत औजारों और हथियारों के कारण जंगलों को साफ करना आसान हो गया और कृषि का विस्तार तेजी से हुआ। इससे गंगा के उपजाऊ मैदानी क्षेत्रों में नई बस्तियों और राज्यों का विकास हुआ और महाजनपदों का उदय हुआ। इसी समय भारतीय इतिहास में दो महान धर्म सुधारक भगवान बुद्ध और भगवान महावीर का भी उदय हुआ, जिन्होंने समाज और धर्म को नई दिशा दी। इसलिए छठी शताब्दी ई.पू. का काल भारतीय इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और परिवर्तनकारी काल माना जाता है।
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प्रश्न 2. ऋग्वैदिक काल में परिवार कितनी पीढ़ियों का संयुक्त परिवार होता था?
(A) 2 से 3 पीढ़ी
(B) 3 से 4 पीढ़ी
(C) 4 से 5 पीढ़ी
(D) केवल एक पीढ़ी
✅ उत्तर: (B) 3 से 4 पीढ़ी
ऋग्वैदिक काल में परिवार सामान्यतः संयुक्त परिवार के रूप में रहता था, जिसमें लगभग 3 से 4 पीढ़ियों के लोग एक साथ निवास करते थे। इस समय परिवार समाज की सबसे महत्वपूर्ण इकाई माना जाता था। माता-पिता और भाई-बहन को छोड़कर अन्य सभी संबंधियों को ‘नप्तृ’ कहा जाता था। वैदिक समाज पितृसत्तात्मक था, इसलिए परिवार में पुरुष की प्रधानता रहती थी। परिवार के मुखिया को ‘कुलप’ कहा जाता था, जिसके हाथ में परिवार का नियंत्रण और निर्णय लेने का अधिकार होता था। संयुक्त परिवार व्यवस्था के कारण परिवार के सभी सदस्य एक-दूसरे की सहायता करते थे, जिससे सामाजिक सुरक्षा बनी रहती थी। साथ ही कृषि और पशुपालन जैसे कार्यों में सभी लोग मिलकर भाग लेते थे, जिससे आर्थिक गतिविधियाँ मजबूत होती थीं।
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प्रश्न 3. ऋग्वैदिक काल में माता-पिता और भाई-बहन को छोड़कर शेष संबंधियों को क्या कहते थे?
(A) कुलप
(B) नप्तृ
(C) अमाजू
(D) क्षेत्रज
✅ उत्तर: (B) नप्तृ
ऋग्वैदिक काल में पारिवारिक संबंधों को स्पष्ट रूप से समझाने के लिए विभिन्न शब्दों का प्रयोग किया जाता था। इस काल में माता-पिता और भाई-बहन को छोड़कर अन्य सभी संबंधियों को ‘नप्तृ’ कहा जाता था। इसमें चाचा, मामा, फूफा, दादा, नाना आदि अनेक प्रकार के संबंधी शामिल होते थे। यह शब्द उस समय के पारिवारिक संबंधों के विशेष वर्गीकरण को दर्शाता है। ऋग्वैदिक समाज में परिवार सामाजिक व्यवस्था की मूल इकाई माना जाता था और परिवार का संगठन काफी मजबूत था। परिवार का मुखिया ‘कुलप’ कहलाता था, जिसके पास परिवार के संचालन और निर्णय लेने का अधिकार होता था। कुलप परिवार के सभी सदस्यों का नेतृत्व करता था और सामाजिक तथा आर्थिक कार्यों में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती थी।
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प्रश्न 4. ऋग्वैदिक काल में परिवार के मुखिया को क्या कहा जाता था?
(A) नप्तृ
(B) अमाजू
(C) कुलप
(D) ब्रह्मवादिनी
✅ उत्तर: (C) कुलप
ऋग्वैदिक काल में परिवार के मुखिया को ‘कुलप’ कहा जाता था। कुलप परिवार का प्रमुख होता था और उसके पास परिवार के सभी सदस्यों पर नियंत्रण रखने तथा महत्वपूर्ण निर्णय लेने का अधिकार होता था। वह परिवार का प्रतिनिधि और संरक्षक दोनों माना जाता था। उस समय का समाज पितृसत्तात्मक था, इसलिए परिवार में पुरुष की प्रधानता होती थी। सामाजिक संगठन की संरचना भी क्रमबद्ध थी, जिसमें परिवार सबसे छोटी इकाई थी। कई परिवार मिलकर ‘कुल’ बनाते थे और कई कुल मिलकर ‘ग्राम’ या ‘गण’ का निर्माण करते थे। इसके बाद विश और जन जैसी बड़ी इकाइयाँ बनती थीं। इसके अलावा दूर के संबंधियों के लिए ‘नप्तृ’ शब्द का प्रयोग किया जाता था।
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प्रश्न 5. ऋग्वैदिक काल में निम्नलिखित में से कौन-सी प्रथा प्रचलित नहीं थी?
(A) विधवा पुनर्विवाह
(B) महिलाओं की शिक्षा
(C) बाल विवाह
(D) नियोग प्रथा
✅ उत्तर: (C) बाल विवाह
ऋग्वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति समाज में अपेक्षाकृत सम्मानजनक और स्वतंत्र मानी जाती थी। इस काल में बाल-विवाह, सती प्रथा तथा पर्दा प्रथा का प्रचलन नहीं था, जिससे महिलाओं को सामाजिक जीवन में सक्रिय भागीदारी का अवसर मिलता था। विधवा विवाह को भी समाज में स्वीकृति प्राप्त थी और स्त्रियों को शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार था। कई स्त्रियाँ विदुषी थीं और उन्होंने ऋग्वेद के मंत्रों के संकलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिनमें लोपामुद्रा, घोषा और अपाला जैसी ऋषिकाओं का उल्लेख मिलता है। इसके अतिरिक्त स्त्रियों को नियोग प्रथा के अंतर्गत संतान प्राप्ति का अधिकार भी प्राप्त था। इससे स्पष्ट होता है कि उस समय स्त्रियों की सामाजिक स्थिति अपेक्षाकृत सुदृढ़ थी। हालांकि उत्तर वैदिक काल में धीरे-धीरे उनकी स्थिति में गिरावट आने लगी और बाल-विवाह, पर्दा प्रथा जैसी कुप्रथाएँ विकसित हो गईं।
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प्रश्न 6. ऋग्वैदिक काल में ‘नियोग प्रथा’ क्या थी?
(A) एक से अधिक पत्नी
(B) निःसंतान महिला द्वारा संतान प्राप्ति
(C) विधवा विवाह
(D) बाल विवाह
✅ उत्तर: (B) निःसंतान महिला द्वारा संतान प्राप्ति
ऋग्वैदिक काल में नियोग प्रथा का उल्लेख मिलता है, जिसके अंतर्गत यदि किसी दंपत्ति को संतान नहीं होती थी तो महिला को संतान प्राप्ति के लिए परिवार के किसी निकट संबंधी, विशेषकर देवर के साथ संबंध स्थापित करने की अनुमति दी जाती थी। इस व्यवस्था का उद्देश्य वंश परंपरा को बनाए रखना और परिवार में उत्तराधिकारी की कमी को दूर करना था। इस प्रकार उत्पन्न संतान को ‘क्षेत्रज’ कहा जाता था, जिसमें ‘क्षेत्र’ का अर्थ स्त्री या गर्भधारण का स्थान और ‘ज’ का अर्थ जन्मा हुआ होता है। इस प्रथा को उस समय समाज में एक व्यावहारिक और स्वीकृत समाधान के रूप में देखा जाता था। प्राचीन ग्रंथों, विशेषकर महाभारत में भी नियोग प्रथा के उदाहरण मिलते हैं, जैसे धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म। इससे यह स्पष्ट होता है कि उस काल में वंश की निरंतरता को अत्यधिक महत्व दिया जाता था।
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प्रश्न 7. नियोग प्रथा से उत्पन्न संतान को क्या कहा जाता था?
(A) अमाजू
(B) ब्रह्मवादिनी
(C) क्षेत्रज
(D) नप्तृ
✅ उत्तर: (C) क्षेत्रज
नियोग प्रथा के अंतर्गत उत्पन्न संतान को ‘क्षेत्रज’ कहा जाता था। वैदिक धर्मशास्त्रों में संतान के 12 प्रकार बताए गए हैं, जिनमें क्षेत्रज पुत्र भी एक महत्वपूर्ण प्रकार माना जाता है। ‘क्षेत्रज’ शब्द में ‘क्षेत्र’ का अर्थ स्त्री की कोख या गर्भधारण का स्थान होता है और ‘ज’ का अर्थ जन्मा हुआ है। इस प्रकार वह पुत्र जो किसी अन्य पुरुष से स्त्री की कोख में उत्पन्न होता था, लेकिन सामाजिक और पारिवारिक रूप से पति का ही पुत्र माना जाता था, उसे क्षेत्रज कहा जाता था। इस व्यवस्था का उद्देश्य मुख्य रूप से वंश परंपरा को बनाए रखना और संतानहीनता की समस्या का समाधान करना था। मनुस्मृति सहित अन्य धर्मशास्त्रों में भी क्षेत्रज पुत्र का उल्लेख मिलता है। महाभारत काल में नियोग प्रथा के अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उस समय यह एक स्वीकृत सामाजिक व्यवस्था थी।
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प्रश्न 8. ऋग्वैदिक काल में जीवन भर अविवाहित रहने वाली लड़कियों को क्या कहते थे?
(A) ब्रह्मवादिनी
(B) सद्योद्वाहा
(C) अमाजू
(D) क्षेत्रज
✅ उत्तर: (C) अमाजू
ऋग्वैदिक काल में स्त्रियों के जीवन और शिक्षा से संबंधित कई विशिष्ट श्रेणियों का उल्लेख मिलता है। जीवन भर अविवाहित रहने वाली स्त्रियों को ‘अमाजू’ कहा जाता था, जो समाज में अपेक्षाकृत स्वतंत्र रूप से जीवन व्यतीत करती थीं। वैदिक साहित्य में ‘ब्रह्मवादिनी’ उन विदुषी स्त्रियों को कहा जाता था जो आजीवन अविवाहित रहकर वेदों तथा अन्य विषयों की शिक्षा प्राप्त करती थीं और ज्ञानार्जन में अपना जीवन समर्पित करती थीं। इसके विपरीत ‘सद्योद्वाहा’ वे स्त्रियाँ थीं जो अपने विवाह तक ही शिक्षा ग्रहण करती थीं और विवाह के बाद पारिवारिक जीवन में प्रवृत्त हो जाती थीं। इन विभिन्न श्रेणियों से यह स्पष्ट होता है कि वैदिक समाज में स्त्रियों की शैक्षिक और वैवाहिक स्थिति को अलग-अलग रूपों में मान्यता प्राप्त थी। इससे यह भी ज्ञात होता है कि उस समय महिलाओं को शिक्षा और सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था।
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प्रश्न 9. ऋग्वैदिक काल में कुंआरी रहकर आजीवन शिक्षा ग्रहण करने वाली महिलाएं क्या कहलाती थीं?
(A) अमाजू
(B) ब्रह्मवादिनी
(C) सद्योद्वाहा
(D) दुहिता
✅ उत्तर: (B) ब्रह्मवादिनी
ऋग्वैदिक काल में जो स्त्रियाँ कुंआरी रहकर आजीवन शिक्षा ग्रहण करती थीं, उन्हें ‘ब्रह्मवादिनी’ कहा जाता था। ये विदुषी महिलाएँ वेदों और अन्य शास्त्रों के अध्ययन में निपुण होती थीं तथा ज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देती थीं। इस काल की अनेक ब्रह्मवादिनियों ने ऋग्वैदिक मंत्रों की रचना में भी अपना योगदान दिया। अपाला, विश्वावरी, निवावरी, लोपामुद्रा, सिक्ता और घोषा जैसी विदुषी स्त्रियाँ प्रसिद्ध ब्रह्मवादिनियों के रूप में जानी जाती हैं। इसके अतिरिक्त ‘सद्योद्वाहा’ वे स्त्रियाँ थीं जो अपने विवाह तक ही शिक्षा ग्रहण करती थीं और विवाह के पश्चात पारिवारिक जीवन में प्रवेश कर जाती थीं, जबकि ‘अमाजू’ उन स्त्रियों को कहा जाता था जो आजीवन अविवाहित रहकर जीवन व्यतीत करती थीं। इन तथ्यों से स्पष्ट होता है कि वैदिक काल में महिलाओं को शैक्षणिक स्वतंत्रता और सम्मानजनक स्थान प्राप्त था।
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प्रश्न 10. ऋग्वैदिक काल में विवाह तक ही शिक्षा ग्रहण करने वाली महिलाएं क्या कहलाती थीं?
(A) अमाजू
(B) ब्रह्मवादिनी
(C) सद्योद्वाहा
(D) लोपामुद्रा
✅ उत्तर: (C) सद्योद्वाहा
ऋग्वैदिक काल में जो महिलाएँ अपने विवाह तक ही शिक्षा ग्रहण करती थीं, उन्हें ‘सद्योद्वाहा’ कहा जाता था। ‘सद्यः’ का अर्थ तत्काल या शीघ्र होता है तथा ‘उद्वाहा’ का अर्थ विवाह है। इस प्रकार सद्योद्वाहा वे स्त्रियाँ थीं जो अल्पकाल तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद शीघ्र विवाह कर लेती थीं। उनकी शिक्षा का मुख्य उद्देश्य गृहस्थ जीवन की तैयारी और पारिवारिक दायित्वों को समझना होता था। इसके विपरीत ‘ब्रह्मवादिनी’ वे विदुषी स्त्रियाँ थीं जो आजीवन अविवाहित रहकर वेदों और शास्त्रों का अध्ययन करती थीं और ज्ञान की साधना में अपना जीवन समर्पित करती थीं। इन दोनों श्रेणियों से यह स्पष्ट होता है कि वैदिक काल में महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त था और शिक्षा व्यवस्था में स्त्री-पुरुष समानता की परंपरा देखने को मिलती है।
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प्रश्न 11. ऋग्वैदिक काल की सर्वाधिक प्रसिद्ध विदुषी कौन थीं?
(A) अपाला
(B) घोषा
(C) लोपामुद्रा
(D) विश्वावरी
✅ उत्तर: (C) लोपामुद्रा
ऋग्वैदिक काल की विदुषी महिलाओं में लोपामुद्रा सर्वाधिक प्रसिद्ध मानी जाती हैं। वे महान ऋषि अगस्त्य की पत्नी थीं और उन्होंने ऋग्वैदिक मंत्रों की रचना में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वैदिक साहित्य में लोपामुद्रा के अतिरिक्त अपाला, विश्वावरी, निवावरी, सिक्ता और घोषा जैसी अनेक विदुषी स्त्रियों का भी उल्लेख मिलता है। इन विदुषी महिलाओं को सामान्यतः ‘ऋषिकाएं’ कहा जाता था, क्योंकि उन्होंने वेदों के मंत्रों की रचना और ज्ञान के प्रसार में सक्रिय भूमिका निभाई। ऋग्वैदिक साहित्य में लगभग 30 से अधिक महिला ऋषिकाओं का उल्लेख मिलता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उस समय महिलाओं को शिक्षा और ज्ञानार्जन के क्षेत्र में सम्मानजनक स्थान प्राप्त था। इसके अतिरिक्त ऋषि अगस्त्य को विशेष रूप से दक्षिण भारत में आर्य संस्कृति के प्रसार का श्रेय दिया जाता है।
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प्रश्न 12. दक्षिण भारत में आर्य संस्कृति के प्रचार का श्रेय किसे दिया जाता है?
(A) विदेह माथव
(B) ऋषि अगस्त्य
(C) वशिष्ठ
(D) विश्वामित्र
✅ उत्तर: (B) ऋषि अगस्त्य
दक्षिण भारत में आर्य संस्कृति के प्रचार-प्रसार का श्रेय मुख्य रूप से ऋषि अगस्त्य को दिया जाता है। इसी कारण उन्हें ‘दक्षिण भारत के आर्यीकरण का प्रणेता’ भी कहा जाता है। वैदिक परंपरा के अनुसार अगस्त्य महान ऋषि थे और वे प्रसिद्ध विदुषी लोपामुद्रा के पति थे। प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि उन्होंने दक्षिण भारत में वैदिक संस्कृति, भाषा और परंपराओं के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके विपरीत पूर्वी भारत में आर्य संस्कृति के विस्तार का श्रेय विदेह माथव को दिया जाता है। ऋषि अगस्त्य का उल्लेख रामायण और महाभारत दोनों महाकाव्यों में मिलता है, जिससे उनकी ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता स्पष्ट होती है। वे विंध्य पर्वत को विनम्र करने की प्रसिद्ध कथा के कारण भी जाने जाते हैं। इसके अतिरिक्त अगस्त्य को तमिल साहित्य के आदि-संत के रूप में भी सम्मानित किया जाता है।
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प्रश्न 13. पूर्वी भारत में आर्य संस्कृति का प्रसार किसने किया था?
(A) ऋषि अगस्त्य
(B) वशिष्ठ
(C) विदेह माथव
(D) याज्ञवल्क्य
✅ उत्तर: (C) विदेह माथव
पूर्वी भारत में आर्य संस्कृति का प्रसार मुख्य रूप से विदेह माथव ने किया था। प्राचीन ग्रंथ शतपथ ब्राह्मण में उनके कार्य और यात्रा का वर्णन मिलता है। विदेह माथव के पुरोहित गौतम राहुगण थे। उन्होंने अग्नि वैश्वानर के साथ सदानीरा नदी (गंडक) तक यात्रा करके आर्य सभ्यता का विस्तार किया। माथव मिथिला (विदेह) के शासक थे, जो वर्तमान बिहार में स्थित है। दक्षिण भारत में ऋषि अगस्त्य और पूर्व में विदेह माथव के माध्यम से आर्य संस्कृति के यह वितरण इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
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प्रश्न 14. ऋग्वैदिक काल में स्त्रियों को किन संस्थाओं में भाग लेने का अधिकार था?
(A) केवल विदथ में
(B) केवल समिति में
(C) विदथ और सभा में
(D) सभा, समिति और विदथ तीनों में
✅ उत्तर: (C) विदथ और सभा में
ऋग्वैदिक काल में प्रमुख तीन संस्थाएँ थीं — विदथ, सभा और समिति। इनमें विदथ सबसे प्राचीन थी और यह धार्मिक एवं सामाजिक कार्यों के लिए आयोजित होती थी। सभा वरिष्ठ और अनुभवी लोगों की परिषद थी, जबकि समिति सामान्य जनसभा मानी जाती थी। समिति को छोड़कर विदथ और सभा दोनों में स्त्रियों की भागीदारी होती थी, जिससे उनके सामाजिक अधिकार स्पष्ट होते हैं। हालांकि, स्त्रियों को संपत्ति और राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं थे।
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प्रश्न 15. ऋग्वेद के किस मंडल में चारों वर्णों का एक साथ उल्लेख है?
(A) चौथे मंडल में
(B) छठे मंडल में
(C) आठवें मंडल में
(D) दसवें मंडल में
✅ उत्तर: (D) दसवें मंडल में
ऋग्वेद के दसवें मंडल में स्थित ‘पुरुष सूक्त’ में पहली बार चारों वर्णों — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र — का उल्लेख एक साथ मिलता है। इस सूक्त में वर्णित है कि एक विराट पुरुष के शरीर के विभिन्न अंगों से इन चारों वर्णों की उत्पत्ति हुई। ब्राह्मण मुख से, क्षत्रिय बाहु से, वैश्य जंघा से और शूद्र पैरों से उत्पन्न हुए। दसवां मंडल सबसे बाद में जोड़ा गया माना जाता है और यही कारण है कि वर्ण व्यवस्था ऋग्वैदिक काल के अंत में अस्तित्व में आई।
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प्रश्न 16. ‘पुरुष सूक्त’ ऋग्वेद के किस मंडल में है?
(A) पहले मंडल में
(B) पांचवें मंडल में
(C) दसवें मंडल में
(D) सातवें मंडल में
✅ उत्तर: (C) दसवें मंडल में
‘पुरुष सूक्त’ ऋग्वेद के दसवें मंडल में स्थित है और यह वर्ण व्यवस्था की उत्पत्तिविराट पुरुष था, जिसके शरीर से सृष्टि के विभिन्न तत्त्व और चारों वर्णों — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र — की उत्पत्ति हुई। ऋग्वेद के दसवें मंडल में कई महत्वपूर्ण सूक्त हैं, जैसे नासदीय सूक्त (सृष्टि की उत्पत्ति), पुरुष सूक्त और विवाह सूक्त। यह मंडल अन्य मंडलों की तुलना में सबसे बाद में जोड़ा गया माना जाता है और इसकी भाषा अपेक्षाकृत नई है।
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प्रश्न 17. वैदिक काल में स्त्रियों को किन दो अधिकारों से वंचित रखा गया था?
(A) शिक्षा और नियोग का अधिकार
(B) सम्पत्ति और राजनीतिक अधिकार
(C) विवाह और धर्म संबंधी अधिकार
(D) पुनर्विवाह और शिक्षा का अधिकार
✅ उत्तर: (B) सम्पत्ति और राजनीतिक अधिकार
ऋग्वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति बाद के कालों की तुलना में बेहतर थी। उन्हें शिक्षा, नियोग , और विधवा पुनर्विवाह जैसे अधिकार प्राप्त थे। वे विदथ और सभा में भी भाग ले सकती थीं। हालांकि, उन्हें संपत्ति और राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं थे; वे स्वतंत्र रूप से संपत्ति नहीं रख सकती थीं और राजनीतिक निर्णयों में उनकी भूमिका नहीं थी। यह वैदिक समाज की एक महत्त्वपूर्ण सीमा थी। आधुनिक संविधान ने इन अधिकारों को स्त्री-पुरुष के लिए समान रूप से सुनिश्चित किया है।
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प्रश्न 18. यजुर्वेद में चावल की कितनी किस्मों का उल्लेख मिलता है?
(A) तीन किस्म
(B) चार किस्म
(C) पांच किस्म
(D) सात किस्म
✅ उत्तर: (C) पांच किस्म
यजुर्वेद में चावल की पाँच किस्मों का उल्लेख है, जिनमें ‘महाव्रीहि’ सर्वोत्तम गुणवत्ता वाली मानी जाती थी। यह उत्तर वैदिक काल में कृषि के उन्नत विकास और विविधता का प्रमाण है। भारत में चावल की खेती प्राचीन काल से होती आ रही है। पुरातात्त्विक साक्ष्य बताते हैं कि भारत चावल की खेती के प्राचीनतम केंद्रों में से एक था। लहुरादेवा (उत्तर प्रदेश) में लगभग 7000-6000 ई.पू. के चावल के प्रमाण मिले हैं।
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प्रश्न 19. यजुर्वेद में वर्णित सर्वोत्तम चावल की किस्म कौन-सी थी?
(A) व्रीहि
(B) महाव्रीहि
(C) गोधूम
(D) माष
✅ उत्तर: (B) महाव्रीहि
यजुर्वेद में चावल की पाँच किस्मों का उल्लेख है, जिनमें ‘महाव्रीहि’ सर्वोत्तम गुणवत्ता वाली थी। ‘महा’ का अर्थ है महान/उत्तम और ‘व्रीहि’ चावल का प्राचीन नाम है। यजुर्वेद मुख्यतः यज्ञ-विधानों का संग्रह है और यह दो शाखाओं में विभाजित है — कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद। कृष्ण यजुर्वेद में तैत्तिरीय और काठक संहिताएं शामिल हैं, जबकि शुक्ल यजुर्वेद में वाजसनेयी संहिता है। उत्तर वैदिक काल की कृषि-उन्नति और कृषि विविधता को समझने के लिए यह जानकारी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
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प्रश्न 20. उत्तर वैदिक काल में गेहूं के लिए कौन-सा शब्द प्रयुक्त होता था?
(A) व्रीहि
(B) माष
(C) गोधूम
(D) सर्षप
✅ उत्तर: (C) गोधूम
उत्तर वैदिक काल में गेहूं को ‘गोधूम‘ कहा जाता था। माष उड़द का, व्रीहि चावल का और सर्षप सरसों का प्राचीन नाम था। इस काल में कृषि का बहुमुखी विकास हुआ और अनेक नई फसलें उगाई जाने लगीं। गेहूं की खेती भारत में सिंधु सभ्यता काल से होती आ रही है। पुरातात्त्विक खुदाई में हड़प्पा, मोहनजोदड़ो आदि स्थलों पर गेहूं के साक्ष्य मिले हैं। आज भारत विश्व के प्रमुख गेहूं उत्पादक देशों में से एक है।
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प्रश्न 21. उत्तर वैदिक काल में उड़द को क्या कहा जाता था?
(A) सर्षप
(B) व्रीहि
(C) यव
(D) माष
✅ उत्तर: (D) माष
उत्तर वैदिक काल में उड़द को ‘माष‘ कहा जाता था। सर्षप सरसों का, व्रीहि चावल का और यव जौ का प्राचीन नाम था। उड़द दाल भारत की प्राचीनतम फसलों में से एक है और वैदिक काल से इसकी खेती होती रही है। उड़द प्रोटीन का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। उत्तर वैदिक काल में दलहन फसलों की खेती भी की जाती थी। ‘माष’ शब्द बाद में ‘मांस’ और आधुनिक ‘मास’ या ‘माश’ के रूप में विकसित हुआ।
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प्रश्न 22. उत्तर वैदिक काल में सरसों को क्या कहा जाता था?
(A) माष
(B) यव
(C) गोधूम
(D) सर्षप
✅ उत्तर: (D) सर्षप
उत्तर वैदिक काल में सरसों को ‘सर्षप‘ कहा जाता था। यह शब्द संस्कृत का है, जिससे बाद में हिन्दी का ‘सरसों’ शब्द बना। माष उड़द का, यव जौ का और गोधूम गेहूं का प्राचीन नाम था। सरसों की खेती सिंधु सभ्यता काल से भी पहले भारत में होती रही है। भारत आज विश्व का सबसे बड़ा सरसों उत्पादक देश है। वैदिक काल में सरसों के तेल का उपयोग भोजन और धार्मिक अनुष्ठानों में होता था।
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प्रश्न 23. ऋग्वैदिक काल में विदथ, सभा और समिति में से कौन-सी संस्था सबसे प्राचीन मानी जाती है?
(A) सभा
(B) समिति
(C) विदथ
(D) तीनों समकालीन थीं
✅ उत्तर: (C) विदथ
ऋग्वैदिक काल की तीन प्रमुख संस्थाओं — विदथ, सभा और समिति — में विदथ सबसे प्राचीन मानी जाती है। विदथ एक जनजातीय सभा थी जहाँ धार्मिक और सामाजिक कार्य होते थे और इसमें स्त्री-पुरुष दोनों भाग लेते थे। सभा वरिष्ठ लोगों की परिषद थी और समिति जनसभा थी जिसमें सामान्य लोग भाग लेते थे। समिति में स्त्रियों की भागीदारी नहीं थी। उत्तर वैदिक काल में विदथ का महत्त्व घटने लगा। वैदिक राजनीतिक संस्थाएं भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा की जड़ें मानी जाती हैं।
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प्रश्न 24. ऋग्वैदिक काल में कौन-सी प्रथा प्रचलित थी?
(A) सती प्रथा
(B) बाल विवाह
(C) विधवा पुनर्विवाह
(D) पर्दा प्रथा
✅ उत्तर: (C) विधवा पुनर्विवाह
ऋग्वैदिक काल में विधवाओं का पुनर्विवाह होता था और इस समय सती प्रथा, बाल-विवाह और पर्दा प्रथा का प्रचलन नहीं था। ऋग्वेद में एक सूक्त का वर्णन है जिसमें विधवा को उसके देवर के साथ नए जीवन की शुरुआत का आह्वान किया गया है। उत्तर वैदिक काल और बाद के काल में स्त्रियों की स्थिति में अवनति आई। सती प्रथा के प्रमाण उत्तर वैदिक काल से मिलने लगते हैं। ब्रिटिश काल में राजा राम मोहन राय के प्रयासों से 1829 में सती प्रथा को कानूनी रूप से समाप्त किया गया।
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प्रश्न 25. ऋग्वैदिक काल में बहुपति विवाह के उदाहरण किस महाकाव्य से भी समर्थित हैं?
(A) रामायण
(B) महाभारत
(C) वाल्मीकि रामायण
(D) रघुवंश
✅ उत्तर: (B) महाभारत
ऋग्वैदिक काल में बहुपति (polyandry) और बहुपत्नी (polygamy) दोनों प्रकार के विवाहों के उदाहरण मिलते हैं। महाभारत में द्रौपदी का पांचों पांडवों से विवाह बहुपति विवाह का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है। यह प्रथा मुख्यतः संपत्ति के विभाजन से बचने के लिए अपनाई जाती थी। रामायण में राजा दशरथ की तीन रानियों के माध्यम से बहुपत्नी विवाह के उदाहरण मिलते हैं। वर्तमान में भारत में कुछ जनजातियों में बहुपति विवाह की परंपरा आज भी मौजूद है।
वैदिक काल से जुड़े लोहे के उपयोग, परिवार व्यवस्था और स्त्रियों की स्थिति जैसे विषय न केवल इतिहास को समझने में मदद करते हैं, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। इन MCQs के माध्यम से आपने इन टॉपिक्स के प्रमुख तथ्यों को सरल और प्रभावी तरीके से रिवाइज किया होगा। लगातार अभ्यास और ऐसे ही क्विज़ के जरिए आपकी तैयारी और मजबूत होगी। उम्मीद है यह पोस्ट आपके लिए उपयोगी रही होगी—इसे बार-बार पढ़ें और अपनी सफलता की ओर एक कदम और बढ़ाएं।