ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में हुए विद्रोह: एक विस्तृत अध्ययन

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भारतीय इतिहास में 18वीं और 19वीं शताब्दी का समय अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दौरान भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी शक्ति को मजबूत किया और धीरे-धीरे पूरे देश पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। 1757 ई० में प्लासी के युद्ध के बाद कंपनी एक व्यापारिक संस्था से राजनीतिक शक्ति में परिवर्तित हो गई। हालांकि, ब्रिटिश शासन की स्थापना कभी भी शांतिपूर्ण नहीं रही। देश के विभिन्न हिस्सों में किसानों, आदिवासियों, ज़मींदारों और स्थानीय शासकों ने समय-समय पर ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ विद्रोह किए। ये विद्रोह भले ही स्थानीय और सीमित रहे हों, लेकिन इन्होंने 1857 के महान विद्रोह और बाद में चले स्वतंत्रता संग्राम की नींव रखी।

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का एकमात्र उद्देश्य भारत से अधिकतम धन निकालना था। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कंपनी ने कई ऐसी नीतियां लागू कीं जो भारतीय जनता के लिए अत्यंत कष्टकारी साबित हुईं।

द्वैध शासन (1765-1772): रॉबर्ट क्लाइव द्वारा स्थापित द्वैध शासन प्रणाली ने बंगाल में प्रशासनिक अराजकता पैदा की। इस व्यवस्था के तहत कंपनी ने राजस्व वसूलने का अधिकार तो ले लिया, लेकिन प्रशासन की जिम्मेदारी नवाब पर छोड़ दी। इससे शासन में भ्रष्टाचार और अव्यवस्था बढ़ी।

स्थायी बंदोबस्त (1793): लॉर्ड कार्नवालिस द्वारा लागू की गई यह व्यवस्था बंगाल, बिहार और उड़ीसा में लागू हुई। इसके तहत ज़मींदारों को भूमि का स्थायी मालिक बना दिया गया और उन्हें एक निश्चित राजस्व सरकार को देना था। समस्या यह थी कि राजस्व की राशि बहुत अधिक थी और समय पर न देने पर ज़मींदारों की संपत्ति नीलाम कर दी जाती थी। इससे किसानों पर बोझ बढ़ा क्योंकि ज़मींदार उनसे अधिक लगान वसूलते थे।

रैयतवाड़ी बंदोबस्त: थॉमस मुनरो और रीड द्वारा मद्रास और बंबई प्रेसिडेंसी में लागू इस व्यवस्था में किसानों को सीधे सरकार को राजस्व देना होता था। सिद्धांत में यह व्यवस्था बेहतर लगती थी, लेकिन व्यवहार में राजस्व का निर्धारण भूमि की संभावित उत्पादन क्षमता के आधार पर किया जाता था, न कि वास्तविक उत्पादन के आधार पर। सूखा, बाढ़ या फसल खराब होने पर भी किसानों को पूरा राजस्व देना पड़ता था।

महालवाड़ी बंदोबस्त: हॉल्ट मैकेन्जी द्वारा पश्चिमोत्तर भारत (उत्तर प्रदेश, पंजाब) में लागू इस व्यवस्था में पूरे गांव या महाल को एक इकाई माना गया। गांव के मुखिया या लंबरदार को पूरे गांव का राजस्व जमा करना होता था। यह राशि भी अत्यधिक थी और किसानों पर इसका भारी बोझ पड़ता था।

इन सभी भू-राजस्व व्यवस्थाओं की एक मुख्य समस्या यह थी कि राजस्व बहुत अधिक था और समय पर न देने पर किसानों और ज़मींदारों को उनकी भूमि से बेदखल कर दिया जाता था। इससे कृषक वर्ग में भारी असंतोष फैला और विद्रोह की परिस्थितियां बनीं।

ब्रिटिश शासन ने आदिवासी समुदायों की पारंपरिक जीवन पद्धति को पूरी तरह से नष्ट कर दिया। सदियों से आदिवासी समुदाय जंगलों और भूमि पर सामूहिक अधिकार रखते थे। वे स्वतंत्र रूप से जंगल की उपज का उपयोग करते थे, झूम खेती करते थे और अपने सरदारों या मुखिया के नेतृत्व में स्वशासन का आनंद लेते थे।

ब्रिटिश शासन ने इस पूरी व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया। नई भू-राजस्व व्यवस्था ने भूमि के व्यक्तिगत स्वामित्व की अवधारणा लागू की और सामूहिक अधिकारों को समाप्त कर दिया। जंगलों को सरकारी संपत्ति घोषित कर दिया गया और वन उपज पर कर लगाए गए। जो चीजें आदिवासी निःशुल्क प्राप्त करते थे, अब उनके लिए शुल्क देना पड़ता था।

इसके अलावा, ब्रिटिश शासन के साथ बाहरी लोग – साहूकार, महाजन, सूदखोर और व्यापारी – आदिवासी क्षेत्रों में आए। इन लोगों ने आदिवासियों को ऋण के जाल में फंसाया और उनकी भूमि हड़प ली। सरकार की नीतियां भी इन बाहरी लोगों के पक्ष में थीं। इन सभी कारणों से आदिवासी समुदायों में गहरा असंतोष पैदा हुआ जो विद्रोहों के रूप में प्रकट हुआ।

कुछ विद्रोह धार्मिक और सामाजिक कारणों से भी हुए। ब्रिटिश शासन ने पारंपरिक धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप किया। तीर्थयात्रा पर प्रतिबंध, धार्मिक स्थलों पर कर लगाना, और ईसाई मिशनरियों को प्रोत्साहन देना – इन सभी ने लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई। संन्यासी विद्रोह इसका एक प्रमुख उदाहरण है।

कई विद्रोह धार्मिक आंदोलनों के रूप में शुरू हुए लेकिन बाद में राजनीतिक रूप ले लिया। फरायजी आंदोलन, वहाबी आंदोलन और कूका विद्रोह इसके उदाहरण हैं। ये आंदोलन धार्मिक सुधार से शुरू हुए लेकिन ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष में बदल गए।

स्थान: बंगाल नेता: केना सरकार, दिजी नारायण और भवानी पाठक

संन्यासी विद्रोह 18वीं शताब्दी के अंत में बंगाल में हुआ था। इस विद्रोह की जड़ें धार्मिक और आर्थिक दोनों थीं। संन्यासी और फकीर समुदाय पारंपरिक रूप से तीर्थयात्रा करते थे और भिक्षा से अपना जीवन यापन करते थे। ब्रिटिश प्रशासन ने तीर्थयात्रा पर प्रतिबंध लगाए और उन पर कर लगाया। इससे इन समुदायों की आजीविका प्रभावित हुई।

1770 ई० में बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा जिसे “छियत्तर का अकाल” कहा जाता है। इस अकाल में लगभग एक तिहाई आबादी की मौत हो गई। अकाल के बाद की अराजकता और कष्ट ने संन्यासियों को विद्रोह के लिए प्रेरित किया। उन्होंने ब्रिटिश सैनिकों और अधिकारियों पर हमले किए, राजस्व कार्यालयों को लूटा और स्थानीय ज़मींदारों से धन वसूला।

इस विद्रोह को दबाने के लिए ब्रिटिश गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स को कई सैन्य अभियान चलाने पड़े। विद्रोह लगभग चार दशकों तक चला और अंततः 1800 ई० के आसपास समाप्त हुआ। महान बंगाली उपन्यासकार बंकिमचंद्र चटर्जी ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास “आनंदमठ” में इस विद्रोह का जीवंत चित्रण किया है। इसी उपन्यास में “वन्दे मातरम्” गीत है जो बाद में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का प्रेरणा गीत बना।

स्थान: बंगाल नेता: मजनूम शाह और चिराग अली शाह

फकीर विद्रोह संन्यासी विद्रोह के समानांतर चला। मुस्लिम फकीरों ने भी ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ हथियार उठाए। मजनूम शाह एक साहसी नेता थे जिन्होंने अंग्रेजों को खुली चुनौती दी। उन्होंने ज़मींदारों और किसानों से स्वयं धन वसूलना शुरू किया और ब्रिटिश अधिकारियों की अवहेलना की।

मजनूम शाह के बाद चिराग अली शाह ने विद्रोह का नेतृत्व संभाला और इसे बंगाल के उत्तरी जिलों तक विस्तारित किया। इस विद्रोह की एक विशेषता यह थी कि इसमें हिंदू और मुसलमान दोनों ने भाग लिया। भवानी पाठक और देवी चौधरानी जैसे हिंदू नेताओं ने फकीरों का साथ दिया। यह सांप्रदायिक सद्भाव का एक अच्छा उदाहरण था।

ब्रिटिश सरकार ने इस विद्रोह को दबाने के लिए कठोर उपाय किए। 19वीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में यह विद्रोह धीरे-धीरे कमजोर हो गया, लेकिन इसने ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रतिरोध की भावना को जीवित रखा।

स्थान: उत्तर-पूर्वी बंगाल नेता: करम शाह और टीपू

पागलपंथी एक अर्द्ध-धार्मिक संप्रदाय था जिसकी स्थापना करम शाह ने की थी। “पागलपंथी” शब्द का अर्थ है “पागलों का पंथ” – यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि ये लोग अपनी धार्मिक प्रथाओं में अत्यधिक भावुक और उत्साही होते थे। इस पंथ में हिंदू, मुसलमान, गारो और हाजोंग आदिवासी शामिल थे, जो इसकी सार्वभौमिक अपील को दर्शाता है।

1813 ई० में टीपू (करम शाह के पुत्र) के नेतृत्व में पागलपंथियों ने किसानों को ज़मींदारों के शोषण के खिलाफ संगठित किया। उन्होंने ज़मींदारों की संपत्ति पर हमले किए और किसानों से न्याय की मांग की। लगभग दो दशकों तक ये विद्रोही अंग्रेजों और ज़मींदारों से लड़ते रहे।

ब्रिटिश सरकार ने शुरू में इसे एक स्थानीय समस्या समझा, लेकिन जब विद्रोह बढ़ता गया तो उन्होंने सैन्य बल का प्रयोग किया। 1833 ई० में टीपू को गिरफ्तार कर लिया गया और विद्रोह का दमन हो गया। हालांकि, इस विद्रोह ने किसान असंतोष की गहराई को उजागर किया।

स्थान: बंगाल (फरीदपुर क्षेत्र) नेता: हाजी शरीयतउल्लाह और दूदू मियां

फरायजी आंदोलन इस्लाम के धार्मिक सुधार आंदोलन के रूप में शुरू हुआ। “फरायजी” का अर्थ है “कर्तव्यों का पालन करने वाला”। हाजी शरीयतउल्लाह ने मुसलमानों को इस्लाम के मूल सिद्धांतों की ओर लौटने के लिए प्रेरित किया और अंधविश्वासों का विरोध किया।

हालांकि, जब ब्रिटिश शासन ने भू-राजस्व बढ़ाया और किसानों को बेदखल करना शुरू किया, तो यह आंदोलन राजनीतिक हो गया। शरीयतउल्लाह के पुत्र दूदू मियां ने आंदोलन को नई दिशा दी। उन्होंने समतावादी विचारधारा अपनाई और घोषणा की कि “सभी मनुष्य समान हैं और भूमि पर केवल ईश्वर का अधिकार है। किसी भी मनुष्य को किसानों की आय पर कर लगाने का अधिकार नहीं है।”

दूदू मियां ने किसानों को संगठित किया और ज़मींदारों के खिलाफ संघर्ष चलाया। उन्होंने एक समानांतर प्रशासन की स्थापना की और ज़मींदारों को लगान देने से इनकार किया। ब्रिटिश सरकार और ज़मींदारों ने मिलकर इस आंदोलन का दमन किया। दूदू मियां को कई बार गिरफ्तार किया गया। अंततः फरायजी आंदोलन कमजोर हो गया और इसके कई अनुयायी वहाबी आंदोलन में शामिल हो गए।

स्थान: महाराष्ट्र (पश्चिमी घाट क्षेत्र) नेता: चित्तर सिंह

रामोसी समुदाय मराठा साम्राज्य में सैनिक और पुलिस के रूप में सेवा करता था। वे किलों की रक्षा करते थे और कानून-व्यवस्था बनाए रखते थे। मराठा साम्राज्य के पतन के बाद जब अंग्रेजों ने इस क्षेत्र पर नियंत्रण कर लिया, तो रामोसियों को सेवा से बेदखल कर दिया गया।

बेरोजगार होकर रामोसी लोगों ने खेती करना शुरू किया, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने उन पर भारी भू-राजस्व लगा दिया। राजस्व वसूली के तरीके भी अत्यंत कठोर थे। समय पर राजस्व न देने पर उनकी संपत्ति जब्त कर ली जाती थी और उन्हें शारीरिक दंड दिया जाता था।

चित्तर सिंह के नेतृत्व में रामोसी लोगों ने 1822 ई० में विद्रोह कर दिया। उन्होंने राजस्व कार्यालयों पर हमले किए और ब्रिटिश अधिकारियों को चुनौती दी। ब्रिटिश सरकार ने शुरू में सैन्य बल से इसे दबाने की कोशिश की, लेकिन रामोसी पहाड़ी इलाकों में छापामार युद्ध में माहिर थे।

अंततः ब्रिटिश सरकार ने समझौते का रास्ता अपनाया। उन्होंने रामोसियों के अपराधों को माफ कर दिया, उन्हें भू-अनुदान दिए और कई लोगों को पहाड़ी पुलिस में भर्ती कर लिया। यह उन कुछ विद्रोहों में से एक था जहां सरकार को समझौता करना पड़ा।

स्थान: खानदेश (महाराष्ट्र) नेता: सेवरम

भील एक आदिवासी समुदाय है जो पश्चिम भारत के पहाड़ी और जंगली इलाकों में रहता है। वे शिकार, मछली पकड़ने और झूम खेती पर निर्भर थे। 1818 ई० में जब अंग्रेजों ने खानदेश पर अधिकार कर लिया, तो भीलों की पारंपरिक जीवन शैली खतरे में पड़ गई।

ब्रिटिश सरकार ने भीलों पर भू-राजस्व लगाया और उनकी पारंपरिक अधिकारों को सीमित कर दिया। जंगल की उपज पर भी कर लगाए गए। इससे भीलों की आर्थिक स्थिति खराब हो गई। भीलों ने अपने अस्तित्व के लिए विद्रोह कर दिया।

1825 ई० में सेवरम के नेतृत्व में यह विद्रोह और भी शक्तिशाली हो गया। भील योद्धा पहाड़ों में छुपकर छापामार हमले करते थे। वे तीर-धनुष और स्थानीय हथियारों का प्रयोग करते थे। ब्रिटिश सेना को इन्हें नियंत्रित करने में काफी कठिनाई हुई।

अंततः ब्रिटिश सरकार ने सैन्य बल और समझौते दोनों का उपयोग किया। कुछ भील नेताओं को रियायतें दी गईं और कुछ को दंडित किया गया। 1831 ई० तक विद्रोह काफी हद तक समाप्त हो गया, लेकिन भीलों में असंतोष जारी रहा।

स्थान: छोटानागपुर (झारखंड) नेता: बुद्धो भगत

कोल आदिवासी छोटानागपुर के पठारी इलाकों में रहते थे। सदियों से वे अपने सरदारों और राजा के नेतृत्व में स्वशासन का आनंद लेते थे। उनकी अपनी पारंपरिक कानून व्यवस्था थी और वे सामूहिक रूप से भूमि पर खेती करते थे।

1820 के दशक में ब्रिटिश शासन ने इस क्षेत्र में हस्तक्षेप करना शुरू किया। अंग्रेजों ने कोलों के पारंपरिक नेताओं की शक्ति को कम किया और उनके किलों को तोड़ दिया। नई भू-राजस्व व्यवस्था लागू की गई जिसने सामूहिक स्वामित्व को व्यक्तिगत स्वामित्व में बदल दिया।

इसके साथ ही बाहरी लोग – साहूकार, जमींदार और व्यापारी – इस क्षेत्र में आए। इन लोगों ने कोलों को ऋण के जाल में फंसाया और उनकी भूमि हड़प ली। कोल लोग अपने ही क्षेत्र में बेगार करने के लिए मजबूर हो गए।

1831 ई० में बुद्धो भगत के नेतृत्व में कोलों ने विद्रोह कर दिया। उन्होंने बाहरी लोगों पर हमले किए, ब्रिटिश अधिकारियों को मार डाला और अपने पारंपरिक अधिकारों की बहाली की मांग की। विद्रोह राँची, हजारीबाग और पलामू तक फैल गया।

ब्रिटिश सरकार ने इस विद्रोह को बहुत गंभीरता से लिया क्योंकि यह एक बड़े क्षेत्र में फैल गया था। उन्होंने बड़ी सैन्य टुकड़ियां भेजीं और कठोरता से विद्रोह का दमन किया। हजारों कोल मारे गए या गिरफ्तार किए गए। 1832 ई० तक विद्रोह समाप्त हो गया।

स्थान: त्रावणकोर (केरल) नेता: वेलू थम्पी

वेलू थम्पी त्रावणकोर रियासत के दीवान (प्रधानमंत्री) थे। लॉर्ड वेलेजली की सहायक संधि नीति ने इस विद्रोह को जन्म दिया। सहायक संधि के तहत भारतीय रियासतों को एक ब्रिटिश सेना रखनी पड़ती थी और इसके खर्च का भुगतान करना होता था। यह खर्च इतना अधिक था कि छोटी रियासतों के लिए इसे वहन करना लगभग असंभव था।

1805 ई० में त्रावणकोर के महाराजा को सहायक संधि करने के लिए बाध्य किया गया। इससे रियासत पर भारी वित्तीय बोझ पड़ा। जब वेलू थम्पी ने इसका विरोध किया, तो अंग्रेजों ने उन्हें दीवान के पद से हटा दिया।

वेलू थम्पी ने 1809 ई० में खुला विद्रोह कर दिया। उन्होंने स्थानीय सेना और नायर बटालियन का समर्थन प्राप्त किया। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ एक स्वतंत्रता संग्राम की घोषणा की और स्थानीय शासकों से भी सहायता मांगी।

ब्रिटिश सेना ने विद्रोह को कुचलने के लिए बड़े पैमाने पर कार्रवाई की। कई युद्धों में वेलू थम्पी की सेना पराजित हुई। घायल और हताश होकर वेलू थम्पी जंगलों में भाग गए। 1809 ई० में जंगल में ही उनकी मृत्यु हो गई। उनके विद्रोह ने केरल में ब्रिटिश विरोधी भावना को मजबूत किया।

स्थान: कित्तूर (कर्नाटक) नेता: रानी चेन्नमा और राय अप्पा

कित्तूर चेन्नमा का विद्रोह भारतीय महिलाओं के साहस और नेतृत्व का एक गौरवशाली उदाहरण है। 1824 ई० में कित्तूर के राजा की मृत्यु हो गई और उनकी विधवा रानी चेन्नमा ने एक लड़के को गोद ले लिया। हालांकि, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने गोद लिए गए उत्तराधिकारी को मान्यता देने से इनकार कर दिया।

यह लॉर्ड डलहौजी की “हड़प नीति” (Doctrine of Lapse) का एक प्रारंभिक उदाहरण था, जिसके तहत बिना प्राकृतिक उत्तराधिकारी वाली रियासतों को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया जाता था। अंग्रेजों ने कित्तूर का प्रशासन अपने हाथों में लेने का प्रयास किया।

रानी चेन्नमा ने इसका कड़ा विरोध किया। अपने सेनापति राय अप्पा की सहायता से उन्होंने 1824 ई० में युद्ध की घोषणा कर दी। पहले युद्ध में चेन्नमा की सेना ने ब्रिटिश सेना को परास्त कर दिया और धारवाड़ के कलेक्टर सेंट जॉन थैकरे को मार डाला। कित्तूर की स्वतंत्रता की घोषणा कर दी गई।

हालांकि, ब्रिटिश सरकार ने बड़ी सेना भेजी और 1829 ई० में कित्तूर पर पूर्ण रूप से अधिकार कर लिया। राय अप्पा को पकड़कर फांसी दे दी गई। रानी चेन्नमा को धारवाड़ के किले में कैद कर दिया गया, जहां 1829 ई० में उनकी मृत्यु हो गई। रानी चेन्नमा को कर्नाटक में एक महान स्वतंत्रता सेनानी के रूप में याद किया जाता है।

स्थान: कोल्हापुर (महाराष्ट्र) नेता: स्थानीय गडकरी नेता

गडकरी मराठा साम्राज्य में किलों की रक्षा करने वाले अनुवांशिक कर्मचारी थे। यह पद पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता था और इन्हें कुछ भूमि भी दी जाती थी। मराठा साम्राज्य के पतन के बाद जब अंग्रेजों ने महाराष्ट्र पर नियंत्रण किया, तो गडकरियों को सेवा से हटा दिया गया।

बेरोजगार गडकरियों ने कृषि कार्य अपनाया। हालांकि, ब्रिटिश सरकार ने उन पर भारी भू-राजस्व लगा दिया। राजस्व की दर इतनी अधिक थी कि गडकरियों के लिए इसे चुकाना कठिन हो गया। कई लोगों की भूमि जब्त कर ली गई।

1844 ई० में कोल्हापुर में गडकरियों ने विद्रोह कर दिया। उन्होंने राजस्व देने से इनकार किया और ब्रिटिश अधिकारियों पर हमले किए। हालांकि, यह विद्रोह बहुत संगठित नहीं था और ब्रिटिश सेना ने शीघ्र ही इसे दबा दिया। 1845 ई० तक विद्रोह समाप्त हो गया।

स्थान: पंजाब नेता: भगत जवाहर मल (सियान साहब) और बाबा रामसिंह

कूका आंदोलन सिख धर्म में सुधार आंदोलन के रूप में शुरू हुआ। इसके संस्थापक भगत जवाहर मल (जिन्हें सियान साहब कहा जाता था) ने सिख धर्म में प्रचलित कुरीतियों – मूर्ति पूजा, जाति व्यवस्था, और अंधविश्वासों – का विरोध किया। उन्होंने सादा जीवन, कीर्तन और नाम स्मरण पर जोर दिया।

1845 ई० में भगत जवाहर मल की मृत्यु के बाद बाबा रामसिंह ने आंदोलन का नेतृत्व संभाला। 1849 ई० में जब अंग्रेजों ने पंजाब पर विजय प्राप्त की और सिख साम्राज्य का अंत हो गया, तो कूका आंदोलन ने राजनीतिक रूप ले लिया। इसका मुख्य उद्देश्य सिख प्रभुसत्ता की बहाली और अंग्रेजों को देश से बाहर निकालना बन गया।

बाबा रामसिंह ने अपने अनुयायियों को ब्रिटिश सामान का बहिष्कार करने, सरकारी नौकरी न करने और अंग्रेजी अदालतों का उपयोग न करने के लिए प्रेरित किया। यह स्वदेशी और असहयोग का एक प्रारंभिक उदाहरण था। कूकों ने अपनी समानांतर अदालतें और प्रशासन स्थापित किया।

1871-72 ई० में कूकों और ब्रिटिश सरकार के बीच हिंसक टकराव हुए। मलेरकोटला और राइकोट में कूकों ने कसाइयों पर हमले किए (क्योंकि वे गौ-हत्या के विरोधी थे)। ब्रिटिश सरकार ने कठोर कार्रवाई की। 68 कूकों को बिना मुकदमे के तोप के मुंह पर बांधकर उड़ा दिया गया। 1872 ई० में बाबा रामसिंह को गिरफ्तार कर रंगून निर्वासित कर दिया गया, जहां 1885 ई० में उनकी मृत्यु हो गई।

कूका आंदोलन का महत्व इस बात में है कि इसने स्वदेशी, असहयोग और अहिंसा के विचारों को प्रस्तुत किया, जो बाद में महात्मा गांधी के आंदोलन में केंद्रीय बन गए।

स्थान: असम नेता: गोमधर कुंवर

अहोम असम के अभिजात वर्ग थे जिन्होंने सदियों तक असम पर शासन किया था। 1826 ई० में यांदाबू की संधि के बाद असम ब्रिटिश नियंत्रण में आ गया। अंग्रेजों ने अहोम राजा को हटाया और असम को ब्रिटिश भारत का हिस्सा बना दिया।

अहोम अभिजात वर्ग ने इसका विरोध किया क्योंकि उनकी राजनीतिक शक्ति और विशेषाधिकार समाप्त हो गए। 1828 ई० में गोमधर कुंवर के नेतृत्व में उन्होंने विद्रोह कर दिया। उन्होंने अहोम राजवंश की बहाली की मांग की।

हालांकि, ब्रिटिश सरकार ने इस बार सैन्य बल के बजाय समझौते का रास्ता अपनाया। उन्होंने अहोम नेताओं के साथ बातचीत की और कुछ रियायतें दीं। विद्रोह शांतिपूर्वक समाप्त हो गया।

स्थान: भागलपुर और राजमहल के बीच का क्षेत्र (दामिन-ए-कोह) नेता: सिद्धो और कान्हू मुर्मू

संथाल विद्रोह 19वीं शताब्दी के आदिवासी विद्रोहों में सबसे व्यापक और शक्तिशाली था। संथाल लोग छोटानागपुर और राजमहल की पहाड़ियों में रहते थे। 1832 ई० में ब्रिटिश सरकार ने संथाल परगना बनाया और संथालों को वहां बसने के लिए प्रोत्साहित किया। शुरू में संथालों को भूमि दी गई और कम राजस्व लगाया गया।

हालांकि, धीरे-धीरे स्थिति बदल गई। महाजन और साहूकार संथाल परगना में आए और संथालों को ऋण देना शुरू किया। ये साहूकार अत्यधिक ब्याज वसूलते थे – कभी-कभी 50% से 500% तक। संथाल किसान इस ऋण जाल में फंस गए। जब वे ऋण नहीं चुका पाते थे, तो साहूकार उनकी भूमि, मवेशी और यहां तक कि उनकी महिलाओं को भी हड़प लेते थे।

ब्रिटिश अधिकारी और पुलिस साहूकारों का पक्ष लेते थे। जब संथाल न्याय के लिए अदालत जाते, तो उन्हें न्याय नहीं मिलता था। इसके अलावा, रेलवे के निर्माण के लिए संथालों से बेगार ली जाती थी।

1855 ई० में चार भाइयों – सिद्धो, कान्हू, चांद और भैरव – ने संथालों को एकजुट किया। उन्होंने घोषणा की कि ठाकुर (ईश्वर) ने उन्हें अंग्रेजों और साहूकारों को निकालने का आदेश दिया है। 30 जून 1855 को भागनादीह गांव में लगभग 10,000 संथाल एकत्र हुए और विद्रोह की घोषणा की।

संथाल विद्रोहियों ने साहूकारों, ज़मींदारों, पुलिस स्टेशनों, रेलवे स्टेशनों और सरकारी कार्यालयों पर हमले किए। उन्होंने अपनी समानांतर सरकार की घोषणा की। विद्रोह तेजी से फैला और लगभग 30,000 वर्ग मील के क्षेत्र में फैल गया।

ब्रिटिश सरकार ने विद्रोह को गंभीरता से लिया। उन्होंने बड़ी संख्या में सैनिक भेजे और मार्शल लॉ लगा दिया। भागलपुर के कमिश्नर ब्राउन और मेजर लॉयड ने क्रूरतापूर्वक विद्रोह का दमन किया। हजारों संथाल मारे गए। सिद्धो और कान्हू को 1856 ई० में पकड़कर फांसी दे दी गई।

हालांकि विद्रोह असफल रहा, इसने ब्रिटिश सरकार को संथालों की समस्याओं के प्रति जागरूक किया। 1856 ई० में संथाल परगना को एक अलग जिला बनाया गया और कुछ विशेष कानून लागू किए गए जो साहूकारों के शोषण को सीमित करते थे। संथाल विद्रोह आदिवासी प्रतिरोध का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।

14. नील विद्रोह (1859-60 ई०)

स्थान: बंगाल (नादिया और जेसोर जिले) नेता: दिगंबर विश्वास और विष्णु विश्वास

नील विद्रोह भारतीय किसानों का पहला सफल संगठित विद्रोह था। 19वीं शताब्दी में यूरोपीय व्यापारियों ने बंगाल में नील की खेती को बढ़ावा दिया क्योंकि यूरोप में नील की मांग बहुत थी। नील के बागान मालिकों (जिन्हें “साहेब” कहा जाता था) ने किसानों को नील की खेती करने के लिए बाध्य किया।

नील की खेती में कई समस्याएं थीं:

  1. नील की फसल जमीन को बंजर बना देती थी
  2. नील का मूल्य बहुत कम था जबकि मेहनत बहुत अधिक
  3. किसान नील के बजाय धान उगाना चाहते थे जो उनके भोजन के लिए जरूरी था
  4. बागान मालिक किसानों को जबरन अनुबंध करवाते थे और फिर बहुत कम दाम देते थे
  5. जो किसान नील नहीं उगाना चाहते थे, उन्हें शारीरिक प्रताड़ना दी जाती थी

1859 ई० में बंगाल के नादिया जिले के गोविंदपुर गांव में पहली बार किसानों ने संगठित रूप से नील की खेती करने से इनकार कर दिया। दिगंबर विश्वास और विष्णु विश्वास के नेतृत्व में किसानों ने प्रतिज्ञा की कि वे नील नहीं उगाएंगे, चाहे कुछ भी हो जाए।

यह आंदोलन तेजी से फैला। हजारों किसानों ने नील की खेती बंद कर दी। उन्होंने बागान मालिकों का सामाजिक बहिष्कार किया। नाई, धोबी और अन्य कारीगरों ने भी बागान मालिकों की सेवा करने से इनकार कर दिया। यह एक अहिंसक लेकिन प्रभावी विरोध था।

बंगाली बुद्धिजीवियों ने इस आंदोलन का समर्थन किया। दीनबंधु मित्र ने “नील दर्पण” नाटक लिखा जिसमें बागान मालिकों के अत्याचारों का जीवंत चित्रण किया गया। हिंदू पैट्रियट के संपादक हरिशचंद्र मुखर्जी ने भी किसानों का समर्थन किया।

अंततः ब्रिटिश सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा। 1860 ई० में नील आयोग गठित किया गया। आयोग की रिपोर्ट ने किसानों के पक्ष में फैसला दिया और घोषणा की कि किसानों को नील की खेती करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। यह भारतीय किसानों की पहली बड़ी जीत थी।

नील विद्रोह का महत्व इस बात में है कि इसने दिखाया कि संगठित और अहिंसक प्रतिरोध सफल हो सकता है। बाद में महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह (1917) को नील विद्रोह से प्रेरणा मिली।

स्थान: बंगाल (पावना जिला) नेता: ईशानचंद्र राय और शंभुनाथ पाल

पावना विद्रोह बंगाली किसानों का एक महत्वपूर्ण आंदोलन था। इस समय तक बंगाल में स्थायी बंदोबस्त के कारण ज़मींदारों की शक्ति बहुत बढ़ गई थी। ज़मींदार किसानों से मनमाना लगान वसूलते थे और उन्हें अनेक अवैध कर देने के लिए बाध्य करते थे। इन करों में “अबवाब” (अतिरिक्त कर), सलामी (नजराना), और विवाह कर शामिल थे।

इसके अलावा, ज़मींदार किसानों को उनकी भूमि से बेदखल करने का प्रयास करते थे ताकि वे उस भूमि को बागान मालिकों को ऊंची कीमत पर बेच सकें। किसान जो पीढ़ियों से एक ही भूमि पर खेती कर रहे थे, अचानक बेघर हो जाते थे।

1873 ई० में पावना जिले के किसानों ने ईशानचंद्र राय और शंभुनाथ पाल के नेतृत्व में संगठित होना शुरू किया। उन्होंने “एग्रेरियन लीग” (कृषक संघ) की स्थापना की। इस संगठन ने किसानों को एकजुट किया और उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया।

पावना विद्रोह की एक विशेषता यह थी कि किसान ब्रिटिश सरकार का विरोध नहीं कर रहे थे। वे कहते थे, “हम इंग्लैंड की महारानी के किसान बनना चाहते हैं।” उनका विरोध ज़मींदारों के शोषण के खिलाफ था। वे नियमित भू-राजस्व देने के लिए तैयार थे, लेकिन अवैध करों और बेदखली का विरोध करते थे।

किसानों ने अहिंसक तरीके अपनाए। उन्होंने ज़मींदारों को अवैध कर देने से इनकार किया और सामाजिक बहिष्कार का सहारा लिया। बंगाली बुद्धिजीवियों – बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय और आर.सी. दत्त – ने इस आंदोलन का समर्थन किया।

ब्रिटिश सरकार ने स्थिति की गंभीरता को समझा और 1885 ई० में बंगाल टेनेंसी एक्ट (काश्तकारी अधिनियम) पारित किया। इस कानून ने किसानों को कुछ सुरक्षा प्रदान की। अब ज़मींदार मनमाने ढंग से किसानों को बेदखल नहीं कर सकते थे और लगान बढ़ाने पर भी सीमाएं लगाई गईं।

स्थान: रांची (छोटानागपुर) नेता: बिरसा मुंडा

बिरसा मुंडा का विद्रोह आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। बिरसा मुंडा का जन्म 1875 ई० में हुआ था। उन्होंने ईसाई मिशनरियों से शिक्षा प्राप्त की और वैष्णव धर्म से भी प्रभावित हुए। लेकिन जल्द ही उन्होंने महसूस किया कि मुंडा समुदाय का असली दुश्मन ब्रिटिश सरकार और उसकी भू-राजस्व नीतियां हैं।

ब्रिटिश सरकार ने मुंडा समुदाय की सामूहिक भूमि स्वामित्व की परंपरा को नष्ट कर दिया और व्यक्तिगत स्वामित्व की व्यवस्था लागू की। इससे बाहरी लोग – ज़मींदार और साहूकार – आदिवासी भूमि हड़पने में सफल हो गए। मुंडा लोग अपनी ही जमीन पर बेगार करने के लिए मजबूर हो गए।

बिरसा मुंडा ने धार्मिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर आंदोलन शुरू किया। धार्मिक स्तर पर, उन्होंने मुंडा धर्म की शुद्धि का आह्वान किया और बाहरी प्रभावों को हटाने का प्रयास किया। उन्होंने खुद को “भगवान का दूत” घोषित किया और मुंडा लोगों को एकजुट करना शुरू किया।

राजनीतिक स्तर पर, बिरसा ने “उलगुलान” (महान विद्रोह) की घोषणा की। उनका नारा था “अबुआ दिसुम रे अबुआ राज” (हमारे देश में हमारा राज)। उन्होंने ज़मींदारों और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष का आह्वान किया।

1899-1900 ई० में मुंडा विद्रोहियों ने ज़मींदारों, पुलिस स्टेशनों और सरकारी कार्यालयों पर हमले किए। इस विद्रोह की एक विशेषता यह थी कि मुंडा महिलाओं ने भी सक्रिय रूप से भाग लिया।

ब्रिटिश सरकार ने कठोरता से विद्रोह का दमन किया। 1900 ई० में बिरसा मुंडा को गिरफ्तार कर लिया गया। रांची जेल में रहस्यमय परिस्थितियों में 9 जून 1900 को उनकी मृत्यु हो गई। उनकी उम्र केवल 25 वर्ष थी।

बिरसा मुंडा की मृत्यु के बाद भी उनका प्रभाव जारी रहा। ब्रिटिश सरकार ने 1908 ई० में छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट पारित किया, जिसने आदिवासियों की सामूहिक भूमि को कुछ सुरक्षा प्रदान की। बिरसा मुंडा को आज झारखंड में एक महान नायक के रूप में याद किया जाता है।

स्थान: महाराष्ट्र (पुणे क्षेत्र) नेता: वासुदेव बलवंत फड़के

वासुदेव बलवंत फड़के का आंदोलन भारतीय क्रांतिकारी गतिविधियों का एक प्रारंभिक उदाहरण है। फड़के एक शिक्षित व्यक्ति थे जो ब्रिटिश शासन के आर्थिक शोषण से गहरे रूप से क्षुब्ध थे। उन्होंने महसूस किया कि ब्रिटिश शासन भारत को गरीब बना रहा है और इससे छुटकारा पाने के लिए सशस्त्र संघर्ष आवश्यक है।

1879 ई० में फड़के ने रामोसी आदिवासियों और ग्रामीण किसानों का एक संगठन बनाया। उन्होंने छापामार युद्ध की रणनीति अपनाई। उनकी योजना थी:

  1. ज़मींदारों और धनी लोगों को लूटकर धन इकट्ठा करना
  2. इस धन से हथियार खरीदना और सेना बनाना
  3. संचार व्यवस्था (टेलीग्राफ लाइनें, रेलवे) को नष्ट करना
  4. अंततः ब्रिटिश शासन के खिलाफ पूर्ण विद्रोह करना

फड़के के अनुयायियों ने कई सरकारी कार्यालयों और ज़मींदारों की संपत्तियों पर हमले किए। उन्होंने टेलीग्राफ लाइनों को काटा और रेलवे लाइनों को क्षतिग्रस्त किया। फड़के ने स्थानीय लोगों से धन एकत्र किया और उन्हें यह विश्वास दिलाया कि वे मराठा साम्राज्य को फिर से स्थापित करेंगे।

हालांकि, 1880 ई० में फड़के को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। जेल में उनका स्वास्थ्य बिगड़ता गया और 1883 ई० में उनकी मृत्यु हो गई।

फड़के का आंदोलन भले ही असफल रहा, लेकिन इसने भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन की नींव रखी। बाद में महाराष्ट्र में चापेकर बंधुओं और विनायक दामोदर सावरकर जैसे क्रांतिकारियों को फड़के से प्रेरणा मिली।

स्थान: मालाबार (केरल) नेता: विभिन्न स्थानीय नेता और अली मुसालियार (1921)

मोपला विद्रोह एक लंबे समय तक चलने वाला कृषक असंतोष था। मोपला मालाबार के मुस्लिम किसान थे जो मुख्यतः हिंदू ज़मींदारों के अधीन काम करते थे। यह विद्रोह मुख्यतः आर्थिक था, न कि धार्मिक, हालांकि बाद में इसे सांप्रदायिक रंग दे दिया गया।

मालाबार में ब्रिटिश शासन ने स्थायी बंदोबस्त लागू किया जिससे हिंदू ज़मींदारों के अधिकार बहुत बढ़ गए। ज़मींदार मनमाने ढंग से मोपला किसानों को उनकी भूमि से बेदखल कर सकते थे। लगान भी बहुत अधिक था।

1836 ई० से लेकर 1921 ई० तक लगभग 22 मोपला विद्रोह हुए। ये अधिकतर स्थानीय और छोटे पैमाने के थे। मोपला किसान ज़मींदारों पर हमला करते थे और उनकी संपत्तियों को नष्ट करते थे।

1921-22 ई० में जब असहयोग आंदोलन अपने चरम पर था, मोपला विद्रोह फिर से भड़का। इस बार यह अधिक व्यापक और हिंसक था। अली मुसालियार के नेतृत्व में मोपलाओं ने ज़मींदारों और सरकारी अधिकारियों पर हमले किए। दुर्भाग्य से, कुछ हिंदू किसानों पर भी हमले हुए।

ब्रिटिश सरकार ने इस विद्रोह को सांप्रदायिक दंगा बताया और कहा कि मोपला हिंदुओं पर हमला कर रहे हैं। वास्तव में यह मुख्यतः एक कृषक आंदोलन था, लेकिन इसे सांप्रदायिक रूप दे दिया गया। सरकार ने कठोरता से विद्रोह का दमन किया। हजारों मोपला मारे गए या गिरफ्तार किए गए।

स्थान: गोदावरी जिला (आंध्र प्रदेश) नेता: चंद्रैय्या, सरदार जंगम, पुलीकान्त संबैय्या, तम्मान डोरा

रम्पा आंध्र प्रदेश का एक पहाड़ी क्षेत्र था जो लगभग 800 वर्ग मील में फैला था। यह गोदावरी नदी के उत्तरी किनारे से लेकर सिलेरू नदी तक था। इस क्षेत्र के आदिवासियों की अपनी पारंपरिक शासन व्यवस्था थी।

1879 ई० के रम्पा विद्रोह के तीन मुख्य कारण थे:

  1. अव्यवस्थित भू-बंदोबस्त: 1802-03 ई० के दक्षिण के स्थायी बंदोबस्त में रम्पा क्षेत्र का उचित बंदोबस्त नहीं किया गया था। भूमि के अधिकार स्पष्ट नहीं थे और इससे विवाद उत्पन्न होते रहते थे।
  2. आबकारी कानून: ब्रिटिश सरकार ने नया आबकारी कानून लागू किया जिसने ताड़ी निकालने पर रोक लगा दी। आदिवासियों के लिए ताड़ी सामाजिक और धार्मिक महत्व की थी। घरेलू उपयोग के लिए भी ताड़ी निकालने पर प्रतिबंध लगाना उनके लिए अस्वीकार्य था।
  3. अतिरिक्त कर “मोदालू पन्नु”: ठेकेदारों ने एक नया अतिरिक्त कर लगा दिया जो आदिवासियों के लिए बोझ था। यह तात्कालिक कारण बना जिसने विद्रोह को भड़काया।

चंद्रैय्या, सरदार जंगम, पुलीकान्त संबैय्या और तम्मान डोरा जैसे स्थानीय नेताओं ने आदिवासियों को संगठित किया। उन्होंने आबकारी ठेकेदारों, सरकारी अधिकारियों और बाहरी व्यापारियों पर हमले किए।

ब्रिटिश सरकार ने सैन्य बल भेजा और दमनात्मक कार्रवाई की। 1880 ई० तक विद्रोह को दबा दिया गया। हालांकि, इस विद्रोह ने सरकार को आबकारी नीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया।

ये सभी विद्रोह भले ही स्थानीय और सीमित रहे हों, लेकिन इन्होंने भारतीय जनमानस में राष्ट्रीय चेतना के बीज बोए। लोगों ने महसूस किया कि ब्रिटिश शासन उनके हितों के विरुद्ध है और उसका विरोध आवश्यक है। ये विद्रोह 1857 के महान विद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार करते हैं।

इन विद्रोहों ने किसानों और आदिवासियों को एकजुट होने और संगठित संघर्ष करने का महत्व सिखाया। नील विद्रोह और पावना विद्रोह जैसे आंदोलनों ने दिखाया कि संगठित और अहिंसक प्रतिरोध सफल हो सकता है।

इन विद्रोहों के दबाव में ब्रिटिश सरकार को कई सुधार करने पड़े। बंगाल टेनेंसी एक्ट, नील आयोग की स्थापना, छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट – ये सभी विद्रोहों के परिणाम थे। हालांकि ये सुधार पर्याप्त नहीं थे, लेकिन इन्होंने किसानों और आदिवासियों को कुछ राहत दी।

कित्तूर की रानी चेन्नमा, देवी चौधरानी और मुंडा विद्रोह में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने यह दिखाया कि स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। बाद में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की व्यापक भागीदारी इसी परंपरा का विस्तार है।

वासुदेव बलवंत फड़के और कूका आंदोलन जैसे विद्रोहों ने सशस्त्र क्रांति और असहयोग के विचारों को प्रस्तुत किया। ये विचार बाद में 20वीं शताब्दी के क्रांतिकारी आंदोलन में केंद्रीय बन गए।

1757 से 1900 ई० के बीच भारत में हुए ये सभी विद्रोह ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय जनता के गहरे असंतोष को दर्शाते हैं। ये विद्रोह भले ही असफल रहे हों और ब्रिटिश सरकार ने इन्हें कठोरता से दबा दिया हो, लेकिन इन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की नींव रखी।

इन विद्रोहों से हमें कई महत्वपूर्ण सबक मिलते हैं:

  1. औपनिवेशिक शोषण का प्रतिरोध: भारतीय जनता ने कभी भी ब्रिटिश शासन को स्वीकार नहीं किया और निरंतर इसका विरोध किया।
  2. संगठन और एकता की शक्ति: जब लोग संगठित होते हैं, तो वे शक्तिशाली बन जाते हैं। नील विद्रोह और पावना विद्रोह इसके उदाहरण हैं।
  3. अहिंसक प्रतिरोध की प्रभावशीलता: कई विद्रोह जैसे नील विद्रोह ने दिखाया कि अहिंसक तरीके भी प्रभावी हो सकते हैं।
  4. सभी वर्गों की भागीदारी: किसान, आदिवासी, महिलाएं, बुद्धिजीवी – सभी ने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया।
  5. धैर्य और दृढ़ता: कई विद्रोह दशकों तक चले। यह दिखाता है कि स्वतंत्रता के लिए संघर्ष एक लंबी प्रक्रिया है।

प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से, छात्रों को इन विद्रोहों के नेताओं, स्थान, समय और कारणों को याद रखना चाहिए। साथ ही, इन विद्रोहों के व्यापक संदर्भ और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में इनकी भूमिका को समझना भी महत्वपूर्ण है।

ये सभी विद्रोह भारतीय इतिहास के गौरवशाली अध्याय हैं जो हमें याद दिलाते हैं कि स्वतंत्रता कभी भी आसानी से नहीं मिलती – इसके लिए संघर्ष, बलिदान और अटूट साहस की आवश्यकता होती है।

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