
प्रस्तावना
- छत्रपति शिवाजी महाराज, जो मराठा साम्राज्य के संस्थापक और महान योद्धा थे, उनका निधन 3 अप्रैल, 1680 ई० को हुआ। उनकी मृत्यु के साथ ही मराठा साम्राज्य में एक बड़े संकट की शुरुआत हो गई, क्योंकि उन्होंने अपने जीवनकाल में किसी भी उत्तराधिकारी की स्पष्ट घोषणा नहीं की थी।
- शिवाजी की तीन पत्नियां थीं – साईबाई निंबालकर जो उनकी प्रथम पत्नी थीं, सोयराबाई जो द्वितीय पत्नी थीं, और पुत्तीबाई जिन्होंने शिवाजी की मृत्यु के बाद सती प्रथा का पालन करते हुए उनकी जलती चिता में प्रवेश कर अपने प्राण त्याग दिए।
- साईबाई निंबालकर के गर्भ से 1657 में शंभाजी का जन्म हुआ था, जो शिवाजी के ज्येष्ठ पुत्र थे। शंभाजी को बचपन से ही युद्ध कला, राजनीति और शासन का प्रशिक्षण दिया गया था। वे अपनी बहादुरी, सैन्य कौशल और रणनीतिक सोच के लिए जाने जाते थे।
- सोयराबाई से उत्पन्न राजाराम का जन्म 1670 में हुआ था। शिवाजी की मृत्यु के समय राजाराम की आयु केवल 10 वर्ष थी, जो शासन संभालने के लिए बहुत कम उम्र थी। इसके बावजूद, सोयराबाई ने अपने पुत्र को गद्दी पर बिठाने का प्रयास किया।
- शिवाजी की मृत्यु के तुरंत बाद सोयराबाई ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को साकार करने के लिए राजाराम को मराठा साम्राज्य का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। यह घोषणा परंपरागत उत्तराधिकार के नियमों के विपरीत थी।
- हिंदू परंपरा और राजसी नियमों के अनुसार, ज्येष्ठ पुत्र शंभाजी ही शिवाजी के वास्तविक और वैध उत्तराधिकारी थे। शंभाजी न केवल बड़े थे, बल्कि उनमें शासन करने की योग्यता और अनुभव भी था, जबकि राजाराम अभी बालक ही थे।
- इस उत्तराधिकार के विवाद ने मराठा साम्राज्य को दो गुटों में बांट दिया। एक तरफ शंभाजी के समर्थक थे जो परंपरा और योग्यता के आधार पर उन्हें सही उत्तराधिकारी मानते थे, तो दूसरी तरफ सोयराबाई और उनके समर्थक थे जो राजाराम को राजा बनाना चाहते थे।
- दोनों भाइयों के बीच गद्दी के लिए एक तीव्र संघर्ष शुरू हो गया। यह केवल भाइयों के बीच का झगड़ा नहीं था, बल्कि इसमें मराठा दरबार के विभिन्न गुट, सरदार और मंत्री भी शामिल थे। इस आंतरिक कलह ने साम्राज्य की एकता और शक्ति को कमजोर कर दिया।
- अंततः शंभाजी अपनी सैन्य शक्ति, राजनीतिक कुशलता और समर्थकों की मदद से इस संघर्ष में विजयी रहे। उन्होंने राजाराम को पराजित किया और उन्हें कैद में डाल दिया तथा 1680 में मराठा साम्राज्य के छत्रपति के रूप में सिंहासन पर आसीन हुए।
- शंभाजी का शासनकाल 1680 से 1689 तक केवल नौ वर्षों का रहा, लेकिन इस अवधि में उन्होंने मुगल सम्राट औरंगजेब के खिलाफ कई महत्वपूर्ण युद्ध लड़े। उन्होंने औरंगजेब के विद्रोही पुत्र राजकुमार अकबर को शरण और सैन्य सहायता भी प्रदान की।
- 1689 में संगमेश्वर के दुर्ग में मुगल सेना ने शंभाजी को धोखे से पकड़ लिया। औरंगजेब ने उन्हें और उनके मंत्री कवि कलश को अत्यंत क्रूरता से यातनाएं दीं और अंत में मृत्युदंड दे दिया। शंभाजी की यह वीरतापूर्ण मृत्यु मराठा इतिहास का एक दुखद अध्याय बन गई।
- शंभाजी की मृत्यु के बाद मराठों ने राजाराम को, जो अब वयस्क हो चुके थे, 19 फरवरी 1689 को अपना नया छत्रपति घोषित किया। इस प्रकार वही राजाराम जिन्हें पहले पराजित कर कैद किया गया था, अब परिस्थितियों के कारण मराठा साम्राज्य के शासक बन गए।
- यह उत्तराधिकार का संघर्ष मराठा साम्राज्य के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इसने न केवल साम्राज्य की आंतरिक राजनीति को प्रभावित किया, बल्कि मुगलों के खिलाफ चल रहे संघर्ष को भी कमजोर कर दिया। शिवाजी द्वारा स्थापित एकजुट मराठा शक्ति इस आंतरिक फूट के कारण विभाजित हो गई।
शंभाजी कौन थे?
छत्रपति शंभाजी महाराज मराठा साम्राज्य के द्वितीय छत्रपति थे, जो छत्रपति शिवाजी महाराज और उनकी प्रथम पत्नी साईबाई निंबालकर के ज्येष्ठ पुत्र थे। उनका जन्म 14 मई 1657 को पुरंदर के किले में हुआ था। मात्र ढाई वर्ष की आयु में माता के निधन के बाद उनका पालन-पोषण दादी जीजाबाई ने किया। शंभाजी महाराज ने 1680 से 1689 तक शासन किया और अपने जीवनकाल में 121 युद्ध लड़े, जिनमें सभी में विजय प्राप्त की। वे एक वीर योद्धा, कुशल रणनीतिकार, संस्कृत के विद्वान और साहित्यकार थे।
शंभाजी महाराज का इतिहास
- छत्रपति शंभाजी महाराज का जन्म 14 मई 1657 को पुरंदर किले में हुआ था। वे मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज और उनकी प्रथम पत्नी साईबाई निंबालकर के ज्येष्ठ पुत्र थे। जब शंभाजी मात्र ढाई वर्ष के थे, तभी उनकी माता का निधन हो गया, जिसके बाद उनका पालन-पोषण उनकी दादी जीजाबाई ने किया। जीजाबाई ने उनमें राष्ट्रप्रेम, धर्मप्रेम और हिंदवी स्वराज की भावना का संचार किया।
- शंभाजी ने बचपन से ही गणित, तर्कशास्त्र, भूगोल, इतिहास, पुराण, रामायण और व्याकरण का गहन अध्ययन किया। उन्होंने संस्कृत और फारसी भाषा में पारंगता हासिल की। पिता शिवाजी महाराज से उन्होंने शारीरिक प्रशिक्षण और युद्ध कला सीखी। मथुरा में अज्ञातवास के दौरान उनकी भेंट उज्जैन के विद्वान कवि कलश से हुई, जो आजीवन उनके मुख्य सलाहकार और मित्र बने रहे।
- शिवाजी की मृत्यु के समय शंभाजी पन्हाला के किले में कैद थे। जब उन्हें पता चला कि उनकी सौतेली माता सोयराबाई ने राजाराम को उत्तराधिकारी घोषित किया है, तो उन्होंने पन्हाला और रायगढ़ के किले पर अधिकार कर लिया। 20 जुलाई 1680 को कवि कलश के माध्यम से उनका राज्याभिषेक हुआ और वे मराठा साम्राज्य के द्वितीय छत्रपति बने। उन्होंने “शककर्ता” और “हिंदवी धर्मोधारक” की उपाधियां धारण कीं।
- शंभाजी महाराज ने अपने नौ वर्षीय शासनकाल में 121 युद्ध लड़े और सभी में विजय प्राप्त की। उन्होंने 1680 में बुरहानपुर पर सफल आक्रमण किया और विशाल मुगल खजाना प्राप्त किया। उन्होंने औरंगजेब के विद्रोही पुत्र राजकुमार अकबर को शरण और सैन्य सहायता प्रदान की, जिससे औरंगजेब उनका कट्टर शत्रु बन गया। शंभाजी ने संस्कृत में “बुधभूषण” और “नायिकाभेद” जैसे ग्रंथों की रचना की। वे एक महान योद्धा, विद्वान और मराठा साम्राज्य के रक्षक थे।
शंभाजी महाराज की मृत्यु कैसे हुई?
1 फरवरी 1689 को संगमेश्वर में मुगल सेनापति मुकर्रब खान ने धोखे से शंभाजी महाराज और कवि कलश को बंदी बना लिया। औरंगजेब ने उन्हें इस्लाम स्वीकार करने के लिए कहा, परंतु शंभाजी ने इंकार कर दिया। इसके बाद 40 दिनों तक उन पर अमानवीय अत्याचार किए गए – उनकी आंखें निकाली गईं, जीभ काटी गई, शरीर में चीरे लगाकर नमक भरा गया। अंततः 11 मार्च 1689 को तुलापुर में उनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े करके नदी में फेंक दिया गया। यह इतिहास की एक अत्यंत क्रूर और बर्बर हत्या थी।
शंभाजी महाराज को किसने मारा और क्यों?
- शंभाजी महाराज को मुगल बादशाह औरंगजेब ने मारा। औरंगजेब शंभाजी से इसलिए नफरत करता था, क्योंकि शंभाजी ने उसके विद्रोही पुत्र राजकुमार अकबर को शरण और सैन्य सहायता प्रदान की थी। इसके अलावा, शंभाजी ने मुगल साम्राज्य के खिलाफ लगातार युद्ध लड़े और बुरहानपुर जैसे मुगल शहरों को लूटा था। शंभाजी के बहनोई गनोजी शिर्के ने विश्वासघात करते हुए मुगल सेनापति मुकर्रब खान को संगमेश्वर में शंभाजी के छिपे होने की सूचना दी।
- 1 फरवरी 1689 को मुकर्रब खान ने धोखे से शंभाजी और कवि कलश को बंदी बना लिया। औरंगजेब ने उन्हें तीन शर्तें रखीं – मुगलों के सामने समर्पण, सभी किले सौंप देना, या इस्लाम स्वीकार करना। शंभाजी ने तीनों शर्तें ठुकरा दीं। क्रोधित औरंगजेब ने 40 दिनों तक अमानवीय यातनाएं देने के बाद 11 मार्च 1689 को तुलापुर में शंभाजी महाराज की क्रूरतापूर्वक हत्या करवा दी।
राजाराम कौन थे?
छत्रपति राजाराम मराठा साम्राज्य के तृतीय छत्रपति थे, जो छत्रपति शिवाजी महाराज और उनकी द्वितीय पत्नी सोयराबाई के कनिष्ठ पुत्र थे। उनका जन्म 24 फरवरी 1670 को रायगढ़ किले पर हुआ था। शंभाजी महाराज की मृत्यु के बाद 1689 में मात्र 19 वर्ष की आयु में उन्होंने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में मराठा साम्राज्य की बागडोर संभाली। उन्होंने सत्ता के विकेंद्रीकरण की नीति अपनाकर मराठा राज्य को औरंगजेब के आक्रमणों से बचाया और 1689 से 1700 तक शासन किया।
राजाराम महाराज का इतिहास-
- छत्रपति राजाराम का जन्म 24 फरवरी 1670 को रायगढ़ किले पर हुआ था। वे छत्रपति शिवाजी महाराज और उनकी द्वितीय पत्नी सोयराबाई के पुत्र थे। बचपन से ही राजाराम को युद्धकला, प्रशासन और राजनीति की शिक्षा दी गई। 15 मार्च 1680 को उनका विवाह सरसेनापति प्रतापराव गुजर की पुत्री जानकीबाई से हुआ। बाद में उनका विवाह सरसेनापति हंबीरराव मोहिते की पुत्री ताराबाई से भी हुआ।
- 11 मार्च 1689 को जब छत्रपति शंभाजी महाराज की औरंगजेब द्वारा क्रूर हत्या कर दी गई, उस समय राजाराम की आयु मात्र 19 वर्ष थी। अत्यंत विकट परिस्थितियों में उन्होंने मराठा साम्राज्य का नेतृत्व संभाला। रायगढ़ पर मुगल सेनापति जुल्फिकार खान के नेतृत्व में भीषण आक्रमण हुआ। शंभाजी की पत्नी येशूबाई ने राजाराम को विशालगढ़ किले में सुरक्षित रखते हुए स्वयं मराठा नेतृत्व संभाला, परंतु सूर्यजी पिसाली नामक एक अधिकारी के विश्वासघात के कारण येशूबाई और उनके अल्पवयस्क पुत्र शाहू को मुगलों ने बंदी बना लिया। इस प्रकार 1689 में रायगढ़ का पतन हो गया।
- राजाराम ने मराठा राज्य को बचाने के लिए एक अद्भुत रणनीति अपनाई – सत्ता का विकेंद्रीकरण। उन्होंने मराठा सरदारों को नई जागीरें, सरंजाम और विभिन्न उपाधियाँ प्रदान कीं। इससे मराठा राज्य का स्वरूप बदल गया – अब यह शिवाजी के समय का एकतंत्रीय राज्य नहीं रहा, बल्कि कई केंद्रों से संचालित होने लगा। इस कारण औरंगजेब दक्षिण भारत में अपना पूर्ण आधिपत्य स्थापित नहीं कर सका।
- राजाराम ने प्रतापगढ़, सातारा, पन्हाला होते हुए जिंजी (कर्नाटक) पहुंचकर वहां से मुगलों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा, परंतु मुगलों के लगातार आक्रमणों के कारण वे जिंजी छोड़कर पुनः महाराष्ट्र लौट आए और सातारा को अपनी राजधानी बनाया। उनके शासनकाल में संताजी घोरपड़े और धनाजी जाधव जैसे वीर सेनापतियों ने गुरिल्ला युद्ध प्रणाली से मुगल सेना को भारी क्षति पहुंचाई।
राजाराम की मृत्यु कैसे हुई?
1698 में राजाराम महाराज ने धनाजी जाधव, परसोजी भोसले और खांडेराव दाभाडे के साथ खानदेश की सैन्य मोहिम आरंभ की। इसी मोहिम के दौरान उनकी तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। मुगलों के निरंतर आक्रमणों और लंबे युद्धों के कारण उनका स्वास्थ्य पहले से ही कमजोर हो चुका था। मोहिम से उन्हें सिंहगड़ किले पर लाया गया, जहां उनकी शारीरिक स्थिति और खराब हो गई। अंततः 2-3 मार्च 1700 को सिंहगड़ किले पर उनका निधन हो गया। मृत्यु के समय उनकी आयु मात्र 30 वर्ष थी। उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ताराबाई ने अपने पुत्र शिवाजी द्वितीय के नाम पर राज्यकारभार संभाला।
शिवाजी द्वितीय कौन थे?
छत्रपति शिवाजी द्वितीय मराठा साम्राज्य के चतुर्थ छत्रपति थे, जो छत्रपति राजाराम और महारानी ताराबाई के पुत्र थे। उनका जन्म 1696 में जिंजी किले में हुआ था। 1700 में राजाराम की मृत्यु के बाद मात्र 4 वर्ष की आयु में उनका राज्याभिषेक हुआ। उनकी माता ताराबाई ने उनकी संरक्षिका बनकर 1700 से 1707 तक वास्तविक रूप से शासन किया। शाहू के आगमन के बाद हुए संघर्ष में पराजित होने पर शिवाजी द्वितीय को कोल्हापुर राज्य प्रदान किया गया।
शिवाजी द्वितीय का इतिहास-
- छत्रपति शिवाजी द्वितीय का जन्म 1696 में जिंजी किले में हुआ था। वे छत्रपति राजाराम और महारानी ताराबाई के पुत्र थे। ताराबाई छत्रपति शिवाजी महाराज के सरसेनापति हंबीरराव मोहिते की पुत्री थीं और 1675 में जन्मी एक प्रसिद्ध मराठा वीरांगना थीं।
- 2-3 मार्च 1700 को राजाराम की सिंहगड़ किले पर मृत्यु के बाद, उनके अल्पवयस्क पुत्र शिवाजी द्वितीय को मात्र 4 वर्ष की आयु में गद्दी पर बिठाया गया। ताराबाई ने शिवाजी द्वितीय और मराठा साम्राज्य की संरक्षिका बनकर राज्य की कमान संभाली। वे अपनी योग्यता और सामर्थ्य के बल पर राज्य की वास्तविक शासिका बन गईं। उन्होंने भयानक संकटग्रस्त परिस्थितियों में मराठा राज्य की रक्षा की और मुगलों के विरुद्ध स्वतंत्रता संघर्ष जारी रखा।
- ताराबाई ने अपने शौर्य और पराक्रम से मुगलों को जोरदार चुनौती दी। उन्होंने रायगढ़, सातारा और सिंहगड़ जैसे महत्वपूर्ण किलों को मुगलों से पुनः जीत लिया। उन्होंने सेनापतियों की नियुक्ति, कृषि उत्पादन और मुगल क्षेत्रों पर आक्रमण की योजना जैसे सभी कार्यों का नियंत्रण स्वयं संभाला। मुगल इतिहासकार खाफी खान ने भी ताराबाई के नेतृत्व की प्रशंसा की।
- 2 मार्च 1707 को मुगल बादशाह औरंगजेब की अहमदाबाद में मृत्यु तक दक्षिण भारत में मराठा शक्ति का परचम लहराता रहा। औरंगजेब की मृत्यु के बाद बहादुर शाह प्रथम शासक बना। उसके शासनकाल में औरंगजेब के दूसरे पुत्र आजमशाह ने 8 मई 1707 को छत्रपति शंभाजी के पुत्र शाहू को मुगलों की कैद से मुक्त कर दिया।
- शाहू के दक्षिण भारत पहुंचने के बाद उनकी चाची ताराबाई के साथ गद्दी को लेकर संघर्ष हुआ। खेड़ा के युद्ध (1707) में शाहू ने ताराबाई को पराजित कर दिया। इस संघर्ष में ताराबाई के स्वयं के सेनापति धनाजी जाधव ने शाहू की सहायता की। शाहू ने सतारा में मराठा साम्राज्य की बागडोर संभाली और धनाजी जाधव को अपना सेनापति नियुक्त किया। ताराबाई और शिवाजी द्वितीय को कोल्हापुर राज्य प्रदान किया गया, जो एक अलग मराठा राज्य बन गया। इस प्रकार मराठा साम्राज्य दो भागों में विभाजित हो गया – सतारा और कोल्हापुर।
शाहू महाराज कौन थे?
शाहू महाराज मराठा साम्राज्य के छत्रपति थे, जो छत्रपति शिवाजी महाराज के पौत्र और संभाजी महाराज के पुत्र थे। इनका जन्म 1682 ई० में हुआ था, जब औरंगज़ेब ने 1689 ई० में संभाजी महाराज को पकड़कर मार डाला, तब मात्र 7 वर्ष की आयु में शाहू को भी मुगलों ने बंदी बना लिया। लगभग 18 वर्षों तक मुगल कैद में रहने के बाद 1707 ई० में औरंगज़ेब की मृत्यु के पश्चात् उन्हें रिहा किया गया। रिहाई के बाद उन्होंने मराठा गद्दी पर अपना दावा पेश किया और ताराबाई (संभाजी की विधवा) से संघर्ष कर 1708 ई० में खेड़ की लड़ाई में विजय प्राप्त की तथा सातारा को अपनी राजधानी बनाया। शाहू महाराज एक उदार, शांत स्वभाव के शासक थे। वे प्रशासन में सीधे हस्तक्षेप करने की बजाय योग्य व्यक्तियों को अधिकार सौंपने में विश्वास रखते थे।
शाहू महाराज का इतिहास-
मुगल कैद (1689–1707 ई०): पिता संभाजी की हत्या के बाद शाहू को उनकी माता येसूबाई सहित मुगलों ने बंदी बना लिया। इस दौरान उन्हें मुगल दरबार में रखा गया, परंतु उनकी मराठा पहचान और स्वाभिमान बना रहा।
गद्दी के लिए संघर्ष (1707–1708 ई०): औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद रिहा होते ही शाहू ने मराठा राज्य पर अपना अधिकार जताया। ताराबाई से संघर्ष हुआ और खेड़ के युद्ध में जीत के बाद वे छत्रपति बने।
बालाजी विश्वनाथ की नियुक्ति (1713 ई०): शाहू ने बालाजी विश्वनाथ को पेशवा नियुक्त किया, जो इस पद पर आने वाले पहले अत्यंत प्रभावशाली पेशवा साबित हुए। इसी के साथ पेशवा युग की नींव पड़ी।
पेशवा की बढ़ती शक्ति: शाहू के शासनकाल में धीरे-धीरे वास्तविक सत्ता पेशवाओं के हाथ में चली गई। शाहू नाममात्र के छत्रपति रह गए, जबकि पेशवा साम्राज्य के असली संचालक बन गए।
साम्राज्य विस्तार: शाहू के काल में मराठा शक्ति का विस्तार दक्कन से आगे उत्तर भारत तक हुआ। मालवा, गुजरात और बुंदेलखंड तक मराठों का प्रभाव फैला।
आंतरिक शांति की नीति: शाहू ने कोल्हापुर के शासकों (ताराबाई गुट) से समझौते की कोशिश की और आंतरिक मराठा संघर्षों को कम करने का प्रयास किया।
निधन (1749 ई०): शाहू महाराज का निधन 1749 ई० में हुआ। उनके कोई उत्तराधिकारी नहीं था, इसलिए उनके बाद पेशवाओं की शक्ति और भी निर्बाध हो गई और वे मराठा साम्राज्य के वास्तविक शासक बन गए।
बालाजी विश्वनाथ कौन थे?
बालाजी विश्वनाथ मराठा साम्राज्य के प्रथम वंशानुगत पेशवा थे, जिन्हें ‘मराठा राज्य का द्वितीय संस्थापक’ कहा जाता है। उनका जन्म 1662 में कोंकण के श्रीवर्धन गांव में चित्तपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे करों के विशेषज्ञ थे और अपनी कूटनीति व प्रशासनिक प्रतिभा के लिए प्रसिद्ध थे। 1707 के खेड़ा युद्ध में उन्होंने सेनापति धनाजी जाधव को ताराबाई से साहू के पक्ष में करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 16 नवंबर 1713 को छत्रपति साहू ने उन्हें पेशवा नियुक्त किया, जिसके साथ मराठा इतिहास में ‘पेशवाओं का काल’ आरंभ हुआ। उनकी मृत्यु 2 अप्रैल 1720 को हुई।
बालाजी विश्वनाथ का इतिहास-
- बालाजी विश्वनाथ का जन्म 1662 में महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र के श्रीवर्धन गांव में एक चित्तपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। यह गांव जंजीरा के सिद्दियों के शासन के अधीन था। सिद्दियों से शत्रुता के कारण बालाजी अपने परिवार सहित महाराष्ट्र चले गए। वे करों और राजस्व व्यवस्था के विशेषज्ञ थे, जिसके कारण उन्हें मराठा सेनानायक धनाजी जाधव के यहां नौकरी मिल गई।
- 1699 से 1708 के बीच बालाजी धनाजी जाधव के अधीन पूना और दौलताबाद के सूबेदार रहे। इसी दौरान वे छत्रपति शाहू के संपर्क में आए, जो उस समय मुगलों द्वारा नजरबंद थे। 1708 में धनाजी जाधव ने उन्हें ‘कारकून’ (राजस्व का क्लर्क) नियुक्त किया। धनाजी की मृत्यु के बाद उनके पुत्र चंद्रसेन जाधव ने 1712 में बालाजी को ‘सेनाकर्त्ते’ (सैन्यभार का संगठनकर्ता) की उपाधि दी।
- 1707 के खेड़ा युद्ध में बालाजी ने सेनापति धनाजी जाधव को ताराबाई के पक्ष से साहू के पक्ष में करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जब 1708 में चंद्रसेन जाधव ताराबाई के साथ मिल गया, तो बालाजी को अपनी शक्ति बढ़ाने का सुनहरा अवसर मिला। उन्होंने अपनी कूटनीतिक क्षमता से कान्होजी आंगड़े को बिना युद्ध के ही शाहू के पक्ष में कर लिया और चंद्रसेन को पराजित किया।
- बालाजी की इन बहुमूल्य सेवाओं से प्रसन्न होकर छत्रपति साहू ने 16 नवंबर 1713 को उन्हें पेशवा (प्रधानमंत्री) नियुक्त किया। इसके साथ ही मराठा इतिहास में एक नए युग की शुरुआत हुई, जिसे ‘पेशवाओं का काल’ कहा जाता है। साहू का पालन-पोषण मुगल कैद में हुआ था, इसलिए उनमें प्रशासनिक, सैनिक व राजनीतिक गुणों का अभाव था। बालाजी की सहायता से ही साहू मराठा गृहयुद्ध में सफल हुए। इसीलिए बालाजी विश्वनाथ को शिवाजी के बाद ‘मराठा राज्य का द्वितीय संस्थापक’ माना जाता है।
- 1719 में बालाजी ने दिल्ली में सैय्यद बंधुओं के साथ एक महत्वपूर्ण संधि की, जिसे मराठों का ‘मैग्नाकार्टा’ कहा जाता है। इस संधि से मराठों को दक्षिण के छह सूबों में चौथ और सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार मिला। 2 अप्रैल 1720 को बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु हो गई। शाहू ने पेशवा पद को बालाजी के परिवार के लिए वंशानुगत कर दिया, और उनके पुत्र बाजीराव प्रथम पेशवा बने।
मराठा इतिहास का मैग्नाकार्टा क्या है?
मराठा इतिहास का मैग्नाकार्टा 1719 में पेशवा बालाजी विश्वनाथ और मुगल सम्राट फर्रुखसियर के प्रतिनिधि सैय्यद हुसैन अली खान के बीच हुई ऐतिहासिक संधि को कहा जाता है। प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार सर रिचर्ड टेम्पल ने इसे ‘मराठा साम्राज्य के इतिहास का मैग्नाकार्टा’ या ‘महाधिकार पत्र’ की संज्ञा दी। इस संधि ने मराठों को दक्षिण भारत में चौथ और सरदेशमुखी वसूलने का वैधानिक अधिकार प्रदान किया तथा मुगल राजनीति में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप का अवसर दिया। यह संधि मराठा शक्ति के उत्कर्ष में एक निर्णायक मोड़ साबित हुई।
1719 की मराठा-मुगल संधि-
1719 की मराठा-मुगल संधि भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी, जिसने मराठा साम्राज्य को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। इस समय दिल्ली में मुगल सम्राट फर्रुखसियर और सैय्यद बंधुओं (सैय्यद हुसैन अली और सैय्यद अब्दुल्ला खान) के बीच गंभीर मतभेद उत्पन्न हो गए थे। दोनों पक्ष एक-दूसरे को समाप्त करने का षड्यंत्र रच रहे थे। इसी समय दक्षिण में सूबेदार के रूप में तैनात सैय्यद हुसैन अली ने पेशवा बालाजी विश्वनाथ से संपर्क किया।
फरवरी 1719 में बालाजी विश्वनाथ और सैय्यद हुसैन अली के बीच एक ऐतिहासिक संधि हुई। इस संधि की मुख्य शर्तें निम्नलिखित थीं:
पहली शर्त: दक्कन के छह मुगल सूबों पर मराठों को चौथ और सरदेशमुखी (कुल राजस्व का 35 प्रतिशत) वसूलने का अधिकार प्रदान किया गया। यह मराठों की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत थी।
दूसरी शर्त: हैदराबाद, गोंडवाना, खानदेश, बरार और कर्नाटक के वे क्षेत्र जो हाल ही में मराठों ने जीते थे लेकिन मुगलों ने छीन लिए थे, उन पर पुनः मराठा प्रभुत्व स्थापित किया गया।
तीसरी शर्त: छत्रपति शिवाजी के स्वराज्य क्षेत्र कहे जाने वाले भागों पर भी मराठों को राजस्व वसूलने का अधिकार मिला।
चौथी शर्त: 1689 से मुगलों की कैद में रह रही साहू की माता येशूबाई को मुक्त कर दिया गया। यह साहू के लिए एक भावनात्मक उपलब्धि थी।
पांचवीं शर्त: कोल्हापुर में शासन कर रहे शंभाजी द्वितीय को साहू द्वारा परेशान नहीं किया जाएगा। इससे मराठा आंतरिक विवादों में शांति स्थापित हुई।
बदले में छत्रपति साहू ने मुगल बादशाह को प्रतिवर्ष 10 लाख रुपये देने और आवश्यकता पड़ने पर 15,000 मराठा घुड़सवार सैनिकों की सहायता प्रदान करने का वचन दिया।
संधि के बाद बालाजी विश्वनाथ खांडेराव दाभाड़े के नेतृत्व में 15,000 मराठा सैनिकों के साथ दिल्ली पहुंचे। मराठा सेना की सहायता से सैय्यद बंधुओं ने फर्रुखसियर को सिंहासन से उतारकर उसे मार डाला और रफी-उद-दरजात को नया मुगल सम्राट बनाया। नए बादशाह ने इस संधि को औपचारिक मान्यता प्रदान की।
प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार सर रिचर्ड टेम्पल ने इस संधि को ‘मराठा साम्राज्य का मैग्नाकार्टा’ (महाधिकार पत्र) कहा। यह संधि मराठों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी क्योंकि इससे उन्हें मुगल राजनीति में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप का अवसर मिला और मुगल साम्राज्य की कमजोरी स्पष्ट हो गई। इस संधि ने मराठों को दक्षिण भारत का सबसे शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति बना दिया।
बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के बाद 17 अप्रैल 1720 को उनके पुत्र बाजीराव प्रथम पेशवा बने, जिन्होंने इस नींव पर मराठा साम्राज्य का और विस्तार किया।
बाजीराव प्रथम की मृत्यु कैसे हुई?
पेशवा बाजीराव प्रथम की मृत्यु 28 अप्रैल 1740 को मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में नर्मदा नदी के दक्षिण तट पर स्थित रावेरखेड़ी नामक स्थान पर हुई। वे उत्तर भारत के एक सैन्य अभियान से लौट रहे थे और लगभग एक लाख सैनिकों के साथ नर्मदा तट पर विश्राम के लिए रुके थे। निरंतर युद्धों और सैन्य अभियानों के कारण उनका शरीर पहले से ही कमजोर हो चुका था। निमाड़ क्षेत्र की भीषण गर्मी में 23 अप्रैल को उन्हें तापघात (लू) लग गया। 26 अप्रैल को बुखार इतना बढ़ गया कि वे बेसुध हो गए। अंततः 28 अप्रैल 1740 को मात्र 40 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उसी दिन नर्मदा तट पर उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। उनकी मृत्यु की खबर सुनकर मस्तानी ने भी आत्महत्या कर ली।
बाजीराव प्रथम का इतिहास-
- पेशवा बाजीराव प्रथम का जन्म 18 अगस्त 1700 को कोंकण के चित्तपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता बालाजी विश्वनाथ मराठा साम्राज्य के प्रथम पेशवा थे और माता का नाम राधाबाई था। उनका एक छोटा भाई चिमाजी अप्पा भी महान योद्धा था। बाजीराव बचपन से ही अपने पिता के साथ सैन्य अभियानों में जाते थे और 12 वर्ष की आयु में ही पहली बार युद्धभूमि में उतरे। 2 अप्रैल 1720 को बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के बाद, छत्रपति शाहू ने अन्य सरदारों के विरोध के बावजूद मात्र 20 वर्ष के बाजीराव को 17 अप्रैल 1720 को पेशवा नियुक्त किया।
- बाजीराव प्रथम एक अद्वितीय सैनिक, महान सेनानायक और दूरदर्शी राजनीतिज्ञ थे। उन्होंने मराठा साम्राज्य को एक नई दिशा दी और उसका व्यापक विस्तार किया। उन्हें मराठा संघ का ‘ढीला-ढाला संघ’ पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने इसका पुनर्गठन किया। नए मराठा संघ के प्रमुख स्तंभ थे – सिंधिया (ग्वालियर), होल्कर (इंदौर), गायकवाड (बड़ौदा) और भोंसले (नागपुर)। बाजीराव ने सतारा के स्थान पर पूणे को मराठा राजनीति का प्रधान केंद्र बना दिया।
- बाजीराव साम्राज्यवादी प्रवृत्ति के शासक थे। उन्होंने छत्रपति शाहू से कहा था, “हमें इस जर्जर वृक्ष के तने पर प्रहार करना चाहिए, शाखाएं तो स्वयं ही गिर जाएंगी और इस प्रकार मराठों की पताका कृष्णा से लेकर अटक तक फहरने लगेगी।” इस दृष्टिकोण के साथ उन्होंने उत्तर भारत में मराठा विस्तार की नीति अपनाई।
- मार्च 1729 में बुंदेलखंड विजय बाजीराव की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। उन्होंने बुंदेल शासक छत्रसाल को मुगल सम्राट मुहम्मद शाह (1719-48) से स्वतंत्र कराया। कृतज्ञ छत्रसाल ने बाजीराव को अपनी राज्य का एक तिहाई हिस्सा और अपनी पुत्री मस्तानी प्रदान की। 1733 में बाजीराव ने जंजीरा के सिद्दियों को एक लंबे अभियान के बाद पराजित किया। 1738-39 में उन्होंने पश्चिमी समुद्र तट पर पुर्तगालियों पर हमला कर साल्सेट और बेसिन क्षेत्र छीन लिया।
- बाजीराव की सैन्य प्रतिभा अद्वितीय थी। उन्होंने अपने 20 वर्षों के पेशवा काल में 41 युद्ध लड़े और एक भी युद्ध नहीं हारे। शिवाजी के बाद वे गुरिल्ला युद्ध पद्धति के सबसे बड़े विशेषज्ञ माने गए। इसी कारण उन्हें ‘लड़ाकू पेशवा’ कहा जाता है। उनकी युद्ध रणनीति इतनी प्रभावी थी कि द्वितीय विश्व युद्ध में इसी शैली को ‘ब्लिट्जक्रिग’ के नाम से अपनाया गया। अमेरिकी सेना ने उनकी पालखेड़ की लड़ाई (1728) का मॉडल बनाकर सैनिकों को प्रशिक्षण देना शुरू किया।
- बाजीराव की दो पत्नियां थीं – काशीबाई (प्रथम पत्नी) और मस्तानी (द्वितीय पत्नी)। काशीबाई से उनके चार पुत्र हुए – बालाजी बाजीराव (नानासाहेब), रामचंद्र, रघुनाथराव और जनार्दन। मस्तानी से उनका एक पुत्र शमशेर बहादुर हुआ। मस्तानी से उनके संबंधों के कारण उन्हें पुणे के ब्राह्मणों का विरोध झेलना पड़ा।
- 28 अप्रैल 1740 को नर्मदा नदी के तट पर रावेरखेड़ी में बाजीराव प्रथम की मृत्यु हो गई। ब्रिटिश इतिहासकार सर रिचर्ड टेम्पल ने लिखा, “उनकी मृत्यु वैसी ही हुई जैसा उनका जीवन था – तंबू वाले शिविर में अपने सैनिकों के साथ।” उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र बालाजी बाजीराव (नानासाहेब) पेशवा बने और मराठा साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचा।
बालाजी बाजीराव की मृत्यु कैसे हुई?
बालाजी बाजीराव की मृत्यु का सबसे बड़ा कारण पानीपत का तृतीय युद्ध (1761 ई०) था। इस युद्ध में अहमद शाह अब्दाली ने मराठों को भयंकर पराजय दी, जिसमें हजारों मराठा सैनिक मारे गए। बालाजी बाजीराव का पुत्र विश्वासराव भी इसी युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ। इस दर्दनाक पराजय और पुत्र वियोग के गहरे आघात को वे सहन न कर सके और अत्यधिक मानसिक वेदना के कारण जून 1761 ई० में उनका निधन हो गया।
बालाजी बाजीराव का इतिहास-
बालाजी बाजीराव, जिन्हें ‘नाना साहेब’ भी कहा जाता है, 1740 ई० में पेशवा बने। उन्हें यह पद छत्रपति साहू ने सातारा में सौंपा था। उनके काल की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि पेशवा पद का वंशानुगत हो जाना था। साहू निःसंतान थे, इसलिए उन्होंने ताराबाई के पौत्र राजाराम द्वितीय को उत्तराधिकारी बनाया। बालाजी ने इसे सहर्ष स्वीकार किया, जिससे प्रसन्न होकर साहू ने यह आदेश दिया कि पेशवाओं को उनके वंशानुगत पद से कभी नहीं हटाया जाए। इनके शासनकाल में मराठा शक्ति उत्तर भारत तक फैली, परंतु 1761 ई० में पानीपत के तृतीय युद्ध में अब्दाली से मिली करारी हार ने मराठा साम्राज्य की कमर तोड़ दी और इसी आघात से बालाजी बाजीराव का निधन हो गया।
संगोला की संधि क्या है?
संगोला की संधि 14 जनवरी 1750 ई० को मराठा इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना थी। छत्रपति साहू की मृत्यु (1749 ई०) के पश्चात् मराठा साम्राज्य में सत्ता का संतुलन पूरी तरह बदल गया। इसी पृष्ठभूमि में पेशवा बालाजी बाजीराव और मराठा छत्रपति राजाराम द्वितीय के मध्य यह ऐतिहासिक संधि हुई, जिसे ‘संगोला की संधि’ कहा जाता है।
इस संधि की प्रमुख शर्तें निम्नलिखित थीं —
- राज्य के समस्त प्रमुख विभाग और प्रशासनिक अधिकार छत्रपति राजाराम द्वितीय ने पेशवा बालाजी बाजीराव को औपचारिक रूप से सौंप दिए।
- यद्यपि अष्टप्रधान मंत्रियों के पद नाममात्र के लिए बने रहे, परंतु वास्तविक प्रशासन से उनका कोई संबंध नहीं रह गया।
- छत्रपति को राज्य का केवल संवैधानिक प्रधान माना गया और उनके निवास की व्यवस्था सातारा में कर दी गई।
- इस संधि के बाद मराठा राजनीति का वास्तविक केंद्र सातारा से हटकर पुणे हो गया।
- पेशवा अब नाम और काम दोनों से मराठा साम्राज्य के सर्वेसर्वा बन गए।
पानीपत का तीसरा युद्ध किसके बीच हुआ था?
पानीपत का तृतीय युद्ध 14 जनवरी 1761 ई० को अफगान आक्रमणकारी अहमदशाह अब्दाली और मराठा सेना के बीच हुआ था। मराठा सेना का नाममात्र का नेतृत्व विश्वासराव भाऊ कर रहे थे, जबकि वास्तविक सेनापति सदाशिवराव भाऊ थे। अब्दाली के साथ रुहेला सरदार नजीबउद्दौला और अवध के नवाब शुजाउद्दौला भी थे, जबकि मराठों को केवल मुगल वजीर इमाद-उल-मुल्क का समर्थन प्राप्त था।
पानीपत का तीसरा युद्ध क्यों हुआ था?
पानीपत के तृतीय युद्ध का तात्कालिक कारण मराठों और अहमदशाह अब्दाली के बीच पंजाब को लेकर उत्पन्न टकराव था। मुगल वजीर गाजीउद्दीन के निमंत्रण पर मराठा सेना दिल्ली पहुंची और रघुनाथ राव ने अब्दाली के नायब को हराकर पंजाब पर अधिकार कर लिया। वहाँ एक मराठा सरदार को मुगल सम्राट के नाम पर सूबेदार नियुक्त किया गया। इस घटना ने अब्दाली का क्रोध भड़का दिया और 1759 ई० में वह एक विशाल सेना लेकर पुनः भारत की ओर बढ़ा, जिसकी परिणति 1761 ई० में पानीपत के तृतीय युद्ध के रूप में हुई।
पानीपत का तृतीय युद्ध के कारण-
पानीपत के तृतीय युद्ध के लिए कोई एक कारण जिम्मेदार नहीं था, बल्कि कई राजनीतिक, सैन्य और कूटनीतिक परिस्थितियाँ इसके लिए उत्तरदायी थीं —
1. मराठों का उत्तर भारत में बढ़ता प्रभाव
18वीं शताब्दी के मध्य तक मराठा शक्ति अपने चरमोत्कर्ष पर थी। उन्होंने दिल्ली, मालवा, बुंदेलखंड और पंजाब तक अपना प्रभाव फैला लिया था। इस विस्तार ने अफगान शासक अहमदशाह अब्दाली को चिंतित कर दिया, क्योंकि वह उत्तर भारत पर अपना दबदबा कायम रखना चाहता था।
2. पंजाब विजय और अब्दाली का क्रोध
मुगल वजीर गाजीउद्दीन के अनुरोध पर पेशवा बालाजी बाजीराव ने अपने भाई रघुनाथ राव को दिल्ली भेजा। रघुनाथ राव ने अब्दाली के नायब को हराकर पंजाब पर अधिकार कर लिया और एक मराठा सरदार को वहाँ का सूबेदार नियुक्त किया। इस घटना ने अब्दाली को अत्यंत क्रोधित कर दिया और उसने मराठों को सबक सिखाने का निश्चय किया।
3. मुगल सत्ता की कमजोरी
मुगल साम्राज्य इस समय तक पूरी तरह निर्बल हो चुका था। दिल्ली की सत्ता पर विभिन्न गुटों का नियंत्रण था। इस राजनीतिक शून्यता का लाभ उठाकर मराठे और अब्दाली दोनों उत्तर भारत की सत्ता पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहते थे, जिससे दोनों के बीच संघर्ष अनिवार्य हो गया।
4. मराठों के विरुद्ध क्षेत्रीय शक्तियों की नाराजगी
रुहेला सरदार नजीबउद्दौला और अवध के नवाब शुजाउद्दौला मराठों से पहले ही पराजित हो चुके थे और उनसे असंतुष्ट थे। इन दोनों ने अब्दाली का साथ देकर मराठों से बदला लेने का अवसर देखा। इससे मराठों के विरुद्ध एक शक्तिशाली गठबंधन खड़ा हो गया।
5. मराठों की कूटनीतिक विफलता
मराठे अपने संभावित मित्रों को साथ लाने में असफल रहे। जाट सरदार सूरजमल, राजपूत और सिक्ख — तीनों ने इस युद्ध में तटस्थता अपनाई। यदि ये शक्तियाँ मराठों के साथ होतीं तो युद्ध का परिणाम भिन्न हो सकता था। मराठों की यह कूटनीतिक चूक उनकी पराजय का एक बड़ा कारण बनी।
पानीपत का तृतीय युद्ध के परिणाम–
पानीपत के तृतीय युद्ध के परिणाम अत्यंत दूरगामी और विनाशकारी थे। इस युद्ध ने न केवल मराठा शक्ति को तोड़ा, बल्कि भारत के राजनीतिक इतिहास की दिशा ही बदल दी —
1. मराठा शक्ति का पतन
यह युद्ध मराठा साम्राज्य के लिए पूर्णतः प्रलयंकारी साबित हुआ। इस युद्ध में हजारों मराठा सैनिक मारे गए। विश्वासराव भाऊ और सदाशिवराव भाऊ जैसे कुशल सेनापति युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। इस पराजय ने मराठों की सैन्य शक्ति और प्रतिष्ठा दोनों को गहरी चोट पहुँचाई।
2. पेशवा बालाजी बाजीराव की मृत्यु
पानीपत की पराजय की सूचना बालाजी बाजीराव को कूट संदेश में इस प्रकार पहुँचाई गई — “दो मोती विलीन हो गए, बाईस सोने की मुहरें लुप्त हो गईं।” पुत्र विश्वासराव की मृत्यु और इस शर्मनाक पराजय के दोहरे आघात को वे सहन नहीं कर सके और जून 1761 ई० में उनका निधन हो गया।
3. उत्तर भारत में मराठा प्रभाव का अंत
पानीपत के बाद मराठे उत्तर भारत से व्यावहारिक रूप से बाहर हो गए। पंजाब और दिल्ली पर उनका प्रभाव समाप्त हो गया। रुहेला सरदार नजीबउद्दौला अब्दाली के प्रतिनिधि के रूप में दिल्ली का शासक बना।
4. अंग्रेजों को लाभ
मराठों की इस पराजय का सबसे अधिक फायदा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को हुआ। उत्तर भारत में कोई भी ऐसी भारतीय शक्ति नहीं बची जो अंग्रेजों के विस्तार को रोक सके। इस युद्ध ने परोक्ष रूप से भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की नींव को और मजबूत किया।
5. मराठा संघ में बिखराव
इस युद्ध के बाद मराठा संघ में एकता समाप्त हो गई। सिंधिया, होल्कर, भोंसले और पेशवा — सभी अपने-अपने हितों की रक्षा में लग गए। मराठा राजनीति में आंतरिक कलह और प्रतिस्पर्धा बढ़ गई, जिसने साम्राज्य को और कमजोर किया।
6. भारतीय इतिहास पर दीर्घकालिक प्रभाव
प्रत्यक्षदर्शी इतिहासकार काशीराज पंडित के अनुसार — “पानीपत का तीसरा युद्ध मराठों के लिए प्रलयंकारी साबित हुआ।” यह युद्ध भारतीय इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था जिसने देश की राजनीतिक तकदीर बदल दी और अंततः भारत को विदेशी शासन की ओर धकेल दिया।
माधवराव प्रथम कौन थे?
माधवराव प्रथम मराठा साम्राज्य के एक अत्यंत प्रतिभाशाली और कुशल पेशवा थे। वे पेशवा बालाजी बाजीराव के पुत्र थे और पानीपत के तृतीय युद्ध (1761 ई०) के कुछ सप्ताह बाद ही अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् 1761 ई० में पेशवा की गद्दी पर बैठे। उनके चाचा रघुनाथ राव उनके संरक्षक नियुक्त हुए। माधवराव ने अपने अल्प शासनकाल (1761-72 ई०) में ही मराठा साम्राज्य की खोई हुई प्रतिष्ठा और शक्ति को पुनः स्थापित किया। मात्र 27 वर्ष की आयु में 1772 ई० में क्षय रोग से उनकी मृत्यु हो गई।
माधवराव प्रथम का शासनकाल और उपलब्धियां-
1. पेशवा पद की प्राप्ति और प्रारंभिक चुनौतियाँ
माधवराव प्रथम 1761 ई० में अत्यंत विषम परिस्थितियों में पेशवा बने। पानीपत के तृतीय युद्ध ने मराठा साम्राज्य की कमर तोड़ दी थी। सैकड़ों वीर सेनापति मारे जा चुके थे, खजाना रिक्त था और साम्राज्य की प्रतिष्ठा धूमिल हो चुकी थी। ऐसे संकटकाल में इस युवा पेशवा ने असाधारण साहस और दूरदर्शिता का परिचय दिया।
2. मराठा शक्ति का पुनरुद्धार
माधवराव प्रथम की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने पानीपत के तृतीय युद्ध से हुई समस्त क्षतियों की भरपाई कर दी। उन्होंने नई सेना संगठित की, राज्य की वित्तीय स्थिति सुधारी और मराठा संघ को पुनः एकजुट किया। उनके नेतृत्व में मराठा शक्ति ने अत्यंत तीव्र गति से पुनर्जीवन प्राप्त किया।
3. उत्तर भारत में मराठा प्रभाव की पुनर्स्थापना
1765 ई० की इलाहाबाद की संधि के अंतर्गत मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय इलाहाबाद में रह रहे थे। माधवराव के शासनकाल में मराठा सरदार महादजी सिंधिया के नेतृत्व में 1772 ई० में शाहआलम द्वितीय को पुनः दिल्ली की गद्दी पर बिठाया गया। इस प्रकार मुगल सम्राट मराठों का पेंशनर बनकर रह गया, जो उत्तर भारत में मराठा वर्चस्व का प्रमाण था।
4. दक्षिण भारत में अभियान
माधवराव ने दक्षिण भारत में भी मराठा शक्ति का विस्तार किया। उन्होंने हैदर अली और निजाम को नियंत्रित किया तथा दक्षिण के विभिन्न क्षेत्रों पर मराठा प्रभाव को पुनः स्थापित किया। उनकी सैन्य और प्रशासनिक क्षमता ने दक्षिण में मराठा साम्राज्य को सुदृढ़ बनाया।
5. प्रशासनिक सुधार
माधवराव एक कुशल प्रशासक भी थे। उन्होंने राज्य की आय बढ़ाने, न्याय व्यवस्था सुधारने और सैन्य संगठन को मजबूत करने के लिए अनेक सुधार किए। उनके शासन में पुणे पुनः मराठा राजनीति का शक्तिशाली केंद्र बन गया।
6. असामयिक मृत्यु और इतिहासकारों का मत
1772 ई० में मात्र 27 वर्ष की आयु में क्षय रोग के कारण माधवराव प्रथम का निधन हो गया। उनकी मृत्यु मराठा साम्राज्य के लिए एक अपूरणीय क्षति थी। प्रसिद्ध इतिहासकार ग्रांट डफ ने उनकी मृत्यु पर कहा था — “पानीपत के तीसरे युद्ध से मराठाओं को जितना नुकसान नहीं हुआ, उससे कहीं ज्यादा नुकसान इस पेशवा की मृत्यु से हुआ।” यह कथन माधवराव की महानता और मराठा साम्राज्य में उनके महत्व को भली-भाँति दर्शाता है।
नारायण राव कौन थे?
नारायण राव मराठा साम्राज्य के पेशवा थे, जो 1772 ई० में अपने बड़े भाई माधवराव प्रथम की मृत्यु के पश्चात् पेशवा पद पर आसीन हुए। वे पेशवा बालाजी बाजीराव के पुत्र थे। नारायण राव का शासनकाल अत्यंत अल्प रहा, क्योंकि उनके चाचा रघुनाथ राव (राघोवा) ने स्वयं पेशवा बनने की महत्वाकांक्षा में उनकी हत्या करवा दी। उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी गंगूबाई के पुत्र माधवराव नारायण द्वितीय को उनका उत्तराधिकारी घोषित किया गया और उसकी सुरक्षा हेतु बारभाई परिषद की स्थापना की गई।
नारायण राव की मृत्यु कैसे हुई?
नारायण राव की मृत्यु मराठा इतिहास की सबसे दुखद और षड्यंत्रपूर्ण घटनाओं में से एक है। उनके चाचा रघुनाथ राव अर्थात राघोवा स्वयं पेशवा का पद प्राप्त करना चाहते थे। इसी महत्वाकांक्षा के चलते उन्होंने अपने ही भतीजे नारायण राव की हत्या का षड्यंत्र रचा।
हत्या की घटना
1773 ई० में रघुनाथ राव के इशारे पर मराठा सैनिकों ने पुणे के शनिवारवाड़ा महल में नारायण राव पर हमला कर दिया। कहा जाता है कि रघुनाथ राव ने अपने सैनिकों को संदेश भेजा था — “नारायण राव को पकड़ लो”, परंतु उस संदेश में ‘पकड़ो’ की जगह ‘मारो’ पढ़ा गया अथवा जानबूझकर ऐसा किया गया। नारायण राव अपनी जान बचाने के लिए भागते हुए अपने चाचा रघुनाथ राव के पास पहुँचे और ‘काका मला वाचवा’ अर्थात “चाचा मुझे बचाओ” कहकर गुहार लगाई, परंतु निर्दयी रघुनाथ राव ने उन्हें सैनिकों के हवाले कर दिया।
हत्या का परिणाम
इस प्रकार 1773 ई० में नारायण राव की नृशंस हत्या कर दी गई। उनका शासनकाल मात्र एक वर्ष का रहा। इस हत्या के बाद नाना फड़णवीस और महादजी सिंधिया ने रघुनाथ राव का विरोध किया और नारायण राव की विधवा गंगूबाई के नवजात पुत्र को उत्तराधिकारी घोषित कर उसकी सुरक्षा के लिए बारभाई परिषद का गठन किया। नारायण राव की यह दुखद मृत्यु मराठा साम्राज्य के पतन की एक महत्वपूर्ण कड़ी बन गई।
प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध कब हुआ था?
प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध 1775 ई० से 1782 ई० के बीच लड़ा गया था। यह युद्ध अंग्रेजों और मराठा साम्राज्य के बीच होने वाला पहला बड़ा सशस्त्र संघर्ष था। उस समय बंगाल का गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स था और मुगल शासक शाहआलम द्वितीय था। इस युद्ध की शुरुआत का मूल कारण सूरत की संधि (1775 ई०) था, जो रघुनाथ राव और बंबई के अंग्रेज प्रतिनिधियों के बीच हुई थी। अंततः 1782 ई० में महादजी सिंधिया की मध्यस्थता से सालबाई की संधि के साथ यह युद्ध समाप्त हुआ।

प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध क्यों हुआ था?
प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध के लिए कोई एक कारण जिम्मेदार नहीं था, बल्कि कई राजनीतिक, कूटनीतिक और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ इसके पीछे काम कर रही थीं —
1. रघुनाथ राव की महत्वाकांक्षा
प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध की नींव तब पड़ी जब रघुनाथ राव (राघोवा) ने अपने भतीजे नारायण राव की हत्या करवाकर पेशवा पद हथियाने का प्रयास किया। परंतु नाना फड़णवीस और महादजी सिंधिया के नेतृत्व में बारभाई परिषद ने उसका विरोध किया और नारायण राव के नवजात पुत्र माधवराव नारायण द्वितीय को पेशवा घोषित कर दिया। इससे रघुनाथ राव का पेशवा बनने का सपना टूट गया और वह अंग्रेजों की शरण में पहुँचा।
2. सूरत की संधि (1775 ई०)
रघुनाथ राव भागकर सूरत पहुँचा और वहाँ बंबई के अंग्रेज प्रतिनिधियों के साथ 1775 ई० में सूरत की संधि की। इस संधि के अंतर्गत अंग्रेजों ने रघुनाथ राव को 2500 सैनिक और 12 लाख रुपये मासिक खर्च देने का वचन दिया। बदले में रघुनाथ राव ने विजय के पश्चात साल्सिट, बेसिन, भड़ौच और सूरत जिलों के राजस्व का एक भाग अंग्रेजों को देने का वादा किया। इसी संधि को आंग्ल-मराठा संघर्ष का प्रारंभिक बिंदु माना जाता है।
3. कलकत्ता और बंबई प्रेसीडेंसी का मतभेद
कलकत्ता के अंग्रेज प्रतिनिधियों ने सूरत की संधि को मान्यता देने से इनकार कर दिया और मार्च 1776 ई० में पुरंदर की संधि की, जिसके अंतर्गत सूरत की संधि रद्द कर दी गई। परंतु लंदन के कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने सूरत की संधि को ही मान्यता प्रदान की। इस प्रकार अंग्रेजों की आंतरिक नीतिगत असहमति ने भी इस युद्ध को अपरिहार्य बना दिया।
4. अंग्रेजों की विस्तारवादी नीति
वारेन हेस्टिंग्स के नेतृत्व में अंग्रेज कंपनी भारत में अपना राजनीतिक और व्यापारिक प्रभाव बढ़ाना चाहती थी। मराठा साम्राज्य उस समय भारत की सबसे बड़ी शक्ति था। रघुनाथ राव का साथ देना अंग्रेजों के लिए मराठा साम्राज्य के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने और अपनी शक्ति बढ़ाने का एक सुनहरा अवसर था।
5. मराठा साम्राज्य में आंतरिक अस्थिरता
पानीपत के तृतीय युद्ध और माधवराव प्रथम की असामयिक मृत्यु के पश्चात् मराठा साम्राज्य आंतरिक कलह और अस्थिरता से जूझ रहा था। रघुनाथ राव और बारभाई परिषद के बीच सत्ता संघर्ष ने साम्राज्य को कमजोर कर दिया था। इस आंतरिक कमजोरी का लाभ उठाकर अंग्रेजों ने हस्तक्षेप किया, जो अंततः प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध का कारण बना।
द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध कब हुआ था?
द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध अगस्त 1803 ई० से 1805 ई० के बीच लड़ा गया था। इस युद्ध का मूल कारण 1802 ई० में हुई बेसिन की संधि थी, जो पेशवा बाजीराव द्वितीय और अंग्रेजों के बीच हुई थी। इस युद्ध में लार्ड वेलेजली के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने मराठा शक्तियों को एक-एक कर पराजित किया। अंततः 1805 ई० में जार्ज बार्लो और होल्कर के बीच राजापुर की संधि के साथ यह युद्ध समाप्त हुआ। इस युद्ध में सिंधिया, भोंसले और होल्कर तीनों मराठा शक्तियाँ अंग्रेजों से पराजित हुईं।
द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध क्यों हुआ था?
द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध के पीछे कई राजनीतिक, कूटनीतिक और व्यक्तिगत कारण उत्तरदायी थे —
1. माधवराव नारायण द्वितीय की आत्महत्या
1795 ई० में पेशवा माधवराव नारायण द्वितीय ने आत्महत्या कर ली, जिससे मराठा साम्राज्य में नेतृत्व का संकट उत्पन्न हो गया। इसके पश्चात् रघुनाथ राव का पुत्र बाजीराव द्वितीय मराठों का पेशवा बना। वह अयोग्य, कायर और अदूरदर्शी शासक था, जिसकी मूर्खतापूर्ण नीतियों ने द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की।
2. मराठा साम्राज्य में आंतरिक संघर्ष
1795 ई० में महादजी सिंधिया और 1800 ई० में नाना फड़णवीस की मृत्यु के पश्चात् मराठा साम्राज्य में अनुभवी नेतृत्व का पूर्णतः अभाव हो गया। इसके बाद पुणे पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए जसवंतराव होल्कर और दौलतराव सिंधिया के बीच भयंकर प्रतिस्पर्धा प्रारंभ हो गई। इस आंतरिक कलह ने मराठा शक्ति को बुरी तरह कमजोर कर दिया।
3. बाजीराव द्वितीय की मूर्खतापूर्ण नीति
पेशवा बाजीराव द्वितीय ने होल्कर और सिंधिया के मध्य चल रहे संघर्ष में दौलतराव सिंधिया का पक्ष लिया और जसवंतराव होल्कर के भाई विट्ठूजी की निर्ममतापूर्वक हत्या करवा दी। इससे क्रोधित होकर जसवंतराव होल्कर ने पुणे पर आक्रमण कर दिया, जिसमें सिंधिया और बाजीराव द्वितीय दोनों बुरी तरह पराजित हुए।
4. बेसिन की संधि (1802 ई०)
पुणे से पराजित होकर बाजीराव द्वितीय भागकर बेसिन चला गया और वहाँ एक जहाज पर अंग्रेज प्रतिनिधियों के साथ बेसिन की संधि (1802 ई०) कर ली। इस संधि के अंतर्गत पुणे का पेशवा लार्ड वेलेजली की सहायक संधि में बंध गया, पुणे में अंग्रेजों के नेतृत्व वाली सेना रखी जानी थी और पुणे की विदेश नीति पर अंग्रेजों का पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया। यही बेसिन की संधि द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध का प्रत्यक्ष कारण बनी।
5. लार्ड वेलेजली की साम्राज्यवादी नीति
लार्ड वेलेजली (1798-1805 ई०) भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार करने की महत्वाकांक्षा रखता था। उसकी सहायक संधि की नीति का उद्देश्य भारतीय राज्यों को अंग्रेजी अधीनता में लाना था। मराठा साम्राज्य में आंतरिक कलह और बाजीराव द्वितीय की कायरता ने उसे इस नीति को लागू करने का स्वर्णिम अवसर प्रदान किया, जिसने अंततः द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध को जन्म दिया।
तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध कब हुआ था?
तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध 1817 ई० से 1818 ई० के बीच लड़ा गया था। इस युद्ध के समय बंगाल का गवर्नर जनरल लार्ड हेस्टिंग्स था। इस युद्ध की पृष्ठभूमि पिंडारियों के दमन के बहाने तैयार की गई थी। 1817 ई० में किर्की के युद्ध में पेशवा को, सीतलवाड़ी के युद्ध में सिंधिया को और महीदपुर के युद्ध में होल्कर को अंग्रेजों ने पराजित किया। 1818 ई० तक मराठा शक्ति पूरी तरह ध्वस्त हो गई और पुणे को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया गया। यह युद्ध मराठा साम्राज्य के अंत का प्रतीक बना।
तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध क्यों हुआ था?
तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण उत्तरदायी थे —
1. पिंडारियों का उदय और उनकी लूटपाट
पिंडारियों का सर्वप्रथम उल्लेख 1789 ई० में शंभाजी पर हुए मुगल आक्रमण के दौरान मिलता है। ये लोग मूलतः मराठा सेना के साथ अवैतनिक रूप से लूटपाट में भाग लेते थे और लूट के माल का एक हिस्सा इनकी जीविका का आधार था। प्रसिद्ध इतिहासकार मैल्कम ने इन्हें “मराठा सेना के साथ चलने वाले शिकारी कुत्ते” कहकर पुकारा है। ये पिंडारी मराठा शक्ति के कमजोर होने के साथ-साथ अनियंत्रित होते चले गए।
2. मराठा शक्ति का पतन और पिंडारियों की दुर्दशा
द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध के पश्चात् मराठा साम्राज्य की शक्ति दिनोदिन क्षीण होती चली गई। इन परिस्थितियों में मराठाओं के अधीनस्थ पिंडारियों की आर्थिक स्थिति भी बिगड़ती चली गई। जीविका के साधन समाप्त होने पर पिंडारियों ने अंग्रेजों के प्रभाव वाले क्षेत्रों पर आक्रमण करना प्रारंभ कर दिया। यहाँ तक कि उन्होंने मराठा क्षेत्रों को भी नहीं छोड़ा। इस प्रकार पिंडारी मराठा और अंग्रेज दोनों के लिए एक गंभीर समस्या बन गए।
3. अंग्रेजों का मराठाओं पर आरोप
अंग्रेजों ने मराठाओं पर यह आरोप लगाया कि उन्हीं के प्रोत्साहन और संरक्षण से पिंडारी अंग्रेजी क्षेत्रों पर आक्रमण कर रहे हैं। सिंधिया स्वयं पिंडारियों से समझौता करने की कोशिश कर रहा था, जिसे अंग्रेजों ने उनके साथ मिलीभगत के रूप में देखा। इस आरोप को बहाना बनाकर लार्ड हेस्टिंग्स ने पिंडारियों के दमन के नाम पर मराठाओं के विरुद्ध सैन्य अभियान छेड़ने का निर्णय लिया।
4. संधियों का उल्लंघन
लार्ड हेस्टिंग्स ने पिंडारी दमन अभियान के दौरान मई 1816 ई० में भोंसले के साथ नागपुर की संधि, जून 1816 ई० में पेशवा के साथ पुणे की संधि और नवंबर 1816 ई० में सिंधिया के साथ ग्वालियर की संधि की। इन संधियों के अंतर्गत तीनों मराठा शक्तियों ने पिंडारियों के विरुद्ध अंग्रेजों को सहायता देने का वचन दिया था। परंतु तीनों ने बाद में इन संधियों का उल्लंघन किया, जिससे अंग्रेजों को तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध छेड़ने का खुला अवसर मिल गया।
5. लार्ड हेस्टिंग्स की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा
लार्ड हेस्टिंग्स भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को पूर्णतः सुदृढ़ करना चाहता था। मराठा साम्राज्य ही एकमात्र ऐसी शक्ति बची थी जो अंग्रेजी प्रभुत्व को चुनौती दे सकती थी। पिंडारी समस्या ने उसे एक उचित बहाना प्रदान किया और उसने इस अवसर का पूरा लाभ उठाते हुए मराठा शक्ति को सदा के लिए समाप्त करने का निर्णय लिया। यही तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण और वास्तविक कारण था।

निष्कर्ष
इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी एवं मराठों के बीच संघर्ष भारतीय इतिहास का एक निर्णायक अध्याय रहा, जिसने भारत की राजनीतिक दिशा को पूरी तरह बदल दिया। प्रारंभ में मराठा शक्ति अत्यंत प्रभावशाली थी, लेकिन आंतरिक कमजोरियों और आपसी संघर्षों के कारण वे धीरे-धीरे अंग्रेजों के सामने कमजोर पड़ गए। दूसरी ओर, अंग्रेजों ने अपनी कूटनीति, सैन्य शक्ति और आर्थिक संसाधनों का प्रभावी उपयोग कर पूरे भारत में अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया।
अंततः इन संघर्षों का परिणाम यह हुआ कि मराठा साम्राज्य का पतन हुआ और अंग्रेजी सत्ता भारत में मजबूत हो गई। यह घटनाक्रम हमें यह सिखाता है कि केवल बाहरी शक्ति ही नहीं, बल्कि आंतरिक एकता और सुदृढ़ नेतृत्व भी किसी राष्ट्र की स्थिरता के लिए अत्यंत आवश्यक होते हैं।
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