छठी शताब्दी ई.पू. MCQ 2026: बौद्ध-जैन Top Questions

छठी शताब्दी ई०पू० MCQ – द्वितीय नगरीकरण, बौद्ध और जैन धर्म के महत्वपूर्ण प्रश्न
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प्राचीन भारत का इतिहास भाग-25 MCQ-2026

छठी शताब्दी ई०पू० MCQ | द्वितीय नगरीकरण, बौद्ध-जैन के महत्वपूर्ण MCQ 2026

छठी शताब्दी ई०पू० प्राचीन भारतीय इतिहास का एक बेहद महत्वपूर्ण दौर था, जब द्वितीय नगरीकरण, बौद्ध और जैन धर्म का उदय तथा सामाजिक-आर्थिक बदलाव तेजी से हुए। इसी काल में लोहे के उपयोग से कृषि और व्यापार का विस्तार हुआ, जिससे नए नगरों और महाजनपदों का विकास संभव हुआ। प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे UPSC, BPSC और SSC में इस टॉपिक से अक्सर प्रश्न पूछे जाते हैं। इस पोस्ट में दिए गए MCQs आपको न केवल concept clear करेंगे बल्कि exam में बेहतर प्रदर्शन करने में भी मदद करेंगे।

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प्रश्न 1. भारतीय इतिहास में द्वितीय नगरीय क्रांति किस शताब्दी में हुई?

A) चौथी शताब्दी ई०पू०
B) पाँचवीं शताब्दी ई०पू०
C) छठी शताब्दी ई०पू०
D) सातवीं शताब्दी ई०पू०

उत्तर: C) छठी शताब्दी ई०पू०

भारतीय इतिहास में प्रथम नगरीय क्रांति सैंधव (हड़प्पा) सभ्यता के समय हुई थी और यह कांस्ययुग (Bronze Age) से संबंधित थी। उस समय मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे विकसित नगर मौजूद थे। इसके बाद वैदिक काल में समाज अधिकतर ग्रामीण और कृषि आधारित हो गया और बड़े नगरों का विकास कम हो गया। लेकिन बाद में छठी शताब्दी ई०पू० के आसपास फिर से नगरों का विकास शुरू हुआ, जिसे इतिहास में द्वितीय नगरीय क्रांति कहा जाता है। यह क्रांति लौहयुग (Iron Age) से संबंधित थी। इस समय लोहे के औजारों का उपयोग बढ़ने लगा, जिससे कृषि उत्पादन में तेजी से वृद्धि हुई। अधिक उत्पादन होने पर व्यापार, बाजार और नगरों का विकास संभव हुआ। इसी कारण इस काल में कई नए नगर और महाजनपद विकसित हुए।

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प्रश्न 2. प्रथम नगरीय क्रांति किस युग से संबंधित थी?

A) लौहयुग
B) कांस्ययुग
C) पाषाणयुग
D) ताम्रयुग

उत्तर: B) कांस्ययुग

भारत में प्रथम नगरीय क्रांति सैंधव (हड़प्पा) सभ्यता के समय हुई थी और यह कांस्ययुग (Bronze Age) से संबंधित थी। इस काल में मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे सुव्यवस्थित और विकसित नगर पाए जाते हैं, जहाँ अच्छी नगर योजना, सड़कों का जाल और जल निकासी की व्यवस्था थी। इसके विपरीत द्वितीय नगरीय क्रांति लौहयुग (Iron Age) से संबंधित मानी जाती है। इस समय लोहे के औजारों के प्रयोग से कृषि का विस्तार हुआ और उत्पादन बढ़ने लगा, जिससे नए नगरों का विकास संभव हुआ। प्रथम नगरीय क्रांति मुख्य रूप से सिंधु घाटी क्षेत्र में हुई थी, जबकि द्वितीय नगरीय क्रांति गंगा के मध्यवर्ती क्षेत्र में विकसित हुई। इन दोनों क्रांतियों के क्षेत्र, समय और विशेषताओं में यह अंतर इतिहास की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।

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प्रश्न 3. द्वितीय नगरीय क्रांति किस नदी क्षेत्र में संपन्न हुई?

A) सिंधु नदी क्षेत्र
B) गंगा के मध्यवर्ती क्षेत्र
C) ब्रह्मपुत्र क्षेत्र
D) नर्मदा क्षेत्र

उत्तर: B) गंगा के मध्यवर्ती क्षेत्र

द्वितीय नगरीय क्रांति प्राचीन भारत के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी, जो गंगा के मध्यवर्ती क्षेत्र में हुई। यह क्षेत्र आज के बिहार और उत्तर प्रदेश के अंतर्गत आता है। इससे पहले प्रथम नगरीय क्रांति सिंधु और उसकी सहायक नदियों के क्षेत्र में हुई थी, जहाँ हड़प्पा सभ्यता के नगर विकसित हुए थे। बाद में छठी शताब्दी ई०पू० में गंगा क्षेत्र में फिर से कई नए नगरों का विकास होने लगा। इस समय कौशांबी, कुशीनगर और वाराणसी जैसे प्रमुख नगर उभरे। इस क्षेत्र में लौह अयस्क की प्रचुरता थी और लोहे के औजारों के प्रयोग से कृषि का तेजी से विकास हुआ। अधिक उत्पादन और व्यापार के कारण नगरों का विस्तार हुआ। इसी क्षेत्र में आगे चलकर मगध साम्राज्य का उदय हुआ, जिसने प्राचीन भारत के राजनीतिक इतिहास को नई दिशा दी।

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प्रश्न 4. छठी शताब्दी ई०पू० में द्वितीय नगरीय क्रांति का प्रमुख कारण क्या था?

A) व्यापार मार्गों का विस्तार
B) लोहे का कृषि में बड़े पैमाने पर प्रयोग
C) समुद्री व्यापार का विकास
D) राजनीतिक एकता

उत्तर: B) लोहे का कृषि में बड़े पैमाने पर प्रयोग

छठी शताब्दी ई०पू० में हुई द्वितीय नगरीय क्रांति का सबसे प्रमुख कारण लोहे का कृषि में बड़े पैमाने पर प्रयोग था। इस समय लोहे के औजार जैसे हल और अन्य कृषि उपकरणों का उपयोग बढ़ने लगा, जिससे खेतों की गहरी जुताई संभव हुई और कृषि उत्पादन में तेजी से वृद्धि हुई। जब उत्पादन आवश्यकता से अधिक होने लगा तो अधिशेष उत्पादन पैदा हुआ, जिसने व्यापार, बाजार और नगरों के विकास को बढ़ावा दिया। इसके साथ ही मगध क्षेत्र के आसपास लौह संसाधनों की प्रचुरता भी थी, जिससे कृषि और हथियार दोनों के लिए लोहे के उपकरण आसानी से बनाए जा सके। इसी समय ढलवा लोहा बनाने की नई तकनीक भी विकसित हो चुकी थी, जिसने आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन को गति दी।

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प्रश्न 5. छठी शताब्दी ई०पू० में सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन के परिणामस्वरूप लगभग कितने धार्मिक संप्रदायों का उदय हुआ?

A) 32
B) 42
C) 62
D) 72

उत्तर: C) 62

छठी शताब्दी ई०पू० में मध्य गांगेय क्षेत्र में ब्राह्मणीय सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था के विरुद्ध कई प्रकार के सुधार आंदोलन हुए। इन आंदोलनों के परिणामस्वरूप लगभग 62 धार्मिक संप्रदायों का उदय हुआ। उस समय समाज में कर्मकांड, यज्ञ और पुरोहितवाद का प्रभाव अधिक हो गया था, जिससे कई लोग असंतुष्ट थे। इसी असंतोष के कारण अनेक नए विचार और धर्म सामने आए। इन संप्रदायों में जैन धर्म और बौद्ध धर्म सबसे अधिक लोकप्रिय हुए और बाद में व्यापक रूप से फैल गए। इसके अलावा आजीवक और लोकायत जैसे अन्य संप्रदाय भी अस्तित्व में आए। इन सभी धार्मिक आंदोलनों ने समाज में नए विचार, सरल धर्म और नैतिक जीवन पर बल दिया।

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प्रश्न 6. उत्तरवैदिक समाज में वर्ण क्रम में क्षत्रियों का कौन सा स्थान था?

A) प्रथम
B) द्वितीय
C) तृतीय
D) चतुर्थ

उत्तर: B) द्वितीय

उत्तरवैदिक काल में समाज चार वर्णों में विभाजित था—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। इस व्यवस्था में ब्राह्मणों का स्थान प्रथम माना जाता था क्योंकि उनके हाथ में धार्मिक सत्ता थी, जबकि क्षत्रियों का स्थान द्वितीय था और उनके पास राजनीतिक सत्ता होती थी। इसके बाद वैश्य तीसरे स्थान पर थे जो व्यापार और कृषि से जुड़े थे, जबकि शूद्र चौथे स्थान पर रखे गए थे। हालांकि शासन का कार्य मुख्य रूप से क्षत्रियों के हाथ में था, फिर भी सामाजिक सम्मान में वे ब्राह्मणों से नीचे माने जाते थे। इसी कारण क्षत्रिय वर्ग में असंतोष उत्पन्न हुआ। यह असंतोष बाद में बौद्ध और जैन धर्म के समर्थन का एक महत्वपूर्ण कारण बना। महावीर और गौतम बुद्ध दोनों ही क्षत्रिय कुल से थे और उन्होंने उस समय की कठोर सामाजिक व्यवस्था को चुनौती दी।

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प्रश्न 7. उत्तरवैदिक काल में किस वर्ण की आर्थिक स्थिति काफी अच्छी हो गई थी?

A) ब्राह्मण
B) क्षत्रिय
C) वैश्य
D) शूद्र

उत्तर: C) वैश्य

उत्तरवैदिक काल में वैश्य वर्ण मुख्य रूप से व्यापार-वाणिज्य और आर्थिक गतिविधियों से जुड़ा हुआ था। इसी कारण समय के साथ उनकी आर्थिक स्थिति काफी मजबूत हो गई थी। वे राज्य के लिए मुख्य कर दाता भी थे और व्यापार तथा बाजारों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। फिर भी वर्ण व्यवस्था में उनका स्थान तीसरा ही माना जाता था। आर्थिक रूप से समृद्ध होने के बावजूद उन्हें समाज में उतनी प्रतिष्ठा नहीं मिलती थी क्योंकि उस समय की व्यवस्था जन्म आधारित थी और उसमें सामाजिक उन्नति की संभावना बहुत कम थी। इसी कारण वैश्य वर्ग ने बौद्ध धर्म को व्यापक समर्थन दिया, क्योंकि यह धर्म कर्म आधारित व्यवस्था और समानता की बात करता था। व्यापारियों और श्रेष्ठियों ने बौद्ध धर्म के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बौद्ध विहारों के निर्माण में भी बड़ा योगदान दिया।

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प्रश्न 8. बौद्ध और जैन धर्म के उदय में किस आर्थिक कारक की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण थी?

A) समुद्री व्यापार
B) लोहे के प्रयोग से उपजी नई कृषि अर्थव्यवस्था
C) स्वर्ण मुद्राओं का प्रचलन
D) रेशम मार्ग का विकास

उत्तर: B) लोहे के प्रयोग से उपजी नई कृषि अर्थव्यवस्था

बौद्ध और जैन धर्म के उदय के पीछे केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि आर्थिक कारण भी महत्वपूर्ण थे। लोहे के उपकरणों के प्रयोग से कृषि का तेजी से विस्तार हुआ और नई कृषिमूलक अर्थव्यवस्था विकसित होने लगी। इस नई व्यवस्था में पशुधन, विशेषकर बैल और अन्य पशु, कृषि कार्यों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो गए। लेकिन उस समय ब्राह्मणीय यज्ञों में बड़ी संख्या में पशु बलि दी जाती थी, जो इस नई कृषि अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक थी। इसलिए समाज में ऐसे विचारों और धर्मों की आवश्यकता महसूस हुई जो अहिंसा और पशुओं की रक्षा पर बल दें। इसी पृष्ठभूमि में बौद्ध और जैन धर्म का उदय हुआ, जिन्होंने अहिंसा को अपने प्रमुख सिद्धांत के रूप में स्वीकार किया। इससे स्पष्ट होता है कि उस समय के धार्मिक आंदोलन आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों से भी प्रभावित थे।

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प्रश्न 9. उत्तरवैदिक काल में यज्ञों में पशु बलि किस नई व्यवस्था के प्रतिकूल थी?

A) व्यापारिक अर्थव्यवस्था
B) मुद्रा अर्थव्यवस्था
C) नई कृषि अर्थव्यवस्था
D) सामंती अर्थव्यवस्था

उत्तर: C) नई कृषि अर्थव्यवस्था

छठी शताब्दी ई०पू० में लोहे के उपकरणों के व्यापक प्रयोग से कृषि अर्थव्यवस्था का तेजी से विकास हुआ। खेतों की जुताई और अन्य कृषि कार्यों के लिए पशुधन, विशेषकर बैलों का महत्व बहुत बढ़ गया था। लेकिन उस समय यज्ञों में बड़ी संख्या में पशु बलि दी जाती थी, जो इस नई कृषि व्यवस्था के लिए हानिकारक थी क्योंकि इससे कृषि कार्यों के लिए आवश्यक पशुओं की संख्या कम हो सकती थी। इसी कारण समाज में ऐसे विचारों की आवश्यकता महसूस हुई जो अहिंसा और पशु संरक्षण पर बल दें। इस पृष्ठभूमि में बौद्ध और जैन धर्म को किसानों और व्यापारियों का व्यापक समर्थन मिला। इन धर्मों ने अहिंसा को प्रमुख सिद्धांत के रूप में अपनाया, जिससे नई कृषि अर्थव्यवस्था को भी समर्थन मिला।

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प्रश्न 10. छठी शताब्दी ई०पू० में किस धातु के सिक्कों का प्रचलन प्रारंभ हुआ?

A) सोना
B) चाँदी
C) धातु (आहत सिक्के)
D) ताँबा

उत्तर: C) धातु (आहत सिक्के)

छठी शताब्दी ई०पू० में धातु के सिक्कों का प्रचलन प्रारंभ हुआ, जिन्हें आहत सिक्के (Punch Marked Coins) कहा जाता है। ये सिक्के सामान्यतः चाँदी या ताँबे के बने होते थे और इन पर विभिन्न प्रकार के चिह्न अंकित किए जाते थे। इन सिक्कों के उपयोग से व्यापार-वाणिज्य को एक नई गति मिली और धीरे-धीरे मौद्रिक अर्थव्यवस्था का विकास होने लगा। पहले जहाँ वस्तु विनिमय प्रणाली प्रचलित थी, वहीं अब सिक्कों के माध्यम से लेन-देन आसान हो गया। इसी समय सूद पर ऋण देने की प्रथा भी विकसित होने लगी। व्यापार और आर्थिक गतिविधियों के बढ़ने से वैश्य वर्ण की आर्थिक स्थिति और अधिक मजबूत हो गई।

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प्रश्न 11. बुद्ध और महावीर ने किस प्रकार के समाज का आदर्श प्रस्तुत किया?

A) जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था वाला
B) कर्म आधारित और समतामूलक समाज
C) राजतंत्रात्मक समाज
D) ब्राह्मण प्रधान समाज

उत्तर: B) कर्म आधारित और समतामूलक समाज

बुद्ध और महावीर ने समाज के सामने समतामूलक समाज और कर्म आधारित व्यवस्था का आदर्श प्रस्तुत किया। उस समय समाज में जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था बहुत कठोर हो चुकी थी, जिसमें सामाजिक उन्नति की संभावना लगभग नहीं थी। यदि कोई व्यक्ति निम्न वर्ण में जन्म लेता था, तो वह कितना भी योग्य क्यों न हो, उसे उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं हो सकती थी। इसी कारण समाज के कई वर्ग इस व्यवस्था से असंतुष्ट थे। विशेष रूप से क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्गों ने इन नई शिक्षाओं को स्वीकार किया। बौद्ध और जैन धर्म ने समानता, नैतिक आचरण और कर्म को महत्व देकर इस कठोर सामाजिक व्यवस्था को चुनौती दी। यही कारण था कि इन धर्मों को उस समय व्यापक जनसमर्थन प्राप्त हुआ और ये तेजी से लोकप्रिय बने।

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प्रश्न 12. उत्तरवैदिक काल में धर्म के जटिल और कर्मकांडीय होने का क्या कारण था?

A) राजाओं का हस्तक्षेप
B) मंत्रोच्चार की शुद्धता पर अत्यधिक बल
C) विदेशी प्रभाव
D) बौद्धों का विरोध

उत्तर: B) मंत्रोच्चार की शुद्धता पर अत्यधिक बल

उत्तरवैदिक काल में पहले के सरल वैदिक धर्म की जगह धर्म अधिक जटिल और कर्मकांडीय हो गया था। धार्मिक अनुष्ठानों में मंत्रोच्चार की शुद्धता पर बहुत अधिक बल दिया जाने लगा, जिसके कारण पुरोहित वर्ग की भूमिका अत्यधिक बढ़ गई। लोगों के मन में यह भय बैठा दिया गया कि यदि मंत्रों का उच्चारण गलत हुआ तो अनिष्टकारी परिणाम हो सकते हैं। साथ ही यज्ञ और पशु बलि का महत्व भी बहुत बढ़ गया, जिससे धार्मिक अनुष्ठान समय और धन की दृष्टि से अत्यंत खर्चीले हो गए। इस कारण सामान्य लोग इन धार्मिक क्रियाओं से दूर होने लगे और उन्हें ऐसे धर्म की आवश्यकता महसूस हुई जो सरल, सुलभ और सभी के लिए समान हो। इसी पृष्ठभूमि में बुद्ध और महावीर ने एक सरल और नैतिक जीवन पर आधारित धर्म का संदेश दिया, जिसे समाज में व्यापक स्वीकृति मिली।

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प्रश्न 13. छठी शताब्दी ई०पू० में उदय हुए नगरों में निम्न में से कौन सा नगर शामिल था?

A) पाटलिपुत्र
B) कौशांबी
C) तक्षशिला
D) उज्जैन

उत्तर: B) कौशांबी

छठी शताब्दी ई०पू० में द्वितीय नगरीय क्रांति के परिणामस्वरूप कौशांबी, कुशीनगर और वाराणसी जैसे महत्वपूर्ण नगरों का उदय हुआ। कौशांबी वत्स महाजनपद की राजधानी थी और यमुना नदी के किनारे स्थित होने के कारण यह एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र बन गया था। वहीं कुशीनगर बौद्ध धर्म के लिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि यहीं भगवान बुद्ध ने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था। वाराणसी (काशी) अपनी प्राचीनता और सांस्कृतिक महत्व के लिए प्रसिद्ध रहा है। ये सभी नगर उस समय व्यापार, धर्म और संस्कृति के प्रमुख केंद्र बन गए थे।

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प्रश्न 14. सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन का केंद्र कहाँ था?

A) सिंधु घाटी क्षेत्र
B) दक्षिण भारत
C) मध्य गांगेय क्षेत्र
D) पंजाब क्षेत्र

उत्तर: C) मध्य गांगेय क्षेत्र

छठी शताब्दी ई०पू०सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन का केंद्र मध्य गांगेय क्षेत्र (Middle Gangetic Plain) था, जो वर्तमान बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में स्थित है। इस क्षेत्र में लौह अयस्क की प्रचुरता थी, जिसने कृषि क्रांति और नई अर्थव्यवस्था के उदय को बढ़ावा दिया। इसी क्षेत्र में मगध साम्राज्य का भी उदय हुआ। बुद्ध (लुंबिनी/बोधगया/वाराणसी) और महावीर (वैशाली) दोनों की कर्मभूमि इसी क्षेत्र में थी। यह क्षेत्र प्राचीन भारतीय इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण भौगोलिक केंद्र माना जाता है।

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प्रश्न 15. ब्राह्मणीय व्यवस्था में निम्नलिखित में से क्या निंदनीय नहीं माना जाता था?

A) समुद्रपारीय व्यापार
B) सूद पर ऋण देना
C) यज्ञ करना
D) वेश्यावृत्ति

उत्तर: C) यज्ञ करना

ब्राह्मणीय व्यवस्था में यज्ञ को पवित्र और श्रेष्ठ कार्य माना जाता था। वहीं सूद पर ऋण देना, समुद्रपारीय व्यापार, मौद्रिक अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक भोजनालय और वेश्यावृत्ति को निंदनीय माना जाता था। लेकिन नगरीकरण के बाद ये सभी गतिविधियाँ सामान्य जीवन का हिस्सा बन गईं। इस कारण ब्राह्मणीय व्यवस्था और नई नगरीय अर्थव्यवस्था के बीच संघर्ष उत्पन्न हुआ, जो सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन का एक मुख्य कारण बना। इस प्रकार के प्रश्न अक्सर negative approach से पूछे जाते हैं और trick questions के रूप में परीक्षा में आते हैं।
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प्रश्न 16. उपनिषदों का योगदान छठी शताब्दी ई०पू० के सुधार आंदोलन में किस रूप में था?

A) यज्ञ प्रणाली को बढ़ावा देने में
B) बौद्धिक चेतना जागृत करने में
C) वर्ण व्यवस्था को मजबूत करने में
D) राजतंत्र को समर्थन देने में

उत्तर: B) बौद्धिक चेतना जागृत करने में

उपनिषदों में वर्णित सिद्धांतों ने बौद्धिक और दार्शनिक चेतना को जागृत किया, जिसने छठी शताब्दी ई०पू० के सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उपनिषदों में आत्मा, परमात्मा, कर्म और पुनर्जन्म जैसे दार्शनिक प्रश्नों पर गहन विचार किया गया। इससे लोगों में स्वतंत्र चिंतन की प्रवृत्ति उत्पन्न हुई। उपनिषदिक विचारों ने यज्ञ और कर्मकांड के बजाय आत्म-साक्षात्कार और ज्ञान पर बल दिया, जो बौद्ध और जैन दर्शन के निकट था। इसलिए उपनिषदों को इस सुधार आंदोलन का वैचारिक आधार माना जाता है।

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प्रश्न 17. छठी शताब्दी ई०पू० में सूद पर ऋण लेने वाले को क्या कहा जाता था?

A) श्रेष्ठी
B) अधम
C) वैश्य
D) गाहपति

उत्तर: B) अधम

छठी शताब्दी ई०पू० में मौद्रिक अर्थव्यवस्था के विकास के साथ सूद पर ऋण देने की प्रथा शुरू हुई। परंतु ब्राह्मणीय सामाजिक व्यवस्था में ऐसे लोगों को अधम कहा जाता था। यह नई अर्थव्यवस्था और पुरानी ब्राह्मणीय व्यवस्था के बीच टकराव का प्रतीक था। ब्राह्मणीय ग्रंथों में व्यापार, सूदखोरी और कुछ व्यवसायों को हेय दृष्टि से देखा जाता था। इसी कारण व्यापारी और साहूकार वर्ग ने उन धर्मों को अपनाया जो उनके व्यवसाय और आर्थिक हितों का सम्मान करते थे, जैसे बौद्ध धर्म

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प्रश्न 18. निम्नलिखित में से कौन सा कारण छठी शताब्दी के धार्मिक आंदोलन का कारण नहीं था?

A) वर्ण व्यवस्था की कठोरता
B) यज्ञों की जटिलता
C) विदेशी आक्रमण का भय
D) पशु बलि से कृषि को हानि

उत्तर: C) विदेशी आक्रमण का भय

छठी शताब्दी ई०पू० के सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन के मुख्य कारण थे — वर्ण व्यवस्था की कठोरता, यज्ञों की जटिलता और व्ययसाध्यता, पशु बलि से नई कृषि अर्थव्यवस्था को हानि और सरल धर्म की आकांक्षाविदेशी आक्रमण का भय इस आंदोलन का कारण नहीं था। यह एक negative type प्रश्न है जो परीक्षाओं में अक्सर आता है। सही उत्तर चुनने के लिए पाठ में उल्लिखित कारणों की सूची बनाकर गैर-उल्लिखित विकल्प पहचानना आवश्यक है।

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प्रश्न 19. प्रथम नगरीय क्रांति और द्वितीय नगरीय क्रांति में क्या समानता थी?

A) दोनों एक ही नदी क्षेत्र में हुईं
B) दोनों में अधिशेष उत्पादन प्रमुख कारक था
C) दोनों लौहयुग में हुईं
D) दोनों में यज्ञों की भूमिका थी

उत्तर: B) दोनों में अधिशेष उत्पादन प्रमुख कारक था

प्रथम नगरीय क्रांति (सैंधव सभ्यता) और द्वितीय नगरीय क्रांति (छठी शताब्दी ई०पू०) दोनों में अधिशेष उत्पादन (Surplus Production) एक प्रमुख कारक था। आवश्यकता से अधिक उत्पादन होने पर व्यापार और विशेषज्ञता संभव हुई, जिसने नगरों के उद्भव को बढ़ावा दिया। दोनों क्रांतियों में अंतर यह था कि पहली क्रांति सिंधु क्षेत्र में कांस्ययुग में हुई जबकि दूसरी गंगा क्षेत्र में लौहयुग में।

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प्रश्न 20. छठी शताब्दी ई०पू० में क्षत्रियों की मुख्य शिकायत क्या थी?

A) उन्हें कर देना पड़ता था
B) शासन का प्रधान होते हुए भी सामाजिक दर्जा ब्राह्मणों से नीचे था
C) उन्हें युद्ध में भाग लेना पड़ता था
D) उनके पास भूमि नहीं थी

उत्तर: B) शासन का प्रधान होते हुए भी सामाजिक दर्जा ब्राह्मणों से नीचे था

उत्तरवैदिक समाज में क्षत्रिय राजनीतिक दृष्टि से सर्वोच्च थे — वे राजा और शासक थे, युद्ध लड़ते थे और राज्य का संचालन करते थे। परंतु सामाजिक वर्ण क्रम में उनका स्थान ब्राह्मणों से नीचे, द्वितीय स्थान पर था। यह विरोधाभास क्षत्रियों में असंतोष पैदा करता था। इसी कारण महावीर और बुद्ध ने ब्राह्मणीय वर्चस्व को चुनौती दी और क्षत्रिय राजाओं ने उन्हें संरक्षण दिया। बिम्बिसार और अजातशत्रु जैसे राजाओं का बौद्ध धर्म का समर्थन इसी संदर्भ में समझा जा सकता है।

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प्रश्न 21. छठी शताब्दी ई०पू० में मगध के आसपास के क्षेत्र में किसकी प्रचुरता थी?

A) स्वर्ण भंडार
B) लौह संसाधन
C) हाथीदाँत
D) चाँदी

उत्तर: B) लौह संसाधन

छठी शताब्दी ई०पू० में मगध साम्राज्य के उदय का प्रमुख कारण लौह संसाधनों की प्रचुरता था। वर्तमान झारखंड और छोटानागपुर क्षेत्र में लौह अयस्क के भंडार थे और ढलवा लोहा बनाने की तकनीक विकसित हो चुकी थी। इन संसाधनों का उपयोग कृषि उपकरण और सैन्य हथियार बनाने में किया गया। इसके कारण मगध कृषि और सैन्य दृष्टि से शक्तिशाली बना और उसने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की।

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प्रश्न 22. जैन और बौद्ध धर्म में अहिंसा पर बल देने का मुख्य आर्थिक कारण क्या था?

A) युद्ध बंद करना
B) पशुधन की रक्षा कर कृषि अर्थव्यवस्था को बचाना
C) व्यापार बढ़ाना
D) मांसाहार बंद करना

उत्तर: B) पशुधन की रक्षा कर कृषि अर्थव्यवस्था को बचाना

छठी शताब्दी ई०पू० में लोहे के उपकरण से कृषि विस्तार हुआ और पशुधन — विशेषकर बैल — कृषि के लिए आवश्यक बने। लेकिन ब्राह्मणीय यज्ञ में पशु बलि से पशुधन की संख्या घटती थी और कृषि प्रभावित होती थी। इसलिए नई कृषि अर्थव्यवस्था के लिए पशुओं की सुरक्षा जरूरी थी। बौद्ध और जैन धर्म ने अहिंसा का उपदेश देकर इस आर्थिक आवश्यकता को धार्मिक रूप दिया।

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प्रश्न 23. सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?

A) यह केवल धार्मिक कारणों से हुआ
B) इसका कारण केवल सामाजिक विषमता थी
C) इसके पीछे सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक सभी कारण थे
D) यह विदेशी प्रेरणा से हुआ

उत्तर: C) इसके पीछे सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक सभी कारण थे

छठी शताब्दी ई०पू० का सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन बहुकारणीय था। सामाजिक कारण थे — जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था की कठोरता और असंतोष। धार्मिक कारण थे — कर्मकांडों की जटिलता, यज्ञों की व्ययसाध्यता, पुरोहित वर्ग का वर्चस्व। आर्थिक कारण थे — लोहे से उपजी कृषि अर्थव्यवस्था, मौद्रिक अर्थव्यवस्था का विकास, और व्यापारी वर्ग की नई आकांक्षाएं।

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प्रश्न 24. शूद्रों की स्थिति के संदर्भ में कौन सा कथन सही है?

A) वे मुख्य कर दाता थे
B) उनके ऊपर अनेक अपात्रताएं लादी गई थीं
C) उन्हें धार्मिक कार्यों में प्राथमिकता मिलती थी
D) उनकी स्थिति वैश्यों से बेहतर थी

उत्तर: B) उनके ऊपर अनेक अपात्रताएं लादी गई थीं

उत्तरवैदिक काल में शूद्र वर्ग की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उनका मुख्य कार्य ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की सेवा करना था। उन्हें अपात्रताएं लगाई गई थीं और वे वेद पढ़ने, यज्ञ करने और संपत्ति रखने जैसे अधिकारों से वंचित थे। सामाजिक व्यवस्था में उच्च वर्ण को श्रेष्ठ माना जाता था। शूद्रों की यह स्थिति उन्हें बौद्ध और जैन धर्म की ओर आकर्षित करती थी क्योंकि ये धर्म समानता और अधिकार का संदेश देते थे।

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प्रश्न 25. छठी शताब्दी ई०पू० की क्रांतिकारी घटनाओं में निम्नलिखित में से कौन सी घटना शामिल नहीं थी?

A) द्वितीय नगरीय क्रांति
B) सोलह महाजनपदों का उदय
C) प्रथम बौद्ध संगीति
D) मगध साम्राज्य का उदय

उत्तर: C) प्रथम बौद्ध संगीति

छठी शताब्दी ई०पू० की प्रमुख क्रांतिकारी घटनाएँ थीं — द्वितीय नगरीय क्रांति, सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन, बौद्ध एवं जैन धर्म का उदय, सोलह महाजनपदों का उदय, और मगध साम्राज्य का उदयप्रथम बौद्ध संगीति बुद्ध के महापरिनिर्वाण (483 ई०पू०) के तुरंत बाद हुई थी और यह पाँचवीं शताब्दी ई०पू० की घटना थी, छठी की नहीं। यह एक tricky question है जो परीक्षाओं में भ्रम पैदा करने के लिए पूछा जाता है।

छठी शताब्दी ई०पू० का यह MCQ सेट द्वितीय नगरीकरण, बौद्ध और जैन धर्म तथा सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों को समझने का एक बेहतरीन माध्यम है। इन प्रश्नों के माध्यम से आप परीक्षा में पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण टॉपिक्स पर अच्छी पकड़ बना सकते हैं। यदि आप UPSC, BPSC या SSC जैसी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, तो ऐसे MCQs आपके लिए बेहद उपयोगी साबित होंगे। अपनी तैयारी को मजबूत बनाने के लिए इन्हें बार-बार revise करें।

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