बौद्ध धर्म के 25 महत्वपूर्ण | UPSC, BPSC, SSC परीक्षा हेतु

बौद्ध धर्म के 25 महत्वपूर्ण प्रश्न UPSC BPSC SSC परीक्षा हेतु

प्राचीन भारत का इतिहास भाग-31 MCQ-2026

बौद्ध धर्म के 25 महत्वपूर्ण | UPSC, BPSC, SSC परीक्षा हेतु MCQ 2026

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प्रश्न 1. प्रथम बौद्ध संगीति कब और कहाँ हुई थी?

(A) 483 ई०पू०, राजगृह
(B) 383 ई०पू०, वैशाली
(C) 250 ई०पू०, पाटलिपुत्र
(D) 72 ई०, कुण्डलवन

उत्तर: (A) 483 ई०पू०, राजगृह

प्रथम बौद्ध संगीति (First Buddhist Council) 483 ई०पू० में मगध की राजधानी राजगृह में आयोजित हुई, जो महात्मा बुद्ध की मृत्यु के तुरंत बाद हुई थी। इसकी अध्यक्षता महाकश्यप ने की तथा इसे मगध नरेश अजातशत्रु का संरक्षण प्राप्त था। इस संगीति में आनंद ने सुत्त पिटक (बुद्ध के उपदेश) का और उपालि ने विनय पिटक (संघ के नियम) का वाचन किया। कुल चार बौद्ध संगीतियाँ हुईं—483 ई०पू०-राजगृह, 383 ई०पू०-वैशाली, 250 ई०पू०-पाटलिपुत्र (अशोक काल), 72 ई०-कुण्डलवन (कनिष्क काल)—जो परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

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प्रश्न 2. प्रथम बौद्ध संगीति की अध्यक्षता किसने की थी?

(A) आनंद
(B) उपालि
(C) महाकश्यप
(D) सारिपुत्त

उत्तर: (C) महाकश्यप

प्रथम बौद्ध संगीति (राजगृह, 483 ई०पू०) की अध्यक्षता महाकश्यप ने की, जो महात्मा बुद्ध के प्रमुख शिष्य एवं महापरिनिर्वाण के बाद संघ के वरिष्ठतम सदस्य थे। इस संगीति में आनंद ने सुत्त पिटक (बुद्ध के उपदेश) का तथा उपालि ने विनय पिटक (संघ के नियम) का वाचन किया। इसे मगध नरेश अजातशत्रु का संरक्षण प्राप्त था। इस संगीति का मुख्य उद्देश्य बुद्ध की शिक्षाओं का संकलन और संरक्षण करना था, ताकि वे भविष्य में सुरक्षित रह सकें।

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प्रश्न 3. द्वितीय बौद्ध संगीति किस स्थान पर हुई थी?

(A) राजगृह
(B) वैशाली
(C) पाटलिपुत्र
(D) कुण्डलवन

उत्तर: (B) वैशाली

द्वितीय बौद्ध संगीति 383 ई०पू० में वैशाली में आयोजित हुई, जिसकी अध्यक्षता साबकमीर (Sabakami) ने की। इस संगीति में संघ के अनुशासन से जुड़े 10 विवादास्पद नियमों पर गहन चर्चा हुई। इन मतभेदों के कारण बौद्ध धर्म में पहला बड़ा विभाजन हुआ, जिससे दो प्रमुख शाखाएँ बनीं—थेरवाद (स्थविरवाद) और महासंघिक। आगे चलकर इन्हीं से महायान और हीनयान (थेरवाद) का विकास हुआ। वैशाली संगीति का महत्व इस कारण अत्यधिक है कि यहीं से बौद्ध धर्म में विभाजन की प्रक्रिया शुरू हुई

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प्रश्न 4. तृतीय बौद्ध संगीति किसके शासनकाल में हुई थी?

(A) बिम्बिसार
(B) चंद्रगुप्त मौर्य
(C) अशोक
(D) कनिष्क

उत्तर: (C) अशोक

तृतीय बौद्ध संगीति 250 ई०पू० में पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) में सम्राट अशोक के शासनकाल में आयोजित हुई। इसकी अध्यक्षता मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की। इस संगीति में अभिधम्म पिटक को त्रिपिटक में शामिल किया गया, जिससे बौद्ध साहित्य पूर्ण रूप में व्यवस्थित हुआ। साथ ही बौद्ध धर्म के अंतर्राष्ट्रीय प्रसार हेतु विभिन्न देशों में धर्म प्रचारकों को भेजने का निर्णय लिया गया। अशोक ने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा। यह संगीति बौद्ध धर्म के वैश्विक विस्तार की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

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प्रश्न 5. चतुर्थ बौद्ध संगीति किसके संरक्षण में हुई थी?

(A) हर्षवर्धन
(B) चंद्रगुप्त द्वितीय
(C) कनिष्क
(D) समुद्रगुप्त

उत्तर: (C) कनिष्क

चतुर्थ बौद्ध संगीति लगभग 72 ई० में कुण्डलवन (कश्मीर) में कुशाण शासक कनिष्क के संरक्षण में आयोजित हुई। इसकी अध्यक्षता वसुमित्र ने की तथा अश्वघोष उपाध्यक्ष थे। इस संगीति में बौद्ध धर्म का औपचारिक विभाजन दो प्रमुख धाराओं—हीनयान (थेरवाद) और महायान—में हुआ। महायान का प्रसार मध्य एशिया, चीन, जापान, कोरिया आदि में हुआ, जबकि हीनयान (थेरवाद) श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड में विकसित हुआ। कनिष्क को महायान बौद्ध धर्म का प्रमुख संरक्षक माना जाता है।

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प्रश्न 6. बौद्ध धर्म की किस संगीति में हीनयान और महायान का विभाजन हुआ था?

(A) प्रथम संगीति
(B) द्वितीय संगीति
(C) तृतीय संगीति
(D) चतुर्थ संगीति

उत्तर: (D) चतुर्थ संगीति

बौद्ध धर्म का औपचारिक विभाजन चतुर्थ संगीति (72 ई०, कुण्डलवन, कनिष्क के समय) में हीनयान (थेरवाद) और महायान के रूप में हुआ। हीनयान के अनुसार मुक्ति केवल व्यक्तिगत प्रयास से प्राप्त होती है और बुद्ध एक महापुरुष हैं, देवता नहीं। जबकि महायान में बुद्ध को देवतुल्य माना गया तथा बोधिसत्व की अवधारणा विकसित हुई, जो दूसरों के उद्धार हेतु कार्य करते हैं। हीनयान की भाषा पालि है, जबकि महायान की भाषा संस्कृत है। हीनयान का प्रसार श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड में तथा महायान का विस्तार चीन, जापान, कोरिया जैसे क्षेत्रों में हुआ।

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प्रश्न 7. बौद्ध धर्म का पवित्र ग्रंथ त्रिपिटक के कितने भाग हैं?

(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच

उत्तर: (B) तीन

बौद्ध धर्म का पवित्र ग्रंथ ‘त्रिपिटक’ (Tipitaka) तीन भागों में विभाजित है—
(1) विनय पिटक: इसमें संघ के नियम और अनुशासन का वर्णन है; इसका वाचन प्रथम संगीति में उपालि ने किया।
(2) सुत्त पिटक: इसमें महात्मा बुद्ध के उपदेश संकलित हैं; इसका वाचन आनंद ने किया।
(3) अभिधम्म पिटक: इसमें बौद्ध दर्शन का गहन विश्लेषण है, जिसे तृतीय संगीति (250 ई०पू०, पाटलिपुत्र) में जोड़ा गया।
‘पिटक’ का अर्थ टोकरी होता है। त्रिपिटक पालि भाषा में रचित है और यह बौद्ध धर्म का सबसे प्राचीन व प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है।

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प्रश्न 8. ‘विनय पिटक’ में क्या है?

(A) बुद्ध के उपदेश
(B) बौद्ध दर्शन का विश्लेषण
(C) बौद्ध संघ के नियम और अनुशासन
(D) बुद्ध की जीवनी

उत्तर: (C) बौद्ध संघ के नियम और अनुशासन

‘विनय पिटक’ में बौद्ध संघ के नियम, अनुशासन और विधि-विधान का विस्तृत वर्णन मिलता है। प्रथम बौद्ध संगीति (483 ई०पू०, राजगृह) में इसका वाचन उपालि ने किया था। ‘विनय’ का अर्थ अनुशासन होता है, इसलिए इसमें भिक्षुओं और भिक्षुणियों के आचरण संबंधी सभी नियम सम्मिलित हैं। त्रिपिटक के तीन भागविनय पिटक (संघ के नियम), सुत्त पिटक (बुद्ध के उपदेश), अभिधम्म पिटक (दार्शनिक विश्लेषण)—अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उपालि (विनय) और आनंद (सुत्त) के वाचन संबंधी तथ्य परीक्षाओं में अक्सर पूछे जाते हैं। विनय पिटक से बौद्ध संघ के प्रारंभिक इतिहास की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

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प्रश्न 9. बौद्ध धर्म और जैन धर्म में एक समानता क्या है?

(A) दोनों ने वेदों को प्रमाण माना
(B) दोनों ने अहिंसा पर बल दिया
(C) दोनों के ग्रंथ संस्कृत में हैं
(D) दोनों के संस्थापक ब्राह्मण थे

उत्तर: (B) दोनों ने अहिंसा पर बल दिया

बौद्ध धर्म और जैन धर्म दोनों में अहिंसा को केंद्रीय स्थान प्राप्त है। दोनों ने वेदों की सत्ता को अस्वीकार किया, इसलिए इन्हें नास्तिक दर्शन कहा जाता है। दोनों धर्मों के संस्थापक क्षत्रिय थे—महात्मा बुद्ध (शाक्य क्षत्रिय) और महावीर (ज्ञातृ क्षत्रिय)। साथ ही दोनों ने जाति व्यवस्था का विरोध किया। मुख्य अंतर यह है कि जैन धर्म में अहिंसा अत्यंत कठोर/कट्टर रूप में मानी जाती है, जबकि बौद्ध धर्म में ‘मध्यम मार्ग’ का सिद्धांत अपनाया गया है। जैन धर्म का साहित्य अर्द्धमागधी भाषा में और बौद्ध धर्म का साहित्य पालि भाषा में रचित है, जो परीक्षाओं में अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य हैं।

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प्रश्न 10. बौद्ध धर्म में ‘निर्वाण’ का क्या अर्थ है?

(A) स्वर्ग की प्राप्ति
(B) तृष्णा और अज्ञान का विनाश — मुक्ति की अवस्था
(C) पुनर्जन्म
(D) देवत्व की प्राप्ति

उत्तर: (B) तृष्णा और अज्ञान का विनाश — मुक्ति की अवस्था

बौद्ध धर्म में ‘निर्वाण’ (Nirvana / Nibbana) का अर्थ है तृष्णा (इच्छा), अज्ञान और राग-द्वेष का पूर्ण नाश, जिससे पुनर्जन्म के चक्र (संसार) से मुक्ति मिलती है। ‘निर्वाण’ का शाब्दिक अर्थ ‘बुझ जाना’ है, जैसे दीपक का शांत हो जाना। यह बौद्ध धर्म का परम लक्ष्य माना जाता है और जीवित अवस्था में भी प्राप्त किया जा सकता है। महात्मा बुद्ध को बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के समय निर्वाण की अवस्था प्राप्त हुई, जबकि मृत्यु के समय प्राप्त निर्वाण को महापरिनिर्वाण कहा जाता है। निर्वाण की तुलना हिंदू धर्म के ‘मोक्ष’ और जैन धर्म के ‘मुक्ति’ से की जा सकती है, जो सभी में अंतिम मुक्ति का द्योतक है।

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प्रश्न 11. ‘बोधिसत्व’ की अवधारणा किस बौद्ध सम्प्रदाय में है?

(A) हीनयान (थेरवाद)
(B) महायान
(C) वज्रयान
(D) दोनों (B) और (C)

उत्तर: (D) दोनों (B) और (C)

‘बोधिसत्व’ (Bodhisattva) की अवधारणा महायान और वज्रयान बौद्ध धर्म में प्रमुख रूप से मिलती है। बोधिसत्व वह होता है जो बुद्धत्व प्राप्त करने में सक्षम होने के बावजूद सभी प्राणियों के कल्याण और उद्धार के लिए पुनः जन्म लेता रहता है।
महायान बौद्ध धर्म में अवलोकितेश्वर, मंजुश्री, मैत्रेय आदि प्रमुख बोधिसत्व माने जाते हैं। यहाँ बुद्ध को देवतुल्य माना जाता है और भक्ति का भी महत्व है। इसके विपरीत, हीनयान (थेरवाद) में ‘अर्हत’ की अवधारणा प्रमुख है, जिसमें व्यक्ति स्वयं के प्रयास से मुक्ति प्राप्त करता है। इस प्रकार बोधिसत्व बनाम अर्हत की धारणा महायान और हीनयान के बीच एक महत्वपूर्ण वैचारिक अंतर को दर्शाती है।

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प्रश्न 12. महात्मा बुद्ध ने किस मार्ग को ‘मध्यम मार्ग’ कहा था?

(A) अत्यधिक विलासिता और कठोर तपस्या — दोनों से बचने का मार्ग
(B) केवल तपस्या का मार्ग
(C) केवल गृहस्थ जीवन का मार्ग
(D) केवल ध्यान का मार्ग

उत्तर: (A) अत्यधिक विलासिता और कठोर तपस्या — दोनों से बचने का मार्ग

महात्मा बुद्ध का ‘मध्यम मार्ग’ (Middle Path / Majjhिमा प्रतिपदा) वह मार्ग है जो अत्यधिक विलासिता (राजमहल का जीवन) और अत्यधिक कठोर तपस्या (6 वर्षों की साधना) — दोनों के बीच संतुलन स्थापित करता है। बुद्ध ने इसे वीणा के तार की उपमा से समझाया—न बहुत ढीले, न बहुत कसे। यह सिद्धांत उन्हें सुजाता की खीर ग्रहण करने के बाद प्राप्त अनुभव से स्पष्ट हुआ, जब उन्होंने समझा कि अत्यधिक तपस्या भी ज्ञान के लिए पर्याप्त नहीं है। मध्यम मार्ग का व्यावहारिक रूप ‘अष्टांगिक मार्ग’ है, जिसमें सम्यक दृष्टि, संकल्प, वाणी, कर्म, आजीविका, प्रयास, स्मृति और समाधि शामिल हैं। यह बौद्ध दर्शन की अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है।

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प्रश्न 13. ‘अष्टांगिक मार्ग’ में कितने अंग हैं?

(A) चार
(B) छः
(C) आठ
(D) दस

उत्तर: (C) आठ

महात्मा बुद्ध का ‘अष्टांगिक मार्ग’ (Eightfold Path / अट्टांगिक मग्ग) बौद्ध धर्म का व्यावहारिक मार्ग है, जो चतुर्थ आर्य सत्य (दुःख निरोध मार्ग) को दर्शाता है। इसके आठ अंग हैं—
(1) सम्यक् दृष्टि, (2) सम्यक् संकल्प, (3) सम्यक् वाक्, (4) सम्यक् कर्मांत, (5) सम्यक् आजीव, (6) सम्यक् व्यायाम, (7) सम्यक् स्मृति, (8) सम्यक् समाधि
इन अंगों को तीन वर्गों में बाँटा गया है—
प्रज्ञा (1-2), शील (3-5), समाधि (6-8)
भारत के राष्ट्रीय ध्वज में स्थित 24 तीलियों वाला चक्र सम्राट अशोक के धर्मचक्र का प्रतीक है।

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प्रश्न 14. ‘तथागत’ का क्या अर्थ है?

(A) महान् राजा
(B) इस प्रकार आया / इस प्रकार गया
(C) वेदों का ज्ञाता
(D) शाक्यों का मुनि

उत्तर: (B) इस प्रकार आया / इस प्रकार गया

‘तथागत’ (Tathāgata) महात्मा बुद्ध का एक महत्वपूर्ण उपनाम है। पालि में इसका अर्थ “इस प्रकार आया” (tathā + āgata) या “इस प्रकार गया” (tathā + gata) माना जाता है। यह शब्द उस अवस्था को दर्शाता है जिसमें बुद्ध परम सत्य को प्राप्त कर चुके हैं और पूर्ववर्ती बुद्धों के समान मार्ग का अनुसरण करते हैं। बौद्ध साहित्य में बुद्ध को ‘तथागत’ कहकर संबोधित करने की परंपरा रही है। उनके अन्य प्रमुख नाम भी महत्वपूर्ण हैं— बुद्ध (जागृत), शाक्यमुनि (शाक्य कुल के मुनि), सम्यक् सम्बुद्ध (पूर्णतः जागृत)। इन सभी उपनामों के अर्थ परीक्षाओं में अक्सर पूछे जाते हैं

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प्रश्न 15. महात्मा बुद्ध के समय मगध का राजा कौन था?

(A) अजातशत्रु
(B) बिम्बिसार
(C) चंद्रगुप्त मौर्य
(D) उदयन

उत्तर: (B) बिम्बिसार

महात्मा बुद्ध के जीवनकाल में मगध का शासक बिम्बिसार था, जो हर्यंक वंश का प्रमुख राजा और बौद्ध धर्म का समर्थक था। उसने राजगृह में वेलुवन विहार बनवाकर बुद्ध को दान दिया, जिससे दोनों के बीच घनिष्ठ संबंध स्थापित हुए। बिम्बिसार का पुत्र अजातशत्रु बाद में राजा बना और उसने अपने पिता को कारागार में डालकर मृत्यु दिलाई। बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद प्रथम बौद्ध संगीति अजातशत्रु के संरक्षण में आयोजित हुई। बिम्बिसार जैन धर्म के संस्थापक महावीर का भी समकालीन था। बिम्बिसार-अजातशत्रु और बौद्ध धर्म का संबंध परीक्षाओं में बार-बार पूछा जाने वाला महत्वपूर्ण विषय है।

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प्रश्न 16. ‘पंचशील’ के सिद्धांत में कितने नियम हैं?

(A) तीन
(B) पाँच
(C) आठ
(D) दस

उत्तर: (B) पाँच

बौद्ध धर्म के ‘पंचशील’ में पाँच नैतिक नियम शामिल हैं, जो विशेष रूप से गृहस्थ उपासकों के लिए निर्धारित हैं— (1) अहिंसा (किसी जीव की हत्या नहीं), (2) अचौर्य (चोरी नहीं), (3) कामुक दुराचार से विरति, (4) मृषावाद-विरति (झूठ नहीं), (5) मद्यपान-विरति (नशा नहीं)। भिक्षुओं के लिए इनसे अधिक कठोर नियम निर्धारित हैं। 1954 का भारत-चीन ‘पंचशील’ समझौता अलग है, जिसके 5 कूटनीतिक सिद्धांत हैं। बौद्ध पंचशील धार्मिक आचार-संहिता है, जबकि भारत-चीन पंचशील एक कूटनीतिक समझौता है—इन दोनों में भ्रम नहीं करना चाहिए।

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प्रश्न 17. बौद्ध धर्म में ‘कर्म’ का सिद्धांत किससे संबंधित है?

(A) ईश्वर की इच्छा से
(B) व्यक्ति के कर्मों का फल उसे मिलता है
(C) जाति के आधार पर भाग्य
(D) वेदों के पाठ से मुक्ति

उत्तर: (B) व्यक्ति के कर्मों का फल उसे मिलता है

बौद्ध धर्म में ‘कर्म’ का सिद्धांत बताता है कि व्यक्ति के कर्म (actions) ही उसके भविष्य और पुनर्जन्म को निर्धारित करते हैं। अच्छे कर्म अच्छे परिणाम देते हैं, जबकि बुरे कर्म दुःखद परिणाम लाते हैं। बौद्ध धर्म में ईश्वर की अवधारणा प्रमुख नहीं है—महात्मा बुद्ध ने ईश्वर के अस्तित्व के प्रश्न पर मौन रखा। उनका मत था कि मोक्ष/निर्वाण के लिए ईश्वर नहीं, बल्कि सही कर्म और ज्ञान आवश्यक हैं। बौद्ध कर्म सिद्धांत की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें शाश्वत आत्मा (Soul) का निषेध किया गया है, जबकि हिंदू धर्म में आत्मा को स्थायी माना जाता है। यही अंतर दोनों के कर्म सिद्धांत को अलग बनाता है।

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प्रश्न 18. सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म कब अपनाया थी ?

(A) गद्दी पर बैठने के तुरंत बाद
(B) कलिंग युद्ध (261 ई०पू०) के बाद
(C) अपनी माँ के कहने पर
(D) तृतीय बौद्ध संगीति से पहले

उत्तर: (B) कलिंग युद्ध (261 ई०पू०) के बाद

सम्राट अशोक ने 261 ई०पू० के कलिंग युद्ध के बाद बौद्ध धर्म अपनाया। इस युद्ध में हुई भीषण जन-हानि ने उनके हृदय में गहरा परिवर्तन उत्पन्न किया, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने धम्म नीति को अपनाया। उनके गुरु उपगुप्त (निग्रोध) थे। अशोक ने बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण दिया और इसके वैश्विक प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने 84,000 स्तूपों का निर्माण कराया, चार प्रमुख बौद्ध तीर्थों की यात्रा की तथा अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका में धर्म प्रचार हेतु भेजा। अशोक के प्रयासों के कारण ही बौद्ध धर्म भारत से बाहर विश्व स्तर पर फैल सका—इसलिए उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

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प्रश्न 19. महात्मा बुद्ध ने किस सामाजिक बुराई का विरोध किया थी ?

(A) केवल पशु बलि
(B) जाति व्यवस्था और पशु बलि दोनों
(C) केवल जाति व्यवस्था
(D) केवल स्त्री-शोषण

उत्तर: (B) जाति व्यवस्था और पशु बलि दोनों

महात्मा बुद्ध ने जाति व्यवस्था और पशु बलि—दोनों का स्पष्ट विरोध किया। उन्होंने जन्म आधारित जाति व्यवस्था को अस्वीकार कर कर्म को ही श्रेष्ठता का आधार माना। बौद्ध संघ में सभी जातियों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—को समान रूप से प्रवेश मिला। इसका उदाहरण उपालि हैं, जो नाई (शूद्र) होने के बावजूद संघ में उच्च स्थान पर प्रतिष्ठित हुए। अहिंसा के सिद्धांत के कारण बुद्ध ने पशु बलि का भी विरोध किया। यह दृष्टिकोण तत्कालीन ब्राह्मण धर्म की कुरीतियों के विरुद्ध एक सामाजिक सुधार आंदोलन के रूप में उभरा। इसी कारण बौद्ध धर्म को समाज के निचले वर्गों में व्यापक लोकप्रियता मिली और आगे चलकर कई आधुनिक सामाजिक सुधारकों ने भी इसे अपनाया।

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प्रश्न 20. ‘थेरवाद’ बौद्ध धर्म मुख्यतः किन देशों में प्रचलित है?

(A) चीन, जापान, कोरिया
(B) श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड
(C) तिब्बत, भूटान, मंगोलिया
(D) नेपाल, भारत, पाकिस्तान

उत्तर: (B) श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड

बौद्ध धर्म के तीन प्रमुख सम्प्रदाय हैं—थेरवाद (हीनयान), महायान और वज्रयान (तंत्रयान)

थेरवाद (हीनयान) का अर्थ है “बुजुर्गों/आचार्यों का मत” और इसे बौद्ध धर्म की मूल शिक्षाओं के सबसे निकट माना जाता है। इसका प्रसार दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में हुआ—श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया, लाओस आदि। इसमें पालि भाषा को पवित्र माना जाता है।
महायान बौद्ध धर्म का प्रसार पूर्वी एशिया में हुआ—चीन, जापान, कोरिया, वियतनाम। इसमें बोधिसत्व की अवधारणा और बुद्ध को देवतुल्य मानने की परंपरा प्रमुख है।
वज्रयान (तंत्रयान) का विकास तिब्बत, भूटान, मंगोलिया आदि क्षेत्रों में हुआ, जिसमें तांत्रिक साधनाओं का विशेष महत्व है।
थेरवाद, महायान और वज्रयान—ये तीनों सम्प्रदाय परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

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प्रश्न 21. चतुर्थ बौद्ध संगीति की अध्यक्षता किसने की थी ?

(A) मोग्गलिपुत्त तिस्स
(B) साबकमीर
(C) वसुमित्र
(D) अश्वघोष

उत्तर: (C) वसुमित्र

चतुर्थ बौद्ध संगीति (72 ई०, कुण्डलवन, कश्मीर) कुशाण शासक कनिष्क के संरक्षण में आयोजित हुई। इसकी अध्यक्षता वसुमित्र ने की तथा अश्वघोष उपाध्यक्ष थे। चारों बौद्ध संगीतियों के अध्यक्ष(1) प्रथम: महाकश्यप (2) द्वितीय: साबकमीर (3) तृतीय: मोग्गलिपुत्त तिस्स (4) चतुर्थ: वसुमित्रयह क्रम परीक्षाओं में अत्यंत महत्वपूर्ण है। अश्वघोष एक प्रसिद्ध बौद्ध कवि थे, जिन्होंने ‘बुद्धचरित’ (महात्मा बुद्ध की जीवनी) की रचना संस्कृत में की। वहीं वसुमित्र एक प्रमुख बौद्ध दार्शनिक थे, जो सर्वास्तिवाद सम्प्रदाय से संबंधित थे।

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प्रश्न 22. ‘बुद्धचरित’ की रचना किसने की थी ?

(A) नागार्जुन
(B) अश्वघोष
(C) वसुबंधु
(D) धर्मकीर्ति

उत्तर: (B) अश्वघोष

‘बुद्धचरित’ (Buddhacharita) की रचना महान् बौद्ध कवि अश्वघोष ने संस्कृत भाषा में की। यह महात्मा बुद्ध के जीवन पर आधारित एक महाकाव्य है, जिसे संस्कृत साहित्य की उत्कृष्ट कृतियों में गिना जाता है। अश्वघोष कनिष्क के दरबारी कवि थे और चतुर्थ बौद्ध संगीति में उपाध्यक्ष भी रहे। उन्होंने ‘सौंदरानंद’ (नंद की कथा) की भी रचना की। महत्वपूर्ण बौद्ध विद्वान और उनकी रचनाएँनागार्जुनमाध्यमिका दर्शन वसुबंधुअभिधर्मकोश अश्वघोषबुद्धचरित धर्मकीर्तिप्रमाणवार्तिक

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प्रश्न 23. निम्नलिखित में कौन-सा बौद्ध धर्म और जैन धर्म का मुख्य अंतर है?

(A) बौद्ध ने अहिंसा पर बल दिया, जैन ने नहीं
(B) बौद्ध ने मध्यम मार्ग अपनाया, जैन में कठोर तपस्या पर बल
(C) जैन ने वेदों को माना, बौद्ध ने नहीं
(D) जैन का साहित्य पालि में है

उत्तर: (B) बौद्ध ने मध्यम मार्ग अपनाया, जैन में कठोर तपस्या पर बल

बौद्ध धर्म और जैन धर्म का प्रमुख अंतर उनके जीवन-दर्शन में है। बौद्ध धर्म ‘मध्यम मार्ग’ (न अति विलासिता, न अति तपस्या) को मानता है, जबकि जैन धर्म में कठोर तपस्या और कायक्लेश पर विशेष बल दिया जाता है। महावीर ने 12 वर्षों की कठोर तपस्या की और नग्न जीवन अपनाया। दूसरा महत्वपूर्ण अंतर यह है कि जैन धर्म में ‘आत्मा (जीव)’ की अवधारणा है, जबकि बौद्ध धर्म ‘अनात्मवाद’ (No-self) को मानता है। भाषा के आधार परजैन साहित्य अर्द्धमागधी में तथा बौद्ध साहित्य पालि में रचित है। हालाँकि, दोनों धर्मों ने वेदों की सत्ता को अस्वीकार किया।

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प्रश्न 24. तृतीय बौद्ध संगीति की अध्यक्षता किसने की थी?

(A) महाकश्यप
(B) साबकमीर
(C) मोग्गलिपुत्त तिस्स
(D) वसुमित्र

उत्तर: (C) मोग्गलिपुत्त तिस्स

तृतीय बौद्ध संगीति (250 ई०पू०, पाटलिपुत्र) सम्राट अशोक के शासनकाल में आयोजित हुई, जिसकी अध्यक्षता मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की। इस संगीति में ‘अभिधम्म पिटक’ को त्रिपिटक में शामिल किया गया, जिससे बौद्ध साहित्य और अधिक व्यवस्थित हुआ।
इसी संगीति में बौद्ध धर्म के विदेशों में प्रचार के लिए धर्म प्रचारकों को भेजने का निर्णय लिया गया। मोग्गलिपुत्त तिस्स ने ‘कथावत्थु’ नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें तत्कालीन बौद्ध सम्प्रदायों के मतों का खंडन किया गया। अशोक इस संगीति के महान् संरक्षक थे। चारों बौद्ध संगीतियों के अध्यक्षों का क्रम इस प्रकार है महाकश्यप, साबकमीर, मोग्गलिपुत्त तिस्स, वसुमित्र

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प्रश्न 25. ‘नालंदा विश्वविद्यालय’ का संबंध किस धर्म से है?

(A) हिंदू धर्म
(B) जैन धर्म
(C) बौद्ध धर्म
(D) इस्लाम

उत्तर: (C) बौद्ध धर्म

नालंदा विश्वविद्यालय बौद्ध धर्म से संबंधित विश्व का सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध विश्वविद्यालय था, जो बिहार के नालंदा में स्थित था। इसकी स्थापना गुप्त काल (5वीं शताब्दी ई०) में हुई। यहाँ हजारों छात्र और सैकड़ों आचार्य बौद्ध दर्शन, तर्कशास्त्र, चिकित्सा आदि विषयों का अध्ययन करते थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग ने इसके शैक्षणिक स्तर और व्यवस्था का विस्तृत वर्णन किया है 1193 ई० में बख्तियार खिलजी ने इस महान विश्वविद्यालय को आग लगाकर नष्ट कर दिया, जिससे ज्ञान का एक विशाल केंद्र समाप्त हो गया। आज नालंदा विश्वविद्यालय को पुनः स्थापित किया गया है और इसके अवशेष UNESCO विश्व धरोहर स्थल के रूप में संरक्षित हैं।

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