
प्राचीन भारत का इतिहास भाग-34 MCQ-2026
नालंदा विश्वविद्यालय: अंतिम भोजन, प्रतीक, अशोक के प्रचारक और पतन के कारण MCQ 2026
1. महात्मा बुद्ध का अंतिम भोजन क्या था और किसने दिया था?
✅ उत्तर: (B) चुंद (लुहार/सुनार) द्वारा दिया गया शूकर मार्द्धव
महात्मा बुद्ध के जीवन का अंतिम भोजन पावा नगर में चुंद नामक एक कर्मकार (लुहार/सुनार) द्वारा दिया गया था, जिसे शूकर मार्द्धव कहा गया, और इस भोजन के बाद उनकी तबीयत इतनी बिगड़ी कि वे कुशीनगर पहुँचकर 80 वर्ष की आयु में 483 ई.पू. में महापरिनिर्वाण को प्राप्त हुए; विद्वानों का मत है कि यह शूकर मार्द्धव या तो सूअर का मांस था या कंद, लेकिन यह चुंद का दिया अंतिम भोजन बौद्ध साहित्य में एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है।
2. महात्मा बुद्ध ने किस अवस्था में ज्ञान की प्राप्ति की थी ?
✅ उत्तर: (B) 35 वर्ष
महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ई.पू. में हुआ, 16 वर्ष की आयु में विवाह किया, 29 वर्ष की आयु में गृह त्याग किया, और 35 वर्ष की आयु में बोधगया में ज्ञान (संबोधि) प्राप्त किया; इसके बाद उन्होंने 45 वर्षों तक बौद्ध धर्म का प्रचार किया और 80 वर्ष की आयु में 483 ई.पू. में महापरिनिर्वाण को प्राप्त हुए; यह जीवन हमें सिखाता है कि त्याग, साधना और ज्ञान के माध्यम से मानव जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य हासिल किया जा सकता है।
3. महात्मा बुद्ध के चचेरे भाई देवदत्त के बारे में क्या सत्य है?
✅ उत्तर: (B) वह प्रारंभ में बुद्ध के अनुयायी थे पर बाद में विरोधी बने और तीन बार हत्या का प्रयास किया
देवदत्त महात्मा बुद्ध के चचेरे भाई थे। शुरू में वे बुद्ध के विचारों से प्रभावित होकर बौद्ध संघ में शामिल हुए, लेकिन बाद में वे उनके घोर विरोधी बन गए। उन्होंने लगभग तीन बार बुद्ध की हत्या करने की कोशिश की — एक बार हाथी को पागल करके, एक बार पत्थर फेंककर और एक बार उंगलीमाल डाकू को उनके पीछे भेजकर। देवदत्त ने बौद्ध संघ को भी बुद्ध से अलग करने की कोशिश की। यह कहानी बौद्ध साहित्य में प्रारंभिक विवादों और मानवीय कमजोरियों को उजागर करती है।
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4. ‘सर्वम् दुःखम्’ किस आर्य सत्य का सार है?
✅ उत्तर: (C) प्रथम आर्य सत्य
‘सर्वम् दुःखम्’ अर्थात् ‘संसार में दुःख ही दुःख है’ — यह महात्मा बुद्ध के प्रथम आर्य सत्य का सार है। चार आर्य सत्यों का क्रम है: (1) दुःख है (सर्वम् दुःखम्), (2) दुःख का कारण है (तृष्णा/अविद्या — द्वितीय आर्य सत्य), (3) दुःख को रोका जा सकता है (तृतीय आर्य सत्य), और (4) दुःख रोकने के उपाय अर्थात् अष्टांगिक मार्ग (चतुर्थ आर्य सत्य)। ‘सर्वम् दुःखम्’, ‘सर्वम् क्षणिकम्’ और ‘सर्वम् अनात्मम्’ — ये तीन बौद्ध दर्शन के मूल सिद्धांत हैं, जिन्हें त्रिलक्षण कहते हैं। बुद्ध ने जन्म, वृद्धावस्था, रोग, मृत्यु और प्रियजनों से वियोग — सभी को दुःखरूप बताया।
5. ‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ में दुःख के कितने कारण बताए गए हैं?
✅ उत्तर: (D) 12
महात्मा बुद्ध ने ‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ में दुःख की 12 कारण-कड़ियाँ बताई — (1) अविद्या, (2) संस्कार, (3) विज्ञान, (4) नामरूप, (5) षडायतन, (6) स्पर्श, (7) वेदना, (8) तृष्णा, (9) उपादान, (10) भव, (11) जाती, और (12) जरामरण; इसका मूल कारण अविद्या है और इसे द्वादश नियदान या नियदान श्रृंखला कहा जाता है, जो दिखाता है कि कैसे अज्ञान से शुरू होकर जीवन के सभी दुःख जन्म, बुढ़ापा, रोग और मृत्यु तक हमारे अनुभव में आते हैं।
6. ‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ के अनुसार दुःख का मूल कारण क्या है?
✅ उत्तर: (B) अविद्या (अज्ञान)
महात्मा बुद्ध के ‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ (12 नियदान) में दुःख की पूरी श्रृंखला अविद्या (अज्ञान) से शुरू होती है, जिससे संस्कार, विज्ञान, नामरूप… और अंततः जरामरण तक का चक्र बनता है; इसलिए दुःख का मूल कारण अविद्या है, और जब इसे समाप्त किया जाता है तो पूरी श्रृंखला टूट जाती है और निर्वाण की प्राप्ति होती है, जबकि तृष्णा (8वीं कड़ी) भी एक कारण है लेकिन मूल नहीं।
7. अष्टांगिक मार्ग के कौन-से दो अंग ‘प्रज्ञा’ कहलाते हैं?
✅ उत्तर: (B) सम्यक् दृष्टि और सम्यक् संकल्प
अष्टांगिक मार्ग को तीन भागों में बाँटा गया है — प्रज्ञा (सम्यक् दृष्टि और सम्यक् संकल्प), शील (सम्यक् वाणी, सम्यक् कर्मांत, सम्यक् आजीव), और समाधि (सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि); इस प्रकार पहला भाग प्रज्ञा, मध्य के तीन शील और अंतिम तीन समाधि हैं, और बौद्ध धर्म में त्रिरत्न के दो प्रकार हैं — एक: बुद्ध, धम्म, संघ और दूसरा: प्रज्ञा, शील, समाधि।
8. बौद्ध धर्म में ‘सर्वक्षणिकम्’ का सिद्धांत किससे संबंधित है?
✅ उत्तर: (B) सब कुछ क्षणिक है — कोई वस्तु स्थायी नहीं
महात्मा बुद्ध ने ‘सर्वक्षणिकम्’ कहा — अर्थात् इस संसार में कोई भी वस्तु स्थायी नहीं है, सब कुछ क्षणिक है, इसी सिद्धांत को क्षणिकवाद कहते हैं; जिस आत्मा को अन्य धर्मों ने अजर, अमर और शाश्वत कहा, बुद्ध ने उसे भी क्षणिक माना, इसलिए बौद्ध धर्म अनात्मवादी धर्म है, और ‘सर्वम् दुःखम्’, ‘सर्वम् क्षणिकम्’ और ‘सर्वम् अनात्मम्’ ये तीन सिद्धांत मिलकर त्रिलक्षण बनाते हैं।
9. महात्मा बुद्ध के चिकित्सक कौन थे?
✅ उत्तर: (B) जीवक
जीवक महात्मा बुद्ध के चिकित्सक और प्राचीन भारत के प्रसिद्ध वैद्य थे, जो राजा बिम्बिसार के भी राजवैद्य रहे और तक्षशिला विश्वविद्यालय में शिक्षा लेकर बुद्ध का उपचार किया; बुद्ध के जीवन से जुड़े अन्य विशिष्ट व्यक्ति थे — आनंद (निजी परिचारक), सुनीति व वस्सकार (राज्यकर्ता), आम्रपाली (गणिका), चुंद (कर्मकार) और अंगुलिमाल (डाकू)।
10. प्रसिद्ध गणिका ‘आम्रपाली’ किससे संबंधित थी?
✅ उत्तर: (B) वैशाली की प्रसिद्ध गणिका जो बुद्ध से जुड़ी थी
आम्रपाली (Amrapali/Ambapali) वैशाली की प्रसिद्ध गणिका थी, अपनी अद्भुत सुंदरता के लिए जानी जाती थी, लेकिन बौद्ध साहित्य के अनुसार वह महात्मा बुद्ध की शिष्या बनी और बौद्ध संघ में प्रवेश किया, उसने अपना आम्रवन बुद्ध को दान में दिया, और थेरीगाथा में उसकी कविताएँ संकलित हैं जो सांसारिक सुंदरता की क्षणभंगुरता और आध्यात्मिक जागरण का वर्णन करती हैं; महात्मा बुद्ध के जीवन से जुड़े विशिष्ट व्यक्तियों में उसका नाम गणिका के रूप में आता है और वैशाली में द्वितीय बौद्ध संगीति के आयोजन का संदर्भ भी उसके आवास से जुड़ा है।
11. ‘अंगुलिमाल’ कौन था और महात्मा बुद्ध से उसका क्या संबंध था?
✅ उत्तर: (B) एक क्रूर डाकू जो बुद्ध के प्रभाव से शिष्य बन गया
अंगुलिमाल (Angulimala) एक क्रूर डाकू था जो लोगों की हत्या कर उनकी उंगलियों की माला पहनता था और कोसल राज्य में आतंक फैलाता था, लेकिन महात्मा बुद्ध के करुणामय व्यवहार से उसका हृदय बदल गया, वह बुद्ध का शिष्य बन गया और बौद्ध संघ में प्रवेश किया; यह प्रसंग बौद्ध धर्म में करुणा और सुधार की शक्ति का प्रतीक है और मज्झिम निकाय के ‘अंगुलिमाल सुत्त’ में विस्तार से वर्णित है।
12. महात्मा बुद्ध के जीवन में ‘घोड़ा’ किस घटना का प्रतीक है?
✅ उत्तर: (C) गृह त्याग
बौद्ध कला में महात्मा बुद्ध के जीवन की प्रमुख घटनाओं को प्रतीकों के माध्यम से दर्शाया गया है — माता के गर्भ में आना = हाथी, जन्म = कमल का फूल, यौवन = साँड़, गृह त्याग = घोड़ा (घोड़े का नाम ‘कन्थक’), ज्ञान प्राप्ति = पीपल वृक्ष, निर्वाण = पदचिन्ह, प्रथम उपदेश = धर्मचक्र , महापरिनिर्वाण = स्तूप; इस प्रकार घोड़ा गृह त्याग (महाभिनिष्क्रमण) का प्रतीक है और यह प्रारंभिक बौद्ध कला की अनिकोनिक परंपरा में साँची, भरहुत और अमरावती की कला में देखी जाती है।
13. महात्मा बुद्ध के जीवन में ‘स्तूप’ किस घटना का प्रतीक है?
✅ उत्तर: (D) महापरिनिर्वाण (मृत्यु)
बौद्ध कला में स्तूप महात्मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण का प्रतीक है, और जीवन की अन्य घटनाओं को प्रतीकों में दर्शाया गया है — हाथी (गर्भ में आना), कमल (जन्म), साँड़ (यौवन), घोड़ा (गृह त्याग), पीपल वृक्ष (ज्ञान प्राप्ति), पदचिन्ह (निर्वाण/मोक्ष), चक्र (प्रथम उपदेश/धर्मचक्र प्रवर्तन) और स्तूप (महापरिनिर्वाण), ये आठ प्रतीक प्रारंभिक बौद्ध कला की अनिकोनिक परंपरा का आधार हैं क्योंकि स्तूप में बुद्ध के शरीरावशेष रखे जाते थे।
14. ‘संकारा’ या ‘संकिषा’ स्थल किस घटना से जुड़ा है?
✅ उत्तर: (B) महात्मा बुद्ध का स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरण
संकारा या संकिषा पांचाल जनपद में स्थित था और बौद्ध परंपरा के अनुसार यह वही स्थान है जहाँ महात्मा बुद्ध स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुए थे, ऐसा माना जाता है कि उन्होंने अपनी दिवंगत माता महामाया को त्रायस्त्रिंश स्वर्ग में धर्मोपदेश दिया और फिर संकिषा लौट आए; यह महात्मा बुद्ध के आठ महत्वपूर्ण स्थलों में से एक है — लुम्बिनी, सारनाथ, राजगीर, वैशाली, कुशीनगर, बोधगया, श्रावस्ती और संकारा/संकिषा — और इन स्थलों का बौद्ध तीर्थाटन में विशेष महत्व है।
15. अशोक ने श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए किसे भेजा था ?
✅ उत्तर: (B) महेन्द्र और संघमित्रा
अशोक ने अपने पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार करने भेजा, और अन्य प्रमुख प्रचारक थे — मज्जिम → हिमालय, महारक्षित → यवन देश (ग्रीक क्षेत्र), महादेव → मैसूर, सोन एवं उत्तरा → महाराष्ट्र, महाधर्म रक्षित → महाराष्ट्र, और अशोक और चारुमती → नेपाल; यह सूची UPSC और BPSC परीक्षाओं में महत्वपूर्ण है और श्रीलंका में आज भी थेरवाद बौद्ध धर्म के अनुयायी महेन्द्र-संघमित्रा के प्रचार का परिणाम हैं।
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16. अशोक ने यवन देश (ग्रीक क्षेत्र) में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए किसे भेजा था ?
✅ उत्तर: (C) महारक्षित
अशोक ने यवन देश (Yona/ग्रीक क्षेत्र — वर्तमान अफगानिस्तान और पश्चिमोत्तर भारत) में बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए महारक्षित को भेजा, जो दिखाता है कि उन्होंने केवल भारतीय उपमहाद्वीप तक ही नहीं बल्कि विदेशी क्षेत्रों तक भी प्रचारक भेजे; उस समय यवन देश में यूनानी-बैक्ट्रियन शासक थे, और बाद में मिलिंदपन्हो में वर्णित यूनानी राजा मिनांडर का बौद्ध धर्म से संबंध इसी परंपरा की निरंतरता को दर्शाता है।
17. द्वितीय बौद्ध संगीति के समकालीन शासक कौन थे?
✅ उत्तर: (B) कालाशोक (शिशुनाग वंश)
द्वितीय बौद्ध संगीति (383 ई.पू., वैशाली) शिशुनाग वंशीय शासक कालाशोक के शासनकाल में हुई, और चारों संगीतियों के समकालीन शासक थे — प्रथम: अजातशत्रु (हर्यक वंश), द्वितीय: कालाशोक (शिशुनाग वंश), तृतीय: अशोक (मौर्य वंश), और चतुर्थ: कनिष्क (कुशाण वंश); ध्यान रहे कि कालाशोक और अशोक दो अलग शासक हैं, कालाशोक शिशुनाग वंश का और महान अशोक मौर्य वंश का, ताकि परीक्षा में भ्रम न हो।
18. नालंदा विश्वविद्यालय को ‘ऑक्सफोर्ड ऑफ महायान बौद्ध’ क्यों कहा जाता था?
✅ उत्तर: (B) क्योंकि यहाँ विशेष रूप से महायान बौद्ध धर्म की शिक्षा दी जाती थी
नालंदा विश्वविद्यालय में विशेष रूप से महायान बौद्ध धर्म की पढ़ाई होती थी, इसलिए इसे ‘ऑक्सफोर्ड ऑफ महायान बौद्ध’ कहा जाता था, जबकि हीनयान शाखा की पढ़ाई वल्लभी (काठियावाड़, गुजरात) में और वज्रयान की पढ़ाई विक्रमशिला विश्वविद्यालय में होती थी; नालंदा की स्थापना कुमारगुप्त प्रथम ने की थी और इसका पुस्तकालय धर्मगंज तीन तल का था — रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक, जिसे बाद में बख्तियार खिलजी ने नष्ट किया।
19. नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना किसने की थी?
✅ उत्तर: (C) कुमारगुप्त प्रथम
नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त वंशीय शासक कुमारगुप्त प्रथम (415-455 ई.पू.) ने की थी, जो चंद्रगुप्त द्वितीय के उत्तराधिकारी थे; यह विश्वविद्यालय बिहार के नालंदा जिले में स्थित था, जबकि अन्य विश्वविद्यालयों के संस्थापक थे — विक्रमशिला (धर्मपाल, पाल वंश) और ओदंतपुरी (गोपाल, पाल वंश); नालंदा में शिलभद्र, धर्मपाल, नागार्जुन जैसे महान विद्वान रहे और ह्वेनसांग के गुरु शीलभद्र भी नालंदा के आचार्य थे।
20. नालंदा के पुस्तकालय का नाम क्या था?
✅ उत्तर: (C) धर्मगंज
नालंदा विश्वविद्यालय का विशाल पुस्तकालय धर्मगंज तीन तल का था, जिसके भवन थे — रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक; इसमें हजारों दुर्लभ बौद्ध और अन्य ग्रंथों की पांडुलिपियाँ संग्रहीत थीं, और जब बख्तियार खिलजी ने नालंदा पर आक्रमण कर पुस्तकालय जला दिया, तो कहा जाता है कि पांडुलिपियाँ महीनों तक जलती रहीं, जिससे इसकी विशालता का अंदाजा लगता है, और धर्मगंज के जलने से भारतीय ज्ञान-परंपरा को अपूरणीय क्षति हुई; ये नाम UPSC और BPSC परीक्षाओं में अक्सर पूछे जाते हैं।
21. हीनयान बौद्ध धर्म की विशेष पढ़ाई किस विश्वविद्यालय में होती थी?
✅ उत्तर: (C) वल्लभी
हीनयान (थेरवाद) बौद्ध धर्म की विशेष पढ़ाई वल्लभी विश्वविद्यालय में होती थी, जो काठियावाड़, गुजरात में स्थित था, जबकि महायान की पढ़ाई नालंदा में और वज्रयान की पढ़ाई विक्रमशिला में होती थी; तीनों विश्वविद्यालय और उनकी शाखाएँ हैं — वल्लभी (हीनयान), नालंदा (महायान), विक्रमशिला (वज्रयान), और वल्लभी विश्वविद्यालय का उल्लेख ह्वेनसांग ने भी किया है, इसलिए यह तथ्य परीक्षाओं में अक्सर उम्मीदवारों को चकित कर देता है।
22. महायान बौद्ध धर्म में ‘विज्ञानवाद’ (योगाचार) के प्रवर्तक कौन थे?
✅ उत्तर: (B) मैत्रेयनाथ
महायान बौद्ध धर्म दो शाखाओं में विभाजित था — माध्यमिक या शून्यवाद (प्रवर्तक: नागार्जुन) और विज्ञानवाद या योगाचार (प्रवर्तक: मैत्रेयनाथ, चौथी शताब्दी के बौद्ध दार्शनिक), जिसका मत है कि केवल विज्ञान (चेतना) ही सत्य है और बाहरी जगत भ्रामक है, इसे वसुबंधु और असंग ने भी आगे बढ़ाया; हीनयान भी दो शाखाओं में विभक्त था — वैभाषिक और सौत्रांतिक; इस प्रकार बौद्ध दर्शन के चार प्रमुख विद्यालय हैं — वैभाषिक, सौत्रांतिक (हीनयान), माध्यमिक, और विज्ञानवाद (महायान)।
23. नागार्जुन की कौन-सी प्रसिद्ध पुस्तकें थीं?
✅ उत्तर: (C) प्रज्ञापारमितासूत्र और माध्यमिककारिका
नागार्जुन ने दो प्रसिद्ध ग्रंथ लिखे — प्रज्ञापारमितासूत्र और माध्यमिककारिका (शून्यवाद का मूल ग्रंथ) और उन्हें ‘भारत का आईंस्टीन’ कहा जाता है; अन्य प्रमुख बौद्ध विद्वान और उनकी रचनाएँ हैं — अश्वघोष (बुद्धचरित, सौंदरानंद), वसुमित्र (विभाषशास्त्र, ‘बौद्ध धर्म का विश्वकोष’), मोग्गलिपुत्त तिस्स (कथावत्थु) और वसुबंधु (अभिधर्मकोश)।
24. ‘विभाषशास्त्र’ (बौद्ध धर्म का विश्वकोष) के लेखक कौन थे?
✅ उत्तर: (C) वसुमित्र
विभाषशास्त्र की रचना वसुमित्र ने की थी, जिसे बौद्ध धर्म का ‘विश्वकोष’ माना जाता है; वसुमित्र चतुर्थ बौद्ध संगीति (कुण्डलवन, कश्मीर, कनिष्क के समय) के अध्यक्ष थे और इसमें सर्वास्तिवाद सम्प्रदाय की शिक्षाओं का विस्तृत विश्लेषण है; इस ग्रंथ की विशालता के कारण इसे ‘विश्वकोष’ कहा गया; अश्वघोष ‘बुद्धचरित’ के लेखक और संगीति के उपाध्यक्ष थे, जिन्हें ‘भारत का मिल्टन’ कहा जाता है, जबकि धर्मकीर्ति को ‘भारत का कांट’ कहा जाता है।
25. बौद्ध धर्म के पतन का वह कारण कौन-सा है जिसमें बुद्ध को विष्णु का अवतार माना गया?
✅ उत्तर: (B) बुद्ध को विष्णु के 9वें अवतार के रूप में शामिल कर लिया गया जिससे उनकी पृथक पहचान समाप्त हो गई
बौद्ध धर्म के पतन के अनेक कारण थे — महात्मा बुद्ध को विष्णु के नौवें अवतार के रूप में हिंदू धर्म में शामिल कर लिया जाना जिससे उसकी पृथक् पहचान धीरे-धीरे समाप्त हुई, कई शाखाओं में विभाजन, राजकीय संरक्षण का समाप्त होना, शंकराचार्य और कुमारिल भट्ट द्वारा खंडन, मिहिरकुल और बख्तियार खिलजी का आक्रमण, शशांक का अत्याचार, संघ में धन और महिलाओं का प्रवेश, और चतुर्थ संगीति के बाद पालि की जगह संस्कृत का उपयोग।
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