पुर्तगालियों का भारत आगमन: व्यापार से साम्राज्य तक की कहानी

पंद्रहवीं शताब्दी तक भारत विश्व व्यापार का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र था। यूरोप में भारतीय मसालों, रेशम और कीमती पत्थरों की अपार मांग थी। परंतु इस व्यापार पर इटलीवासियों और अरब व्यापारियों का पूर्ण एकाधिकार था। परंपरागत स्थलीय मार्ग से होने वाला यह व्यापार अत्यंत लाभदायक था, जिससे इटली की समृद्धि दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी।

1453 में जब तुर्कों ने कुस्तुनतुनिया पर अधिकार कर लिया, तो यूरोपीय देशों के लिए परंपरागत व्यापारिक मार्ग बंद हो गए। यह घटना यूरोप के लिए एक बड़ा झटका थी। विशेषकर स्पेन और पुर्तगाल जैसे नव-उदित राष्ट्र इस व्यापार में अपनी हिस्सेदारी चाहते थे। इसी आवश्यकता ने उन्हें भारत तक पहुँचने के लिए नए समुद्री मार्गों की खोज के लिए प्रेरित किया।

यूरोप में मसालों की मांग केवल स्वाद के लिए नहीं थी। जाड़े की ऋतु में मांस को सुरक्षित रखने और उसकी उपयोगिता बनाए रखने के लिए मसालों की नितांत आवश्यकता होती थी। शराब में मसाले मिलाकर उसे गर्म पेय के रूप में प्रयोग किया जाता था। काली मिर्च तो उस समय ‘काला सोना’ कहलाती थी। इस प्रकार आर्थिक लाभ की चाह ने यूरोपीय देशों को समुद्री अन्वेषण के लिए प्रेरित किया।

पुर्तगाली राजकुमार डॉन हेनरिक, जिन्हें ‘हेनरी द नेविगेटर’ कहा जाता था, ने समुद्री अभियानों की नींव रखी। उन्होंने कुतुबनुमा और एस्ट्रोलैब जैसे नौसंचालन यंत्रों के आधार पर वैज्ञानिक तालिकाएं बनवाईं। 1487 में बार्थोलोम्यो डियाज ने ‘केप ऑफ गुड होप’ तक की यात्रा की, जो भारत की खोज की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।

1497 में पुर्तगाली नाविक वास्को द गामा लिस्बन से भारत की खोज के लिए निकला। उत्तमाशा अंतरीप से होते हुए लगभग दस महीने की कठिन समुद्री यात्रा के बाद वह 17 मई 1498 को केरल के मालाबार तट पर स्थित कालीकट (आधुनिक कोझिकोड) के बंदरगाह पर पहुंचा। यह घटना विश्व इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ थी।

कालीकट का शासक जमोरिन (समूथिरी) था, जो हिंदू धर्म को मानता था। वास्को द गामा ने जमोरिन से भेंट की और व्यापारिक संबंध स्थापित करने की इच्छा व्यक्त की। परंतु वहां पहले से स्थापित अरब व्यापारियों ने पुर्तगालियों का जबरदस्त विरोध किया। फिर भी वास्को द गामा कुछ मसाले लेकर वापस पुर्तगाल लौटा।

इस खोज का महत्व अपार था। यूरोप और भारत के बीच सीधा समुद्री मार्ग स्थापित हो गया, जिससे मध्यस्थों की आवश्यकता समाप्त हो गई। यह भारत में यूरोपीय साम्राज्यवाद की शुरुआत थी।

पुर्तगालियों का भारत आगमन केवल व्यापारिक कारणों से नहीं था, बल्कि इसके पीछे कई उद्देश्य थे। सबसे प्रमुख कारण आर्थिक था। भारतीय मसाले, विशेषकर काली मिर्च, जायफल, लौंग और इलायची की यूरोप में अपार मांग थी। इन मसालों को यूरोप में बेचने पर 400-500 प्रतिशत तक मुनाफा होता था। सोना, चांदी, रत्न, रेशम और सूती वस्त्र भी पुर्तगालियों के लिए आकर्षण के केंद्र थे।

धार्मिक कारण भी महत्वपूर्ण थे। पुर्तगाली कैथोलिक ईसाई थे और वे ईसाई धर्म के प्रसार को अपना पवित्र कर्तव्य मानते थे। उस समय यूरोप में धर्म-युद्ध (क्रूसेड) की भावना प्रबल थी। पुर्तगाली मुस्लिम व्यापारियों के एकाधिकार को तोड़ना चाहते थे, जिन्हें वे अपना धार्मिक शत्रु मानते थे।

राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी एक प्रमुख कारक थी। पुर्तगाल एक छोटा देश था जो यूरोप में अपनी शक्ति और प्रभाव बढ़ाना चाहता था। समुद्री साम्राज्य स्थापित करना उस समय प्रतिष्ठा का प्रतीक था। पुर्तगाल स्पेन के साथ प्रतिस्पर्धा में भी था। दोनों देश नई भूमि और संसाधनों पर अधिकार करने की होड़ में थे। इस प्रकार व्यापार, धर्म और राजनीति का संगम पुर्तगालियों के भारत आगमन का मुख्य कारण बना।

1500 में पैड्रो अल्वरेज कैब्रल दूसरा पुर्तगाली था जो भारत आया। 1502 में वास्को द गामा दूसरी बार भारत आया और इस बार उसका उद्देश्य केवल व्यापार नहीं बल्कि राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करना था। 1503 में कोचीन में पुर्तगालियों की पहली फैक्ट्री या कारखाना स्थापित किया गया। यह पूर्वी व्यापार में पुर्तगालियों के एकाधिकार की दिशा में पहला कदम था।

1505 में फ्रांसिस्को डि अल्मीडा भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का प्रथम गवर्नर बनकर आया। उसने 1509 तक शासन किया और ‘नीले पानी की नीति’ (Blue Water Policy) लागू की। इस नीति का उद्देश्य समुद्र पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करना था। अल्मीडा का मानना था कि स्थलीय साम्राज्य के बजाय समुद्री शक्ति अधिक प्रभावी होगी।

1509 में अल्फोंसो द अल्बुकर्क पुर्तगालियों का दूसरा गवर्नर बना। उसे ‘भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक’ माना जाता है। अल्बुकर्क एक महत्वाकांक्षी और कुशल प्रशासक था। नवंबर 1510 में उसने बीजापुर के सुल्तान युसूफ आदिलशाह से गोवा छीन लिया। यह पुर्तगालियों की सबसे बड़ी सफलता थी। 1530 में गोवा कोचीन के स्थान पर पुर्तगालियों का मुख्य केंद्र बन गया। इसके बाद पुर्तगालियों ने दीव, दमन, हुगली और अन्य स्थानों पर भी अपने केंद्र स्थापित किए।

पुर्तगालियों ने भारत में एक अनोखी प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की जिसे ‘एस्टाडो द इंडिया’ कहा गया। इस व्यवस्था का केंद्र गोवा था और इसका नियंत्रण सीधे पुर्तगाल के राजा के अधीन था। वायसराय भारत में पुर्तगाली प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी होता था। इस प्रशासनिक ढांचे का मुख्य उद्देश्य व्यापारिक हितों की रक्षा करना था।

पुर्तगालियों की सबसे महत्वपूर्ण नीति ‘कार्टाज प्रणाली’ (Cartaz System) थी। यह एक प्रकार का समुद्री परमिट था जो सभी जहाजों को पुर्तगाली नियंत्रित क्षेत्रों में व्यापार करने के लिए लेना अनिवार्य था। जो जहाज यह परमिट नहीं लेते थे, उन्हें पुर्तगाली नौसेना द्वारा जब्त कर लिया जाता था या नष्ट कर दिया जाता था। इस तरह पुर्तगालियों ने हिंद महासागर के व्यापार पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया।

पुर्तगालियों ने सामरिक महत्व के स्थानों पर मजबूत किले बनाए। गोवा, दीव, दमन, कोचीन आदि में बनाए गए किले उनकी सैन्य शक्ति के केंद्र थे। इन किलों से वे समुद्री मार्गों पर नजर रखते थे और शत्रुओं से अपनी रक्षा करते थे। उन्होंने व्यापारिक केंद्रों (फैक्टरियों) की स्थापना की जहां से मसालों और अन्य वस्तुओं का व्यापार नियंत्रित होता था।

पुर्तगालियों और भारतीय शासकों के बीच संबंध जटिल और परिवर्तनशील थे। प्रारंभ में कालीकट के जमोरिन ने पुर्तगालियों का स्वागत किया, परंतु अरब व्यापारियों के दबाव में उसने बाद में विरोध किया। पुर्तगालियों ने कालीकट के विरुद्ध कोचीन और कन्नानोर के शासकों से मित्रता की। यह ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का प्रारंभिक रूप था।

विजयनगर साम्राज्य के महान शासक कृष्णदेवराय (1509-1529) के साथ अल्बुकर्क के उत्कृष्ट संबंध थे। कृष्णदेवराय ने अल्बुकर्क को भटकल में किला बनाने की अनुमति दी। प्रसिद्ध पुर्तगाली यात्री डोमिंगो पायस ने कृष्णदेवराय की खूब प्रशंसा की और विजयनगर की समृद्धि का विस्तृत वर्णन किया। यह सहयोग दोनों के लिए लाभदायक था।

परंतु अन्य स्थानों पर संघर्ष भी हुए। बीजापुर, अहमदनगर और अन्य दक्कन सल्तनतों ने पुर्तगालियों का विरोध किया। गुजरात के सुल्तानों ने भी पुर्तगालियों से कई युद्ध किए। 1509 में दीव के युद्ध में पुर्तगालियों ने गुजरात, मिस्र और कालीकट की संयुक्त नौसेना को हराया। यह समुद्र में पुर्तगालियों की सर्वोच्चता का प्रमाण था। समय के साथ पुर्तगालियों ने स्थानीय राजनीति में हस्तक्षेप करना शुरू किया और कई छोटे राज्यों को अपने अधीन कर लिया।

पुर्तगालियों का भारत पर बहुआयामी प्रभाव पड़ा। आर्थिक दृष्टि से उन्होंने भारत के पारंपरिक समुद्री व्यापार में क्रांति ला दी। अरब व्यापारियों का एकाधिकार समाप्त हो गया और यूरोपीय शक्तियों का प्रवेश हुआ। मसालों के व्यापार पर पुर्तगालियों का नियंत्रण हो गया। परंतु उनकी कार्टाज प्रणाली ने भारतीय व्यापारियों के लिए कठिनाइयां उत्पन्न कीं।

सांस्कृतिक और धार्मिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण था। पुर्तगालियों ने ईसाई धर्म के प्रसार पर जोर दिया। गोवा में कई चर्च और मठ बनाए गए। सेंट फ्रांसिस जेवियर जैसे धर्म-प्रचारकों ने भारत में ईसाई धर्म का प्रचार किया। परंतु जबरन धर्म-परिवर्तन और धार्मिक न्यायालय (Inquisition) की स्थापना ने स्थानीय लोगों में असंतोष पैदा किया।

तकनीकी क्षेत्र में पुर्तगालियों का योगदान उल्लेखनीय था। उन्होंने भारत में पहली बार प्रिंटिंग प्रेस का उपयोग किया। जहाज निर्माण उद्योग की शुरुआत की और भारतीयों को आधुनिक नौसैनिक तकनीक से परिचित कराया। गोला-बारूद का उपयोग और आग्नेयास्त्रों का प्रचलन बढ़ा। गोथिक स्थापत्य शैली भारत में आई। सबसे महत्वपूर्ण योगदान नई फसलों का था – तंबाकू, आलू, मिर्च, टमाटर, अनानास, काजू, अमरूद आदि पुर्तगालियों द्वारा ही भारत आए।

सत्रहवीं शताब्दी तक पुर्तगालियों का पतन शुरू हो गया। इसके कई कारण थे। सबसे महत्वपूर्ण कारण अन्य यूरोपीय शक्तियों, विशेषकर डच और अंग्रेजों का आगमन था। डचों ने सत्रहवीं शताब्दी की शुरुआत में पुर्तगालियों से कई क्षेत्र छीन लिए। 1639 में डचों ने कोचीन पर अधिकार कर लिया। अंग्रेजों और फ्रांसीसियों ने भी धीरे-धीरे पुर्तगालियों की शक्ति को कमजोर किया।

पुर्तगाली प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार और अकुशलता भी पतन का कारण बनी। अधिकारी अपने निजी लाभ में लिप्त रहते थे और साम्राज्य के हितों की उपेक्षा करते थे। पुर्तगाल एक छोटा देश होने के कारण लंबे समय तक विशाल साम्राज्य को संभालने में असमर्थ था। सैनिक और वित्तीय संसाधनों की कमी एक बड़ी समस्या थी।

स्थानीय विरोध भी बढ़ता जा रहा था। जबरन धर्म-परिवर्तन और कठोर नीतियों से भारतीय जनता में असंतोष था। मराठों और मुगलों जैसी शक्तिशाली भारतीय शक्तियों ने भी पुर्तगालियों को चुनौती दी। धार्मिक कट्टरता और असहिष्णुता ने उन्हें स्थानीय लोगों से अलग कर दिया। पुर्तगाल की यूरोप में कमजोर स्थिति भी भारत में उनके पतन का कारण बनी। 1580 से 1640 तक पुर्तगाल स्पेन के अधीन रहा, जिससे उनकी शक्ति और कमजोर हो गई।

भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षाओं में पुर्तगालियों के आगमन को एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना माना जाता है। यह भारत में यूरोपीय उपनिवेशवाद की शुरुआत थी। 17 मई 1498 को वास्को द गामा का कालीकट पहुंचना केवल एक भौगोलिक खोज नहीं थी, बल्कि यह एक नए युग की शुरुआत थी जो अगले 450 वर्षों तक भारत को प्रभावित करता रहा।

पुर्तगालियों ने पहली बार भारत में आधुनिक नौसैनिक शक्ति और समुद्री व्यापार के नियंत्रण का महत्व प्रदर्शित किया। उनकी कार्टाज प्रणाली ने भविष्य की यूरोपीय शक्तियों को व्यापारिक एकाधिकार स्थापित करने का तरीका सिखाया। अंग्रेजों ने बाद में इसी नीति को और विकसित रूप में अपनाया।

सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी महत्वपूर्ण था। पुर्तगालियों के माध्यम से भारत और यूरोप के बीच विचारों, तकनीक और उत्पादों का आदान-प्रदान हुआ। गोवा आज भी पुर्तगाली संस्कृति का जीवंत प्रमाण है। भाषा, वास्तुकला, खान-पान और धर्म में पुर्तगाली प्रभाव आज भी दिखाई देता है।

आर्थिक दृष्टि से पुर्तगालियों ने भारत को विश्व व्यापार में एक नई भूमिका दी। पहली बार भारतीय उत्पाद सीधे यूरोपीय बाजारों में पहुंचे। परंतु इसने भारत को धीरे-धीरे कच्चे माल के निर्यातक और तैयार माल के आयातक की भूमिका में धकेल दिया, जो औपनिवेशिक शोषण की शुरुआत थी।

पुर्तगालियों का भारत आगमन निश्चित रूप से भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ (turning point) था। यह केवल व्यापारिक संबंध की स्थापना नहीं थी, बल्कि यह भारत के आधुनिक इतिहास की शुरुआत थी। पुर्तगालियों ने पहली बार यह सिद्ध किया कि यूरोपीय शक्तियां भारत में राजनीतिक और आर्थिक प्रभुत्व स्थापित कर सकती हैं।

यद्यपि पुर्तगालियों का साम्राज्य सीमित था और वे केवल तटीय क्षेत्रों तक सीमित रहे, फिर भी उन्होंने अन्य यूरोपीय शक्तियों के लिए रास्ता खोल दिया। डच, अंग्रेज और फ्रांसीसी उनके पदचिह्नों पर चले। पुर्तगालियों की सफलताओं और असफलताओं ने भविष्य की यूरोपीय कंपनियों को महत्वपूर्ण सबक दिए।

सकारात्मक पक्ष से देखें तो पुर्तगालियों ने भारत में नई तकनीक, फसलें और विचार लाए। प्रिंटिंग प्रेस, आधुनिक जहाज निर्माण, आग्नेयास्त्र और नई कृषि उपज उनकी देन थे। परंतु नकारात्मक पक्ष में उनका धार्मिक असहिष्णुता, जबरन धर्म-परिवर्तन और व्यापारिक एकाधिकार भारत के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ।

आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो पुर्तगालियों का आगमन उस लंबी औपनिवेशिक प्रक्रिया की शुरुआत थी जो 1947 में समाप्त हुई। यह भारतीय इतिहास का एक ऐसा अध्याय है जो हमें गौरव और पीड़ा दोनों की याद दिलाता है – गौरव इस बात का कि भारत कितना समृद्ध और आकर्षक था, और पीड़ा इस बात की कि हम अपनी एकता और शक्ति को संभाल नहीं सके।

• 15वीं सदी से पहले एशिया में व्यापार पर अरबों का और यूरोप में इटली का एकाधिकार था
• 1453 में कुस्तुनतुनिया पर तुर्कों का कब्जा – यूरोपीय देशों को नए समुद्री रास्ते खोजने पड़े
• यूरोप में मसालों की मांग सबसे ज्यादा – जाड़े में मांस सुरक्षित रखने और शराब में मिलाकर गर्म पेय बनाने के लिए
• 15वीं सदी में भारत आने वाली यूरोपीय कंपनियां – पुर्तगाली, डच, अंग्रेज़, डेनिस और फ्रांसीसी
• समुद्री अभियानों में गहरी रुचि के कारण पुर्तगाली राजकुमार डॉन हेनरिक को ‘हेनरी द नेविगेटर’ कहा गया
• हेनरी ने कुतुबनुमा और एस्ट्रोलैब के आधार पर नौसैनिक तालिकाएं बनवाईं
• 1487 – बार्थोलोम्यो डियाज ने ‘केप ऑफ गुड होप’ (उत्तमाशा अंतरीप) तक की यात्रा की
• 1492 – कोलम्बस भारत खोजने निकला, पर वेस्टइंडीज पहुँच गया (अमेरिका की खोज का श्रेय उसे दिया जाता है)
• कोलम्बस इटली का निवासी था पर स्पेन की महारानी इसाबेला ने यह यात्रा प्रायोजित की थी, इसलिए ‘स्पेन का कोलम्बस’ कहा जाता है
• अमेरिका का नाम प्रसिद्ध नाविक ‘अमेरिगो वेस्पुसी’ के नाम पर पड़ा (कोलम्बस के नाम पर नहीं!)
• 1497 में वास्कोडिगामा लिस्बन से भारत के लिए रवाना हुआ
• 17 मई 1498 को वास्कोडिगामा कालीकट (केरल) पहुँचा – भारत आने वाला पहला यूरोपीय
• कालीकट का शासक ‘जमोरिन’ था जोकि हिन्दू धर्म को मानने वाला था
• अरबवासियों ने पुर्तगालियों का विरोध किया पर जल्द ही भारतीय व्यापार से बाहर हो गए
• 1500 को पैड्रो अल्वरेज कैब्रल दूसरा पुर्तगाली जो भारत आया (13 सितंबर को)
• 1502 में वास्कोडिगामा दूसरी बार भारत आया
• 1503 में कोचीन में पुर्तगालियों की पहली फैक्ट्री/कारखाना स्थापित (काली मिर्च और मसाला व्यापार के लिए)
• पुर्तगालियों की दूसरी फैक्ट्री कन्नानोर में लगी
• फ्रांसिस्को डि अल्मीडा भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का प्रथम गवर्नर था
• फ्रांसिस्को डि अल्मीडा ने ‘नीले पानी की नीति’ (Blue Water Policy) शुरू की, समुद्र में अपनी ताकत मजबूत करने के लिए
• पुर्तगाली सामुद्रिक साम्राज्य को ‘एस्टाडो-द-इण्डिया’ कहा गया
अल्बुकर्क (1509 से) – असली बॉस:
• अल्बुकर्क को ‘भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक’ माना जाता है
• अल्बुकर्क ने कोचीन को अपना मुख्यालय बनाया
• अल्बुकर्क ने नवम्बर 1510 को गोआ को बीजापुर के युसूफ आदिलशाह से छीन लिया
• 1530 में गोआ, कोचीन की जगह पुर्तगालियों का मुख्य केंद्र बना
• अल्बुकर्क के समकालीन – विजयनगर का महान शासक कृष्णदेवराय (1509-29) था
• कृष्णदेवराय ने अल्बुकर्क को भटकल में किला बनाने की छूट दी थी
• प्रसिद्ध पुर्तगाली यात्री डोमिंगो पायस ने कृष्णदेवराय की खूब तारीफ की थी
• अल्बुकर्क ने निम्न वर्ग के पुर्तगालियों को भारतीय महिलाओं से शादी के लिए प्रेरित किया जिससे सामाजिक आधार मजबूत हो सके
• अल्बुकर्क ने सती प्रथा रोकने का प्रयास किया
• 1515 में अल्बुकर्क की मृत्यु गोआ में हो गयी और वहीं दफनाया गया
• 1524 में वास्कोडिगामा तीसरी बार भारत आया
• 1527 में वास्कोडिगामा कोचीन में मर गया
पुर्तगालियों की देन-
तकनीकी योगदान:
• भारत में पहली बार प्रिंटिंग प्रेस का उपयोग – पुर्तगालियों ने किया
• दक्षिण भारत में पहली बार गोला-बारूद का इस्तेमाल
• भारतीय सैनिकों को अपनी सेना में भर्ती कर प्रशिक्षित किया
• भारत में जहाज़ निर्माण उद्योग की शुरुआत
• गोथिक स्थापत्य कला का प्रचलन
कृषि क्रांति
• तंबाकू – जहांगीर के शासनकाल में खेती शुरू
• मूंगफली – ब्राजील से लाई गई
• आलू – आज की मुख्य फसल, 16वीं सदी में आई
• लाल मिर्च – भारतीय खाने की जान, पुर्तगालियों की देन
• मकई, टमाटर, शकरकंद, रबर प्लांट – सब ब्राजील से लाये गए
फल जो पुर्तगाली लाए:
• चीकू – पुर्तगालियों की देन
• काजू – पुर्तगालियों की देन
• अमरूद – पुर्तगालियों की देन
• अन्नानास/पाइनएप्पल – पुर्तगालियों की देन
• शरीफा/सीताफल – पुर्तगालियों की देन

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1.1498 में वास्को द गामा के भारत आगमन ने भारतीय इतिहास की दिशा को कैसे प्रभावित किया? समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।

2.पुर्तगालियों के भारत आगमन के प्रमुख कारणों का विश्लेषण कीजिए तथा उनके व्यापारिक उद्देश्यों की प्रकृति स्पष्ट कीजिए।

3.भारत में पुर्तगालियों की नीतियों और रणनीतियों का मूल्यांकन कीजिए। क्या वे केवल व्यापारी थे या साम्राज्यवादी भी?

4.पुर्तगालियों के आगमन का भारतीय अर्थव्यवस्था और समुद्री व्यापार पर क्या प्रभाव पड़ा? विश्लेषण कीजिए।

5.भारत में पुर्तगालियों के पतन के कारणों का परीक्षण कीजिए। अन्य यूरोपीय शक्तियों के आगमन ने इसमें क्या भूमिका निभाई?

1. प्रश्न: पुर्तगालियों का भारत में आगमन कब हुआ?

उत्तर: 1498 ई० में वास्को द गामा कालीकट (कोझिकोड) पहुँचे।

2. प्रश्न: भारत पहुँचने वाले पहले यूरोपीय कौन थे?

उत्तर: पुर्तगाली सबसे पहले यूरोपीय थे जो समुद्री मार्ग से भारत पहुँचे।

3. प्रश्न: पुर्तगालियों के भारत आने का मुख्य उद्देश्य क्या था?

उत्तर: मसालों का व्यापार, धन प्राप्त करना और ईसाई धर्म का प्रसार।

4. प्रश्न: भारत में पुर्तगालियों का पहला प्रमुख व्यापारिक केंद्र कौन सा था?

उत्तर: कालीकट उनका पहला प्रमुख व्यापारिक केंद्र था।

5. प्रश्न: भारत में पुर्तगालियों की शक्ति को किसने मजबूत किया?

उत्तर: अल्फोंसो द अल्बुकर्क ने गोवा पर अधिकार करके उनकी स्थिति मजबूत की।

6. प्रश्न: ‘कार्टाज प्रणाली’ क्या थी?

उत्तर: यह पुर्तगालियों की समुद्री नियंत्रण नीति थी, जिसके तहत बिना अनुमति कोई जहाज व्यापार नहीं कर सकता था।

7. प्रश्न: पुर्तगालियों के पतन के मुख्य कारण क्या थे?

उत्तर: डच और अंग्रेजों का आगमन, प्रशासनिक कमजोरी और स्थानीय विरोध।

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