
प्रस्तावना
दक्षिण भारत का मध्यकालीन इतिहास उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। शक्तिशाली साम्राज्यों के उत्थान और पतन ने इस क्षेत्र की राजनीतिक दशा को निरंतर बदला है। इन्हीं परिवर्तनों में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ 1565 ई० में तालीकोटा के युद्ध के साथ आया।
तालीकोटा का युद्ध दक्षिण भारतीय इतिहास की एक निर्णायक घटना थी। इस युद्ध में दक्कन की चार सल्तनतों – बीदर, बीजापुर, अहमदनगर और गोलकुण्डा ने संयुक्त मोर्चा बनाकर विजयनगर साम्राज्य को करारी शिकस्त दी। यह पराजय केवल एक युद्ध की हार नहीं थी, बल्कि दो शताब्दियों से चली आ रही एक महान सांस्कृतिक और राजनीतिक परंपरा के अंत का प्रतीक थी।
विजयनगर के पतन के बाद दक्षिण भारत में एक नया राजनीतिक परिदृश्य उभरा। कई छोटे-बड़े राज्यों ने स्वतंत्रता प्राप्त की और अपनी सत्ता स्थापित करने का प्रयास किया। इन्हीं नवोदित राज्यों में मैसूर का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
मैसूर में वोडियार वंश का शासन था। लेकिन समय के साथ यह वंश कमज़ोर होता गया। चिक्का कृष्ण राज द्वितीय के शासनकाल में वास्तविक सत्ता नन्जराज और देवराज नामक दो भाइयों के हाथों में केंद्रित हो गई। इसी दौर में एक साधारण सैनिक हैदर अली का प्रवेश मैसूर की राजनीति में हुआ, जिसने आगे चलकर दक्षिण भारत के इतिहास को एक नई दिशा प्रदान की।
यह प्रस्तावना उस ऐतिहासिक संक्रमण काल को समझने का प्रयास है, जब दक्षिण भारत पुराने साम्राज्यवादी ढांचे से निकलकर नए युग में प्रवेश कर रहा था।
हैदर अली कौन था?
हैदर अली 18वीं शताब्दी का एक महान भारतीय योद्धा और कुशल प्रशासक था। वह मैसूर राज्य का वास्तविक शासक बना, हालांकि औपचारिक रूप से वोडियार वंश के राजा को सत्ता में बनाए रखा। हैदर अली एक साधारण सैनिक से उठकर शासक बना और अंग्रेजों के विरुद्ध कड़ा संघर्ष किया। उसने अपनी सैन्य प्रतिभा और कूटनीतिक चतुराई से मैसूर को दक्षिण भारत की एक प्रमुख शक्ति बना दिया।
हैदर अली का जन्म कब हुआ था?
हैदर अली का जन्म 1720 ई० में बुदिकोट (वर्तमान कर्नाटक) में हुआ था। उसके पिता फतह मुहम्मद एक साधारण सैनिक थे जो मैसूर की सेना में कार्यरत थे। हैदर अली का बचपन सैन्य वातावरण में बीता, जिसने उसे युद्ध कला और घुड़सवारी में निपुण बनाया। उसकी प्रारंभिक शिक्षा सीमित थी, लेकिन उसने व्यावहारिक अनुभव से बहुत कुछ सीखा।
हैदर अली की मृत्यु कब हुई थी
हैदर अली की मृत्यु 7 दिसंबर 1782 ई० को हुई थी। उनकी मृत्यु चित्तूर (वर्तमान आंध्र प्रदेश) में एक कैंसर जैसी बीमारी से हुई। उस समय वह द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्षरत थे। उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र टीपू सुल्तान ने मैसूर की सत्ता संभाली और पिता की विरासत को आगे बढ़ाया।
हैदर अली किसका पिता था?
हैदर अली महान योद्धा और शेर-ए-मैसूर के नाम से प्रसिद्ध टीपू सुल्तान का पिता था। टीपू सुल्तान का जन्म 1750 ई० में हुआ था और वह हैदर अली की सबसे बड़ी संतान था। हैदर अली ने अपने पुत्र को युद्ध कला, प्रशासन और कूटनीति की शिक्षा दी। टीपू ने अपने पिता के साथ कई युद्धों में भाग लिया और उनकी मृत्यु के बाद उनकी नीतियों को जारी रखा।
हैदर अली किस राज्य का शासक था?
हैदर अली मैसूर राज्य (वर्तमान कर्नाटक) का वास्तविक शासक था। उसने 1761 ई० में नन्जराज को पराजित कर मैसूर पर अधिकार कर लिया। हालांकि औपचारिक रूप से वोडियार वंश के राजा को गद्दी पर बनाए रखा, लेकिन सभी प्रशासनिक और सैन्य शक्तियां उसके हाथों में थीं। उसने मैसूर को एक छोटी रियासत से एक शक्तिशाली राज्य बना दिया।
हैदर अली और टीपू सुल्तान का संबंध क्या था?
हैदर अली और टीपू सुल्तान पिता-पुत्र थे। हैदर अली ने अपने पुत्र टीपू को एक कुशल योद्धा और प्रशासक बनाया। टीपू ने बचपन से ही अपने पिता के साथ युद्धों में भाग लिया और उनसे युद्ध कौशल सीखा। हैदर अली की मृत्यु के बाद 1782 ई० में टीपू सुल्तान ने मैसूर की सत्ता संभाली। दोनों ने मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया और भारतीय स्वतंत्रता की रक्षा का प्रयास किया।
हैदर अली ने अंग्रेजों से युद्ध क्यों किया?
- हैदर अली और अंग्रेजों के बीच संघर्ष कई कारणों से हुआ। मुख्य कारण था अंग्रेजों की विस्तारवादी नीति और दक्षिण भारत में उनका बढ़ता प्रभाव।
- अंग्रेजों ने मद्रास और उसके आसपास के क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया था। वे धीरे-धीरे पूरे दक्षिण भारत पर अधिकार करने की योजना बना रहे थे। हैदर अली की बढ़ती शक्ति उनके लिए सबसे बड़ी बाधा थी।
- हैदर अली ने मैसूर को एक मजबूत राज्य बनाया था। उसकी आधुनिक सेना और यूरोपीय तर्ज पर प्रशिक्षित सैनिक अंग्रेजों के लिए चुनौती थे। अंग्रेज नहीं चाहते थे कि कोई स्वतंत्र भारतीय शक्ति उनके सामने खड़ी हो।
- व्यापारिक प्रतिस्पर्धा भी एक प्रमुख कारण था। हैदर अली ने समुद्री व्यापार को बढ़ावा दिया और अपना जहाजी बेड़ा तैयार किया। यह अंग्रेजों के व्यापारिक हितों के विरुद्ध था।
- अंग्रेजों ने हैदर अली के विरुद्ध षड्यंत्र रचे और उसके पड़ोसी राज्यों को उसके खिलाफ भड़काया। निज़ाम और मराठों के साथ अंग्रेजों की संधियां हैदर अली के लिए खतरा बन गईं।
- हैदर अली एक स्वाभिमानी शासक था। उसने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार करने से इनकार कर दिया और अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए युद्ध का मार्ग चुना। उसने अंग्रेजों के विरुद्ध चार युद्ध लड़े और उन्हें कई बार पराजित किया।
हैदर अली की उपलब्धियां
- हैदर अली की उपलब्धियां भारतीय इतिहास में अविस्मरणीय हैं। उसने एक साधारण सैनिक से उठकर मैसूर के शासक बनने तक का सफर तय किया।
- सैन्य सुधार उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी। उसने अपनी सेना का यूरोपीय तर्ज पर आधुनिकीकरण किया। पत्थर कला बंदूकों से लैस नियमित सैनिकों के दस्ते बनवाए और तोपखाने को मजबूत किया।
- हैदर अली ने भारतीय शासकों में पहली बार नौसेना का निर्माण किया। उसके पास तोपों से लैस जहाजों का एक बेड़ा था, जो समुद्री तट की रक्षा करता था। यह उसकी दूरदर्शिता का प्रमाण था।
- प्रशासनिक सुधारों में भी उसने महत्वपूर्ण कार्य किए। उसने राजस्व व्यवस्था को सुधारा और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण किया। किसानों की स्थिति सुधारने के लिए कई कदम उठाए।
- हैदर अली ने मैसूर के क्षेत्रफल में व्यापक विस्तार किया। उसने बेदनूर, बिदानूर, कन्नड़, मालाबार तट और कर्नाटक के कई क्षेत्रों को जीता। मैसूर एक छोटी रियासत से एक शक्तिशाली राज्य बन गया।
- अंग्रेजों के विरुद्ध उसके संघर्ष ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की नींव रखी। प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767-69) में उसने अंग्रेजों को बुरी तरह पराजित किया और मद्रास तक पहुंच गया। उसकी सैन्य रणनीति और साहस आज भी प्रेरणा देता है।
हैदर अली का इतिहास

- हैदर अली का जन्म 1720 ई० में कर्नाटक के बुदिकोट गांव में एक साधारण सैनिक परिवार में हुआ था। उसके पिता फतह मुहम्मद मैसूर की सेना में एक साधारण सिपाही थे। बचपन से ही हैदर को युद्ध कला और घुड़सवारी का शौक था।
- हैदर अली की शिक्षा औपचारिक नहीं थी, लेकिन उसने व्यावहारिक अनुभव से बहुत कुछ सीखा। उसने युवावस्था में मैसूर की सेना में भर्ती हुआ और अपनी वीरता से जल्द ही प्रसिद्ध हो गया। उसका नाम ‘हैदर’ जिसका अर्थ ‘सिंह’ है, उसके साहस का प्रतीक बन गया।
- 1749 ई० में देवनहल्ली के युद्ध में हैदर अली ने असाधारण वीरता दिखाई। उसकी बहादुरी से प्रभावित होकर उसे उच्च पद दिया गया। 1753 ई० में वह डिंडीगुल का फौजदार नियुक्त हुआ।
- मैसूर में उस समय वोडियार वंश का शासक चिक्का कृष्ण राज द्वितीय एक कमजोर राजा था। वास्तविक सत्ता नन्जराज और देवराज नामक दो भाइयों के हाथों में थी। हैदर अली ने चतुराई से राजनीतिक परिस्थितियों का लाभ उठाया।
- उसने राजा का पक्ष लेते हुए नन्जराज के विरुद्ध संघर्ष किया। 1760-61 ई० में हैदर अली ने नन्जराज को पराजित कर मैसूर की सत्ता अपने हाथों में ले ली। हालांकि उसने औपचारिक रूप से वोडियार राजा को गद्दी पर बनाए रखा, लेकिन वास्तविक शक्ति उसके हाथों में थी।
- हैदर अली ने सत्ता में आते ही सुधारों की शुरुआत की। उसने सेना का आधुनिकीकरण किया और यूरोपीय तर्ज पर प्रशिक्षित सैनिक तैयार किए। उसने फ्रांसीसी विशेषज्ञों की सहायता से तोपखाना मजबूत किया।
- समुद्री शक्ति के महत्व को समझते हुए हैदर अली ने एक जहाजी बेड़ा तैयार किया। यह भारतीय इतिहास में अद्वितीय था कि किसी भारतीय शासक ने नौसेना पर इतना ध्यान दिया।
- हैदर अली ने मैसूर के क्षेत्रफल में व्यापक वृद्धि की। उसने मालाबार तट, बिदानूर, बेदनूर और कर्नाटक के कई क्षेत्रों को जीता। मैसूर दक्षिण भारत की सबसे शक्तिशाली रियासत बन गई।
- अंग्रेजों के साथ हैदर अली के चार युद्ध हुए। प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767-69) में उसने अंग्रेजों को बुरी तरह पराजित किया। उसकी सेना ने मद्रास के द्वार तक पहुंचकर अंग्रेजों को संधि करने पर मजबूर किया।
- द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780-84) के दौरान हैदर अली ने मराठों और निज़ाम के साथ गठबंधन बनाया। पोर्टो नोवो और पोलिलूर के युद्धों में उसने अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी।
- 7 दिसंबर 1782 ई० को चित्तूर में कैंसर जैसी बीमारी से हैदर अली की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्र टीपू सुल्तान ने मैसूर की सत्ता संभाली और पिता की विरासत को आगे बढ़ाया। हैदर अली का जीवन संघर्ष, साहस और स्वाभिमान की प्रेरणादायक कहानी है।
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध कब हुआ था?
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध सन् 1767 ईस्वी में शुरू हुआ और 1769 ईस्वी में समाप्त हुआ। यह युद्ध करीब दो वर्षों तक चला। उस दौरान बंगाल का गवर्नर लॉर्ड वेरेल्स्ट था और दिल्ली में मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय का नाममात्र का शासन था। आखिरकार 4 अप्रैल 1769 को मद्रास की संधि के साथ इस युद्ध का पटाक्षेप हुआ।
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध किसके बीच हुआ था?
यह युद्ध एक तरफ ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और दूसरी तरफ मैसूर के शक्तिशाली शासक हैदर अली के बीच लड़ा गया। अंग्रेज़ी सेना का नेतृत्व जनरल जोसेफ स्मिथ कर रहे थे जबकि मैसूर की ओर से हैदर अली खुद मैदान में था। हैदर अली एक साधारण सैनिक से उठकर मैसूर का सर्वेसर्वा बना था, इसलिए उसकी रणनीति और साहस दोनों बेमिसाल थे। उसने अकेले दम पर नहीं लड़ा, बल्कि चतुराई से निज़ाम और मराठों को भी अपने पक्ष में कर लिया। यह युद्ध महज़ दो राज्यों की लड़ाई नहीं था, बल्कि यह दक्षिण भारत में वर्चस्व की असली जंग थी।
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध के क्या कारण थे?
- प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध कोई अचानक भड़का संघर्ष नहीं था। इसके पीछे वर्षों से धधकती आग थी जो एक-एक घटना से और भड़कती रही। आइए उन कारणों को विस्तार से समझते हैं।
- बंगाल को जीतने के बाद अंग्रेज़ों का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर था। वे पूरे भारत को एक-एक कर निगलना चाहते थे। दक्षिण भारत उनकी अगली मंज़िल था और मैसूर उनके रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट। इसीलिए उन्होंने मैसूर को कमज़ोर करने की साज़िश शुरू की।
- हैदर अली एक असाधारण शासक था। उसने मैसूर की सेना को आधुनिक तरीके से संगठित किया, तोपखाना खड़ा किया और पड़ोसी राज्यों को एक-एक करके अपने अधीन किया। जब अंग्रेज़ों ने यह देखा तो उन्हें एहसास हो गया कि यह आदमी अगर और ताकतवर हुआ तो इनके सपनों पर पानी फेर देगा।
- 1766 में जब हैदर अली मराठों से लड़ाई में उलझा हुआ था, तब अंग्रेज़ों ने पीठ पीछे हैदराबाद के निज़ाम से संधि कर ली। इस संधि में तय हुआ कि उत्तरी सरकार के क्षेत्र के बदले में निज़ाम को हैदर अली के खिलाफ अंग्रेज़ी मदद मिलेगी। यह हैदर अली के साथ बहुत बड़ा धोखा था और इसने उसके दिल में अंग्रेज़ों के प्रति नफ़रत की आग जला दी।
- अंग्रेज़, निज़ाम और मराठे — तीनों ने मिलकर मैसूर को घेरने की योजना बनाई। यह देखकर कोई भी डर जाता, लेकिन हैदर अली ने हिम्मत नहीं हारी। उसने समझदारी से काम लिया और निज़ाम को जमीन का लालच देकर और मराठों को धन देकर अपनी तरफ कर लिया। इस तरह अंग्रेज़ अकेले पड़ गए।
- हैदर अली एक मजबूत नौसेना बनाना चाहता था, जिसके लिए उसे समुद्र तट तक अपना राज्य फैलाना ज़रूरी था। लेकिन अंग्रेज़ों ने उसके हर प्रयास को रोका और गुन्टूर व माही जैसे तटीय इलाकों पर कब्ज़ा कर लिया। इससे हैदर अली और भी भड़क गया।
- हैदर अली ने मुहम्मद अली के दुश्मन महफूज़ खां को अपने दरबार में शरण दी थी। इसके अलावा उसने चंदा साहब के बेटे को भी नौकरी पर रखा हुआ था, जो अंग्रेज़ों को पसंद नहीं था। दूसरी तरफ अंग्रेज़ों ने वेरनौर में सैनिक अड्डा बनाया जो हैदर की नज़र में उसके राज्य के लिए खतरा था। इस तरह दोनों के बीच हर दिन तनाव बढ़ता गया और 1767 में यह तनाव खुले युद्ध में बदल गया।
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध के क्या परिणाम थे?
- यह युद्ध इतिहास के उन युद्धों में से एक है जिसने सिद्ध कर दिया कि शक्ति केवल बड़ी सेना में नहीं, बल्कि सही रणनीति और साहस में होती है। इस युद्ध के परिणाम बेहद दूरगामी रहे।
- हैदर अली ने अंग्रेज़ों को मैदान में ऐसी मात दी कि वे पीछे हटते-हटते मद्रास तक पहुँच गए। मंगलौर पर हमला करके उसने बंबई से आई अंग्रेज़ी सेना को भी धूल चटाई। अंग्रेज़ों की यह हार उनके घमंड पर जबरदस्त तमाचा था।
- जब हैदर अली की सेना मद्रास के बिल्कुल करीब आ गई तो अंग्रेज़ों के पास संधि करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। 4 अप्रैल 1769 को उन्हें हैदर अली की शर्तों पर मद्रास की संधि करनी पड़ी — यह संधि उनके लिए किसी शर्म से कम नहीं थी।
- इस जीत ने हैदर अली को दक्षिण भारत का सबसे ताकतवर शासक बना दिया। उसकी साख इतनी बढ़ गई कि उसने एक तस्वीर बनवाई जिसमें अंग्रेज़ गवर्नर उसके सामने झुके हुए दिखाए गए। मैसूर अब दक्षिण भारतीय राजनीति का केंद्र बन गया था।
- 1771 में जब मराठों ने मैसूर पर तीसरी बार हमला किया, तब संधि की शर्त के अनुसार अंग्रेज़ों को हैदर अली की मदद करनी थी। लेकिन उन्होंने साफ इनकार कर दिया। इस धोखे ने हैदर अली को अंग्रेज़ों का चिर-शत्रु बना दिया।
- पहले युद्ध की यह संधि केवल दिखावे की शांति थी। अंग्रेज़ों के विश्वासघात ने हैदर अली को इतना क्रोधित किया कि 1780 में उसने कर्नाटक में अर्काट पर हमला कर दिया और द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध की शुरुआत हो गई।
मद्रास की संधि 1769 क्या थी?
मद्रास की संधि वह ऐतिहासिक दस्तावेज़ है जिसने प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध को विराम दिया। यह संधि 4 अप्रैल 1769 को मैसूर के शासक हैदर अली और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हस्ताक्षरित हुई।
संधि क्यों करनी पड़ी?
जब हैदर अली की सेना मद्रास के एकदम पास आ गई और शहर में भय और अफरातफरी फैल गई, तब अंग्रेज़ों को समझ आ गया कि अब लड़ते रहना बेकार है। उन्होंने खुद पहल करके संधि का प्रस्ताव रखा।
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संधि की प्रमुख शर्तें
पहली शर्त यह थी कि दोनों पक्ष युद्ध के दौरान जीते हुए एक-दूसरे के इलाके वापस लौटाएंगे। दूसरी शर्त यह रही कि अगर भविष्य में किसी तीसरी शक्ति ने दोनों में से किसी पर भी हमला किया तो वे एक-दूसरे की मदद करेंगे। तीसरी और महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि हैदर अली ने करुर का क्षेत्र वापस नहीं किया, जो उसकी जीत का प्रतीक बना रहा।
संधि का असली महत्त्व
यह संधि भले ही कागज़ पर बराबरी की दिखती हो, लेकिन असलियत में यह अंग्रेज़ों की नामवर हार की कबूलियत थी। इतिहास में पहली बार किसी भारतीय शासक ने अंग्रेज़ों को उनकी शर्तों पर नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर संधि करने के लिए मजबूर किया था।
संधि टूटी और नया युद्ध शुरू हुआ
यह संधि ज़्यादा दिन नहीं टिकी। 1771 में जब मराठों ने मैसूर पर हमला किया, अंग्रेज़ों ने मदद करने से इनकार कर दिया और संधि की शर्त का खुलेआम उल्लंघन किया। इस धोखे ने हैदर अली के दिल में ऐसी आग जलाई जो 1780 में द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के रूप में भड़क उठी। इस तरह मद्रास की संधि जो शांति की उम्मीद लेकर आई थी, आगे चलकर और बड़े संघर्ष की जड़ बन गई।
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध कब हुआ था?
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध सन् 1780 ईस्वी में शुरू हुआ और 1784 ईस्वी तक चला। यह युद्ध लगभग चार वर्षों तक जारी रहा। इस दौरान पहले हैदर अली ने और उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र टीपू सुल्तान ने मैसूर की सेना की कमान संभाली। अंततः 1784 ई. में मंगलौर की संधि के साथ यह युद्ध समाप्त हुआ।
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध किसके बीच हुआ था?
यह युद्ध एक तरफ ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और दूसरी तरफ मैसूर के शासक हैदर अली के बीच शुरू हुआ। अंग्रेज़ी सेना की कमान पहले जनरल आयरकूट के हाथ में थी, जिसे बाद में मैथ्यूज ने संभाला। मैसूर की तरफ से युद्ध के बीच में ही 7 दिसम्बर 1782 को हैदर अली का निधन हो गया, जिसके बाद उनके बहादुर पुत्र टीपू सुल्तान ने मोर्चा संभाला और 1784 तक अंग्रेज़ों को कड़ी टक्कर देता रहा।
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के क्या कारण थे ?
यह युद्ध अचानक नहीं भड़का — इसके पीछे अंग्रेज़ों की धोखेबाज़ी और हैदर अली के आत्मसम्मान की टकराहट थी।
- 1769 की मद्रास की संधि में तय हुआ था कि अगर किसी तीसरी शक्ति ने दोनों में से किसी पर हमला किया तो वे एक-दूसरे की मदद करेंगे। 1771 में जब मराठों ने मैसूर पर आक्रमण किया, तब अंग्रेज़ों ने हैदर अली की मदद करने से साफ इनकार कर दिया। यह खुला विश्वासघात था और इसी ने इस दूसरे युद्ध की नींव रखी।
- 19 मार्च 1779 को अंग्रेज़ों ने माही के फ्रांसीसी बंदरगाह पर जबरदस्ती कब्ज़ा कर लिया। यह इलाका हैदर अली के संरक्षण में था। हैदर अली ने इसे अपनी संप्रभुता का सीधा अपमान माना और उसने तय कर लिया कि अब इसका जवाब युद्ध के मैदान में ही दिया जाएगा।
- हैदर अली को पता था कि हथियारों और सैनिक सहयोग के मामले में फ्रांसीसी अंग्रेज़ों से कहीं बेहतर मित्र हैं। वह फ्रांसीसियों से बारूद, शीशा और बंदूकें हासिल कर रहा था। अंग्रेज़ों को यह बात बिल्कुल रास नहीं आती थी। माही पर कब्ज़ा करके उन्होंने हैदर की इस आपूर्ति लाइन को तोड़ने की कोशिश की, जिससे हैदर और भी भड़क गया।
- एक तरफ हैदर अली दक्षिण भारत में एक मज़बूत और स्वतंत्र मैसूर साम्राज्य खड़ा करना चाहता था, तो दूसरी तरफ अंग्रेज़ पूरे दक्षिण भारत को अपने कब्ज़े में लेना चाहते थे। इन दोनों के सपने एक साथ पूरे नहीं हो सकते थे — इसीलिए टकराव अटल था।
- जब हैदर अली को लगा कि अंग्रेज़ों से बातचीत से कुछ हासिल नहीं होगा, तो उसने 1780 में कर्नाटक में अर्काट पर धावा बोल दिया। इसी के साथ द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध की शुरुआत हो गई।
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के क्या परिणाम थे ?
यह युद्ध इतिहास का वह पन्ना है जिसने मैसूर की वीरता और अंग्रेज़ों की चालबाज़ी दोनों को एक साथ उजागर किया।
- युद्ध के बीच में ही 7 दिसम्बर 1782 को हैदर अली का निधन हो गया। उन्होंने जाते-जाते एक बड़ी बात कही थी — “स्थल मार्ग पर हम अंग्रेज़ों को चुनौती दे सकते हैं, लेकिन समुद्र को तो मैं नहीं सूखा सकता।” यह कथन उनकी दूरदर्शिता और पीड़ा दोनों को दर्शाता है।
- हैदर अली की मृत्यु के बाद टीपू सुल्तान ने तुरंत सेना की कमान संभाली और अंग्रेज़ों को एक पल भी चैन नहीं लेने दिया। उसने 1783 में अंग्रेज़ जनरल मैथ्यूज को युद्ध में बंदी बना लिया — यह मैसूर की बहुत बड़ी नैतिक जीत थी।
- 1784 में मंगलौर की संधि के साथ यह युद्ध समाप्त हुआ। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के जीते हुए इलाके वापस लौटाए। यह संधि टीपू सुल्तान और लॉर्ड मैकार्टनी के बीच हुई। इसे भी प्रथम युद्ध की तरह कोई स्पष्ट विजेता घोषित नहीं हुआ।
- वारेन हेस्टिंग्स ने खुद स्वीकार किया कि यह संधि सम्मानजनक नहीं है और लॉर्ड मैकार्टनी की वजह से मैसूर का नुकसान हो सकता है। यह बयान अपने आप में अंग्रेज़ों की कमज़ोरी की निशानी था।
- यह युद्ध भी पहले की तरह अधूरा रहा। टीपू सुल्तान अंग्रेज़ों को दक्षिण भारत से खदेड़ना चाहता था और अंग्रेज़ मैसूर को खत्म करना चाहते थे। इसीलिए कुछ ही वर्षों बाद तीसरा आंग्ल-मैसूर युद्ध छिड़ गया।
मंगलौर की संधि क्या थी? (1784)
मंगलौर की संधि वह शांति समझौता था जिसने द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध को विराम दिया। यह संधि 1784 ईस्वी में हुई। इसमें दोनों पक्षों ने युद्ध के दौरान कब्ज़े में लिए गए एक-दूसरे के इलाके वापस लौटाने पर सहमति जताई। यह संधि न तो पूरी तरह अंग्रेज़ों की जीत थी और न ही मैसूर की — दोनों के लिए यह एक अस्थायी विराम था।
मंगलौर की संधि कब और किसके बीच हुई?
मंगलौर की संधि सन् 1784 ईस्वी में हुई। यह संधि एक तरफ मैसूर के शासक टीपू सुल्तान और दूसरी तरफ ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रतिनिधि लॉर्ड मैकार्टनी के बीच संपन्न हुई। यह संधि मंगलौर नगर में हस्ताक्षरित की गई, इसीलिए इसे मंगलौर की संधि के नाम से जाना जाता है। इसी के साथ द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का समापन हुआ।
मंगलौर की संधि के मुख्य प्रावधान
मंगलौर की संधि 1784 भले ही एक छोटे से दस्तावेज़ में समाई हो, लेकिन इसके प्रावधानों ने दक्षिण भारत की राजनीति पर गहरा असर डाला।
- संधि का सबसे पहला और बुनियादी प्रावधान यह था कि दोनों पक्ष युद्ध के दौरान एक-दूसरे से छीने गए सभी इलाके बिना किसी शर्त के वापस लौटाएंगे। इससे युद्ध से पहले की यथास्थिति बहाल हो गई।
- दोनों पक्षों ने यह भी तय किया कि युद्ध के दौरान जो भी सैनिक या अधिकारी बंदी बनाए गए हैं, उन्हें रिहा किया जाएगा। इससे टीपू सुल्तान ने अंग्रेज़ जनरल मैथ्यूज सहित कई अंग्रेज़ बंदियों को छोड़ा।
- संधि में यह भी स्पष्ट किया गया कि दोनों पक्ष एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करेंगे और आपसी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। हालाँकि यह प्रावधान बाद में सिर्फ कागज़ पर ही रहा।
- इस संधि में कोई भी प्रावधान ऐसा नहीं था जो टीपू सुल्तान को नीचा दिखाए। बल्कि यह माना गया कि टीपू ने अपने पिता की मृत्यु के बाद भी युद्ध जारी रखकर अंग्रेज़ों को बराबरी की शर्तों पर संधि करने पर मजबूर किया।
- संधि के बाद वारेन हेस्टिंग्स ने लॉर्ड मैकार्टनी पर निशाना साधते हुए कहा कि इस संधि की वजह से मैसूर का नुकसान होगा। यह बयान बताता है कि संधि अंग्रेज़ों के लिए कोई बड़ी उपलब्धि नहीं थी, बल्कि एक मजबूरी थी।
यह संधि असल में केवल एक अस्थायी विराम थी। दोनों पक्षों के बीच कोई स्थायी समाधान नहीं निकला था। यही कारण है कि कुछ ही वर्षों बाद तीसरा आंग्ल-मैसूर युद्ध शुरू हो गया।
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध में मंगलौर की संधि का महत्व

मंगलौर की संधि केवल एक युद्धविराम का दस्तावेज़ नहीं थी — यह भारतीय इतिहास में उस दौर का एक बड़ा मील का पत्थर थी जब किसी भारतीय शासक ने अंग्रेज़ों को उनकी मनमर्ज़ी नहीं करने दी।
- इस संधि का सबसे बड़ा महत्व यह था कि मैसूर की संप्रभुता सुरक्षित रही। टीपू सुल्तान ने चार साल तक अंग्रेज़ों से लड़कर यह सिद्ध कर दिया कि मैसूर को आसानी से झुकाया नहीं जा सकता।
- इस संधि के बाद टीपू सुल्तान दक्षिण भारत का सबसे चर्चित और सम्मानित योद्धा बन गया। उसने अपने पिता की विरासत को न केवल संभाला, बल्कि उसे और मज़बूत किया।
- वारेन हेस्टिंग्स जैसे अनुभवी अंग्रेज़ प्रशासक ने भी इस संधि को सराहनीय नहीं माना। यह दर्शाता है कि अंग्रेज़ इस युद्ध में वह नहीं पा सके जो वे चाहते थे।
- इस युद्ध में यह भी देखने को मिला कि अगर भारतीय शासक मिलकर लड़ें तो अंग्रेज़ों को रोका जा सकता है। हालाँकि यह एकजुटता पूरी तरह कभी नहीं आई, लेकिन हैदर अली और टीपू ने अकेले ही अंग्रेज़ों को कई बार पीछे धकेला।
- यह संधि शांति नहीं, बल्कि अगले युद्ध की तैयारी का समय थी। दोनों पक्ष जानते थे कि यह अंतिम फैसला नहीं है। तीसरे और चौथे आंग्ल-मैसूर युद्ध की जड़ें इसी संधि के बाद के वर्षों में पकती रहीं।
मंगलौर की संधि के परिणाम क्या थे?
मंगलौर की संधि के परिणाम दूरगामी और बहुआयामी रहे — कुछ तत्काल और कुछ दीर्घकालिक।
- संधि का सबसे तात्कालिक परिणाम यह था कि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के इलाके वापस कर दिए और युद्ध से पहले की स्थिति बहाल हो गई। इससे न तो अंग्रेज़ों को कुछ नया मिला और न ही मैसूर को कुछ गँवाना पड़ा।
- इस संधि के बाद टीपू सुल्तान और भी आत्मविश्वास से भर गया। उसे लगा कि वह अपने पिता की नीति को सही तरीके से आगे बढ़ा रहा है और अंग्रेज़ों को दक्षिण भारत से भगाना उसके बस में है।
- वारेन हेस्टिंग्स इस संधि से बिल्कुल खुश नहीं था। उसका मानना था कि यह संधि मैसूर को और मज़बूत बनाएगी और आगे चलकर अंग्रेज़ों के लिए और बड़ी मुसीबत खड़ी करेगी। उनकी यह आशंका सच भी निकली।
- इस संधि के बाद भी दोनों पक्षों के बीच तनाव खत्म नहीं हुआ। टीपू सुल्तान फ्रांस और अन्य शक्तियों से मदद लेकर अंग्रेज़ों का मुकाबला करने की तैयारी करता रहा। इसी का नतीजा था कि 1790 में तीसरा आंग्ल-मैसूर युद्ध शुरू हो गया।
- मंगलौर की संधि ने दक्षिण भारत में कोई स्थायी शांति नहीं लाई। मैसूर, अंग्रेज़, मराठे और निज़ाम — सभी अपनी-अपनी चालें चलते रहे। यह दौर अनिश्चितता और कूटनीतिक खींचतान का दौर था।
- इतिहास के पन्नों में यह संधि इस बात की गवाह बनी कि मैसूर ने अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद के सामने घुटने नहीं टेके। हैदर अली और टीपू सुल्तान का यह प्रतिरोध आज भी भारतीय स्वाभिमान की मिसाल माना जाता है।
तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध कब हुआ
तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध सन् 1790 ई० से 1792 ई० के मध्य लड़ा गया। यह युद्ध लगभग दो वर्षों तक चला। इस युद्ध का आरंभ वर्ष 1790 में हुआ जब टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों के मित्र राज्य त्रावणकोर पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध का अंत मार्च 1792 ई० में श्रीरंगपट्टनम की संधि के साथ हुआ। यह आंग्ल-मैसूर संघर्षों की श्रृंखला का तीसरा और अत्यंत निर्णायक युद्ध था।
तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध किसके बीच हुआ
तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध मुख्यतः मैसूर के शासक टीपू सुल्तान और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच लड़ा गया। कंपनी की ओर से बंगाल के गवर्नर जनरल लार्ड कार्नवालिस ने सेना का नेतृत्व किया। अंग्रेजों ने इस युद्ध में हैदराबाद के निज़ाम और मराठों के साथ मिलकर एक त्रिदलीय गठबंधन बनाया और संयुक्त रूप से टीपू सुल्तान का सामना किया। इस प्रकार एक ओर टीपू सुल्तान था तो दूसरी ओर अंग्रेज, निज़ाम और मराठों का शक्तिशाली गठजोड़।
तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध के कारण
1. द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के बाद 1784 ई० में मंगलौर की संधि हुई थी, लेकिन यह संधि दोनों पक्षों के बीच के मतभेदों को पूरी तरह दूर करने में सफल नहीं रही। अंग्रेज और टीपू सुल्तान दोनों ही दक्षिण भारत में अपनी राजनीतिक सर्वोच्चता स्थापित करना चाहते थे। दोनों ओर से टकराव की स्थिति बनी रही और युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार होती रहे।
2. टीपू सुल्तान ने अपनी सेना को अत्यंत आधुनिक और सुसंगठित बनाया था। उसने अपने राज्य में कई आंतरिक सुधार भी किए जिससे मैसूर की शक्ति तेजी से बढ़ रही थी। टीपू की इस बढ़ती हुई शक्ति को देखकर अंग्रेजों के साथ-साथ निज़ाम और मराठे भी चिंतित हो गए।
3. अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान पर यह आरोप लगाया कि वह अंग्रेजों के विरुद्ध फ्रांसीसियों के साथ गुप्त समझौता कर रहा है। टीपू ने 1787 ई० में फ्रांस और तुर्की में अपने दूत भी भेजे थे। इससे अंग्रेजों को यह आशंका और भी बलवती हो गई कि टीपू विदेशी शक्तियों की मदद से उनके विरुद्ध षड्यंत्र रच रहा है।
4. तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का तात्कालिक कारण टीपू सुल्तान द्वारा त्रावणकोर पर किया गया आक्रमण था। त्रावणकोर अंग्रेजों का मित्र राज्य था और ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काली मिर्च का प्रमुख स्रोत भी था। वर्ष 1789-90 में टीपू ने त्रावणकोर पर हमला कर दिया जिसे अंग्रेजों ने अपने अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप माना और युद्ध की घोषणा कर दी।
5. अंग्रेजों ने टीपू को घेरने के लिए 1790 ई० में निज़ाम और मराठों के साथ मिलकर एक त्रिदलीय संगठन तैयार किया। इस शक्तिशाली गठजोड़ ने टीपू को चारों ओर से घेर लिया और युद्ध को उसके लिए अत्यंत कठिन बना दिया।
तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध के परिणाम
1. इस युद्ध में टीपू सुल्तान को भारी पराजय का सामना करना पड़ा। प्रारंभ में मद्रास के गवर्नर मिडोज के नेतृत्व में अभियान शुरू हुआ, परंतु जब वह सफल नहीं हुआ तो स्वयं लार्ड कार्नवालिस ने कमान संभाली। अंग्रेजी सेना ने वैल्लौर, अम्बूर और बंगलौर को जीतते हुए श्रीरंगपट्टनम को घेर लिया। टीपू ने वीरतापूर्वक संघर्ष किया परंतु अंततः विजय संभव न देख संधि के लिए विवश हो गया।
2. श्रीरंगपट्टनम की संधि के अंतर्गत टीपू सुल्तान को अपने विशाल मैसूर साम्राज्य का लगभग आधा भू-भाग अंग्रेजों और उनके सहयोगियों — निज़ाम और मराठों — को सौंपना पड़ा। इससे मैसूर की शक्ति और संसाधन दोनों एकदम आधे रह गए।
3. टीपू को युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में 3.3 करोड़ रुपये की भारी राशि अदा करनी पड़ी। इस धनराशि का भुगतान निर्धारित अवधि के भीतर करना था। इतनी बड़ी रकम देने से मैसूर की अर्थव्यवस्था पर अत्यंत बुरा प्रभाव पड़ा।
4. संधि की एक अपमानजनक शर्त यह थी कि टीपू सुल्तान को अपने दो पुत्रों को लार्ड कार्नवालिस के पास बंधक के रूप में रखना पड़ा। यह टीपू के लिए व्यक्तिगत रूप से अत्यंत अपमानजनक था।
5. इस युद्ध के बाद दक्षिण भारत में टीपू सुल्तान की शक्ति और प्रतिष्ठा बुरी तरह कमजोर हो गई। वहाँ धीरे-धीरे ब्रिटिश सत्ता का वर्चस्व स्थापित होने लगा। लार्ड कार्नवालिस ने इस युद्ध के बाद कहा था — “हमने अपने मित्रों को शक्तिशाली बनाए बिना ही अपने शत्रु को कुचल दिया।”
श्रीरंगपट्टनम की संधि 1792 क्या थी?
- तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790-92) के दौरान जब अंग्रेजी सेना ने श्रीरंगपट्टनम के किले को चारों ओर से घेर लिया, तो टीपू सुल्तान को विवश होकर संधि की शरण लेनी पड़ी। फरवरी 1792 में लार्ड कार्नवालिस ने स्वयं किले का घेराव किया और अंततः मार्च 1792 ई० में यह ऐतिहासिक संधि संपन्न हुई जिसे श्रीरंगपट्टनम की संधि कहा जाता है।
- इस संधि की सबसे महत्त्वपूर्ण शर्त यह थी कि टीपू सुल्तान को अपने मैसूर साम्राज्य का लगभग आधा भाग अंग्रेजों और उनके सहयोगियों को देना पड़ा। इस विभाजित भू-भाग को अंग्रेजों, मराठों और हैदराबाद के निज़ाम के बीच बाँटा गया, जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा ब्रिटिश कंपनी के पास रहा।
- संधि के अनुसार टीपू सुल्तान को 3.3 करोड़ रुपये की भारी युद्ध क्षतिपूर्ति राशि अंग्रेजों को देनी थी। यह राशि एक निर्धारित समय-सीमा के भीतर चुकानी थी। इस भारी आर्थिक बोझ ने मैसूर की वित्तीय स्थिति को और कमजोर कर दिया।
- संधि की एक अत्यंत अपमानजनक शर्त यह भी थी कि टीपू सुल्तान के दो पुत्रों को लार्ड कार्नवालिस के पास बंधक के रूप में रहना होगा। इन्हें तब तक नहीं छोड़ा जाएगा जब तक संधि की समस्त शर्तें पूरी न हो जाएँ। टीपू ने संधि की सभी शर्तें पूरी कीं और उसके बाद उसके पुत्रों को मुक्त किया गया।
- यह संधि भारत के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हुई। इसके बाद दक्षिण भारत में मैसूर की शक्ति अत्यंत सीमित हो गई और ब्रिटिश प्रभुत्व का विस्तार तेज़ी से हुआ। यद्यपि टीपू सुल्तान ने पराजय स्वीकार की, फिर भी वे अपनी हार को भूले नहीं और फ्रांसीसियों से मित्रता बढ़ाते रहे — जो आगे चलकर चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध का कारण बनी।
चतुर्थ आंग्ल मैसूर युद्ध कब हुआ था?
चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध सन् 1799 ई० में लड़ा गया। यह आंग्ल-मैसूर युद्धों की श्रृंखला का चौथा और अंतिम युद्ध था। इस युद्ध के समय भारत का मुगल बादशाह शाहआलम द्वितीय था, जबकि बंगाल का गवर्नर जनरल लार्ड वेलेज़्ली (1798-1805 ई०) था। फरवरी 1799 में युद्ध की घोषणा हुई और 4 मई 1799 को श्रीरंगपट्टनम के किले पर अंग्रेजों का अधिकार होने के साथ यह युद्ध समाप्त हो गया।
चतुर्थ आंग्ल मैसूर युद्ध किसके बीच हुआ
यह युद्ध मैसूर के वीर शासक टीपू सुल्तान और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच लड़ा गया। अंग्रेजों की ओर से लार्ड वेलेज़्ली के नेतृत्व में जनरल हैरिस, जनरल स्टुअर्ट और कर्नल आर्थर वेलेजली ने सेना का संचालन किया। इस युद्ध में भी अंग्रेजों ने हैदराबाद के निज़ाम को अपने साथ मिला लिया। अकेले पड़ जाने के बावजूद टीपू सुल्तान ने बहादुरी से संघर्ष किया और अंततः युद्धभूमि में ही वीरगति को प्राप्त हुआ।
चतुर्थ आंग्ल मैसूर युद्ध के कारण
1. 1792 ई० में श्रीरंगपट्टनम की अपमानजनक संधि के बाद टीपू सुल्तान के मन में अंग्रेजों से प्रतिशोध लेने की तीव्र भावना जागृत हो गई। उसने अपनी सेना को पुनः संगठित किया, किलेबंदी मजबूत की, घुड़सवार और पैदल सेना की संख्या बढ़ाई और अगले युद्ध की तैयारी में लग गया।
2. तृतीय युद्ध के पश्चात टीपू सुल्तान ने फ्रांसीसियों के साथ अपने संबंध और भी प्रगाढ़ कर लिए। उसने श्रीरंगपट्टनम में जैकोबिन क्लब की सदस्यता ग्रहण की तथा फ्रांसीसी सैनिकों का अपनी सेना में स्वागत किया। उसने फ्रांस की क्रांति के सम्मान में श्रीरंगपट्टनम में स्वतंत्रता का वृक्ष भी लगाया और स्वयं को ‘नागरिक टीपू’ कहलाने लगा।
3. 1798 में फ्रांसीसी सेनापति नेपोलियन मिस्र पहुँचा था और उसका एक लक्ष्य भारत में अंग्रेजों को कमजोर करना भी था। टीपू ने नेपोलियन से पत्राचार किया और उससे सैन्य सहयोग की उम्मीद लगाई। इससे अंग्रेजों की चिंता बढ़ गई और उन्होंने टीपू को खत्म करने का निश्चय कर लिया।
4. 1799 ई० में गवर्नर जनरल लार्ड वेलेज़्ली ने टीपू सुल्तान के पास सहायक संधि (Subsidiary Alliance) का प्रस्ताव भेजा। इस संधि को स्वीकार करने का अर्थ था — अपनी स्वतंत्रता और सत्ता का समर्पण। स्वाभिमानी टीपू ने इस प्रस्ताव को दृढ़ता से ठुकरा दिया, और यही चतुर्थ युद्ध का सबसे प्रत्यक्ष कारण बना।
5. लार्ड वेलेज़्ली एक घोर साम्राज्यवादी था। वह भारत आते ही समझ गया था कि टीपू सुल्तान ब्रिटिश सत्ता के विस्तार में सबसे बड़ी बाधा है। उसने निज़ाम को अपनी ओर मिलाया और टीपू पर फ्रांसीसी साजिश का आरोप लगाकर फरवरी 1799 में युद्ध की घोषणा कर दी।
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चतुर्थ आंग्ल मैसूर युद्ध के परिणाम
1. इस युद्ध का सबसे महत्त्वपूर्ण और दुखद परिणाम था — मैसूर के वीर शासक टीपू सुल्तान की मृत्यु। 4 मई 1799 को श्रीरंगपट्टनम के किले की प्राचीर पर लड़ते हुए गोली लगने से टीपू वीरगति को प्राप्त हुआ। वह जीते जी शत्रु के सामने नहीं झुका, क्योंकि उसका विश्वास था कि शेर की तरह एक दिन जीना, गीदड़ की तरह सौ दिन जीने से बेहतर है।
2. टीपू की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने श्रीरंगपट्टनम पर पूर्ण अधिकार कर लिया। कनारा, कोयंबटूर और दक्षिणी कन्नड़ जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र सीधे ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिए गए। इस प्रकार टीपू का विशाल मैसूर साम्राज्य बिखर गया।
3. वोडियार वंश की पुनर्स्थापना और सहायक संधि अंग्रेजों ने मैसूर की गद्दी पर पुराने हिंदू वोडियार वंश के बालक कृष्णराज को बैठाया और उनसे सहायक संधि कर ली। इसका अर्थ यह था कि मैसूर अब एक आश्रित राज्य बन गया, जिसकी रक्षा और नीतियाँ अंग्रेजों की इच्छा पर निर्भर थीं।
4. इस युद्ध के बाद दक्षिण भारत में अंग्रेजों का वर्चस्व पूरी तरह स्थापित हो गया। अब कोई भी देशी शक्ति उन्हें चुनौती देने की स्थिति में नहीं थी। वेलेज़्ली ने विजय की खुशी में कहा था — “पूरे भारत का साम्राज्य अब मेरे कदमों पर।”
5. इस महत्त्वपूर्ण विजय के उपलक्ष्य में आयरलैण्ड के लार्ड समाज ने वेलेज़्ली को ‘मार्क्विस’ की सम्मानजनक उपाधि प्रदान की। यह उपाधि उनकी भारत में ब्रिटिश शक्ति के विस्तार में भूमिका की स्वीकृति थी।
टीपू सुल्तान की मृत्यु कब हुई
टीपू सुल्तान की मृत्यु 4 मई 1799 ई० को हुई। वे चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध के दौरान अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टनम के किले की रक्षा करते हुए युद्धभूमि में ही वीरगति को प्राप्त हुए। दुर्ग की प्राचीर पर लड़ते समय उन्हें गोली लगी और वे शहीद हो गए। मैसूर के इस शेर ने अंत तक अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया। उनका पार्थिव शरीर किले के पूर्वी द्वार के पास मिला था।
श्रीरंगपट्टनम का युद्ध 1799
श्रीरंगपट्टनम का युद्ध मई 1799 ई० में अंग्रेजों और टीपू सुल्तान के बीच हुआ। अंग्रेजी सेना ने चारों दिशाओं से मैसूर की राजधानी श्रीरंगपट्टनम को घेर लिया। टीपू के कुछ विश्वासघाती सेनापतियों के कारण अंग्रेज दुर्ग में प्रवेश करने में सफल हुए। टीपू ने अत्यंत साहस के साथ किले की रक्षा की, परंतु 4 मई 1799 को वे लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए। इसी के साथ आंग्ल-मैसूर संघर्ष का अध्याय सदा के लिए बंद हो गया।
टीपू सुल्तान कौन था ?
टीपू सुल्तान 18वीं शताब्दी के दक्षिण भारत के मैसूर राज्य के एक वीर और पराक्रमी शासक थे। उनका पूरा नाम सुल्तान फतेह अली खान था। वे प्रसिद्ध शासक हैदर अली के पुत्र थे। उनकी वीरता और साहस से प्रभावित होकर उनके पिता ने उन्हें ‘शेर-ए-मैसूर’ की उपाधि दी थी। वे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के सबसे कठोर प्रतिद्वंद्वियों में से एक थे और 4 मई 1799 को श्रीरंगपट्टनम की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

टीपू सुल्तान का इतिहास
जन्म और प्रारंभिक जीवन
टीपू सुल्तान का जन्म 20 नवंबर 1750 को कर्नाटक के देवनहल्ली नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता हैदर अली मैसूर राज्य के एक साधारण सैनिक से उठकर राज्य के शक्तिशाली शासक बने थे। टीपू की माँ का नाम फातिमा फख्र-उन-निसा था। टीपू को बचपन से ही अरबी, फारसी, कन्नड़ और उर्दू भाषाओं की शिक्षा दी गई। इसके साथ ही घुड़सवारी, तलवारबाजी और युद्धकला में भी उन्हें पारंगत किया गया।
राज्याभिषेक और शासनकाल
1782 ई० में पिता हैदर अली की मृत्यु के पश्चात टीपू सुल्तान मैसूर की गद्दी पर बैठे। उन्होंने अपने शासनकाल में मैसूर को एक अत्यंत सुसंगठित और समृद्ध राज्य के रूप में विकसित किया। उन्होंने नई सिक्का प्रणाली, नया कैलेंडर और आधुनिक भूमि राजस्व व्यवस्था लागू की। उन्होंने जमींदारी प्रथा समाप्त करके किसानों को सीधा राहत दिया।
सैन्य प्रतिभा और रॉकेट तकनीक
टीपू सुल्तान एक असाधारण सैन्य प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने लोहे के आवरण वाले रॉकेटों का युद्ध में प्रभावी उपयोग किया, जो उस समय की सबसे उन्नत सैन्य तकनीकों में से एक थी। यही कारण है कि उन्हें ‘मिसाइल मैन’ भी कहा जाता है। उनके इन्हीं रॉकेटों से प्रेरित होकर बाद में यूरोप में ‘कांग्रेव रॉकेट’ का विकास हुआ।
आर्थिक और सामाजिक सुधार
टीपू ने मैसूर में रेशम उद्योग की नींव रखी, जो आगे चलकर एक अत्यंत सफल उद्योग बना। उन्होंने शहतूत के पेड़ लगवाकर रेशम उत्पादन को बढ़ावा दिया। इसके साथ ही उन्होंने आधुनिक तरीकों से कागज़ निर्माण, घड़ियाँ और अन्य उपकरणों के उत्पादन में भी उल्लेखनीय सफलता हासिल की।
धार्मिक सहिष्णुता
टीपू सुल्तान एक धार्मिक सहिष्णु शासक थे। वे श्रृंगेरी के जगद्गुरु शंकराचार्य श्री सच्चिदानंद भारती का अत्यंत आदर करते थे। उन्होंने अपने शासनकाल में किसी भी भारतीय शासक — चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान — के विरुद्ध अंग्रेजों से कोई गठबंधन नहीं किया।
आंग्ल-मैसूर युद्ध और अंतिम संघर्ष
टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों के विरुद्ध तृतीय और चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध लड़े। 1792 में श्रीरंगपट्टनम की अपमानजनक संधि के बाद भी उनका साहस नहीं टूटा। उन्होंने फ्रांसीसियों और अन्य शक्तियों से सहायता लेने का प्रयास किया, परंतु सफलता नहीं मिली। जब 1799 में लार्ड वेलेज़्ली ने सहायक संधि का प्रस्ताव भेजा तो टीपू ने उसे दृढ़ता से अस्वीकार कर दिया।
वीरगति
4 मई 1799 को श्रीरंगपट्टनम के किले की रक्षा करते हुए टीपू सुल्तान वीरगति को प्राप्त हुए। मैसूर के इस वीर शेर ने अंत तक शत्रु के सामने घुटने नहीं टेके। उनका यह कथन आज भी प्रेरणादायक है — “सौ दिन गीदड़ की भाँति जीने से अच्छा है, एक दिन शेर की तरह जीना।” उनकी मृत्यु के साथ ही मैसूर के स्वतंत्र शासन का स्वर्णिम अध्याय सदा के लिए बंद हो गया।
निष्कर्ष
आंग्ल-मैसूर युद्धों की पूरी कहानी हमें केवल लड़ाइयों का इतिहास नहीं बताती, बल्कि यह उस दौर की राजनीति, कूटनीति और शक्ति संतुलन को भी उजागर करती है। हैदर अली और टीपू सुल्तान ने अपने साहस, दूरदर्शिता और सैन्य कौशल से अंग्रेज़ों को कड़ी चुनौती दी। खासकर टीपू सुल्तान ने आखिरी समय तक अंग्रेजों के सामने झुकने के बजाय लड़ना चुना, जो उनके अदम्य आत्मसम्मान को दर्शाता है।
हालाँकि अंततः अंग्रेज़ों की जीत हुई, लेकिन इसका मुख्य कारण उनकी मजबूत नौसेना, बेहतर संसाधन और भारतीय राज्यों के बीच एकता की कमी थी। यदि उस समय भारतीय शक्तियाँ एकजुट होतीं, तो शायद इतिहास कुछ और होता।
इन युद्धों से हमें यह सीख मिलती है कि केवल वीरता ही नहीं, बल्कि रणनीति, संसाधन और एकता भी किसी संघर्ष में जीत के लिए उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। आंग्ल-मैसूर युद्ध भारतीय इतिहास का एक ऐसा अध्याय है, जो हमें न केवल अतीत को समझने में मदद करता है, बल्कि भविष्य के लिए भी महत्वपूर्ण सीख देता है।
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