
प्रस्तावना
भारत के इतिहास में एक ऐसा मोड़ आया जिसने पूरे देश की दिशा बदल दी—और इसकी शुरुआत बंगाल से हुई। ईस्ट इंडिया कंपनी, जो भारत में केवल व्यापार करने आई थी, आखिर कैसे धीरे-धीरे सत्ता पर काबिज हो गई? यह सवाल आज भी लोगों के मन में उत्सुकता पैदा करता है। बंगाल, जो उस समय भारत का सबसे समृद्ध प्रांत था, अंग्रेजों की नजर में क्यों आया और उन्होंने किन चालों, साजिशों और युद्धों के जरिए इसे अपने नियंत्रण में लिया—यह कहानी केवल इतिहास नहीं, बल्कि राजनीति, कूटनीति और धोखे का मिश्रण है। प्लासी के युद्ध से लेकर बक्सर तक, हर घटना ने अंग्रेजों की ताकत को बढ़ाया और भारतीय शासकों की कमजोरियों को उजागर किया। इस लेख में हम जानेंगे कि आखिर ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल पर कैसे कब्जा किया और इसके पीछे की असली सच्चाई क्या थी।
मुर्शिद कुली खां (1700-27 ई०)
मुर्शिद कुली खां कौन था?
मुर्शिद कुली खां बंगाल के स्वतंत्र राज्य का संस्थापक था। 1701 ई० में मुगल बादशाह औरंगज़ेब ने उसे बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया था। उसने ढाका के स्थान पर मकसूदाबाद को अपनी राजधानी बनाई और उसका नाम बदलकर मुर्शिदाबाद रख दिया। 1707 ई० में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद उसने बंगाल में अर्ध-स्वतंत्र सत्ता स्थापित की। उसने प्रशासनिक सुधार किए, भू-राजस्व व्यवस्था को सुव्यवस्थित किया और 1727 ई० तक शासन किया।
बंगाल का पहला नवाब कौन था?
मुर्शिद कुली खां को बंगाल का प्रथम स्वतंत्र नवाब माना जाता है, यद्यपि वह औरंगज़ेब द्वारा नियुक्त सूबेदार था, परंतु औरंगज़ेब की मृत्यु के पश्चात् उसने बंगाल में अपनी स्वतंत्र सत्ता कायम की। उसने मुगल बादशाह को केवल नाममात्र की वफादारी दी और वास्तविक रूप से स्वतंत्र शासक के समान कार्य किया। उसने 1701 से 1727 ई० तक शासन किया और बंगाल के नवाबी वंश की नींव रखी, जिसके बाद उसके उत्तराधिकारियों ने शासन किया।
मुर्शिदाबाद का इतिहास हिंदी में
मुर्शिदाबाद की स्थापना और नामकरण
मुर्शिदाबाद की स्थापना मुर्शिद कुली खां ने 18वीं शताब्दी के प्रारंभ में की थी। मूल रूप से यह स्थान मकसूदाबाद के नाम से जाना जाता था। जब मुर्शिद कुली खां ने 1701 ई० में बंगाल के सूबेदार का पद संभाला, तो उसने ढाका के स्थान पर इस नगर को अपनी राजधानी बनाया और अपने नाम पर इसका नाम मुर्शिदाबाद रखा।
मुर्शिदाबाद का राजनीतिक महत्व
मुर्शिदाबाद बंगाल की राजधानी के रूप में शीघ्र ही एक महत्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र बन गया। यहां से मुर्शिद कुली खां और उसके उत्तराधिकारियों ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा पर शासन किया। नगर में भव्य महल, मस्जिदें और प्रशासनिक भवन बनाए गए। यह नवाबों की शक्ति और समृद्धि का प्रतीक था।
मुर्शिदाबाद की आर्थिक समृद्धि
मुर्शिदाबाद व्यापार और वाणिज्य का एक प्रमुख केंद्र बन गया। भागीरथी नदी के तट पर स्थित होने के कारण यह व्यापारिक मार्गों से जुड़ा था। यहां रेशम, मलमल और अन्य वस्त्रों का व्यापार फला-फूला। यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों ने भी यहां अपनी उपस्थिति स्थापित की। नगर की समृद्धि और वैभव की ख्याति दूर-दूर तक फैली।
प्लासी का युद्ध और पतन
1757 ई० में प्लासी के युद्ध ने मुर्शिदाबाद के इतिहास में निर्णायक मोड़ लाया। नवाब सिराजुद्दौला की पराजय के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का बंगाल पर प्रभुत्व स्थापित हो गया। यद्यपि मुर्शिदाबाद कुछ समय तक राजधानी बना रहा, परंतु धीरे-धीरे इसका राजनीतिक महत्व कम होता गया। 1772 ई० में अंग्रेजों ने राजधानी को कलकत्ता स्थानांतरित कर दिया।
मुर्शिदाबाद की ऐतिहासिक धरोहर
आज मुर्शिदाबाद अपनी ऐतिहासिक धरोहर के लिए प्रसिद्ध है। यहां हजारदुआरी पैलेस, कटरा मस्जिद, मुर्शिद कुली खां का मकबरा और अन्य ऐतिहासिक स्मारक हैं जो बंगाल के नवाबी युग की याद दिलाते हैं।
मुर्शिद कुली खां की नीतियां क्या थी?
भू-राजस्व सुधार
मुर्शिद कुली खां की सबसे महत्वपूर्ण नीति भू-राजस्व व्यवस्था में सुधार थी। उसने व्यापक भूमि सर्वेक्षण कराया और भू-राजस्व का वैज्ञानिक निर्धारण किया। उसने जागीरदारी प्रथा को समाप्त करने का प्रयास किया और खालसा भूमि पर सरकार का सीधा नियंत्रण स्थापित किया। इससे राज्य की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। उसने भू-राजस्व संग्रह की व्यवस्था को सुव्यवस्थित बनाया और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के प्रयास किए।
प्रशासनिक सुधार
मुर्शिद कुली खां ने प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाया। उसने योग्य और कुशल अधिकारियों की नियुक्ति की। उसने प्रशासन में हिंदू अधिकारियों को भी महत्वपूर्ण पद दिए, जिससे स्थानीय जनता का सहयोग प्राप्त हुआ। उसने न्याय व्यवस्था में सुधार किए और कानून-व्यवस्था बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया। उसकी प्रशासनिक दक्षता के कारण बंगाल में शांति और स्थिरता स्थापित हुई।
आर्थिक नीति
मुर्शिद कुली खां ने व्यापार और वाणिज्य को प्रोत्साहित किया। उसने व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित की और व्यापारियों को सुविधाएं प्रदान कीं। उसने मुद्रा व्यवस्था को स्थिर रखा और बाजारों को नियमित किया। यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों के साथ भी उसने व्यापारिक संबंध बनाए रखे। इन नीतियों से बंगाल की आर्थिक समृद्धि में वृद्धि हुई।
सैन्य संगठन
उसने सैन्य शक्ति को मजबूत बनाया। उसने एक सुसंगठित सेना का गठन किया जो आंतरिक विद्रोहों को दबाने और बाह्य आक्रमणों से रक्षा करने में सक्षम थी। उसने किलों और दुर्गों की मरम्मत करवाई और रणनीतिक स्थानों पर चौकियां स्थापित कीं। इससे बंगाल की सुरक्षा सुदृढ़ हुई।
धार्मिक सहिष्णुता
मुर्शिद कुली खां ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई। यद्यपि वह स्वयं धार्मिक मुसलमान था और उसने अनेक मस्जिदों का निर्माण करवाया, परंतु उसने हिंदू प्रजा के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार किया। इससे सांप्रदायिक सद्भाव बना रहा और प्रशासन सुचारू रूप से चलता रहा।
शुजाउद्दीन और सरफराज खां कौन थे?
शुजाउद्दीन मुर्शिद कुली खां का दामाद था, जो 1727 ई० में उसकी मृत्यु के बाद बंगाल का नवाब बना। उसने 1727 से 1739 ई० तक शासन किया और बंगाल में अपनी स्वतंत्र सत्ता को और मजबूत किया। उसके शासनकाल में बंगाल की समृद्धि जारी रही। 1739 ई० में शुजाउद्दीन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र सरफराज खां बंगाल का नवाब बना, परंतु उसका शासनकाल बहुत छोटा रहा। 1740 ई० में अलीवर्दी खां ने उसे पराजित कर दिया और स्वयं बंगाल का नवाब बन गया।
अली वर्दी खां (1740-56 ई०)
अलीवर्दी खां कौन था?
अलीवर्दी खां 1740 से 1756 ई० तक बंगाल का शक्तिशाली नवाब था। उसने गिरिया के युद्ध में सरफराज खां को पराजित कर बंगाल की सत्ता प्राप्त की। वह मुगल बादशाह के अधीन बंगाल, बिहार और उड़ीसा तीनों प्रांतों का सूबेदार था। उसने यूरोपीय शक्तियों, विशेषकर अंग्रेजों की बढ़ती शक्ति को पहचाना और उन्हें नियंत्रित रखने का प्रयास किया। उसने मराठों से संघर्ष किया और अंततः उनसे संधि की। उसकी मृत्यु के बाद उसका नाती सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना।

अलीवर्दी खां का इतिहास हिंदी में
अलीवर्दी खां का जन्म 1671 ई० में हुआ था और उसका मूल नाम मिर्जा मुहम्मद अली था। वह शाह कुली खां मिर्जा मुहम्मद मदनी का पुत्र था। शुजाउद्दीन मोहम्मद खां ने उसे 1732 ई० में बिहार का उप-सूबेदार नियुक्त किया था। 1740 ई० में गिरिया के युद्ध में उसने सरफराज खां को पराजित कर बंगाल का नवाब बन गया। उसने नवाब बनने के बाद “मिर्जा मुहम्मद खां” की उपाधि धारण की।
मुगल बादशाह से मान्यता
अलीवर्दी खां ने अपनी सत्ता को वैध बनाने के लिए मुगल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला को 2 करोड़ रुपये का नजराना भेजा। इसके बदले में मुगल बादशाह ने उसे बंगाल का नवाब स्वीकृत करने का आधिकारिक घोषणा पत्र जारी किया। वह मुगलों द्वारा आधिकारिक रूप से घोषित बंगाल का प्रथम नवाब था। हालांकि, नवाबी मिलने के बाद उसने कभी भी मुगल राजकोष में कोई राजस्व जमा नहीं किया।
मराठा आक्रमण और संघर्ष
1740 से 1751 ई० तक अलीवर्दी खां को मराठों के लगातार आक्रमणों का सामना करना पड़ा। मराठा सरदार रघुजी भोंसले ने बार-बार बंगाल पर आक्रमण किए। यद्यपि अलीवर्दी खां ने मराठा सरदार भास्कर पंडित की हत्या कर दी थी, फिर भी वह मराठा आक्रमणों को पूरी तरह रोकने में असमर्थ रहा। अंततः 1751 ई० में उसने मराठों से संधि कर ली। संधि की शर्तों के अनुसार उसने उड़ीसा प्रांत मराठों को दे दिया और बिहार तथा बंगाल की चौथ के रूप में 12 लाख रुपये वार्षिक कर देना स्वीकार किया।
यूरोपीय शक्तियों के प्रति नीति
अलीवर्दी खां यूरोपीय शक्तियों की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं को समझने वाला दूरदर्शी शासक था। उसने यूरोपीयनों की तुलना मधुमक्खी के छत्ते से की और कहा था कि यदि उन्हें छोड़ दिया जाए तो वे शहद देंगी, और यदि उन्हें छेड़ा जाए तो वे काट-काट कर मार डालेंगी। उसने अंग्रेजों और फ्रांसीसियों को किलेबंदी करने की अनुमति नहीं दी, जब मराठा आक्रमणों के दौरान अंग्रेजों ने फोर्ट विलियम के चारों ओर खाई बना दी, तो उसने मुगल बादशाह को पत्र लिखकर दस्तक निरस्त करने का अनुरोध किया, परंतु कोई उत्तर नहीं मिला।
मृत्यु और उत्तराधिकार
1756 ई० में 80 वर्ष की आयु में अलीवर्दी खां की मृत्यु हो गई। उसकी तीन पुत्रियां थीं, परंतु तीनों दामाद उसके सामने ही मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे। अपनी मृत्यु से पूर्व उसने अपनी सबसे छोटी पुत्री के पुत्र सिराजुद्दौला को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। उसने सिराजुद्दौला को अंग्रेजों पर कभी भी विश्वास न करने और उन्हें जैसे ही मौका मिले बंगाल से निकाल देने की महत्वपूर्ण सलाह दी थी।
बंगाल का नवाब अलीवर्दी खां कौन था?
अलीवर्दी खां बंगाल का अंतिम शक्तिशाली और स्वतंत्र नवाब था, जिसने 1740 से 1756 ई० तक शासन किया। उसने सरफराज खां को गिरिया के युद्ध में पराजित कर सत्ता प्राप्त की और अफशर वंश की स्थापना की। वह एक कुशल प्रशासक और दूरदर्शी शासक था जिसने यूरोपीय शक्तियों, विशेषकर अंग्रेजों की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं को पहचाना। उसने मराठों से लंबे संघर्ष के बाद संधि की और बंगाल में शांति स्थापित की। उसकी मृत्यु के बाद उसका नाती सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना।
अलीवर्दी खां और अंग्रेजों का संबंध क्या था?
अलीवर्दी खां अंग्रेजों की बढ़ती शक्ति और महत्वाकांक्षाओं को लेकर अत्यंत सतर्क था। यद्यपि उसके अंग्रेजों के साथ औपचारिक रूप से अच्छे संबंध थे और उसने उन्हें व्यापार करने की अनुमति दी थी, परंतु उसने उन्हें कभी भी पूर्ण विश्वास नहीं किया। उसने यूरोपीय शक्तियों की तुलना मधुमक्खी के छत्ते से की और कहा था कि यदि उन्हें छेड़ा न जाए तो वे शहद देंगी, परंतु यदि छेड़ा जाए तो काट-काट कर मार डालेंगी। यह उक्ति उसकी दूरदर्शिता और यूरोपीय खतरे की समझ को दर्शाती है।
किलेबंदी पर प्रतिबंध
अलीवर्दी खां ने अंग्रेजों और फ्रांसीसियों को किलेबंदी करने का अधिकार नहीं दिया। उसने दोनों यूरोपीय शक्तियों को बंगाल में स्थायी दुर्ग बनाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया, जब मराठा आक्रमणों के दौरान अंग्रेजों ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए फोर्ट विलियम के चारों ओर खाई बना दी, तो अलीवर्दी खां ने इसका विरोध किया। उसने मुगल बादशाह को पत्र लिखकर दस्तक (कर-मुक्त व्यापार का अधिकार) निरस्त करने का अनुरोध किया, परंतु उसे कोई उत्तर नहीं मिला। यह घटना अंग्रेजों की बढ़ती स्वतंत्रता और मुगल शक्ति की कमजोरी को दर्शाती है।
सिराजुद्दौला को चेतावनी
अलीवर्दी खां ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में यूरोपीय शक्ति, विशेषकर अंग्रेजों के खतरे को स्पष्ट रूप से पहचान लिया था। उसने अपनी मृत्यु से पूर्व अपने उत्तराधिकारी सिराजुद्दौला को महत्वपूर्ण सलाह दी थी कि वह अंग्रेजों पर कभी भी विश्वास न करे और जैसे ही मौका मिले उन्हें बंगाल से निकाल दे। उसने यह भी कहा था कि इस समय तो धरती पर लगी आग बुझाना भी कठिन है, यदि समुद्र से भी आग की लपटें निकलने लगीं तो उन्हें कौन शांत कर सकेगा। यह कथन अंग्रेजों की समुद्री शक्ति और उनके भविष्य के खतरे की ओर संकेत था।
अलीवर्दी खां और सिराजुद्दौला का संबंध क्या था?
अलीवर्दी खां और सिराजुद्दौला का संबंध नाना-नाती का था। सिराजुद्दौला अलीवर्दी खां की सबसे छोटी पुत्री का पुत्र था। अलीवर्दी खां की तीनों पुत्रियां थीं, परंतु उसके तीनों दामाद उसके सामने ही मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे। अपनी मृत्यु से पूर्व अलीवर्दी खां ने सिराजुद्दौला को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। अप्रैल 1756 में अलीवर्दी खां की मृत्यु के बाद सिराजुद्दौला लगभग 23 वर्ष की आयु में बंगाल का नवाब बना। अलीवर्दी खां ने सिराजुद्दौला को अंग्रेजों पर विश्वास न करने और उन्हें बंगाल से निकालने की महत्वपूर्ण सलाह दी थी, जो उसकी दूरदर्शिता को दर्शाती है।
सिराजुद्दौला (1756-57 ई०)
सिराजुद्दौला कौन था?
सिराजुद्दौला बंगाल का अंतिम स्वतंत्र नवाब था, जिसने 1756 से 1757 ई० तक शासन किया। वह अलीवर्दी खां की छोटी पुत्री का पुत्र और नाती था। 1756 में लगभग 23 वर्ष की आयु में नवाब बनने पर उसे अनेक विरोधियों का सामना करना पड़ा। उसने अंग्रेजों की बढ़ती शक्ति और किलेबंदी का विरोध किया। 23 जून 1757 को प्लासी के युद्ध में मीर जाफर के विश्वासघात के कारण उसकी पराजय हुई और 2 जुलाई 1757 को उसकी हत्या कर दी गई। उसके शासन की समाप्ति भारत में ब्रिटिश शासन की शुरुआत मानी जाती है।
सिराजुद्दौला का इतिहास हिंदी में
सिराजुद्दौला का जन्म 1733 ई० में हुआ था। उसके पिता जैनुद्दीन अहमद खां बिहार के शासक थे और उसकी माता अमीना बेगम नवाब अलीवर्दी खां की सबसे छोटी पुत्री थीं। अलीवर्दी खां ने अपने जीवनकाल में ही सिराजुद्दौला को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। हालांकि, उसके परिवार में कई लोग इस निर्णय से असंतुष्ट थे और उसके विरोधी बन गए।
नवाब बनना और चुनौतियां
अप्रैल 1756 में अलीवर्दी खां की मृत्यु के बाद सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना। उस समय उसकी आयु मात्र 23 वर्ष थी। नवाब बनते ही उसे अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उसकी मौसी घसीटी बेगम, पूर्णिया का नवाब शौकतजंग, सेनापति मीर जाफर, दीवान रायदुर्लभ और जगत सेठ जैसे प्रभावशाली लोग उसके विरोधी थे। इन सभी ने अंग्रेजों से मिलकर उसके खिलाफ षड्यंत्र रचे।
अंग्रेजों से संघर्ष
सिराजुद्दौला शुरू से ही अंग्रेजों की बढ़ती शक्ति और उनकी महत्वाकांक्षाओं को समझता था, जब अंग्रेजों ने उसकी अनुमति के बिना कलकत्ता में किलेबंदी शुरू की, तो उसने इसका कड़ा विरोध किया। 4 जून 1756 को उसने कासिम बाजार की अंग्रेज फैक्ट्री पर अधिकार कर लिया और 17 जून 1756 को कलकत्ता के किले को घेर लिया। अंग्रेज गवर्नर रोजर ड्रेक फुल्टा द्वीप में भाग गया। सिराजुद्दौला ने कलकत्ता का नाम बदलकर अलीनगर रखा।
प्लासी का युद्ध और पतन
अंग्रेजों ने कर्नल क्लाइव के नेतृत्व में कलकत्ता पर पुनः अधिकार कर लिया और 9 फरवरी 1757 को सिराजुद्दौला को अलीनगर की संधि करने के लिए बाध्य किया, परंतु अंग्रेज इससे संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने नवाब के विरोधियों से मिलकर षड्यंत्र रचा और मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाने का लालच दिया। 23 जून 1757 को प्लासी के मैदान में युद्ध हुआ जिसमें मीर जाफर, रायदुर्लभ और अन्य सेनापतियों के विश्वासघात के कारण सिराजुद्दौला की पराजय हुई। युद्ध के बाद वह मुर्शिदाबाद भाग गया परंतु पकड़ लिया गया और 2 जुलाई 1757 को मीर जाफर के पुत्र मीरन के आदेश पर मोहम्मद अली बेग ने उसकी हत्या कर दी।
ऐतिहासिक महत्व
सिराजुद्दौला की मृत्यु के साथ ही बंगाल में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन की नींव पड़ी। उसे भारत का अंतिम स्वतंत्र नवाब माना जाता है। यद्यपि अंग्रेज इतिहासकारों ने उसे क्रूर और दुश्चरित्र बताया, परंतु वास्तव में वह एक देशभक्त शासक था जो अंग्रेजों की मंशा को समझता था और बंगाल की स्वतंत्रता बचाने का प्रयास कर रहा था। उसकी कब्र पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद के खुशबाग में स्थित है।
सिराजुद्दौला के विरोधी कौन थे? पूरी जानकारी
घसीटी बेगम (मौसी)
घसीटी बेगम सिराजुद्दौला की मौसी और अलीवर्दी खां की बड़ी पुत्री थी। उसका विवाह ढाका के नवाब से हुआ था। वह स्वयं बंगाल की नवाब बनना चाहती थी और अत्यंत महत्वाकांक्षी थी। उसके पास अपार संपत्ति थी और उसके दो दीवान राजबल्लभ और कृष्णबल्लभ उसके सहयोगी थे। उसने सिराजुद्दौला के विरुद्ध षड्यंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और मीर जाफर को उकसाने में प्रमुख भूमिका निभाई।
शौकतजंग (पूर्णिया का नवाब)
शौकतजंग सिराजुद्दौला का चचेरा भाई और पूर्णिया का नवाब था। वह अलीवर्दी खां की दूसरी पुत्री का पुत्र था। उसने सिराजुद्दौला की नवाबी का विरोध किया और स्वयं बंगाल का नवाब बनने की इच्छा रखता था। 1756 ई० में मनिहारी के युद्ध में सिराजुद्दौला ने उसे पराजित किया और उसकी मृत्यु हो गई।
मीर जाफर (सेनापति)
मीर जाफर बंगाल की सेना का प्रधान सेनापति और मीर-बख्शी था। वह अत्यंत महत्वाकांक्षी और लालची व्यक्ति था। अंग्रेजों ने उसे बंगाल का नवाब बनाने का लालच देकर अपनी ओर मिला लिया। उसने अंग्रेजों के साथ गुप्त संधि कर ली और प्लासी के युद्ध में सिराजुद्दौला को धोखा दिया। उसकी सेना ने युद्ध में भाग नहीं लिया, जिसके कारण सिराजुद्दौला की पराजय हुई। युद्ध के बाद मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाया गया।
रायदुर्लभ (दीवान)
रायदुर्लभ नवाब का दीवान था। वह भी अंग्रेजों के षड्यंत्र में शामिल था और उसने प्लासी के युद्ध में सिराजुद्दौला के साथ विश्वासघात किया।
जगत सेठ महावतचंद
जगत सेठ महावतचंद बंगाल के नादिया का प्रसिद्ध बैंकर और धनी व्यापारी था। उसके पास अपार धन-संपत्ति थी और बंगाल की अर्थव्यवस्था में उसका महत्वपूर्ण स्थान था। वह भी अंग्रेजों के षड्यंत्र में शामिल था और उसने मीर जाफर को समर्थन दिया।
अमीनचंद (सिख व्यापारी)
अमीनचंद एक सिख व्यापारी था। अंग्रेजों ने उसे 30 लाख रुपये नकद और नवाब के खजाने का 5% हिस्सा देने का लालच दिया था। उसने कलकत्ता में अंग्रेजों और मुर्शिदाबाद में नवाब के विरोधियों के बीच गुप्त वार्ताएं चलाईं और षड्यंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के बीच संघर्ष क्यों हुआ?
सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के बीच संघर्ष का प्रमुख कारण अंग्रेजों द्वारा नवाब की अनुमति के बिना कलकत्ता में किलेबंदी करना था। अंग्रेजों ने फोर्ट विलियम के चारों ओर किलेबंदी और खाई बनाना शुरू कर दिया। सिराजुद्दौला को यह अंग्रेजों की बढ़ती सैन्य शक्ति और महत्वाकांक्षाओं का संकेत लगा। उसने तुरंत अंग्रेजों को किलेबंदी रोकने का आदेश दिया, परंतु अंग्रेजों ने इसे नहीं माना। जबकि फ्रांसीसियों ने नवाब का आदेश मानकर किलेबंदी रोक दी थी।
व्यापारिक विशेषाधिकारों का दुरुपयोग
अंग्रेजों को मुगल बादशाह फर्रुखसियर द्वारा 1717 में दिए गए फरमान के अनुसार दस्तक (कर-मुक्त व्यापार का परमिट) का अधिकार प्राप्त था। परंतु अंग्रेजों के कर्मचारी इस विशेषाधिकार का दुरुपयोग कर रहे थे। वे अपने निजी व्यापार में भी दस्तक का उपयोग करते थे, जिससे नवाब को राजस्व की भारी हानि हो रही थी। सिराजुद्दौला ने इस दुरुपयोग को रोकने का प्रयास किया, परंतु अंग्रेज नहीं माने।
विद्रोहियों को शरण देना
अंग्रेजों ने नवाब के विरोधियों और विद्रोहियों को शरण दी। विशेष रूप से, उन्होंने कृष्णदास नामक एक व्यक्ति को शरण दी जो नवाब के खिलाफ था। इससे सिराजुद्दौला अत्यंत क्रोधित हो गया। उसने अंग्रेजों से कृष्णदास को सौंपने की मांग की, परंतु अंग्रेजों ने इनकार कर दिया। यह घटना भी दोनों के बीच तनाव का कारण बनी।
नवाब को उपहार न देना
जब सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना, तो परंपरागत रूप से सभी व्यापारिक कंपनियों को नए नवाब को उपहार और बधाई भेजनी चाहिए थी। परंतु अंग्रेजों ने जानबूझकर सिराजुद्दौला को कोई उपहार नहीं भेजा। इसे सिराजुद्दौला ने अपने अपमान के रूप में लिया और यह भी दोनों के बीच तनाव का कारण बना।
कलकत्ता पर आक्रमण
इन सभी कारणों से क्रोधित होकर सिराजुद्दौला ने 1756 में कलकत्ता पर आक्रमण किया। 4 जून 1756 को उसने कासिम बाजार की अंग्रेज फैक्ट्री पर अधिकार कर लिया और 17 जून 1756 को फोर्ट विलियम को घेर लिया। अंग्रेज गवर्नर रोजर ड्रेक भाग गया और सिराजुद्दौला ने कलकत्ता पर अधिकार कर लिया। इस दौरान कालकोठरी की घटना हुई जिसे अंग्रेजों ने अपने प्रचार में बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया।
अंग्रेजों का प्रतिशोध
कलकत्ता पर पुनः अधिकार करने के लिए कर्नल क्लाइव के नेतृत्व में अंग्रेज सेना आई और उसने कलकत्ता पर फिर से कब्जा कर लिया। इसके बाद 9 फरवरी 1757 को अलीनगर की संधि हुई, परंतु अंग्रेज इससे भी संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने सिराजुद्दौला को हटाने और मीर जाफर को नवाब बनाने का षड्यंत्र रचा, जो अंततः प्लासी के युद्ध में परिणत हुआ।
प्लासी का युद्ध क्यों हुआ और किसके बीच हुआ?
प्लासी का युद्ध 23 जून 1757 को बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुआ। अंग्रेज सेना का नेतृत्व कर्नल रॉबर्ट क्लाइव कर रहे थे। युद्ध प्लासी (पलाशी) नामक स्थान पर हुआ जो मुर्शिदाबाद के दक्षिण में भागीरथी नदी के किनारे स्थित है।
युद्ध के कारण
प्लासी का युद्ध अनेक कारणों से हुआ। मुख्य कारण था कि अंग्रेज सिराजुद्दौला को नवाब के पद से हटाकर अपने हाथों की कठपुतली बनाना चाहते थे। अलीनगर की संधि के बावजूद अंग्रेज संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने मार्च 1757 में सिराजुद्दौला की सार्वभौम सत्ता की उपेक्षा करते हुए चंद्रनगर के फ्रांसीसी किले पर आक्रमण कर दिया। इससे सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के बीच तनाव और बढ़ गया।
षड्यंत्र और विश्वासघात
अंग्रेजों ने सिराजुद्दौला के विरोधियों – मीर जाफर, रायदुर्लभ, जगत सेठ और अमीनचंद से मिलकर गुप्त षड्यंत्र रचा। उन्होंने मीर जाफर से गुप्त संधि की और उसे बंगाल का नवाब बनाने का लालच दिया। 12 जून 1757 को मीर जाफर ने क्लाइव को पत्र भेजकर सूचना दी कि वह कार्यवाही शुरू कर सकता है। 22 जून 1757 को क्लाइव ने सिराजुद्दौला पर अनेक आरोप लगाते हुए युद्ध की घोषणा कर दी।
युद्ध और परिणाम
23 जून 1757 को प्लासी के मैदान में युद्ध हुआ। सिराजुद्दौला की सेना में लगभग 50,000 सैनिक, 40 तोपें और 10 युद्ध हाथी थे, जबकि क्लाइव के पास केवल 3,000 सैनिक थे। परंतु मीर जाफर, रायदुर्लभ और अन्य सेनापतियों के विश्वासघात के कारण नवाब की अधिकांश सेना ने युद्ध में भाग नहीं लिया। केवल मीर मदान और मोहन लाल जैसे वफादार सेनापतियों ने वीरता से लड़ाई की परंतु वे पराजित हुए। सिराजुद्दौला की हार हुई और वह मुर्शिदाबाद भाग गया। बाद में उसे पकड़ लिया गया और 2 जुलाई 1757 को उसकी हत्या कर दी गई। मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाया गया और इस प्रकार बंगाल में ब्रिटिश राजनीतिक प्रभुत्व की शुरुआत हुई।
अलीनगर की संधि क्या थी? 1757
जून 1756 में सिराजुद्दौला ने कलकत्ता पर अधिकार कर लिया था और उसका नाम बदलकर अलीनगर रखा था। अंग्रेज गवर्नर रोजर ड्रेक फुल्टा द्वीप में शरण लेने को मजबूर हुए थे। कलकत्ता पर पुनः अधिकार करने के लिए कर्नल क्लाइव और मेजर क्लिपैट्रिक के नेतृत्व में थल सेना तथा एडमिरल वॉटसन के नेतृत्व में जल सेना भेजी गई। अंग्रेजों ने माणिकचंद्र को घूस देकर और फुल्टा के शरणार्थियों को मुक्त करके कलकत्ता पर फिर से अधिकार कर लिया।

संधि की शर्तें
9 फरवरी 1757 को सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के बीच अलीनगर की संधि हुई। इस संधि के प्रमुख प्रावधान थे: सबसे पहले, दस्तक (कर-मुक्त व्यापार का परमिट) का प्रयोग जारी रखने की बात की गई। कंपनी को पहले की तरह बिना कर चुकाए व्यापार करने का अधिकार मिल गया। दूसरे, कंपनी को अपनी इच्छानुसार कलकत्ता की अपनी आबादी की किलेबंदी करने की अनुमति मिल गई। यह एक महत्वपूर्ण रियायत थी जिसका सिराजुद्दौला ने पहले विरोध किया था। तीसरे, कंपनी को अपने सिक्कों को ढालने की अनुमति मिल गई। चौथे, कंपनी को अपने व्यापारिक अधिकारों की पुनर्स्थापना मिल गई।
संधि का महत्व और परिणाम
यह संधि अंग्रेजों के लिए अत्यंत लाभदायक थी क्योंकि इससे उन्हें वे सभी अधिकार वापस मिल गए जो उनके पास पहले थे, बल्कि किलेबंदी का नया अधिकार भी मिल गया। परंतु अंग्रेज इससे भी संतुष्ट नहीं थे। वे सिराजुद्दौला को पूरी तरह से हटाकर अपनी कठपुतली सरकार स्थापित करना चाहते थे। इसलिए संधि के मात्र चार महीने बाद ही उन्होंने सिराजुद्दौला के विरोधियों से मिलकर षड्यंत्र रचना शुरू कर दिया जो अंततः प्लासी के युद्ध में परिणत हुआ। इस प्रकार अलीनगर की संधि एक अस्थायी समझौता था जो अंग्रेजों को प्लासी के युद्ध की तैयारी करने का समय देने के अलावा कुछ नहीं था।
कालकोठरी घटना क्या थी (Black Hole Incident)?
कालकोठरी घटना (Black Hole Tragedy) 20 जून 1756 की रात को हुई जब सिराजुद्दौला ने कलकत्ता पर अधिकार किया था। कहा जाता है कि सिराजुद्दौला के सैनिक अधिकारियों ने 146 अंग्रेज बंदियों को फोर्ट विलियम के एक अत्यंत छोटे कमरे में बंद कर दिया। इस कोठरी की लंबाई मात्र 18 फीट और चौड़ाई 14 फीट 10 इंच थी। 20 जून की भयानक गर्मी में इतने लोगों को इतनी छोटी जगह में बंद करने के कारण घुटन से 21 जून को केवल 23 लोग ही जीवित बचे। शेष सभी की मृत्यु हो गई।
विवाद और सच्चाई
इस घटना के बारे में जो जानकारी मिलती है वह जे. जेड. हॉलवेल नामक एक अंग्रेज बंदी के विवरण पर आधारित है जो जीवित बचे लोगों में से एक था। अनेक इतिहासकारों का मानना है कि हॉलवेल ने इस घटना को अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया। महत्वपूर्ण बात यह है कि सिराजुद्दौला इस घटना के बारे में पूर्णतः अनभिज्ञ था। यह उसके सैनिक अधिकारियों की गलती या लापरवाही थी, नवाब का जानबूझकर किया गया कृत्य नहीं। जैसे ही सिराजुद्दौला को इसकी जानकारी मिली, उसने जीवित बचे बंदियों को तुरंत मुक्त कर दिया।
अंग्रेजों का प्रचार
अंग्रेजों ने इस घटना का उपयोग अपने प्रचार में किया और सिराजुद्दौला को एक क्रूर और दुष्ट शासक के रूप में प्रस्तुत किया। इसने अंग्रेजों को सिराजुद्दौला के विरुद्ध युद्ध करने का नैतिक औचित्य प्रदान किया। वास्तव में यह एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी परंतु इसमें सिराजुद्दौला की कोई सीधी भूमिका नहीं थी।
दस्तक प्रणाली क्या थी?
दस्तक एक प्रकार का परमिट या पास था जो मुगल काल में व्यापारियों को कर-मुक्त व्यापार करने की अनुमति देता था। 1717 में मुगल बादशाह फर्रुखसियर ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को एक फरमान जारी किया जिसमें कंपनी को बंगाल में 3,000 रुपये वार्षिक के बदले कर-मुक्त व्यापार का अधिकार दिया गया। कंपनी को अपने माल के परिवहन के लिए दस्तक जारी करने की अनुमति दी गई। परंतु कंपनी के कर्मचारियों ने इस विशेषाधिकार का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया और अपने निजी व्यापार में भी दस्तक का उपयोग करने लगे, जिससे बंगाल के नवाबों को भारी राजस्व हानि हुई। यही दस्तक प्रणाली का दुरुपयोग सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के बीच संघर्ष का एक प्रमुख कारण बना।
प्लासी का युद्ध (23 जून, 1757 ई०)
प्लासी का युद्ध क्या था?
प्लासी का युद्ध भारतीय इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी। यह युद्ध 23 जून, 1757 ई० को बंगाल के नादिया जिले में भागीरथी नदी के किनारे प्लासी नामक स्थान पर हुआ था। इस युद्ध में एक ओर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना थी जिसका नेतृत्व रॉबर्ट क्लाइव कर रहा था, तो दूसरी ओर बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला की सेना थी। यह युद्ध षड्यंत्र और विश्वासघात का परिणाम था। इस युद्ध में अंग्रेज़ों की विजय हुई और इसी के साथ भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव पड़ी। के० एम० पणिक्कर के अनुसार यह युद्ध एक सौदा था, जिसमें बंगाल के कुछ स्वार्थी लोगों ने नवाब को अंग्रेज़ों के हाथों बेच दिया।
प्लासी का युद्ध कब हुआ?
प्लासी का युद्ध 23 जून, सन् 1757 ई० को बृहस्पतिवार के दिन हुआ था। यह युद्ध बंगाल के नादिया जिले में भागीरथी नदी के तट पर स्थित प्लासी नामक स्थान पर लड़ा गया। उस समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विलियम पिट्स थे, मुगल बादशाह आलमगीर द्वितीय था और बंगाल का नवाब सिराजुद्दौला था। यह वह ऐतिहासिक तिथि है जिसे भारत में ब्रिटिश शासन की नींव रखने वाले दिन के रूप में जाना जाता है। इस तिथि के बाद भारत के इतिहास की दिशा पूरी तरह बदल गई और अंग्रेज़ों का प्रभुत्व धीरे-धीरे पूरे देश में फैलता चला गया।
प्लासी का युद्ध किसके बीच हुआ?
प्लासी का युद्ध ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के बीच हुआ था। कंपनी की सेना का नेतृत्व रॉबर्ट क्लाइव ने किया, जबकि नवाब की सेना का नेतृत्व सेनापति मीर जाफर के हाथ में था। नवाब की ओर से केवल मीर मदान और मोहनलाल ने वीरतापूर्वक युद्ध किया। मीर जाफर, जगत सेठ और कई अन्य दरबारियों ने अंग्रेज़ों से पहले ही षड्यंत्र कर लिया था। नवाब की अपनी सेना ने भी युद्ध में पूरी तरह भाग नहीं लिया। यह युद्ध वास्तव में अंग्रेज़ों बनाम सिराजुद्दौला न होकर, भारतीय विश्वासघात बनाम एक अकेले नवाब का युद्ध बन गया।
प्लासी के युद्ध के कारण
- व्यापारिक अधिकारों का दुरुपयोग अंग्रेज़ों को मुगल बादशाह ने 1717 ई० में व्यापार करने की अनुमति दी थी परन्तु वे इस सुविधा का दुरुपयोग करने लगे। वे बिना शुल्क दिए व्यापार करते थे और अपने दस्तक (परमिट) का प्रयोग भारतीय व्यापारियों को भी देते थे, जिससे नवाब को भारी राजस्व हानि होती थी। इस दुरुपयोग से नवाब सिराजुद्दौला अत्यंत क्रोधित था।
- किलेबंदी का विस्तार अंग्रेज़ों ने कलकत्ता स्थित फोर्ट विलियम की किलेबंदी को बिना नवाब की अनुमति के बढ़ाना शुरू कर दिया। सिराजुद्दौला ने इसे अपनी सत्ता के लिए खतरा समझा और अंग्रेज़ों को किलेबंदी रोकने का आदेश दिया। अंग्रेज़ों ने इस आदेश की अवहेलना की, जिससे दोनों के बीच तनाव और बढ़ गया।
- नवाब के शत्रुओं को शरण देना अंग्रेज़ों ने नवाब के शत्रु कृष्णदास को अपने यहाँ शरण दी। कृष्णदास नवाब के विरोधी थे और नवाब उन्हें पकड़ना चाहता था। अंग्रेज़ों द्वारा उन्हें शरण देना नवाब की आँखों में खुली चुनौती थी, जिसने दोनों पक्षों के संबंधों को और अधिक कटु बना दिया।
- षड्यंत्र और विश्वासघात रॉबर्ट क्लाइव ने नवाब के सेनापति मीर जाफर को बंगाल की गद्दी का लालच देकर अपनी ओर मिला लिया। जगत सेठ जैसे धनी व्यापारी तथा कई दरबारी भी इस षड्यंत्र में शामिल थे। नवाब के अपने ही लोगों ने उसे धोखा दिया, जिससे युद्ध से पहले ही उसकी पराजय निश्चित हो गई।
- आंतरिक विरोध और राजनीतिक अस्थिरता सिराजुद्दौला को अपने ही दरबार में घोर विरोध का सामना करना पड़ता था। उसकी बुआ घसीटी बेगम और अन्य विरोधी उसे अस्थिर करने की कोशिश कर रहे थे। इस आंतरिक कलह का लाभ उठाकर अंग्रेज़ों ने अपनी स्थिति मजबूत की और युद्ध की परिस्थितियाँ तैयार कीं।
प्लासी के युद्ध के परिणाम
- बंगाल में ब्रिटिश सत्ता की स्थापना प्लासी के युद्ध के बाद अंग्रेज़ों ने मीर जाफर को बंगाल का कठपुतली नवाब बना दिया। वास्तविक सत्ता ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में आ गई। इस युद्ध ने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव रखी। धीरे-धीरे पूरे देश में अंग्रेज़ों का प्रभुत्व फैलता चला गया।
- बंगाल का आर्थिक शोषण युद्ध जीतने के बाद अंग्रेज़ों ने बंगाल की अपार संपत्ति को लूटा। कंपनी के अधिकारियों ने जमकर रिश्वत बटोरी और बंगाल का व्यापार पूरी तरह तबाह हो गया। नवीनचन्द्र सेन के अनुसार, “प्लासी युद्ध के पश्चात् भारत की दासता का वह युग प्रारम्भ हुआ जिसमें भारत का बेइन्तहा शोषण हुआ।”
- मीर जाफर का नवाब बनना और सिराजुद्दौला की हत्या युद्ध के तुरंत बाद मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाया गया। मीर जाफर के पुत्र मीरन ने सिराजुद्दौला की निर्ममता से हत्या कर दी। इस प्रकार बंगाल का अंतिम स्वतंत्र नवाब समाप्त हो गया और भारत में दासता का युग शुरू हुआ।
- फ्रांसीसी शक्ति का अंत प्लासी की विजय से प्राप्त संसाधनों का उपयोग कर अंग्रेज़ों ने कर्नाटक के तीसरे युद्ध में फ्रांसीसी कंपनी को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। इससे भारत में फ्रांसीसी शक्ति हमेशा के लिए समाप्त हो गई और अंग्रेज़ों की श्रेष्ठता निर्विवाद रूप से स्थापित हो गई।
- भारत के इतिहास पर दीर्घकालीन प्रभाव ताराचन्द्र के अनुसार, “प्लासी युद्ध से परिणामों की लम्बी श्रृंखला शुरू हुई जिसने भारत का रूप ही पूर्णतया बदल दिया।” यदुनाथ सरकार के अनुसार इस हार से भारत में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। इस युद्ध ने भारत की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक संरचना को जड़ से बदल दिया।
प्लासी का युद्ध 1757 हिंदी में
प्लासी का युद्ध 23 जून 1757 को पश्चिम बंगाल के नादिया जिले में भागीरथी नदी के किनारे लड़ा गया। इस युद्ध में रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को पराजित किया। यह युद्ध वास्तव में एक षड्यंत्र था क्योंकि नवाब के अपने सेनापति मीर जाफर ने विश्वासघात किया। मीर मदान की वीरगति के बाद नवाब असहाय हो गया और उसे युद्ध के मैदान से भागना पड़ा। बाद में मीरन ने उसकी हत्या कर दी। इस युद्ध के परिणामस्वरूप भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव पड़ी और भारत गुलामी के युग में प्रवेश कर गया।
मीर जाफर (1757-60 ई०)
मीर जाफर कौन था?
मीर जाफर का पूरा नाम सैयद मीर मोहम्मद जाफर अली खान था। वह बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला का सेनापति (कमांडर-इन-चीफ) था और उसका रिश्तेदार भी था। भारतीय इतिहास में उसे गद्दारी के सबसे बड़े प्रतीक के रूप में जाना जाता है। 1757 ई० में प्लासी के युद्ध में उसने अपने नवाब को धोखा देकर अंग्रेज़ों का साथ दिया, जिसके परिणामस्वरूप सिराजुद्दौला की पराजय हुई। इस गद्दारी के बदले में अंग्रेज़ों ने उसे बंगाल का नवाब बनाया। वह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का पहला कठपुतली नवाब था, जिसने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव रखने में सहायता की।
मीर जाफर का इतिहास
- मीर जाफर अरब मूल का था और उसे नवाब अलीवर्दी खान का विश्वास प्राप्त था। वह बंगाल की सेना में बख्शी (सैन्य अधिकारी) के पद पर आसीन हुआ। उसने एक साहसी सैनिक के रूप में ख्याति अर्जित की और नवाब के कई सैन्य अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कटक के युद्ध में उसने नवाब के भतीजे को बचाया और मराठों को पराजित करने में भी योगदान दिया।
- दिनीपुर के युद्ध में मराठों की शक्ति देखकर मीर जाफर मैदान से भाग गया, जिससे उसकी कायरता प्रकट हुई। बाद में उसने अताउल्लाह के साथ मिलकर नवाब के विरुद्ध षड्यंत्र रचा, परन्तु पकड़ा गया और पद से बर्खास्त कर दिया गया। इसके बावजूद उसने अपनी महत्वाकांक्षा नहीं छोड़ी।
- 1756 ई० में अलीवर्दी खान की मृत्यु के बाद सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना और मीर जाफर उसका सेनापति नियुक्त हुआ। मीर जाफर हमेशा से स्वयं नवाब बनना चाहता था। रॉबर्ट क्लाइव ने इसी महत्वाकांक्षा का लाभ उठाते हुए उससे गुप्त समझौता किया कि यदि वह अंग्रेज़ों की मदद करे तो उसे नवाब बनाया जाएगा।
- प्लासी विजय के बाद अंग्रेज़ों ने मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाया। उसने रॉबर्ट क्लाइव को 2 लाख 34 हज़ार पौण्ड व्यक्तिगत ईनाम दिया तथा अंग्रेज़ सैनिकों और अधिकारियों को 50 लाख रुपये प्रदान किए। अंग्रेज़ उसका बेहिसाब आर्थिक दोहन करते रहे। आलस, अक्षमता और अफीम की लत के कारण क्लाइव ने उसे “द ओल्ड फूल” कहना शुरू कर दिया।
- 1760 ई० में अंग्रेज़ों ने उसे गद्दी से हटाकर उसके दामाद मीर कासिम को नवाब बनाया। परन्तु बाद में 1764 ई० में अंग्रेज़ों ने उसे पुनः नवाब बनाया और 5 फरवरी 1765 ई० को उसकी मृत्यु हो गई। आज भी उसके वंशज उसकी गद्दारी के कलंक को ढोने पर विवश हैं।
मीर जाफर और प्लासी का युद्ध
- प्लासी के युद्ध (23 जून 1757) में मीर जाफर सिराजुद्दौला की सेना का प्रधान सेनापति था। रॉबर्ट क्लाइव ने युद्ध से पूर्व ही मीर जाफर से गुप्त समझौता कर लिया था कि यदि वह युद्ध में अपनी सेना को निष्क्रिय रखे तो उसे बंगाल का नवाब बनाया जाएगा। मीर जाफर ने यह सौदा स्वीकार कर लिया और अपने नवाब के साथ विश्वासघात किया।
- युद्ध के दिन मीर जाफर जानबूझकर अपनी विशाल सेना को युद्ध में नहीं उतरने दिया। नवाब की सेना के पास अंग्रेज़ों से कई गुना अधिक सैनिक थे, परन्तु षड्यंत्र के कारण यह शक्ति बेकार रही। मीर मदान और मोहनलाल ने वीरतापूर्वक अंग्रेज़ों का सामना किया, किन्तु वे अकेले कुछ न कर सके। मीर मदान की मृत्यु के बाद नवाब पूरी तरह असहाय हो गया।
- अंग्रेज़ों की जीत के बाद सिराजुद्दौला मैदान छोड़कर भाग गया और मीर जाफर के पुत्र मीरन ने उसकी हत्या कर दी। इस प्रकार जिस नवाब की रोटी खाई, उसी के घर को मीर जाफर ने बर्बाद कर दिया। बदले में उसे बंगाल की गद्दी मिली, परन्तु वह एक कठपुतली नवाब से अधिक कुछ नहीं था। के० एम० पणिक्कर के शब्दों में यह युद्ध एक सौदा था, जिसमें स्वार्थी लोगों ने नवाब को बेच दिया।
मीर जाफर ने सिराजुद्दौला को क्यों धोखा दिया?
- मीर जाफर के मन में बचपन से ही बंगाल का नवाब बनने की प्रबल इच्छा थी। जब 1756 ई० में 23 वर्षीय सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना, तो मीर जाफर को यह सहन नहीं हुआ। वह स्वयं को अधिक योग्य समझता था। नवाब बनने की यह असंतुष्ट महत्वाकांक्षा ही उसकी गद्दारी की जड़ थी।
- जब सिराजुद्दौला नवाब बना तो उसने मीर जाफर की जगह राजा मानिकचंद को अधिक महत्व दिया। इससे मीर जाफर का अपमान हुआ और उसके मन में नवाब के प्रति द्वेष और बढ़ गया। इसके अतिरिक्त मीर जाफर पहले भी नवाब के विरुद्ध षड्यंत्र रच चुका था और पदच्युत हो चुका था, इसलिए दोनों के बीच पहले से ही वैमनस्य था।
- रॉबर्ट क्लाइव ने अपने जासूसों से पता लगाया कि मीर जाफर धन और पद के लालच में नवाब से गद्दारी कर सकता है। क्लाइव ने उसे पत्र लिखा और नवाब बनाने का वादा किया। मीर जाफर के लिए यह प्रस्ताव किसी सपने के सच होने जैसा था और उसने तत्काल इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
- बंगाल के शक्तिशाली व्यापारी जगत सेठ और कई अन्य दरबारी भी सिराजुद्दौला से असंतुष्ट थे। इन सबने मिलकर मीर जाफर को अंग्रेज़ों से मिलने के लिए प्रोत्साहित किया। इस सामूहिक षड्यंत्र ने मीर जाफर को और अधिक साहस दिया।
- मीर जाफर को एक ओर अंग्रेज़ों की बढ़ती सैन्य शक्ति का भय था, तो दूसरी ओर नवाब की गद्दी का प्रलोभन था। उसे लगा कि अंग्रेज़ों के विरुद्ध जाने से कोई लाभ नहीं होगा। अतः उसने अपने स्वार्थ को राष्ट्र और स्वामिभक्ति से ऊपर रखा और भारत के इतिहास का सबसे बड़ा गद्दार बन गया।
मीर जाफर बंगाल का नवाब कैसे बना?
- प्लासी के युद्ध से पूर्व रॉबर्ट क्लाइव ने मीर जाफर से गुप्त संधि की। इस संधि में तय हुआ कि यदि मीर जाफर अंग्रेज़ों की मदद करे और युद्ध में अपनी सेना को निष्क्रिय रखे तो अंग्रेज़ उसे बंगाल का नवाब बनाएंगे। इस षड्यंत्र में जगत सेठ और अन्य दरबारी भी शामिल थे।
- 23 जून 1757 को प्लासी के मैदान में मीर जाफर ने अपनी विशाल सेना को युद्ध में भाग नहीं लेने दिया। इस कारण सिराजुद्दौला की पराजय हुई और वह मैदान छोड़कर भाग गया। बाद में मीर जाफर के पुत्र मीरन ने सिराजुद्दौला की हत्या कर दी।
- प्लासी विजय के तुरंत बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने मीर जाफर को बंगाल, बिहार और उड़ीसा का नवाब घोषित कर दिया। इस प्रकार ‘बंगाल की प्रथम क्रान्ति’ सम्पन्न हुई और अंग्रेज़ कंपनी ‘राजा बनाने वाले’ (King Maker) की भूमिका में आ गई। मीर जाफर भले ही नवाब बना, परन्तु वास्तविक सत्ता सदैव ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में ही रही और वह एक कठपुतली नवाब से अधिक कुछ नहीं था।
मीर कासिम (1760-63 ई०)
मीर कासिम कौन था?
मीर कासिम बंगाल के नवाब मीर जाफर का दामाद था। 1760 ई० में अंग्रेज़ों ने मीर जाफर को हटाकर उसे बंगाल का नवाब बनाया। वह अलीवर्दी खाँ के बाद के नवाबों में सबसे योग्य और स्वाभिमानी नवाब था। वह अंग्रेज़ों की कठपुतली बनकर नहीं रहना चाहता था। उसने बंगाल को सुदृढ़ बनाने के अनेक प्रयास किए। अंग्रेज़ों से संघर्ष के बाद वह अवध के नवाब और मुगल सम्राट से मिलकर अंग्रेज़ों को भारत से खदेड़ना चाहता था, परन्तु बक्सर के युद्ध (1764) में पराजित हो गया।
मीर कासिम का इतिहास
- 1760 ई० में अंग्रेज़ों ने मीर जाफर को उसकी अक्षमता और आर्थिक दुर्दशा के कारण बंगाल की गद्दी से हटा दिया। इसके बाद मीर जाफर ने स्वयं अपने दामाद मीर कासिम के पक्ष में गद्दी त्याग दी। मीर कासिम को बंगाल का नवाब बनाया गया और इसे ‘बंगाल की दूसरी क्रान्ति’ कहा जाता है।
- नवाबी प्राप्त करते ही मीर कासिम ने अंग्रेज़ों को भारी-भरकम उपहार दिए। उसने बेन्सिटार्ट को 5 लाख, हालवेल को 2 लाख 70 हज़ार और कर्नल केलाड को 4 लाख रुपये उपहार स्वरूप प्रदान किए। इसके अतिरिक्त उसने कंपनी को बर्दवान, मिदनापुर और चटगाँव के तीन जिले भी सौंप दिए।
- मीर कासिम एक कुशल प्रशासक था। समकालीन मुस्लिम इतिहासकार गुलाम हुसैन ने अपनी पुस्तक ‘सियार-उल-मुत्खैरिन’ में उसके प्रशासन की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। उसने बंगाल की आर्थिक दशा सुधारने के अनेक सार्थक प्रयास किए। उसने भ्रष्ट अधिकारियों पर कठोर नियंत्रण रखा और राजस्व प्रशासन को व्यवस्थित किया।
- मीर कासिम ने बंगाल की सैन्य व्यवस्था का पुनर्गठन किया। उसने सेना को यूरोपीय तर्ज़ पर संगठित करने के लिए आर्मेनियन ‘गुर्गिन खाँ’ की सहायता ली। मुंगेर में उसने तोप बनाने की फैक्ट्री भी स्थापित की ताकि वह अंग्रेज़ों पर निर्भर न रहे।
- अंग्रेज़ों के हस्तक्षेप और मुर्शिदाबाद के षड्यंत्रों से बचने के लिए मीर कासिम ने अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर स्थानांतरित कर ली। वहाँ उसने स्वतंत्र सेना तैयार की और कर संग्रह को व्यवस्थित किया ताकि वह पूर्णतः स्वतंत्र रूप से शासन कर सके।
- 1763 ई० में अंग्रेज़ों से संघर्ष के बाद मीर कासिम को गद्दी से हटा दिया गया। इसके बाद वह अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय के साथ मिलकर बक्सर के युद्ध (1764) में अंग्रेज़ों से लड़ा, परन्तु पराजित हो गया। इसके पश्चात् वह भटकता रहा और 8 मई 1777 ई० को दिल्ली में उसकी मृत्यु हुई।
मीर कासिम और अंग्रेज़ों का संघर्ष
- मीर कासिम के समय अंग्रेज़ अधिकारी दस्तक (शुल्क-मुक्त व्यापार परमिट) का भारी दुरुपयोग करते थे। वे इस परमिट को भारतीय व्यापारियों को भी बेचते थे, जिससे नवाब को भारी राजस्व हानि होती थी। मीर कासिम ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई परन्तु अंग्रेज़ों ने कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी।
- 22 मार्च, 1763 ई० को मीर कासिम ने एक साहसिक निर्णय लेते हुए सभी भारतीय और विदेशी व्यापारियों के लिए आंतरिक शुल्क समाप्त कर दिया। इससे भारतीय व्यापारियों को भी वही सुविधा मिलने लगी जो अंग्रेज़ों को मिलती थी। इस निर्णय से अंग्रेज़ अत्यंत क्रोधित हो गए क्योंकि उनका एकाधिकार समाप्त हो गया।
- अंग्रेज़ अधिकारी एलिस ने पटना पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में ले लिया। इस पर मीर कासिम ने पटना पर पलटवार किया और अनेक अंग्रेज़ों को बंदी बना लिया। इससे दोनों पक्षों के बीच खुला युद्ध अनिवार्य हो गया। 19 जुलाई 1763 ई० को करवा के युद्ध में मीर कासिम पराजित हुआ।
- अंग्रेज़ों की विजय और मीर कासिम का पलायन करवा के युद्ध के बाद अंग्रेज़ों ने मीर कासिम को तीन और बार पराजित किया। पराजित होकर मीर कासिम ने मुंगेर छोड़ दिया और पटना में शरण ली। अंग्रेज़ों ने 1763 ई० में ही मीर जाफर को पुनः बंगाल का नवाब घोषित कर दिया। इस प्रकार मीर कासिम बंगाल की गद्दी हमेशा के लिए खो बैठा।
मीर कासिम बंगाल का नवाब कैसे बना?
- प्लासी युद्ध के बाद मीर जाफर नवाब बना था, परन्तु उसकी आलस्य, अक्षमता और अफीम की लत के कारण बंगाल की स्थिति बद से बदतर होती गई। अंग्रेज़ों की बढ़ती माँगों को पूरा करने में वह असमर्थ था। सेना का 13 महीने का वेतन बकाया हो गया और बंगाल का खज़ाना खाली हो गया।
- अंग्रेज़ों ने 1760 ई० में मीर जाफर पर दबाव डाला कि वह अपने दामाद मीर कासिम के पक्ष में गद्दी छोड़ दे। मीर जाफर के लिए 1500 रुपये वार्षिक पेंशन तय की गई। मीर जाफर ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर अपने दामाद के पक्ष में सिंहासन त्याग दिया।
- 1760 ई० में मीर कासिम को ईस्ट इंडिया कंपनी की कृपा से बंगाल का नवाब बनाया गया। इसे इतिहास में ‘बंगाल की दूसरी क्रान्ति’ कहा जाता है। नवाब बनते ही उसने अंग्रेज़ अधिकारियों को भारी-भरकम उपहार और कंपनी को तीन जिले देकर अपनी स्थिति सुदृढ़ करने का प्रयास किया।
मीर कासिम और बक्सर का युद्ध
- त्रिगुट का निर्माण 1763 ई० में अंग्रेज़ों द्वारा गद्दी से हटाए जाने के बाद मीर कासिम अवध के नवाब शुजाउद्दौला की शरण में पहुँचा। उसने शुजाउद्दौला और मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय के साथ मिलकर एक शक्तिशाली त्रिगुट (तीन-देशीय गठबंधन) बनाया और अंग्रेज़ों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की।
- बक्सर का युद्ध (22 अक्टूबर 1764) यह युद्ध बनारस के पूर्व बिहार में स्थित बक्सर के मैदान में लड़ा गया। एक ओर मीर कासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय की संयुक्त सेना थी, तो दूसरी ओर अंग्रेज़ कंपनी की सेना थी जिसका नेतृत्व हेक्टर मुनरो ने किया।
- इस युद्ध में अंग्रेज़ों की विजय हुई और तीनों पक्ष पराजित हो गए। बक्सर की पराजय के बाद मीर कासिम भटकता रहा और अंततः दिल्ली में गुमनामी की मृत्यु को प्राप्त हुआ। इस युद्ध का परिणाम बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी और राजस्व शक्ति अंग्रेज़ों के हाथ में चली गई। इतिहासकारों के अनुसार यदि प्लासी के युद्ध ने बंगाल में ब्रिटिश प्रभुता स्थापित की, तो बक्सर के युद्ध ने कंपनी को एक अखिल भारतीय शक्ति का रूप दे दिया।
बक्सर का युद्ध (22 अक्टूबर 1764 ई०)
बक्सर का युद्ध क्या था?
बक्सर का युद्ध 22 अक्टूबर 1764 ई० को बिहार के बक्सर नामक स्थान पर लड़ा गया। यह युद्ध ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और तीन भारतीय शक्तियों — बंगाल के अपदस्थ नवाब मीर कासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय — की संयुक्त सेना के बीच हुआ। अंग्रेज़ी सेना का नेतृत्व हेक्टर मुनरो ने किया। इस युद्ध में अंग्रेज़ों की निर्णायक विजय हुई। यह युद्ध प्लासी के युद्ध से अधिक महत्वपूर्ण था क्योंकि इसने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को स्थायी और अखिल भारतीय रूप दे दिया।

बक्सर का युद्ध कब हुआ?
बक्सर का युद्ध 22 अक्टूबर 1764 ई० को हुआ था। यह युद्ध बिहार के आरा जिले में स्थित बक्सर के मैदान में गंगा नदी के तट पर लड़ा गया। उस समय बंगाल का गवर्नर वेन्सिटार्ट था, बंगाल का नवाब मीर जाफर था और मुगल बादशाह शाहआलम द्वितीय था। युद्ध में अंग्रेज़ी सेना का नेतृत्व हेक्टर मुनरो ने किया। इस युद्ध के पश्चात् 1765 ई० में इलाहाबाद की संधि हुई जिसने भारत के इतिहास की दिशा सदा के लिए बदल दी और अंग्रेज़ों को बंगाल, बिहार व उड़ीसा का दीवानी अधिकार मिल गया।
बक्सर का युद्ध किसके बीच हुआ?
बक्सर का युद्ध एक ओर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना और दूसरी ओर तीन शक्तियों के त्रिगुट के बीच हुआ। इस त्रिगुट में बंगाल के अपदस्थ नवाब मीर कासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय शामिल थे। अंग्रेज़ी सेना का नेतृत्व मेजर हेक्टर मुनरो ने किया। त्रिगुट की संयुक्त सेना में 40,000 से 60,000 सैनिक थे, जबकि अंग्रेज़ों के पास केवल 7,072 सैनिक थे। फिर भी अंग्रेज़ों ने इस युद्ध में पूर्ण विजय प्राप्त की और त्रिगुट को बुरी तरह पराजित किया।
बक्सर के युद्ध के कारण
- बक्सर युद्ध का मूल कारण मीर कासिम और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच बढ़ता तनाव था। मीर कासिम एक स्वाभिमानी नवाब था और वह अंग्रेज़ों की कठपुतली बनकर नहीं रहना चाहता था। जब उसने अपने राज्य को सुदृढ़ करने के प्रयास किए तो अंग्रेज़ उससे ईर्ष्या करने लगे और उसे कमज़ोर करने की कोशिश करने लगे।
- अंग्रेज़ अधिकारी दस्तक (शुल्क-मुक्त व्यापार परमिट) का अत्यधिक दुरुपयोग करते थे। वे इस परमिट को भारतीय व्यापारियों को भी बेचते थे जिससे नवाब को भारी राजस्व हानि होती थी। मीर कासिम ने 22 मार्च 1763 ई० को सभी व्यापारियों के लिए शुल्क मुक्त व्यापार की घोषणा कर दी जिससे अंग्रेज़ अत्यधिक क्रोधित हो गए।
- अंग्रेज़ अधिकारी एलिस ने पटना पर आक्रमण कर दिया। इस पर मीर कासिम ने पलटवार करते हुए अनेक अंग्रेज़ों को बंदी बना लिया। इससे दोनों के बीच खुला युद्ध शुरू हो गया। करवा के युद्ध (19 जुलाई 1763) सहित कई युद्धों में पराजित होने के बाद मीर कासिम बंगाल छोड़कर अवध भाग गया।
- अवध पहुँचकर मीर कासिम ने नवाब शुजाउद्दौला को अपनी ओर मिलाया। मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय भी इस गठबंधन में शामिल हो गया क्योंकि अंग्रेज़ों से उसे भी खतरा था। इन तीनों ने मिलकर अंग्रेज़ों को भारत से खदेड़ने का संकल्प लिया और बक्सर के मैदान में उन्हें ललकारा।
- अंग्रेज़ों की बढ़ती साम्राज्यवादी नीति भी इस युद्ध का एक प्रमुख कारण थी। वे केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहना चाहते थे बल्कि पूरे भारत पर राजनीतिक और आर्थिक नियंत्रण स्थापित करना चाहते थे। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वे किसी भी स्वतंत्र भारतीय शासक को सहन करने के लिए तैयार नहीं थे।
बक्सर के युद्ध के परिणाम
- 22 अक्टूबर 1764 को बक्सर के मैदान में हेक्टर मुनरो के नेतृत्व में अंग्रेज़ी सेना ने त्रिगुट को बुरी तरह पराजित किया। मीर कासिम युद्ध क्षेत्र से भाग गया और जीवन भर भटकता रहा। मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय ने अंग्रेज़ों से संधि कर उनकी शरण ली। यह भारत में अंग्रेज़ी सत्ता की सबसे निर्णायक विजय थी।
- बक्सर युद्ध के समय ही 1763 ई० में मीर जाफर को एक बार फिर बंगाल का नवाब बनाया जा चुका था। वह पूरी तरह अंग्रेज़ों की कठपुतली था। फरवरी 1765 में उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद नजमुद्दौला को बंगाल का नाममात्र का नवाब बनाया गया जो पूरी तरह अंग्रेज़ों के निर्देशों पर निर्भर था।
- बक्सर की विजय के बाद अंग्रेज़ों ने रॉबर्ट क्लाइव को मई 1765 ई० में दूसरी बार बंगाल का गवर्नर बनाकर भेजा। उसका उद्देश्य बक्सर के बाद होने वाली संधियों में अंग्रेज़ों के लिए अधिकतम लाभ सुनिश्चित करना था।
- बक्सर की विजय के परिणामस्वरूप 1765 ई० में इलाहाबाद की दो संधियाँ हुईं। इन संधियों के द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा का दीवानी अधिकार प्राप्त हो गया। इससे कंपनी को राजस्व का विशाल स्रोत मिल गया।
- बक्सर युद्ध के परिणामस्वरूप बंगाल, बिहार और उड़ीसा में 1765 से 1772 ई० तक द्वैध शासन चला। इसमें कंपनी दीवान थी और नवाब नाज़िम। कंपनी राजस्व वसूल करती थी और नवाब प्रशासन देखता था। यह व्यवस्था बंगाल के लिए अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण सिद्ध हुई।
इलाहाबाद की संधि 1765 क्या थी?
- पृष्ठभूमि बक्सर युद्ध (1764) में विजय के बाद रॉबर्ट क्लाइव को दूसरी बार बंगाल का गवर्नर बनाकर भेजा गया। उसने 1765 ई० में इलाहाबाद में दो अलग-अलग संधियाँ कीं — एक मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय के साथ (इलाहाबाद की प्रथम संधि) और दूसरी अवध के नवाब शुजाउद्दौला के साथ (इलाहाबाद की द्वितीय संधि)।
- इलाहाबाद की प्रथम संधि (12 अगस्त 1765 ई०) इस संधि में मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय ने ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा का दीवानी अधिकार प्रदान किया। इसके बदले में कंपनी ने सम्राट को 26 लाख रुपये वार्षिक देने का वादा किया, जबकि बंगाल के नवाब को निज़ामत कार्य के लिए 53 लाख रुपये दिए जाने थे। इलाहाबाद और कड़ा के जिले अवध के नवाब से लेकर मुगल सम्राट को दे दिए गए। शाहआलम द्वितीय को अंग्रेज़ों ने अपने संरक्षण में ले लिया और इलाहाबाद में रखा।
- इलाहाबाद की द्वितीय संधि (16 अगस्त 1765 ई०) यह संधि रॉबर्ट क्लाइव और अवध के नवाब शुजाउद्दौला के बीच हुई। इसमें शुजाउद्दौला ने अंग्रेज़ों को युद्ध क्षतिपूर्ति के रूप में 50 लाख रुपये देना स्वीकार किया। इलाहाबाद और कड़ा के जिले नवाब से ले लिए गए। अवध में अंग्रेज़ी सेना नवाब के खर्च पर रखी गई। कंपनी को अवध में शुल्क-मुक्त व्यापार का अधिकार प्राप्त हो गया।
प्लासी और बक्सर के युद्ध में अंतर
- युद्ध प्लासी का युद्ध (1757) वास्तव में एक सुनियोजित षड्यंत्र था। मीर जाफर ने पहले से ही अंग्रेज़ों से मिलीभगत कर ली थी और नवाब की विशाल सेना ने युद्ध में भाग ही नहीं लिया। इसके विपरीत, बक्सर का युद्ध (1764) एक विधिवत और भीषण युद्ध था जिसमें दोनों पक्षों ने अपनी पूरी सैन्य शक्ति लगाई।
- प्लासी में केवल बंगाल का नवाब सिराजुद्दौला अंग्रेज़ों के विरुद्ध था, और वह भी विश्वासघात के कारण अकेला पड़ गया था। बक्सर में तीन शक्तियों — मीर कासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय — की 40,000 से 60,000 सैनिकों वाली संयुक्त सेना थी।
- प्लासी के युद्ध ने केवल बंगाल में अंग्रेज़ी प्रभुता की नींव रखी और यह मुख्यतः एक षड्यंत्र था। बक्सर के युद्ध ने अंग्रेज़ों को एक अखिल भारतीय शक्ति का दर्जा दिला दिया और इसने प्लासी के अधूरे कार्य को पूरा किया। इतिहासकारों के अनुसार, प्लासी के युद्ध ने अंग्रेज़ों को राजनीतिक शक्ति की शुरुआत दी जबकि बक्सर ने उसे स्थायित्व प्रदान किया।
- प्लासी के बाद अंग्रेज़ों को केवल बंगाल पर नियंत्रण और धन मिला। बक्सर के बाद इलाहाबाद की संधि द्वारा उन्हें बंगाल, बिहार और उड़ीसा का दीवानी अधिकार मिला जो एक कानूनी और संवैधानिक अधिकार था।
- प्लासी में अंग्रेज़ों के पास लगभग 3,000 सैनिक थे और सिराजुद्दौला के पास 20,000 से अधिक, फिर भी कोई वास्तविक युद्ध नहीं हुआ। बक्सर में अंग्रेज़ों के केवल 7,072 सैनिकों ने 40,000 से 60,000 की संयुक्त सेना को वास्तविक युद्ध में परास्त किया, जो अंग्रेज़ी सैन्य श्रेष्ठता का प्रमाण था।
इलाहाबाद की संधि के परिणाम
- इलाहाबाद की संधि का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह रहा कि ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा का दीवानी अधिकार प्राप्त हो गया। इससे कंपनी को इन तीन समृद्ध प्रांतों से राजस्व वसूलने का वैधानिक अधिकार मिल गया जिसने उन्हें आर्थिक दृष्टि से अत्यंत शक्तिशाली बना दिया।
- इस संधि के पश्चात् बंगाल में द्वैध शासन की स्थापना हुई जो 1765 से 1772 ई० तक चली। इसमें कंपनी दीवान थी और नवाब नाज़िम। ‘द्वैध शासन’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग लियो कार्टियस ने किया था। 1772 ई० में वारेन हेस्टिंग्स ने इस व्यवस्था को समाप्त किया।
- इस संधि से मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय पूरी तरह अंग्रेज़ों के संरक्षण में आ गया। 1772 ई० में मराठा पेशवा माधवराव प्रथम ने उसे दिल्ली की गद्दी पर पुनः बैठाया और उसे अपना पेंशनर बना लिया। इस प्रकार मुगल साम्राज्य की शक्ति पूरी तरह समाप्त हो गई।
- द्वितीय संधि द्वारा अवध कंपनी के प्रभाव में आ गया। अवध में अंग्रेज़ी सेना नवाब के खर्च पर तैनात हो गई और कंपनी को वहाँ शुल्क-मुक्त व्यापार का अधिकार मिल गया। अवध धीरे-धीरे अंग्रेज़ी साम्राज्य का एक संरक्षित राज्य बन गया।
- दीवानी अधिकार मिलने के बाद अंग्रेज़ों को अब ब्रिटेन से धन या बहुमूल्य धातु लाने की आवश्यकता नहीं रही। वे भारत के राजस्व से ही यहाँ का कच्चा माल खरीदते थे, उसे ब्रिटेन भेजते थे और वहाँ निर्मित माल भारतीय बाज़ार में बेचते थे। इससे भारत का हस्तशिल्प उद्योग नष्ट होने लगा और भारतीय संसाधनों का प्रवाह ब्रिटेन की ओर तेज हो गया।
दीवानी अधिकार क्या है?
दीवानी अधिकार से तात्पर्य किसी क्षेत्र में भू-राजस्व वसूल करने तथा दीवानी (सिविल) मामलों का निपटारा करने के अधिकार से है। 12 अगस्त 1765 ई० को इलाहाबाद की प्रथम संधि के तहत मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय ने ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा का दीवानी अधिकार प्रदान किया। इसके अंतर्गत भू-राजस्व वसूली के अतिरिक्त दीवानी सम्बंधी सभी मामले भी आते थे। शेष सारे कार्य जैसे कानून व्यवस्था और सुरक्षा निज़ामत कार्य कहलाते थे जो नवाब के पास रहे। इस प्रकार कंपनी दीवान और नवाब नाज़िम बन गया।
निष्कर्ष
ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा बंगाल पर कब्जा केवल एक सैन्य जीत नहीं थी, बल्कि यह राजनीतिक चालों, कूटनीति और भारतीय शासकों की कमजोरियों का परिणाम था। प्लासी (1757) और बक्सर (1764) जैसे युद्धों ने अंग्रेजों को निर्णायक बढ़त दी, लेकिन असली जीत उनके द्वारा की गई साजिशों और आंतरिक मतभेदों का फायदा उठाने में थी। बंगाल की अपार संपत्ति और संसाधनों ने कंपनी को आर्थिक रूप से मजबूत बनाया, जिससे उन्होंने पूरे भारत में अपना प्रभाव तेजी से फैलाया। यह घटना भारत में ब्रिटिश शासन की नींव साबित हुई। इससे हमें यह समझने को मिलता है कि केवल बाहरी ताकत ही नहीं, बल्कि आंतरिक एकता की कमी भी बड़े पतन का कारण बन सकती है। इसलिए इतिहास हमें सतर्क करता है कि एकता, जागरूकता और मजबूत नेतृत्व किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति होती है।
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