
भूमिका
भारत के संवैधानिक विकास की यात्रा अत्यंत लंबी और जटिल रही है। ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल से लेकर स्वतंत्र भारत के गणतंत्र बनने तक, यह विकास कई चरणों से गुजरा। 26 जनवरी 1950 को भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य बना और इस दिन भारतीय संविधान लागू हुआ। यह संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है जिसमें कुल 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां हैं।
भारत में ब्रिटिश शासन की शुरुआत 1757 में प्लासी के युद्ध से मानी जाती है। इसके बाद 1764 में बक्सर के युद्ध ने ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थिति को और मजबूत कर दिया। कंपनी का मुख्य उद्देश्य व्यापार और आर्थिक लाभ था लेकिन धीरे-धीरे उसने राजनीतिक सत्ता भी हासिल कर ली। 1765 की इलाहाबाद की संधि के बाद कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी मिल गई।
कंपनी के कर्मचारियों को बहुत कम वेतन दिया जाता था लेकिन उन्हें निजी व्यापार की छूट थी। इस अधिकार का दुरुपयोग होने लगा और कर्मचारी तो अमीर होते गए लेकिन कंपनी की आर्थिक स्थिति खराब होती गई। 1767 में ब्रिटिश संसद ने कंपनी पर 4 लाख पाउंड वार्षिक देने की शर्त लगाई। 1772 तक कंपनी ने अपने शेयरधारकों को 12% तक लाभांश दिया जबकि उसकी वास्तविक स्थिति बहुत खराब थी।
अंततः कंपनी को बैंक ऑफ इंग्लैंड से 10 लाख पाउंड ऋण लेना पड़ा। इस मांग के बाद ब्रिटिश संसद ने कंपनी के मामलों में हस्तक्षेप करना शुरू किया। 1773 में दो महत्वपूर्ण अधिनियम पारित किए गए – एक में कंपनी को 14 लाख पाउंड ऋण दिया गया और दूसरा था रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 जो भारतीय संवैधानिक विकास में पहला कदम था।
रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 क्या है? कारण, प्रावधान और महत्व
रेग्युलेटिंग अधिनियम 1773 भारतीय संवैधानिक इतिहास में पहला महत्वपूर्ण कदम था। इस अधिनियम के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन में पहली बार ब्रिटिश सरकार का प्रत्यक्ष हस्तक्षेप हुआ। इससे पहले कंपनी पूरी तरह स्वतंत्र रूप से काम करती थी लेकिन अब उसके कार्यों पर सरकारी नियंत्रण स्थापित किया गया जो आगे चलकर और मजबूत होता गया।
इस अधिनियम के तहत 24 सदस्यीय ‘बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स’ का गठन किया गया जो कंपनी के कामकाज को देखता था। बंगाल के गवर्नर को अब ‘बंगाल का गवर्नर जनरल’ बना दिया गया। इस प्रकार वारेन हेस्टिंग्स बंगाल के अंतिम गवर्नर और प्रथम गवर्नर जनरल बने। यह पद भारतीय प्रशासन में सर्वोच्च पद बन गया जो 1947 तक चलता रहा।
गवर्नर जनरल को युद्ध और शांति के मामलों में बॉम्बे और मद्रास प्रेसिडेंसी को निर्देश देने का अधिकार मिला। इससे प्रशासनिक एकीकरण की दिशा में पहला कदम उठा। गवर्नर जनरल की सहायता के लिए 4 सदस्यों की कार्यकारी परिषद बनाई गई। इस परिषद में निर्णय बहुमत से लिए जाते थे और गवर्नर जनरल भी एक सदस्य की तरह मत देता था।
कलकत्ता में एक सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) की स्थापना का प्रावधान किया गया। सर एलिजाह इम्पे को इसका प्रथम मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया। इसके अलावा तीन अन्य न्यायाधीश – हाइड, चैम्बर्स और लिमेस्टर नियुक्त किए गए। यह न्यायालय राजा, जमींदार और कंपनी के बीच विवादों को सुलझाता था और अंग्रेजी कानून लागू करता था।
इस अधिनियम में भ्रष्टाचार रोकने के लिए भी प्रावधान थे। कंपनी के किसी भी सैनिक, असैनिक या पदाधिकारी को किसी से भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उपहार, दान या पारितोषिक लेना प्रतिबंधित कर दिया गया। यह प्रावधान कर्मचारियों के भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए लाया गया था जो उस समय बहुत फैला हुआ था। प्रतियोगी परीक्षाओं में इस अधिनियम से कई प्रश्न पूछे जाते हैं।
पिट्स इंडिया एक्ट 1784: द्वैध शासन क्या है?
रेग्युलेटिंग एक्ट की कमियों को दूर करने के लिए 1784 में पिट्स इंडिया एक्ट लाया गया। यह अधिनियम ब्रिटिश प्रधानमंत्री विलियम पिट के नाम पर जाना जाता है। इस अधिनियम ने भारत में द्वैध शासन (Dual Government) की स्थापना की – एक तरफ कंपनी का निदेशक मंडल और दूसरी तरफ ब्रिटिश सरकार का बोर्ड ऑफ कंट्रोल। यह व्यवस्था 1858 तक चली।
इस अधिनियम के तहत इंग्लैंड में 6 सदस्यीय ‘बोर्ड ऑफ कंट्रोल’ का गठन किया गया। इसमें एक राज्य सचिव, चार प्रिवी काउंसिल के सदस्य और एक चांसलर ऑफ एक्सचेकर शामिल थे। इस बोर्ड की अध्यक्षता राज्य सचिव करता था जो 1793 से सवेतन पद बन गया। यह बोर्ड भारतीय शासन के लिए 1858 तक जिम्मेदार रहा।
बोर्ड ऑफ कंट्रोल को भारत के सभी सैनिक, असैनिक और राजस्व संबंधी विषयों पर नियंत्रण का अधिकार मिल गया। इस तरह भारतीय मामलों में ब्रिटिश सरकार का प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित हो गया। कंपनी अब केवल प्रशासनिक एजेंसी बनकर रह गई और वास्तविक शक्ति ब्रिटिश सरकार के हाथों में आ गई जो आगे चलकर और मजबूत होती गई।
गवर्नर जनरल की परिषद में सदस्यों की संख्या 4 से घटाकर 3 कर दी गई। बॉम्बे और मद्रास की सरकारें पूर्णतः बंगाल के गवर्नर जनरल के अधीन हो गईं। इससे प्रशासनिक एकीकरण को बल मिला। गवर्नर जनरल को सभी प्रेसिडेंसियों पर नियंत्रण का अधिकार मिल गया और वह सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी बन गया। UPSC और राज्य सेवा परीक्षाओं में यह अधिनियम बहुत महत्वपूर्ण है।
संशोधनात्मक अधिनियम 1786: गवर्नर जनरल की शक्तियाँ कैसे बढ़ीं?
1786 का संशोधनात्मक अधिनियम विशेष रूप से लॉर्ड कार्नवालिस के लिए लाया गया था। इस अधिनियम ने गवर्नर जनरल को अभूतपूर्व शक्तियां प्रदान कीं। गवर्नर जनरल को सर्वप्रथम सेना का सर्वोच्च सेनापति (Commander-in-Chief) बना दिया गया। इससे पहले यह पद अलग होता था लेकिन अब दोनों पद एक व्यक्ति में निहित कर दिए गए जिससे प्रशासनिक और सैन्य शक्ति एकीकृत हो गई।
गवर्नर जनरल को विशेष परिस्थितियों में अपनी परिषद के निर्णय को रद्द करने का अधिकार मिला। यह सर्वप्रथम ‘वीटो पावर’ का प्रावधान था। इस शक्ति से गवर्नर जनरल की स्थिति और मजबूत हो गई। अब वह परिषद के बहुमत के फैसले को भी खारिज कर सकता था अगर उसे लगता कि यह जरूरी है। यह शक्ति बाद के सभी गवर्नर जनरलों को भी मिली।
लॉर्ड कार्नवालिस ने भारत में प्रशासनिक सुधारों की शुरुआत की। उन्होंने सिविल सेवा, न्यायिक व्यवस्था और पुलिस प्रणाली में सुधार किए। स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement) 1793 में लागू किया गया जिसमें जमींदारों को भूमि का स्थायी मालिक बना दिया गया। इससे कंपनी को निश्चित राजस्व मिलने लगा लेकिन किसानों पर बोझ बढ़ गया।
कार्नवालिस कोड भी इसी समय लागू हुआ जिसने न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था को व्यवस्थित किया। भारतीयों को उच्च पदों से हटा दिया गया और केवल यूरोपियन अधिकारियों को ही महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया जाने लगा। यह नस्लभेद की नीति थी जो बाद में भारतीय राष्ट्रवाद के उदय का एक कारण बनी। प्रतियोगी परीक्षाओं में कार्नवालिस के सुधार बहुत पूछे जाते हैं।
चार्टर अधिनियम 1793 क्या है? प्रावधान और महत्व
1793 का चार्टर अधिनियम ब्रिटिश संसद द्वारा पारित पहला चार्टर अधिनियम था। इसके बाद हर 20 वर्ष में कंपनी के चार्टर को नवीनीकृत किया जाता था। इस अधिनियम ने आगे आने वाले सभी गवर्नर जनरलों को स्वतः ही सेना का सर्वोच्च सेनापति बना दिया। अब यह एक स्थायी व्यवस्था बन गई जो 1947 तक जारी रही। सैन्य और प्रशासनिक शक्ति का यह संयोजन बहुत प्रभावी साबित हुआ।
इस अधिनियम में एक महत्वपूर्ण वित्तीय प्रावधान किया गया। कंपनी के कर्मचारियों, नियंत्रण बोर्ड के सदस्यों और सेना के वेतन व व्यय का भुगतान भारतीय राजस्व से करने का प्रावधान किया गया। इसका मतलब था कि ब्रिटिश प्रशासन का खर्च भारतीय लोगों पर डाला गया। यह आर्थिक शोषण का एक रूप था जो स्वतंत्रता तक जारी रहा।
इस अधिनियम ने बोर्ड ऑफ कंट्रोल की शक्तियों को और स्पष्ट किया। कंपनी के व्यावसायिक और राजनीतिक कार्यों में अंतर स्पष्ट किया गया। राजनीतिक मामलों में ब्रिटिश सरकार का पूर्ण नियंत्रण था जबकि व्यावसायिक मामलों में कंपनी को कुछ स्वायत्तता थी। लेकिन व्यवहार में सरकार ही सभी महत्वपूर्ण फैसले लेती थी और कंपनी उन्हें लागू करती थी।
इस समय तक ब्रिटिश भारत में विस्तार की नीति जारी थी। लॉर्ड वेलेजली ने सहायक संधि प्रणाली (Subsidiary Alliance System) शुरू की जिसके तहत भारतीय रियासतों को ब्रिटिश सेना रखनी पड़ती थी और उसका खर्च उठाना पड़ता था। इससे रियासतें कमजोर होती गईं और ब्रिटिश नियंत्रण बढ़ता गया। SSC और बैंकिंग परीक्षाओं में चार्टर अधिनियमों से प्रश्न पूछे जाते हैं।
चार्टर अधिनियम 1813 क्या है? शिक्षा और धर्म प्रसार
1813 का चार्टर अधिनियम बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि इसने कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त कर दिया। अब अन्य ब्रिटिश व्यापारी भी भारत में व्यापार कर सकते थे। हालांकि चीन के साथ व्यापार और चाय के व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार बना रहा। यह 1833 तक जारी रहा। इस तरह भारत में मुक्त व्यापार की शुरुआत हुई जिससे ब्रिटिश पूंजीवाद को बढ़ावा मिला।
इस अधिनियम में पहली बार भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की संवैधानिक स्थिति को स्पष्ट किया गया। यह घोषित किया गया कि भारत में ब्रिटिश क्षेत्र ब्रिटिश क्राउन के अधीन हैं। कंपनी केवल क्राउन की एजेंसी के रूप में काम कर रही थी। इससे यह स्पष्ट हो गया कि भारत पर वास्तविक सत्ता ब्रिटिश सरकार की है, कंपनी की नहीं।
शिक्षा और साहित्य के प्रोत्साहन के लिए पहली बार एक लाख रुपये वार्षिक खर्च करने का प्रावधान किया गया। यह भारत में पश्चिमी शिक्षा की शुरुआत थी। हालांकि इसका उद्देश्य भारतीयों को शिक्षित करना नहीं बल्कि ऐसे लोग तैयार करना था जो अंग्रेजी भाषा और संस्कृति को समझें और प्रशासन में सहायक बनें। बाद में मैकाले ने इसे और स्पष्ट किया।
ईसाई मिशनरियों को भारत में प्रवेश और धर्म प्रचार की वैधानिक मान्यता मिल गई। विलियम विल्बरफोर्स के नेतृत्व में पहला ईसाई मिशनरी दल भारत आया। इससे भारत में ईसाई धर्म का प्रसार शुरू हुआ। मिशनरियों ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम किया लेकिन उनका मुख्य उद्देश्य धर्म परिवर्तन था। प्रतियोगी परीक्षाओं में यह अधिनियम बहुत महत्वपूर्ण है।
चार्टर अधिनियम 1833 क्या है? प्रशासनिक केंद्रीकरण
1833 का चार्टर अधिनियम भारतीय संवैधानिक इतिहास में मील का पत्थर है। इस अधिनियम ने कंपनी को पूर्णतः एक प्रशासनिक संस्था में बदल दिया। कंपनी के सभी व्यापारिक अधिकार पूरी तरह समाप्त कर दिए गए। चीन के साथ व्यापार और चाय का एकाधिकार भी खत्म हो गया। अब कंपनी विशुद्ध रूप से ब्रिटिश सरकार की राजनीतिक एजेंसी बनकर रह गई। वाणिज्यिक गतिविधियां पूरी तरह बंद कर दी गईं।
बंगाल का गवर्नर जनरल अब संपूर्ण भारत का गवर्नर जनरल बन गया। इस प्रकार लॉर्ड विलियम बेंटिक बंगाल के अंतिम और भारत के प्रथम गवर्नर जनरल बने। उन्हें प्रशासन के क्षेत्र में सर्वोच्च सत्ता प्राप्त हो गई। बॉम्बे और मद्रास प्रेसिडेंसियां पूरी तरह उनके अधीन हो गईं। इससे भारत में एकीकृत प्रशासन की स्थापना हुई जो पहले नहीं थी।
भारतीय साम्राज्य में अब सपरिषद गवर्नर जनरल द्वारा निर्मित कानून पूरे भारत में लागू होने लगे। केंद्रीय विधायिका की शक्ति बढ़ गई। ईस्ट इंडिया कंपनी के सभी ऋण भारत सरकार पर डाल दिए गए। यह भारतीय जनता पर अतिरिक्त बोझ था क्योंकि अब कंपनी के कर्ज भी भारतीय राजस्व से चुकाए जाने लगे। यह आर्थिक शोषण की एक और परत थी।
सरकारी नौकरी में भारतीयों के साथ भेदभाव की नीति को कागज पर समाप्त कर दिया गया और पहली बार योग्यता को आधार बनाने की घोषणा की गई। लेकिन व्यवहार में भारतीयों को उच्च पदों से दूर रखा जाता रहा। भारत में दास प्रथा समाप्त करने की घोषणा की गई। ब्रिटिश नागरिकों को भारत में भूमि खरीदने की छूट दी गई जिससे यूरोपीय बागान मालिकों की संख्या बढ़ी।
विधि व्यवस्था के संहिताकरण के लिए लॉर्ड मैकाले की अध्यक्षता में एक विधि आयोग गठित किया गया। गवर्नर जनरल की परिषद में एक विधि सदस्य का प्रावधान किया गया और लॉर्ड मैकाले प्रथम विधि सदस्य बने। इन्होंने भारतीय दंड संहिता (IPC) का मसौदा तैयार किया जो 1860 में लागू हुई। UPSC मुख्य परीक्षा में इस अधिनियम से प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
चार्टर अधिनियम 1853 क्या है? लोक सेवा सुधार
1853 का चार्टर अधिनियम अंतिम चार्टर अधिनियम था। इसमें कंपनी के भारत में शासन की कोई निर्धारित अवधि नहीं रखी गई जबकि पहले के चार्टर 20 वर्ष के लिए दिए जाते थे। समयावधि का निर्धारण न होना इस बात का संकेत था कि कंपनी के शासन को ब्रिटिश संसद द्वारा कभी भी समाप्त किया जा सकता है। यह प्रावधान बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि 1857 के विद्रोह के बाद वास्तव में ऐसा ही हुआ।
नियंत्रण बोर्ड के राज्य सचिव और सदस्यों के वेतन निर्धारित करना ब्रिटिश सरकार का कार्य हो गया लेकिन भुगतान कंपनी करती थी। बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की सदस्य संख्या 24 से घटाकर 18 कर दी गई। बोर्ड को नए राज्यों का निर्माण और सीमाओं में परिवर्तन करने का अधिकार था। इन प्रावधानों से कंपनी पर नियंत्रण और बढ़ गया था।
विधि सदस्य गवर्नर जनरल की परिषद का पूर्ण सदस्य बन गया। इस अधिनियम में विधायिका और कार्यपालिका का पहली बार पृथक्करण किया गया। जब परिषद विधायी कार्य करती थी तो इसमें अतिरिक्त सदस्य जोड़े जाते थे। इसने भारत में पहली बार आधुनिक विधायिका की नींव रखी। यह एक महत्वपूर्ण संवैधानिक विकास था जो आगे चलकर विस्तारित हुआ।
इस अधिनियम का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान प्रतियोगी परीक्षा द्वारा सिविल सेवा की शुरुआत थी। अब भारतीय सिविल सेवा में भर्ती के लिए खुली प्रतियोगी परीक्षा आयोजित की जाने लगी। हालांकि परीक्षा लंदन में होती थी और आयु सीमा इतनी कम थी कि भारतीयों के लिए इसमें सफल होना बहुत मुश्किल था। फिर भी यह योग्यता आधारित चयन की दिशा में एक कदम था।
सत्येंद्र नाथ टैगोर 1863 में ICS परीक्षा पास करने वाले पहले भारतीय बने। धीरे-धीरे भारतीयों की संख्या बढ़ने लगी लेकिन प्रशासन में उच्च पदों पर यूरोपियनों का ही वर्चस्व रहा। यह अधिनियम 1857 के विद्रोह से ठीक पहले आया था। प्रतियोगी परीक्षाओं में सिविल सेवा की शुरुआत से जुड़े प्रश्न बहुत पूछे जाते हैं। राज्य सेवा परीक्षाओं में भी यह टॉपिक महत्वपूर्ण है।
भारत शासन अधिनियम 1858 क्या है? क्राउन का प्रत्यक्ष शासन
1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार ने महसूस किया कि भारत का शासन अब कंपनी के हाथों में नहीं रहना चाहिए। 1858 का भारत शासन अधिनियम लाकर भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन कर दिया गया। यह भारतीय संवैधानिक इतिहास में एक बड़ा मोड़ था। कंपनी की सेना अब क्राउन की सेना बन गई और सभी सैनिक शक्तियां सीधे सम्राट के अधीन आ गईं।
बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स और बोर्ड ऑफ कंट्रोल दोनों को समाप्त कर दिया गया। इनकी सभी शक्तियां ‘भारत राज्य सचिव’ (Secretary of State for India) में निहित कर दी गईं जो ब्रिटिश मंत्रिमंडल का सदस्य होता था। भारत राज्य सचिव की सहायता के लिए 15 सदस्यों की एक भारत परिषद का गठन किया गया। इसमें 8 सदस्यों को सम्राट और 7 सदस्यों को पूर्व कंपनी नियुक्त करती थी।
भारत परिषद के सदस्यों के लिए यह अनिवार्य था कि उन्हें भारत में 10 वर्ष की सेवा का अनुभव हो और भारत छोड़े 10 वर्ष से अधिक न हुए हों। यह प्रावधान यह सुनिश्चित करने के लिए था कि परिषद में अनुभवी लोग हों जो भारतीय परिस्थितियों को समझते हों। लेकिन व्यवहार में यह परिषद केवल सलाहकार निकाय थी और वास्तविक शक्ति राज्य सचिव के पास थी।
गवर्नर जनरल का पद अब ‘वायसराय’ (Viceroy) कहलाने लगा जो सम्राट का व्यक्तिगत प्रतिनिधि था। लॉर्ड कैनिंग भारत के पहले वायसराय बने। वायसराय के माध्यम से भारत राज्य सचिव ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी होते हुए भारत का शासन करता था। भारत शासन के सभी प्राधिकार – सिविल, सैनिक, कार्यपालिका, विधायिका – सपरिषद गवर्नर जनरल (वायसराय) में निहित कर दिए गए।
देशी रियासतों के प्रति हड़प नीति (Doctrine of Lapse) को समाप्त कर दिया गया। महारानी विक्टोरिया की घोषणा में कहा गया कि रियासतों की संप्रभुता का सम्मान किया जाएगा। 1877 में महारानी विक्टोरिया को भारत की साम्राज्ञी घोषित किया गया। यह अधिनियम 1947 तक भारत के शासन का आधार बना रहा। UPSC और राज्य PSC परीक्षाओं में इस अधिनियम से बहुत प्रश्न पूछे जाते हैं।
भारत परिषद अधिनियम 1861 क्या है? विकेंद्रीकरण की शुरुआत

1861 का भारत परिषद अधिनियम संवैधानिक विकास में महत्वपूर्ण कदम था। इस अधिनियम के द्वारा पहली बार विभागीय प्रणाली (Portfolio System) और मंत्रिमंडलीय प्रणाली की नींव रखी गई। लॉर्ड कैनिंग ने विभिन्न विभागों को परिषद सदस्यों में बांट दिया जैसे गृह, वित्त, विधि, सैन्य आदि। प्रत्येक सदस्य अपने विभाग का प्रभारी होता था। यह आधुनिक मंत्रिमंडल व्यवस्था की शुरुआत थी।
इस अधिनियम के द्वारा पहली बार लोक प्रतिनिधित्व के तत्व का समावेश किया गया। विधि-निर्माण में भारतीयों से सहयोग लेने का प्रयास किया गया। जब गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद विधान परिषद के रूप में काम करती थी तो इसमें कुछ गैर-सरकारी सदस्य शामिल किए जाते थे। ये सदस्य सीधे निर्वाचित नहीं होते थे बल्कि वायसराय द्वारा मनोनीत किए जाते थे।
पहली बार विधायी विकेंद्रीकरण की नींव रखी गई। बॉम्बे और मद्रास प्रेसिडेंसी को विधि निर्माण का पुनः अधिकार दे दिया गया जो 1833 में छीन लिया गया था। बाद में बंगाल, उत्तर पश्चिमी प्रांत (आगरा) और पंजाब में भी विधान परिषदें स्थापित की गईं। इससे स्थानीय स्तर पर कानून बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई जो प्रांतीय स्वायत्तता की दिशा में पहला कदम था।
वायसराय की परिषद में पांचवें सदस्य का प्रावधान किया गया जो विधिवेत्ता होता था। सेना के सर्वोच्च कमांडर को परिषद का असाधारण सदस्य बनाया गया। गवर्नर जनरल (वायसराय) को विशेष परिस्थितियों में पहली बार अध्यादेश जारी करने का अधिकार दिया गया। यह शक्ति आपातकाल में तुरंत कानून बनाने के लिए थी। बाद में भारतीय संविधान में भी यह प्रावधान रखा गया।
लॉर्ड कैनिंग ने इस अधिनियम के तहत राजा दिनकर राव, सर दिनकर राव और सर नादिर रोज़ को विधान परिषद में नामांकित किया। ये पहले भारतीय सदस्य थे हालांकि इनकी शक्तियां बहुत सीमित थीं। यह प्रतिनिधित्व प्रतीकात्मक अधिक था व्यावहारिक कम। SSC और बैंकिंग परीक्षाओं में इस अधिनियम से प्रश्न पूछे जाते हैं।
भारत परिषद अधिनियम 1892 क्या है? निर्वाचन की शुरुआत
1892 का भारत परिषद अधिनियम भारत के शासन का आधार विस्तृत करने और गैर-सरकारी तथा भारतीय तत्वों को शासन में भाग लेने का अवसर देने के लिए लाया गया था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 में हो चुकी थी और भारतीय राजनीतिक जागरूकता बढ़ रही थी। इस दबाव के कारण यह सुधार किए गए लेकिन ये बहुत सीमित थे।
निर्वाचन पद्धति का आरंभ तो पहली बार किया गया किंतु ‘निर्वाचन’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया। यह अप्रत्यक्ष निर्वाचन था जिसे ‘सिफारिश’ या ‘नामांकन’ कहा जाता था। भारतीय विधान परिषद में शासकीय बहुमत बनाए रखा गया लेकिन गैर-सरकारी सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई। बंगाल चैंबर ऑफ कॉमर्स और प्रांतीय विधान परिषदों द्वारा सदस्य नाम निर्देशित होने लगे।
प्रांतीय विधान परिषदों के गैर-सरकारी सदस्य स्थानीय निकायों जैसे विश्वविद्यालय, जिला बोर्ड और नगरपालिका द्वारा नामांकित होने लगे। इससे प्रतिनिधित्व का आधार कुछ व्यापक हुआ। विभिन्न हितों और वर्गों को प्रतिनिधित्व मिलने लगा। लेकिन यह प्रणाली अभी भी बहुत सीमित थी और वास्तविक लोकतंत्र से बहुत दूर थी।
गैर-सरकारी सदस्यों को पहली बार बजट पर विचार-विमर्श करने और सार्वजनिक हित तथा सरकारी नीतियों पर प्रश्न पूछने का अधिकार मिला। यह एक महत्वपूर्ण कदम था। लेकिन उन्हें पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं था। सरकार प्रश्नों का उत्तर देने के लिए बाध्य नहीं थी। बजट पर मतदान या संशोधन प्रस्ताव रखने का भी अधिकार नहीं था।
इसकी आलोचना इस आधार पर की गई कि यह बहुत सीमित सुधार थे। कांग्रेस और अन्य राष्ट्रवादी संगठनों ने इन्हें अपर्याप्त और असंतोषजनक बताया। गोपाल कृष्ण गोखले ने कहा कि “हमें जो दिया गया है वह बहुत कम है लेकिन जो मांगा गया था वह बहुत अधिक नहीं था।” फिर भी यह प्रतिनिधित्व और संवैधानिक विकास की दिशा में एक कदम था। प्रतियोगी परीक्षाओं में इस अधिनियम की आलोचना भी पूछी जाती है।
मार्ले-मिंटो सुधार 1909 क्या है? सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व
1909 का भारत परिषद अधिनियम मार्ले-मिंटो सुधार के नाम से जाना जाता है। लॉर्ड मार्ले उस समय भारत राज्य सचिव और लॉर्ड मिंटो वायसराय थे। इस अधिनियम का सबसे विवादास्पद प्रावधान मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचन (Separate Electorate) की व्यवस्था थी। मुस्लिम सदस्यों का चुनाव केवल मुस्लिम मतदाता ही कर सकते थे। इससे सांप्रदायिक राजनीति को प्रोत्साहन मिला और आगे चलकर विभाजन का बीज बोया गया।
केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों में सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई। केंद्रीय विधान परिषद में अधिकतम 60 सदस्य हो सकते थे जिनमें से 27 निर्वाचित होते थे। प्रांतीय परिषदों में भी निर्वाचित सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई। लेकिन अभी भी सरकारी बहुमत बना रहा और निर्वाचन अप्रत्यक्ष था। मतदान का अधिकार केवल संपत्ति और शिक्षा के आधार पर सीमित लोगों को था।
परिषद सदस्यों को बजट पर बहस करने, प्रश्न पूछने, पूरक प्रश्न पूछने और प्रस्ताव रखने का अधिकार मिला। लेकिन बजट पर मतदान का अधिकार नहीं था। सरकार किसी भी प्रस्ताव या सुझाव को मानने के लिए बाध्य नहीं थी। वायसराय को वीटो पावर थी और वह किसी भी कानून को रद्द कर सकता था। इस तरह सुधार दिखावटी अधिक थे वास्तविक कम।
पहली बार एक भारतीय को वायसराय की कार्यकारी परिषद में नियुक्त किया गया। सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा को विधि सदस्य बनाया गया। लेकिन यह प्रतिनिधित्व प्रतीकात्मक था। इंग्लैंड में भी भारत परिषद में दो भारतीयों को नियुक्त किया गया। कांग्रेस और राष्ट्रवादियों ने इन सुधारों को निराशाजनक बताया। लेकिन मुस्लिम लीग ने पृथक निर्वाचन का स्वागत किया। UPSC में सांप्रदायिक राजनीति के इतिहास में यह अधिनियम बहुत महत्वपूर्ण है।
मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार 1919 क्या है? द्वैध शासन
प्रथम विश्व युद्ध में भारतीयों ने ब्रिटिश सरकार का साथ दिया और उम्मीद की कि युद्ध के बाद उन्हें स्वराज मिलेगा। 20 अगस्त 1917 को मांटेग्यू ने घोषणा की कि ब्रिटिश सरकार का उद्देश्य भारत में उत्तरदायी सरकार की क्रमिक स्थापना करना है। इस घोषणा के आधार पर 1919 में भारत शासन अधिनियम लाया गया। यह मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार के नाम से जाना जाता है।
इस अधिनियम का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान प्रांतों में द्वैध शासन (Dyarchy) की स्थापना थी। प्रांतीय विषयों को दो भागों में बांटा गया – आरक्षित और हस्तांतरित। आरक्षित विषय जैसे कानून व्यवस्था, वित्त, भू-राजस्व आदि गवर्नर और उसकी कार्यकारी परिषद द्वारा प्रशासित होते थे। हस्तांतरित विषय जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, स्थानीय स्वशासन आदि भारतीय मंत्रियों द्वारा प्रशासित होते थे जो विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी थे।
केंद्र में द्विसदनीय विधायिका की स्थापना हुई – राज्य परिषद (Council of State) और केंद्रीय विधान सभा (Central Legislative Assembly)। राज्य परिषद में 60 सदस्य थे जिनमें 33 निर्वाचित थे। केंद्रीय विधान सभा में 145 सदस्य थे जिनमें 104 निर्वाचित थे। निर्वाचन प्रत्यक्ष था लेकिन मताधिकार बहुत सीमित था – केवल 10% लोगों को वोट का अधिकार था।
भारत में पहली बार लोक सेवा आयोग की स्थापना का प्रावधान किया गया। 1926 में इसकी स्थापना हुई। लंदन में हाई कमिश्नर का पद बनाया गया। भारत सचिव को इंग्लैंड की संचित निधि से वेतन मिलने लगा, भारतीय राजस्व से नहीं। महिलाओं को मतदान और चुनाव लड़ने का अधिकार मिला। कुछ प्रांतों में वर्ग, जाति और धर्म के आधार पर सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व बढ़ाया गया।
द्वैध शासन व्यवहार में असफल रहा। भारतीय मंत्रियों के पास वित्तीय शक्ति नहीं थी और नौकरशाही उनका सहयोग नहीं करती थी। गवर्नर किसी भी मामले को आरक्षित घोषित कर सकता था। कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अन्य राजनीतिक दलों ने इन सुधारों को अपर्याप्त बताया। महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया। फिर भी यह संवैधानिक विकास में एक महत्वपूर्ण कदम था। प्रतियोगी परीक्षाओं में द्वैध शासन बहुत पूछा जाता है।
साइमन कमीशन और भारत शासन अधिनियम 1935 क्या है?
1919 के अधिनियम में प्रावधान था कि 10 वर्ष बाद इसकी समीक्षा की जाएगी। 1927 में ब्रिटिश सरकार ने साइमन कमीशन भेजा जिसके सभी सात सदस्य अंग्रेज थे। भारतीयों ने “साइमन गो बैक” के नारे के साथ इसका बहिष्कार किया। लाहौर में लाला लाजपत राय पर लाठीचार्ज हुआ जिसमें वे घायल हो गए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई। कमीशन की सिफारिशों के आधार पर 1935 का अधिनियम बनाया गया।
भारत शासन अधिनियम 1935 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित सबसे लंबा अधिनियम था। इसमें 321 धाराएं और 10 अनुसूचियां थीं। यह अधिनियम भारतीय संविधान का आधार बना। भारतीय संविधान के कई प्रावधान इसी अधिनियम से लिए गए हैं। इस अधिनियम ने अखिल भारतीय संघ की स्थापना का प्रावधान किया जिसमें ब्रिटिश प्रांत और देशी रियासतें शामिल होनी थीं। लेकिन यह संघ कभी अस्तित्व में नहीं आया क्योंकि पर्याप्त रियासतें शामिल नहीं हुईं।
प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त कर दिया गया और प्रांतीय स्वायत्तता (Provincial Autonomy) की स्थापना की गई। 11 प्रांतों में उत्तरदायी सरकारें बनाई गईं। गवर्नर केवल विशेष परिस्थितियों में हस्तक्षेप कर सकता था। प्रांतीय विधानसभाओं में अधिकांश सदस्य निर्वाचित होते थे। मताधिकार का विस्तार किया गया – लगभग 30 मिलियन लोगों को वोट का अधिकार मिला जो पहले 5-6 मिलियन था।
केंद्र में द्वैध शासन की व्यवस्था की गई – आरक्षित और हस्तांतरित विषय। लेकिन केंद्र में उत्तरदायी सरकार नहीं थी। गवर्नर जनरल के पास व्यापक शक्तियां थीं। तीन सूचियां बनाई गईं – संघ सूची (59 विषय), प्रांतीय सूची (54 विषय) और समवर्ती सूची (36 विषय)। अवशिष्ट शक्तियां गवर्नर जनरल को दी गईं। बर्मा को भारत से अलग कर दिया गया। सिंध और उड़ीसा नए प्रांत बनाए गए।
संघीय न्यायालय (Federal Court) की स्थापना की गई जो सर्वोच्च न्यायिक निकाय था। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना 1935 में हुई। प्रांतीय और संघीय स्तर पर लोक सेवा आयोग बनाए गए। सांप्रदायिक निर्वाचन को बढ़ाया गया – अब सिखों, एंग्लो-इंडियनों और यूरोपियनों को भी पृथक प्रतिनिधित्व मिला। महात्मा गांधी ने इसे “दासता का नया चार्टर” कहा। कांग्रेस ने आलोचना की लेकिन 1937 के चुनावों में भाग लिया और कई प्रांतों में सरकार बनाई। प्रतियोगी परीक्षाओं में यह सबसे महत्वपूर्ण अधिनियम है।
क्रिप्स मिशन 1942 क्या है? प्रस्ताव और असफलता

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीयों का समर्थन पाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने मार्च 1942 में सर स्टैफोर्ड क्रिप्स को भारत भेजा। क्रिप्स मिशन ने प्रस्ताव दिया कि युद्ध के बाद भारत को डोमिनियन स्टेट्स का दर्जा दिया जाएगा। एक संविधान सभा बनाई जाएगी जो भारत का संविधान बनाएगी। प्रांतों को यह अधिकार होगा कि वे संघ में शामिल हों या अलग रहें और अपना अलग संविधान बनाएं।
यह प्रस्ताव भारत विभाजन की संभावना की ओर इशारा करता था। कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने इन प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया। कांग्रेस ने तत्काल सत्ता हस्तांतरण की मांग की और महात्मा गांधी ने अगस्त 1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ शुरू किया। मुस्लिम लीग ने 1940 में पाकिस्तान की मांग कर दी थी और वह अधिक स्पष्ट अलग राष्ट्र चाहती थी।
क्रिप्स मिशन असफल रहा लेकिन इसने यह स्पष्ट कर दिया कि ब्रिटिश सरकार भारत को स्वतंत्रता देने के लिए तैयार है। युद्ध के बाद ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई और वह भारत पर नियंत्रण बनाए रखने में असमर्थ था। अंतर्राष्ट्रीय दबाव भी बढ़ रहा था। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन अपने चरम पर था। इन सब कारणों से स्वतंत्रता अब दूर नहीं थी। प्रतियोगी परीक्षाओं में क्रिप्स मिशन की असफलता के कारण पूछे जाते हैं।
कैबिनेट मिशन योजना 1946 क्या है? मुख्य प्रस्ताव
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने फरवरी 1946 में घोषणा की कि भारत को शीघ्र स्वतंत्रता दी जाएगी। मार्च 1946 में तीन सदस्यीय कैबिनेट मिशन भारत आया। इसमें लॉर्ड पेथिक लॉरेंस (भारत सचिव और नेता), सर स्टैफोर्ड क्रिप्स और ए.वी. अलेक्जेंडर शामिल थे। मिशन का उद्देश्य भारतीय नेताओं से बातचीत कर सत्ता हस्तांतरण की योजना बनाना था।
कैबिनेट मिशन ने 16 मई 1946 को अपनी योजना प्रस्तुत की। इसमें एक कमजोर केंद्र के साथ संघीय व्यवस्था का प्रस्ताव था। संघ के पास केवल तीन विषय होंगे – रक्षा, विदेश मामले और संचार। अन्य सभी विषय प्रांतों के पास होंगे। प्रांतों को तीन समूहों में बांटने का प्रस्ताव था – समूह A में हिंदू बहुल प्रांत, समूह B में पंजाब और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत, समूह C में बंगाल और असम। भारत का विभाजन नहीं होना था।
संविधान सभा के गठन का प्रस्ताव किया गया जिसमें 389 सदस्य होंगे। प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा इनका चुनाव होगा। संविधान सभा स्वतंत्र भारत का संविधान बनाएगी। एक अंतरिम सरकार बनाई जाएगी जिसमें प्रमुख राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व होगा। कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने शर्तों के साथ इस योजना को स्वीकार किया लेकिन बाद में विवाद उत्पन्न हो गए।
सितंबर 1946 में जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। मुस्लिम लीग भी शामिल हुई लेकिन सहयोग नहीं किया। दिसंबर 1946 में संविधान सभा की पहली बैठक हुई लेकिन मुस्लिम लीग ने बहिष्कार किया। कांग्रेस और लीग के बीच मतभेद बढ़ते गए। सांप्रदायिक दंगे भड़क गए। कैबिनेट मिशन योजना असफल हो गई और विभाजन अपरिहार्य हो गया। प्रतियोगी परीक्षाओं में संविधान सभा से जुड़े तथ्य बहुत महत्वपूर्ण हैं।
माउंटबेटन योजना 1947 क्या है? भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम
फरवरी 1947 में प्रधानमंत्री एटली ने दो महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं। पहली, ब्रिटिश सरकार जून 1948 तक भारत को सत्ता सौंप देगी। दूसरी, लॉर्ड माउंटबेटन को नया वायसराय बनाकर भारत भेजा जाएगा। माउंटबेटन मार्च 1947 में भारत आए और सभी पक्षों से बातचीत की। उन्होंने पाया कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौता असंभव है और सांप्रदायिक स्थिति बहुत गंभीर है। विभाजन अपरिहार्य लग रहा था।
3 जून 1947 को माउंटबेटन योजना घोषित की गई। इसमें भारत का विभाजन स्वीकार कर लिया गया। 15 अगस्त 1947 को दो स्वतंत्र डोमिनियन – भारत और पाकिस्तान – बनाए जाएंगे। पंजाब और बंगाल का विभाजन होगा। सिंध पाकिस्तान में जाएगा। उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत और सिलहट (असम) में जनमत संग्रह होगा। देशी रियासतों को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने या स्वतंत्र रहने का विकल्प दिया गया।
सभी प्रमुख दलों ने इस योजना को स्वीकार कर लिया। कांग्रेस ने अनिच्छा से विभाजन स्वीकार किया। सरदार वल्लभभाई पटेल ने माना कि बिना विभाजन के समस्या का हल नहीं है। मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग पूरी होने पर खुशी जताई। सिख समुदाय और हिंदू महासभा ने विरोध किया लेकिन स्थिति उनके नियंत्रण से बाहर थी। सर सिरिल रेडक्लिफ को सीमा निर्धारण का काम सौंपा गया।
ब्रिटिश संसद ने 18 जुलाई 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पारित किया। इसके मुख्य प्रावधान थे – 15 अगस्त 1947 से भारत और पाकिस्तान स्वतंत्र डोमिनियन बनेंगे। ब्रिटिश सम्राट इनका संवैधानिक प्रमुख होगा। प्रत्येक डोमिनियन का एक गवर्नर जनरल होगा। संविधान सभाएं अपने-अपने संविधान बनाएंगी। भारत राज्य सचिव का पद समाप्त हो जाएगा। 1935 का अधिनियम (संशोधनों के साथ) तब तक लागू रहेगा जब तक नया संविधान नहीं बनता। देशी रियासतों पर ब्रिटिश आधिपत्य समाप्त हो जाएगा।
15 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान स्वतंत्र हुए। लेकिन इस खुशी के साथ विभाजन की त्रासदी भी आई। लाखों लोग मारे गए, करोड़ों विस्थापित हुए, महिलाओं के साथ अत्याचार हुए। महात्मा गांधी ने विभाजन को “आत्मा का विभाजन” कहा। सरदार पटेल ने 565 रियासतों को भारत में विलय करने का कार्य किया। जम्मू-कश्मीर, हैदराबाद और जूनागढ़ की समस्याएं बाद में सुलझीं। स्वतंत्रता के साथ ही नए राष्ट्र निर्माण की चुनौतियां शुरू हो गईं। प्रतियोगी परीक्षाओं में स्वतंत्रता और विभाजन से जुड़े तथ्य बहुत पूछे जाते हैं।
संविधान सभा क्या है? भारतीय संविधान का निर्माण
कैबिनेट मिशन योजना के तहत संविधान सभा का गठन किया गया। प्रांतीय विधानसभाओं ने अप्रत्यक्ष चुनाव द्वारा इसके सदस्यों का चुनाव किया। 9 दिसंबर 1946 को संविधान सभा की पहली बैठक हुई। डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को अस्थायी अध्यक्ष चुना गया। 11 दिसंबर को डॉ. राजेंद्र प्रसाद को स्थायी अध्यक्ष चुना गया। 13 दिसंबर को जवाहरलाल नेहरू ने ऐतिहासिक ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ पेश किया जो 22 जनवरी 1947 को पारित हुआ।
विभाजन के बाद संविधान सभा का पुनर्गठन हुआ। अब इसमें 299 सदस्य रहे। डॉ. बी.आर. अंबेडकर की अध्यक्षता में प्रारूप समिति (Drafting Committee) बनाई गई। संविधान सभा ने 2 वर्ष 11 माह 18 दिन में 11 सत्रों में संविधान बनाया। विभिन्न देशों के संविधानों का अध्ययन किया गया। ब्रिटेन, अमेरिका, आयरलैंड, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया आदि से प्रावधान लिए गए। भारत की परिस्थितियों के अनुसार संशोधन किए गए।
26 नवंबर 1949 को संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया गया। इसी दिन को संविधान दिवस मनाया जाता है। कुछ प्रावधान तुरंत लागू हो गए लेकिन पूरा संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। इस दिन को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है क्योंकि 1930 में इसी दिन कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज की घोषणा की थी। भारत संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बन गया।
भारतीय संविधान दुनिया का सबसे लंबा लिखित संविधान है। मूल संविधान में 395 अनुच्छेद, 22 भाग और 8 अनुसूचियां थीं। अब 470+ अनुच्छेद, 25 भाग और 12 अनुसूचियां हैं। यह कठोर और लचीला दोनों है – कुछ प्रावधान संशोधित करना आसान है, कुछ के लिए विशेष बहुमत चाहिए। संविधान में मौलिक अधिकार, राज्य के नीति निदेशक तत्व, मौलिक कर्तव्य, संघीय व्यवस्था, संसदीय लोकतंत्र आदि का प्रावधान है।
डॉ. अंबेडकर को संविधान का निर्माता कहा जाता है। प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संविधान को अंतिम रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हस्तलिखित संविधान को प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने सुंदर कैलिग्राफी में लिखा। शांतिनिकेतन के कलाकारों ने इसे सजाया। मूल संविधान की प्रतियां संसद के पुस्तकालय में सुरक्षित रखी गई हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में संविधान सभा से जुड़े तथ्य बहुत महत्वपूर्ण हैं – सदस्यों के नाम, समितियां, तिथियां आदि बार-बार पूछे जाते हैं।
निष्कर्ष – संवैधानिक विकास की विरासत
भारत का संवैधानिक विकास 1773 से 1950 तक लगभग 177 वर्षों की लंबी यात्रा है। रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 से शुरू होकर भारतीय संविधान 1950 तक, यह विकास कई चरणों से गुजरा। प्रत्येक अधिनियम ने भारतीय राजनीतिक चेतना को प्रभावित किया और स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूती दी। ब्रिटिश सरकार ने थोड़े-थोड़े सुधार किए लेकिन वास्तविक शक्ति अपने हाथों में रखी। भारतीयों ने संघर्ष जारी रखा और अंततः पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त की।
प्रत्येक अधिनियम की अपनी विशेषताएं और सीमाएं थीं। रेग्युलेटिंग एक्ट ने पहली बार ब्रिटिश सरकार का हस्तक्षेप शुरू किया। पिट्स इंडिया एक्ट ने द्वैध शासन स्थापित किया। चार्टर अधिनियमों ने कंपनी को व्यापारिक से प्रशासनिक संस्था में बदला। 1858 के अधिनियम ने कंपनी शासन समाप्त कर क्राउन शासन शुरू किया। 1861 और 1892 के अधिनियमों ने सीमित प्रतिनिधित्व दिया।
1909 में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व शुरू हुआ जो विभाजन का बीज बना। 1919 में द्वैध शासन और सीमित उत्तरदायी सरकार आई। 1935 का अधिनियम सबसे व्यापक था और प्रांतीय स्वायत्तता दी। कैबिनेट मिशन ने संविधान सभा की नींव रखी। 1947 में स्वतंत्रता मिली लेकिन विभाजन की कीमत चुकानी पड़ी। 1950 में अपना संविधान लागू करके भारत ने लोकतांत्रिक गणतंत्र की यात्रा शुरू की।
यह विकास केवल कानूनी नहीं बल्कि राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक भी था। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने इस प्रक्रिया को तेज किया। कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अन्य संगठनों ने विभिन्न चरणों में अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं। गांधीजी, नेहरू, पटेल, अंबेडकर, जिन्ना आदि नेताओं ने इतिहास की दिशा तय की। आम जनता के संघर्षों और बलिदानों ने स्वतंत्रता को संभव बनाया। आज हम जिस लोकतंत्र में जीते हैं, वह इसी लंबी यात्रा का परिणाम है।
भारतीय संविधान की विशेषताएं भी इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से समझी जा सकती हैं। क्यों हमारा संविधान संघीय है लेकिन एकात्मक झुकाव के साथ? क्यों आपातकालीन प्रावधान इतने व्यापक हैं? क्यों मौलिक अधिकारों के साथ नीति निदेशक तत्व भी हैं? इन सबके उत्तर संवैधानिक विकास के इतिहास में मिलते हैं। इसलिए यह विषय केवल परीक्षा के लिए नहीं बल्कि भारतीय राजनीति को समझने के लिए भी आवश्यक है।
भारत के गवर्नर जनरल एवं वायसराय — सम्पूर्ण इतिहास
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