
प्राचीन भारत का इतिहास भाग-14 MCQ-2026
वेदांग MCQs 2026: श्रौत, शुल्व, कल्प, व्याकरण और ज्योतिष के 25+ महत्वपूर्ण प्रश्न
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प्रश्न 1. ‘शुल्व सूत्र’ किसका भाग है?
(A) गृह्य सूत्र का
(B) धर्म सूत्र का
(C) श्रौत सूत्र का
(D) उपनिषद् का
✅ उत्तर: (C) श्रौत सूत्र का
‘शुल्व सूत्र’ कल्प वेदांग के श्रौत सूत्र का एक महत्वपूर्ण भाग है। इसमें मुख्य रूप से यज्ञवेदी (यज्ञ की वेदी) के निर्माण के लिए आवश्यक ज्यामितीय गणनाओं का विस्तृत वर्णन मिलता है। ‘शुल्व’ शब्द का अर्थ है — रस्सी, जिसका उपयोग प्राचीन काल में भूमि को नापने और यज्ञवेदी के आकार को निर्धारित करने के लिए किया जाता था। इसलिए शुल्व सूत्र को प्राचीन भारतीय ज्यामिति (Geometry) का एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है। शुल्व सूत्रों में विभिन्न प्रकार की यज्ञवेदी बनाने की विधियाँ दी गई हैं, जिनमें वर्गाकार, आयताकार और वृत्ताकार वेदियाँ शामिल हैं। इन वेदियों के निर्माण में सटीक गणितीय सिद्धांतों का प्रयोग किया जाता था। विशेष रूप से बौधायन शुल्व सूत्र में पाइथागोरस प्रमेय (समकोण त्रिभुज में कर्ण का वर्ग अन्य दो भुजाओं के वर्गों के योग के बराबर होता है) का उल्लेख मिलता है, जिसे यूनानी गणितज्ञ पाइथागोरस से पहले का माना जाता है। इसी कारण शुल्व सूत्र को भारतीय गणित और ज्यामिति के इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण और प्राचीन स्रोत माना जाता है।
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प्रश्न 2. ‘निरुक्त’ वेदांग में किसका अध्ययन किया जाता है?
(A) मंत्रों के उच्चारण का
(B) वैदिक मंत्रों के शब्दों की व्युत्पत्ति का
(C) यज्ञ विधि का
(D) काव्य के छंदों का
✅ उत्तर: (B) वैदिक मंत्रों के शब्दों की व्युत्पत्ति का
‘निरुक्त’ वेदांग में वैदिक मंत्रों में प्रयुक्त कठिन और प्राचीन शब्दों की व्युत्पत्ति (Etymology) तथा उनके वास्तविक अर्थों का अध्ययन किया जाता है। वैदिक मंत्रों में अनेक ऐसे शब्द होते थे जिनका अर्थ सामान्य लोगों के लिए समझना कठिन था, इसलिए उनके सही अर्थ और उत्पत्ति को स्पष्ट करने के लिए निरुक्त का विकास हुआ। इसे ‘वेद का कान’ कहा जाता है, क्योंकि यह वेदों के शब्दों को समझने और उनके सही अर्थ को सुनने-समझने में सहायता करता है। इस विषय का सबसे प्रसिद्ध और प्राचीन ग्रंथ ‘निरुक्त’ है जिसकी रचना महान विद्वान यास्काचार्य ने की थी। इस ग्रंथ में वैदिक शब्दों की उत्पत्ति, उनके अर्थ तथा उनके प्रयोग की व्याख्या की गई है। इसी कारण ‘निरुक्त’ को भाषा विज्ञान (Linguistics) का सबसे प्राचीन ग्रंथ माना जाता है और यास्काचार्य को भाषाविज्ञान का जनक कहा जाता है।
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प्रश्न 3. वेदांग साहित्य को वैदिक साहित्य में शामिल किया जाता है या नहीं?
(A) हाँ, पूर्णतः शामिल किया जाता है
(B) नहीं, इसे वैदिक साहित्य के अंतर्गत शामिल नहीं किया जाता
(C) आंशिक रूप से शामिल किया जाता है
(D) केवल कल्प और व्याकरण शामिल हैं
✅ उत्तर: (B) नहीं, इसे वैदिक साहित्य के अंतर्गत शामिल नहीं किया जाता
वेदांग साहित्य को सामान्यतः वैदिक साहित्य के अंतर्गत शामिल नहीं किया जाता। वास्तव में वेदांग ऐसे सहायक शास्त्र हैं जिनका विकास वेदों को सही ढंग से समझने, याद रखने और उनका अध्ययन करने में सहायता प्रदान करने के लिए हुआ था। इसीलिए वेदांग को ‘वेद के अंग’ कहा जाता है, अर्थात् वे वेदों के अध्ययन को सरल और व्यवस्थित बनाने वाले उपकरण हैं, लेकिन वे स्वयं वेद नहीं हैं। वेदांग की कुल छह शाखाएँ मानी जाती हैं — शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष। इनमें शिक्षा में उच्चारण का ज्ञान, कल्प में वैदिक कर्मकांडों की विधि, व्याकरण में भाषा के नियम, निरुक्त में शब्दों की व्युत्पत्ति, छंद में वैदिक मंत्रों के छंदों का अध्ययन तथा ज्योतिष में यज्ञों के लिए शुभ समय और तिथि का निर्धारण बताया गया है। प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर यह प्रश्न पूछा जाता है कि वेदांग को वैदिक साहित्य में शामिल किया जाता है या नहीं, इसलिए इस तथ्य को स्पष्ट रूप से याद रखना महत्वपूर्ण है।
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प्रश्न 4. बोगाजकोई अभिलेख में ‘नासत्य’ देवता की पहचान किससे की गई है?
(A) इंद्र से
(B) वरुण से
(C) अश्विन से
(D) मित्र से
✅ उत्तर: (C) अश्विन से
बोगाजकोई अभिलेख में ‘नासत्य’ देवता की पहचान ‘अश्विन’ से की गई है। अश्विन कुमार वैदिक काल के प्रसिद्ध जुड़वाँ देवता माने जाते हैं जो मुख्य रूप से चिकित्सा, सौंदर्य और प्रातःकाल से संबंधित हैं। वैदिक साहित्य में अश्विन देवताओं को रोगों को दूर करने वाले और मनुष्यों की सहायता करने वाले देवताओं के रूप में वर्णित किया गया है। बोगाजकोई अभिलेख लगभग 1400 ईसा पूर्व का माना जाता है और यह एशिया माइनर (आधुनिक तुर्की) से प्राप्त हुआ था। इस अभिलेख में हित्ती और मितन्त्री राजाओं के बीच हुई एक संधि का उल्लेख मिलता है, जिसमें इंद्र, मित्र, वरुण और नासत्य जैसे वैदिक देवताओं को साक्षी के रूप में स्वीकार किया गया था। यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह प्रमाणित होता है कि वैदिक देवताओं की पूजा भारत के बाहर भी होती थी। इसलिए इतिहासकार इसे पश्चिम एशिया में आर्यों की उपस्थिति का सबसे प्राचीन लिखित प्रमाण मानते हैं।
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प्रश्न 5. ‘कल्प’ वेदांग में किसका अध्ययन किया जाता है?
(A) मंत्रों के उच्चारण का
(B) वैदिक कर्मकांडों का
(C) शब्दों की व्युत्पत्ति का
(D) ग्रहों और नक्षत्रों का
✅ उत्तर: (B) वैदिक कर्मकांडों का
कल्प वेदांग में मुख्य रूप से वैदिक कर्मकांडों तथा यज्ञों से संबंधित विधियों का अध्ययन किया जाता है। इसे ‘वेद का हाथ’ कहा जाता है, क्योंकि जैसे हाथ किसी कार्य को संपन्न करने में सहायक होते हैं, उसी प्रकार कल्प वेदांग वेदों में वर्णित यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों को व्यवहार में करने की विधि बताता है। कल्प को सामान्यतः तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है — श्रौत सूत्र, गृह्य सूत्र और धर्म सूत्र। श्रौत सूत्र में बड़े सार्वजनिक यज्ञों जैसे अश्वमेध, राजसूय और सोमयाग आदि की विस्तृत विधियाँ बताई गई हैं। गृह्य सूत्र में गृहस्थ जीवन से जुड़े संस्कारों जैसे जन्म, नामकरण, उपनयन, विवाह और अंत्येष्टि की विधि का वर्णन मिलता है। वहीं धर्म सूत्र में सामाजिक और धार्मिक नियमों, आचार-व्यवहार तथा वर्णाश्रम व्यवस्था से संबंधित सिद्धांतों का उल्लेख किया गया है। श्रौत सूत्र का एक महत्वपूर्ण भाग ‘शुल्व सूत्र’ है, जिसमें यज्ञवेदी निर्माण के लिए आवश्यक ज्यामितीय सिद्धांतों का वर्णन मिलता है और इसे प्राचीन भारतीय ज्यामिति का महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाता है।
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प्रश्न 6. आर्यों के मूल निवास स्थान के संबंध में जर्मनी से संबंधित विद्वान कौन थे?
(A) मैक्समूलर
(B) पी. गाईल्स
(C) नेहरिंग
(D) बाल गंगाधर तिलक
✅ उत्तर: (A) मैक्समूलर
जर्मनी के प्रसिद्ध विद्वान मैक्समूलर (Max Müller) ने आर्यों के मूल निवास स्थान के संबंध में ‘मध्य एशिया सिद्धांत’ प्रस्तुत किया। उनके अनुसार आर्य मूल रूप से मध्य एशिया क्षेत्र के निवासी थे और वहीं से वे विभिन्न दिशाओं में फैलकर भारत सहित अन्य क्षेत्रों में पहुँचे। मैक्समूलर ने वेदों और प्राचीन भारतीय साहित्य का गहन अध्ययन किया और उनका अंग्रेजी में अनुवाद भी किया, जिससे पश्चिमी देशों में भारतीय संस्कृति और वैदिक साहित्य के अध्ययन को बढ़ावा मिला। उन्होंने प्रसिद्ध ग्रंथ श्रृंखला ‘Sacred Books of the East’ का संपादन भी किया, जिसमें अनेक भारतीय और एशियाई धार्मिक ग्रंथों का अनुवाद प्रकाशित किया गया। आर्यों के मूल निवास स्थान के विषय में अन्य विद्वानों ने भी अलग-अलग मत प्रस्तुत किए हैं। उदाहरण के लिए पी. गाईल्स ने जर्मनी को तथा नेहरिंग ने ऑस्ट्रिया/हंगरी को आर्यों का मूल स्थान बताया। हालांकि अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार मध्य एशिया सिद्धांत को अपेक्षाकृत अधिक मान्यता प्राप्त है।
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प्रश्न 7. ‘शिक्षा’ वेदांग में किसका अध्ययन किया जाता है?
(A) यज्ञ विधि का
(B) मंत्रों के उच्चारण का
(C) शब्दों की व्युत्पत्ति का
(D) ज्योतिष गणना का
✅ उत्तर: (B) मंत्रों के उच्चारण का
‘शिक्षा’ वेदांग का वह महत्वपूर्ण अंग है जिसमें वैदिक मंत्रों के सही उच्चारण से संबंधित नियमों और सिद्धांतों का अध्ययन किया जाता है। वैदिक काल में मंत्रों का शुद्ध और स्पष्ट उच्चारण अत्यंत आवश्यक माना जाता था, क्योंकि यह विश्वास था कि यदि मंत्रों का उच्चारण गलत हो जाए तो यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठान निष्फल हो सकते हैं। इसी कारण शिक्षा वेदांग को ‘वेद का नाक’ कहा गया है, क्योंकि जैसे नाक ध्वनि के उच्चारण और स्वर को प्रभावित करती है, उसी प्रकार शिक्षा वेदांग मंत्रों के शुद्ध उच्चारण की विधि बताता है। यह विषय मुख्य रूप से Phonetics (स्वनविज्ञान) से संबंधित है, जिसमें ध्वनियों के उच्चारण, स्वर, मात्रा और उच्चारण की शुद्धता का अध्ययन किया जाता है। इस क्षेत्र का एक प्रमुख और प्रसिद्ध ग्रंथ ‘पाणिनीय शिक्षा’ है, जिसमें वैदिक ध्वनियों और उनके सही उच्चारण के नियमों का विस्तार से वर्णन किया गया है।
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प्रश्न 8. सुश्रुत आदि आयुर्वेद ग्रंथों के अनुसार आयुर्वेद किस वेद का उपवेद है?
(A) ऋग्वेद
(B) सामवेद
(C) यजुर्वेद
(D) अथर्ववेद
✅ उत्तर: (D) अथर्ववेद
आयुर्वेद किस वेद का उपवेद है, यह विद्वानों के बीच विवाद का विषय रहा है। विभिन्न ग्रंथों में इस विषय पर अलग-अलग मत प्रस्तुत किए गए हैं। ‘चरणव्यूह’ नामक ग्रंथ के अनुसार आयुर्वेद को ऋग्वेद का उपवेद माना गया है। वहीं दूसरी ओर सुश्रुत संहिता जैसे प्रमुख आयुर्वेदिक ग्रंथों के अनुसार आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपवेद माना जाता है। चरक ने भी अपने ग्रंथ में उल्लेख किया है कि एक योग्य चिकित्सक को चारों वेदों का ज्ञान होना चाहिए, किंतु उसे विशेष रूप से अथर्ववेद के प्रति अधिक श्रद्धा रखनी चाहिए, क्योंकि इसमें औषधि, रोग और उपचार से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण संदर्भ मिलते हैं। इसी कारण अधिकांश विद्वान आयुर्वेद को अथर्ववेद से अधिक संबंधित मानते हैं। हालांकि प्रतियोगी परीक्षाओं, विशेषकर UPSC में, इस विषय से जुड़े दोनों मत पूछे जा सकते हैं, इसलिए दोनों दृष्टिकोणों को जानना महत्वपूर्ण है।
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प्रश्न 9. चरक के अनुसार चिकित्सक चारों वेदों में किसके प्रति अधिक भक्ति प्रकट करेगा?
(A) ऋग्वेद
(B) सामवेद
(C) यजुर्वेद
(D) अथर्ववेद
✅ उत्तर: (D) अथर्ववेद
महान आयुर्वेदाचार्य चरक ने अपने ग्रंथ में उल्लेख किया है कि यदि कोई व्यक्ति यह प्रश्न करे कि चारों वेदों में से किस वेद के आधार पर आयुर्वेद के विद्वान अपने उपदेश देते हैं, तो एक चिकित्सक को विशेष रूप से अथर्ववेद के प्रति अधिक भक्ति प्रकट करनी चाहिए। इसका प्रमुख कारण यह है कि अथर्ववेद में रोग, औषधि, उपचार पद्धति और जड़ी-बूटियों से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण संदर्भ मिलते हैं। इस वेद में प्राकृतिक औषधियों, वनस्पतियों तथा रोग निवारण की विधियों का विस्तृत वर्णन मिलता है, जो प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति के विकास में अत्यंत सहायक रहा। इसी कारण अधिकांश विद्वान आयुर्वेद को अथर्ववेद से निकटता से संबंधित मानते हैं। इस दृष्टिकोण से यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में चिकित्सा विज्ञान और वैदिक ज्ञान का गहरा संबंध था तथा आयुर्वेद का आधार मुख्य रूप से अथर्ववेद की परंपरा से जुड़ा हुआ माना जाता है।
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प्रश्न 10. दाशराज्ञ युद्ध (दस राजाओं का युद्ध) किस नदी के तट पर हुआ था?
(A) सरस्वती नदी
(B) सिंधु नदी
(C) परुष्णी (रावी) नदी
(D) यमुना नदी
✅ उत्तर: (C) परुष्णी (रावी) नदी
ऋग्वेद के सप्तम मण्डल में वर्णित प्रसिद्ध ‘दाशराज्ञ युद्ध’ ऋग्वैदिक काल की एक अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना मानी जाती है। यह युद्ध परुष्णी नदी के तट पर हुआ था, जिसे वर्तमान समय में रावी नदी के नाम से जाना जाता है। इस युद्ध में भरत वंश के राजा सुदास ने अपने विरोध में खड़े दस राजाओं के शक्तिशाली गठबंधन को पराजित किया था। इस संघर्ष में सुदास के प्रमुख सहयोगी और मार्गदर्शक उनके पुरोहित वशिष्ठ थे, जिन्होंने अपनी रणनीति और वैदिक ज्ञान से सुदास का मार्गदर्शन किया। इस युद्ध का उल्लेख ऋग्वेद में विस्तार से मिलता है और इसे ऋग्वैदिक काल की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना माना जाता है। इतिहास और वैदिक अध्ययन की दृष्टि से यह घटना अत्यंत महत्वपूर्ण है तथा प्रतियोगी परीक्षाओं, विशेष रूप से UPSC में इससे संबंधित तथ्य अक्सर पूछे जाते हैं।
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प्रश्न 11. दाशराज्ञ युद्ध में कौन विजयी हुआ था?
(A) दस राजाओं का गठबंधन
(B) भरत राजा सुदास
(C) मितन्त्री राजा
(D) हित्ती राजा
✅ उत्तर: (B) भरत राजा सुदास
‘दाशराज्ञ युद्ध’ ऋग्वैदिक काल की एक अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना थी, जिसमें भरत वंश के राजा सुदास ने निर्णायक विजय प्राप्त की। इस युद्ध में सुदास के प्रमुख मार्गदर्शक और पुरोहित ऋषि वशिष्ठ थे, जिन्होंने अपने ज्ञान और रणनीति से उनका मार्गदर्शन किया। सुदास के विरुद्ध दस राजाओं का एक शक्तिशाली गठबंधन बना था, जिसमें पुरु, यदु, तुर्वश, अनु और द्रुह्यु जैसी प्रमुख जनजातियाँ शामिल थीं, जबकि भरत जनजाति सुदास के पक्ष में थी। यह युद्ध परुष्णी नदी (आधुनिक रावी) के तट पर लड़ा गया था। इस संघर्ष में सुदास की विजय के परिणामस्वरूप भरत जनजाति का प्रभुत्व स्थापित हुआ और उनका प्रभाव क्षेत्र में अत्यधिक बढ़ गया। कई इतिहासकारों का मत है कि आगे चलकर भारतवर्ष का नाम भी इसी ‘भरत’ जनजाति से संबंधित माना जाने लगा। इसलिए यह युद्ध वैदिक इतिहास में विशेष महत्व रखता है।
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प्रश्न 12. ‘गृह्य सूत्र’ में किसका विवरण है?
(A) बड़े यज्ञों की विधि
(B) सामाजिक-धार्मिक नियम
(C) घरेलू संस्कारों जैसे विवाह, उपनयन की विधि
(D) ज्यामितीय गणनाएँ
✅ उत्तर: (C) घरेलू संस्कारों जैसे विवाह, उपनयन की विधि
‘गृह्य सूत्र’ कल्प वेदांग का दूसरा महत्वपूर्ण भाग है, जिसमें गृहस्थ जीवन से संबंधित संस्कारों और धार्मिक विधियों का विस्तार से वर्णन किया गया है। इन ग्रंथों में मनुष्य के जीवन से जुड़े विभिन्न संस्कारों की विधि और नियम बताए गए हैं। विशेष रूप से इसमें जन्म, नामकरण, उपनयन, विवाह और अंत्येष्टि जैसे प्रमुख संस्कारों का उल्लेख मिलता है। वैदिक परंपरा के अनुसार मनुष्य के जीवन में कुल 16 संस्कार माने गए हैं और इन संस्कारों को करने की विधि गृह्य सूत्रों में वर्णित है। इन ग्रंथों के माध्यम से हमें प्राचीन भारतीय समाज की पारिवारिक परंपराओं, धार्मिक आचारों और सामाजिक जीवन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। इसलिए इतिहास और संस्कृति के अध्ययन की दृष्टि से गृह्य सूत्र अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत माने जाते हैं। इसी कारण इन्हें उचित रूप से ‘गृहस्थ जीवन की संहिता’ भी कहा जा सकता है।
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प्रश्न 13. ‘धर्म सूत्र’ में किसका विवरण है?
(A) बड़े यज्ञों की विधि
(B) सामाजिक और धार्मिक नियम
(C) मंत्रों के उच्चारण के नियम
(D) ज्योतिष गणना
✅ उत्तर: (B) सामाजिक और धार्मिक नियम
‘धर्म सूत्र’ कल्प वेदांग का तीसरा महत्वपूर्ण भाग है, जिसमें सामाजिक, नैतिक और धार्मिक नियमों का विस्तृत वर्णन किया गया है। इन ग्रंथों में प्राचीन भारतीय समाज की व्यवस्था को व्यवस्थित रखने के लिए विभिन्न प्रकार के नियम निर्धारित किए गए थे। विशेष रूप से इसमें वर्णाश्रम धर्म, राजधर्म, आचार-व्यवहार और सामाजिक कर्तव्यों से संबंधित सिद्धांतों का उल्लेख मिलता है। धर्म सूत्रों के माध्यम से यह बताया गया है कि समाज के विभिन्न वर्गों तथा जीवन के विभिन्न आश्रमों में व्यक्तियों को किस प्रकार आचरण करना चाहिए। समय के साथ यही धर्म सूत्र आगे चलकर स्मृति साहित्य के रूप में विकसित हुए। मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति जैसे प्रसिद्ध ग्रंथ इसी परंपरा की विकसित कड़ियाँ माने जाते हैं। इस प्रकार धर्म सूत्र प्राचीन भारत के विधि-विज्ञान और सामाजिक व्यवस्था की आधारशिला के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
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प्रश्न 14. ‘श्रौत सूत्र’ में किसका विवरण है?
(A) घरेलू संस्कारों की विधि
(B) बड़े सार्वजनिक यज्ञों की विधि
(C) सामाजिक नियमों का विवरण
(D) शब्द व्युत्पत्ति
✅ उत्तर: (B) बड़े सार्वजनिक यज्ञों की विधि
‘श्रौत सूत्र’ कल्प वेदांग का पहला और अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है, जिसमें बड़े सार्वजनिक वैदिक यज्ञों की विधियों और नियमों का विस्तार से वर्णन किया गया है। इन ग्रंथों में अश्वमेध, राजसूय, वाजपेय और सोमयाग जैसे प्रमुख वैदिक यज्ञों को संपन्न करने की प्रक्रिया, अनुष्ठान और संबंधित नियमों का विस्तृत विवरण मिलता है। ‘श्रौत’ शब्द की उत्पत्ति ‘श्रुति’ से हुई है, जिसका अर्थ है वेदों पर आधारित ज्ञान। इसलिए श्रौत सूत्र उन धार्मिक अनुष्ठानों और यज्ञों का वर्णन करते हैं जो सीधे वेदों की परंपरा से जुड़े हुए हैं। श्रौत सूत्र का एक महत्वपूर्ण भाग ‘शुल्व सूत्र’ भी है, जिसमें यज्ञवेदी के निर्माण की ज्यामितीय विधियों का उल्लेख मिलता है। इन ग्रंथों में प्राचीन भारतीयों के गणित और ज्यामिति ज्ञान के प्रारंभिक प्रमाण भी प्राप्त होते हैं। इस प्रकार श्रौत सूत्र वैदिक धार्मिक परंपराओं और वैज्ञानिक ज्ञान दोनों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
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प्रश्न 15. आर्यों का मूल निवास स्थान ‘जर्मनी’ किस विद्वान ने बताया?
(A) मैक्समूलर
(B) पैका
(C) नेहरिंग
(D) पी. गाईल्स
✅ उत्तर: (B) पैका
विद्वान पैका ने आर्यों का मूल निवास स्थान ‘जर्मनी’ बताया। आर्यों के उत्पत्ति स्थल को लेकर विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग मत व्यक्त किए हैं। उदाहरण के लिए, पी. गाईल्स और नेहरिंग ने ऑस्ट्रिया/हंगरी को आर्यों का मूल स्थान माना, जबकि बाल गंगाधर तिलक ने इसे आर्कटिक क्षेत्र से जोड़कर देखा। स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्यों का मूल स्थान तिब्बत माना, और प्रसिद्ध जर्मन विद्वान मैक्समूलर ने इसे मध्य एशिया बताया। विभिन्न मतों के बावजूद, इतिहासकारों और विद्वानों के बीच यह सर्वाधिक स्वीकार्य है कि मैक्समूलर का मध्य एशिया सिद्धांत अधिक मान्यता प्राप्त है। इस प्रकार, आर्यों के मूल निवास स्थान के विषय में विद्वानों के मत भिन्न हो सकते हैं, लेकिन अधिकांश अनुसंधानों के अनुसार मध्य एशिया ही सबसे यथार्थवादी और प्रमाणिक क्षेत्र माना जाता है।
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प्रश्न 16. आर्यों का मूल निवास स्थान ‘ऑस्ट्रिया/हंगरी’ किस विद्वान ने बताया?
(A) पैका
(B) मैक्समूलर
(C) बाल गंगाधर तिलक
(D) पी. गाईल्स व नेहरिंग
✅ उत्तर: (D) पी. गाईल्स व नेहरिंग
विद्वान पी. गाईल्स और नेहरिंग ने आर्यों का मूल निवास स्थान ‘ऑस्ट्रिया/हंगरी’ बताया। आर्यों के उद्गम और उनके मूल निवास को लेकर यूरोपीय और भारतीय विद्वानों में लंबे समय तक मतभेद बना रहा है। अधिकांश यूरोपीय विद्वान मानते हैं कि आर्य यूरेशिया क्षेत्र से आए। वहीं, भारतीय विद्वान और ऐतिहासिक ग्रंथों में इसके संबंध विभिन्न क्षेत्रों से जोड़े गए हैं। आधुनिक अनुसंधान में, आनुवंशिक (Genetic) और पुरातात्विक (Archaeological) प्रमाण के आधार पर यह पाया गया है कि मध्य एशिया, विशेषकर पोंटिक स्टेपी क्षेत्र, आर्यों के मूल निवास स्थान के रूप में सबसे अधिक समर्थन प्राप्त करता है। इस दृष्टिकोण से यह स्पष्ट होता है कि आर्यों का प्रवास और उनकी संस्कृति यूरोपीय और एशियाई क्षेत्रों के संपर्क से विकसित हुई थी। इस प्रकार, विद्वानों के मत भले भिन्न हों, लेकिन वर्तमान शोध मध्य एशिया सिद्धांत को सर्वाधिक प्रमाणिक मानता है।
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प्रश्न 17. बोगाजकोई अभिलेख लगभग किस काल का है?
(A) 2500 ई.पू.
(B) 1400 ई.पू.
(C) 600 ई.पू.
(D) 300 ई.पू.
✅ उत्तर: (B) 1400 ई.पू.
बोगाजकोई अभिलेख लगभग 1400 ई.पू. का प्राचीन दस्तावेज़ है, जो एशिया माइनर (आधुनिक तुर्की) से प्राप्त हुआ। इस अभिलेख में हित्ती और मितन्त्री राजाओं के बीच हुए संधि समझौते का विवरण मिलता है। इस संधि में विशेष रूप से वैदिक देवताओं — इंद्र, मित्र, वरुण और नासत्य को साक्षी बनाया गया, जो उस समय की धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं का प्रमाण है। नासत्य देवता की पहचान यहाँ अश्विन कुमार से की गई है। यह अभिलेख इस बात का स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत करता है कि आर्यों और वैदिक देवताओं की उपस्थिति सिर्फ भारत तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह पश्चिम एशिया में भी प्राचीन काल से विद्यमान थी। इस प्रकार बोगाजकोई अभिलेख वैदिक संस्कृति के विस्तार और आर्यों की वैश्विक उपस्थिति को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत है। इसे प्राचीन भारत और पड़ोसी क्षेत्रों की सामाजिक-सांस्कृतिक समझ का प्रमुख साक्ष्य माना जाता है।
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प्रश्न 18. वेदांग में ‘ज्योतिष’ का मुख्य प्रयोजन क्या था?
(A) भविष्यफल बताना
(B) यज्ञों के लिए शुभ मुहूर्त और तिथि निर्धारण करना
(C) कृषि की जानकारी देना
(D) समुद्री यात्रा में मार्गदर्शन
✅ उत्तर: (B) यज्ञों के लिए शुभ मुहूर्त और तिथि निर्धारण करना
वेदांग में ‘ज्योतिष’ का प्रमुख उद्देश्य यज्ञों और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए उचित समय, तिथि और शुभ मुहूर्त का निर्धारण करना था। इसी कारण इसे ‘वेद की आँख’ कहा गया है, क्योंकि जैसे आँखें व्यक्ति को सही मार्ग दिखाती हैं, उसी प्रकार ज्योतिष सही समय पर यज्ञ कार्य संपन्न करने में मार्गदर्शन करती थी। वेदांग ज्योतिष न केवल धार्मिक अनुष्ठानों के लिए उपयोगी था, बल्कि इसे भारतीय खगोलशास्त्र (Astronomy) का प्राचीनतम ग्रंथ भी माना जाता है। इसमें ग्रहों, नक्षत्रों और अन्य खगोलीय पिंडों की गणनाएँ शामिल थीं, जो यज्ञ और सामाजिक कार्यक्रमों के समय निर्धारण में सहायक थीं। इस प्रकार वेदांग ज्योतिष प्राचीन भारत की वैज्ञानिक परंपरा और धार्मिक प्रथाओं का एक अनिवार्य हिस्सा था, जो समाज और धार्मिक जीवन दोनों के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था।
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प्रश्न 19. ‘व्याकरण’ वेदांग का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ कौन सा है और इसके रचयिता कौन हैं?
(A) निरुक्त — यास्क
(B) अष्टाध्यायी — पाणिनि
(C) महाभाष्य — पतंजलि
(D) छंदसूत्र — पिंगल
✅ उत्तर: (B) अष्टाध्यायी — पाणिनि
व्याकरण वेदांग का सर्वश्रेष्ठ और सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ ‘अष्टाध्यायी’ है, जिसके रचयिता महान वैयाकरण पाणिनि हैं। इस ग्रंथ में कुल 8 अध्याय और लगभग 4000 सूत्र शामिल हैं, जो संस्कृत भाषा के नियम और संरचना को स्पष्ट और व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करते हैं। अष्टाध्यायी को संसार का पहला व्यवस्थित व्याकरण ग्रंथ माना जाता है, और इसी कारण पाणिनि को ‘व्याकरण का जनक’ कहा गया है। इसके माध्यम से न केवल भाषा सीखने वालों को नियम स्पष्ट रूप से मिलते हैं, बल्कि यह वैदिक और प्राचीन साहित्य के अध्ययन के लिए भी आधार प्रदान करता है। बाद में महान विद्वान पतंजलि ने इस पर ‘महाभाष्य’ रचा, जिसमें अष्टाध्यायी के सूत्रों की व्याख्या और विस्तृत विवरण दिया गया। इस प्रकार अष्टाध्यायी और महाभाष्य मिलकर व्याकरण और भाषा विज्ञान के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान करते हैं।
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प्रश्न 20. शुल्व सूत्र में किस यूनानी प्रमेय का उल्लेख भारत में पहले मिलता है?
(A) यूक्लिड प्रमेय
(B) पाइथागोरस प्रमेय
(C) आर्किमिडीज प्रमेय
(D) थेल्स प्रमेय
✅ उत्तर: (B) पाइथागोरस प्रमेय
शुल्व सूत्र में पाइथागोरस प्रमेय का उल्लेख मिलता है, जो कहता है कि समकोण त्रिभुज में कर्ण का वर्ग = अन्य दो भुजाओं के वर्गों का योग। इसे यूनानी गणितज्ञ पाइथागोरस (570-495 ई.पू.) से पहले का माना जाता है। विशेष रूप से बौधायन शुल्व सूत्र में इस प्रमेय का स्पष्ट वर्णन मिलता है, जिससे यह प्रमाणित होता है कि प्राचीन भारत में गणित और ज्यामिति का उन्नत स्तर था। शुल्व सूत्र केवल यज्ञवेदी निर्माण के लिए ही नहीं, बल्कि भौतिक और गणितीय ज्ञान के लिए भी महत्वपूर्ण था। इस तथ्य को UPSC और SSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछा जाता है। इसलिए यह सूत्र भारतीय गणित की प्राचीनता और वैज्ञानिक सोच का एक महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाता है।
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प्रश्न 21. ऋग्वेद के ‘नदी सूक्त’ में आर्थिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण नदी कौन सी मानी गई है?
(A) गंगा
(B) यमुना
(C) सिंधु
(D) सरस्वती
✅ उत्तर: (C) सिंधु
ऋग्वेद के ‘नदी सूक्त’ में सिंधु नदी को आर्थिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है। इसे विशेष सम्मान देते हुए ‘हिरण्याणि’ कहा गया है, जिसका अर्थ है — सोने जैसी बहुमूल्य नदी। सिंधु नदी ऋग्वैदिक आर्यों के व्यापार, कृषि और दैनिक जीवन का मुख्य आधार थी। इसका उल्लेख ऋग्वेद में अन्य नदियों की तुलना में सबसे अधिक बार किया गया है। सिंधु नदी का यह महत्व केवल प्राकृतिक संसाधनों तक सीमित नहीं था, बल्कि यह संस्कृति, व्यापारिक मार्ग और राजनीतिक संगठन के लिए भी केंद्रीय रही। इतिहासकारों के अनुसार, भारत का नाम ‘India’ इसी सिंधु (Indus) नदी से पड़ा। इस प्रकार, सिंधु नदी प्राचीन भारत की आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी और ऋग्वैदिक समाज के लिए इसका स्थान विशेष था।
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प्रश्न 22. सिंधु नदी को ऋग्वेद में किस नाम से पुकारा गया है?
(A) ‘पुण्यसलिला’
(B) ‘हिरण्याणि’
(C) ‘सुरसरि’
(D) ‘महानदी’
✅ उत्तर: (B) ‘हिरण्याणि’
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ऋग्वेद में सिंधु नदी को ‘हिरण्याणि’ कहा गया है, जिसका अर्थ है — सोने जैसी अमूल्य। यह विशेष नाम इस नदी की आर्थिक और सांस्कृतिक महत्ता को दर्शाता है। सिंधु नदी के तट पर ही ऋग्वैदिक आर्यों की मुख्य बस्तियाँ स्थापित थीं, जो कृषि, व्यापार और सामाजिक जीवन के लिए केंद्रीय स्थल थीं। इस नदी का व्यापार, कृषि और परिवहन में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान था। इसी कारण इसे ऋग्वेद में ‘नदियों की माँ’ के समान सम्मान दिया गया। सिंधु नदी केवल जल स्रोत नहीं थी, बल्कि यह सामाजिक संगठन, धार्मिक अनुष्ठान और सांस्कृतिक गतिविधियों का आधार भी थी। इस प्रकार, सिंधु नदी प्राचीन भारतीय सभ्यता की आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी और वैदिक समाज में इसकी महत्ता अनिवार्य मानी जाती थी।
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प्रश्न 23. सिंधु नदी की पश्चिमी सहायक नदियों में अफगानिस्तान में बहने वाली कुभा नदी को आधुनिक काल में किस नाम से जाना जाता है?
(A) झेलम
(B) रावी
(C) काबुल
(D) चिनाव
✅ उत्तर: (C) काबुल
ऋग्वेद में उल्लिखित ‘कुभा’ नदी को आधुनिक काल में ‘काबुल नदी’ के नाम से जाना जाता है। यह सिंधु नदी की पश्चिमी सहायक नदी है, जो मुख्यतः अफगानिस्तान के क्षेत्र में बहती है। ऋग्वेद में अफगानिस्तान की इन नदियों का उल्लेख यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित करता है कि ऋग्वैदिक आर्यों का विस्तार अफगानिस्तान के पूर्वी भाग तक हुआ था। यह भौगोलिक जानकारी न केवल प्राचीन भारत की सीमाओं और आर्यों के विस्तार को समझने में मदद करती है, बल्कि UPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में भी महत्वपूर्ण तथ्य के रूप में उपयोगी मानी जाती है। इस प्रकार, कुब्हा/काबुल नदी प्राचीन आर्य समाज और वैदिक सभ्यता के अध्ययन में केंद्रीय भूमिका निभाती है और इसे वैदिक इतिहास के भूगोल का एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।
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प्रश्न 24. ऋग्वेद में ‘क्रुमु’ नदी को आधुनिक काल में किस नाम से जाना जाता है?
(A) काबुल
(B) कुर्रम
(C) गोमल
(D) स्वात
✅ उत्तर: (B) कुर्रम
ऋग्वेद में उल्लिखित ‘क्रुमु’ नदी को आधुनिक काल में ‘कुर्रम नदी’ के नाम से जाना जाता है। यह नदी भी अफगानिस्तान और पाकिस्तान में सिंधु नदी की पश्चिमी सहायक नदी है। ऋग्वेद में अफगानिस्तान की इन प्रमुख नदियों — कुभा (काबुल), क्रुमु (कुर्रम), गोमती (गोमल) और सुवास्तु (स्वात) — का उल्लेख किया गया है। इन नदियों के माध्यम से हम ऋग्वैदिक आर्यों के भौगोलिक विस्तार और उनके बसने के क्षेत्रों को समझ सकते हैं। यह जानकारी न केवल प्राचीन वैदिक सभ्यता के भूगोल का प्रमाण है, बल्कि UPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में वैदिक और आधुनिक नदी नामों का मिलान पूछे जाने पर भी अत्यंत उपयोगी होती है। इस प्रकार, कुर्रम नदी और अन्य पश्चिमी सहायक नदियाँ प्राचीन भारत और उसके पड़ोसी क्षेत्रों के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
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प्रश्न 25. ऋग्वेद में ‘गोमती’ नदी को आधुनिक काल में किस नाम से जाना जाता है?
(A) कुर्रम
(B) काबुल
(C) गोमल
(D) स्वात
✅ उत्तर: (C) गोमल
ऋग्वेद में उल्लिखित ‘गोमती’ नदी को आधुनिक काल में ‘गोमल नदी’ के नाम से जाना जाता है। यह भी सिंधु नदी की पश्चिमी सहायक नदी है, जो मुख्यतः अफगानिस्तान और पाकिस्तान में बहती है। ध्यान देने योग्य है कि यह नदी उत्तर प्रदेश की ‘गोमती’ नदी से पूरी तरह भिन्न है। ऋग्वेद में अफगानिस्तान की इन नदियों — कुभा (काबुल), क्रुमु (कुर्रम), गोमती (गोमल), सुवास्तु (स्वात) — का उल्लेख यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित करता है कि ऋग्वैदिक आर्यों का पश्चिमी विस्तार अफगानिस्तान तक हुआ था। यह भौगोलिक जानकारी न केवल वैदिक सभ्यता के अध्ययन में उपयोगी है, बल्कि UPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में भी महत्वपूर्ण तथ्य के रूप में पूछी जाती है। इस प्रकार, गोमल नदी प्राचीन आर्य समाज और वैदिक सभ्यता के भौगोलिक और सांस्कृतिक अध्ययन में एक महत्वपूर्ण स्रोत मानी जाती है।
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