
भारत का प्राचीन व्यापारिक इतिहास
भारत का विदेशी देशों के साथ व्यापारिक जुड़ाव बहुत प्राचीन समय से चला आ रहा था। यूरोपीय कंपनियों के आने से पहले भी भारतीय व्यापारी एशिया और अन्य क्षेत्रों के देशों के साथ सक्रिय रूप से व्यापार करते थे। उस समय स्थिति यह थी कि एशियाई व्यापार पर अरब व्यापारियों का प्रभुत्व था, जबकि यूरोप के साथ होने वाले व्यापार में इटली के नगरों का नियंत्रण था।
यह व्यापार बेहद लाभदायक था, जिसके कारण इटली की आर्थिक स्थिति लगातार मजबूत होती गई। इस समृद्धि को देखकर उभरते हुए यूरोपीय राष्ट्र भी इस व्यापार में अपनी हिस्सेदारी चाहते थे। लेकिन उनके सामने एक बड़ी समस्या थी—वे पुराने समुद्री मार्गों का आसानी से उपयोग नहीं कर सकते थे।
एक ओर, पारंपरिक व्यापार मार्गों पर इटली का वर्चस्व था, जिससे अन्य यूरोपीय देशों के लिए प्रवेश कठिन था। दूसरी ओर, 1453 ई. में कुस्तुनतुनिया पर ऑटोमन तुर्कों के कब्जे के बाद इन मार्गों पर उनका नियंत्रण स्थापित हो गया, जिससे व्यापार और भी बाधित हो गया।
इन्हीं परिस्थितियों ने यूरोपीय देशों को नए समुद्री रास्तों की खोज के लिए प्रेरित किया। इस दिशा में सबसे पहले कदम स्पेन और पुर्तगाल जैसे देशों ने उठाए, जिन्होंने नए मार्गों की तलाश में समुद्री अभियानों को प्रोत्साहन दिया।
यूरोप में मसालों की मांग इसलिए थी क्योंकि जाड़े की ऋतु में मांस को सुरक्षित रखने तथा शराब को उष्ण पेय बनाने के लिए मसाले अनिवार्य थे। भारतीय उत्पादों में मसाला यूरोपीय देशों की सर्वाधिक मांग की वस्तु थी।
ब्रह्म समाज: भारतीय सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलन
पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में जो यूरोपीय कंपनियाँ भारत आईं, उनका क्रम इस प्रकार था:
| क्रम | कंपनी | वर्ष |
|---|---|---|
| 1 | पुर्तगाली | 1498 ई. |
| 2 | डच (हॉलैंड) | 1602 ई. |
| 3 | अंग्रेज़ | 1600 ई. (भारत में 1608) |
| 4 | डेनिस (डेनमार्क) | 1616 ई. |
| 5 | फ्रांसीसी | 1664 ई. |
पुर्तगाली — भारत आने वाले प्रथम यूरोपीय
पुर्तगाली राजकुमार डॉन हेनरिक को सामुद्रिक अभियानों में अत्यधिक अभिरुचि थी, इसी कारण उन्हें ‘हेनरी द नेविगेटर’ कहा गया। उन्होंने दिक्सूचक यंत्र (कुतुबनुमा/Compass) तथा नक्षत्र यंत्र (एस्ट्रोलैब/Astrolabe) के आधार पर गणनाएँ करके समुद्री यात्राओं के लिए विशेष तालिकाएँ एवं सारणियाँ बनवाईं। इन्हीं की प्रेरणा से पुर्तगाल ने सामुद्रिक अन्वेषण की राह पकड़ी।
1487 ई. में पुर्तगाली नाविक बार्थोलोम्यो डियाज ने अफ्रीका के दक्षिण में स्थित ‘उत्तमाशा अन्तरीप’ (Cape of Good Hope) तक की यात्रा की। वह यहीं से वापस पुर्तगाल लौट गया और भारत नहीं पहुँच सका।
1492 ई. में एक महत्वपूर्ण समुद्री यात्रा ने विश्व इतिहास की दिशा बदल दी। इटली के निवासी कोलम्बस ने भारत पहुँचने के उद्देश्य से पश्चिम दिशा में समुद्री मार्ग खोजने की शुरुआत की। इस अभियान को स्पेन की महारानी इसाबेला का समर्थन प्राप्त था, इसलिए उसे अक्सर स्पेन का कोलम्बस कहा जाता है।
हालाँकि उसकी योजना भारत पहुँचने की थी, लेकिन वह गलती से उत्तर अमेरिका के निकट स्थित वेस्टइंडीज द्वीप समूह पहुँच गया। इसी घटना को बाद में अमेरिका की खोज (1492 ई.) के रूप में जाना गया।
दिलचस्प बात यह है कि भले ही खोज का श्रेय कोलम्बस को दिया जाता है, लेकिन इस नए महाद्वीप का नाम ‘अमेरिका’ प्रसिद्ध नाविक अमेरिगो वेस्पुसी के नाम पर पड़ा।
1498 ई. में भारत के साथ सीधे समुद्री संपर्क स्थापित होना विश्व इतिहास की एक निर्णायक घटना साबित हुई। पुर्तगाल के नाविक वास्कोडिगामा ने 1497 ई. में लिस्बन से भारत की खोज के उद्देश्य से अपनी यात्रा शुरू की।
लंबी समुद्री यात्रा के बाद, वह उत्तमाशा अन्तरीप (Cape of Good Hope) होते हुए 17 मई, 1498 ई. को केरल के मालाबार तट पर स्थित कालीकट बंदरगाह पहुँचा। उस समय वहाँ का शासक जमोरिन था, जो हिंदू शासक थे।
कालीकट में पहले से व्यापार कर रहे अरब व्यापारियों ने पुर्तगालियों का कड़ा विरोध किया, लेकिन कुछ ही समय में पुर्तगालियों ने उन्हें व्यापार से हटा दिया और अपनी पकड़ मजबूत कर ली।
इस यात्रा का सबसे बड़ा महत्व यह था कि भारत तक पहुँचने का एक नया समुद्री मार्ग खोजा गया, जिसने आगे चलकर यूरोपीय शक्तियों के भारत आगमन और व्यापारिक विस्तार का रास्ता खोल दिया।
पैड्रो अल्वरेज कैब्रल (1500 ई.)
भारत में पुर्तगालियों की मौजूदगी धीरे-धीरे मजबूत होती गई और इसमें कई समुद्री यात्राओं की अहम भूमिका रही। 13 सितंबर, 1500 ई. को पैड्रो अल्वरेज कैब्रल भारत पहुँचा, जो वास्कोडिगामा के बाद आने वाला दूसरा पुर्तगाली नाविक था। उसका आगमन भारत में पुर्तगाली व्यापार के विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।
इसके बाद 1502 ई. में वास्कोडिगामा दूसरी बार भारत आया। इस बार उसका उद्देश्य सिर्फ खोज नहीं, बल्कि काली मिर्च और अन्य मसालों के व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करना था। इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए 1503 ई. में कोचीन में पुर्तगालियों की पहली फैक्ट्री (कोठी) स्थापित की गई, जो भारत में उनके स्थायी व्यापार की शुरुआत थी। इसके बाद कन्नानोर में दूसरी फैक्ट्री भी स्थापित हुई।
वास्कोडिगामा का भारत से संबंध यहीं खत्म नहीं हुआ। वह 1524 ई. में तीसरी बार भारत आया, लेकिन इस बार उसका जीवन अंत की ओर था और अंततः 1527 ई. में कोचीन में उसकी मृत्यु हो गई।
इन घटनाओं ने मिलकर भारत में पुर्तगालियों के मजबूत व्यापारिक आधार और आगे चलकर उनके राजनीतिक प्रभाव की नींव रखी।
फ्रांसिस्को डि अल्मीडा (1505-1509 ई.)
भारत में पुर्तगाली सत्ता की संगठित शुरुआत फ्रांसिस्को डि अल्मीडा के साथ हुई, जिन्हें भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का प्रथम गवर्नर माना जाता है। उन्होंने 1505 से 1509 ई. तक शासन किया और इसी दौरान पुर्तगालियों की समुद्री शक्ति को मजबूत आधार दिया।
अल्मीडा की सबसे महत्वपूर्ण देन थी ‘नीले पानी की नीति’ (Blue Water Policy), जिसका उद्देश्य समुद्र पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करना था, न कि स्थलीय क्षेत्रों पर विस्तार करना। इसी रणनीति के कारण पुर्तगालियों ने समुद्री व्यापार मार्गों पर अपना प्रभुत्व जमाया।
उस समय भारत में पुर्तगालियों के इस समुद्री साम्राज्य को ‘एस्टाडो-द-इण्डिया’ (Estado de India) के नाम से जाना जाता था, जो उनके संगठित और शक्तिशाली व्यापारिक नेटवर्क को दर्शाता है।
अल्बुकर्क (1509-1515 ई.)
भारत में पुर्तगाली सत्ता को वास्तविक मजबूती 1509 ई. में अल्बुकर्क के आगमन के बाद मिली। इसी कारण उसे “भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक” कहा जाता है। शुरुआत में उसने कोचीन को अपना मुख्यालय बनाया, लेकिन उसकी नीतियाँ विस्तार और सुदृढ़ीकरण दोनों पर केंद्रित थीं।
अल्बुकर्क की सबसे बड़ी उपलब्धि थी नवंबर 1510 ई. में गोवा पर अधिकार, जिसे उसने बीजापुर के शासक युसूफ आदिलशाह से छीन लिया। आगे चलकर 1530 ई. में गोवा को पुर्तगालियों का मुख्य केंद्र बना दिया गया, जिससे उनकी शक्ति और भी मजबूत हो गई।
उस समय दक्षिण भारत में विजयनगर साम्राज्य के महान शासक कृष्णदेवराय (1509–1529 ई.) का शासन था। अल्बुकर्क के उनके साथ अच्छे संबंध थे, और कृष्णदेवराय ने उसे भटकल में किला बनाने की अनुमति भी दी थी। इसी काल में पुर्तगाली यात्री डोमिंगो पायस ने कृष्णदेवराय की प्रशंसा की, जो उस समय के वैभव को दर्शाता है।
अल्बुकर्क ने केवल राजनीतिक ही नहीं, सामाजिक स्तर पर भी बदलाव की कोशिश की। उसने पुर्तगालियों को भारतीय महिलाओं से विवाह करने के लिए प्रेरित किया, ताकि उनका सामाजिक आधार भारत में मजबूत हो सके। साथ ही, उसने सती प्रथा को रोकने का प्रयास भी किया।
अंततः 1515 ई. में अल्बुकर्क की मृत्यु गोवा में हुई, और वहीं उसे दफनाया गया। उसके कार्यों ने भारत में पुर्तगाली साम्राज्य की मजबूत नींव रखी, जो आगे कई वर्षों तक कायम रही।
पुर्तगालियों की देन
पुर्तगालियों ने भारत को अनेक महत्वपूर्ण चीज़ें दीं जो आज भारतीय जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं:
तकनीकी योगदान:
भारत में पुर्तगालियों का प्रभाव केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने कई नए बदलावों की शुरुआत भी की। उन्होंने सबसे पहले भारत में प्रिंटिंग प्रेस का उपयोग शुरू किया, जिससे ज्ञान के प्रसार का एक नया माध्यम विकसित हुआ।
सैन्य क्षेत्र में भी उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा—दक्षिण भारत में पहली बार गोला-बारूद का उपयोग किया गया और भारतीय सैनिकों को अपनी सेना में शामिल कर उन्हें आधुनिक तरीके से प्रशिक्षित किया गया।
आर्थिक और तकनीकी क्षेत्र में उन्होंने भारत में जहाज़ निर्माण उद्योग की शुरुआत की, जिससे समुद्री गतिविधियों को बढ़ावा मिला। साथ ही, कला और वास्तुकला में भी उनका प्रभाव दिखा, क्योंकि गोथिक स्थापत्य शैली का भारत में प्रचलन उन्हीं के माध्यम से हुआ।
इन सभी परिवर्तनों ने भारतीय समाज, सेना और तकनीक पर गहरा प्रभाव डाला।
कृषि एवं फसल योगदान:
भारत में पुर्तगालियों के आगमन के साथ कृषि और खान-पान में भी बड़े बदलाव देखने को मिले। मुगल सम्राट जहाँगीर के समय में भारत में तम्बाकू की खेती की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर व्यापक रूप से फैल गई।
पुर्तगालियों ने कई नई फसलें भारत में परिचित कराईं। इनमें आलू, लाल मिर्च और तम्बाकू प्रमुख थे, जो आज भारतीय भोजन का अहम हिस्सा बन चुके हैं। इसके अलावा मूँगफली, मकई, टमाटर, शकरकंद और रबर प्लांट जैसी फसलें भी ब्राज़ील से भारत लाई गईं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि इन सभी नई फसलों की खेती भारत में सोलहवीं सदी के दौरान शुरू हुई, जिसने भारतीय कृषि और खान-पान की परंपराओं को स्थायी रूप से बदल दिया।
फलों का योगदान:
चीकू, काजू, अमरूद, अनानास (पाईनएप्पल), शरीफा — ये सभी फल पुर्तगालियों के द्वारा भारत लाए गए।
डच ईस्ट इंडिया कंपनी
‘डच’ शब्द हॉलैंड (नीदरलैंड) के निवासियों के लिए प्रयोग किया जाता है, जिनकी राजधानी एमस्टर्डम और मुद्रा गिल्डर थी। समुद्री व्यापार में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए उन्होंने 1602 ई. में डच ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की, जिसे डच पार्लियामेंट (स्टोटेन जनरल) द्वारा 21 वर्षों के लिए पूर्वी देशों के साथ व्यापार का एकाधिकार दिया गया। इस कंपनी की आरंभिक पूंजी 65 लाख गिल्डर थी, जो उस समय के हिसाब से बहुत बड़ी मानी जाती है।
भारत में डचों की व्यापारिक गतिविधियाँ तेजी से बढ़ीं। उन्होंने 1605 ई. में मसूलीपट्टनम (कोरोमंडल तट) पर अपनी पहली फैक्ट्री स्थापित की और बाद में पेटापोली (निजामपट्टनम) में दूसरी कोठी बनाई। आगे बढ़ते हुए उन्होंने 1610 ई. में पुलीकट में फैक्ट्री स्थापित की, जो उनका मुख्य केंद्र (हेडक्वार्टर) बना। यहीं उनका प्रसिद्ध ‘गेल्ड्रिया का किला’ भी स्थित था।
डचों ने बंगाल के चिनसुरा को अपना प्रमुख केंद्र बनाया और सूरत व कालीकट जैसे महत्वपूर्ण व्यापारिक स्थानों पर भी अपना प्रभाव स्थापित किया।
हालाँकि, भारत में उनका प्रभुत्व अधिक समय तक नहीं टिक सका। 1759 ई. के वेदरा (बंगाल) के युद्ध में कर्नल फोर्ड के नेतृत्व में अंग्रेजों ने डचों को निर्णायक रूप से हरा दिया, जिसके बाद भारत में डच शक्ति का पतन लगभग निश्चित हो गया।
इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी
यह कंपनी अन्य यूरोपीय कंपनियों की तुलना में सबसे अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुई और अंततः मुगलों के उत्तराधिकारी के रूप में भारत में स्थापित होने में सफल रही।
कंपनी की स्थापना
भारत में अंग्रेजों के आगमन की कहानी भी धीरे-धीरे विकसित हुई। सबसे पहले 1599 ई. में जान मिल्डेन हॉल स्थल मार्ग से भारत पहुँचने वाला पहला अंग्रेज़ माना जाता है, जिसने व्यापारिक संभावनाओं को समझने का प्रयास किया।
इसके बाद एक निर्णायक कदम 31 दिसंबर, 1600 ई. को उठाया गया, जब ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम ने एक शाही फरमान (Royal Charter) जारी कर पूर्वी देशों के साथ व्यापार के लिए एक संयुक्त पूंजी कंपनी (Joint Stock Company) को 15 वर्षों का एकाधिकार प्रदान किया। इसी के साथ इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई, जिसने आगे चलकर भारत के इतिहास में बड़ी भूमिका निभाई।
बाद में स्टुअर्ट वंश के राजा जेम्स प्रथम (1603–1625 ई.) ने इस व्यापारिक एकाधिकार को अनिश्चित काल के लिए बढ़ा दिया, जिससे कंपनी की शक्ति और प्रभाव लगातार बढ़ता गया।
विलियम हॉकिन्स (1608 ई.)
भारत में अंग्रेजों की स्थिति धीरे-धीरे मजबूत होती गई और इसमें शुरुआती यात्राओं की अहम भूमिका रही। 1608 ई. में विलियम हॉकिन्स ‘हेक्टर’ नामक जहाज़ का कप्तान बनकर सूरत बंदरगाह पर पहुँचा। इसके बाद वह आगरा जाकर मुगल सम्राट जहाँगीर से मिला और सूरत में फैक्ट्री स्थापित करने की अनुमति माँगी।
हॉकिन्स की एक खास बात यह थी कि उसने तुर्की भाषा में जहाँगीर से बातचीत की, जिससे सम्राट उस पर काफी प्रभावित हुआ। परिणामस्वरूप जहाँगीर ने उसे 400 का मनसब और ‘खान’ की उपाधि दी, साथ ही आगरा में बसने की अनुमति भी प्रदान की।
इसी प्रक्रिया के तहत अंग्रेजों ने अपने व्यापारिक केंद्र स्थापित करने शुरू किए। 1611 ई. में मसूलीपट्टनम (आंध्रप्रदेश) में पहली अंग्रेज़ी फैक्ट्री स्थापित हुई, जबकि 1613 ई. में सूरत में फैक्ट्री बनाई गई, जो पश्चिमी भारत की पहली और पूरे भारत की दूसरी फैक्ट्री थी।
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सर टामस रो (1615 ई.)
अंग्रेजों की भारत में स्थिति को मजबूत करने में कूटनीति ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी क्रम में 1615 ई. में सर टामस रो, ब्रिटिश सम्राट जेम्स प्रथम के दूत के रूप में सूरत बंदरगाह पर पहुँचा।
इसके बाद वह अजमेर जाकर मुगल सम्राट जहाँगीर से मिला और मुगल दरबार में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। वह लगभग 3 वर्षों तक मुगल दरबार में इंग्लैंड के राजदूत के रूप में रहा, जिससे उसे दरबार की कार्यप्रणाली और राजनीति को समझने का अवसर मिला।
अपने इस कार्यकाल के दौरान उसने ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए कई महत्वपूर्ण व्यापारिक रियायतें हासिल कीं, जिसने भारत में अंग्रेजों के व्यापारिक विस्तार को एक मजबूत आधार प्रदान किया।
पूर्वी तट पर विस्तार
भारत में अंग्रेजों का विस्तार धीरे-धीरे पूरे तटवर्ती क्षेत्रों तक फैलने लगा। इसी क्रम में 1633 ई. में पूर्वी तट पर पहला अंग्रेज़ी कारखाना बालासोर और हरिहरपुर (उड़ीसा) में स्थापित किया गया, जिससे पूर्वी भारत में उनके व्यापार की शुरुआत हुई।
इसके बाद एक महत्वपूर्ण घटना 1639 ई. में हुई, जब फ्रांसिस डे नामक अंग्रेज़ अधिकारी ने चन्द्रगिरि के राजा से मद्रास को पट्टे पर प्राप्त किया। यहाँ अंग्रेजों ने ‘फोर्ट सेंट जॉर्ज’ नामक किला बनवाया, जो आगे चलकर कोरोमंडल तट पर दक्षिण भारत में अंग्रेजों का मुख्य केंद्र (हेडक्वार्टर) बन गया।
इन कदमों ने दक्षिण और पूर्वी भारत में अंग्रेजों की स्थिति को और अधिक मजबूत कर दिया।
बंबई का अधिग्रहण
भारत में अंग्रेजों की शक्ति बढ़ाने में बंबई (मुंबई) का अधिग्रहण एक बेहद महत्वपूर्ण घटना थी। 1661 ई. में एक संधि के तहत इंग्लैंड के युवराज चार्ल्स द्वितीय का विवाह पुर्तगाल की राजकुमारी कैथेरीन ब्रगेन्जा से हुआ, और इस अवसर पर बंबई का बंदरगाह दहेज के रूप में इंग्लैंड को मिला।
इसके बाद 1668 ई. में चार्ल्स द्वितीय ने बंबई को ईस्ट इंडिया कंपनी को मात्र 10 पाउंड वार्षिक किराए पर दे दिया, जो एक अत्यंत लाभदायक सौदा साबित हुआ।
इसी के परिणामस्वरूप आगे चलकर ‘बंबई प्रेसिडेंसी’ का उद्भव हुआ, जिसने पश्चिमी भारत में अंग्रेजों के प्रशासनिक और व्यापारिक विस्तार को नई दिशा दी।
कलकत्ता की स्थापना
बंगाल में अंग्रेजों की मजबूत पकड़ एक महत्वपूर्ण समझौते के साथ शुरू हुई। 1698 ई. में बंगाल के सूबेदार अजीम-उस-शान ने सुतानाती, कालिकाता और गोविंदपुर नामक तीन गाँवों की ज़मींदारी ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दी। इसके बदले कंपनी को पुराने ज़मींदार इब्राहिम खान को 1200 रुपये वार्षिक देना तय हुआ।
इन तीनों गाँवों को मिलाकर आगे चलकर आधुनिक कलकत्ता (कोलकाता) शहर बसाया गया, जो अंग्रेजों का एक प्रमुख केंद्र बना। यहाँ अंग्रेजों ने 1699 ई. में ‘फोर्ट विलियम’ नामक किले की स्थापना की, जो उनकी शक्ति का प्रतीक बना।
बाद में 1700 ई. में फोर्ट विलियम को ईस्ट इंडिया कंपनी का मुख्यालय घोषित किया गया, जिससे बंगाल में अंग्रेजों का प्रशासनिक और व्यापारिक नियंत्रण और मजबूत हो गया। इस किले का नाम ब्रिटेन के सम्राट विलियम तृतीय के नाम पर रखा गया था।
जान सुरमन का मिशन — फर्रुखसियर का फरमान (1717 ई.)
अंग्रेजों की शक्ति को बंगाल में निर्णायक बढ़त 1717 ई. के फर्रुखसियर के फरमान से मिली। इस दिशा में जॉन सुरमन के नेतृत्व में एक अंग्रेज़ प्रतिनिधि मंडल मुगल दरबार पहुँचा, जिसमें एडवर्ड स्टीफेंसन, ख्वाजा सेहुर्द (अर्मेनियाई दुभाषिया) और सर्जन डॉक्टर जॉर्ज हैमिल्टन शामिल थे।
उस समय मुगल सम्राट फर्रुखसियर एक गंभीर फोड़े से पीड़ित था, जिसका हैमिल्टन ने सफलतापूर्वक इलाज किया। इससे प्रसन्न होकर सम्राट ने 1717 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी के पक्ष में एक महत्वपूर्ण फरमान जारी किया।
इस फरमान को इतिहासकार ऑर्म्स ने “कंपनी के इतिहास का मैग्नाकार्टा” कहा, क्योंकि इसके तहत कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा में मात्र 3000 रुपये वार्षिक के बदले करमुक्त व्यापार का अधिकार मिल गया। इस सुविधा को ‘दस्तक’ (Free Pass) कहा जाता था।
हालाँकि, यही विशेषाधिकार आगे चलकर बंगाल के नवाबों और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच संघर्ष का मुख्य कारण बना, जिसने भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी।
डेनिस ईस्ट इंडिया कंपनी
भारत में यूरोपीय कंपनियों की दौड़ में डेनमार्क भी शामिल था, लेकिन उसका प्रभाव सीमित ही रहा। 1616 ई. में डेनमार्क की ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य भारत के साथ व्यापार करना था।
भारत में उन्होंने 1620 ई. में तंजौर जिले के ट्रैंक्वेबार में अपनी पहली फैक्ट्री स्थापित की। इसके बाद उन्होंने बंगाल के सेरमपुर (श्रीरामपुर) में दूसरी फैक्ट्री बनाई, जो आगे चलकर उनका मुख्य केंद्र बना।
हालाँकि, व्यापार के क्षेत्र में यह कंपनी अधिक सफलता प्राप्त नहीं कर सकी और धीरे-धीरे ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार तक सीमित होकर रह गई। अंततः 1745 ई. में इस कंपनी ने अपनी सभी फैक्ट्रियाँ ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को बेच दीं, जिससे भारत में उसका अस्तित्व लगभग समाप्त हो गया।
फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी
भारत में आने वाली यूरोपीय शक्तियों में फ्रांसीसी कंपनी सबसे अंत में पहुँची, लेकिन उसने जल्दी ही अपने व्यापारिक केंद्र स्थापित कर लिए। 1664 ई. में फ्रांस के सम्राट लुई चौदहवें के मंत्री कोल्बर्ट ने फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की, जो एक सरकारी कंपनी थी, जबकि अंग्रेज़ों की कंपनी निजी थी।
भारत में फ्रांसीसियों ने अपने व्यापार की शुरुआत 1668 ई. में सूरत में पहली फैक्ट्री स्थापित करके की, जिसे फ्रांसिस कैरों ने स्थापित किया। इसके बाद 1669 ई. में मसूलीपट्टनम में दूसरी कोठी बनाई गई, जिसका श्रेय मरकारा को दिया जाता है।
बंगाल में फ्रांसीसियों की स्थिति मजबूत करने का श्रेय 1690–92 ई. में फ्रैंको मार्टिन द्वारा बसाए गए चन्द्रनगर को जाता है, जो उनका मुख्य केंद्र बन गया। वहीं दक्षिण भारत में पुदुचेरी (पांडिचेरी) फ्रांसीसियों का प्रमुख केंद्र रहा।
इस प्रकार फ्रांसीसियों ने भारत में अपने व्यापारिक नेटवर्क का विस्तार किया और अंग्रेज़ों के साथ प्रतिस्पर्धा की मजबूत नींव रखी।
आंग्ल-फ्रांसीसी संघर्ष — कर्नाटक के युद्ध
भारत में प्रभुत्व की स्थापना को लेकर अंग्रेज़ और फ्रांसीसी कंपनियों के बीच दक्षिण भारत के कार्नेटिक क्षेत्र में तीन युद्ध हुए, जिन्हें ‘कर्नाटक/कार्नेटिक युद्ध’ कहा गया।
प्रथम कर्नाटक युद्ध (1746-48 ई.)
यह युद्ध वास्तव में भारत तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका संबंध यूरोप के ‘आस्ट्रिया के उत्तराधिकार युद्ध’ से था, जिसका प्रभाव भारत में भी दिखाई दिया। उस समय भारत में फ्रांसीसी शक्ति का नेतृत्व गवर्नर डूप्ले के हाथों में था, जिसने अपनी रणनीति से फ्रांसीसियों को मजबूत स्थिति में ला दिया।
युद्ध का तात्कालिक कारण बना जब ब्रिटिश एडमिरल बार्नेट ने फ्रांसीसी जहाज़ों को पकड़ लिया, जिससे दोनों शक्तियों के बीच संघर्ष तेज हो गया। इस पूरे संघर्ष में फ्रांसीसियों का पलड़ा भारी रहा, और उन्होंने अपनी सैन्य क्षमता का प्रभावी प्रदर्शन किया।
इसी युद्ध का एक महत्वपूर्ण भाग था ‘सेंट टोमे (अड्यार का युद्ध)’, जिसमें महफूज खाँ (कर्नाटक नवाब अनवरुद्दीन की सेना) और कैप्टन पैराडाइज (फ्रांसीसी सेना) आमने-सामने हुए। इस लड़ाई में फ्रांसीसी सेना विजयी रही, जिससे उनकी प्रतिष्ठा और बढ़ गई।
अंततः यह संघर्ष 1748 ई. में ‘एक्शं-लॉ-शॉपेल की संधि’ के साथ समाप्त हुआ, जिसने अस्थायी रूप से अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों के बीच शांति स्थापित कर दी।
द्वितीय कर्नाटक युद्ध (1749-54 ई.)
यह संघर्ष भारत में अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा का परिणाम था, जिसका मुख्य कारण हैदराबाद और कर्नाटक में उत्तराधिकार के विवादों में दोनों कंपनियों का हस्तक्षेप था। हैदराबाद में नासिर जंग और मुजफ्फर जंग, जबकि कर्नाटक में अनवरुद्दीन और चांदा साहब के बीच संघर्ष चल रहा था।
इस स्थिति में डूप्ले ने मुजफ्फर जंग और चांदा साहब का समर्थन किया, जबकि अंग्रेजों की ओर से रॉबर्ट क्लाइव ने नासिर जंग और अनवरुद्दीन का पक्ष लिया।
इस संघर्ष का पहला बड़ा परिणाम 3 अगस्त, 1749 ई. का ‘आम्बूर का युद्ध’ था, जिसमें डूप्ले की सेना ने अनवरुद्दीन को पराजित कर दिया और वह युद्ध में मारा गया। इसके बाद चांदा साहब कर्नाटक का नवाब बना, जबकि अनवरुद्दीन का पुत्र मुहम्मद अली त्रिचरापल्ली भाग गया।
स्थिति तब बदली जब 1751 ई. में ‘अर्काट का प्रसिद्ध घेरा’ हुआ। मुहम्मद अली के भागने के बाद रॉबर्ट क्लाइव ने अर्काट पर कब्जा कर लिया, जिससे फ्रांसीसियों की स्थिति कमजोर हो गई। यह घटना इतनी निर्णायक थी कि डूप्ले का प्रभाव समाप्त हो गया, और उसे फ्रांस वापस बुला लिया गया। उसकी जगह गोडेहू को भारत भेजा गया।
अंततः यह संघर्ष दिसंबर 1754 ई. में ‘पांडिचेरी की संधि’ के साथ समाप्त हुआ, जिसने अस्थायी रूप से अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों के बीच संतुलन स्थापित किया।
तृतीय कर्नाटक युद्ध (1758-63 ई.)
यह संघर्ष केवल भारत तक सीमित नहीं था, बल्कि यूरोप में चल रहे ‘सप्तवर्षीय युद्ध (1756–1763 ई.)’ का ही विस्तार था। इस वैश्विक युद्ध में फ्रांस ने आस्ट्रिया का साथ दिया, जबकि इंग्लैंड ने प्रशा का समर्थन किया, जिसका प्रभाव भारत में भी स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
भारत में इस युद्ध का सबसे निर्णायक मोड़ 1760 ई. का ‘वांडीवाश का युद्ध’ था, जिसमें अंग्रेज़ों ने फ्रांसीसी सेना को बुरी तरह पराजित कर दिया। इस हार के बाद भारत में फ्रांसीसियों का प्रभाव लगभग समाप्त हो गया।
अंततः 1763 ई. में ‘पेरिस की संधि’ के तहत यूरोप का सप्तवर्षीय युद्ध और भारत का तीसरा आंग्ल-फ्रांसीसी युद्ध एक साथ समाप्त हुए। इसके परिणामस्वरूप भारत में अंग्रेज़ों की एकछत्र सर्वोच्चता स्थापित हो गई, जिसने आगे चलकर उनके साम्राज्य के विस्तार का रास्ता पूरी तरह साफ कर दिया।
तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध 1817–1818: कारण, घटनाक्रम और परिणाम
यूरोपीय कंपनियों की पहली भारतीय फैक्ट्री
| कंपनी | पहली फैक्ट्री | स्थान | वर्ष |
|---|---|---|---|
| पुर्तगाली | कोचीन | केरल | 1503 ई. |
| डच | मसूलीपट्टनम | आंध्र प्रदेश | 1605 ई. |
| अंग्रेज़ | मसूलीपट्टनम | आंध्र प्रदेश | 1611 ई. |
| डेनिस | ट्रैंक्वेबार | तमिलनाडु | 1620 ई. |
| फ्रांसीसी | सूरत | गुजरात | 1668 ई. |
कंपनियों की स्थापना का वर्ष
| कंपनी | स्थापना वर्ष |
|---|---|
| डच ईस्ट इंडिया कंपनी | 1602 ई. |
| इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी | 1600 ई. |
| डेनिस ईस्ट इंडिया कंपनी | 1616 ई. |
| फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी | 1664 ई. |
प्रमुख व्यक्तित्व और उनका योगदान
| व्यक्ति | योगदान | वर्ष |
|---|---|---|
| हेनरी द नेविगेटर | सामुद्रिक अभियानों की प्रेरणा | 15वीं सदी |
| बार्थोलोम्यो डियाज | केप ऑफ गुड होप तक | 1487 ई. |
| कोलम्बस | वेस्टइंडीज / अमेरिका खोज | 1492 ई. |
| वास्कोडिगामा | भारत की खोज — कालीकट | 17 मई, 1498 ई. |
| पैड्रो कैब्रल | दूसरे पुर्तगाली — भारत | 1500 ई. |
| अल्मीडा | पहला पुर्तगाली गवर्नर | 1505-1509 ई. |
| अल्बुकर्क | दूसरा गवर्नर — वास्तविक संस्थापक | 1509-1515 ई. |
| जान मिल्डेन हॉल | स्थल मार्ग से भारत आने वाले पहले अंग्रेज़ | 1599 ई. |
| विलियम हॉकिन्स | हेक्टर जहाज़ — सूरत | 1608 ई. |
| सर टामस रो | ब्रिटिश राजदूत — जहाँगीर से मुलाकात | 1615 ई. |
| जॉन सुरमन | फर्रुखसियर का फरमान | 1717 ई. |
| फ्रांसिस डे | मद्रास / फोर्ट सेंट जार्ज | 1639 ई. |
| डूप्ले | फ्रांसीसी गवर्नर — कर्नाटक युद्ध | 1746-54 ई. |
| रॉबर्ट क्लाइव | अर्काट का घेरा | 1751 ई. |
| कर्नल फोर्ड | वेदरा युद्ध में डचों को हराया | 1759 ई. |
निष्कर्ष
पंद्रहवीं से अठारहवीं शताब्दी के बीच भारत में आने वाली यूरोपीय कंपनियों ने भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी। पुर्तगालियों ने जहाँ सामुद्रिक वर्चस्व की नीति अपनाई, वहीं डचों ने व्यापारिक प्रभुत्व की कोशिश की। अंग्रेज़ों ने राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने की दिशा में काम किया और फ्रांसीसियों से तीन बड़े युद्धों में विजय प्राप्त कर भारत पर अपना एकाधिकार स्थापित किया। वांडीवाश (1760) और पेरिस संधि (1763) के पश्चात भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव पूरी तरह मज़बूत हो गई।
यूरोपीय कंपनियों के आगमन का क्रम याद रखने के लिए — “पु-डु-अं-डे-फ्रा” पुर्तगाली → डुच → अंग्रेज़ → डेनिस → फ्रांसीसी
FAQs-
परीक्षा में पूछे गए महत्वपूर्ण प्रश्न
- भारत में समुद्री मार्ग की खोज किसने की थी ?
Ans. वास्कोडिगामा (1498 ई.) - वास्कोडिगामा भारत में कहाँ उतरा था?
Ans. कालीकट (17 मई, 1498 ई.) - ‘केप ऑफ गुड होप’ की खोज किसने की थी ?
Ans. बार्थोलोम्यो डियाज (1487 ई.) - अमेरिका का नाम किसके नाम पर पड़ा है ?
Ans. अमेरिगो वेस्पुसी - भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक कौन था?
Ans. अल्बुकर्क - ‘नीले पानी की नीति’ किसने चलाई थी ?
Ans. अल्मीडा - ‘एस्टाडो-द-इण्डिया’ क्या था?
Ans. पुर्तगालियों का सामुद्रिक साम्राज्य - भारत में प्रिंटिंग प्रेस सबसे पहले किसने लाया था ?
Ans. पुर्तगाली - इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना कब हुई थी ?
Ans. 31 दिसंबर, 1600 ई. - महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम ने कितने वर्षों के लिए एकाधिकार दिया था ?
Ans. 15 वर्ष (बाद में जेम्स प्रथम ने अनिश्चितकाल के लिए) - ‘हेक्टर’ जहाज़ पर भारत आने वाला अंग्रेज़ कौन था?
Ans. विलियम हॉकिन्स (1608 ई.) - फर्रुखसियर के फरमान को ‘मैग्नाकार्टा’ किसने कहा था ?
Ans. ऑर्म्स (1717 ई.) - ‘दस्तक’ क्या था?
Ans. करमुक्त व्यापार का पास (Free Pass) - कलकत्ता किन तीन गाँवों को मिलाकर बना था ?
Ans. सुतानाती, कालिकाता और गोविंदपुर - फोर्ट विलियम का नाम किस ब्रिटिश राजा के नाम पर रखा गया था ?
Ans. विलियम तृतीय - बंबई अंग्रेज़ों को दहेज में किसने दिया था ?
Ans. पुर्तगाल ने — स्पेन के माध्यम से — चार्ल्स द्वितीय की शादी पर - डच कंपनी को कितने वर्षों का एकाधिकार मिला था?
Ans. 21 वर्ष - डचों का ‘गेल्ड्रिया का किला’ कहाँ था?
Ans. पुलीकट (मद्रास) - वांडीवाश का युद्ध कब हुआ था ?
Ans. 1760 ई. (तृतीय कर्नाटक युद्ध के दौरान) - तीसरे कर्नाटक युद्ध का अंत किस संधि से हुआ था ?
Ans. पेरिस की संधि (1763 ई.) - पुर्तगालियों ने गोवा किससे छीना था ?
Ans. बीजापुर के शासक युसूफ आदिलशाह से (1510 ई.) - अर्काट का घेरा किसने डाला था ?
Ans. रॉबर्ट क्लाइव (1751 ई.) - प्रथम कर्नाटक युद्ध किस संधि से समाप्त हुआ था ?
Ans. एक्शं-लॉ-शॉपेल की संधि (1748 ई.) - फ्रांसीसी कंपनी की स्थापना किसने की थी ?
Ans. कोल्बर्ट (लुई चौदहवें का मंत्री) — 1664 ई. - भारत में मूँगफली, काजू, अनानास किसने लाया?
Ans. पुर्तगाली
UPSC/UPPSC परीक्षाओ में पूछे जाने वाले संभावित प्रश्न
- भारत में यूरोपीय कंपनियों के आगमन के कारणों का विश्लेषण कीजिए।
- भारत में पुर्तगालियों के आगमन और उनके प्रभाव का विस्तृत वर्णन कीजिए।
- वास्कोडिगामा की भारत यात्रा के महत्व का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
- भारत में डच ईस्ट इंडिया कंपनी की गतिविधियों और उनके पतन के कारणों की विवेचना कीजिए।
- इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में आगमन और प्रारंभिक विस्तार का वर्णन कीजिए।
- फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी के उदय और भारत में उनके प्रभाव का मूल्यांकन कीजिए।
- भारत में अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों के बीच हुए कर्नाटक युद्धों के कारणों और परिणामों का विश्लेषण कीजिए।
- भारत में यूरोपीय कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा ने भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित किया? स्पष्ट कीजिए।
- भारत में यूरोपीय शक्तियों के आगमन के दीर्घकालिक प्रभावों का मूल्यांकन कीजिए।
- भारत में यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों के आगमन से उपनिवेशवाद की नींव कैसे पड़ी? समझाइए।