
1. प्रस्तावना (Introduction)
भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना की प्रक्रिया में आंग्ल–मराठा युद्धों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठा संघ के बीच तीन प्रमुख युद्ध हुए — प्रथम (1775–1782), द्वितीय (1803–1805) और तृतीय (1817–1819)। इन युद्धों की परिणति ने भारत के राजनीतिक भूगोल को पूर्णतः बदल दिया।
तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध (1817–1819) न केवल मराठा शक्ति का अंतिम अध्याय था, बल्कि यह ब्रिटिश सर्वोच्चता (Paramountcy) की औपचारिक स्थापना का भी प्रतीक बना। इस युद्ध के पश्चात संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में कोई भी शक्ति ब्रिटिश कंपनी को प्रत्यक्ष चुनौती देने में सक्षम नहीं रही।
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2. युद्ध की पृष्ठभूमि (Background)
द्वितीय आंग्ल–मराठा युद्ध के बाद की स्थिति
द्वितीय आंग्ल–मराठा युद्ध (1803–1805) में मराठों की पराजय के पश्चात मराठा संघ अत्यंत दुर्बल हो गया था। सुर्जी अर्जुनगाँव की संधि (1803) और देवगाँव की संधि (1803) के द्वारा सिंधिया और भोसले को भारी क्षेत्रीय एवं आर्थिक हानि उठानी पड़ी थी। बाजीराव द्वितीय ने बेसिन की संधि (1802) के तहत अपनी स्वतंत्रता व्यावहारिक रूप से ब्रिटिश कंपनी को सौंप दी थी।
मराठा शक्ति का पतन और आंतरिक संघर्ष
मराठा संघ में परस्पर ईर्ष्या और सत्ता संघर्ष व्याप्त था, जिसके कारण पेशवा, सिंधिया, होल्कर और भोसले — ये चारों प्रमुख शक्तियाँ कभी एकजुट होकर नहीं लड़ सकीं। बाजीराव द्वितीय अदूरदर्शी, कायर और स्वार्थी शासक था, जो कभी ब्रिटिश समर्थन लेता, तो कभी उनके विरुद्ध षड्यंत्र रचता। परिणामस्वरूप, मराठा सरदारों के बीच गहरा आपसी अविश्वास उत्पन्न हो गया, जिसने उनकी सामूहिक शक्ति को पूरी तरह खोखला कर दिया।
ब्रिटिश विस्तारवादी नीति
लॉर्ड वेलेजली की सहायक संधि प्रणाली (Subsidiary Alliance) और लॉर्ड हेस्टिंग्स की “ब्रिटिश सर्वोच्चता” की नीति ने भारत में ब्रिटिश विस्तार को व्यवस्थित और संगठित रूप प्रदान किया। हेस्टिंग्स का स्पष्ट उद्देश्य था कि कोई भी भारतीय राज्य ब्रिटिश प्रभुसत्ता को चुनौती न दे सके, जिससे ब्रिटिश साम्राज्य की नींव और अधिक सुदृढ़ हो गई।
3. संघर्ष के प्रमुख पक्ष (Main Contenders)
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी इस युद्ध में सबसे संगठित और शक्तिशाली पक्ष के रूप में उभरी। इसके गवर्नर-जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स (1813–1823) थे, जिनके नेतृत्व में ब्रिटिश विस्तार नीति को व्यवस्थित रूप मिला। युद्ध में जनरल थॉमस हिसलोप, कर्नल बर और मैल्कम जैसे प्रमुख सेनापतियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ब्रिटिश सेना की सबसे बड़ी विशेषता थी उसकी अनुशासित संरचना, आधुनिक सैन्य तकनीक और श्रेष्ठ कूटनीति, जिसने उन्हें भारतीय शक्तियों पर निर्णायक बढ़त दिलाई।
मराठा संघ
मराठा संघ इस युद्ध में एक प्रमुख लेकिन आंतरिक रूप से कमजोर शक्ति के रूप में उपस्थित था। इसके अंतर्गत बाजीराव द्वितीय (पूना), दौलतराव सिंधिया (ग्वालियर), मल्हारराव होल्कर (इंदौर) और अप्पासाहेब भोसले (नागपुर) जैसे प्रमुख शासक शामिल थे।
हालाँकि इन शक्तियों के बीच एकता का अभाव, आपसी अविश्वास और स्वतंत्र नीतियाँ थीं, जिसके कारण मराठा संघ सामूहिक रूप से प्रभावी प्रतिरोध करने में असफल रहा।
4. युद्ध के कारण (Causes of the War)
राजनीतिक कारण
मराठा सरदार बेसिन की संधि और सहायक संधि की शर्तों से असंतुष्ट थे। ये संधियाँ उनकी स्वायत्तता का हनन करती थीं। पेशवा ब्रिटिश संरक्षण से मुक्त होकर पुनः स्वतंत्र सत्ता स्थापित करना चाहता था। नागपुर के भोसले और इंदौर के होल्कर भी ब्रिटिश नियंत्रण से तंग आ चुके थे।
आर्थिक कारण
सहायक संधि के अंतर्गत मराठा राज्यों को ब्रिटिश सेना के रखरखाव हेतु भारी रकम देनी पड़ती थी, जिससे उनकी अर्थव्यवस्था जर्जर हो गई थी। भूमि के बड़े भाग ब्रिटिश नियंत्रण में जाने से मराठा राजकोष रिक्त हो रहा था।
कूटनीतिक कारण
लॉर्ड हेस्टिंग्स ने पिंडारियों के विरुद्ध अभियान को बहाने के रूप में उपयोग किया और मराठा राज्यों की सीमाओं में प्रवेश किया। मराठा सरदारों ने इसे अपनी संप्रभुता पर आक्रमण माना। पेशवा ने चुपचाप एक सैन्य गठबंधन बनाने का प्रयास किया, जिसे ब्रिटिशों ने विद्रोह के रूप में देखा।
पिंडारियों का प्रश्न
पिंडारी अर्धसैनिक लुटेरे थे जो मध्य भारत में व्यापक लूटपाट करते थे। इनके प्रमुख नेता थे — चीतू, वासिल मुहम्मद और करीम खाँ। मराठा सरदार इन्हें संरक्षण देते थे और कई बार इनका उपयोग अपने शत्रुओं के विरुद्ध करते थे। ब्रिटिशों ने पिंडारियों के दमन को आधार बनाकर सम्पूर्ण मध्य भारत में सैन्य उपस्थिति बढ़ाई।
5. युद्ध से पूर्व की घटनाएँ (Pre-War Developments)
1816–1817 में लॉर्ड हेस्टिंग्स ने पिंडारियों के विरुद्ध उत्तर और दक्षिण—दोनों दिशाओं से घेराबंदी की विशाल योजना बनाई, जिसके तहत लगभग 1,13,000 सैनिकों की दो बड़ी सेनाएँ तैनात की गईं। इसी दौरान ग्वालियर की संधि (नवंबर 1817) के अंतर्गत दौलतराव सिंधिया ने ब्रिटिशों का साथ देने और तटस्थ रहने का वचन दिया, जिससे मराठों की एकता और कमजोर हो गई।
इसके बाद पूना की संधि (जून 1817) में बाजीराव द्वितीय को अपमानजनक शर्तें स्वीकार करनी पड़ीं, जिसके तहत उसे मराठा संघ पर अपना नेतृत्व छोड़ना पड़ा—यही घटना आगे चलकर उसके विद्रोह का कारण बनी। वहीं नागपुर संधि (मई 1816) के अंतर्गत अप्पासाहेब भोसले को भी ब्रिटिश शर्तों के सामने झुकना पड़ा।
इन परिस्थितियों में पेशवा ने गुप्त रूप से होल्कर और भोसले के साथ मिलकर ब्रिटिश विरोधी गठबंधन बनाने का प्रयास किया, लेकिन आपसी अविश्वास और कमजोर समन्वय के कारण यह गठबंधन प्रभावी रूप से उभर नहीं सका।
6. युद्ध का घटनाक्रम (Course of the War)
युद्ध का प्रारंभ (1817)
5 नवंबर 1817 को पेशवा बाजीराव द्वितीय ने कर्कई (खड़की) के निकट ब्रिटिश रेजिडेंट के बंगले पर आक्रमण करवाया। खड़की का युद्ध (5 नवंबर 1817) में ब्रिटिश सेना ने पेशवा की सेना को पराजित किया। पेशवा पूना छोड़कर भाग गया।
नागपुर का युद्ध (नवंबर 1817): अप्पासाहेब भोसले ने ब्रिटिश रेजिडेंट पर आक्रमण किया। सिताबर्डी के युद्ध (26–27 नवंबर 1817) में भोसले की सेना पराजित हुई।
कोरेगाँव का युद्ध (1 जनवरी 1818): यह युद्ध ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। पेशवा की विशाल सेना (लगभग 28,000) के सामने कैप्टन स्टॉन्टन के नेतृत्व में मात्र 500 ब्रिटिश सैनिक (जिनमें महार सैनिक बहुमत में थे) खड़े हुए। यह युद्ध अनिर्णायक रहा, परंतु ब्रिटिश प्रतिरोध की शक्ति का प्रदर्शन हुआ। यह स्थान आज भी महार रेजिमेंट के लिए गौरव का प्रतीक है।
असई का युद्ध द्वितीय युद्ध से संबंधित था, लेकिन तृतीय युद्ध में अष्टी का युद्ध (फरवरी 1818) निर्णायक रहा, जहाँ पेशवा की सेना पूर्णतः नष्ट हो गई।
निर्णायक संघर्ष और मराठों की हार
फरवरी–मार्च 1818 तक पेशवा भागता रहा। मालेगाँव और जावली में भी उसे पराजय मिली। अंततः 3 जून 1818 को पेशवा बाजीराव द्वितीय ने सर जॉन मैल्कम के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। उसे 8 लाख रुपये वार्षिक पेंशन देकर बिठूर (कानपुर के निकट) में भेज दिया गया, जहाँ वह 1853 तक जीवित रहा।
होल्कर के साथ मंदसौर की संधि (जनवरी 1818) हुई। भोसले नागपुर राज्य खो बैठे। सिंधिया तटस्थ रहे और इस प्रकार उनका राज्य अपेक्षाकृत सुरक्षित रहा।
7. प्रमुख व्यक्तित्व (Key Personalities)
बाजीराव द्वितीय (1775–1853)
मराठा इतिहास का सबसे विवादास्पद पेशवा। वह चालाक किंतु दीर्घदृष्टिहीन था। 1802 में ब्रिटिश शरण माँगना, 1817 में अचानक विद्रोह करना और फिर आत्मसमर्पण — यह उसके अस्थिर चरित्र का प्रमाण है। बिठूर में उसने नाना साहब (धोंडू पंत) को गोद लिया, जो बाद में 1857 के विद्रोह का नायक बना।
लॉर्ड हेस्टिंग्स (1813–1823)
ब्रिटिश भारत के सबसे सफल गवर्नर-जनरलों में से एक। उन्होंने पिंडारियों का दमन, नेपाल युद्ध (1814–16) और तृतीय मराठा युद्ध — तीनों में सफलता प्राप्त की। उनकी “ब्रिटिश सर्वोच्चता” की नीति ने संपूर्ण भारत में कंपनी का एकाधिकार स्थापित किया।
अप्पासाहेब भोसले
नागपुर के शासक, जिन्होंने ब्रिटिश रेजिडेंट पर आक्रमण का साहस किया, परंतु पराजित हुए और अंततः देशनिकाला पाया।
मल्हारराव होल्कर
इंदौर के कमजोर शासक, जो अंततः ब्रिटिश शर्तों पर संधि करने को विवश हुए।
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8. मराठों की पराजय के कारण (Causes of Maratha Defeat)
मराठा संघ कभी एकजुट नहीं हो सका। सिंधिया तटस्थ रहे, होल्कर ने देर से प्रवेश किया और भोसले अकेले युद्ध करते रहे। पेशवा में नेतृत्व क्षमता का पूर्णतः अभाव था।
लॉर्ड हेस्टिंग्स ने “फूट डालो और जीतो” की नीति अत्यंत कुशलता से अपनाई। प्रत्येक मराठा शक्ति को अलग-अलग संधियों में बाँधकर उन्हें एकजुट होने से रोका गया।
मराठा सेना में आधुनिक तोपखाने और अनुशासन की कमी थी। युद्ध रणनीति पुरानी और असंगठित थी। ब्रिटिश सेना प्रशिक्षित, अनुशासित और आधुनिक हथियारों से लैस थी।
बाजीराव द्वितीय जैसे कायर और अदूरदर्शी नेता के नेतृत्व में कोई भी युद्ध नहीं जीता जा सकता था। कोई भी करिश्माई सैन्य नेतृत्व मराठों के पास नहीं था जो सभी सरदारों को एकसूत्र में बाँध सके।
लगातार युद्धों और ब्रिटिश संधियों की शर्तों ने मराठा राजकोष रिक्त कर दिया था। दीर्घकालीन युद्ध लड़ने की आर्थिक क्षमता नहीं थी।
9. युद्ध के परिणाम (Consequences)
राजनीतिक परिणाम
तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध के पश्चात राजनीतिक स्तर पर व्यापक परिवर्तन हुए, जिन्होंने भारत की सत्ता संरचना को पूरी तरह बदल दिया। पेशवाई का अंत कर दिया गया और बाजीराव द्वितीय का पद समाप्त कर पूना पर ब्रिटिश अधिकार स्थापित हो गया। इसके साथ ही मराठा संघ का औपचारिक विघटन हो गया, जिससे उनकी सामूहिक शक्ति समाप्त हो गई।
इसी क्रम में अप्पासाहेब भोसले का नागपुर राज्य ब्रिटिशों द्वारा छीन लिया गया, जबकि राजस्थान के राजपूत शासकों ने ब्रिटिश संरक्षण स्वीकार कर लिया, जिससे उनकी स्वतंत्र नीति समाप्त हो गई। इसके अतिरिक्त, सतारा क्षेत्र का पुनर्गठन कर प्रतापसिंह को छत्रपति के रूप में स्थापित किया गया, जो केवल प्रतीकात्मक शासक थे।
आर्थिक परिणाम
तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध के बाद आर्थिक स्तर पर भी व्यापक परिवर्तन हुए, जिनसे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को अत्यधिक लाभ प्राप्त हुआ। मराठों के नियंत्रण में रहे प्रमुख व्यापार मार्गों पर ब्रिटिश अधिकार स्थापित हो गया, जिससे उनके व्यापारिक हित और मजबूत हुए।
इसके साथ ही मध्य भारत और दक्कन का विशाल भू-क्षेत्र ब्रिटिश नियंत्रण में आ गया, जिससे उनकी आर्थिक शक्ति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। साथ ही, पिंडारियों के दमन से व्यापार मार्ग सुरक्षित हुए, जिसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश व्यापार को और अधिक स्थिरता एवं विस्तार मिला।
प्रशासनिक परिवर्तन
तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध के पश्चात प्रशासनिक स्तर पर महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए, जिनसे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का नियंत्रण और अधिक सुदृढ़ हो गया। बॉम्बे प्रेजिडेंसी का विस्तार किया गया, जिससे पश्चिमी भारत में ब्रिटिश प्रशासन मजबूत हुआ।
इसी क्रम में नागपुर और आसपास के क्षेत्रों को मिलाकर एक नई प्रशासनिक इकाई — मध्य प्रांत — का गठन किया गया, जिससे प्रशासनिक नियंत्रण अधिक संगठित हुआ। साथ ही, सहायक संधि प्रणाली (Subsidiary Alliance) को और अधिक सुदृढ़ किया गया, जिससे भारतीय राज्यों की स्वतंत्रता और सीमित हो गई।
इसके अतिरिक्त, राजपूत राज्यों के साथ नई संरक्षण संधियाँ संपन्न की गईं, जिसके परिणामस्वरूप वे ब्रिटिश संरक्षण में आ गए और उनकी विदेश नीति पर ब्रिटिश नियंत्रण स्थापित हो गया।
10. तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध का महत्व (Significance)
1761 में पानीपत के तृतीय युद्ध में अहमद शाह अब्दाली ने मराठों को पहला बड़ा झटका दिया था। 1818 में तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध ने उस कहानी का पटाक्षेप किया। शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित और पेशवाओं द्वारा विस्तारित मराठा साम्राज्य का अस्तित्व पूर्णतः समाप्त हो गया।
1818 के पश्चात ब्रिटिश कंपनी के सामने कोई भी प्रभावी भारतीय शक्ति नहीं बची। मैसूर (1799), हैदराबाद (सहायक संधि), राजपूत (1818), मराठा (1818) — सभी ब्रिटिश सर्वोच्चता के अधीन आ गए। केवल पंजाब (सिख) और सिंध शेष स्वतंत्र रहे, जो बाद में 1843 और 1849 में ब्रिटिश अधिकार में आए।
यह युद्ध मुगल साम्राज्य के पतन के बाद उभरी क्षेत्रीय शक्तियों के युग का भी अंत था। अब भारत में एकमात्र सर्वशक्तिमान सत्ता ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी थी। इसने 1857 के विद्रोह तक का मार्ग प्रशस्त किया।
11. निष्कर्ष (Conclusion)
तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध भारतीय इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था। यह युद्ध केवल दो सैन्य शक्तियों का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह दो सभ्यताओं, दो राजनीतिक दर्शनों और दो भिन्न ऐतिहासिक युगों का टकराव था। मराठों की पराजय का मूल कारण उनकी सैन्य दुर्बलता नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक अदूरदर्शिता, आंतरिक कलह और एकता का अभाव था।
लॉर्ड हेस्टिंग्स की कूटनीतिक प्रतिभा और ब्रिटिश सैन्य अनुशासन के सामने बिखरा हुआ मराठा संघ टिक न सका। इस युद्ध ने यह सिद्ध कर दिया कि आंतरिक एकता के बिना कोई भी शक्ति विदेशी आक्रमण का सामना नहीं कर सकती — यह सबक आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
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UPSC/UPPSC/SSC के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
प्रमुख तिथियाँ एवं घटनाएँ
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1802 | बेसिन की संधि — पेशवा ने ब्रिटिश आधिपत्य स्वीकारा |
| 1803 | सुर्जी अर्जुनगाँव संधि (सिंधिया), देवगाँव संधि (भोसले) |
| 1816 | नागपुर संधि — भोसले पर शर्तें थोपी गईं |
| जून 1817 | पूना की संधि — पेशवा ने मराठा संघ नेतृत्व त्यागा |
| नवंबर 1817 | खड़की युद्ध — पेशवा पराजित, पूना छोड़ा |
| नवंबर 1817 | सिताबर्डी युद्ध — भोसले पराजित |
| 1 जनवरी 1818 | कोरेगाँव का युद्ध — पेशवा vs ब्रिटिश (महार सैनिक) |
| जनवरी 1818 | मंदसौर की संधि — होल्कर ने आत्मसमर्पण किया |
| फरवरी 1818 | अष्टी का युद्ध — पेशवा की सेना नष्ट |
| 3 जून 1818 | बाजीराव द्वितीय का आत्मसमर्पण — मैल्कम के सामने |
महत्वपूर्ण संधियाँ–
| संधि | वर्ष | पक्ष | मुख्य शर्त |
|---|---|---|---|
| बेसिन की संधि | 1802 | पेशवा–कंपनी | सहायक सेना स्वीकृति |
| सुर्जी अर्जुनगाँव | 1803 | सिंधिया–कंपनी | दिल्ली, आगरा, भरूच आदि ब्रिटिश को |
| देवगाँव | 1803 | भोसले–कंपनी | कटक और बालासोर ब्रिटिश को |
| पूना संधि | 1817 | पेशवा–कंपनी | मराठा संघ नेतृत्व त्याग |
| ग्वालियर संधि | 1817 | सिंधिया–कंपनी | तटस्थता का वचन |
| मंदसौर संधि | 1818 | होल्कर–कंपनी | राजपूत क्षेत्र त्याग |
परीक्षा हेतु Key Points
→ पेशवाई का अंत: 1818 में बाजीराव द्वितीय के आत्मसमर्पण से पेशवा पद समाप्त। उन्हें 8 लाख रुपये वार्षिक पेंशन पर बिठूर भेजा गया।
→ पिंडारी नेता: चीतू, वासिल मुहम्मद, करीम खाँ — तीनों का अंत 1818 तक हो गया।
→ कोरेगाँव युद्ध का महत्व: 500 ब्रिटिश-महार सैनिक बनाम 28,000 पेशवा सेना — ब्रिटिश अदम्य साहस का प्रतीक; महार रेजिमेंट के लिए सम्मान का दिन (1 जनवरी)।
→ नाना साहब से संबंध: बिठूर में बाजीराव ने धोंडू पंत (नाना साहब) को गोद लिया → 1857 विद्रोह से सीधा संबंध।
→ गवर्नर-जनरल: लॉर्ड हेस्टिंग्स (मार्क्विस ऑफ हेस्टिंग्स) — तृतीय मराठा युद्ध + पिंडारी दमन + नेपाल युद्ध — तीनों उनके कार्यकाल में।
→ ब्रिटिश सर्वोच्चता: 1818 के बाद केवल पंजाब (सिख) और सिंध स्वतंत्र रहे।
→ प्रशासनिक परिणाम: बॉम्बे प्रेजिडेंसी का विस्तार, मध्य प्रांत का गठन, राजपूत राज्यों से नई संरक्षण संधियाँ।
→ स्मरणीय तथ्य: यह युद्ध “पिंडारी युद्ध” के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इसकी शुरुआत पिंडारी दमन अभियान से हुई थी।
PYQs-
1. तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध कब हुआ?
उत्तर: 1817 से 1818 के बीच यह युद्ध लड़ा गया।
2.तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध किनके बीच हुआ?
उत्तर: ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठा संघ के बीच यह युद्ध हुआ।
3.तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध के समय गवर्नर-जनरल कौन था?
उत्तर: इस समय लॉर्ड हेस्टिंग्स गवर्नर-जनरल था।
4.तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध का मुख्य कारण क्या था?
उत्तर: ब्रिटिश विस्तारवादी नीति और मराठों की आंतरिक कमजोरी इसका मुख्य कारण था।
5.तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध में मराठों का नेतृत्व किसने किया?
उत्तर: बाजीराव द्वितीय ने मराठों का नेतृत्व किया।
6.तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध का परिणाम क्या हुआ?
उत्तर: मराठा शक्ति का अंत और ब्रिटिश सर्वोच्चता की स्थापना हुई।
7.पेशवाई का अंत कब हुआ?
उत्तर: 1818 में पेशवा पद समाप्त कर दिया गया।
8.तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध में मराठों की हार क्यों हुई?
उत्तर: आंतरिक फूट, कमजोर नेतृत्व और ब्रिटिश कूटनीति इसके प्रमुख कारण थे।
9.तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध के बाद कौन-सा क्षेत्र ब्रिटिशों के अधीन आया?
उत्तर: मध्य भारत और दक्कन के विशाल क्षेत्र ब्रिटिश नियंत्रण में आ गए।
10.तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध का ऐतिहासिक महत्व क्या है?
उत्तर: यह युद्ध भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की पूर्ण स्थापना का प्रतीक माना जाता है।
LQAs–
- तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध (1817–1818) के कारणों का विश्लेषण कीजिए।
- द्वितीय आंग्ल–मराठा युद्ध के बाद मराठा संघ की स्थिति का वर्णन कीजिए।
- तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध में मराठों की पराजय के कारणों का विस्तार से विवेचन कीजिए।
- तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध के राजनीतिक परिणामों का विश्लेषण कीजिए।
- तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध के आर्थिक प्रभावों का मूल्यांकन कीजिए।
- तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध के पश्चात हुए प्रशासनिक परिवर्तनों की व्याख्या कीजिए।
- तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध में ब्रिटिश कूटनीति की भूमिका का परीक्षण कीजिए।
- मराठा संघ की आंतरिक कमजोरियों का तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध के संदर्भ में विश्लेषण कीजिए।
- क्या तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध भारत में ब्रिटिश सर्वोच्चता की स्थापना का निर्णायक चरण था? समालोचनात्मक टिप्पणी कीजिए।
- तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध में पिंडारियों के प्रश्न की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
- लॉर्ड हेस्टिंग्स की नीतियों का तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध के संदर्भ में मूल्यांकन कीजिए।
- तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध ने भारत के राजनीतिक भूगोल को किस प्रकार परिवर्तित किया? विवेचना कीजिए।
- पेशवा बाजीराव द्वितीय की भूमिका का तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध के संदर्भ में विश्लेषण कीजिए।
- तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध के दीर्घकालीन प्रभावों की समीक्षा कीजिए।