
परिचय
बंगाल में ब्रिटिश शासन की शुरुआत भारतीय इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था। यह वह समय था जब एक व्यापारिक कंपनी धीरे-धीरे एक विशाल साम्राज्य में तब्दील हो रही थी। बंगाल के गवर्नरों ने इस परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
23 जून 1757 को प्लासी के युद्ध के बाद अंग्रेजों की स्थिति बंगाल में मजबूत हो गई। इस युद्ध में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला की हार हुई और अंग्रेजों ने बंगाल पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। यह भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव थी।
गवर्नर की भूमिका केवल प्रशासनिक नहीं थी। वे नीति निर्माता, सैन्य रणनीतिकार और राजस्व प्रबंधक भी थे। प्रत्येक गवर्नर ने अपने कार्यकाल में विभिन्न सुधार किए जिन्होंने भारत के भविष्य को प्रभावित किया।
रॉबर्ट क्लाइव कौन था और उसका कार्यकाल (1757-60, 1765-67)
प्लासी युद्ध और सत्ता की शुरुआत
1. रॉबर्ट क्लाइव का जन्म 29 सितंबर 1725 में हुआ था। वह मध्यमवर्गीय परिवार से थे और 1743 में एक साधारण क्लर्क के रूप में ईस्ट इंडिया कंपनी में शामिल हुए। उनका मुख्य काम गवर्नर को पत्र लिखना था। लेकिन अपनी सूझबूझ और रणनीतिक कौशल से वे तेजी से उच्च पदों पर पहुंचे।
2. प्लासी का युद्ध (23 जून 1757) क्लाइव की सबसे बड़ी सफलता थी। इस युद्ध में उन्होंने कूटनीति और सैन्य रणनीति का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। सिराजुद्दौला के सेनापति मीर जाफर से गुप्त समझौता करके क्लाइव ने युद्ध को अपने पक्ष में मोड़ दिया। यह युद्ध केवल एक दिन में समाप्त हो गया।
3. प्लासी युद्ध की जीत के बाद मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाया गया, लेकिन वास्तविक शक्ति अंग्रेजों के हाथ में थी। क्लाइव को बंगाल का पहला गवर्नर नियुक्त किया गया (1757-60)। उन्हें “भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का संस्थापक” और “ब्रिटिश का बाबर” कहा जाता है।
द्वैध शासन प्रणाली (Dual Government)
1. 1764 में बक्सर का युद्ध हुआ जिसमें अंग्रेजों ने बंगाल के नवाब, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेनाओं को पराजित किया। इस जीत के बाद क्लाइव को 1765 में दूसरी बार बंगाल का गवर्नर बनाकर भारत भेजा गया।
2. द्वैध शासन या दोहरा शासन (1765-1772) क्लाइव की सबसे विवादास्पद नीति थी। इस व्यवस्था में दीवानी का अधिकार (राजस्व संग्रह) कंपनी के पास था और निजामत का अधिकार (प्रशासन और सैन्य व्यवस्था) नवाब के पास रहा।
3. यह व्यवस्था दोषपूर्ण थी। राजस्व तो अंग्रेज इकट्ठा करते थे लेकिन प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं लेते थे। इससे भ्रष्टाचार बढ़ा और 1770 का भयंकर बंगाल का अकाल हुआ जिसमें लाखों लोग मारे गए। अकाल के दौरान भी राजस्व कठोरता से वसूला गया।
4. क्लाइव ने कंपनी के कर्मचारियों के लिए ‘सोसायटी ऑफ ट्रेड’ की स्थापना की जिसे नमक, सुपारी और तंबाकू के व्यापार का एकाधिकार था। उन्होंने निजी व्यापार और भ्रष्टाचार रोकने के प्रयास किए, लेकिन स्वयं भी अपार संपत्ति अर्जित की।
इलाहाबाद की संधियाँ (1765)
इलाहाबाद की प्रथम संधि (12 अगस्त 1765) क्लाइव ने मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय के साथ की। इस संधि के तहत:
- कंपनी को बिहार, बंगाल और उड़ीसा की दीवानी (राजस्व संग्रह का अधिकार) मिली
- सम्राट को 26 लाख रुपये वार्षिक पेंशन देना स्वीकार किया
- इलाहाबाद और कड़ा के जिले सम्राट को दिए गए
इलाहाबाद की द्वितीय संधि (16 अगस्त 1765) अवध के नवाब शुजाउद्दौला के साथ हुई। इसमें: - नवाब ने 50 लाख रुपये युद्ध हर्जाना देना स्वीकार किया
- इलाहाबाद और कड़ा के जिले नवाब से लेकर मुगल सम्राट को दे दिए गए
क्लाइव 1767 में इंग्लैंड लौट गए। वहां उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। 22 नवंबर 1774 को उन्होंने आत्महत्या कर ली। उनका योगदान विवादास्पद है – कुछ उन्हें साम्राज्य निर्माता मानते हैं तो कुछ लुटेरा।
वेरेलस्ट कौन था और उसका कार्यकाल(1767-69)
क्लाइव के बाद हैरी वेरेलस्ट बंगाल का गवर्नर बना। उसका कार्यकाल छोटा लेकिन महत्वपूर्ण था।
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767-69) वेरेलस्ट के शासनकाल में हुआ। यह युद्ध हैदर अली के नेतृत्व में मैसूर और अंग्रेजों के बीच लड़ा गया। हैदर अली एक कुशल सैन्य रणनीतिकार था जिसने फ्रांसीसियों से प्रशिक्षित सेना बनाई थी।
मद्रास की संधि (1769)
युद्ध मद्रास की संधि (1769) से समाप्त हुआ। इस संधि में दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के जीते हुए क्षेत्र वापस करने और आपसी सहयोग का समझौता किया। यह संधि एक समझौता संधि थी जिसमें कोई भी पक्ष पूर्ण विजेता नहीं बना।
वेरेलस्ट के शासनकाल में द्वैध शासन की समस्याएं जारी रहीं। प्रशासनिक अव्यवस्था और भ्रष्टाचार चरम पर था।
वॉरेन हेस्टिंग्स कौन था और उसका कार्यकाल (1772-1785)
वॉरेन हेस्टिंग्स का जन्म 1732 में हुआ था। वह 1750 में 18 वर्ष की उम्र में एक क्लर्क के रूप में कलकत्ता आया। अपनी कार्यकुशलता के कारण वह 1761-64 तक कासिम बाजार का अध्यक्ष रहा।
रेग्युलेटिंग एक्ट 1773
1772 में हेस्टिंग्स बंगाल का गवर्नर बना। उसने सबसे पहले क्लाइव की द्वैध शासन प्रणाली को समाप्त किया। अब संपूर्ण प्रशासन कंपनी के हाथ में आ गया। नवाब को केवल नाममात्र का शासक बना दिया गया।
1773 का रेग्युलेटिंग एक्ट ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया। यह भारत में कंपनी के शासन के लिए पहला लिखित संविधान था। इसके मुख्य प्रावधान:
- बंगाल के गवर्नर को अब ‘गवर्नर जनरल’ की उपाधि दी गई
- मद्रास और बंबई के गवर्नर को बंगाल के गवर्नर जनरल के अधीन किया गया
- गवर्नर जनरल के लिए चार सदस्यीय परिषद का गठन – फिलिप फ्रांसिस, क्लेवरिंग, मॉनसन और बारवेल
- निर्णय बहुमत से होते थे; गवर्नर जनरल केवल मतों के बराबर होने पर निर्णायक मत दे सकता था
पहला गवर्नर जनरल
1. 1774 में हेस्टिंग्स बंगाल का प्रथम गवर्नर जनरल बना। इस प्रकार वह बंगाल का अंतिम गवर्नर और प्रथम गवर्नर जनरल दोनों था। उसका कार्यकाल 1785 तक चला।
2. हेस्टिंग्स को अपनी परिषद से बहुत कठिनाई हुई। फिलिप फ्रांसिस विशेष रूप से उसका विरोधी था और दोनों में निरंतर संघर्ष चलता रहा। 1780 में दोनों के बीच द्वंद्व युद्ध भी हुआ जिसमें फ्रांसिस घायल हो गया।
सुप्रीम कोर्ट (1774)
रेग्युलेटिंग एक्ट के तहत 1774 में कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) की स्थापना हुई। सर एलिजा इम्पे पहले मुख्य न्यायाधीश बने। इसमें एक मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य न्यायाधीश थे।
हेस्टिंग्स ने न्यायिक सुधार किए: - प्रत्येक जिले में दीवानी और फौजदारी न्यायालय स्थापित किए
- दीवानी मामलों में हिंदू कानून और फौजदारी मामलों में मुस्लिम कानून लागू किया
- जिला कलेक्टर को न्यायिक अधिकार दिए गए
मनुस्मृति का अंग्रेजी अनुवाद ‘Code of Gentoo Laws’ (1776) के नाम से उनके कार्यकाल में प्रकाशित हुआ। फतवा-ए-आलमगीरी का भी अनुवाद किया गया।
एशियाटिक सोसाइटी (1784)
1784 में विलियम जोन्स द्वारा एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य भारतीय भाषाओं में रचित ऐतिहासिक पुस्तकों का अंग्रेजी में अनुवाद करना था। यह भारतीय ज्ञान और संस्कृति के अध्ययन का महत्वपूर्ण केंद्र बना।
1781 में कलकत्ता मदरसा की स्थापना मुस्लिम शिक्षा के लिए की गई। 1782 में जोनाथन डंकन ने बनारस में संस्कृत विद्यालय की स्थापना की।
हेस्टिंग्स के शासनकाल में महत्वपूर्ण युद्ध: - प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-82) – सलबाई की संधि (1782) से समाप्त
- द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780-84) – मंगलौर की संधि (1784) से समाप्त
- 1784 में पिट्स इंडिया एक्ट पारित हुआ। इसने बोर्ड ऑफ कंट्रोल की स्थापना की जो कंपनी के राजनीतिक मामलों पर नियंत्रण रखता था। इसके बाद एक नया द्वैध शासन शुरू हुआ – बोर्ड ऑफ कंट्रोल और कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स का। यह 1858 तक चला।
- हेस्टिंग्स ने मुगल सम्राट को दी जाने वाली 26 लाख रुपये की वार्षिक पेंशन बंद कर दी। इलाहाबाद और कड़ा के क्षेत्र वापस ले लिए। इस प्रकार उसने अंग्रेजी शासन को मुगल प्रभुत्व से मुक्त किया।
- नंद कुमार केस हेस्टिंग्स के शासन का विवादास्पद अध्याय है। नंद कुमार ने हेस्टिंग्स पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। इसके बदले उन्हें जालसाजी के आरोप में फांसी दे दी गई। यह न्यायिक हत्या का मामला माना जाता है।
- फरवरी 1785 में हेस्टिंग्स इंग्लैंड लौटा। वहां एडमंड बर्क ने उस पर महाभियोग चलाया जो 1788 से 1795 तक चला। अंततः वह बरी हो गया लेकिन उसकी प्रतिष्ठा धूमिल हो गई।
सर जॉन मैकफर्सन कौन था और उसका कार्यकाल (1785-86)
सर जॉन मैकफर्सन ने फरवरी 1785 से सितंबर 1786 तक गवर्नर जनरल का पद संभाला। यह एक संक्रमणकालीन अवधि थी।
अल्पकालिक शासन
1. मैकफर्सन का शासन कोई विशेष सुधार या घटना के लिए प्रसिद्ध नहीं है। उसने मुख्य रूप से प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखी। उसके शासनकाल में कोई बड़ा युद्ध या संधि नहीं हुई।
2. यह समय ब्रिटिश सरकार द्वारा एक मजबूत और सुधारवादी गवर्नर जनरल की नियुक्ति की तैयारी का था। लॉर्ड कार्नवालिस को इस पद के लिए चुना जा रहा था।
लॉर्ड कार्नवालिस कौन था और उसका कार्यकाल (1786-93, 1805)

चार्ल्स कार्नवालिस (31 दिसंबर 1738 – 5 अक्टूबर 1805) एक महान सुधारक और प्रशासक था। उसने सितंबर 1786 से जुलाई 1793 तक और फिर 1805 में गवर्नर जनरल के रूप में कार्य किया।
स्थायी बंदोबस्त (1793)
कार्नवालिस का सबसे महत्वपूर्ण योगदान स्थायी बंदोबस्त या जमींदारी बंदोबस्त (22 मार्च 1793) था। पिट्स इंडिया एक्ट ने निर्देश दिया था कि भूमिकर का स्थायी बंदोबस्त किया जाए।
कार्नवालिस ने राजस्व बोर्ड के अध्यक्ष सर जॉन शोर और जेम्स ग्रांट से विचार-विमर्श किया। तीन मुख्य प्रश्न थे:
- बंदोबस्त किससे किया जाए?
- बंदोबस्त का आधार क्या हो?
- बंदोबस्त कितनी अवधि के लिए हो?
अंततः निर्णय लिया गया:
- जमींदारों को भूमि का स्वामी माना गया
- उन्हें राजस्व का 8/9 भाग कंपनी को और 1/9 भाग अपने पास रखने का अधिकार मिला
- यह व्यवस्था स्थायी और शाश्वत थी
1790 में पहले दस वर्षीय व्यवस्था (जॉन शोर की व्यवस्था) लागू की गई। 1793 में इसे स्थायी बंदोबस्त में बदल दिया गया। यह व्यवस्था बंगाल, बिहार और उड़ीसा में लागू की गई।
इस व्यवस्था के परिणाम: - जमींदार शक्तिशाली हो गए और किसान शोषित
- सरकार का राजस्व स्थिर हो गया लेकिन भूमि मूल्य वृद्धि का लाभ नहीं मिला
- कृषि में कोई सुधार नहीं हुआ
- भूमिहीन किसानों की संख्या बढ़ी
सिविल सेवा की स्थापना
1. कार्नवालिस को भारतीय सिविल सेवा का जनक कहा जाता है। उसने कोवेनेंटेड सिविल सर्विस की स्थापना की जो बाद में इंडियन सिविल सर्विस (ICS) बनी।
2. उसने भारतीयों को उच्च पदों से बाहर कर दिया। केवल अंग्रेजों को ही महत्वपूर्ण पद दिए जाने लगे। यह नस्लवादी नीति थी जो बाद में भारतीय राष्ट्रवाद का एक कारण बनी।
3. जिले के सभी अधिकार कलेक्टर को दिए गए। कलेक्टर राजस्व संग्रह, पुलिस और न्यायिक कार्यों का प्रमुख बना। इसे भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का इस्पात का चौखटा कहा गया।
न्यायिक सुधार
1793 में कार्नवालिस कोड बनाया गया। यह शक्तियों के पृथक्करण पर आधारित था: - राजस्व प्रशासन को न्यायिक प्रशासन से अलग किया
- चार भ्रमणशील अदालतें स्थापित कीं – तीन बंगाल और एक बिहार के लिए
- भारतीय न्यायाधीशों वाली जिला अदालतें समाप्त कर दीं
कार्नवालिस ने पुलिस चौकियों की स्थापना की। थाना व्यवस्था शुरू हुई जो आज भी जारी है।
उसने कंपनी के कर्मचारियों के निजी व्यापार पर प्रतिबंध लगा दिया। इससे भ्रष्टाचार कम करने का प्रयास हुआ।
तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध
तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790-92) कार्नवालिस के शासनकाल में हुआ। टीपू सुल्तान ने त्रावणकोर पर आक्रमण किया जो अंग्रेजों का मित्र था। यह युद्ध का कारण बना।
श्रीरंगपट्टम की संधि (1792) से युद्ध समाप्त हुआ। इसके तहत: - टीपू को अपने राज्य का आधा हिस्सा देना पड़ा
- 3 करोड़ 30 लाख रुपये युद्ध हर्जाना देना पड़ा
- अपने दो पुत्रों को बंधक के रूप में देना पड़ा
- मालाबार, कन्नड़, कोयंबटूर और डिंडीगुल के क्षेत्र खो दिए
कार्नवालिस 1793 में इंग्लैंड लौट गया। 1805 में वह दूसरी बार गवर्नर जनरल बनकर आया लेकिन गाजीपुर में उसकी मृत्यु हो गई। वहीं उसकी समाधि भी है।
सर जॉन शोर कौन था और उसका कार्यकाल (1793-98)
सर जॉन शोर (बाद में लॉर्ड टेनहम) ने 1793 से 1798 तक गवर्नर जनरल का पद संभाला। वह स्थायी बंदोबस्त के मुख्य वास्तुकार थे और राजस्व बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में कार्नवालिस की सहायता की थी।
तटस्थता की नीति
1. शोर ने तटस्थता की नीति (Policy of Non-Intervention) अपनाई। उसका मानना था कि भारतीय राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। यह नीति कार्नवालिस से मिलती-जुलती थी।
2. 1795 में खर्दा का युद्ध मराठों और निजाम के बीच हुआ। शोर ने हस्तक्षेप नहीं किया यद्यपि निजाम अंग्रेजों का मित्र था। इससे अंग्रेजों की प्रतिष्ठा को धक्का लगा।
3. शोर का शासनकाल अपेक्षाकृत शांत रहा। कोई बड़ा युद्ध या विस्तार नहीं हुआ। लेकिन उसकी तटस्थता की नीति से फ्रांसीसी प्रभाव बढ़ने का खतरा पैदा हो गया।
लॉर्ड वेलेजली कौन था और उसका कार्यकाल (1798-1805)

रिचर्ड वेलेजली भारत में सबसे आक्रामक और साम्राज्यवादी गवर्नर जनरलों में से एक था। उसे ‘बंगाल का शेर’ या ‘बंगाल टाइगर’ कहा जाता है।
सहायक संधि प्रणाली
वेलेजली का सबसे महत्वपूर्ण योगदान सहायक संधि प्रणाली (Subsidiary Alliance System) था। यद्यपि इसकी शुरुआत फ्रांसीसी डूप्ले ने की थी, लेकिन वेलेजली ने इसे व्यवस्थित और व्यापक रूप दिया।
सहायक संधि की मुख्य शर्तें:
- भारतीय राज्य ब्रिटिश सहायक सेना अपने क्षेत्र में रखेंगे
- इस सेना का खर्च भारतीय राज्य वहन करेगा
- राज्य अपनी स्वतंत्र विदेश नीति नहीं रख सकता
- किसी अन्य यूरोपीय शक्ति से संबंध नहीं रख सकता
- राज्य में ब्रिटिश रेजिडेंट रहेगा
- आंतरिक मामलों में सैद्धांतिक स्वायत्तता लेकिन वास्तव में ब्रिटिश नियंत्रण
सहायक संधि स्वीकार करने वाले राज्य:
- हैदराबाद का निजाम (1798-1800)
- मैसूर (1799)
- तंजौर (1799)
- अवध (1801)
- पेशवा (1802 – बेसीन की संधि)
- भोंसले (1803)
- सिंधिया (1804)
- जोधपुर, जयपुर, बूंदी, भरतपुर
1799 में चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध हुआ। टीपू सुल्तान की मृत्यु 4 मई 1799 को श्रीरंगपट्टम में लड़ते हुए हुई। टीपू को ‘मैसूर का शेर’ कहा जाता था। उसने कहा था “शेर की एक दिन की जिंदगी गीदड़ की सौ साल की जिंदगी से बेहतर है।”
1800 में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना वेलेजली ने की। इसका उद्देश्य कंपनी के कर्मचारियों को भारतीय भाषाओं और संस्कृति का प्रशिक्षण देना था।
द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध
31 दिसंबर 1802 को बेसीन की संधि हुई। पेशवा बाजीराव द्वितीय ने यह संधि स्वीकार की। यह पहला मराठा सरदार था जिसने सहायक संधि स्वीकार की।
बेसीन की संधि की शर्तें:
- 6000 सैनिकों की ब्रिटिश सेना पूना में तैनात होगी
- पेशवा 26 लाख रुपये वार्षिक देगा
- पूना में ब्रिटिश रेजिडेंट रहेगा
- सूरत का क्षेत्र अंग्रेजों को देना होगा
इस संधि से मराठा सरदार क्रोधित हो गए। सिंधिया और भोंसले ने इसका विरोध किया और द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-05) शुरू हुआ।
दिल्ली पर अधिकार
लॉर्ड लेक ने सितंबर 1803 में दिल्ली पर अधिकार कर लिया। मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय ब्रिटिश संरक्षण में आ गया। आगरा का किला भी अंग्रेजों के हाथ में आया।
अन्य महत्वपूर्ण संधियां: - देवगांव की संधि (1803) – भोंसले के साथ
- सुर्जी अर्जनगांव की संधि (30 दिसंबर 1803) – सिंधिया के साथ
शिशु वध प्रथा को 1804 में समाप्त किया गया। यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक सुधार था।
वेलेजली ने भारत में ब्रिटिश क्षेत्र को तीन गुना कर दिया। उसे “भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का वास्तविक निर्माता” कहा जाता है। 1805 में कंपनी के निदेशकों ने उसे वापस बुला लिया क्योंकि उसकी आक्रामक नीति से खर्च बहुत बढ़ गया था।
सर जॉर्ज बार्लो कौन था और उसका कार्यकाल (1805-07)
सर जॉर्ज बार्लो ने संक्षिप्त अवधि के लिए कार्य किया। उसने शांति और मितव्ययिता की नीति अपनाई।
वेल्लोर विद्रोह (1806)
10 जुलाई 1806 को वेल्लोर (तमिलनाडु) में सैनिक विद्रोह हुआ। यह भारत में पहला बड़ा सैनिक विद्रोह था, जो 1857 के विद्रोह का पूर्वाभास था।
विद्रोह के कारण:
- सैनिकों की वर्दी और धार्मिक रीति-रिवाजों में हस्तक्षेप
- टीपू सुल्तान के परिवार का प्रभाव जो वेल्लोर में रहता था
- ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों से असंतोष
विद्रोह को कठोरता से दबा दिया गया। सैकड़ों सैनिक मारे गए। टीपू के परिवार को कलकत्ता भेज दिया गया। इस घटना ने सैनिक असंतोष की गंभीरता को उजागर किया।
लॉर्ड मिन्टो प्रथम कौन था और उसका कार्यकाल (1807-13)
गिल्बर्ट इलियट (लॉर्ड मिन्टो) एक शांत और संतुलित शासक था। उसने विस्तार से अधिक समेकन पर जोर दिया।
अमृतसर की संधि (1809)
25 अप्रैल 1809 को अमृतसर की संधि अंग्रेजों और महाराजा रणजीत सिंह के बीच हुई। इस संधि के तहत:
- सतलुज नदी को अंग्रेज और सिख क्षेत्रों की सीमा माना गया
- रणजीत सिंह ने सतलुज के पूर्व में विस्तार नहीं करने का वादा किया
- अंग्रेजों ने रणजीत सिंह के उत्तर-पश्चिमी विस्तार में हस्तक्षेप नहीं करने का आश्वासन दिया
यह संधि दोनों पक्षों के लिए लाभदायक थी। रणजीत सिंह को पंजाब और अफगानिस्तान की ओर विस्तार करने की स्वतंत्रता मिली। अंग्रेज उत्तर-पश्चिम से सुरक्षित हो गए।
चार्टर एक्ट 1813
1813 का चार्टर एक्ट मिन्टो के शासनकाल में पारित हुआ। इसके महत्वपूर्ण प्रावधान: - कंपनी का भारत के व्यापार पर एकाधिकार समाप्त (चाय और चीन के व्यापार को छोड़कर)
- एकतरफा मुक्त व्यापार लागू – अंग्रेज भारत में मुक्त व्यापार कर सकते थे
- ईसाई मिशनरियों को भारत आने की अनुमति – विलियम विल्बरफोर्स के नेतृत्व में पहला दल आया
- भारतीय शिक्षा पर एक लाख रुपये खर्च करने का प्रावधान
- यह अधिनियम भारत में मुक्त व्यापार और ईसाई प्रचार के युग की शुरुआत थी। इससे भारतीय उद्योगों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा क्योंकि अब ब्रिटिश माल बिना किसी रुकावट के आने लगा।
मारक्विस ऑफ हेस्टिंग्स कौन था और उसका कार्यकाल (1813-23)
फ्रांसिस रॉडन हेस्टिंग्स एक महत्वाकांक्षी और विस्तारवादी गवर्नर जनरल था। उसे वॉरेन हेस्टिंग्स से भ्रमित नहीं करना चाहिए।
तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध
1. पिंडारियों का दमन (1817) इस युद्ध का तात्कालिक कारण बना। पिंडारी लुटेरे गिरोह थे जो मध्य भारत में लूटपाट करते थे। हेस्टिंग्स ने उन्हें कुचलने का अभियान शुरू किया।
2. मराठा सरदार पिंडारियों की सहायता कर रहे थे। इससे तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-18) शुरू हुआ। यह अंतिम और निर्णायक युद्ध था।
प्रमुख घटनाएं:
- पेशवा बाजीराव द्वितीय की अंतिम पराजय
- उसे 8 लाख रुपये वार्षिक पेंशन देकर कानपुर के बिठूर भेज दिया गया
- अप्पा साहब (नागपुर) की पराजय
- होल्कर और सिंधिया की अधीनता
- मराठा महासंघ का पूर्ण पतन
मराठा शक्ति का अंत 1818 में हो गया। उनके सभी क्षेत्र अंग्रेजों के अधीन आ गए। यह भारत में ब्रिटिश सर्वोच्चता की स्थापना का प्रतीक था।
गोरखा युद्ध
आंग्ल-नेपाल युद्ध या गोरखा युद्ध (1814-16) भी हेस्टिंग्स के शासनकाल में हुआ। नेपाल की विस्तारवादी नीति युद्ध का कारण बनी।
सुगौली की संधि (1816) से युद्ध समाप्त हुआ: - नेपाल ने कुमाऊं, गढ़वाल, शिमला और नैनीताल के क्षेत्र खो दिए
- एक ब्रिटिश रेजिडेंट काठमांडू में नियुक्त हुआ
- नेपाल सिक्किम को स्वतंत्र करने पर सहमत हुआ
गोरखा सैनिकों की वीरता से प्रभावित होकर अंग्रेजों ने उन्हें अपनी सेना में भर्ती करना शुरू किया। गोरखा रेजिमेंट आज भी भारतीय सेना का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
रैय्यतवाड़ी और महालवाड़ी व्यवस्था
स्थायी बंदोबस्त की समस्याओं के कारण नई भूमि व्यवस्थाएं लागू की गईं:
रैय्यतवाड़ी व्यवस्था (1820): - थॉमस मुनरो ने मद्रास में लागू की
- किसान सीधे सरकार को कर देता था
- मध्यस्थ जमींदार नहीं होता था
- लागू क्षेत्र: मद्रास, बंबई, असम
महालवाड़ी व्यवस्था: - मार्टिन बर्ड ने उत्तर-पश्चिम प्रांत में लागू की
- पूरे गांव या महाल को इकाई माना गया
- ग्रामीण समुदाय संयुक्त रूप से जिम्मेदार
- लागू क्षेत्र: उत्तर प्रदेश, मध्य प्रांत, पंजाब
हिन्दू कॉलेज स्थापना
1817 में राजा राममोहन राय के प्रयासों से डेविड हेयर द्वारा हिन्दू कॉलेज (कलकत्ता) की स्थापना। यह आधुनिक शिक्षा का केंद्र बना। यहां पाश्चात्य विज्ञान, दर्शन और साहित्य की शिक्षा दी जाती थी।
यह कॉलेज बाद में प्रेसीडेंसी कॉलेज और फिर प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय बना। यहां से बंगाल पुनर्जागरण के अनेक नेता निकले।
हेस्टिंग्स का शासनकाल भारत में ब्रिटिश शक्ति के चरम का प्रतीक था। अब कोई भारतीय शक्ति अंग्रेजों को चुनौती नहीं दे सकती थी।
लॉर्ड एमहर्स्ट कौन था और उसका कार्यकाल (1823-28)
- विलियम पिट एमहर्स्ट का शासनकाल युद्धों और विद्रोहों से भरा था।
प्रथम बर्मा युद्ध
प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध (1824-26) एमहर्स्ट के शासन की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी। बर्मा की विस्तारवादी नीति और असम तथा मणिपुर पर आक्रमण युद्ध का कारण बना।
यांडाबू की संधि (24 फरवरी 1826) से युद्ध समाप्त हुआ: - बर्मा ने असम, अराकान, तेनासेरिम और मणिपुर छोड़ दिए
- एक करोड़ रुपये युद्ध हर्जाना देना पड़ा
- रंगून में ब्रिटिश रेजिडेंट की नियुक्ति
यह युद्ध अत्यंत खर्चीला था और इसमें हजारों सैनिक रोग और युद्ध में मारे गए। लेकिन इससे भारत की पूर्वी सीमा सुरक्षित हो गई।
बैरकपुर विद्रोह (1824)
बैरकपुर में सैनिक विद्रोह (नवंबर 1824) हुआ। 47वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के सैनिकों ने बर्मा जाने से इनकार कर दिया।
विद्रोह के कारण: - समुद्र पार जाने से धर्म भ्रष्ट होने का डर
- कम वेतन और खराब सुविधाएं
- अंग्रेज अधिकारियों का अपमानजनक व्यवहार
विद्रोह को कठोरता से दबाया गया। पूरी रेजिमेंट को भंग कर दिया गया। कई सैनिकों को फांसी या कठोर सजा दी गई। यह घटना 1857 के महान विद्रोह की पूर्व चेतावनी थी।
एमहर्स्ट के शासनकाल में भारत-बर्मा सीमा का निर्धारण हुआ। ब्रिटिश साम्राज्य पूर्व में बर्मा तक फैल गया। लेकिन युद्ध का भारी आर्थिक बोझ भी पड़ा।
निष्कर्ष
- बंगाल के गवर्नरों ने भारतीय इतिहास को गहराई से प्रभावित किया। रॉबर्ट क्लाइव से लेकर लॉर्ड एमहर्स्ट तक की यात्रा एक व्यापारिक कंपनी के विशाल साम्राज्य में परिवर्तन की कहानी है।
प्रत्येक गवर्नर ने अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी: - क्लाइव ने नींव रखी
- हेस्टिंग्स ने संस्थागत ढांचा बनाया
- कार्नवालिस ने प्रशासनिक सुधार किए
- वेलेजली ने साम्राज्य का विस्तार किया
- मारक्विस ऑफ हेस्टिंग्स ने भारतीय शक्तियों को पराजित किया
1. इन नीतियों के दूरगामी परिणाम हुए। भूमि व्यवस्थाओं ने कृषि संरचना बदल दी। शिक्षा नीतियों ने आधुनिक भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग पैदा किया। न्यायिक सुधारों ने कानून की एकरूपता लाई।
2. लेकिन यह शोषण और दमन की कहानी भी है। 1770 का भयंकर अकाल, भारतीय उद्योगों का विनाश, किसानों का शोषण, सांस्कृतिक अपमान – ये सब ब्रिटिश शासन के अंधेरे पक्ष थे।
3. वेल्लोर और बैरकपुर के विद्रोह भारतीय असंतोष के संकेत थे जो अंततः 1857 के महान विद्रोह में फूट पड़े। नस्लवादी नीतियों ने भारतीय राष्ट्रवाद को जन्म दिया।
4. सहायक संधि प्रणाली ने भारतीय राज्यों को कमजोर किया लेकिन राजनीतिक एकीकरण का मार्ग भी प्रशस्त किया। एकसमान कानून और प्रशासन ने बाद में एक राष्ट्र के रूप में भारत की पहचान बनाने में मदद की।
5. इन गवर्नरों की नीतियों ने आधुनिक भारत की नींव रखी – अच्छे और बुरे दोनों तरीकों से। उनके द्वारा स्थापित प्रशासनिक संरचना, शिक्षा प्रणाली, न्यायिक व्यवस्था आज भी भारत में दिखाई देती है।
6. 1828 के बाद लॉर्ड विलियम बेंटिक का युग आया जो सुधारों का युग था। लेकिन बंगाल के गवर्नरों ने वह आधार तैयार किया था जिस पर भविष्य की नीतियां बनीं।
7. यह समझना महत्वपूर्ण है कि इतिहास केवल तथ्यों का संग्रह नहीं, बल्कि घटनाओं की समझ है। बंगाल के गवर्नरों का अध्ययन हमें यह समझने में मदद करता है कि कैसे एक छोटी व्यापारिक कंपनी ने पूरे उपमहाद्वीप पर शासन किया।
8. सैन्य शक्ति, कूटनीति, विभाजन की नीति, आर्थिक शोषण और तकनीकी श्रेष्ठता – इन सभी का मिला-जुला प्रयोग ब्रिटिश साम्राज्य की सफलता का रहस्य था। भारतीय शासकों की आपसी फूट, दूरदर्शिता की कमी और सैन्य पिछड़ापन भी महत्वपूर्ण कारक थे।
आज जब हम स्वतंत्र भारत में रहते हैं, तो बंगाल के गवर्नरों का इतिहास हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता कितनी कीमती है और इसे बनाए रखने के लिए एकता, सतर्कता और दृढ़ संकल्प की आवश्यकता है।
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