
संक्रामक रोगों का परिचय
संक्रामक रोग वे रोग होते हैं जो हानिकारक सूक्ष्मजीवों यानी रोगाणुओं के कारण होते हैं। ये रोगाणु एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में वायु, जल, भोजन, रोगवाहक कीट और शारीरिक संपर्क जैसे माध्यमों से फैलते हैं। इसीलिए इन्हें संचरणीय या संक्रामक रोग कहा जाता है। दैनिक जीवन में इसका सबसे सरल उदाहरण यह है कि जब कोई व्यक्ति खांसी या छींक के समय मुंह पर हाथ नहीं रखता, तो उसके थूक की बारीक बूंदों में मौजूद रोगाणु हवा में फैलकर आसपास के लोगों को संक्रमित कर सकते हैं। यही कारण है कि भीड़भाड़ वाली जगहों जैसे बाजार, स्कूल, अस्पताल, बस और रेलगाड़ी में संक्रामक रोग तेजी से फैलते हैं। WHO के अनुसार विश्व में हर साल लाखों लोग संक्रामक रोगों से मरते हैं, जिनमें से अधिकांश मौतें सही जानकारी और समय पर उपचार से बचाई जा सकती हैं।
संक्रामक रोगों का वर्गीकरण
संक्रामक रोगों को मुख्यतः उनके कारण बनने वाले सूक्ष्मजीव की प्रकृति के आधार पर पाँच भागों में बाँटा जाता है। पहला वर्ग है जीवाणु जनित रोग यानी Bacterial Diseases, दूसरा है विषाणु या वायरस जनित रोग यानी Viral Diseases, तीसरा है प्रोटोजोआ जनित रोग यानी Protozoan Diseases, चौथा है कृमि जनित रोग यानी Helminthic Diseases और पाँचवाँ है कवक जनित रोग यानी Fungal Diseases। इनमें से प्रत्येक प्रकार के रोग का संचरण, लक्षण और उपचार अलग-अलग होता है, इसलिए इनकी अलग-अलग समझ जरूरी है।
जीवाणु जनित रोग (Bacterial Diseases)
- हैजा (Cholera)
हैजा एक अत्यंत तीव्र और जानलेवा जलजनित रोग है जो विब्रियो कोलेरी नामक जीवाणु से होता है। यह जीवाणु आकार में अल्पविराम यानी comma जैसा दिखता है। यह रोग मुख्यतः दूषित जल और दूषित खाद्य पदार्थों के सेवन से फैलता है। मक्खियाँ इस रोग को फैलाने में बड़ी भूमिका निभाती हैं क्योंकि वे रोगी के मल पर बैठकर जीवाणु उठाती हैं और फिर खुले भोजन पर बैठ जाती हैं। दैनिक जीवन में गर्मियों के दिनों में सड़क किनारे बिना ढके रखे गोलगप्पे, कटे फल या चाट का पानी अक्सर हैजा फैलाने का माध्यम बनता है। भारत में बाढ़ के बाद या अशुद्ध जलापूर्ति के इलाकों में हैजा की महामारी फूट पड़ती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया भर में हर साल लगभग 13 से 40 लाख लोग हैजे से पीड़ित होते हैं और 21,000 से 1,43,000 लोगों की मृत्यु होती है।
हैजे के मुख्य लक्षणों में तीव्र उल्टी और दस्त सबसे पहले आते हैं। इसके दस्त पानी जैसे और सफेद रंग के होते हैं जिन्हें “चावल के पानी जैसे दस्त” अर्थात Rice water stools कहते हैं, यह हैजे की पहचान का सबसे बड़ा चिह्न है। रोगी के शरीर से इतनी तेजी से पानी और नमक निकल जाता है कि उसे गंभीर निर्जलीकरण यानी Dehydration हो जाती है। इससे पेशाब बंद हो जाती है, हाथ-पैरों में ऐंठन शुरू हो जाती है, आंखें धंस जाती हैं, त्वचा ढीली पड़ जाती है और रक्तचाप गिर जाता है। यदि समय पर इलाज न हो तो कुछ ही घंटों में रोगी की मृत्यु हो सकती है।
हैजे का तत्काल उपचार ORS यानी Oral Rehydration Solution से होता है जो नमक और चीनी का घोल है। घर पर एक लीटर उबले पानी में एक चम्मच नमक और आठ चम्मच चीनी घोलकर ORS बनाया जा सकता है। गंभीर मामलों में अस्पताल में ड्रिप यानी IV fluids देना जरूरी होता है। हैजे का टीका भी उपलब्ध है जो मौखिक रूप से दिया जाता है। बचाव के लिए पानी को कम से कम 15-20 मिनट उबालकर पीना, भोजन को ढककर रखना, खाना खाने से पहले और शौच के बाद साबुन से हाथ धोना, बाजार के खुले खाद्य पदार्थों से परहेज करना और रोगी के मल-मूत्र पर कीटाणुनाशक छिड़कना आवश्यक है।
परीक्षा महत्वपूर्ण तथ्य: हैजा जल-जनित रोग है। कारक जीवाणु विब्रियो कोलेरी है। इसका आकार comma जैसा होता है। मुख्य लक्षण चावल के पानी जैसे दस्त हैं। उपचार ORS से होता है।
- डिप्थीरिया (Diphtheria)
डिप्थीरिया एक वायुजनित संक्रामक रोग है जो कॉरिनबैक्टीरियम डिप्थीरिआई नामक जीवाणु से होता है। यह रोग रोगी के छींकने, खांसने और निकट संपर्क में आने से फैलता है। दैनिक जीवन में स्कूलों में बच्चों के बीच यह रोग तेजी से फैलता है क्योंकि बच्चे एक-दूसरे के पास बैठते हैं और खेलते समय निकट संपर्क में रहते हैं। भारत में टीकाकरण कार्यक्रम से पहले यह रोग बच्चों में मृत्यु का एक प्रमुख कारण था।
डिप्थीरिया की सबसे बड़ी पहचान यह है कि रोगी के गले में एक मोटी सफेद या भूरी-भूरी झिल्ली बन जाती है जो श्वास नलिका को बंद करने लगती है। इससे रोगी को सांस लेने में भारी कठिनाई होती है। साथ ही 102-104°F तक तेज बुखार, गला खराब होना, निगलने में कठिनाई और गर्दन में सूजन जो “बुल नेक” यानी Bull neck कहलाती है, ये सब लक्षण दिखते हैं। यदि समय पर इलाज न हो तो जीवाणु द्वारा उत्पन्न विष हृदय और मस्तिष्क को भी क्षतिग्रस्त कर सकता है।
उपचार के लिए तत्काल एंटीसीरम यानी Anti-toxin Serum का इंजेक्शन लगवाना चाहिए। इसके साथ पेनिसिलिन या एरिथ्रोमाइसिन जैसी एंटीबायोटिक्स दी जाती हैं, रोगी को अलग कमरे में रखा जाता है और पूर्ण आराम व तरल आहार दिया जाता है। DPT टीका यानी Diphtheria, Pertussis, Tetanus वैक्सीन बच्चों को 6 सप्ताह, 10 सप्ताह और 14 सप्ताह की आयु में लगाया जाता है और 16-18 महीने तथा 4-6 वर्ष की आयु में बूस्टर डोज दी जाती है।
परीक्षा महत्वपूर्ण तथ्य: डिप्थीरिया में गले में सफेद झिल्ली बनती है। यह श्वास नलिका को अवरुद्ध कर देती है। DPT टीका तीन रोगों डिप्थीरिया, कुकुर खांसी और टिटेनस से बचाता है।
- क्षय रोग / तपेदिक / टी.बी. (Tuberculosis)
क्षय रोग यानी Tuberculosis एक अत्यंत प्राचीन और व्यापक बीमारी है जिसे यक्ष्मा, काक रोग, राजयक्ष्मा और तपेदिक जैसे नामों से भी जाना जाता है। इसका कारण माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस नामक जीवाणु है। इस जीवाणु की खोज महान जर्मन वैज्ञानिक रॉबर्ट कोच ने 24 मार्च 1882 को की थी, इसीलिए 24 मार्च को प्रतिवर्ष विश्व टीबी दिवस मनाया जाता है। यह रोग मुख्यतः रोगी के खांसने, छींकने और थूकने से हवा में फैले रोगाणुओं से फैलता है। दैनिक जीवन में सार्वजनिक स्थानों पर थूकना टी.बी. फैलाने का सबसे बड़ा कारण है। जब कोई टी.बी. रोगी सार्वजनिक जगह पर थूकता है तो थूक के सूखने के बाद उसके रोगाणु हवा में उड़ते रहते हैं और सांस के साथ दूसरे लोगों के फेफड़ों में पहुंच जाते हैं। इसीलिए सार्वजनिक स्थानों पर थूकना कानूनन अपराध है।
क्षय रोग मुख्यतः फेफड़ों को प्रभावित करता है, जिसे फुफ्फुसीय टी.बी. या Pulmonary TB कहते हैं, लेकिन यह शरीर के किसी भी अंग को प्रभावित कर सकता है जैसे लिम्फ ग्रंथियाँ, आंत, मस्तिष्क, हड्डियाँ, गुर्दे और त्वचा। प्रारंभ में हल्का बुखार जो विशेषकर शाम को आता है, सूखी खांसी जो 2-3 सप्ताह से अधिक समय तक रहे, बिना किसी कारण के वजन में कमी, थकान और कमजोरी, भूख न लगना और रात को पसीना आना जैसे लक्षण दिखते हैं। रोग बढ़ने पर बलगम में खून आना जिसे हीमोप्टाइसिस कहते हैं, सीने में दर्द और सांस लेने में तकलीफ जैसी गंभीर समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
टी.बी. की पहचान के लिए मंटॉक्स टेस्ट, बलगम की AFB जांच, छाती का एक्स-रे और आधुनिक GeneXpert टेस्ट जो मात्र 2 घंटे में परिणाम देता है, उपयोग में लाए जाते हैं। उपचार के लिए WHO द्वारा अनुशंसित DOTS प्रणाली यानी Directly Observed Treatment Short-course अपनाई जाती है। इसमें रिफैम्पिसिन, आइसोनियाजिड, पायराजिनामाइड और एथमब्युटोल नामक दवाएं दी जाती हैं। नए मामलों में 6 महीने और पुराने जटिल मामलों में 9-12 महीने का उपचार होता है। MDR-TB यानी Multi-Drug Resistant TB में रिफैम्पिसिन और आइसोनियाजिड दोनों काम नहीं करतीं इसलिए 18-24 महीने का लंबा उपचार करना पड़ता है।
BCG यानी Bacillus Calmette-Guérin टीका टी.बी. से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय है। इसे फ्रांस के वैज्ञानिकों कालमेट और गुएरिन ने विकसित किया था। यह टीका जन्म के तुरंत बाद या 48 घंटे के भीतर बाएं कंधे के ऊपरी भाग में लगाया जाता है। टीके से त्वचा पर जो निशान पड़ता है वह BCG की सफलता का प्रमाण होता है।
भारत में टी.बी. की स्थिति बेहद चिंताजनक है। WHO की रिपोर्ट 2024 के अनुसार भारत में विश्व के सबसे अधिक टीबी रोगी हैं और लगभग 3% मामले MDR-TB के हैं। 2015-2023 के बीच टीबी मामलों में 17.7% की कमी आई है। भारत सरकार ने 2025 तक टीबी उन्मूलन का लक्ष्य रखा है जो विश्व लक्ष्य 2030 से 5 वर्ष पहले है। निक्षय पोषण योजना के तहत रोगियों को पोषण सहायता दी जाती है और निक्षय मित्र कार्यक्रम से सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा मिल रहा है।
परीक्षा महत्वपूर्ण तथ्य: क्षय रोग की खोज रॉबर्ट कोच ने 1882 में की। BCG टीका कालमेट और गुएरिन ने बनाया। उपचार की मुख्य दवा रिफैम्पिसिन है। DOTS का अर्थ है प्रत्यक्ष निरीक्षण में अल्पकालिक उपचार। विश्व टीबी दिवस 24 मार्च को मनाया जाता है।
- कुष्ठ रोग / कोढ़ (Leprosy / Hansen’s Disease)
कुष्ठ रोग जिसे Hansen’s Disease भी कहते हैं, माइकोबैक्टीरियम लेप्री नामक जीवाणु से होता है। यह जीवाणु नॉर्वे के वैज्ञानिक G.H. Armauer Hansen ने 1873 में खोजा था, इसीलिए इसे Hansen’s Disease कहते हैं। कुष्ठ रोग के बारे में सबसे महत्वपूर्ण और गलतफहमी दूर करने वाला तथ्य यह है कि यह न तो पैतृक रोग है, न आनुवांशिक और न ही पाप का फल। यह वायु या जल से नहीं फैलता बल्कि केवल घनिष्ठ और लंबे समय के संपर्क से फैलता है। दैनिक जीवन में भारत में कुष्ठ रोग को अभिशाप समझा जाता था और रोगियों को समाज से बाहर कर दिया जाता था। लेकिन आधुनिक चिकित्सा ने साबित किया है कि यह एक सामान्य संक्रामक रोग है जो पूरी तरह ठीक हो सकता है।
कुष्ठ रोग के लक्षण मुख्यतः त्वचा और तंत्रिकाओं से संबंधित होते हैं। त्वचा पर सफेद या लाल चकत्ते पड़ जाते हैं और उस प्रभावित भाग में स्पर्श की अनुभूति खत्म हो जाती है। यह संवेदनशीलता की कमी यानी Loss of Sensation कुष्ठ रोग की विशिष्ट पहचान है। इसके अलावा त्वचा मोटी होने लगती है, गांठें बन जाती हैं और परिधीय तंत्रिकाएं प्रभावित होती हैं। रोग बढ़ने पर उंगलियों का टेढ़ापन जिसे Claw hand कहते हैं, पैर की उंगलियों का झुकना, चेहरे की विकृति जिसे Lion face कहते हैं और आंखों में संक्रमण से अंधापन हो सकता है।
कुष्ठ रोग दो प्रकार का होता है। ट्यूबरक्युलॉइड कुष्ठ कम गंभीर और कम संक्रामक होता है जिसमें केवल कुछ चकत्ते होते हैं। लेप्रोमेटस कुष्ठ अधिक गंभीर और अधिक संक्रामक होता है और पूरे शरीर में फैल जाता है।
उपचार के लिए MDT यानी Multi-Drug Therapy 1981 से प्रारंभ हुई जिसमें डेप्सोन, क्लोफाजीमीन और रिफैम्पिसिन तीन दवाएं दी जाती हैं। पॉसीबैसिलरी कुष्ठ में 6 महीने और मल्टीबैसिलरी कुष्ठ में 12 महीने का उपचार होता है। WHO द्वारा ये दवाएं सभी रोगियों को निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती हैं। भारत 2005 में कुष्ठ उन्मूलन के लक्ष्य को प्राप्त कर चुका है लेकिन अभी भी नए मामले आते रहते हैं।
परीक्षा महत्वपूर्ण तथ्य: कुष्ठ रोग माइकोबैक्टीरियम लेप्री से होता है। उपचार MDT से होता है। तीन दवाएं हैं डेप्सोन, क्लोफाजीमीन और रिफैम्पिसिन। यह आनुवांशिक रोग नहीं है और पूर्णतः इलाज योग्य है।
- टिटेनस / धनुस्तंभ (Tetanus)
टिटेनस को धनुस्तंभ या धनुष टंकार भी कहते हैं। यह क्लोस्ट्रीडियम टिटेनी नामक जीवाणु से होता है जो एक एनारोबिक जीवाणु है यानी यह ऑक्सीजन के बिना भी जीवित रहता है। इस जीवाणु के बीजाणु यानी Spores धूल, मिट्टी और गोबर में पाए जाते हैं और वर्षों तक जीवित रह सकते हैं। जब किसी को जंग लगी कील, कांटे या किसी नुकीली चीज से गहरी चोट लगती है और वह घाव ठीक से साफ नहीं होता तो मिट्टी में मौजूद बीजाणु घाव में पहुंच जाते हैं और वहाँ एक शक्तिशाली विष टेटानोस्पैज्मिन बनाते हैं। दैनिक जीवन में खेत में काम करते समय या बच्चों के खेलते समय जो हल्की-फुल्की चोट लगती है उसे यदि साफ न किया जाए तो टिटेनस का खतरा हो सकता है। यही कारण है कि किसी भी चोट पर तुरंत एंटीसेप्टिक लगाना जरूरी है।

टिटेनस के लक्षण 3 से 21 दिन की उद्भवन अवधि के बाद शुरू होते हैं। सबसे पहले जबड़े में अकड़न होती है जिसे Lockjaw कहते हैं और मुंह खोलने में कठिनाई होती है। फिर गर्दन की मांसपेशियाँ अकड़ने लगती हैं। धीरे-धीरे चेहरे पर एक विचित्र मुस्कान जैसा भाव आ जाता है जिसे Sardonic Smile कहते हैं। रोग के गंभीर होने पर पूरा शरीर धनुष की तरह मुड़ जाता है जिसे Opisthotonos कहते हैं, पूरे शरीर में दर्दनाक ऐंठन होती है और श्वसन की मांसपेशियों के पक्षाघात से सांस रुकने का खतरा बन जाता है। टिटेनस में मृत्यु दर 10-20% है।
चोट लगने पर ATS यानी Anti-Tetanus Serum या TIG यानी Tetanus Immunoglobulin 24 घंटे के भीतर लगवाना बेहद जरूरी है। घाव को हाइड्रोजन पेरोक्साइड से साफ करना, एंटीबायोटिक्स जैसे मेट्रोनिडाजोल देना और गंभीर मामलों में वेंटिलेटर सहायता दी जाती है। बचाव के लिए DPT टीका लगाया जाता है जो डिप्थीरिया, कुकुर खांसी और टिटेनस तीनों से एक साथ सुरक्षा देता है। गर्भवती महिलाओं को TT यानी Tetanus Toxoid के 2 डोज लगाए जाते हैं जिससे नवजात टिटेनस से बचाव होता है।
परीक्षा महत्वपूर्ण तथ्य: टिटेनस का कारक क्लोस्ट्रीडियम टिटेनी है। मुख्य लक्षण जबड़े में अकड़न यानी Lockjaw है। चोट लगने पर तत्काल ATS लगाना जरूरी है। DPT टीका तीन रोगों से बचाता है।
- टायफॉइड / मोतीझरा / मियादी बुखार (Typhoid Fever)
टायफॉइड को मोतीझरा या मियादी बुखार भी कहते हैं। यह साल्मोनेला टाइफी नामक जीवाणु से होता है। यह एक जलजनित रोग है जो दूषित पानी और दूषित भोजन के सेवन से फैलता है। मक्खियाँ इसे मल से उठाकर भोजन तक पहुंचाती हैं। कुछ लोग स्वस्थ दिखते हुए भी इस जीवाणु को फैलाते रहते हैं, उन्हें Carrier कहा जाता है। दैनिक जीवन में गर्मियों में सड़क किनारे मिलने वाली कुल्फी, आइसक्रीम या शरबत अक्सर दूषित पानी से बनी होती है और इनसे टायफॉइड फैलने का खतरा रहता है। भारत में हर साल लाखों लोग टायफॉइड से पीड़ित होते हैं, खासकर बरसात और गर्मी के मौसम में।
टायफॉइड की उद्भवन अवधि 5 से 20 दिन होती है जिसका औसत 10 से 14 दिन है। पहले सप्ताह में धीरे-धीरे बुखार बढ़ता है जो सुबह कम और शाम को अधिक रहता है, सिरदर्द लगातार बना रहता है, भूख नहीं लगती, कब्ज या दस्त होते हैं। दूसरे सप्ताह में बुखार 103-104°F तक पहुंच जाता है, शरीर पर गुलाबी रंग के दाने जिन्हें Rose spots कहते हैं दिखाई देते हैं और प्लीहा यानी तिल्ली का आकार बढ़ जाता है। तीसरे सप्ताह में आंतों में अल्सर बन जाते हैं जिससे आंत में छेद होने का खतरा रहता है।
निदान के लिए विडाल टेस्ट सबसे प्रसिद्ध जांच है जिसमें 1:160 या अधिक टाइटर टायफॉइड की पुष्टि करता है। पहले सप्ताह में Blood Culture सबसे सटीक जांच होती है। टाइफीडॉट टेस्ट भी तेज और सटीक जांच है जो IgM और IgG एंटीबॉडी की पहचान करता है।
उपचार में एज़िथ्रोमाइसिन, सिप्रोफ्लोक्सासिन, सेफ्ट्रिएक्सोन जैसी एंटीबायोटिक्स दी जाती हैं। रोगी को पूर्ण आराम, तरल आहार यानी दही, दलिया, खिचड़ी और पर्याप्त पानी देना जरूरी है। TAB वैक्सीन और TCV यानी Typhoid Conjugate Vaccine टायफॉइड से बचाव करती हैं।
परीक्षा महत्वपूर्ण तथ्य: टायफॉइड का कारक साल्मोनेला टाइफी है। यह जलजनित रोग है। निदान के लिए विडाल टेस्ट प्रसिद्ध है। उद्भवन काल 5-20 दिन है। टीके TAB और TCV हैं।
- प्लेग (Plague)
प्लेग इतिहास की सबसे भयानक महामारियों में से एक है। 14वीं सदी में यूरोप में इसने “ब्लैक डेथ” के रूप में जो तबाही मचाई उससे यूरोप की एक तिहाई से अधिक जनसंख्या मारी गई थी जो लगभग 7.5 से 20 करोड़ लोग थे। भारत में 1994 में सूरत, गुजरात में प्लेग की महामारी फैली जिससे पूरे देश में दहशत फैल गई थी। प्लेग का कारक जीवाणु पाश्चुरेला पेस्टिस या यर्सिनिया पेस्टिस है। इसका सबसे खतरनाक रोगवाहक जेनोप्सिला केओपिस नामक पिस्सू है जो चूहों पर पाया जाता है। दैनिक जीवन में झुग्गी-झोपड़ियों और गंदे इलाकों में चूहों की अधिकता के कारण प्लेग फैलने का खतरा बना रहता है।
प्लेग तीन प्रकार का होता है। बुबोनिक प्लेग सबसे सामान्य है जिसमें लिम्फ नोड्स में गिल्टियाँ यानी Buboes बन जाती हैं और यह 90% मामलों में पाया जाता है। सेप्टिसीमिक प्लेग में संक्रमण रक्त में फैल जाता है। न्यूमोनिक प्लेग सबसे खतरनाक है जिसमें फेफड़े प्रभावित होते हैं और यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में सीधे फैल सकता है।
बुबोनिक प्लेग में अचानक 103-106°F तेज बुखार आता है, कंपकंपी होती है, गर्दन, बगल और जांघ में दर्दनाक सूजी हुई गिल्टियाँ बन जाती हैं जो काले रंग की हो जाती हैं और त्वचा पर काले धब्बे पड़ जाते हैं। इसीलिए इसे “ब्लैक डेथ” कहा जाता है। न्यूमोनिक प्लेग में यदि उपचार न हो तो 24-72 घंटे में मृत्यु हो सकती है।
उपचार में स्ट्रेप्टोमाइसिन, जेंटामाइसिन, डॉक्सीसाइक्लिन और सिप्रोफ्लोक्सासिन जैसी एंटीबायोटिक्स दी जाती हैं। बचाव के लिए चूहों को जिंक फॉस्फेट से मारना, DDT से पिस्सू नियंत्रण करना और संक्रमित व्यक्तियों को अलग रखना यानी Quarantine करना जरूरी है।
परीक्षा महत्वपूर्ण तथ्य: प्लेग का कारक यर्सिनिया पेस्टिस है। रोगवाहक जेनोप्सिला केओपिस यानी चूहे का पिस्सू है। उपचार स्ट्रेप्टोमाइसिन और सल्फा ड्रग्स से होता है। चूहों को जिंक फॉस्फेट से मारा जाता है।
- काली खांसी / कुकुर खांसी (Whooping Cough / Pertussis)
काली खांसी जिसे कुकुर खांसी या Whooping Cough भी कहते हैं, बोर्डीटेला पर्टुसिस नामक जीवाणु से होती है। यह मुख्यतः 6 महीने से 5 वर्ष के छोटे बच्चों को प्रभावित करती है और हवा के माध्यम से फैलती है। यह अत्यंत संक्रामक रोग है। दैनिक जीवन में यदि स्कूल या क्रेच में एक बच्चे को काली खांसी हो जाए तो यह तेजी से अन्य बच्चों में फैल जाती है क्योंकि बच्चे एक-दूसरे के पास रहते और खेलते हैं। इस रोग में खांसी की आवाज “हूप-हूप” जैसी होती है इसीलिए इसे Whooping Cough कहा जाता है।
प्रारंभ में 1-2 सप्ताह तक सामान्य सर्दी-जुकाम जैसे लक्षण रहते हैं। फिर गंभीर चरण में 2-8 सप्ताह तक लगातार 10-20 बार खांसी के दौरे पड़ते हैं जिसके बाद “हूप” की आवाज के साथ सांस ली जाती है। खांसते-खांसते उल्टी भी हो सकती है और चेहरा लाल या नीला पड़ जाता है। शिशुओं में यह रोग अत्यंत खतरनाक है क्योंकि इससे निमोनिया, दौरे और यहाँ तक कि मृत्यु भी हो सकती है। 6 महीने से कम आयु के शिशुओं में मृत्यु दर 1% तक होती है।

उपचार में एज़िथ्रोमाइसिन या एरिथ्रोमाइसिन जैसी एंटीबायोटिक्स प्रारंभिक चरण में प्रभावी होती हैं। DPT टीका इस रोग से सबसे अच्छा बचाव है और टीकाकरण से गंभीर मामलों में 90% की कमी आती है।
परीक्षा महत्वपूर्ण तथ्य: काली खांसी का कारक बोर्डीटेला पर्टुसिस है। मुख्य लक्षण “हूप-हूप” की आवाज के साथ खांसी है। टीका DPT तीन रोगों से बचाता है। यह मुख्यतः छोटे बच्चों को प्रभावित करती है।
- एंथ्रैक्स / प्लीहा ज्वर (Anthrax)
एंथ्रैक्स जिसे प्लीहा ज्वर भी कहते हैं, बैसीलस एन्थ्रैसिस नामक जीवाणु से होता है। यह मुख्यतः शाकाहारी पशुओं का रोग है लेकिन मनुष्यों में भी फैल सकता है। इस जीवाणु की सबसे खतरनाक विशेषता यह है कि यह बीजाणु बनाता है जो वर्षों, यहाँ तक कि दशकों तक मिट्टी में जीवित रह सकते हैं। दैनिक जीवन में चर्म उद्योग में काम करने वाले लोग, पशु चिकित्सक और कसाई इस रोग के उच्च जोखिम में होते हैं। 2001 में अमेरिका में एंथ्रैक्स बीजाणुओं को डाक द्वारा लिफाफों में भेजा गया था जिससे 22 लोग संक्रमित हुए और 5 की मृत्यु हुई। यह जैव-आतंकवाद का एक कुख्यात उदाहरण है।
एंथ्रैक्स तीन प्रकार का होता है। त्वचीय एंथ्रैक्स सबसे सामान्य है जो 95% मामलों में होता है और इसमें त्वचा पर काला घाव यानी Black Eschar बनता है जो दर्द रहित होता है। श्वसन एंथ्रैक्स सबसे घातक है जिसमें बीजाणुओं को सांस द्वारा अंदर लेने से फेफड़े प्रभावित होते हैं और यदि उपचार न हो तो मृत्यु दर 90% तक होती है। आंत्र एंथ्रैक्स संक्रमित मांस खाने से होता है और दुर्लभ लेकिन गंभीर होता है।
एंथ्रैक्स को जैविक हथियार के रूप में उपयोग किया जा सकता है। IAS Main 2003 में यह जानकारी पूछी गई थी कि एक विमान से 110 पौंड बीजाणु 12 मील के क्षेत्र में फैलाए जा सकते हैं। उपचार में पेनिसिलिन, सिप्रोफ्लोक्सासिन और डॉक्सीसाइक्लिन दी जाती हैं। भारतीय वैक्सीन JNU के डॉ. योगेंद्र सिंह ने विकसित की है जो अमेरिकी और ब्रिटिश टीके से बेहतर मानी जाती है और एक ही खुराक में काम करती है।
परीक्षा महत्वपूर्ण तथ्य: एंथ्रैक्स का कारक बैसीलस एन्थ्रैसिस है। त्वचीय एंथ्रैक्स में काला घाव बनता है। उपचार पेनिसिलिन से होता है। भारतीय वैक्सीन डॉ. योगेंद्र सिंह ने बनाई।
- निमोनिया / न्यूमोकोकल रोग (Pneumonia)
निमोनिया फेफड़ों का एक गंभीर संक्रमण है जो मुख्यतः स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनी नामक जीवाणु से होता है। यह 2 वर्ष से कम और 65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को सबसे अधिक प्रभावित करता है। विश्व में 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु का निमोनिया एक प्रमुख कारण है। दैनिक जीवन में सर्दियों में या मानसून के दौरान ठंड और नमी के कारण निमोनिया के मामले बढ़ जाते हैं। बुजुर्गों और छोटे बच्चों को इस मौसम में विशेष सावधानी रखनी चाहिए।
निमोनिया में अचानक 103-105°F तक तेज बुखार आता है, कंपकंपी होती है, खांसी पहले सूखी और बाद में जंग के रंग का बलगम यानी Rusty Sputum लिए हुई होती है जो इस रोग की विशिष्ट पहचान है। सीने में छुरा घोंपने जैसा दर्द होता है जो सांस लेने पर बढ़ता है। तेज सांस चलने लगती है और होंठ व नाखून नीले पड़ सकते हैं।
उपचार में एमोक्सिसिलिन, एज़िथ्रोमाइसिन और गंभीर मामलों में सेफ्ट्रिएक्सोन दी जाती हैं। ऑक्सीजन थेरेपी और IV तरल पदार्थ भी आवश्यक होते हैं। बचाव के लिए न्यूमोकोकल कॉन्जुगेट वैक्सीन यानी PCV लगाई जाती है। भारत ने 2020 में अपना स्वदेशी न्यूमोसिल टीका विकसित किया। इसके अलावा बैसिलस हीमोफिलस इन्फ्लुएंजा नामक जीवाणु भी छोटे बच्चों में निमोनिया और मस्तिष्क ज्वर का कारण बनता है जिससे बचाव के लिए Hib वैक्सीन दी जाती है।
परीक्षा महत्वपूर्ण तथ्य: निमोनिया का कारक स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनी है। विशिष्ट लक्षण जंग के रंग का बलगम है। टीका PCV है। भारतीय टीका न्यूमोसिल 2020 में लॉन्च हुआ। बैसिलस हीमोफिलस इन्फ्लुएंजा बच्चों में मैनिनजाइटिस का कारण है।
- गोनोरिया / सुजाक (Gonorrhea)
गोनोरिया एक यौन संचारित रोग है जो निसेरिया गोनोरी नामक जीवाणु से होता है। यह लैंगिक संपर्क से फैलता है। इसमें पेशाब में जलन, पीले-हरे रंग का स्राव और पेडू में दर्द जैसे लक्षण होते हैं। महिलाओं में यह अक्सर बिना लक्षणों के रहता है जिससे यह चुपचाप फैलता रहता है। यदि उपचार न हो तो यह बांझपन का कारण बन सकता है। उपचार में सेफ्ट्रिएक्सोन और एज़िथ्रोमाइसिन दी जाती हैं।
- सिफलिस / उपदंश (Syphilis)
सिफलिस एक यौन संचारित रोग है जो ट्रेपोनेमा पैलिडम नामक जीवाणु से होता है। यह लैंगिक संपर्क से फैलता है। इसके तीन चरण होते हैं। प्राथमिक चरण में जननांगों पर दर्द रहित घाव यानी Chancre बनता है। द्वितीयक चरण में पूरे शरीर पर चकत्ते पड़ जाते हैं। तृतीयक चरण में हृदय और मस्तिष्क प्रभावित होते हैं। गर्भवती महिला से यह गर्भस्थ शिशु को भी हो सकता है जिसे Congenital Syphilis कहते हैं। उपचार पेनिसिलिन से होता है।
- भोजन विषाक्तता (Food Poisoning)
भोजन विषाक्तता साल्मोनेला बैसिलाई नामक जीवाणु से मुख्यतः होती है, हालांकि Staphylococcus aureus और Clostridium perfringens भी इसके अन्य कारण हैं। दूषित या बासी भोजन खाने के 2-6 घंटे के भीतर उल्टी, दस्त, पेट दर्द और बुखार जैसे लक्षण आ जाते हैं। दैनिक जीवन में शादी-समारोहों या सामूहिक भोजन में सैकड़ों लोग एक साथ भोजन विषाक्तता का शिकार हो जाते हैं। उपचार में ORS और एंटीबायोटिक्स दी जाती हैं।
- बोटुलिज्म (Botulism)
बोटुलिज्म क्लोस्ट्रिडियम बोटुलिनम नामक जीवाणु द्वारा उत्पन्न विष से होता है। यह विश्व के सबसे घातक प्राकृतिक विषों में से एक है। मुख्यतः डिब्बाबंद भोजन में यह जीवाणु बिना ऑक्सीजन के पनपता है। इससे पक्षाघात, दृष्टि समस्याएं और निगलने में कठिनाई जैसे लक्षण होते हैं। उपचार में एंटीटॉक्सिन और वेंटिलेटर सहायता दी जाती है।
परीक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य
टीकाकरण सारणी :
BCG टीका क्षय रोग से बचाव करता है और जन्म के 48 घंटे के भीतर बाएं कंधे में लगाया जाता है। DPT टीका डिप्थीरिया, कुकुर खांसी और टिटेनस तीनों से एक साथ बचाव करता है और 6, 10, 14 सप्ताह में लगता है। Hib वैक्सीन मस्तिष्क ज्वर और निमोनिया से बचाव करती है। PCV यानी Pneumococcal Conjugate Vaccine न्यूमोकोकल रोग से बचाती है। TAB और TCV टायफॉइड से बचाव करती हैं। ATS यानी Anti-Tetanus Serum चोट लगने पर 24 घंटे के भीतर लगाया जाता है।
प्रमुख खोजकर्ता और उनके योगदान:
रॉबर्ट कोच ने 1882 में टी.बी. के जीवाणु माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस की खोज की थी। एडवर्ड जेनर को टीकाकरण का जनक कहा जाता है जिन्होंने 1796 में चेचक का टीका विकसित किया था। कालमेट और गुएरिन ने BCG टीका बनाया। लुई पाश्चर ने रेबीज का टीका और पाश्चरीकरण की विधि खोजी। ए. लेवेरॉन ने मलेरिया परजीवी की खोज की। G.H. Armauer Hansen ने 1873 में कुष्ठ रोग के जीवाणु की खोज की। रॉनाल्ड रॉस ने 1897 में मलेरिया परजीवी का जीवन चक्र खोजा।
विश्व स्वास्थ्य दिवस:
विश्व टीबी दिवस 24 मार्च को मनाया जाता है। विश्व मलेरिया दिवस 25 अप्रैल को मनाया जाता है। विश्व एड्स दिवस 1 दिसंबर को मनाया जाता है। विश्व स्वास्थ्य दिवस 7 अप्रैल को मनाया जाता है। विश्व कुष्ठ रोग दिवस जनवरी के अंतिम रविवार को मनाया जाता है।
रोग → कारक → संचरण → उपचार → टीका
हैजा: विब्रियो कोलेरी → दूषित जल/भोजन → ORS, ड्रिप → हैजा वैक्सीन
डिप्थीरिया: कॉरिनबैक्टीरियम डिप्थीरिआई → हवा → एंटीटॉक्सिन → DPT
टी.बी.: माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस → हवा → DOTS (रिफैम्पिसिन) → BCG
कुष्ठ: माइकोबैक्टीरियम लेप्री → निकट संपर्क → MDT → नहीं
टिटेनस: क्लोस्ट्रीडियम टिटेनी → घाव → ATS → DPT
टायफॉइड: साल्मोनेला टाइफी → दूषित जल/भोजन → एज़िथ्रोमाइसिन → TAB/TCV
प्लेग: यर्सिनिया पेस्टिस → पिस्सू (चूहा) → स्ट्रेप्टोमाइसिन → प्लेग वैक्सीन
काली खांसी: बोर्डीटेला पर्टुसिस → हवा → एज़िथ्रोमाइसिन → DPT
एंथ्रैक्स: बैसीलस एन्थ्रैसिस → संक्रमित पशु/बीजाणु → पेनिसिलिन → एंथ्रैक्स वैक्सीन
निमोनिया: स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनी → हवा → एमोक्सिसिलिन → PCV/न्यूमोसिल
गोनोरिया: निसेरिया गोनोरी → यौन संपर्क → सेफ्ट्रिएक्सोन → नहीं
सिफलिस: ट्रेपोनेमा पैलिडम → यौन संपर्क → पेनिसिलिन → नहीं
MCQ: प्रश्न और उत्तर
- गोनोरिया किस जीवाणु से होता है? – निसेरिया गोनोरी (Neisseria gonorrhoeae)
- BCG का पूर्ण रूप क्या है? – बैसिलस कैलमेट गुएरिन (Bacillus Calmette-Guérin)
- रिफैम्पिसिन किस रोग में प्रयुक्त होती है? – टी.बी. (क्षय रोग)
- टायफॉइड में शरीर का कौन-सा अंग प्रभावित होता है? – आंत (छोटी आंत)
- DPT टीका किन तीन रोगों से बचाता है? – डिप्थीरिया, कुकुर खांसी (पर्टुसिस), टिटेनस
- सिफलिस किस जीवाणु से होता है? – ट्रेपोनेमा पैलिडम (Treponema pallidum)
- प्रतिरोधी सूक्ष्म जीवों का विकास रोकने वाले पदार्थ क्या कहलाते हैं? – एंटीबायोटिक (Antibiotics)
- BCG का टीका नवजात शिशु को कब लगाया जाता है? – जन्म के तुरंत बाद या 48 घंटे के भीतर
- संदूषित जल से कौन-सा रोग नहीं होता? – खसरा (Measles) – यह वायरस जनित हवा से फैलने वाला रोग है
- कौन-सा रोग जीवाणु द्वारा होता है और मक्खियों द्वारा फैलता है? – टायफॉइड
- रोहिणी, कुकर-खांसी, टिटेनस से बचाव के लिए कौन-सा टीका दिया जाता है? – DPT (डीपीटी)
- टायफॉइड और कॉलरा किस प्रकार के रोग हैं? – जल-जन्य रोग (Water-borne diseases)
- ‘The Clock is Ticking’ किस दिवस की 2021 की थीम थी? – विश्व टीबी दिवस, 2021
- न्यूमोकोकल संयुग्मी वैक्सीन किन रोगों से बचाती है? – निमोनिया, मैनिनजाइटिस (तानिकाशोथ), सेप्सिस (IAS 2020)
- निमोनिया किसका संक्रमण है? – फेफड़े का
- बैसिलस हीमोफिलस इन्फ्लुएंजा क्या कारक है? – छोटे बच्चों में मैनिनजाइटिस (मस्तिष्क ज्वर) का (UPPCS 2022)
- रोग पैदा करने वाला सूक्ष्मजीव क्या है? – रोगाणु/बैक्टीरिया (Pathogens/Bacteria) – (UPPCS 2024)
- विश्व में प्लेग रोग की शुरुआत कहाँ से मानी जाती है? – चीन से
- कुष्ठ रोग के लिए MDT में कौन-सी तीन दवाएं हैं? – डेप्सोन, क्लोफाजीमीन, रिफैम्पिसिन
- मलेरिया परजीवी की खोज किसने की? – ए. लेवेरॉन (A. Laveran)
- कुनैन (मलेरिया की दवा) किस पौधे से प्राप्त होती है? – सिनकोना (Cinchona)
- चूहे मारने के लिए कौन-सा रसायन प्रयोग होता है? – जिंक फॉस्फेट (Zinc Phosphate)
- प्लेग का रोगवाहक कौन है? – जेनोप्सिला केओपिस (चूहे का पिस्सू)
- एंथ्रैक्स को अन्य किस नाम से जाना जाता है? – प्लीहा ज्वर (Spleen fever)
- भारत में न्यूमोकोकल वैक्सीन का नाम क्या है? – न्यूमोसिल (Pneumosil) – 2020 में लॉन्च
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